कुल 169 लेख

  • 10 Apr
    Janhavi Dwivedi

    हंसी संक्रामक क्यों होती है?

    laughter therapy

     

     

    हँसता  हुआ चेहरा देखकर हंसी क्यों आ जाती है ?

    "हँसो और दुनिया तुम्हारे साथ हँसती है", ये सिर्फ एक कहावत नही है, जिसे हम बचपन से सुनते आये हैं। वैज्ञानिक खोजों से यह पता चला है कि हँसी संक्रामक होती है। शोध बताते हैं कि जब हम अन्य लोगों के चेहरों पर किसी भी तरह की भावनात्मक अभिव्यक्ति देखते हैं, हमारा मस्तिष्क उसे प्रतिबिंबित करने के कोशिश करता है, जिससे हम उस व्यक्ति के साथ संबंध मजबूत करने के लिए उसकी भावनाओं में भागीदार हो सकें। मनुष्य के लिए शुरू से ही अपने समूह के सदस्यों  के साथ मजबूत रिश्ते बनाना महत्वपूर्ण रहा है, और अभी भी यह प्रक्रिया जारी है और यही वजह है कि मस्तिष्क इस तरह का व्यवहार करता है। यह क्षमता हमारे सामाजिक वातावरण को बनाये रखने में मदद करती है।

    हालांकि, यह पता चला है कि सकारात्मक भावनाओं के लिए, हमारा मस्तिष्क अधिक और बहुत तेजी से प्रतिक्रिया करता है। इस वजह से सकारात्मक भावनाओं से अधिक संबंध बनने की संभावना होती है। ये भी Immune system को मजबूत करने वाला माना जाता है, और इसलिए मस्तिष्क उनपर अधिक responds करता है। इसलिए, जब हम किसी को हँसते हुए देखते हैं या कोई joke सुनते हैं तो हमारा मस्तिष्क अनायास ही चेहरे की मांसपेशियों को हँसने के लिए तैयार करता है और हम मुस्कुरा देते हैं।

    डॉ सोफी स्कॉट, इस research प्रोजेक्ट की प्रमुख ने टिप्पणी की है :-

    "हम आम तौर पर कई लोगों के बीच हँसी या वाहवाही जैसी सकारात्मक भावनाओं का सामना करते हैं। जैसे, परिवार के साथ बैठकर कॉमेडी प्रोग्राम या दोस्तों के साथ फुटबॉल मैच देखना। यह मस्तिष्क में प्रतिक्रिया करता है और हमें अपने आप हँसी या मुस्कान आ जाती है। जो की समूह के व्यवहार को प्रतिबिम्बित करने का ऐसा तरीका है, जो समूह में व्यवहार करने में हमारी मदद करता है। यह समूह के सदस्यों के बीच मजबूत संबंध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।“

    इसीलिए शायद जब दो अनजान लोग आपस में मिलते हैं, तो उनके  बीच  की चुप्पी को तोड़ने के लिए मजाक का इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है, कि किसी भी प्रकार की औपचारिक या अनौपचारिक  स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक कौशल में से एक यही है।

    उदास मन को अच्छा करने में Laughter therapy मदद करती है। 

    उदासी या अन्य किसी मनोवैज्ञनिक विकार के लिए Laughter therapy बहुत मदद  करती है। Laughter therapy में किसी भी joke का इस्तेमाल नही किया जाता बल्कि प्रशिक्षक  की साधारण हँसी ही आपको हंसने के लिए प्रेरित करती है।

    यह मस्तिष्क की सकारात्मक भावनाओं की नकल उतारने में  मैकनिज़्म काम  करता है और उपयोगी होता है। अवसाद में कुछ भी ख़ुशी देने वाली चीजें पाना  बहुत मुश्किल हो सकता है, लेकिन Laughter therapy मस्तिष्क के ऑटोमैटिक  सिस्टम पर काम करता है, और सकारात्मक भावनाओं को बढ़ाता है और फील गुड का अहसास करने वाले हार्मोन डोपामाइन को रिलीज़  करता है। इसका   प्रभाव कई गुना होता है, जैसा की हम देखते हैं, पूरा ग्रुप हँसने लगता है।

    आपकी कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, यदि आप में हंसाने की क्षमता है।

