• 14 Apr
    Oyindrila Basu

    द जंगल बुक-क्यों हम आज भी इस फिल्म के दीवाने हैं ?

     


    "जंगल जंगल बात चली है पता चला है..तू रु रु रु... अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है"
    एक हफ्ते का इंतज़ार एक साल जितना लम्बा लगता था, रविवार की सुबह हम ९० दशक के बच्चों के लिए खुशियों का मौसम लाता था। हम बेसब्री से इन्तजार करते थे कब हमारा साँवला दोस्त चोटी बांध कर पीली चड्डी में अपने दोस्तों के साथ आएगा, और पप्पू, बगीरा और भालू के साथ हमें खुश कर के जाएगा। हम शेर खान के लिए भी उतने ही बेसब्र होते थे।

    the jungle book


    इस साल, #आयरन मैन के निर्देशक, Jon Favreau हमारे लिए फिर से लाएं है मोगली का जादू, अंग्रेजी फिल्म 'द जंगल बुक' के साथ। ९० के दशक के बच्चों के लिए मोगली को फिर से देख पाना एक सपने जैसा है।
    पर क्या वजह है की हम ९० में पैदा हुए लोग, जंगल बुक से इतना प्रेम करते हैं?
    १. दूरदर्शन में जंगल बुक हिंदी में आता था, और यही अनुष्ठान सबसे लोकप्रिय हुआ, ख़ास कर भारत और उसके प्रादेशिक देशों में। हर एक किरदार हिंदी और उर्दू में बात करता था, इससे हम दर्शक उससे जुड़ जाते थें।
    २. जंगल बुक किताब भारत के वातावरण को ध्यान में रख कर लिखी गई है। रुडयार्ड किपलिंग जंगल के जीवन से प्रेरित हो कर ये किताब लिखते हैं। इसके सभी किरदारों के नाम भारतीय है। 'भालू', 'शेर खान' 'मोगली' और 'का' सभी भारतीय नाम हैं।
    ३. ९० के दशक में केबल या डिश टीवी नहीं था। बहुत सारे चैनल्स भी नहीं थे। सिर्फ दूरदर्शन और मेट्रो चैनल ही टीवी पर आते थे। इसलिए कोई भी प्रोग्राम जो हमें आता वही हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाता। इसीलिए शक्तिमान, चन्द्रकान्ता, महाभारत जैसे शो भी काफी प्रसिद्ध हुए। और बच्चे जिन्हें कार्टून पसंद थे, उनके लिए मोगली ही सर्वश्रेष्ठ बन गया।
    ४. कार्टून या एनीमेशन धीरे धीरे चढ़ाव ले रहा था। हम अचम्भित थे कि पशु भी बात कर रहे हैं। हमें पता था शेर दहाड़ता है, और गाय रंभाती है। लेकिन जंगल बुक में सभी पशु इंसानों की तरह बोल रहे थें, और हम बच्चे चौंक कर देखते थे की ये कैसे सम्भव है। सन २००० के बाद जन्मे व्यक्ति इस ख़ास अनुभूति को कभी नहीं समझ पाएंगे।
    ५. हमारी नानी हमें कहानियां सुनाती थीं, कि बच्चों को खूंखार जानवर उठा कर ले जाते हैं, ताकि हम जंगली जीवों से डरें और उनसे सावधान रहना सीखें। पर जंगल बुक ने पहली बार दिखाया की जानवर में भी जज़्बात होते हैं, और वे भी हमारे दोस्त बन सकते हैं। ये बात बच्चों को बहुत भा गयी।
    ६. आज भी जब हम कहीं 'चड्डी पहन के फूल खिला है' गाना सुनते हैं तो एक बार वो यादें दिमाग में आती हैं। वह रविवार के दिन, वो आलसी दोपहर याद आते हैं, जब होमवर्क का मतलब था, रंगों के नाम बताना, या फिर १ से ५ तक गिनती करना।

    the jungle book

    giphy.com
    इसीलिए जब अंग्रेजी जंगल बुक का प्रोमो पहली बार टीवी पर आया, तो हम ९० के बच्चे उछल कर खड़े हो गये।
    हम सभी हमारे सुख के दिनों को बार-बार जीना चाहते हैं, बचपन तो नहीं रहा, पर उनकी यादों से खुद को खुश करना चाहते हैं।
    हाल ही में खबर है कि जंगल बुक फिल्म को हिंदी में डब किया जा रहा है। यानी फिर से वापसी नाना पाटेकर और ओम पुरी जी का।
    जंगल बुक केवल एक सिनेमा नहीं, यह हमारा बचपन है।

