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  • 29 Feb
    Shiva Raman Pandey

    काउंसलिंग के विषय में कुछ मिथकों का स्पष्टीकरण

    Clarification of 19 myths about counselling

     

    काउंसलिंग स्वयं को जानने और स्वस्थ होने का एक अनोखा मार्ग हो सकता है यदि यह सही काउंसलर के द्वारा सही तरीके से दी जाय। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि, काउंसलिंग को लेकर  बहुत सी मिथक और गलतफहमियां हैं जिसे लोगों ने काउंसलिंग के प्रति अपनी सोच में पाल रखा है। हम उनमे कुछ भ्रांतियों को दूर करने के लिए स्पष्टीकरण दे रहें हैं ,कृपया जरूर पढ़ें :-

    मिथक 1. कोई भी काउंसलर बन सकता है।

    स्पष्टीकरण :ऐसा देखा गया है कि १-२ महीने का कोर्स करके लोग काउंसलर बन कर लोगों की काउंसलिंग करने लग जाते हैं। दुर्भाग्य से भारत में यह बहुत अधिक हो रहा है। लेकिन वास्तव में एक काउंसलर के पास human development या psychology में कम से कम मास्टर्स की डिग्री होनी चाहिए। यदि आपको काउंसलर के विषय में कोई अनिश्चितता हो तो आप उनसे उनकी योग्यता के विषय में पूछ सकते हैं यह आपका जानने का अधिकार है।

     

    मिथक 2. यदि काउंसलिंग सस्ती है तो यह अच्छी नही है।

    स्पष्टीकरण :यह सत्य नही है। बहुत से कम्युनिटी सेंटर और NGO  मुफ्त में ऐसी सेवाएं दे रहें हैं और अच्छे भी हैं।

     

    मिथक 3. यदि कोई अधिक मूल्य ले रहा है तो वह जरूर अच्छा है।

    स्पष्टीकरण: यह ऊपर वाले मिथक के समान है ।  बहुत से नीम हकीम भी ऊँचे दाम वसूलते है। इसलिए मूल्य गुणवत्ता का कोई मापदंड नही है।

     

    मिथक 4. काउंसलर का काम है मुझे सलाह देना।

    स्पष्टीकरण: काउंसलर का काम है आपकी भावनाओं को फिर से ठीक करके आपको योग्य बनाने में आपकी मदद करना ताकि आप स्वयं अपनी समस्याओं को हल कर सकें। काउंसलर आपको सलाह नही देते और यदि वे ऐसा करते हैं, तो यह गलत है।

     

    मिथक 5. काउंसलर के पास सिर्फ पागल लोग जाते हैं।

     स्पष्टीकरण: काउंसलिंग सिर्फ मनोवैज्ञानिक समस्या से ग्रस्त लोगों के लिए नही है। काउंसलिंग रिश्तों को सुधारने ,ऑफिस में कार्य क्षमता बढ़ाने,शैक्षणिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने ,तनाव प्रबंधन आदि से भी संबंधित होती है।

     

    मिथक 6. काउंसलिंग के लिए जाने का मतलब मैं कमजोर हूँ। 

     स्पष्टीकरण: क्या जुखाम की दवा लेने का मतलब आप कमजोर हैं ? नही ना।  यह होशियारी और समझदारी है कि स्वयं को सही समय पर बचाने के लिए मदद ली जाय।

     

    मिथक 7. काउंसलिंग से आप काउंसलर के ऊपर निर्भर हो जाएंगे।

    स्पष्टीकरण : नही, एक अच्छा काउंसलर आपको अधिक कुशल बनाने में आपकी मदद करता है,ताकि आप अपना जीवन स्वतंत्रता पूर्वक व्यतीत कर सकें ।

      

    मिथक 8.काउंसलिंग या थेरेपी कई वर्षों तक जारी रहती है। 

    स्पष्टीकरण : यह सत्य नही है। हालाँकि कुछ मन में गहराई तक बसी हुए भावनाओं को लम्बे समय तक काउंसलिंग की जरूरत होती है। लेकिन ज्यादातर मामले कम अवधि की थेरेपी से ही हल हो जाते हैं।

     

