कुल 169 लेख

  • 13 Apr
    Oyindrila Basu

    ‘की और का’ के बराबर योगदान से ही अच्छा घर, अच्छा समाज और अच्छा रिश्ता बनता है।

    ki aur ka movie

     

    http://www.idiva.com/news-relationships/new-age-indian-bride-who-cant-cook-and-clean/33629

    मैं उल्लिखित लेख पर अपना तर्क शुरू करना चाहूंगी। इन बातों पर मैंने भी गौर किया, और पाया कि ये सारी बातें सच है। मुझे नहीं लगता है कि इस लेख का उद्देश्य गृहिणी का असम्मान करना है, लेकिन पूरी बातचीत में लेखक वही कर रही है। आज के ज़माने में वर्किंग महिला को गृहिणी से ज्यादा मज़बूत बताना कोई गर्व की बात नहीं। इससे महिला की स्थिति समाज में किसी भी रूप से उन्नति नहीं पाती। घर सम्भालना एक कला होती  है और जो भी मर्द या औरत खाना बनाना पसंद करते हैं, वे कलाकार हैं। (तभी देश में शेफ उच्च वेतन पानेवालों में से एक है) यानी अगर कोई औरत आलू- मटर बना रही है, तो वह पसीने में जीवन व्यर्थ कर रही है ये कहना गलत होगा। वह खुद को एक कला में माहिर कर रही है। मैं लेखक से एक बात पर सहमत हूँ कि समाज में अच्छी गृह वधू को कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हक़दार है । हालाँकि समाज महिलाओं को निपुण गृहिणी बनने की सलाह ज़रूर देता है।

    मैं ये भी मानती हूँ कि अगर आपको घर के काम पसंद नहीं है, तो सिर्फ समाज कहता है इसलिए उसे सीखने की कोई ज़रूरत नहीं। सब को सब कुछ आना ज़रूरी तो नहीं। सच है। लेकिन हर मर्द और औरत को कुछ घर के काम आने ही चाहिए, क्योंकि आप नहीं जानते कब आपको खुद वह काम करने की ज़रूरत पड़ जाए। दूसरी ओर घर में बना खाना बाई के खाने से हमेशा स्वस्थ और लज़ीज़ होता है। आज अमरीका की पौष्टिक संस्था भी इस बात को प्रचार करती है, कि रोज़ का खाना घर में ही बनना चाहिए।

    अब यह आप की इच्छा पर निर्भर है की आप क्या करेंगे। अगर आप कुछ घर के काम सीख लेंगे तो बाई झंझट से मुक्त होंगे। अगर नहीं भी सीखना चाहते तो नहीं करेंगे।

    लेकिन लेखिका से एक प्रश्न यहां ज़रूरी है - अगर आप घर के काम नहीं सीखना चाहते, और आपका पति काम नहीं करना चाहे, ऑफिस ना जाना चाहे, जीवन में सफलता से दूर रहना चाहे, तो क्या आप इस बात को भी स्वीकार पाएंगे??

    कल हमने अमरीका में 'की और का' देखी। अर्जुन और करीना ने अपनी अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। अगर एक महिला कर्म क्षेत्र में सफल होना चाहती है, और एक पुरुष घर सम्हालने में खुश है तो इस में कोई हर्ज नहीं। ख़ास बात ये नहीं की फिल्म में एक मर्द घर सम्हाल रहा है, फिल्म में कई ख़ास मुद्दे हैं जिन्हें  छेड़ कर हमारे समाज की प्रचलित धारणाओं को बदलने की कोशिश की गयी है।

    1. अर्जुन एक गृहिणी को 'कामचोर' कहे जाने पर सख्त ऐतराज़ जताते हैं। अगर कोई प्रोफेशनल जीवन  से दूर रहकर अपनी मेहनत से एक घर को सजाती है, इसका मतलब ये नहीं की वह "घर पर बैठी है" घर के काम में शारीरिक मेहनत ज्यादा लगती है, और आप जितना जिम्मेदारी से घर सम्हालते हैं आपका घर, परिवार उतना ही उन्नति करता है, जैसे आप  की कंपनी की ग्रोथ में अपना सहयोग देते हैं, तभी वह उन्नति करती है ।