  • 14 Apr
    Oyindrila Basu

    रिजेक्ट होने का दर्द मानसिक और शारीरिक दोनों रूप में होता है ।

    brain treat rejection as physical pain

     

     

    रिजेक्ट होने का दिल पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। सामाजिक हो, या व्यक्तिगत क्षेत्र, हम में से कोई भी ठुकराया जाना नहीं चाहता। लेकिन हमें नहीं पता होता की ठुकराए जाने का दर्द शारीरिक पीड़ा जैसी ही होती है, और यह केवल मानसिक दर्द न होकर शरीर पर भी असर दिखाता है । 

    वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हमारा मस्तिष्क रिजेक्शन को शारीरिक दर्द, पीड़ा और तकलीफ के बराबर मानता है, इसलिए रिजेक्ट होने पर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया भी वैसी ही होती है।

    1. रिजेक्शन से, मस्तिष्क के उन्ही भाग को ज्यादा असर होता है, जो शारीरिक चोट से प्रभावित होते है। एम आर आई स्टडी से हमें पता चलता है, कि मस्तिष्क रिजेक्ट होने पर वैसी ही प्रतिक्रिया देता है, जैसा शारीरिक चोट लगने पर देता है ।
    2. कहते हैं जब इंसान सभ्यता की सीढ़ी चढ़ रहा था, तब वे झुण्ड में चलते थे, और ostracism या समाज से निकाला जाना मृत्युदंड के सामान था। इंसान तब अकेले नहीं जी सकता था। समाज का ठुकराया व्यक्ति शारीरिक रूप से भी कमज़ोर हो जाता था। इसलिए कहा जाता है कि इंसानी दिमाग ने इस आदत को अपने अंदर कैद कर लिया, और यह आदत जैविक रूप से आज भी इंसानों के अंदर ज़िंदा है।
    3. ठोकर ज्यादा तकलीफ देती है क्योंकि हमारी यादाश्त उसे समर्थन करती है- शरीर के ज़ख्म दवाई से भर जाते हैं, और उसकी पीड़ा दूर हो जाती है, लेकिन मस्तिष्क पर लगी ठोकर की चोट इंसान को बार-बार याद आती रहती है, वह क्षण, वह हादसा उसे भविष्य में भी सताता रहता है। मस्तिष्क उस दर्द को भूलना नहीं चाहता, इसलिए दर्द ज्यादा होता है।
    4. ठुकराए जाने पर हमारे आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचती है- आत्मविश्वास टूटने पर तकलीफ ज्यादा होता है। ठुकराए जाने पर हमारा खुद पर से गुरूर मिट जाता है, और अंदर का इंसान मर जाता है।
    5. जब आत्मसम्मान नहीं रहता तो साथ जीने की इच्छा भी चली जाती है- इंसान हमेशा किसी दल के द्वारा अपनाया जाना चाहता है। यही चाहत उसे सामाजिक बनाती है। लेकिन नकारे जाने से ये इच्छा भी नहीं रहती।
    6. ठुकराए जाने पर इंसान को बहुत गुस्सा आता है- क्रोध खतरनाक है। सिर्फ मस्तिष्क को ही नहीं, यह शरीर को भी काफी हानि पहुंचाता है। इसलिए दर्द का प्रभाव भी ज्यादा होता है।

     

    लेकिन शरीर ठोकर की चिकित्सा खुद ब खुद करती है। ठुकराए जाने पर दिमाग कुछ ख़ास पदार्थ जिसे chemical opioids कहते हैं, तैयार करता  है। इनका काम होता है जज़्बातों को शांत करना।

    लेकिन जो लोग सोशल एंग्जायटी  के शिकार होते हैं वे इसका ज्यादा लाभ नहीं उठा पातें।

    acetaminophen (tyrenol) भी जज़्बाती दर्द को कम करने में मदद करता है।

    तो अगर आपको लगे, कि रिजेक्ट होने पर आपका शरीर दर्द महसूस करता है तो,  निश्चिन्त रहें, ये स्वाभाविक है।

     

  • 13 Apr
    Oyindrila Basu

    ‘की और का’ के बराबर योगदान से ही अच्छा घर, अच्छा समाज और अच्छा रिश्ता बनता है।

    ki aur ka movie

     

    http://www.idiva.com/news-relationships/new-age-indian-bride-who-cant-cook-and-clean/33629