    हँसी पसंद को भी बढ़ावा देती है। उदाहरण के लिए, बच्चों को वे अंकल या टीचर अच्छे लगते हैं जो उन्हें हँसाते हैं। यदि किसी में हँसाने की कला होती है तो हम आसानी से उसकी कमियों की अनदेखी कर देते हैं।

    हँसना हमारे इम्यून सिस्टम को बढ़ाता है।

    कुछ शोध ये बताते हैं कि, हमारे पूर्वजों को पहले से ही हँसने से स्वाथ्य लाभ की जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने योग में चेहरे के व्यायाम में हँसने और हँसने के भावों को शामिल  किया है। यह संक्रामक होने के साथ-साथ स्वास्थ्यकर भी है। यहाँ तक कि जो मांसपेशियों हँसने में इस्तेमाल होती हैं, उन्ही मांसपेशियों का इस्तेमाल करके हम फील गुड कर सकते हैं, और स्वास्थ्य लाभ कर सकते हैं।

  • 10 Apr
    Janhavi Dwivedi

    खुद को व्यस्त रखने से आप निराश नहीं रहेंगे

    less busy less happy

     

     

    मिसेज गुप्ता आजकल बहुत खुश नजर आती हैं ,उनके जीवन में नई उमंग सी आगयी है। ...बच्चों के  बड़े होने के बाद वे सब अपनी पढ़ाई और कार्यों में व्यस्त हो गए और मिसेज गुप्ता दिनभर खाली रहतीं। फिर उनकी सहेली रमा ने उन्हें डांस क्लास ज्वाइन करने की सलाह दी। अब वे सीखने के साथ दूसरे बच्चों को भी डांस सीखा रही हैं। जीवन में ताजगी आ गयी है ,और साथ ही कुछ सार्थक करने का अहसास....

    महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन जैसे नेता हमेशा अपने समय को प्रबंधित करना जानते थे, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वे स्वयं को व्यस्त रखते थे।

    चाहे आप एक कामकाजी व्यक्ति हों या एक स्टूडेंट या एक ग्रहणी हम सबके पास बहुत सी जिम्मेदारी और कार्य होता है।  

    वास्तव में जब हमारे पास कोई अर्थपूर्ण कार्य नही होता तब एक खालीपन सा  छाने लगता है.... हाँ ये सही है कि, ज्यादा काम तनावग्रस्त कर सकता है, लेकिन काम ना होना अवसादग्रस्त कर सकता है।

    इसीलिए जिसमें आपकी रूचि ना हो ऐसा करियर चुनने की सलाह की सलाह नहीं दी जाती। क्योंकि जीवन भर अपने विशेष कौशल और सामर्थ्य के विपरीत कार्य करना समझदारी नही है।

    ये सच है कि जब हम कोई काम लगातार करते करते ऊब जाते हैं और अब उस काम में कोई नयापन नही लगता। अक्सर प्रौढ़ावस्था (४५ वर्ष -५५ वर्ष ) के समय ऐसा लगता है। इस उम्र में शादी और कार्य दोनों में उत्साह नही रह जाता। संयोग से ऐसे समय में ही ज्यादातर लोग अपनी नई कम्पनी या स्टार्ट-अप की शुरुआत करते हैं। इस आशा के साथ कि नए कार्य से उनके जीवन का खालीपन दूर होगा।

    कुछ अन्य लोग दूसरे नए चुनौतीपूर्ण कार्य या कई नया शौक सीखते हैं।

    जो ये कार्य नहीं कर पाते उनके जीवन में एक शून्यता आ जाती है। उन्हें अपने जीवन का मूल्य कम होने का अहसास होने लगता है, उन्हें अपनी कबिलियत के प्रति शंका होती है। हममें से ज्यादातर को लगता है कि, यदि हमारे पास योग्यता और कौशल है तो हमें अपने समय का उपयोग करना चाहिए, और अधिक चीजे सीखनी चाहिए। खाली बैठने से आनेवाले समय के प्रति व्यर्थ की चिंताए पैदा होने लगती हैं और कभी-कभी तो यह चिंता अपने चरम पर पहुंच जाती हैं। और हमें अवसादग्रस्त भी कर सकती हैं।