    मिथक 9. थेरेपी में आपको दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं।   

    स्पष्टीकरण : थेरेपी में कोई भी कार्य जबरन नही करना होता है। और यही इसकी खूबसूरती है। चयन आपके ऊपर होता है। काउंसलर एक डॉक्टर के सहायक के रूप में कार्य कर सकता है, जो आपको सिर्फ दवाइयाँ लिख कर दे सकते हैं। लेकिन यह आपके ऊपर है कि आप दवाएं लें या नही।

    मिथक 10. काउंसलर दवाएं लिख सकता है।

    स्पष्टीकरण : जबतक काउंसलर के पास मेडिकल की डिग्री नहीं होती वे ऐसा नहीं कर सकते।

     

    मिथक 11. थेरेपी की प्रक्रिया के दौरान थेरेपी लेने वाला निष्क्रिय रहता है।

    स्पष्टीकरण : थेरेपी लेने वाले व्यक्ति को थेरेपी के दौरान बहुत ज्यादा सक्रिय रहना चाहिए, क्योंकि वे स्वयं के लिए लगातार कौशल का विकास कर रहें हैं।

     

    मिथक 12.केवल महिला काउंसलर ही अच्छी होती हैं।

    स्पष्टीकरण : हालाँकि इस व्यवसाय में बहुत सी महिला काउंसलर्स दिखाई देती हैं। यदि एक व्यक्ति के पास सही कौशल, योग्यता और अनुभव है तो फिर वह चाहे पुरुष हो, अच्छा होता है।

     

    मिथक13. ज्यादा उम्रदराज़ काउंसलर अच्छे होते हैं। 

    स्पष्टीकरण : हालाँकि अनुभव जरूरी होता है, लेकिन कभी कभी उम्र लोगो को कठोर भी बना देती है। इसलिए यहां ऐसा कोई नियम नहीं है।

     

    मिथक 14. काउंसलर थेरेपी के बाद हमारे मित्र बन सकते हैं।

    स्पष्टीकरण : सही यही होगा कि काउंसलिंग के संबंधों से अलग दोस्ती का संबंध ना बनाया जाय, क्योंकि थेरेपी को प्रभावी बनाने के लिए सीमाओं का होना जरूरी है।

     

    मिथक 15.  काउंसलिंग सिर्फ बात करना है।

    स्पष्टीकरण : व्यक्ति की मानसिक शुद्धि और समस्या के निदान के लिए  भावनात्मक समस्या को पहचानकर उसे फिर से व्यवस्थित करने की गंभीर प्रक्रिया काउंसलिंग है।

     

    मिथक 16. मित्र और परिवार के सदस्य एक दूसरे की काउंसलिंग कर सकते हैं।

     स्पष्टीकरण : मित्र और परिवार के सदस्य एक दूसरे की सामर्थ्य और कमजोरियों को उतनी निष्पक्षता पूर्वक नही देख सकते जितना की काउंसलर देख सकता है। और उनके पास कोई ट्रेनिंग भी नहीं है, इसलिए उन्हें आधिकारिक तौर पर परामर्श नही देना चाहिए।

     

    मिथक 17.ऑनलाइन काउंसलिंग भरोसेमंद नही होती।

     स्पष्टीकरण :बहुत से भरोसेमंद ऑनलाइन काउंसलिंग के विकल्प हैं, जो मजबूत और सुरक्षित हैं।

    मिथक  18. काउंसलिंग सिर्फ विकारग्रस्त और बीमार व्यक्तियों के लिए है।    

    स्पष्टीकरण :आप भी अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए काउंसलिंग का उपयोग कर सकते हैं। जैसे - अलग सोच की दक्षता।

     

    मिथक19. काउंसलर क्या मेरे राज को मेरे खिलाफ इस्तेमाल करेगा ?