    मैं उल्लिखित लेख पर अपना तर्क शुरू करना चाहूंगी। इन बातों पर मैंने भी गौर किया, और पाया कि ये सारी बातें सच है। मुझे नहीं लगता है कि इस लेख का उद्देश्य गृहिणी का असम्मान करना है, लेकिन पूरी बातचीत में लेखक वही कर रही है। आज के ज़माने में वर्किंग महिला को गृहिणी से ज्यादा मज़बूत बताना कोई गर्व की बात नहीं। इससे महिला की स्थिति समाज में किसी भी रूप से उन्नति नहीं पाती। घर सम्भालना एक कला होती  है और जो भी मर्द या औरत खाना बनाना पसंद करते हैं, वे कलाकार हैं। (तभी देश में शेफ उच्च वेतन पानेवालों में से एक है) यानी अगर कोई औरत आलू- मटर बना रही है, तो वह पसीने में जीवन व्यर्थ कर रही है ये कहना गलत होगा। वह खुद को एक कला में माहिर कर रही है। मैं लेखक से एक बात पर सहमत हूँ कि समाज में अच्छी गृह वधू को कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हक़दार है । हालाँकि समाज महिलाओं को निपुण गृहिणी बनने की सलाह ज़रूर देता है।

    मैं ये भी मानती हूँ कि अगर आपको घर के काम पसंद नहीं है, तो सिर्फ समाज कहता है इसलिए उसे सीखने की कोई ज़रूरत नहीं। सब को सब कुछ आना ज़रूरी तो नहीं। सच है। लेकिन हर मर्द और औरत को कुछ घर के काम आने ही चाहिए, क्योंकि आप नहीं जानते कब आपको खुद वह काम करने की ज़रूरत पड़ जाए। दूसरी ओर घर में बना खाना बाई के खाने से हमेशा स्वस्थ और लज़ीज़ होता है। आज अमरीका की पौष्टिक संस्था भी इस बात को प्रचार करती है, कि रोज़ का खाना घर में ही बनना चाहिए।

    अब यह आप की इच्छा पर निर्भर है की आप क्या करेंगे। अगर आप कुछ घर के काम सीख लेंगे तो बाई झंझट से मुक्त होंगे। अगर नहीं भी सीखना चाहते तो नहीं करेंगे।

    लेकिन लेखिका से एक प्रश्न यहां ज़रूरी है - अगर आप घर के काम नहीं सीखना चाहते, और आपका पति काम नहीं करना चाहे, ऑफिस ना जाना चाहे, जीवन में सफलता से दूर रहना चाहे, तो क्या आप इस बात को भी स्वीकार पाएंगे??

    कल हमने अमरीका में 'की और का' देखी। अर्जुन और करीना ने अपनी अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। अगर एक महिला कर्म क्षेत्र में सफल होना चाहती है, और एक पुरुष घर सम्हालने में खुश है तो इस में कोई हर्ज नहीं। ख़ास बात ये नहीं की फिल्म में एक मर्द घर सम्हाल रहा है, फिल्म में कई ख़ास मुद्दे हैं जिन्हें  छेड़ कर हमारे समाज की प्रचलित धारणाओं को बदलने की कोशिश की गयी है।

    1. अर्जुन एक गृहिणी को 'कामचोर' कहे जाने पर सख्त ऐतराज़ जताते हैं। अगर कोई प्रोफेशनल जीवन  से दूर रहकर अपनी मेहनत से एक घर को सजाती है, इसका मतलब ये नहीं की वह "घर पर बैठी है" घर के काम में शारीरिक मेहनत ज्यादा लगती है, और आप जितना जिम्मेदारी से घर सम्हालते हैं आपका घर, परिवार उतना ही उन्नति करता है, जैसे आप  की कंपनी की ग्रोथ में अपना सहयोग देते हैं, तभी वह उन्नति करती है ।

    2. अगर मर्द घर को सम्हाल रहा है तो उसे उसके लिए अपनी बीवी को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं है, उसे खाना बनाना और घर के काम करना पसंद है इसलिए वह करता है, वह अपनी बीवी पर कोई एहसान नहीं कर रहा है।