    अवसादग्रस्त होने पर सबसे ज्यादा चुनौती व्यक्ति  को फिर से कार्य करने के लिए प्रेरित करने की होती है। अवसाद की अवस्था में एक धारणा मन में बैठ जाती है कि, मैं बेकार हो गया हूँ, मैं कोई काम नही कर सकता, यदि मैं काम नही करूंगा तो कोई फर्क नही पड़ेगा। जितना ज्यादा हम सोचते हैं, उतना ही हम कार्य से दूर होने की जरूरत या आवश्यकता महसूस करते हैं, और कार्य मुक्त होने पर हम कुछ भी अच्छा नहीं कर पाते। इसीलिए आर्थिक रूप से सुरक्षित होते हुए भी हमें अपने समय को उत्पादक कार्यों में लगाने की आवश्यकता महसूस होती है, ताकि हमारे मन में व्यर्थ के विचार ना आने पाएं क्योंकि कहा गया है -"खाली दिमाग शैतान का घर  होता है"

    इसीलिए सबसे ज्यादा आय वाले कुछ लोग भी स्वयं को व्यस्त रखते हैं, अन्यथा अधिक धन होते हुए भी वे काम करने का कष्ट क्यों सहते। उदाहरण के लिए शाहरुख़ खान अपने दिन की शुरुआत सुबह पांच बजे से करते हैं। हाँ, वे छुट्टियां भी लेते हैं और आराम करने के बाद वापस काम पर लौट आते हैं।

    आप छोटे ब्रेक ले सकते हैं जिससे आप को थकान नहीं होगी और आप ऊर्जावान बने रहेंगे। लेकिन पूरी तरह से कार्य मुक्त होना अच्छा विकल्प नही है। कार्य करने से हमे जीवन उद्देश्यपूर्ण लगता है, और वास्तव में इसके बिना घोर निराशा छा जाती है।

    इसलिए क्या करें जब आपके पास बहुत सा खाली  समय है, और आपको जीवन अर्थहीन लगने लगा है ।

    अपने शौक को पूरा कीजिये, या कोई नया शौक विकसित कीजिये।

    किसी काम के मारे की मदद कीजिये।

    स्वयं को सामाजिक कार्यों में व्यस्त कीजिये।

    इन सुझावों पर विचार कीजिये आपकी समस्या का समाधान खुद बा खुद हो जायेगा ।

  • 10 Apr
    Janhavi Dwivedi

    क्या modernization से शादी के मतलब बदल गए हैं?

     

    old marriage and new marriage

    एक फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन में दिखाया जाता है कि, पापा बेटी से शादी के लिए कहते हैं तो बेटी कहती है, "डैड मैं शादी के लिए तैयार हूँ...लेकिन तीन साल बाद, उसके जैसा अच्छा जॉब, घर ये सब करने में इतने साल तो लग ही जायेंगे ना..तभी तो होगा परफेक्ट मैच। ....इक़्वल इक़्वल।

    हाँ यही तो है मॉडर्न गर्ल्स की सोच शादी के बारे में,पहले कैरियर फिर शादी।

    कैसे आया ये बदलाव,क्या मॉडर्नाइजेशन से शादी करने की वजह में बदलाव आया है?

    modernization (आधुनिकीकरण) क्या है ?- modernization का अर्थ है, पुरानी परम्परागत जीवन जीने के तरीके में नए बदलाव लाना। modernization का दौर industrial revolution के बाद शुरू हुआ। पहले लोगो की दुनिया के प्रति समझ सीधी -सादी थी और सिर्फ  काम चलाउ होती थी, जबकि आधुनिक समय में लोगो को सिर्फ कामचलाऊ चीजों की अपेक्षा कलात्मक और सुंदर चीजों के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा, जिसके परिणाम स्वरूप गावों का शहरीकरण, परिवहन,लोगों के रहन -सहन,आय, शिक्षा, पहनावा आदि अनेक बदलाव लोगो ने स्वीकार किये।

    इसके साथ ही लोगों की सोच में भी काफी परिवर्तन दिखने लगा। पहले जहां लड़कियों की शिक्षा को लोग अनावश्यक मानते, नए होते समाज में शिक्षा के महत्व को माना जाने लगा।

