कुल 169 लेख

  • 25 Feb
    Oyindrila Basu

    समाज में लिंग विभेद से लड़ना मुश्किल नहीं । 

    ling bhed

    "स्त्री -पुरुष जीवन रुपी गाडी के अगले और पिछले पहिये हैं", इस कथन से समाज साफ़ बता देता है, कि वे पहिये साथ तो चलते हैं, पर एक पायदान पर नहीं आ सकते। सामाजिक तौर पर, एक आदमी को कमाना चाहिए, और एक औरत को घर सम्हालना चाहिए।

    ये कथन आज के ज़माने में शायद अक्षरों के हिसाब से सत्य न हो, पर समाज में सभी इसी को मान के चलते है ।

    विभेद मिटाने के लिए जड़ से शुरुआत करना होगा ।

    स्कूलों में लड़के लड़कियों में विभेद को कम करना ज़रूरी है । लड़कियों को भी लड़कों के समान खेल, पढ़ाई में प्रोत्साहन मिलना चाहिए ।

    बचपन से बच्चों को लिंग समानता की सीख दें । ताकि लड़कियां इस भ्रम में ना जियें कि वे नाज़ुक हैं, और अपना सामान नहीं उठा सकती, ना ही किसी खेल-कूद में भाग ले सकती हैं ।

    और लड़के ये न माने, कि वे रो नहीं सकते, और किसी को भी मार सकते हैं ।

     काम के क्षेत्र में, आज मर्द और औरत कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं, सब को अच्छी शिक्षा मिल रही है, पर फिर भी इस क्षेत्र में ही लिंग की वजह से भेद-भाव देखा जाता है।

     औरतें ज्यादातर वही काम लेती हैं, जो समाज की बाकी औरतें करती है, और इससे उनकी तनख्वाह में बहुत अंतर आता है, जैसे टीचिंग ।  ज्यादातर महिलाएं इस क्षेत्र में भाग लेती है, इससे उस क्षेत्र में एक प्रकार के लिंग के लोगों की भीड़ हो जाती है, और वेतन घटने लगता है, और उस क्षेत्र का महत्व भी। व्यवसाय या आर्थिक क्षेत्र में वेतन बहुत ऊँचा होता है, पर डॉक्टर महिला उसमें भाग नहीं लेती, और इस प्रकार, साल में, औरत आदमी से, आर्थिक रूप से २०% पीछे रह जाती हैं।

    इसका कारण सामाजिक सोच है, जो औरतों पर हावी रहता है, वे सोचती हैं, कि वे पुरुष प्रधान कार्य नहीं कर सकतीं या वे उसके काबिल नहीं, या फिर उन्हें यह इतना महत्वपूर्ण नहीं लगता, या वे घर-परिवार की प्राथमिकता ज्यादा महत्वपूर्ण समझती हैं । और इस तरह से ये विभेद कभी नहीं घटता।

    इससे हमारे बॉलीवुड के सितारे भी बच नहीं पाते। हाल ही में, अनुष्का शर्मा, अपने कड़े शब्दों में निंदा करती हैं कि,"एक समान काम के लिए, इस इंडस्ट्री में कभी एक समान वेतन नहीं मिलता। अभिनेता को हमेशा ज्यादा वेतन मिलता है, भले मेहनत दोनों समान करते हों, या अभिनेत्री प्रधान फ़िल्म हो ।"

     

    1. कम्पनीज में विभेद को रोकने के लिए एम्प्लायर को तत्पर होना पड़ेगा । एक समान काम के लिए कर्मियों को एक समान वेतन मिले, ये उन्हें देखना होगा ।
    2. महिलाओं को खुद के लिए आवाज़ उठाना ज़रूरी है । वेतन में भेद भाव को न माने, नौकरी जाने के डर से चुप ना रहे ।

     

    कर्म क्षेत्र के अलावा कई और सामाजिक क्षेत्र में भी ये विभेद दिखता है। आदमी को ज्यादा सुविधा दी जाती है।