    3. संघर्ष मर्द या औरत का नहीं। कमाने वाला, और उसपर निर्भर घर चलाने वाले का है। जो कमाता है, समाज की नज़रों में वही लायक है। इसलिए अगर घर सम्हालने वाला एक क्षण के लिए लोगों की नज़रों में आ जाता है, तो कामयाब कमाने वाला जलने लगता है, उसपर निर्भर साथी की कामयाबी उससे बर्दाश्त नहीं होती। यह एक स्वाभाविक सी बात है पर यह बात इतने सहज तरीके से हमने कभी नहीं सोचा होगा।

    4. यह फिल्म इस प्रथा को ठुकराता है की औरत काम काजी  हो सकती है, लेकिन एक मर्द कभी काम छोड़ कर घर नहीं सम्हाल सकता। यहां एक औरत अपने पति से उसकी इंसानियत के लिए प्यार करती है, उसे अपनाती है, उसके पैसे या कर्म क्षेत्र में पोजीशन की वजह से नहीं। यह खुद में एक बहुत बड़ी प्रेरणा है।

     

    मैं ऊपर दिए गए लेख पर आती हूँ। जैसा मैंने कहाँ, घर के काम करने में कोई शर्म नहीं, सीखना हर किसी के लिए ज़रूरी है, चाहे वह मर्द हो या औरत। विदेश में काम वाली बाई नहीं मिलती, तो अगर आप नॉर्वे या नार्डिक जैसी जगह पर होंगे, तो आपको बाहर का खाना भी नसीब नहीं होगा, तब आपको इस कला की ज़रूरत पड़ सकती है। मैं खुद भी लेखिका हूँ, रिसर्च रिव्यु करती हूँ, कर्मरत हूँ, और फिर भी चीन और इटली के लज़ीज़ पकवान अच्छे से बना लेती हूँ। इससे मेरी समझदारी कम नहीं होती। मैं भी अपने पति के साथ राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक विषय पर चर्चा करती हूँ, विभिन्न तरह की किताबें पढ़ती हूँ। खाना बनाने में कोई शर्म नहीं, जो महिला गोल रोटी बना सकती है, वह ऑफिस जाने वाली महिला से किसी भी तरह से कम नहीं है। उसके लिए कोई भी और कला उतना ज़रूरी नहीं है। फोटोग्राफी, नृत्य इत्यादि के बगैर भी आपकी ज़िन्दगी चल जायेगी, लेकिन खाने के बगैर आप नहीं जी पाएंगे, घर साफ़ नहीं होगा, तो बीमार पड़ जाएंगे आप। तो ये काम ज़रूरी है जीने के लिए, तो इन्हें सीखने में ही समझदारी है, पुरुष हो या महिला।

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  • 26 Aug
    Nandini Harkauli

    इमोश्नल इन्टेलीजेंस - आज की आवश्यकता

     

    emotional intelligence

     

     

    भावनाओं को हमेशा एक व्यक्ति के व्यवहार एवं कार्य प्रदर्शन में बाधा मानकर नकारात्मक रूप से देखा जाता है। उदाहरण के लिए, भावनात्मक होना अनिर्णय की स्थिति और नौकरी में खराब प्रदर्शन के साथ जुड़ा हुआ माना जाता था।

    लेकिन हाल ही इस सोच में बदलाव आया है, और हमने यह जान लिया है कि भावनाएं हमारे प्रदर्शन को बेहतर कर,सकारात्मक परिणामों को जन्म देती हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपको अपनी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने की चिंता नहीं होगी, तो आप उसके लिए जी लगाके पढ़ाई भी नहीं करेंगे और अच्छे नम्बर भी नहीं ला पाएंगे। इस प्रकार चिंता और तनाव जो नकारात्मक माने जाते हैं, वास्तव में आवश्यक हैं।

    आपके मन में, एक सवाल उठ रहा होगा, कि यदि चिंता सचमुच फायदेमंद है तो इसके कारण विचार और व्यवहार की परेशानियाँ क्यों हो जाती हैं। हालांकि, बहुत कम या बहुत अधिक चिंता व्यक्ति के लिए हानिकारक है, इसलिए सर्वोत्तम प्रदर्शन के लिए चिंता के स्तर पर ज़रूरत अनुसार नियंत्रण बनाए रखना आवश्यक है, और प्रत्येक व्यक्ति को इसकी समझ होनी चाहिए ताकि वह अपने विचारों को भी प्रबंधित कर सकें।

