कुल 169 लेख

  • 14 Apr
    Oyindrila Basu

    द जंगल बुक-क्यों हम आज भी इस फिल्म के दीवाने हैं ?

     


    "जंगल जंगल बात चली है पता चला है..तू रु रु रु... अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है"
    एक हफ्ते का इंतज़ार एक साल जितना लम्बा लगता था, रविवार की सुबह हम ९० दशक के बच्चों के लिए खुशियों का मौसम लाता था। हम बेसब्री से इन्तजार करते थे कब हमारा साँवला दोस्त चोटी बांध कर पीली चड्डी में अपने दोस्तों के साथ आएगा, और पप्पू, बगीरा और भालू के साथ हमें खुश कर के जाएगा। हम शेर खान के लिए भी उतने ही बेसब्र होते थे।

    the jungle book


    इस साल, #आयरन मैन के निर्देशक, Jon Favreau हमारे लिए फिर से लाएं है मोगली का जादू, अंग्रेजी फिल्म 'द जंगल बुक' के साथ। ९० के दशक के बच्चों के लिए मोगली को फिर से देख पाना एक सपने जैसा है।
    पर क्या वजह है की हम ९० में पैदा हुए लोग, जंगल बुक से इतना प्रेम करते हैं?
    १. दूरदर्शन में जंगल बुक हिंदी में आता था, और यही अनुष्ठान सबसे लोकप्रिय हुआ, ख़ास कर भारत और उसके प्रादेशिक देशों में। हर एक किरदार हिंदी और उर्दू में बात करता था, इससे हम दर्शक उससे जुड़ जाते थें।
    २. जंगल बुक किताब भारत के वातावरण को ध्यान में रख कर लिखी गई है। रुडयार्ड किपलिंग जंगल के जीवन से प्रेरित हो कर ये किताब लिखते हैं। इसके सभी किरदारों के नाम भारतीय है। 'भालू', 'शेर खान' 'मोगली' और 'का' सभी भारतीय नाम हैं।
    ३. ९० के दशक में केबल या डिश टीवी नहीं था। बहुत सारे चैनल्स भी नहीं थे। सिर्फ दूरदर्शन और मेट्रो चैनल ही टीवी पर आते थे। इसलिए कोई भी प्रोग्राम जो हमें आता वही हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाता। इसीलिए शक्तिमान, चन्द्रकान्ता, महाभारत जैसे शो भी काफी प्रसिद्ध हुए। और बच्चे जिन्हें कार्टून पसंद थे, उनके लिए मोगली ही सर्वश्रेष्ठ बन गया।
    ४. कार्टून या एनीमेशन धीरे धीरे चढ़ाव ले रहा था। हम अचम्भित थे कि पशु भी बात कर रहे हैं। हमें पता था शेर दहाड़ता है, और गाय रंभाती है। लेकिन जंगल बुक में सभी पशु इंसानों की तरह बोल रहे थें, और हम बच्चे चौंक कर देखते थे की ये कैसे सम्भव है। सन २००० के बाद जन्मे व्यक्ति इस ख़ास अनुभूति को कभी नहीं समझ पाएंगे।
    ५. हमारी नानी हमें कहानियां सुनाती थीं, कि बच्चों को खूंखार जानवर उठा कर ले जाते हैं, ताकि हम जंगली जीवों से डरें और उनसे सावधान रहना सीखें। पर जंगल बुक ने पहली बार दिखाया की जानवर में भी जज़्बात होते हैं, और वे भी हमारे दोस्त बन सकते हैं। ये बात बच्चों को बहुत भा गयी।
    ६. आज भी जब हम कहीं 'चड्डी पहन के फूल खिला है' गाना सुनते हैं तो एक बार वो यादें दिमाग में आती हैं। वह रविवार के दिन, वो आलसी दोपहर याद आते हैं, जब होमवर्क का मतलब था, रंगों के नाम बताना, या फिर १ से ५ तक गिनती करना।