    शादी के बाद उपनाम का परिवर्तन। आदमी को नाम नहीं बदलना पड़ता, पर औरत को समाज, रिश्तेदार बार बार उकसाते है की वे अपना उपनाम अपने पति के नाम पर रख लें। नाम एक इंसान का परिचय है, और उसको एक दिन के बाद अचानक बदलना बहुत मुश्किल होता है, क्या करना है समझ नहीं आता तो औरत अपने दोनों उपनाम को प्रचार करने लगती है। (एक पिता का, एक पति का)

    1. उपनाम का रिश्ते से कोई सम्पर्क नहीं है, ये समझना ज़रूर है। अपने मत पर अड़े रहे, और दूसरों को भी अपनी बात सही तरीके से समझायें ।

    2. घर में आदमी को आर्थिक चीज़ों पर बोलना चाहिए, और औरतों को दाल-मसाले पर, ये अलिखित नियम अभी भी है।   

    वैज्ञानिकों नें शोध में पाया है कि, आदमी और औरत की मष्तिष्क संरचना एक होती है । अगर आपको ज्ञान है, तो आप किसी भी विषय पर अपना मत रख सकती हैं। ये बात औरत के लिए समझना सबसे ज़रूरी है। इन्टरनेट का इस्तेमाल करें, जो भेद भाव कर रहे हैं, उन्हें हर प्रकार से #सच का सामना करवाएं । खुद पर आत्मविश्वास होने पर ही, आप इस लिंग भेद भाव से बच सकती है।

    कई क्षेत्र में, आदमी को भी इस भेद भाव का शिकार होना पड़ता है। डाइवोर्स के वक़्त भरपाई आदमी को ही भरना है (बावजूद ये की उसकी पत्नी शायद उससे ज्यादा कमाती है), क्योंकि समाज ऐसा मानता है की आदमी आर्थिक रूप से सबल है। अगर कोई महिला गृह-हिंसा का मामला दर्ज करती है, तो समाज मान लेता है, कि औरत तो अबला है, कमज़ोर है, सच ही बोल रही होगी। ऐसे में औरत को गलत तरीके से सहायता मिलती है, जो नहीं होना चाहिए।

    विभेद हटाने के लिए पहले लोगों को गलत फायदे का एहसास दिलाना ज़रूरी है, जो प्रति पक्ष को मिल रहा है, पर ये हमें ही करना होगा। खुद पर विश्वास रखें, और ऐसी परिस्थिति का डट कर सामना करें।

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  • 22 Feb
    Shiva Raman Pandey

    ग्रुप थेरेपी के बारे में जानने योग्य 6 बातें

     group therapy

    1.ग्रुप थेरेपी की शुरुआत किसने की?

    ग्रुप थेरेपी एक सरल और कम लागत वाली  मनोचिकित्सा है। मनोचिकित्सा का यह रूप बहुत ही कम समय में कई स्थानों  पर चर्चित हो गया। हालाँकि इसको कामयाब बनाने का श्रेय कई लोगों को दिया  जाता है, लेकिन उनमे दो नाम गौर करने योग्य हैं:-

    1. Carl Rogers
    2. Irvin Yalom

    Carl Rogers व्यक्ति केंद्रित मनोचिकित्सा के संस्थापक थे, जिसमे थेरेपी का फोकस और ताकत बहुत ही योग्य और अनुभवी विशेषज्ञ के द्वारा व्यक्ति को स्थानांतरित कर दी जाती है। उन्होंने काउंसलर्स के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों और सम्मेलनों का आयोजन किया, जहां से उन्हें ग्रुप थेरेपी का आइडिया आया।

    दूसरी तरफ Irvin Yalom ने बड़े पैमाने पर ग्रुप थेरेपी के बारे में लिखा, जिसमे उन्होंने बताया है की कैसे ग्रुप थेरेपी का संचालन किया जाता है,और कैसे यह लाभदायक हो सकता है।

     2. ग्रुप में सदस्यों की न्यूनतम संख्या :-

    एक ग्रुप में लगभग एक जैसी समस्या से ग्रस्त छः या आठ सदस्य हो सकते हैं और एक या दो काउंसलर्स जो उन्हें थेरेपी लेने में मदद करते हैं। कभी कभी ज्यादा लोग लिए जा सकते हैं, लेकिन छः से आठ सदस्यों की संख्या एक आदर्श संख्या है जो ना तो बहुत ज्यादा है और ना ही बहुत कम। यह एक खुला ग्रुप हो सकता है,जिसमे कोई भी शामिल हो सकता है और छोड़ सकता है या यह एक बंद ग्रुप हो सकता है जिसमे सदस्यों की संख्या स्थिर होती है।