    दो मनोवैज्ञानिक- मेयर और सलोवेई ने 'इमोश्नल इन्टेलीजेंस' को अपनी और दूसरों की भावनाओं की पहचान और समझने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया। इसे भावनाओं का उपयोग करके अपनी विचारधारा को आसान बनाना और भावनाओं का प्रबंधन करने की क्षमता कहा गया है।

    हाल ही में, इमोश्नल इन्टेलीजेंस ने दुनिया भर में व्यापक मान्यता प्राप्त की है और अब यह स्वीकार किया जाता है कि इमोश्नल इन्टेलीजेंस एक व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक कल्याण और सबसे महत्वपूर्ण, शिक्षा व काम में प्रदर्शन को प्रभावित करता है।

    कुछ लोग कह सकते हैं कि भावनात्मक रूप से बुद्धिमान होना या न होना, कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन वास्तविकता में, यह बहुत मायने रखता है। इमोश्नल इन्टेलीजेंस को मापने के लिए कई परीक्षण और मूल्यांकन तैयार किए गए हैं जो आमतौर पर इसे इमोश्नल क्योशन्ट (emotional quotient or EQ) के संदर्भ में मापा जाता है। व्यक्ति का 'ईक्यू'(EQ) जितना बेहतर होगा, उतना ही वह भावनात्मक रूप से बुद्धिमान होगा।

    अधिक इमोश्नल इन्टेलीजेंस बेहतर रिश्ते, नेतृत्व और काम में बेहतर प्रदर्शन, भावनाओं को अच्छी तरह से नियंत्रित करने और मानसिक और भावनात्मक कल्याण करने की क्षमता से जुड़ा हुआ है। इमोश्नल इन्टेलीजेंस अब औद्योगिक, संगठनात्मक, परामर्श, सामाजिक मनोविज्ञान और अन्य ऐसे क्षेत्रों में मायने प्राप्त कर रहा है।

    1.इमोश्नल इन्टेलीजेंस और मानसिक स्वास्थ्य :

    कितनी बार ऐसा होता है कि आप अध्ययन करने के लिए बैठते हैं, लेकिन आपका मन किन्ही अलग ही ख़यालों में खोया रहता है। आप अपने दोस्त के साथ हुई लड़ाई में आप दोनों ने एक दूसरे को गुस्से में क्या क्या कहा, इस बारे में सोचने में समय व्यतीत कर देते हैं।

    यदि आप उस समय तर्क से काम लेते और खुद को जानते हुए अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर लेते, तो शायद लड़ाई टल जाती। अगर पढ़ाई के समय भावनाओं को नियमित करना संभव होता, तो आप सोचने में समय ज़ाया नही कर रहे होते।

    यह मानसिक कल्याण में इमोश्नल इन्टेलीजेंस के महत्व का एक छोटा सा उदाहरण है। ज़रूरत से ज़्यादा सोचना (जो इमोश्नल इन्टेलीजेंस की कमी का परिणाम है) अधिक चिंता और डिप्रेशन का कारण बन सकता है।

    एक उच्च 'ईक्यू' इस प्रकार मन को स्वस्थ बनाए रखता है। इसके अलावा,अगर कोई व्यक्ति भावनात्मक रूप से बुद्धिमान है, तो वह अधिक आशावादी होता है, खुश रहता है और डिप्रेशन और व्याकुलता के ख़तरे से दूर रहता है। ऐसे कईं तरीके हैं जिससे 'ईक्यू' मानसिक स्वास्थ्य में मदद करता है।

    2.इमोश्नल इन्टेलीजेंस और शारीरिक स्‍वास्थ्य :

    आमतौर पर स्वास्थ्य को स्वस्थ व्यवहार और जोखिम भरे अस्वस्थ व्यवहार में वर्गीकृत किया जाता है। स्वस्थ व्यवहार में एक स्वस्थ आहार, नियमित रूप से व्यायाम, अच्छी नींद शामिल हैं, जबकि जोखिम लेने के व्यवहार में धूम्रपान, शराब की लत आदि शामिल हैं।

    अनुसंधान से पता चला है कि अधिक इमोश्नल इन्टेलीजेंस वाले लोग कम इमोश्नल इन्टेलीजेंस वाले लोगों की तुलना में अधिक स्वस्थ होते हैं।