    2. अगर मर्द घर को सम्हाल रहा है तो उसे उसके लिए अपनी बीवी को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं है, उसे खाना बनाना और घर के काम करना पसंद है इसलिए वह करता है, वह अपनी बीवी पर कोई एहसान नहीं कर रहा है।

    3. संघर्ष मर्द या औरत का नहीं। कमाने वाला, और उसपर निर्भर घर चलाने वाले का है। जो कमाता है, समाज की नज़रों में वही लायक है। इसलिए अगर घर सम्हालने वाला एक क्षण के लिए लोगों की नज़रों में आ जाता है, तो कामयाब कमाने वाला जलने लगता है, उसपर निर्भर साथी की कामयाबी उससे बर्दाश्त नहीं होती। यह एक स्वाभाविक सी बात है पर यह बात इतने सहज तरीके से हमने कभी नहीं सोचा होगा।

    4. यह फिल्म इस प्रथा को ठुकराता है की औरत काम काजी  हो सकती है, लेकिन एक मर्द कभी काम छोड़ कर घर नहीं सम्हाल सकता। यहां एक औरत अपने पति से उसकी इंसानियत के लिए प्यार करती है, उसे अपनाती है, उसके पैसे या कर्म क्षेत्र में पोजीशन की वजह से नहीं। यह खुद में एक बहुत बड़ी प्रेरणा है।

     

    मैं ऊपर दिए गए लेख पर आती हूँ। जैसा मैंने कहाँ, घर के काम करने में कोई शर्म नहीं, सीखना हर किसी के लिए ज़रूरी है, चाहे वह मर्द हो या औरत। विदेश में काम वाली बाई नहीं मिलती, तो अगर आप नॉर्वे या नार्डिक जैसी जगह पर होंगे, तो आपको बाहर का खाना भी नसीब नहीं होगा, तब आपको इस कला की ज़रूरत पड़ सकती है। मैं खुद भी लेखिका हूँ, रिसर्च रिव्यु करती हूँ, कर्मरत हूँ, और फिर भी चीन और इटली के लज़ीज़ पकवान अच्छे से बना लेती हूँ। इससे मेरी समझदारी कम नहीं होती। मैं भी अपने पति के साथ राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक विषय पर चर्चा करती हूँ, विभिन्न तरह की किताबें पढ़ती हूँ। खाना बनाने में कोई शर्म नहीं, जो महिला गोल रोटी बना सकती है, वह ऑफिस जाने वाली महिला से किसी भी तरह से कम नहीं है। उसके लिए कोई भी और कला उतना ज़रूरी नहीं है। फोटोग्राफी, नृत्य इत्यादि के बगैर भी आपकी ज़िन्दगी चल जायेगी, लेकिन खाने के बगैर आप नहीं जी पाएंगे, घर साफ़ नहीं होगा, तो बीमार पड़ जाएंगे आप। तो ये काम ज़रूरी है जीने के लिए, तो इन्हें सीखने में ही समझदारी है, पुरुष हो या महिला।

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  • 11 Apr
    Janhavi Dwivedi

    लड़कियां किस प्रकार के लड़कों को पसंद करती हैं ? 

    get liked by girls

     

    सलमान खान के डोले और सिक्स पैक ऐब की लड़कियां दीवानी हैं, और अधिकतर ऐसे लड़कों को ज्यादा पसंद करती हैं। इसका क्या कारण है, आइये जानते हैं इस लेख के माध्यम से-

    किसी के बाहरी रंग रूप, उसके व्यक्तित्व और उसका मन इन सबका एक दूसरे से संबंध हमेशा से ही जटिल रहा है। देखा गया है कि जिनका आंतरिक मन अच्छा होता है वे अच्छे कार्य करते है ।

    तो क्या हम किसी के बाहरी रंग रूप को देखकर उसके व्यक्तित्व या उसकी अंतरात्मा को पहचान सकते हैं ?

