• 20 Dec
    Shiva Raman Pandey

    सेल्फ़ी क्या है? और युवा इसके पीछे पागल क्यों हैं?

    selfi kya hai aaj selfi ka itna badhava kyo hai

    आइये मिलते है नेहा से एक २० वर्षीय युवती है जिसे सेल्फ़ी लेने की आदत सी है वह जहां जाती है वहाँ अपनी 4-5 सेल्फ़ी लेती है, और फिर उन्हें अपने  दोस्तों और  रिश्तेदारो  के बीच दिखाती (शेयर करती)  है। दोस्तों नेहा सिर्फ एक उदहारण है कि आज के युवाओं में सेल्फ़ी का कितना क्रेज है,हर सेकंड अकेले फेसबुक पर दस हज़ार से ज्यादा सेल्फ़ी अपलोड होती है वह भी केवल भारत से !!!!!!!!!!!

    आइये जानते हैं सेल्फ़ी क्या है? और युवा इसके पीछे पागल क्यों है?

    आज इंटरनेट पर सेल्फ़ी की बाढ़ सी आ गई है। हालाँकि कुछ सेल्फ़िज़ ख़ास अवसरों (काम,शादी,जीत की ख़ुशी, उपलब्धि आदि) पर ली जाती है।पर ज्यादातर सेल्फ़िज़ को किसी भी अवसर की आवकश्यकता नहीं होती है। स्पेशल फ़िल्टर Apps जैसे इंस्टाग्राम और स्नैपचैट यह सुनिश्चित करते हैं की हम सिर्फ अच्छी सेल्फ़िज़ फ़िल्टर कर पोस्ट करें।

    हम सेल्फ़िज़ क्यों लेते है?

    सबसे बड़ा स्पष्टीकरण है,नियंत्रण:

    • हम सेल्फ़ी को लेते समय तस्वीर की गुणवत्ता को नियंत्रित कर सकते हैं।यह उस समय नहीं हो सकता जबकि कोई अन्य हमारी तस्वीर लेता है।
    • हम कई फिल्टर्स से कोई एक सेल्फ़ी चुन सकते हैं जो हमे पसंद हो।
    • हम कोण(Angle) और प्रकाश का चुनाव कर सकते हैं।
    • हम कई तस्वीरें ले सकते हैं और फिर उनमें से सबसे अच्छी तस्वीर चुन सकते हैं। यह उस समय नहीं हो सकता जबकि कोई अन्य हमारी तस्वीर लेता है।

    अतः सेल्फ़ी दूसरों को हम कैसे दिखते हैं,इसके नियंत्रण में हमें मदद करती है।

    तो हम कैसे दिखते हैं,इसका नियंत्रण हम क्यों चाहते हैं?

    इसका उत्तर स्वयं को आईने में देखने जैसा है।यह परिकल्पना इस तर्क पर आधारित है कि डिजिटल रूप से जुडी दुनिया में दूसरों की आँखों में अपना मूल्य पाने की धारणा बहुत बढ़ गई है।अक्सर लोग इस बात को भी पोस्ट कर रहे हैं कि वे हर मिनट क्या कर रहे हैं।इसी प्रतिस्पर्धा में कि हमारे जीवन में क्या हो रहा है,इसकी तस्वीर भी हम पोस्ट करना चाहते हैं ।हम उन्ही तस्वीरों को पोस्ट करना चाहते हैं जिनमें हम अच्छे और खुश नज़र आते हैं।

    आज कल हमारा आत्मसम्मान पहले की अपेक्षा अब इस बात पर ज्यादा केंद्रित है कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं। अधिक  प्रशंसा ना मिलने पर लोग अपना धैर्य खो रहे हैं। इसीलिये जब लोग अपना सम्मान और आत्म विश्वास दूसरों के नज़रिये से देखने लगे हैं,वे स्वयं को सबसे अच्छा दिखाना चाहते हैं,ज्यादा से ज्यादा लोगों की प्रशंसा और ध्यान पाना चाहते हैं और स्वयं के बारे में अच्छा अनुभव करना चाहते हैं।

    तो क्या हम अब खुश हैं क्योकि अब हम बहुत सारी सेल्फ़ी ले रहे हैं?