     

    3. ग्रुप का उद्देश्य एक दूसरे की मदद करना :-

    एक ग्रुप बहुत से उद्देश्यों के लिए बनाया जा सकता है। जैसे कुछ नया सीखने के लिए,बेतुके व्यवहार को नियंत्रित  करने के लिए, बेहतर होने के लिए। क्योंकि सभी व्यक्तियों की सामाजिक  स्थिति एक समान होती है और उनकी समस्याओं का समाधान एक दूसरे की मदद करने से हो सकता है। उदाहरण के लिए घरेलू हिंसा से पीड़ित लोग। प्रत्येक थेरेपी में काउंसलर की भूमिका भिन्न होती है।

     

    4.ग्रुप के सदस्यों के बीच क्रियाकलापों के दौरान काउंसलर उनके व्यवहार का निरीक्षण करता है :-

    ग्रुप थेरेपी में सदस्य आपसी व्यवहार से कुछ सीखते हैं और यह उनकी थेरेपी में मदद करता है,क्योंकि ये ग्रुप उनकी समस्या को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। Tuckman ये विश्वास करते हैं कि लोग ग्रुप में अपने परिवार के समान व्यवहार करते हैं, कोई प्रमुख की भूमिका में होता है तो कोई निष्क्रिय रहता है। फिर यह काउंसलर का कार्य है कि पहले वह ग्रुप में सभी की भूमिका का निरीक्षण करे फिर जो निष्क्रिय है उसे सुधारने के लिए उसे प्रमुख की भूमिका दे । लेकिन ये कार्य बहुत गोपनीय तरीके से करे, अन्यथा रोगी को पता लगने पर वह इस परिवर्तन को स्वीकार नही कर सकता और अपने वास्तविक जीवन में इस सुधार को नहीं ले जा सकता।

     

    5.निश्चित विषय पर क्रियाकलाप :-

    ग्रुप थेरेपी का अन्य पहलू है- जिस विषय पर आपसी क्रियाकलाप होना है उसका पाठ्यक्रम। ग्रुप का संचालन निम्न उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है :-

    क्रोध नियंत्रण के लिए

    आत्म विश्वास पाने के लिए

    चिंता कम करने के लिए 

    अवसाद खत्म करने के लिए

    या अन्य किसी मनोवैज्ञानिक समस्या के निदान के लिए

    यदि काउंसलर एक या अधिक सदस्यों पर उस थेरेपी से कोई प्रभाव पड़ते नही देखते तो उन्हें थेरेपी के उस विषय को फिर से नही होने देने के प्रति सावधान रहना होगा,और निष्पक्ष बने रहना होगा।

     

    6. काउंसलर ग्रुप के पड़ाव की श्रृंखला की योजना बनाते हैं :-

    अंत में, एक ग्रुप बहुत ही सुनियोजित होता है। ग्रुप कई पड़ावों से होकर गुजरता है।

    किसे ग्रुप में शामिल होने की अनुमति देनी है,

    क्या क्रियाकलाप होना है, और किस प्रकार होना है?

    कैसे ग्रुप समाप्त होगा ?

    क्या ग्रुप के सदस्य थेरेपी के बाहर मिल सकते हैं या नही ?