    बहुत से शोधकर्ता ये दावा करते हैं कि, उनके शोध में शामिल होने वाले लोग सिर्फ चेहरे को देखकर सामने वाले व्यक्ति (पुरुष/महिला ) के व्यक्तित्व के कुछ गुणों के बारे में बताने में सक्षम थे। एक अध्ययन में प्रतिभागियों को पंद्रह मिनट तक एक दूसरे के सामने शांति से बैठकर अनुभव करके एक दूसरे की बहिर्मुखता और खुलेपन के मूल्यांकन का अनुमान लगाना था। अतः व्यक्ति बात करके अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं को प्रकट करे यह सम्भव नहीं था। यह देखा गया कि प्रतिभागी बहुत ही सही निर्णय देने में सक्षम थे। यह हमारे व्यक्तित्व की विशेषताओं के द्वारा जांचा गया।   

    लीडर्स के व्यक्तित्व के गुण:-

    एक लीडर में कुछ खास विशेषतायें पसंद की जाती हैं, जो लोग भरोसेमंद (विश्वसनीय), सामर्थ्यवान (योग्य), और प्रभावशाली होते हैं अक्सर उन्हें ही किसी कम्पनी और और देश दोनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना जाता है । क्या यह संयोग मात्र है?

    नेतृत्व या आक्रामक व्यवहार में testosterone की भूमिका :-

    मानव सभ्यता के विकास काल से ही आक्रामक व्यवहार शक्ति का प्रतीक रहा है, और यह हार्मोन्स के कारण नियंत्रित होता है, उदाहरण के लिए एक व्यक्ति में testosterone का मतलब आक्रामकता या नेतृत्व हो सकता है। यह अनिवार्य रूप से अधिक शक्ति सम्पन्न कार्यों को करने के लिए ईंधन के रूप में कार्य करता है। Testosterone का मतलब यह भी है कि उस व्यक्ति के गाल की हड्डी ऊंची और  जबड़े की हड्डी चौड़ी है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि जब मानव शिकार पर निर्भर था,  उस काल में शिकार पर ऐसे व्यक्तियों के जाने की आवश्यकता होती थी जिनके चौड़े और मजबूत हड्डियों के साथ ही, शक्ति बढ़ाने के लिए testosterone हार्मोन्स की अधिकता होती थी।

    इसीलिए हम इन विशेषता वाले लोगों को आक्रामक (शक्तिशाली ) और प्रभावशाली मानते हैं शायद इसलिए क्योंकि पाषाण युग के दिनों में यह जानना हमारे लिए जरूरी और  बहुत मददगार हो सकता था कि हमसे मिलने वाला व्यक्ति शक्तिशाली है, या नही।

     

    The unconventional guide to get liked by girls

    लड़कियां किस प्रकार के चेहरे को पसंद करती हैं?

    लड़कियां उन व्यक्तियों को जिनके पास पुरुषोचित और स्त्रियोचित दोनों ही प्रकार के गुण होते हैं उन्हें पसंद करती हैं। जैसे चेहरे के मजबूत किनारे, कामुक होंठ या कोमल आँखे। इससे उन्हें साथी में सही स्तर की आक्रमकता का पता चलता है, न बहुत ज्यादा, न बहुत कम।

    इसी प्रकार किसी व्यक्ति की त्वचा का रंग, उसकी आँखों की चमक और सामान्य लक्षणों को देखकर हम यह बता सकते हैं, कि वह कितना young है और कितना healthy है। साथी के चुनाव की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण जानकारी है।

    "अगर आपको उस व्यक्ति की तलाश है जो आपका जीवन बदल देगा, तो पहले स्वयं को देखें "   

    हम किसी के व्यक्तित्व को कितना परख पाते हैं यह हमारे देखने के तरीके पर निर्भर करता है। हालाँकि इनमे कुछ हार्मोन्स का प्रभाव भी होता है। किन्तु इन सबके बाद भी किसी को पूरी  तरह से समझ पाना बहुत जटिल है, और बाहरी रंग रूप का उसके आंतरिक गुणों से पूरी तरह संबंध नही बताया जा सका है, और ऐसा होने की संभावना भी नहीं दिखाई देती है। ऐसा नहीं लगता कि सब कुछ चेहरे से अनुमानित किया जा सकता है।

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  • 10 Apr
    Janhavi Dwivedi

    हंसी संक्रामक क्यों होती है?

    laughter therapy

     

     

    हँसता  हुआ चेहरा देखकर हंसी क्यों आ जाती है ?