    स्पष्टीकरण :एक अच्छा काउंसलर थेरेपी के दौरान हुई बातों को थेरेपी तक ही रखता है, और कभी आपके खिलाफ नही इस्तेमाल करता है। 

     

     

     

    Responses 2

    • sapna sahi
      sapna sahi   Dec 25, 2015 03:52 PM

      अपने मानसिक और शारीरिक  बीमारियो  को भगाने का बहुत ही अच्छा और सरल उपाय । धन्यबाद

    • shruti jain
      shruti jain   Dec 25, 2015 12:53 PM

      BAHUT HI ACHHI ARTICLES HAI 

  • 29 Feb
    Oyindrila Basu

    सिबलिंग राइवलरी के कारण और निदान

    bhaai bahan ke beech ladaai

     

    'सिबलिंग राइवलरी' यानि सहोदरों के बीच विकृत सम्पर्क। अगर एक ही माता पिता के दो या उससे ज्यादा संतान हों, तो ये संभावना होती है, कि बच्चे एक दूसरे के प्रति एक प्रतिद्वंदी रवैया पैदा कर लेते हैं। इसको अंग्रेजी में 'सिबलिंग राइवलरी' कहते है।

    एक बच्चा खुद को दूसरे से बेहतर साबित करने की फिराक में होता है, और कभी कभी इस प्रकार छेड़छाड़ में, सबल दुर्बल को तकलीफ भी पहुँचाने से पीछे नहीं हटता। बच्चे भूल जाते हैं, कि वे एक दूसरे के भाई या बहन हैं, उनका रिश्ता कोमल और सुन्दर होना चाहिए।

    लेकिन जलन और लड़ाई की मंशा उन में कभी अपनापन पलपने ही नहीं देती। अकसर देखा गया है, जिन घरों में दो से ज्यादा बच्चे हैं, वहां ऐसी प्रतिद्वंदिता ज्यादा पायी जाती है।

    माता पिता का प्यार बट रहा है, ऐसा महसूस होने पर, बच्चे एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं, और ये बचपन से ही खत्म नहीं होता, इसका दुष्प्रभाव उम्र भर रहता है। बड़े हो जाने के बाद भी, भाईओं के बीच मतभेद, झगड़ा आम बातें हैं, हालाँकि तब कारण अलग होता है। (सम्पत्ति पर मतभेद, या आपसी रिश्तों पर)

    सिबलिंग राइवलरी के कई कारण हो सकते हैं:

    1 . माता पिता का दायित्व सब से महत्वपूर्ण है। अकसर परिवार में दो बच्चों के होने से, माता पिता अनजाने में ही, एक के प्रति पक्षपाती हो जातें है। (क्योंकि वे या तो परिवार का पहला बच्चा है, या फिर सब से छोटा है, या फिर सबसे ख़ूबसूरत दिखता है, या फिर पढ़ाई में अव्वल है।) और इस हाल में, वे अपने प्यारे बच्चे को ज्यादा तोहफे देते हैं, ज्यादा प्रशंसा करते है। और इस वजह से उनके दूसरे बच्चे के अंदर हीन भावना पैदा होती है। वह मानने लगता है, कि माता पिता उससे ज्यादा उसके भाई को चाहते हैं, और तब से शुरू होती है, जलन और गुस्सा।

    2 . तुलना करना बुरी बात है। हर बच्चे में अपनी खासियत होती है, पर अकसर माता पिता अपने बच्चों में तुलना करने लगते हैं, और एक की छवि को आदर्श बनाकर दूसरे को प्रोत्साहन देने की कोशिश करते है, पर इससे उलटा प्रभाव होता है, बच्चा और ज़िद्दी हो जाता है, भाई के प्रति क्रोधित हो जाता है। "मम्मी मुझे हमेशा कहती है, अपने बड़े भाई से कुछ सीखो, नहीं तो कभी भी डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाओगे, पर मैं तो क्रिकेट खेलना चाहता हूँ ", बताते हैं अभिषेक मित्तल, 12 वी कक्षा के छात्र।

    3 . बच्चों के मन में कड़वाहट पैदा हो सकती है, अगर माता पिता अपने हर बच्चों पर समान ध्यान नहीं देते। कभी कभी, परिवार में कोई बच्चा, शारीरिक या मानसिक रूप से दुर्बल है, तो माता पिता उसे ज्यादा सुरक्षा देने की कोशिश करते हैं, पर इससे दूसरे बच्चे को महसूस होता है, जैसे वह परिवार में ज़रूरी नहीं है, और क्योंकि माता पिता से प्रतिशोध नहीं ले पाता, इसलिए, अपने दुर्बल भाई पर क्रोधित हो जाता है, आशा करता है, कि वह कभी पैदा ही नहीं हुआ होता। ऐसा हमने हिंदी फिल्म 'हाइड एंड सीक' में देखा है।