    इसके अलावा, हम इस संदर्भ में समझ सकते हैं कि मन और शरीर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, और इसलिए मानसिक स्वास्थ्य की तरह शारीरिक स्वास्थ्य भी इमोश्नल इन्टेलीजेंस से जुड़ा हुआ है। उच्च इमोश्नल इन्टेलीजेंस वाला व्यक्ति तनाव को अच्छी तरह से नियंत्रित कर सकता है। इसके साथ-साथ वह व्यक्ति तनाव से जुड़ी शारीरिक समस्याओं से भी बच सकता है, जैसे अस्थमा, हृदय रोग, इनफ़ेक्शन (तनाव के कारण हमारा इम्यून सिस्टम कमज़ोर हो जाता है)।

    3.इमोश्नल इन्टेलीजेंस और काम में प्रदर्शन :

    जॉन एक मेहनती और बुद्धिमान व्यक्ति है, जिसने वर्षों के परिश्रम के बाद अपनी मनचाही नौकरी प्राप्त की। उसे अपनी, समस्या को सुलझाने की क्षमता और अपने क्षेत्र के अच्छे ज्ञान के कारण काम पर रखा गया था।

    हालांकि, एक महीने के भीतर ही, उसे कईं समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था- वह हर रोज अपने सहकर्मियों के साथ झगड़े कर रहा था और अपने बॉस से भी उसकी बिल्कुल नहीं बन रही थी।

    उसके लिए अपने गुस्से को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया था और लगभग हर दिन घरेलू विवाद भी उसके लिए आम हो गए थे। जैसे दिन बीतते गए, चीजें और खराब होती गईं, और अंतिम में जॉन को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

    क्या वजह हो सकती है कि जॉन अपने व्यावसायिक मांगों से निपटने में सक्षम नहीं हो पा रहा था?

    एक बुद्धिमान और मेहनती व्यक्ति होने के बाद भी इस तरह की समस्याओं के अनुभव का कारण इमोश्नल इन्टेलीजेंस की कमी  हो सकती है।

    हाँ, बुद्धिमत्ता केवल गणित की समस्याओं को हल करना या तार्किक सोच  या किसी विषय में कौशलता ही नहीं है, इसमें हमारी भावनाओं को समझने की क्षमता और अच्छी तरह से परिस्थिति की मांगों को समझने में सक्षम होना भी शामिल है।

    यदि वह अपने सहकर्मियों की भावनाओं को समझने का प्रयास करता, तो वह स्वस्थ संबंधों को बनाए रखने में सक्षम रहता।

    इसके अलावा, यदि वह अपनी भावनाओं को समझता, तो वह अपने क्रोध को नियंत्रित कर पाता, घरेलू झगड़ों से भी बच जाता और एक सुखी जीवन जीने में सक्षम होता। वह अपने बॉस की अपेक्षाओं और मांगों अनुसार काम कर,अपनी नौकरी में सफलता हासिल कर सकता था।

    जैसा कि गोलमेन ने कहा है, नौकरी में सफलता के लिए कौशल और बुद्धि का केवल 20% योगदान होता है लेकिन इमोश्नल इन्टेलीजेंस का इसमें 80% योगदान होता है। उच्च 'ईक्यू' नेतृत्व में सफलता से भी संबंधित है।

    4. इमोश्नल इन्टेलीजेंस और पारस्परिक संबंध :

    अधिक 'ईक्यू' वाले लोग पारस्परिक संबंधों को बनाए रखने में बेहतर होते हैं, क्योंकि वे दूसरों की भावनाओं को अच्छी तरह से समझते हैं और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहते हैं, क्योंकि वह नियंत्रित न किए जाने पर अनावश्यक बहस और झगड़ों में बदल जाती हैं।
    स्वस्थ संबंधों को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक मानदंड यह है कि, आप समझें कि दूसरा व्यक्ति क्या महसूस कर रहा है।

    उदाहरण के लिए, यदि आप अपने दोस्त से मिलते हैं और आप इस बात पर बिना गौर किए कि वह कुछ परेशान नज़र आ रहे हैं, अपनी कहानियाँ किस्से सुनाने बैठ जाते हैं, तो क्या होगा?