    "हँसो और दुनिया तुम्हारे साथ हँसती है", ये सिर्फ एक कहावत नही है, जिसे हम बचपन से सुनते आये हैं। वैज्ञानिक खोजों से यह पता चला है कि हँसी संक्रामक होती है। शोध बताते हैं कि जब हम अन्य लोगों के चेहरों पर किसी भी तरह की भावनात्मक अभिव्यक्ति देखते हैं, हमारा मस्तिष्क उसे प्रतिबिंबित करने के कोशिश करता है, जिससे हम उस व्यक्ति के साथ संबंध मजबूत करने के लिए उसकी भावनाओं में भागीदार हो सकें। मनुष्य के लिए शुरू से ही अपने समूह के सदस्यों  के साथ मजबूत रिश्ते बनाना महत्वपूर्ण रहा है, और अभी भी यह प्रक्रिया जारी है और यही वजह है कि मस्तिष्क इस तरह का व्यवहार करता है। यह क्षमता हमारे सामाजिक वातावरण को बनाये रखने में मदद करती है।

    हालांकि, यह पता चला है कि सकारात्मक भावनाओं के लिए, हमारा मस्तिष्क अधिक और बहुत तेजी से प्रतिक्रिया करता है। इस वजह से सकारात्मक भावनाओं से अधिक संबंध बनने की संभावना होती है। ये भी Immune system को मजबूत करने वाला माना जाता है, और इसलिए मस्तिष्क उनपर अधिक responds करता है। इसलिए, जब हम किसी को हँसते हुए देखते हैं या कोई joke सुनते हैं तो हमारा मस्तिष्क अनायास ही चेहरे की मांसपेशियों को हँसने के लिए तैयार करता है और हम मुस्कुरा देते हैं।

    डॉ सोफी स्कॉट, इस research प्रोजेक्ट की प्रमुख ने टिप्पणी की है :-

    "हम आम तौर पर कई लोगों के बीच हँसी या वाहवाही जैसी सकारात्मक भावनाओं का सामना करते हैं। जैसे, परिवार के साथ बैठकर कॉमेडी प्रोग्राम या दोस्तों के साथ फुटबॉल मैच देखना। यह मस्तिष्क में प्रतिक्रिया करता है और हमें अपने आप हँसी या मुस्कान आ जाती है। जो की समूह के व्यवहार को प्रतिबिम्बित करने का ऐसा तरीका है, जो समूह में व्यवहार करने में हमारी मदद करता है। यह समूह के सदस्यों के बीच मजबूत संबंध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।“

    इसीलिए शायद जब दो अनजान लोग आपस में मिलते हैं, तो उनके  बीच  की चुप्पी को तोड़ने के लिए मजाक का इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है, कि किसी भी प्रकार की औपचारिक या अनौपचारिक  स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक कौशल में से एक यही है।

    उदास मन को अच्छा करने में Laughter therapy मदद करती है। 

    उदासी या अन्य किसी मनोवैज्ञनिक विकार के लिए Laughter therapy बहुत मदद  करती है। Laughter therapy में किसी भी joke का इस्तेमाल नही किया जाता बल्कि प्रशिक्षक  की साधारण हँसी ही आपको हंसने के लिए प्रेरित करती है।