    4 . अकसर घर में होते रोज़ के झगड़ों से भी बच्चों में मन मुटाव हो सकता है।

    5 . कोई बच्चा थका हुआ हो, तो सब का ध्यान अपनी ओर करने के लिए भी वह दूसरे भाई को छेड़ने लगता है।

    6 . इंसान खुद से सबसे ज्यादा प्यार करता है, यही क्षमता उसे दूसरों को प्यार करना सिखाती है, और यही, उसे स्वार्थी भी बनाती है। खुद्की अलग पहचान बनाने की चाह भी सिबलिंग राइवलरी की वजह हो सकती है।

     

    पर इसके प्रभाव बहुत हानिकारक हो सकते है। कभी कभी भाई बहनों के बीच लड़ाई हो जाती है, तो कभी वे मरने मारने पर उत्तर आते हैं। बड़े होने के साथ साथ मुकाबले की सूरत बदलती रहती है। अगर सहोदर एक ही इंसान से प्यार करते हैं, तो फिर से उनमें मुक़ाबला शुरू हो जाता है, जैसे अंजना और संजना के बीच हुआ, फिल्म 'अलोन' में।

    इसे कैसे रोकें:

    1 . पहले तो ये समझें की सिबलिंग राइवलरी या सहोदरों के बीच लड़ाई 'सामान्य' घटना नहीं है। सिर्फ इसलिए, कि यह आम तौर पर घरों में देखा जाता है, इसका ये मतलब नहीं, की ये अच्छी चीज़ है।

    2 . हर बच्चे को उसके प्रतिभा के लिए उत्साह दें। बच्चों में तुलना बुरी बात है। कौन सी क्षमता बेहतर है इसका फैसला माता पिता नहीं कर सकते। उन्हें सबको  समानता से देखना चाहिए।

    3 . अगर आप देखते हैं, की आपका एक बच्चा दूसरे को छेड़ रहा है, तो फौरन पीड़ित को बचाने की कोशिश गलत है। बल्कि छेड़ते बच्चे से बात करें, उसके मानसिकता को समझने की कोशिश करें, और फिर उसे एहसास दिलाएं, कि अगर उसके साथ ऐसा हो रहा होता तो उसे कैसा लगता। इससे उसके मनोवृत्ति में सुधार आएगा।

    4 . माता पिता का ये समझना ज़रूरी है, की कुछ भी अपने आप ठीक नहीं होगा। आप को बचपन से उन्हें सिखाना होगा कि रिश्तों का सम्मान कैसे करते हैं।

    5 . अपने बच्चों को समान रूप से पुरस्कृत करें।

     

    परिवार में खुशहाली हो, तो बच्चे प्यार और सम्मान सीखेंगे। माता-पिता के बीच रिश्ते को देख कर ही बच्चे सीखते हैं, और परिवार में प्यार हो, तो रिश्तों में कड़वाहट कम ही आती है।

  • 28 Feb
    Oyindrila Basu

    च्युइंग गम चबाने से सतर्कता बढ़ती है।

    chewing gum

     

     

    च्युइंग गम का नाम आते ही मुझे अपने स्कूल के दिनों की पुरानी यादें ताजा हो गयीं, जब हम#Chicklets or #BigBubble के boxes अपने पास रखना पसंद करते थे, और च्युइंग गम चबा कर गुब्बारे बनाना बहुत मजेदार लगता था।

    लेकिन क्या बड़ों को इसका महत्व कम समझना चाहिए ? नही ! ये च्युइंग गम के छोटे, रसीले टुकड़े सिर्फ गुब्बारे बंनाने की तुलना में बड़े चमत्कार कर सकते हैं।

    हाल के शोधों में ये बात सामने आई है कि च्युइंग गम में सतर्कता बढ़ाने की क्षमता होती है। लगातार किसी चीज को चबाते रहने से दिमाग में रक्त का प्रवाह बढ़ता है, जिससे हमारी सतर्कता बढ़ जाती है। यह  इन्सुलिन का स्तर बढ़ा देता है, जिससे मस्तिष्क में प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार भागों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