    सब कुछ बहुत ही अच्छी तरह से सुनियोजित होता है, और इसमें काउंसलर की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है।

     

    भारतीय परिवेश में ग्रुप थेरेपी आदर्श है, क्योंकि हम स्वभाव से सामाजिक होते हैं। यह थेरेपी सुरक्षित है और किसी अन्य थेरेपी से कम खर्चीली है।

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    • shruti jain
      shruti jain   Dec 25, 2015 01:42 PM

      मेरी मां  और पापा  रोज आपस में लड़ते रहते है मै क्या करू की दोनों  आपस में लड़ना बंद कर दे कोई सलाह दे धन्यवाद 

  • 22 Feb
    Mandavi Pandey

    एक काउंसलर कैसे काउंसलिंग करता है-5 मुख्य जानकारियां

    counselor kaise counseling karta hai

     

    आप जब किसी कारण से मानसिक रूप से तनावग्रस्त रहने लगते है, और आपके स्वभाव में प्रतिकूल परिवर्तन के कारण आपका जीवन नीरस हो जाता है, तब एक योग्य विशेषज्ञ या काउंसलर काउंसलिंग की प्रक्रिया के द्वारा आपकी समस्याओं को समझ कर उसका निदान करते हैं, और आपका जीवन सुधारने में मदद करते हैं। काउंसलिंग सिर्फ बात करना नहीं है, यह एक प्रक्रिया होती है जिसका उपयोग काउंसलर करते हैं। अक्सर Therapy सेंटर द्वारा प्रक्रिया निर्धारित की जाती है।

    सामान्यतः इसका स्वरूप निम्न प्रकार का होता है –

     

    १.आप और आपकी समस्या को जानना :-

    समस्या का कारण और उसकी गंभीरता को समझने में काउंसलर को दो या तीन दिन लग सकते हैं ,इस दौरान आपके  और काउंसलर के बीच चिकित्स्कीय संबंध भी बन जाते हैं ,जिससे आप काउंसलर या थेरेपिस्ट पर विश्वास कर सकें और उसके साथ सहजता महसूस करे। काउंसलिंग के दौरान आप पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हो सकते । आपको  थेरेपिस्ट के द्वारा समझाई जाने वाली बातों को समझना होता है और हो सकता है आपको छोटे होमवर्क या कोई कार्य दिए जा सकते हैं।

     

    2.आपके व्यव्हार में परिवर्तन दिखना :- सामान्यतः आप में कितना सुधार हुआ है ये पता करने में कई मत हो सकते हैं। थेरपिस्ट के साथ विश्वासपूर्ण संबंध होने के बाद आप में आये अंतर को थेरेपिस्ट आपसे बात करके पता करते हैं। जैसे वे आप  से पूछ सकते हैं कि,

    "आप अपने परिवार के साथ वक्त बिताना चाहते हैं, लेकिन उसी समय आप किसी प्रोजेक्ट में व्यस्त हो जाते हैं, हमें आश्चर्य है ऐसा कैसे हो सकता है?"

    हो सकता है, आप इस अंतर को नहीं बता सकते, या आप जानते हुए भी इसे अधिक महत्व नहीं देते, या कभी इसे जानते हुए भी उत्तर नहीं देते। इस तरह के अंतर ये दिखाते हैं कि चीजे अभी ठीक नहीं हुई हैं, और आपको अभी Therapy की आवश्यकता है, जिससे आपमें आये बदलाव को समझने में मदद मिलती है।

     

    3.बदलाव की शुरुआत :-

    आपकी मानसिक स्थिति में आये अंतर को समझ कर बदलाव की शुरुआत होती है। आप और काउंसलर एकसाथ मिलकर परिवर्तन के तरीके को खोजते हैं।  थेरेपिस्ट आपको कोई स्किल सिखा सकते हैं, जो आपकी बार बार उस प्रकार की समस्या को हल करने में मदद करते हैं। उदाहरण के लिए बातचीत  कि स्किल या समय प्रबंधन का कौशल। कभी कभी आवश्यकता होने पर मनोरोग की दवाइयाँ भी दी जा सकती हैं। यदि थेरेपिस्ट के पास मेडिकल की डिग्री है तो वे स्वयं इसे लिख सकते हैं। यदि  नहीं तो आपको मनोचिकित्स्क के पास जाने का सुझाव दिया जाता है।

     