    यह मस्तिष्क की सकारात्मक भावनाओं की नकल उतारने में  मैकनिज़्म काम  करता है और उपयोगी होता है। अवसाद में कुछ भी ख़ुशी देने वाली चीजें पाना  बहुत मुश्किल हो सकता है, लेकिन Laughter therapy मस्तिष्क के ऑटोमैटिक  सिस्टम पर काम करता है, और सकारात्मक भावनाओं को बढ़ाता है और फील गुड का अहसास करने वाले हार्मोन डोपामाइन को रिलीज़  करता है। इसका   प्रभाव कई गुना होता है, जैसा की हम देखते हैं, पूरा ग्रुप हँसने लगता है।

    आपकी कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, यदि आप में हंसाने की क्षमता है।

    हँसी पसंद को भी बढ़ावा देती है। उदाहरण के लिए, बच्चों को वे अंकल या टीचर अच्छे लगते हैं जो उन्हें हँसाते हैं। यदि किसी में हँसाने की कला होती है तो हम आसानी से उसकी कमियों की अनदेखी कर देते हैं।

    हँसना हमारे इम्यून सिस्टम को बढ़ाता है।

    कुछ शोध ये बताते हैं कि, हमारे पूर्वजों को पहले से ही हँसने से स्वाथ्य लाभ की जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने योग में चेहरे के व्यायाम में हँसने और हँसने के भावों को शामिल  किया है। यह संक्रामक होने के साथ-साथ स्वास्थ्यकर भी है। यहाँ तक कि जो मांसपेशियों हँसने में इस्तेमाल होती हैं, उन्ही मांसपेशियों का इस्तेमाल करके हम फील गुड कर सकते हैं, और स्वास्थ्य लाभ कर सकते हैं।

  • 10 Apr
    Janhavi Dwivedi

    खुद को व्यस्त रखने से आप निराश नहीं रहेंगे

    less busy less happy

     

     

    मिसेज गुप्ता आजकल बहुत खुश नजर आती हैं ,उनके जीवन में नई उमंग सी आगयी है। ...बच्चों के  बड़े होने के बाद वे सब अपनी पढ़ाई और कार्यों में व्यस्त हो गए और मिसेज गुप्ता दिनभर खाली रहतीं। फिर उनकी सहेली रमा ने उन्हें डांस क्लास ज्वाइन करने की सलाह दी। अब वे सीखने के साथ दूसरे बच्चों को भी डांस सीखा रही हैं। जीवन में ताजगी आ गयी है ,और साथ ही कुछ सार्थक करने का अहसास....

    महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन जैसे नेता हमेशा अपने समय को प्रबंधित करना जानते थे, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वे स्वयं को व्यस्त रखते थे।

    चाहे आप एक कामकाजी व्यक्ति हों या एक स्टूडेंट या एक ग्रहणी हम सबके पास बहुत सी जिम्मेदारी और कार्य होता है।  

    वास्तव में जब हमारे पास कोई अर्थपूर्ण कार्य नही होता तब एक खालीपन सा  छाने लगता है.... हाँ ये सही है कि, ज्यादा काम तनावग्रस्त कर सकता है, लेकिन काम ना होना अवसादग्रस्त कर सकता है।

    इसीलिए जिसमें आपकी रूचि ना हो ऐसा करियर चुनने की सलाह की सलाह नहीं दी जाती। क्योंकि जीवन भर अपने विशेष कौशल और सामर्थ्य के विपरीत कार्य करना समझदारी नही है।

    ये सच है कि जब हम कोई काम लगातार करते करते ऊब जाते हैं और अब उस काम में कोई नयापन नही लगता। अक्सर प्रौढ़ावस्था (४५ वर्ष -५५ वर्ष ) के समय ऐसा लगता है। इस उम्र में शादी और कार्य दोनों में उत्साह नही रह जाता। संयोग से ऐसे समय में ही ज्यादातर लोग अपनी नई कम्पनी या स्टार्ट-अप की शुरुआत करते हैं। इस आशा के साथ कि नए कार्य से उनके जीवन का खालीपन दूर होगा।