    एक जापानी संगठन के द्वारा पुरुषों और महिलाओं पर समान रूप से एक परीक्षण किया गया। जिसमे उन्हें स्क्रीन पर दिखाई गई दिशा में प्रतिक्रिया के रूप में अपनी दाई या बायीं ऊँगली से एक बटन दबाना था, आधे लोगो को च्युइंग गम चबाने के लिए दिया गया, और बाकि लोगों को नही दिया गया, आधे घंटे के परीक्षण में ये देखा गया कि वे जो लगातार चबा रहे थे उन्होंने प्रतिक्रिया सिर्फ 493 मिलिसेकेंड में दे दिया ,जबकि दूसरे ग्रुप को इसी काम में 545 मिली सेकेण्ड लगे।

    डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि  लगातार चबाने से, कुछ समय के लिए स्मृति कार्य में हस्तक्षेप से आप और अधिक सतर्क बनते है, और फलस्वरूप स्मृति बेहतर होती है।

    इसलिए अब सभी मां अपने बच्चों का दिमाग तेज करने के लिए च्युइंग देना शुरू कर दें।

    हाल में अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन ने भी घोषित किया है, कि चीनी मुक्त च्युइंग गम चबाने से मसूड़ों में सुधार होता है।  कैविटी से बचाव और दांत मजबूत बनाने के अलावा यह सांस की बदबू से आप को मुक्त रखता है।

    जल्दी ही इन रिपोर्ट से पूरी दुनिया में सभी ब्रांड के च्युइंग गम की बिक्री बढ़ने वाली है।

    अब ये टैग कि "संजू! दांत सड़ जायेंगे" च्युइंग गम के साथ नहीं रहेगा। चॉकलेट को तो चबा नहीं सकते ना।

    हालाँकि इस गुब्बारे की तरह फूलने वाले च्युइंग गम के बहुत से चमत्कारी कार्य हैं।

     #NutritionalNeuroscience ने पहले से उपलब्ध तथ्यों में अपनी ये रिपोर्ट शामिल की है कि च्युइंग गम ध्यान में सहायक होता है, उन्होंने ये दावा किया है कि जब कोई नींद में होता है तो चबाने की क्रिया का अधिक प्रभाव होता है। च्युइंग गम आपके दिमाग  में भूख के अहसास को भुला देता है क्योंकि अधिकांश में थोड़ी मात्रा में चीनी होती है ,जो कार्बोहाइड्रेट की कमी को पूरी कर देता है।

    च्युइंग गम फायदेमंद होता है, क्योंकि यह आपको सक्रिय रखता है, और आपके दिमाग को ऐसा लगता है की आप कुछ खा रहे हैं, जो आपको ताकत दे रही है, जिससे आपको ज्यादा सजग होकर सोचने में मदद मिलती है, और खाने,पीने और भूख जैसी कम महत्वपूर्ण बातों की ओर आपका ध्यान नहीं जाता।

    च्युइंग गम कैफीन या निकोटिन जैसे हानिकारक चीजों को लेने की आदत को भी कम कर सकती है, इसलिए जो लोग धूम्रपान की लत को छोड़ना चाहते हैं वे अक्सर च्युइंग गम चबाते हैं।

    लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि, चबाने के भी नकारात्मक प्रभाव होते हैं :-

    • सतर्कता के अलावा ये आपकी जंक फ़ूड खाने की आदत को भी बढ़ा सकती है।
    • लगातार चबाने से आपके जबड़ों में TMJ (Temporomandibular Joint Disorder) हो सकता है।
    • इसके कारण आपको गैस संबंधी समस्या भी हो सकती है, क्योंकि वास्तव में चबाने का मतलब है ज्यादा हवा को निगलना।
    • जिन लोगो के दांतों में mercury की fillings हुई है उन्हें ज्यादा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि च्युइंग गम मुंह के अंदर इसके केमिकल को तोड़ सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।
    • चीनी युक्त च्युइंग गम से दूर रहिये।

    Responses 1

    • dinesh singh
      dinesh singh   Dec 27, 2015 08:51 PM

      ज्यादा कहना और कम खाना दोनों  ही स्वास्थ के लिए हानिकारक है |

  • 27 Feb
    Oyindrila Basu

    व्यसन या आसक्ति को जड़ से मिटाया जा सकता है।


    vyasan ya aasakti ko kaise door karein

    "आदत जब हद से ज्यादा बढ़ जाए तो नशा बन जाती है", (वैसे याद नहीं आ रहा है, किस फिल्म की लाइनें हैं ये) पर हम सब किसी न किसी आसक्ति से जुड़े होते हैं।