    the jungle book

    giphy.com
    इसीलिए जब अंग्रेजी जंगल बुक का प्रोमो पहली बार टीवी पर आया, तो हम ९० के बच्चे उछल कर खड़े हो गये।
    हम सभी हमारे सुख के दिनों को बार-बार जीना चाहते हैं, बचपन तो नहीं रहा, पर उनकी यादों से खुद को खुश करना चाहते हैं।
    हाल ही में खबर है कि जंगल बुक फिल्म को हिंदी में डब किया जा रहा है। यानी फिर से वापसी नाना पाटेकर और ओम पुरी जी का।
    जंगल बुक केवल एक सिनेमा नहीं, यह हमारा बचपन है।

  • 14 Apr
    Oyindrila Basu

    रिजेक्ट होने का दर्द मानसिक और शारीरिक दोनों रूप में होता है ।

    brain treat rejection as physical pain

     

     

    रिजेक्ट होने का दिल पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। सामाजिक हो, या व्यक्तिगत क्षेत्र, हम में से कोई भी ठुकराया जाना नहीं चाहता। लेकिन हमें नहीं पता होता की ठुकराए जाने का दर्द शारीरिक पीड़ा जैसी ही होती है, और यह केवल मानसिक दर्द न होकर शरीर पर भी असर दिखाता है । 

    वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हमारा मस्तिष्क रिजेक्शन को शारीरिक दर्द, पीड़ा और तकलीफ के बराबर मानता है, इसलिए रिजेक्ट होने पर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया भी वैसी ही होती है।

    1. रिजेक्शन से, मस्तिष्क के उन्ही भाग को ज्यादा असर होता है, जो शारीरिक चोट से प्रभावित होते है। एम आर आई स्टडी से हमें पता चलता है, कि मस्तिष्क रिजेक्ट होने पर वैसी ही प्रतिक्रिया देता है, जैसा शारीरिक चोट लगने पर देता है ।
    2. कहते हैं जब इंसान सभ्यता की सीढ़ी चढ़ रहा था, तब वे झुण्ड में चलते थे, और ostracism या समाज से निकाला जाना मृत्युदंड के सामान था। इंसान तब अकेले नहीं जी सकता था। समाज का ठुकराया व्यक्ति शारीरिक रूप से भी कमज़ोर हो जाता था। इसलिए कहा जाता है कि इंसानी दिमाग ने इस आदत को अपने अंदर कैद कर लिया, और यह आदत जैविक रूप से आज भी इंसानों के अंदर ज़िंदा है।
    3. ठोकर ज्यादा तकलीफ देती है क्योंकि हमारी यादाश्त उसे समर्थन करती है- शरीर के ज़ख्म दवाई से भर जाते हैं, और उसकी पीड़ा दूर हो जाती है, लेकिन मस्तिष्क पर लगी ठोकर की चोट इंसान को बार-बार याद आती रहती है, वह क्षण, वह हादसा उसे भविष्य में भी सताता रहता है। मस्तिष्क उस दर्द को भूलना नहीं चाहता, इसलिए दर्द ज्यादा होता है।
    4. ठुकराए जाने पर हमारे आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचती है- आत्मविश्वास टूटने पर तकलीफ ज्यादा होता है। ठुकराए जाने पर हमारा खुद पर से गुरूर मिट जाता है, और अंदर का इंसान मर जाता है।
    5. जब आत्मसम्मान नहीं रहता तो साथ जीने की इच्छा भी चली जाती है- इंसान हमेशा किसी दल के द्वारा अपनाया जाना चाहता है। यही चाहत उसे सामाजिक बनाती है। लेकिन नकारे जाने से ये इच्छा भी नहीं रहती।
    6. ठुकराए जाने पर इंसान को बहुत गुस्सा आता है- क्रोध खतरनाक है। सिर्फ मस्तिष्क को ही नहीं, यह शरीर को भी काफी हानि पहुंचाता है। इसलिए दर्द का प्रभाव भी ज्यादा होता है।

     