    कुछ अन्य लोग दूसरे नए चुनौतीपूर्ण कार्य या कई नया शौक सीखते हैं।

    जो ये कार्य नहीं कर पाते उनके जीवन में एक शून्यता आ जाती है। उन्हें अपने जीवन का मूल्य कम होने का अहसास होने लगता है, उन्हें अपनी कबिलियत के प्रति शंका होती है। हममें से ज्यादातर को लगता है कि, यदि हमारे पास योग्यता और कौशल है तो हमें अपने समय का उपयोग करना चाहिए, और अधिक चीजे सीखनी चाहिए। खाली बैठने से आनेवाले समय के प्रति व्यर्थ की चिंताए पैदा होने लगती हैं और कभी-कभी तो यह चिंता अपने चरम पर पहुंच जाती हैं। और हमें अवसादग्रस्त भी कर सकती हैं।

    अवसादग्रस्त होने पर सबसे ज्यादा चुनौती व्यक्ति  को फिर से कार्य करने के लिए प्रेरित करने की होती है। अवसाद की अवस्था में एक धारणा मन में बैठ जाती है कि, मैं बेकार हो गया हूँ, मैं कोई काम नही कर सकता, यदि मैं काम नही करूंगा तो कोई फर्क नही पड़ेगा। जितना ज्यादा हम सोचते हैं, उतना ही हम कार्य से दूर होने की जरूरत या आवश्यकता महसूस करते हैं, और कार्य मुक्त होने पर हम कुछ भी अच्छा नहीं कर पाते। इसीलिए आर्थिक रूप से सुरक्षित होते हुए भी हमें अपने समय को उत्पादक कार्यों में लगाने की आवश्यकता महसूस होती है, ताकि हमारे मन में व्यर्थ के विचार ना आने पाएं क्योंकि कहा गया है -"खाली दिमाग शैतान का घर  होता है"

    इसीलिए सबसे ज्यादा आय वाले कुछ लोग भी स्वयं को व्यस्त रखते हैं, अन्यथा अधिक धन होते हुए भी वे काम करने का कष्ट क्यों सहते। उदाहरण के लिए शाहरुख़ खान अपने दिन की शुरुआत सुबह पांच बजे से करते हैं। हाँ, वे छुट्टियां भी लेते हैं और आराम करने के बाद वापस काम पर लौट आते हैं।

    आप छोटे ब्रेक ले सकते हैं जिससे आप को थकान नहीं होगी और आप ऊर्जावान बने रहेंगे। लेकिन पूरी तरह से कार्य मुक्त होना अच्छा विकल्प नही है। कार्य करने से हमे जीवन उद्देश्यपूर्ण लगता है, और वास्तव में इसके बिना घोर निराशा छा जाती है।

    इसलिए क्या करें जब आपके पास बहुत सा खाली  समय है, और आपको जीवन अर्थहीन लगने लगा है ।

    अपने शौक को पूरा कीजिये, या कोई नया शौक विकसित कीजिये।

    किसी काम के मारे की मदद कीजिये।

    स्वयं को सामाजिक कार्यों में व्यस्त कीजिये।

    इन सुझावों पर विचार कीजिये आपकी समस्या का समाधान खुद बा खुद हो जायेगा ।

  • 10 Apr
    Janhavi Dwivedi

    क्या modernization से शादी के मतलब बदल गए हैं?

     

    old marriage and new marriage

    एक फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन में दिखाया जाता है कि, पापा बेटी से शादी के लिए कहते हैं तो बेटी कहती है, "डैड मैं शादी के लिए तैयार हूँ...लेकिन तीन साल बाद, उसके जैसा अच्छा जॉब, घर ये सब करने में इतने साल तो लग ही जायेंगे ना..तभी तो होगा परफेक्ट मैच। ....इक़्वल इक़्वल।

    हाँ यही तो है मॉडर्न गर्ल्स की सोच शादी के बारे में,पहले कैरियर फिर शादी।

    कैसे आया ये बदलाव,क्या मॉडर्नाइजेशन से शादी करने की वजह में बदलाव आया है?