    उन्हें यह गलतफहमी हो सकती है कि आप केवल अपने बारे में सोचते हैं, और उनकी बिल्कुल परवाह नहीं करते, जबकि आपसे केवल यह समझने में भूल हुई थी कि आपका दोस्त किसी दुविधा में है, और उन्हें आपकी मदद और साथ की ज़रूरत हो सकती है। इसलिए संवेदनशील होना और अन्य लोगों की समस्या को उन्हीं के दृष्टिकोण से समझना बहुत महत्वपूर्ण है।

    5.इमोश्नल इन्टेलीजेंस और संघर्ष का समाधान :

    इमोश्नल इन्टेलीजेंस संघर्ष के समाधान में मदद करता है। आम तौर पर जब कोई व्यक्ति किसी से झगड़ रहा होता है, तो सबसे पहली प्रतिक्रिया बेरुखी से पलट कर जवाब देना ही होती है, लेकिन अगर वह व्यक्ति अपने और दूसरे की भावनाओं के प्रति संवेदनशील है, तो वह उस स्थिति में शांत रहकर सकारात्मक रूप से पेश आएगा।

    'आई' या 'मैं/मुझे' का उपयोग करते हुए अपना संदेश पहुँचाना एक अच्छा और नया तरीका है। आम तौर पर जब भी हम किसी व्यक्ति के साथ बहस करते हैं, तो हम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वे हमें किस प्रकार चोट पहुँचाते हैं, हम उस व्यक्ति पर आरोप लगाते हुए उनके बुरे बर्ताव और चरित्र पर ध्यान केंद्रित करते हैं। लेकिन अगर हम 'मैं/ मुझे' शब्द का उपयोग करते हैं, तो हमारा ध्यान अपनी भावनाओं पर और दूसरे व्यक्ति के किसी व्यवहार से हम क्या महसूस करते हैं, इनपर केंद्रित होता है। उदाहरण के लिए: मान लीजिए आपका मित्र समूह के बीच आपसे बेरूख़ी से पेश आता है।

    आप बुरा महसूस करेंगे और अपने दोस्त से कुछ ऐसा कहेंगे - 'तुम बहुत मतलबी हो, हमेशा मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करते हो, बेरूख़ी से पेश आते हो...

    पर आप अपनी बात इस तरह कहें, 'तुम्हारे मेरे प्रति इस तरह के व्यवहार से मुझे बहुत बुरा महसूस होता है,मुझे ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे लिए मैं मायने नहीं रखता, मेरी विनती है ,क्या तुम इस व्यवहार को बदल सकते हो?'

    इस प्रकार, अपनी बात को 'मैं/मुझे' के प्रयोग से आप दूसरे व्यक्ति को आरोपित किए बिना ,उन तक अपना संदेश पहुँचा सकते हैं।

    6. इमोश्नल इन्टेलीजेंस और भावनाओं का प्रबंधन:

    उच्च 'ईक्यू', नकारात्मक और सकारात्मक भावनाओं को विनियमित करने में सक्षम बनाता है ,तब भी जब आप बहुत हताशा हों। यह स्वस्थ संबंधों को बनाए रखने में भी मदद करता है।

    7. इमोश्नल इन्टेलीजेंस और सामाज समर्थक व्यवहार

    अधिक 'ईक्यू' वाले व्यक्तियों में सामाजिक उद्धार की भावना भी अधिक होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इमोश्नल इन्टेलीजेंस के लिए सहानुभूति बहुत आवश्यक है, जो कि सामाजिक कल्याण के लिए ज़रूरी है। अधिक 'ईक्यू' वाले व्यक्तियों की असभ्य व्यवहार में शामिल होने की और स्वयं या दूसरों के लिए समस्याएं पैदा करने की संभावना कम होती है।
    इमोश्नल इन्टेलीजेंस हर क्षेत्र में बहुत उपयोगी है। हमें इसे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि यह हमें सकारात्मकता की ओर बढ़ावा देता है जिससे खुशियों, रचनात्मकता और नए विचारों के लिए हमारे मन के दरवाज़े खुलते हैं।

  • 11 Apr
    Janhavi Dwivedi

    लड़कियां किस प्रकार के लड़कों को पसंद करती हैं ? 

    get liked by girls

     

    सलमान खान के डोले और सिक्स पैक ऐब की लड़कियां दीवानी हैं, और अधिकतर ऐसे लड़कों को ज्यादा पसंद करती हैं। इसका क्या कारण है, आइये जानते हैं इस लेख के माध्यम से-

    किसी के बाहरी रंग रूप, उसके व्यक्तित्व और उसका मन इन सबका एक दूसरे से संबंध हमेशा से ही जटिल रहा है। देखा गया है कि जिनका आंतरिक मन अच्छा होता है वे अच्छे कार्य करते है ।

    तो क्या हम किसी के बाहरी रंग रूप को देखकर उसके व्यक्तित्व या उसकी अंतरात्मा को पहचान सकते हैं ?