    इन पर हुए शोध काफी बंटे हुए हैं। कुछ  महिलाओ पर हुए अध्ययन में यह पाया गया है कि उनकी ज्यादा प्रशंसा और सकारात्मक टिप्पणी स्वयं के बारे में अच्छा सोचने और अनुभव करने में मदद करती है।

    कुछ दूसरे अध्ययन यह बताते हैं की लोग सोशल मीडिया पर प्रशंसा (लाइक्स) पर इतना भरोसा करते हैं कि नकारात्मक टिप्पणी मिलने पर उनका आत्मविश्वास बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। इसलिए स्वयं के बारे में ज्यादा मूल्यांकन, प्रशंसा या नकारात्मक टिप्पणी हमारे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के लिए हानिकारक हो सकता है। एक और  अध्ययन के अनुसार सेल्फ़िज़ की सनक वाले जो लोग अधिक सेल्फ़ी लेते हैं वे अहंकारी होते है अथवा वे लोग जो हद से ज्यादा के स्तर पर स्वयं को प्यार करते हैं, इतनी अधिक सेल्फ़िज़ के द्वारा वे अपनी आत्मप्रशंसा की इच्छा को पूरी करते हैं। हालाँकि अध्ययन यह भी कहते हैं कि अहंकारी लोगों का स्वयं के प्रति संदेह गंभीर स्तर पर होता है। इसलिए वे बहुत सारी प्रशंसा पहले स्थान से पाना चाहते हैं।

    इन अध्ययनों से अलग, एक प्रश्न समय की मांग है कि, क्या हम तस्वीरों को नियंत्रित करते हैं,या तस्वीरें हमें?

    क्या आप विश्वास करेंगे कि पहली सेल्फ़ी 1939 में Robert Cornelius ने ली थी? यहाँ पर सेल्फ़ी के बारे में कुछ तथ्य दिए गये हैं।:

    1) आज कल परफेक्ट सेल्फ़ी लेने की कोचिंग भी शुरू हो गई है। विद्यार्थियों में ज्यादातर महिलाएँ होती हैं।

    2) सेल्फ़ी इतनी पॉपुलर है कि आतंकवादी भी आज कल इसे लेने लगे हैं।

    3) जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश जाते हैं तो कम से कम २ सेल्फ़ी लेते हैं।

    4) बराक ओबामा भी रोज़ 1 सेल्फ़ी लेते हैं ।

  • 20 Dec
    Shiva Raman Pandey

    प्रसव उपरांत व्यवहार परिवर्तन का कारण

    prasav uprant vyohar parivartan ke karn

     

    "बच्चे के जन्म के बाद विशाल को पापा बनने की ख़ुशी है, मिसेज शर्मा को दादी बनने की, पूरे घर में ख़ुशी का माहौल है, लेकिन सीमा का बदलता मूड कोई समझ नहीं पा रहा । जरा -जरा सी बात पर उदास हो जाना, कोई चीज़ पसंद नहीं आने पर रोने लगना । बच्चे को लेकर चिंता करना और चिड़चिड़ाना। सीमा के इस व्यवहार को लेकर विशाल ने मनोचिकित्सक से बात की । तो आइये जानते हैं क्या है प्रसव उपरांत इस व्यवहार परिवर्तन का कारण।

    बेबी ब्लूज या प्रसव पश्चात अवसाद :- एक बच्चे का जन्म इंसान के जीवन  की सबसे बड़ी ख़ुशी होती है। महीनों की परेशानी ,हर समय सावधान रहना ,जीवन शैली में परिवर्तन और उसके बाद डर और ख़ुशी से भरी जन्म देने की प्रक्रिया , सच में ये सब माता - पिता के लिए रोलर -कोस्टर की सवारी जैसा है , और इन्ही कारणों से माता -पिता बच्चे को सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।हालाँकि कभी-कभी माँ जन्म देने के बाद बेहतर नहीं   महसूस करती । यहाँ दो प्रकार की भावनायें या मूड से संबंधित कारण हो सकते हैं। पहला- बच्चे को लेकर चिंता या 'बेबी ब्लूज'