    4.मुश्किलों की पहचान:-

    आपका असहयोगात्मक व्यवहार कई वर्षों से है, इसलिए यह आसानी से नहीं दूर होता। इसलिए सिर्फ तय प्रक्रिया के अलावा मानसिक और भावनात्मक डर और जिद्द के रूप में आने वाली मुश्किलों को लगातार समझना और निवारण किया जाता है, इसलिए जो भी मुश्किलें आती हैं, वे नुकसान नही पहुँचाती। यह Therapy का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है, क्योंकि ये कार्य आप स्वयं नही कर सकते हैं। थेरेपिस्ट को आपको समझने के लिए अच्छी अंतर्दृष्टि और संवाद कौशल की आवश्यकता होती है।

     

    5.Therapy की समाप्ति और पलटाव से बचाव :-

    आपमें आये बदलाव को समझने और मुश्किलों को दूर करने के बाद इसे दोबारा पलटने से रोकने के लिए बचाव सुनिश्चित करना होता है, जैसे कि आप दुबारा अपनी पुरानी स्थिति में ना चला जाये। समस्या के अनुसार बचाव अलग अलग होते हैं। लेकिन सामान्य रूप में किस बात से समस्या बढ़ती है इसका पहले से पता करके उसके अनुसार रणनीति बनाना बचाव है। सत्र धीरे धीरे कम होते जाते हैं और अंत में Therapy समाप्त की जाती है। हालाँकि किसी समस्या के आने पर आप दुबारा आने के लिए स्वतंत्र हैं।

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  • 21 Feb
    Mandavi Pandey

    हम ऑनलाइन रहना क्यों पसंद करते हैं?

    hum online rahna kyon pasand karte hain


     
    कुणाल एक १७ साल का लड़का है, नेट पर दोस्तों से बातें करना उसे पसंद है और इसीलिए हर समय वह ऑनलाइन बना रहता है। सोशल मीडिया में उसके कई अकाउंट हैं। आजकल यही पसंद लगभग हर युवा की हो गई है।


    क्यों आज का युवा ऑनलाइन प्लेटफार्म का इतना दीवाना हो गया है?

    आइये जानते हैं इस लेख के माध्यम से।


    इंटरनेट के माध्यम से अब दुनिया के किसी भी भाग से आसनी से सम्पर्क बनाया जा सकता है। लोग अब घर बैठे ही दुनियाभर में अपने दोस्त बनाने लगे हैं, और ऑनलाइन रहकर ही प्यार ,डेंटिंग, और शादी के लिए जोड़े भी खोजे जाने लगे हैं।


    ऑनलाइन दोस्ती के बहुत से नुकसान भी होते हैं, जैसे आप जिससे दोस्ती कर रहें हैं वह वास्तव में अपने बारे में सारी बातें सच बता रहा है, या आपको धोखा देने के मकसद से झूठी बातें बता रहा है। आप उसे सामने से नहीं देख सकते इसलिए आप उसकी वास्तविकता भी नही जान सकते हैं।


    ऑनलाइन चैटिंग से होने वाले इन नुकसानों के बावजूद क्यों हम इसका इस्तेमाल करना जारी रखते हैं?

    1.नाम को गुप्त रखने के आजादी :-


    ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का सबसे बड़ा फायदा है नाम को गुप्त रखने की आजादी। आप किसी भी नाम और किसी भी फोटो के साथ अपनी एक प्रोफाइल बना सकते हैं, कम्प्यूटर यह नहीं समझ पायेगा कि, आप झूठ बोल रहे हैं।

    आप किसी से या हर किसी से बात कर सकते हैं, और आपके वास्तविक जीवन की बुराई या कमियां जैसे, आपकी क्या हैसियत है ,और आप की योग्यता आदि कुछ भी हो, कोई फर्क नही पड़ता।

     


    2. दुनिया के किसी भी भाग तक आपकी पहुंच:-
    बहुत से देशों में जहां लड़के लड़कियां आपस में मिल कर बात नहीं कर सकते, उन स्थानों में लोग बातें करने के लिए ऑनलाइन प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर सकते हैं, इस तरह से किसी एक देश में बैठा युवा दूसरे देश में अपने लिए दोस्त या जीवनसाथी की तलाश करके बातें कर सकता है।

     


    3.सुविधाजनक:-
    यूँ तो यदि आपको किसी से मिलना है तो आपको अच्छे से तैयार होने की जरूरत होती है,और फिर किसी अच्छी जगह की तलाश करनी होती है आदि।