    "मेरे पति शराब के आदी हो चुके थे। वे खुद रोज़ सोचते थे कि आज छोड़ दूंगा,कल छोड़ दूंगा, लेकिन उनका मनोबल टूट जाता था, किसी न किसी बहाने से वे अपने नशा को अपना ही लेते थे, पर मेरे पिताजी को देखने के बाद, मैं निश्चित थी कि शराब की आदत उन्हें छोड़नी ही पड़ेगी, ये जान लेवा हो सकती है। 31 दिसंबर के बाद, उन्होंने शराब को हाथ नहीं लगाया, तारीख को अपनी ढाल बना ली। "-(Anonymous)

    सिर्फ नशीले पदार्थ ही नहीं, कई और चीज़ें हैं, जो हमें आसक्ति से बांधे रखती हैं। जैसी ज्यादा खरीदारी करना भी आसक्ति है, फ़ोन पर हमेशा मेसेज देखना एक आसक्ति है।

    सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खुद को व्यस्त रखना भी एक आसक्ति है, और धीरे धीरे ये इतने प्रभावशाली हो जातें है, कि हम इन्हें आसानी से छोड़ नहीं पाते। इससे हमारा वक़्त, पैसा, और स्वास्थ्य, सब बर्बाद होता है।

    हम दिन में 10-12 घंटे काम कर सकते हैं, जिनमें 4-5 घंटे आसक्ति को अंजाम देने में व्यर्थ हो जाता है।

    इंटरनेट शॉपिंग की आसक्ति हो, तो Jabong से Flipkart से Amazon तक, ढूंढ़ते ढूंढते,शाम हो जाती है, पर हमारे मन को कुछ पसंद का नहीं मिलता। हम कुछ नहीं खरीदते, लेकिन घंटों जाया हो जाते हैं।

    काम के बीच बार-बार फ़ोन पर मैसेज चेक करने से, ना सिर्फ काम खराब होता है, बल्कि दिमागी संतुलन बिगड़ सकता है, क्योंकि आप एक समय पर दो या उससे ज्यादा काम पर समान ध्यान लगाने कि कोशिश करते हैं।

    कंप्यूटर पर वीडियो गेम्स, बच्चों के लिए एक अद्भुत आसक्ति है, जिससे माता-पिता परेशान हो कर, कंप्यूटर को लॉक कर देते हैं। वीडियो गेम्स बुरे नहीं हैं, पर प्यारे बच्चों ज्यादा देर तक खेलते रहने से, आपकी आँखें खराब हो सकती हैं, आपका शरीर मशीनी हो जाता है, और तार्किक चेतना (लॉजिकल रॅशनॅलिटी) घटने लगता है।

    बच्चों के लिए, ये वक़्त का दुरुपयोग है, क्योंकि, जीवन के इस व्यस्त समय में, उनको पढ़ाई पर ध्यान देना आवश्यक है, पर गेम के लिए आसक्ति से, उनका पढ़ाई पर ध्यान नहीं होता है, और अकसर रोज़ के अभ्यास बाकी रह जाते हैं।

    ऐसे ही नाखून चबाना, सर खुजाना, नाक कुरेदना भी आदतें है, जो समाज में हमारी छवि खराब कर सकती हैं।

    पर हम तो हम हैं, और गाते रहते हैं, "क्या करूँ ओ...... मैं हूँ आदत से मजबूर"

    पर ये आदतें, कई बार हम पर हावी हो जाते हैं, और हम खुद इसे छोड़ना चाहते हैं। पर छूटता नहीं।

    सही तरीके से कोशिश करना ज़रूरी है।

    1. दृढ़ निश्चय बनें। आपको अपनी बुरी आदत छोड़नी है, ये पहले तय कर लें। उसके दुष्प्रभाव को समझें, और क्षणिक ख़ुशी को नज़रअंदाज़ करें।

     

    1. आसक्ति छोड़ने के लिए एक तारीख तय करें, कि उस दिन के बाद आप इस आदत को दुबारा नहीं होने देंगे।

     

    1. खुद से खुद के वादे पर कायम रहें ।

     