    और दूसरा- प्रसव पश्चात अवसाद या 'पोस्ट पार्टम डिप्रेशन' । प्रसवोत्तर चिंता या मनोविकृति का रूप आमतौर पर कम होता है।

    बेबी ब्लूज के लक्षण :-  यह आपके बच्चे के जन्म के एक या दो हफ़्तों के उपरांत ख़त्म हो जाता है , इसके लक्षण हैं :

    मूड बदलना

    चिंता

    उदासी

    चिड़चिड़ापन

    व्याकुलता महसूस करना

    रोना

    एकाग्रता में कमी

    भूख की समस्या

    नींद में कमी

    दूसरी ओर प्रसव पश्चात अवसाद ज्यादा समय तक चलता है और बहुत ज्यादा गंभीर होता है। जन्म देने के छः महीनो तक यह रह सकता है। अगर इसका उपचार न किया जाये और माँ के देखभाल करने की क्षमता और शिशु के प्रति उसके लगाव के साथ हस्तक्षेप करने पर यह और ज्यादा लम्बे समय तक जारी रह सकता है।

    प्रसव पश्चात अवसाद के लक्षणों में शामिल है :-

    o        उदास मन या गंभीर मिज़ाज़

    o        अत्यधिक रोना

    o        अपने बच्चे के साथ जुड़ाव में कठिनाई

    o        अपने दोस्तों और परिवार से दूर होना

    o        भूख में कमी या सामान्य से बहुत अधिक खाना

    o        अनिद्रा या अत्यधिक सोना

    o        भारी थकान या ऊर्जा की कमी

    o        आनंद और ख़ुशी वाली गतिविधियों में कम रूचि लेना

    o        तीव्र चिड़चिड़ापन और क्रोध

    o        यह डर कि आप एक अच्छी माँ नहीं बन सकती हैं

    o        बेकार होने का ,शर्म अपराध या अपूर्णता का एहसास होना

    o        स्पष्ट सोचने की क्षमता ,एकाग्रता या निर्णय लेने की क्षमता में कमी।

    o        गंभीर चिंता और भययुक्त दौरे।

    o        अपने आप को या बच्चो को नुकसान पहुँचाने का  विचार।    

    o        मौत या आत्म हत्या के बारंबार विचार।

     

    प्रसव पश्चात मनोविकृति या चिंता दुर्लभ है लेकिन फिर भी यह हो सकता है। इसके लक्षण इस प्रकार है :-

    घबराहट या चिंता की स्थिति

    भ्रम या भटकाव

    बच्चे के बारे में जुनूनी विचार

    माया और भ्रम

    निद्रा सम्बन्धी परेशानियाँ

    मानसिक उन्माद

    अपने आपको या बच्चे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करना

    प्रसव उपरांत मनोविकृति,जीवन के लिए खतरनाक विचार और व्यहार को बढाती है और इसके तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है।

    अच्छी खबर यह है की इन सभी स्थितियों का उपचार किया जा सकता है। कृपया सम्बंधित मदद के लिए रजिस्टर्ड मेडिकल विशेषज्ञ से जल्दी संपर्क करे।

    आप हमारे अन्य लेखों में पढ़ सकते हैं कि इन स्थितियों के कारण क्या हैं ?

    आनुवंशिक और वातावरण के जोखिम क्या है?

    इन स्थितियों के प्रभाव क्या हैं ?

    और हम कैसे अच्छे हो या मदद कैसे प्राप्त करें?