    लेकिन आपको ऑनलाइन चैटिंग के लिए सिर्फ एक इंटरनेट पैक और अच्छे ब्राउज़र के अलावा ज्यादा कुछ नही चाहिए। इसलिए लोग इन सब की तुलना में ज्यादा सुविधाजनक-ऑनलाइन चैटिंग को वरीयता देते हैं।

     


    4. नियंत्रण(कंट्रोल) :-
    हम ऑनलाइन कैसे दिखाई देते हैं इसका नियंत्रण हम सिर्फ एक बटन क्लिक कर के कर सकते हैं। सेल्फ़ी कैमरे के साथ स्मार्टफोन और लाखों फ़िल्टर से हम अपनी एक नकली इमेज आसानी से बना सकते हैं।

    कई बार तो लोगों को अपनी ये इमेज अपनी असली इमेज से ज्यादा पसंद आने लगती है, और इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा ऑनलाइन गपशप और बातचीत में चिपके रहते हैं।


    हम क्या कहते हैं, और किससे कहते हैं, इसका नियंत्रण भी खुद कर सकते हैं। इसके साथ यह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के उपयोग की इच्छा को भी बढ़ाता है।


    इसके अलावा डेटिंग एप जैसे ‘TINDER’ के उपयोग से हमअनचाहे डेट को रिजेक्ट भी कर सकते हैं। इस तरह नियंत्रण की शक्ति हमें ऑनलाइन प्लेटफार्म पर बने रहने की चाहत बढ़ाती है।



    5.साथियों का दबाव :-

    जब ऑनलाइन प्लेटफार्म की शुरुआत हुई तो इसके फायदे तभी पता चले होंगे जब किसी ने पहली बार इसका उपयोग किया होगा। पहले तो हमें इसपर बात करने की आदत नहीं पड़ी थी।

    फिर इसका चलन बढ़ने के साथ साथियों का दबाव भी इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल करने के लिए महसूस किया जाने लगा, और ये भी एक बड़ा कारण था कि युवा एक दूसरे को ऑनलाइन प्लेटफार्म का इस्तेमाल करते देख इसकी ओर आकर्षित होने लगे।

    अपनी उपलब्धियों और कहानियों को एक दूसरे से शेयर करने लगे। इस प्रकार एक यह ऐसा चक्र बन गया जो कभी कभी बहुत ज्यादा दोषपूर्ण बन जाता है।


    ऑनलाइन प्लेटफार्म के अधिक उपयोग से हम बिना किसी अनुशासन और नियंत्रण के चैटिंग करते हैं ।


    जिससे हम असभ्य और अविवेकी बन सकते हैं।कई बार तो लोग किसी बहकावे में आकर उनका शिकार भी बन जाते हैं। इसलिए ऑनलाइन प्लेटफार्म का उपयोग करते समय हमें अधिक सतर्कता और संयम की आवश्यकता है।

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    Responses 1

    • shruti jain
      shruti jain   Dec 25, 2015 01:26 PM

      मुझे बहुत ज्यादा क्रोध आता है अपने क्रोध पर कैसे काबू करू | 

  • 16 Feb
    Oyindrila Basu

    रिटायरमेंट को एक नई शुरुआत बनाएं।

    retirement ko ek nai shuruaat banayein

     

    हम कई बार रिटायरमेंट के बारे में हमारी कल्पनायें ज़ाहिर करते हैं। यहां जाएंगे, वहाँ खाएंगे, ये देखेंगे, वहां घूमेंगे, मज़ा करेंगे।

     

    पर क्या वह आखिरी दिन आने पर हम सचमुच खुश होते हैं?

     

    जब एक दिन आप के डेस्क पर, फूलों के गुलदस्तों के साथ  सेवानिवृत्त शुभेच्छा आने लगती है... आपको पता होता है, कल आपका ऑफिस में आखिरी कार्यदिवस है । आपको उत्साह रहता है, कि सब आपके काम को सराहेंगे, आपको मुबारकबाद  देंगे, पर एक डर भी लगता है, एक आशंका, कि.... अगले दिन से आप क्या करने वाले हैं?