    1. अपने दिमाग की आवाज़ न सुने। अकसर आपको लगेगा कि एक बार और अपनी पुरानी आदत को अभ्यास कर लेने से कोई हानि नहीं है, दुनिया पर आफत नहीं आएगा। वह इसलिए, क्योंकि जब हम थके हुए होते हैं, मस्तिष्क में #PrefrontalCortex काम करना बंद कर देता है, जब ऐसा लगे, खुद को नकारें। अपनी समझदारी आसक्ति से दूर होने में लगाएं। एक क्षण कि कमज़ोरी को, आपकी लम्बी कोशिश को व्यर्थ न करने दें।

     

    1. जो लोग या जगह, आपको अपनी आसक्ति की तरफ खींचती है, उनसे दूर रहे।

     

    1. अगर कुछ काम न आये, तो विशेषज्ञों की मदद लें।

     

    अपनी कमज़ोरी पर जीत हासिल करने से, आप अंदर से मज़बूत महसूस करेंगे, आपके स्वास्थ्य में सुधार आएगा। आपका वक़्त और पैसा दोनों बचेगा।

    आपकी आसक्ति में साथ देने वाले भागीदारों को शायद, शुरुआत में, ये बदलाव अच्छा न लगे, पर आसक्ति को मिटा कर आप उनके लिए भी उदाहरण बनेंगे, और उन्हें ये छोड़ने में मदद कर पाएंगे।

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    Responses 1

    • virendra rao
      virendra rao   Dec 25, 2015 12:39 PM

      मेरी उम्र २५ साल की है जब मेरी उम्र २२ की थी तब मै एक लड़की से मिला था  और उससे मिलते ही मुझे लगा जैसे मुझे उससे प्यार हो गया है क्योकि  देखने में वह बहुत ही सुन्दर दिखती है  और फिर धीरे धीरे हम दोनों में सच में प्यार हो गया और लगभग ५ महीनो के बाद हम दोनों ने शादी भी कर लिया  अब जबकि हमारी शादी के लगभग २.५ साल होने वाले है हम दोनों की आये दिन लड़ाईया होती रहती है । रोज किसी न  किसी बात को लेकर हम दोनों आपस में लड़ाईया करते ही रहते है । हम क्या करे  कृपया कुछ सलाह दे । धन्यबाद

  • 25 Feb
    Oyindrila Basu

    समाज में लिंग विभेद से लड़ना मुश्किल नहीं । 

    ling bhed

    "स्त्री -पुरुष जीवन रुपी गाडी के अगले और पिछले पहिये हैं", इस कथन से समाज साफ़ बता देता है, कि वे पहिये साथ तो चलते हैं, पर एक पायदान पर नहीं आ सकते। सामाजिक तौर पर, एक आदमी को कमाना चाहिए, और एक औरत को घर सम्हालना चाहिए।

    ये कथन आज के ज़माने में शायद अक्षरों के हिसाब से सत्य न हो, पर समाज में सभी इसी को मान के चलते है ।

    विभेद मिटाने के लिए जड़ से शुरुआत करना होगा ।

    स्कूलों में लड़के लड़कियों में विभेद को कम करना ज़रूरी है । लड़कियों को भी लड़कों के समान खेल, पढ़ाई में प्रोत्साहन मिलना चाहिए ।

    बचपन से बच्चों को लिंग समानता की सीख दें । ताकि लड़कियां इस भ्रम में ना जियें कि वे नाज़ुक हैं, और अपना सामान नहीं उठा सकती, ना ही किसी खेल-कूद में भाग ले सकती हैं ।

    और लड़के ये न माने, कि वे रो नहीं सकते, और किसी को भी मार सकते हैं ।

     काम के क्षेत्र में, आज मर्द और औरत कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं, सब को अच्छी शिक्षा मिल रही है, पर फिर भी इस क्षेत्र में ही लिंग की वजह से भेद-भाव देखा जाता है।

     औरतें ज्यादातर वही काम लेती हैं, जो समाज की बाकी औरतें करती है, और इससे उनकी तनख्वाह में बहुत अंतर आता है, जैसे टीचिंग ।  ज्यादातर महिलाएं इस क्षेत्र में भाग लेती है, इससे उस क्षेत्र में एक प्रकार के लिंग के लोगों की भीड़ हो जाती है, और वेतन घटने लगता है, और उस क्षेत्र का महत्व भी। व्यवसाय या आर्थिक क्षेत्र में वेतन बहुत ऊँचा होता है, पर डॉक्टर महिला उसमें भाग नहीं लेती, और इस प्रकार, साल में, औरत आदमी से, आर्थिक रूप से २०% पीछे रह जाती हैं।