    पहले शादी के मायने घर और परिवार की देखभाल होती थी। :-

    पहले शादी के लिए लड़की पसंद करते समय ये देखा जाता था कि, लड़की घर के काम कर लेती है या नही ?और शादी के बाद नई बहु से सब यही अपेक्षा रखते थे कि, उसका पहला कर्तव्य घर की देखभाल होनी चाहिए, उसकी अपनी इच्छाओं की कोई  कीमत नही होती थी। समाज में सख्त विचार होते थे। और शादी का उद्देश्य परम्पराओं को मानना होता था।  शादी के बाद बच्चे का जन्म और रीति रिवाजों का पालन अनिवार्य होता था।     

    एक संयुक्त परिवार मे जन्म लेने और बड़े होने के कारण यह आवश्यक था कि हर सदस्य परिवार के नियंत्रण में रहे और अपनी भूमिका का सख्ती से पालन करे। और जो कोई इन नियमों को तोड़कर अलग हो (तलाक लेकर ) जाता था उसे समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था।

    एक पत्नी बनने के लिए लड़की शादी की रस्मों में यह वचन देती थी कि, वह किसी भी विपत्ति में परिवार की ढाल बन कर खड़ी रहेगी और जीवन भर पति  का साथ निभाएगी।  

    अब शादी का उद्देश्य जीवन में सहभागी बनाने के लिए एक जीवन साथी को पाना होता है। :-

    अब जबकि आधुनिक युग में संयुक्त परिवारों का चलन नही रहा इस लिए अब युवाओं के ऊपर किसी प्रकार का कोई दबाव नही रहा। अब वे शादी के लिए कोई जल्दबाजी नही दिखाते, और ऐसा जीवन साथी ढूंढते हैं जिसके साथ वे खुश रह सकें और जीवन में साझेदार बना सकें।  इन कपल को अब शादी के बाद बच्चों की कोई जल्दबाजी नही रहती है। सिर्फ जैविक पिता बनना भी वे जरूरी नही समझते, बल्कि समय के साथ बच्चों को गोद लेने का चलन भी बढ़ रहा है।

    अब महिलाएं भी अपनी पहचान बनाना चाहती हैं :-

    आधनिक महिलाएं अब सिर्फ पत्नी, माँ, बहु की पहचान से अलग अपनी खुद की पहचान बनाना चाहती हैं और बना रही हैं। वे समाज और प्रोफेशन में पुरुषों के  बराबर भूमिका निभा रही हैं। इसका मतलब अब वे दहेज या घरेलू हिंसा को नही सहन करेंगी। पुरुषों को भी स्वयं और महिलाओं के प्रति अपने नजरिये को बदलना होगा। 

    सिर्फ हुक्म चलाना या बच्चों की देखभाल का जिम्मा सिर्फ महिलाओं को ही देने वाला रवैया अब नही चलेगा। अब महिलाएं तलाक दे सकती हैं और देती हैं। इसलिए महिलाओं को पुराने जमाने की तरह अनदेखा नही किया जा सकता, इसलिए शादी अब समझौता नही बल्कि सहयोग का विषय है। 

  • 10 Apr
    Oyindrila Basu

    पैरेंटहुड-कोई खुश खबरी है क्या?

    parenthood

     

    हाल ही में, अपनी एक दोस्त से बात करते हुए अहसास हुआ, कि कैसे भारत, विदेश की सर्द हवाओं के बीच में भी, हमारे दिल में, मज़बूत जगह बनाये हुए है। वे बिहार से आएं है, सारे चार साल शादी को हो गए हैं, अब तक संतान नहीं है। और सिर्फ इस वजह से, अमरीका जैसे महेंगे देश में, वे लगभग हर दूसरे दिन डॉक्टर अपॉइंटमेंट्स को दौड़ते हैं। इसका फल मिलता है ना....... रिपोर्ट्स positive आने पर हर जांच के तुरंत बाद, अपनी सास को सब विस्तार से बताती है, कि डॉक्टर ने क्या-क्या हिदायत दी है ।

    "parenthood"  हमारे देश, भारत में, शादी-शुदा जोड़े के लिए हमेशा चर्चा में रहा है- शादी के बाद अगर जल्द बच्चा न आये तो दिक्कत, बिन ब्याही माँ बनना तो उससे भी बड़ी दिक्कत।