    बहुत से शोधकर्ता ये दावा करते हैं कि, उनके शोध में शामिल होने वाले लोग सिर्फ चेहरे को देखकर सामने वाले व्यक्ति (पुरुष/महिला ) के व्यक्तित्व के कुछ गुणों के बारे में बताने में सक्षम थे। एक अध्ययन में प्रतिभागियों को पंद्रह मिनट तक एक दूसरे के सामने शांति से बैठकर अनुभव करके एक दूसरे की बहिर्मुखता और खुलेपन के मूल्यांकन का अनुमान लगाना था। अतः व्यक्ति बात करके अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं को प्रकट करे यह सम्भव नहीं था। यह देखा गया कि प्रतिभागी बहुत ही सही निर्णय देने में सक्षम थे। यह हमारे व्यक्तित्व की विशेषताओं के द्वारा जांचा गया।   

    लीडर्स के व्यक्तित्व के गुण:-

    एक लीडर में कुछ खास विशेषतायें पसंद की जाती हैं, जो लोग भरोसेमंद (विश्वसनीय), सामर्थ्यवान (योग्य), और प्रभावशाली होते हैं अक्सर उन्हें ही किसी कम्पनी और और देश दोनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना जाता है । क्या यह संयोग मात्र है?

    नेतृत्व या आक्रामक व्यवहार में testosterone की भूमिका :-

    मानव सभ्यता के विकास काल से ही आक्रामक व्यवहार शक्ति का प्रतीक रहा है, और यह हार्मोन्स के कारण नियंत्रित होता है, उदाहरण के लिए एक व्यक्ति में testosterone का मतलब आक्रामकता या नेतृत्व हो सकता है। यह अनिवार्य रूप से अधिक शक्ति सम्पन्न कार्यों को करने के लिए ईंधन के रूप में कार्य करता है। Testosterone का मतलब यह भी है कि उस व्यक्ति के गाल की हड्डी ऊंची और  जबड़े की हड्डी चौड़ी है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि जब मानव शिकार पर निर्भर था,  उस काल में शिकार पर ऐसे व्यक्तियों के जाने की आवश्यकता होती थी जिनके चौड़े और मजबूत हड्डियों के साथ ही, शक्ति बढ़ाने के लिए testosterone हार्मोन्स की अधिकता होती थी।

    इसीलिए हम इन विशेषता वाले लोगों को आक्रामक (शक्तिशाली ) और प्रभावशाली मानते हैं शायद इसलिए क्योंकि पाषाण युग के दिनों में यह जानना हमारे लिए जरूरी और  बहुत मददगार हो सकता था कि हमसे मिलने वाला व्यक्ति शक्तिशाली है, या नही।

     

    The unconventional guide to get liked by girls

    लड़कियां किस प्रकार के चेहरे को पसंद करती हैं?

    लड़कियां उन व्यक्तियों को जिनके पास पुरुषोचित और स्त्रियोचित दोनों ही प्रकार के गुण होते हैं उन्हें पसंद करती हैं। जैसे चेहरे के मजबूत किनारे, कामुक होंठ या कोमल आँखे। इससे उन्हें साथी में सही स्तर की आक्रमकता का पता चलता है, न बहुत ज्यादा, न बहुत कम।

    इसी प्रकार किसी व्यक्ति की त्वचा का रंग, उसकी आँखों की चमक और सामान्य लक्षणों को देखकर हम यह बता सकते हैं, कि वह कितना young है और कितना healthy है। साथी के चुनाव की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण जानकारी है।

    "अगर आपको उस व्यक्ति की तलाश है जो आपका जीवन बदल देगा, तो पहले स्वयं को देखें "   

    हम किसी के व्यक्तित्व को कितना परख पाते हैं यह हमारे देखने के तरीके पर निर्भर करता है। हालाँकि इनमे कुछ हार्मोन्स का प्रभाव भी होता है। किन्तु इन सबके बाद भी किसी को पूरी  तरह से समझ पाना बहुत जटिल है, और बाहरी रंग रूप का उसके आंतरिक गुणों से पूरी तरह संबंध नही बताया जा सका है, और ऐसा होने की संभावना भी नहीं दिखाई देती है। ऐसा नहीं लगता कि सब कुछ चेहरे से अनुमानित किया जा सकता है।

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