    इसका कारण सामाजिक सोच है, जो औरतों पर हावी रहता है, वे सोचती हैं, कि वे पुरुष प्रधान कार्य नहीं कर सकतीं या वे उसके काबिल नहीं, या फिर उन्हें यह इतना महत्वपूर्ण नहीं लगता, या वे घर-परिवार की प्राथमिकता ज्यादा महत्वपूर्ण समझती हैं । और इस तरह से ये विभेद कभी नहीं घटता।

    इससे हमारे बॉलीवुड के सितारे भी बच नहीं पाते। हाल ही में, अनुष्का शर्मा, अपने कड़े शब्दों में निंदा करती हैं कि,"एक समान काम के लिए, इस इंडस्ट्री में कभी एक समान वेतन नहीं मिलता। अभिनेता को हमेशा ज्यादा वेतन मिलता है, भले मेहनत दोनों समान करते हों, या अभिनेत्री प्रधान फ़िल्म हो ।"

     

    1. कम्पनीज में विभेद को रोकने के लिए एम्प्लायर को तत्पर होना पड़ेगा । एक समान काम के लिए कर्मियों को एक समान वेतन मिले, ये उन्हें देखना होगा ।
    2. महिलाओं को खुद के लिए आवाज़ उठाना ज़रूरी है । वेतन में भेद भाव को न माने, नौकरी जाने के डर से चुप ना रहे ।

     

    कर्म क्षेत्र के अलावा कई और सामाजिक क्षेत्र में भी ये विभेद दिखता है। आदमी को ज्यादा सुविधा दी जाती है।

    शादी के बाद उपनाम का परिवर्तन। आदमी को नाम नहीं बदलना पड़ता, पर औरत को समाज, रिश्तेदार बार बार उकसाते है की वे अपना उपनाम अपने पति के नाम पर रख लें। नाम एक इंसान का परिचय है, और उसको एक दिन के बाद अचानक बदलना बहुत मुश्किल होता है, क्या करना है समझ नहीं आता तो औरत अपने दोनों उपनाम को प्रचार करने लगती है। (एक पिता का, एक पति का)

    1. उपनाम का रिश्ते से कोई सम्पर्क नहीं है, ये समझना ज़रूर है। अपने मत पर अड़े रहे, और दूसरों को भी अपनी बात सही तरीके से समझायें ।

    2. घर में आदमी को आर्थिक चीज़ों पर बोलना चाहिए, और औरतों को दाल-मसाले पर, ये अलिखित नियम अभी भी है।   

    वैज्ञानिकों नें शोध में पाया है कि, आदमी और औरत की मष्तिष्क संरचना एक होती है । अगर आपको ज्ञान है, तो आप किसी भी विषय पर अपना मत रख सकती हैं। ये बात औरत के लिए समझना सबसे ज़रूरी है। इन्टरनेट का इस्तेमाल करें, जो भेद भाव कर रहे हैं, उन्हें हर प्रकार से #सच का सामना करवाएं । खुद पर आत्मविश्वास होने पर ही, आप इस लिंग भेद भाव से बच सकती है।

    कई क्षेत्र में, आदमी को भी इस भेद भाव का शिकार होना पड़ता है। डाइवोर्स के वक़्त भरपाई आदमी को ही भरना है (बावजूद ये की उसकी पत्नी शायद उससे ज्यादा कमाती है), क्योंकि समाज ऐसा मानता है की आदमी आर्थिक रूप से सबल है। अगर कोई महिला गृह-हिंसा का मामला दर्ज करती है, तो समाज मान लेता है, कि औरत तो अबला है, कमज़ोर है, सच ही बोल रही होगी। ऐसे में औरत को गलत तरीके से सहायता मिलती है, जो नहीं होना चाहिए।

    विभेद हटाने के लिए पहले लोगों को गलत फायदे का एहसास दिलाना ज़रूरी है, जो प्रति पक्ष को मिल रहा है, पर ये हमें ही करना होगा। खुद पर विश्वास रखें, और ऐसी परिस्थिति का डट कर सामना करें।

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