    1. हमारे देश में बच्चा होने के लिए शादी एक माध्यम माना जाता है।
    2. शादी के पहले दो सालों में, दोस्त रिश्तेदार हर मुलाक़ात में, एक बार तो ज़रूर पूछेंगे, "कोई खुश खबरी है क्या?" न मिले, तो फिल्म "हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी" भी देख लो, तो उनकी ख्वाहिशें और सलाह-मशवरा उससे ज्यादा ही लगेंगी।
    3. अगर तीसरा साल भी यूं ही निकल जाए, तो फिर आप तो गये....
    4. वैसे भी, खानदान में रोज़ आती "खुश-खबरियों" से आपको अचानक लगने लगेगा कि आप सच में इस दौड़ में अव्वल आने से चूक रहे हैं, जिसका नाम "Parenthood" है।

     

    एक नई जान को धरती पर लाने का निर्णय ये माँ-बाप मिल कर तय करते हैं। इसका निर्णय, बिन किसी दबाव के सिर्फ उनका होना चाहिए, जब वे ठीक समय समझें, तब बच्चे के जन्म के बारे में सोचें, तो ऐसा क्यों होता है, कि ऐसे महत्वपूर्ण फैसले में, अकसर घरवाले, मोहल्ले वाले, और ये समाज, अपना मत शामिल करने लगता है?

    समाज गुटबंदी पर टिका हुआ है, जहां अगर एक व्यक्ति भी उससे अलग सोचने या करने लगे, तो समाज उसे अलग कर देता है, अकेला कर देता है, उसका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।

    शायद इसी डर से, हम सब सामाजिक जीव, अकसर समाज के नियमों के विरुद्ध नहीं जाते, और एक वक़्त के बाद ये हमारी आदत बन जाती है।

    समाज, इसे आपके अस्तित्व मिटने का डर दिखा कर, कई अंधविश्वास, दकियानूसी नियमों का पालन करने पर भी मजबूर कर देता है। हमको हमारे फैसले लेने नहीं देता, घरवालों के रूप में, हमारी स्वतंत्रता पर रोक लगती है।

    पैरेंटहुड में देरी भी ऐसी ही एक स्थिति है, जब घर वाले मिलकर आपको समझाने लगते हैं, कि वक़्त पर घर में बच्चा ना आने से, आप समाज में मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे, आपकी नज़र नीची हो जाएगी, नाक काट जायेगी।  

    मनोवैज्ञानिक  Solomon Asch ने, अपने कथन, #SocialConformity में इस पर ख़ास तौर से चर्चा की है, कि कैसे इंसान के अकेले हो जाने का डर, उसे समाज के कहे अनुसार चलने पर मजबूर करता है।

    शादी के बाद, जल्दी बच्चे को लाना, यह एक अनुष्ठान की तरह है, जिसके नियम होते हैं, और अगर देर हुई तो माता पिता को अकसर काफी कुछ सुनना पड़ता है। अश्लील नामों (बांझ  या नपुंसक) से उन्हें सराहा जाता है।

    अकेली महिला जो माँ बन जाती हैं, उन पर भी जल्दी शादी करने और अपने लिए पति ढूंढने का का दबाव होता है। समाज उनकी  दृढ़ता और क्षमता को सलाम करने के बजाए उन्हें और मुश्किल में डालता  रहता  है।

    ऐसे सामाजिक दबाव कई और क्षेत्रों में भी दिखते है, जैसे लड़की की शादी, बच्चे की पढ़ाई, या बेटे की नौकरी, हर चीज़ के फैसले में सामाजिक मानसिकता ज़रूर शामिल होती है।

    इसका कोई समाधान नहीं, जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे, ये समाज नहीं बदलेगा, क्योंकि हम लोगों से ही तो समाज बनता है ।

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  • 09 Apr
    Janhavi Dwivedi

    क्षमा करने की शक्ति को पहचानो

    power of forgiveness

     

    शिखा की कोई सहेली नही बन पाती थी, क्योंकि वह  सबसे किसी न किसी बात पर गुस्सा हो जाती थी,यहां तक की अपने छोटे भाई से भी छोटी -छोटी बातों पर  कई दिनों तक बात नही करना उसकी आदत बन  गयी थी। शायद इसका एक कारण यह है कि उसे दूसरों को माफ़ करना नहीं आता, इस लेख के माध्यम से हम बता रहें हैं कि माफ़ी में कितनी शक्ति होती है।