    अगर आपके मन में आत्महत्या कर विचार आ रहे हों,अपने या बच्चे को हानि पहुँचाने का प्रयास कर चुके हों तो आपको यह सलाह है कि आप अपने मित्र या प्रियजनो से बात करें,  और स्वयं को अस्पताल में दाखिल करवाएं।

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  • 23 Dec
    Shiva Raman Pandey

    प्रसव पश्चात अवसाद (Post partum depression) को समझना:-जोखिम के कारक और कारण

    prasav paschat avsad

     

    पहले लेख में जन्म देने की प्रक्रिया से संबंधित प्रसव पश्चात अवसाद और दूसरे मन से संबंधित मसलों  का संक्षिप्त परिचय यह इशारा करता है कि ये मसले  नई माँ पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। अमेरिका  में हुए  अध्ययन के अनुसार दस में से एक नई माँ को प्रसव पश्चात अवसाद होता है और यह बहुत सी माँओं को होने का खतरा होता है।

    माँ के साथ ही पिता भी इससे प्रभावित हो सकते  हैं, क्योंकि प्रसव पश्चात अवसाद या दूसरे मूडmood के स्वरूप संबंधों में तनाव ला सकते हैं और आपसी लड़ाई,चिंता और संवाद समस्या का कारण होते हैं। यह उनके तनाव को बढ़ा सकता है क्यों की उन्हें नई माँ की देखभाल के साथ ही घर के काम और ऑफिस भी जाना पड़ता है।अनुपचारित माताओं के बच्चे ADHD,ADD और उदासीनता जैसे मानसिक रोग का शिकार हो सकते हैं । ऐसे बच्चों को अभिभावक का प्यार न मिलना उनके सामाजिक, भावनात्मक विकास पर असर डाल सकता है । 

    अतः अगर आप इससे निपटने में मदद चाहते हैं, तो प्रसव पश्चात अवसाद के कारण को समझना सबसे ज्यादा जरूरी  है। इसके कारणों में काफी हद तक गर्भावस्था(pregnency) और प्रसव(delivery) के दौरान शरीर में होने वाले हार्मोनल प्रक्रियाओं को जिम्मेदार माना जाता है।जबकि हार्मोन्स जटिल रूप से भावनाओं से जुड़े होते हैं। कभी -कभी गर्भावस्था और प्रसव पीड़ा को लेकर मन में होने वाला तनाव बढ़ जाता है ।वास्तविक प्रसव (डिलिवरी ) एक दर्दनाक प्रक्रिया हो सकती है और यह भी अवसाद को बढ़ा सकती है।

    प्रसव पश्चात अवसाद किसी भी बच्चे के जन्म के बाद हो सकता है ,ना कि सिर्फ पहले बच्चे के जन्म के बाद। इसका जोखिम अधिक होता है, यदि

    • आपको पहले कभी अवसाद हो चुका हो,या तो गर्भावस्था के दौरान या किसी अन्य समय पर।
    • आपको दो ध्रुवी अवसाद (bipolar depression) हो।
    • आपको पहले गर्भावस्था के दौरान प्रसव पश्चात अवसाद था।
    • आपके परिवार के सदस्यों में किसी को अवसाद या मन से संबंधी कोई समस्या हो।
    • आपके साथ पिछले वर्ष कोई तनाव पूर्ण घटना हुई हो ,जैसे -गर्भावस्था की जटिलताएं ,बीमारी या जॉब का खोना।
    • आपके बच्चे को कोई स्वास्थ्य समस्या है या कोई विशेष आवश्यकता।
    • आपको स्तनपान कराने में परेशानी होती है।
    • आपको अपने साथी या किसी विशेष के साथ संबंधों में परेशानी होती है।
    • आपके पास सहयोगियों की कमी है।
    • आपको आर्थिक समस्या है।
    • गर्भावस्था अनियोजित या अनचाही थी।

    यह महत्वपूर्ण है की जल्दी से इसका पता लग जाय क्योंकि प्रसव पश्चात अवसाद  चिंता बढ़ कर मनोविकृति या गंभीर अवसादग्रस्त विकार में बदल सकता है। अगर आपको हल्का सा भी  मानसिक अशांति  का अहसास हो तो आप इंतजार मत करिये। प्रसव पश्चात अवसाद को बिना इलाज नही छोड़ना चाहिए। इसका उपचार अत्यंत आवश्यक है। अगर समय रहते इसका इलाज न हो तो यह आपसी संबंधों को बर्बाद कर देता है और नवजात के विकास को प्रभावित कर सकता है।