     

    यह सवाल,जिसका जवाब आप नहीं जानते, पर अब आप जान सकते हैं, हमारे साथ।

     

    1.काम से अवकाश के बाद, खर्च एक चिन्ता ज़रूर होती है। देखा गया है, कि आम आदमी को अपने अवकाश से पहले मिलने वाले वेतन का ९०% जीवन यापन करने में लगता है । रिटायरमेंट का मतलब खर्च में समझौता न हो, इसलिए, पहले से संचय शुरू करें, और विभिन्न पालिसी में निवेश करें, जो रिटायरमेंट के बाद आपके बैंक खाता को भरती रहेंगी ।

     

    2.जब खर्च की चिन्ता न हो, तो आप बहुत कुछ सोच सकते हैं। ये विश्व बहुत बड़ा है, और इनमें कई जगह पर फोटो खींचने का सपना तो आपने भी देखा होगा। रिटायरमेंट के बाद इस ख्वाब को पूरा करने की शुरुआत करें। जो पास में घूमने लायक जगह हैं, और आप को काम की वजह से, जाने का अवसर नहीं मिला वहाँ रिटायरमेंट के बाद, अपने साथी के साथ घूमने का प्रबंध करें, 

     

    3.अगर आपके माता-पिता हैं, और इतने सालों में, आपको वक़्त नहीं मिला उनके लिए, तो आज से रोज़ कुछ ऐसा करें, जिससे उन्हें ख़ुशी मिले।

     

    4.अपनी सामाजिकता को बढ़ावा दें। घर में दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ पार्टी करें ।

     

    5.या अपने पुराने दोस्तों के साथ किसी जंगल की सैर पर चले जाएँ, जो आपकी तरह सेवानिवृत्त हैं।

     

    6.अगर आपको कोई व्यक्तिगत शौक है, जैसे लेखन, कला का  तो उसका अभ्यास शुरू करें, क्या पता, आप कोई नए काम की ओर बढ़ रहे हों!

     

    7.व्यवसाय में आपकी रुचि हुयी हो, तो उसको अंजाम देने के लिए इस अवसर का लाभ उठाएं।

     

    रिटायरमेंट के बाद क्या नहीं करना चाहिए:

    कुछ लोगों में, काम से अवसर या रिटायरमेंट का बुरा असर होता है। अचानक से ज़िन्दगी का थम जाना वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। खुद को नकारा समझने लगते है, हर बात में झिकझिक करने लगते हैं।

     

    1.अपनी निराशा का बोझ, अपने परिवार पर न निकालें, इससे आपके आपसी संबंधों पर खराब असर पड़ेगा, जब आपको उनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है।

     

    2.अपने ईगो को अपने काम की प्रतिभा पर हावी न होने दें। अकसर देखा गया है, कि ऊँचे पद पर रहते हुए, अवकाश लेने से, बाद में नए काम को स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि हम किसी के नेतृत्व में रहना नहीं चाहतें, इससे हम अच्छे काम की कदर नहीं कर पाते।

     

    3.अपनी पिछली ज़िन्दगी पर शोक मनाना छोड़ कर अपनी आगे की ज़िन्दगी का पूरा आनंद लें।

     

    काम से अवकाश को एक नई शुरुआत बनाएं, अपने जीवन को एक नई शुरुआत दें, तो ये रिटायरमेंट के दिन आप के लिए आसान हो जाएंगे।

     

    हर दिन अपने साथ कुछ नया लाती है, उसे महसूस करें, खुश रहना मानसिक स्थिति के लिए बेहत ज़रूरी है।

     

    Responses 1

    • dinesh singh
      dinesh singh   Dec 27, 2015 08:59 PM

      आपकी पोस्ट बहुत अच्छी है लेकिन अक्सर ही हमने अपने  आस पास कुछ मानसिक रूप  से कमजोर लोगो को  देखा  जिसे  लोग अक्सर  मैंने चिढ़ाते  हुए देखा है जिससे वो व्यक्ति और अधिक चिड़चिड़ाता है और बहुत ही परेशान होता है और इसीलिए लोग उस व्यक्ति से दूरी भी बना कर रखने लगते है की वह पागल है |