    शायद किसी को शिकायतों को मन में रखे रहना सही लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह हमारे लिए ही नुकसानदायक होती है। शोधों से यहपता चला है कि जो व्यक्ति अपने मन में क्रोध और शिकायतों को लम्बे समय तक रखे रहता है,वह खुश नहीं रह सकता।

    आप उसकी गलती का बदला लें या नहीं लें लेकिन इन सब से सबसे ज्यादा आपको ही नुकसान होता है।

    दूसरी तरफ क्षमा या माफ़ कर देने से आपके मन से शिकायत ,क्रोध आदि मिट जाता है और आपका मन हल्का होने में आपको मदद मिलती है।

    शायद ऐसा लगे कि, जिसने गलती की उसे यूँ ही छोड़ना गलत है।लेकिन वास्तव में क्षमा करना किसी उत्पीड़न या अपनी परिस्थति को बिना कुछ कहे  स्वीकारने से एकदम अलग है। क्षमा करना एक बहुत ही सोच समझ कर लिया गया निर्णय होता है। इसलिए किसी को माफ़ करने का निर्णय मन से लेना चाहिए ना की किसी जल्दबाजी में।

    जब आपका कोई मित्र या साथी कोई गलती करता है जिससे आपको ठेस पहुंचती है,तो गुस्सा तो आएगा ही ,क्योंकि ये तो सहज मानवीय व्यवहार है, फिर आप ये सोचिये की गुस्सा करने या बदला लेने  की भावना से तो किसी का भला नही होगा। जितनी जल्दी आप ये समझ जायेंगे उतनी जल्दी आप अपने दुःख से बाहर निकल पाएंगे, क्योंकि ज्यादा समय तक मन में गुस्सा बने रहना भी एक समस्या है।

    यदि हम एक दूसरे को दुःख देते रहते हैं तो हम एक सामान्य मनुष्यों जैसा ही व्यवहार करते हैं। लेकिन यदि हमें अच्छे सार्थक संबंध और उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना करनी है तो अपनी भावनाओं को भी ज्यादा ऊँचे स्तर तक ले जाना जरूरी है। जरा सोचिये: यदि जीवन में किसी मोड़ पर बहुत से लोगों से आपको शिकायत हो तो कितने लोगों से आप अलग हो जाओगे, और कितनों से लड़ोगे? किसी की एक छोटी सी गलती पर उस व्यक्ति केलिए मन में नफरत या शिकायत की भावना ले कर बैठ जाना तो सही नही है। इससे तो बेहतर है आप उस घटना को भूल जाएँ। शोध से यह सामने आया है कि जो दम्पत्ति एक दूसरे की गलतियों को नजरंदाज करते हैं उनका रिश्ता, जो ऐसा नही करते उनसे ज्यादा स्वस्थ होता है। गलतियां तो मनुष्यों से ही होती है ,और यदि हम हर गलती को मुसीबत मान लेगें तब तो सारे रिश्ते हमसे दूर हो जायेंगें।    

    लेकिन इसका मतलब ये नही है की आप अपने जीवन में तिरस्कार करने वाले साथी या व्यक्ति को भी माफ़ कर दें। क्षमा करने की पहली शर्त आपका आत्मसम्मान है। इसलिए यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति या साथी से संबंध रखतें है जो आपका तिरस्कार करता है तो उस रिश्ते से अलग हो जाना ही बुद्धिमानी होगी।

    क्षमा करना आपके लिए ही अच्छा है, ना की किसी  अन्य के लिए और दूसरी बात ये है कि जिसने आपको ठेस पहुँचायी है उसके पास भावनात्मक कमी है और क्षमा करके आप उसे बदलने का एक मौका देंगे।

    यदि आप क्षमा करने की बजाय शिकायतों और गुस्से को मन में लिए रहते हैं तो आप को दुःख होगा। इसलिए यह काम आप अपने लिए कीजिये और क्षमा करने की आदत को अपने मन में जगह दीजिये ताकि आपका स्वास्थ्य बेहतर बना रहे और आपके रिश्तों में खुशियाँ ।