    अगर आप प्रसव पश्चात अवसाद से ग्रस्त माँ के साथी हैं ,तो उसको त्याग देना नही चाहिए बल्कि उसको प्यार और देखभाल की जरूरत है। आपको यह समझने की आवश्यकता है , कि यह एक ऐसी माँ है जो गंभीर भावनात्मक मनोविचारों की गिरफ्त में है। उससे थेरेपी और दवाओं के लिए आग्रह करें। आप स्वयं के लिए भी यह सुनिश्चित करें कि आपके ऊपर देखभाल और काम का अधिक बोझ ना हो ,और आपको कोई सहयोग करे। और जल्दी से जल्दी एक प्रोफेशनल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सम्पर्क करें।

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  • 24 Dec
    Shiva Raman Pandey

    मैं अपने अंदर खाली सा महसूस करती हूँ

    mai andar se khali sa mahsoos karti hun

    "मैं अपने अंदर खाली सा महसूस करती हूँ ।"

    "मैं लगातार अपने जीवन का मतलब ढूढ़ती हूँ "

    "मैं दूसरों की प्रतिक्रिया से खुद को आंकती हूँ "

    "मैं नहीं जानती कि मैं कौन हूँ "

    इन पंक्तियों से हम उनका दर्द समझ सकते हैं जो बॉर्डर लाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर Borderline personality disorder से जूझ रहे हैं ।

    यह एक ऐसा मानसिक विकार है जिससे विश्व के २% लोग प्रभावित हैं । और यह सबसे भ्रमित करने वाली मानसिक बीमारी है ।

    और तकलीफ तब ज्यादा होती है, जब लोग इनसे ग्रसित व्यक्ति को समझ नहीं पाते और उन्हें इमोशनल कह कर उनका मजाक बनाते हैं । आखिर ऐसा क्यों करते हैं लोग?

    बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर एक प्रमुख चिंता का विषय है और पुरुषों की तुलना में महिलाओं को यह अधिक प्रभावित करता है । अगर इस विकार का समय से इलाज न हो तो यह अन्य मानसिक विकारों को जन्म दे सकता है । जिसमे आत्मघाती व्यवहार भी शामिल है ।

    व्यक्ति का मूड बुरी तरह प्रभावित होता है, वह कुछ ही सेकेंड्स में एक मूड से दूसरे मूड में बदल जाता है । इस रोग से प्रभावित व्यक्ति अपने मन को अपने बस में नहीं कर पाते और खुद को खुश और कॉंफिडेंट नहीं महसूस करते ।

    उनके लिए रिश्तों को बनाये रखना और नौकरी को बचाये रखना मुश्किल हो जाता है । उनका मन उनके बस में ना होने से वे अपराधिक काम और ऐसे काम ज्यादा कर सकते हैं, जिसमें जोश और होश दोनों खो सकते हैं ।

    बी पी डी होने पर एक कमी यह  होती है कि व्यक्ति का जीवन के प्रति काला और सफेद नजरिया हो जाता है । या तो सारी चीजें अच्छी हैं या सारी चीजें खराब हैं । इसलिए व्यक्ति के द्वारा की हुई एक ही गलती उसकी नजरों में उसके पूरे व्यक्तित्व को खराब कर देती है ।

    इस विकार के इलाज के लिए डिएलेक्टिकल  बिहैवियर  थेरेपी'(डी बी टी) Dialectical behaviour therapy का प्रयोग किया जाता  है, जिसमें प्रभावित व्यक्ति को यह विश्वास दिलाया जाता है कि दो विचारों के बीच झूलना सही है ।

    और प्रभावित व्यक्ति को लगातार यह सोचने का दबाव नही देना है कि मेरे दो रूपों में कौन सा उसका असली रूप है? अतः न सिर्फ स्वयं और अपने खुद के व्यक्तित्व के साथ बल्कि दूसरों में,जीवन की परिस्थितियों आदि में,यहां तक कि थेरेपिस्ट के साथ भी यह व्यक्ति को उसकी दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करने का अवसर देता है।

    'डी बी टी' के द्वारा संसार के प्रति इस काले और सफेद नजरिये को चुनौती दी जाती है ।