    modernization (आधुनिकीकरण) क्या है ?- modernization का अर्थ है, पुरानी परम्परागत जीवन जीने के तरीके में नए बदलाव लाना। modernization का दौर industrial revolution के बाद शुरू हुआ। पहले लोगो की दुनिया के प्रति समझ सीधी -सादी थी और सिर्फ  काम चलाउ होती थी, जबकि आधुनिक समय में लोगो को सिर्फ कामचलाऊ चीजों की अपेक्षा कलात्मक और सुंदर चीजों के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा, जिसके परिणाम स्वरूप गावों का शहरीकरण, परिवहन,लोगों के रहन -सहन,आय, शिक्षा, पहनावा आदि अनेक बदलाव लोगो ने स्वीकार किये।

    इसके साथ ही लोगों की सोच में भी काफी परिवर्तन दिखने लगा। पहले जहां लड़कियों की शिक्षा को लोग अनावश्यक मानते, नए होते समाज में शिक्षा के महत्व को माना जाने लगा।

    पहले शादी के मायने घर और परिवार की देखभाल होती थी। :-

    पहले शादी के लिए लड़की पसंद करते समय ये देखा जाता था कि, लड़की घर के काम कर लेती है या नही ?और शादी के बाद नई बहु से सब यही अपेक्षा रखते थे कि, उसका पहला कर्तव्य घर की देखभाल होनी चाहिए, उसकी अपनी इच्छाओं की कोई  कीमत नही होती थी। समाज में सख्त विचार होते थे। और शादी का उद्देश्य परम्पराओं को मानना होता था।  शादी के बाद बच्चे का जन्म और रीति रिवाजों का पालन अनिवार्य होता था।     

    एक संयुक्त परिवार मे जन्म लेने और बड़े होने के कारण यह आवश्यक था कि हर सदस्य परिवार के नियंत्रण में रहे और अपनी भूमिका का सख्ती से पालन करे। और जो कोई इन नियमों को तोड़कर अलग हो (तलाक लेकर ) जाता था उसे समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था।

    एक पत्नी बनने के लिए लड़की शादी की रस्मों में यह वचन देती थी कि, वह किसी भी विपत्ति में परिवार की ढाल बन कर खड़ी रहेगी और जीवन भर पति  का साथ निभाएगी।  

    अब शादी का उद्देश्य जीवन में सहभागी बनाने के लिए एक जीवन साथी को पाना होता है। :-

    अब जबकि आधुनिक युग में संयुक्त परिवारों का चलन नही रहा इस लिए अब युवाओं के ऊपर किसी प्रकार का कोई दबाव नही रहा। अब वे शादी के लिए कोई जल्दबाजी नही दिखाते, और ऐसा जीवन साथी ढूंढते हैं जिसके साथ वे खुश रह सकें और जीवन में साझेदार बना सकें।  इन कपल को अब शादी के बाद बच्चों की कोई जल्दबाजी नही रहती है। सिर्फ जैविक पिता बनना भी वे जरूरी नही समझते, बल्कि समय के साथ बच्चों को गोद लेने का चलन भी बढ़ रहा है।

    अब महिलाएं भी अपनी पहचान बनाना चाहती हैं :-

    आधनिक महिलाएं अब सिर्फ पत्नी, माँ, बहु की पहचान से अलग अपनी खुद की पहचान बनाना चाहती हैं और बना रही हैं। वे समाज और प्रोफेशन में पुरुषों के  बराबर भूमिका निभा रही हैं। इसका मतलब अब वे दहेज या घरेलू हिंसा को नही सहन करेंगी। पुरुषों को भी स्वयं और महिलाओं के प्रति अपने नजरिये को बदलना होगा। 

    सिर्फ हुक्म चलाना या बच्चों की देखभाल का जिम्मा सिर्फ महिलाओं को ही देने वाला रवैया अब नही चलेगा। अब महिलाएं तलाक दे सकती हैं और देती हैं। इसलिए महिलाओं को पुराने जमाने की तरह अनदेखा नही किया जा सकता, इसलिए शादी अब समझौता नही बल्कि सहयोग का विषय है।