    ‘डी बी टी’ में ध्यानपूर्ण तकनीक(Mindfulness techniques) का इस्तेमाल किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति धीरे - धीरे स्वीकृति की विचारधारा को गले लगाये । यह सिद्धांत ‘डी बी टी’ मार्श लेनिहेंन द्वारा बनाया  गया था, जब वे आत्मघाती व्यवहार से ग्रस्त महिलाओं के साथ काम कर रहीं थीं , लेकिन उन्होंने देखा कि यह आत्म-हानि(self-harm) के साथ 'बॉर्डर लाइन पर्सनाल्टी डिसऑर्डर' के मूड और कुछ अन्य विकारों  में भी सहायक है।

    अनुसंधानों से यह पता चला है की Mindfulness techniques और DBT therapy की मदद से धीरे धीरे व्यक्ति BPD की दोनों अवस्था को स्वीकार करने लगता है ।

    इसके साथ साथ व्यवहार थेरेपी Behaviour therapy की भी मदद ली जाती है , जिसमें व्यक्ति का डेली रूटीन निश्चित  किया जाता है, क्योंकि रोज -रोज के  बेतहाशा बदलती दिनचर्या भी मूड से जुडी समस्याओं को बढ़ाती है ।

    दिनचर्या में सरल कार्य पहले करने को कहा जाता है, और एक समय सीमा तय कर दी जाती है ।

    इसमें खुद दिमाग को विश्राम देने की तकनीक और अनहोनी को हैंडल करना सिखाया जाता है ।

    इस थेरेपी की मदद से व्यक्ति खुद में आत्मसम्मान महसूस करने लगता है और सुधार महसूस करने लगता है ।

    यह थेरेपी शिक्षा, संबंधों ,और रोजगार  के मामलों में काफी सफल रही है ।

    इसमें समय लगता है लेकिन ‘बी पी डी’ BPD से ग्रस्त लोग ‘डी बी टी’ DBT  थेरेपी से काफी फायदा महसूस करते हैं ।

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  • 26 Dec
    Shiva Raman Pandey

    7 सवाल जिनके जवाब हर अभिभावक को देना चाहिए

    abhibhavak ki jimmedariya

     

    कनिका का पढ़ाई में मन नही लगता। जिसकी वजह से उसकी क्लास टीचर उसे अक्सर समझाती रहती थीं | एक दिन टीचर ने उसके पिता को बुलाकर उसकी शिकायत की ।  जब उसके पिता टीचर से मिलकर चले गए, तब टीचर किसी काम से क्लास के बाहर आईं तो उन्होंने देखा की कनिका के पिता उस पर जोर- जोर से चिल्ला रहे थे, और  उसी गुस्से में उन्होंने उसे एक थप्पड़ भी मार दिया । टीचर को बड़ा अफ़सोस हुआ कि, उनकी वजह से कनिका को इतना झेलना पड़ा, बाद में कनिका ने मैम को रोते हुए बताया कि उसके पापा और मम्मी के बीच रोज लड़ाई होती है । और वे उसे भी जरा-जरा सी बात पर डांटते और मारते रहते हैं । 

    कहीं आपका, आपके बच्चे के साथ ऐसा ही संबंध तो नही?

    पूरे विश्व में खासकर भारत में ये विश्वास किया जाता है कि माता-पिता अपने बच्चे के लिए हमेशा  अच्छा चाहते हैं। जबकि यह बहुत से माता-पिता के लिए सच होता है, कुछ ऐसे माता -पिता भी होते हैं ,जिनके लिए शायद यह सच नहीं होता। इसके दो मुख्य कारण  है :पहला कि माता -पिता बच्चे के भले के लिए क्या सोचते हैं और, वास्तव में बच्चे के लिए क्या अच्छा है, इसमें बहुत बड़ा अंतर होता है । और दूसरा कारण है कि माता -पिता अपने भावनात्मक मुद्दो पर नियंत्रण नही रख पाते,और बच्चे के लिए क्या अच्छा है,यह जानने के बावजूद वे उसे  दे नहीं पाते ।

    क्या अभिभावक के क्रोधित होने का कारण उसका बच्चा होता है ?

    लोग सोचते हैं कि माता -पिता के क्रोधित होने का कारण बच्चे की शरारत और समस्याएं है । हालाँकि इस बात की संभावना काफी अधिक होती है कि ये भावनात्मक समस्या सिर्फ आपके पास नही रहती, बल्कि सामाजिक संबंधों के कारण बच्चे के पास भी आ जाती है ।

    हालाँकि बड़ों के पास बहुत सी भावनात्मक समस्याएं होती हैं । बहुत से माता -पिता इस पर ध्यान देते हैं, और उम्मीद की जाती है कि इसके बच्चों को नुकसान पहुँचाने के स्तर तक बढ़ने के पहले मदद और उपचार प्राप्त कर लेते हैं। जबकि अवसाद और क्रोध पर बहुत समय तक ध्यान नही दिया जाता है ।

    अगर आप सोच रहे हैं कि कहीं आप तो इस श्रेणी में नही आते हैं ?

    तो नीचे दिए कुछ प्रश्नों को देखिये :

    1. क्या बच्चे को आपसे अपने मन की बात कहने में डर लगता है?
    2. क्या आप अक्सर बच्चे को मारते हैं?
    3. जब आप बच्चे पर गुस्सा करते हैं तो क्या ये बच्चे के द्वारा की हुई गलती के अनुपात में है?
    4. उन पर चिल्लाने के बाद क्या आप उन्हें सांत्वना देने का कोई प्रयास करते हैं?
    5. क्या आपका बच्चा भी लम्बे समय तक क्रोध और दुखी मन के लक्षण प्रकट करना शुरू कर रहा है?
    6. क्या आपका बच्चा समय से भोजन लेता है?
    7. क्या आपके बच्चे के पास जब उसे जरूरत होती है, किताबें, खिलौने या दूसरी चीजें होती हैं?

    यदि आपने पहले पांच प्रश्नों के उत्तर 'हाँ' में दिए और अंतिम दो प्रश्नों के उत्तर 'न ' में दिए हैं तो ये चिंता का कारण हो सकता है। इस बात की सम्भावना है, कि आपको कोई समस्या आज भी हो और शायद यह आपको अपने माता पिता द्वारा गलत तरीके से की गयी परवरिश की वजह से हो । क्रोध और अवसाद, रिश्तों के साथ हस्तक्षेप कर उन्हें तनाव पूर्ण और नाजुक बना देतें हैं।

    मनोचिकित्सक से परामर्श

    अभी भी देर नही हुई है। अगर आप ऐसे अभिभावक है जो बात बात पर बच्चे को डांटते और मारते हैं, तो इसका कारण बच्चा नहीं बल्कि आप किसी मनोविकार (mental illness) से ग्रसित हैं, जिसका गुस्सा आप छोटे बच्चे पर निकाल कर खुद को शांत करना चाहते हैं |अब यही समय है इसे बेहतर बनाने का । याद रखें, यह सिर्फ आप के स्वास्थ्य का सवाल नही है, बल्कि आप का अपने बच्चे के साथ रिश्ता उतना ही महत्वपूर्ण है जितना दूसरों के साथ । अगर आप इस पर काम करेंगे तो आपके संबंध कार्यस्थल (office) और घर दोनों स्थानों पर बेहतर हो जायेगें।     

    भावनात्मक समस्याओं से निपटने का सबसे बेहतर तरीका है, इन क्षेत्रों में काम करने वाले परामर्शक या मनोचिकित्सक (psychotherapist)से मिलें । यह बेहतर होगा कि आप ऐसे किसी के पास जाएँ जो माता पिता -बच्चे के संबंधों का विशेषज्ञ हो । सिर्फ स्वयं किताबे या इंटरनेट पर लेख पढ़ कर मदद लेने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा । यह आवश्यक है कि आप अपने और अपने बच्चे के साथ जो संबंध हैं, उसपर विशेषज्ञ के साथ मिलकर  काम करें, और अब तक जो भी नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करें ।

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