    लेकिन शरीर ठोकर की चिकित्सा खुद ब खुद करती है। ठुकराए जाने पर दिमाग कुछ ख़ास पदार्थ जिसे chemical opioids कहते हैं, तैयार करता  है। इनका काम होता है जज़्बातों को शांत करना।

    लेकिन जो लोग सोशल एंग्जायटी  के शिकार होते हैं वे इसका ज्यादा लाभ नहीं उठा पातें।

    acetaminophen (tyrenol) भी जज़्बाती दर्द को कम करने में मदद करता है।

    तो अगर आपको लगे, कि रिजेक्ट होने पर आपका शरीर दर्द महसूस करता है तो,  निश्चिन्त रहें, ये स्वाभाविक है।

     

  • 13 Apr
    Oyindrila Basu

    ‘की और का’ के बराबर योगदान से ही अच्छा घर, अच्छा समाज और अच्छा रिश्ता बनता है।

    ki aur ka movie

     

    http://www.idiva.com/news-relationships/new-age-indian-bride-who-cant-cook-and-clean/33629

    मैं उल्लिखित लेख पर अपना तर्क शुरू करना चाहूंगी। इन बातों पर मैंने भी गौर किया, और पाया कि ये सारी बातें सच है। मुझे नहीं लगता है कि इस लेख का उद्देश्य गृहिणी का असम्मान करना है, लेकिन पूरी बातचीत में लेखक वही कर रही है। आज के ज़माने में वर्किंग महिला को गृहिणी से ज्यादा मज़बूत बताना कोई गर्व की बात नहीं। इससे महिला की स्थिति समाज में किसी भी रूप से उन्नति नहीं पाती। घर सम्भालना एक कला होती  है और जो भी मर्द या औरत खाना बनाना पसंद करते हैं, वे कलाकार हैं। (तभी देश में शेफ उच्च वेतन पानेवालों में से एक है) यानी अगर कोई औरत आलू- मटर बना रही है, तो वह पसीने में जीवन व्यर्थ कर रही है ये कहना गलत होगा। वह खुद को एक कला में माहिर कर रही है। मैं लेखक से एक बात पर सहमत हूँ कि समाज में अच्छी गृह वधू को कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हक़दार है । हालाँकि समाज महिलाओं को निपुण गृहिणी बनने की सलाह ज़रूर देता है।

    मैं ये भी मानती हूँ कि अगर आपको घर के काम पसंद नहीं है, तो सिर्फ समाज कहता है इसलिए उसे सीखने की कोई ज़रूरत नहीं। सब को सब कुछ आना ज़रूरी तो नहीं। सच है। लेकिन हर मर्द और औरत को कुछ घर के काम आने ही चाहिए, क्योंकि आप नहीं जानते कब आपको खुद वह काम करने की ज़रूरत पड़ जाए। दूसरी ओर घर में बना खाना बाई के खाने से हमेशा स्वस्थ और लज़ीज़ होता है। आज अमरीका की पौष्टिक संस्था भी इस बात को प्रचार करती है, कि रोज़ का खाना घर में ही बनना चाहिए।

    अब यह आप की इच्छा पर निर्भर है की आप क्या करेंगे। अगर आप कुछ घर के काम सीख लेंगे तो बाई झंझट से मुक्त होंगे। अगर नहीं भी सीखना चाहते तो नहीं करेंगे।

    लेकिन लेखिका से एक प्रश्न यहां ज़रूरी है - अगर आप घर के काम नहीं सीखना चाहते, और आपका पति काम नहीं करना चाहे, ऑफिस ना जाना चाहे, जीवन में सफलता से दूर रहना चाहे, तो क्या आप इस बात को भी स्वीकार पाएंगे??

    कल हमने अमरीका में 'की और का' देखी। अर्जुन और करीना ने अपनी अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। अगर एक महिला कर्म क्षेत्र में सफल होना चाहती है, और एक पुरुष घर सम्हालने में खुश है तो इस में कोई हर्ज नहीं। ख़ास बात ये नहीं की फिल्म में एक मर्द घर सम्हाल रहा है, फिल्म में कई ख़ास मुद्दे हैं जिन्हें  छेड़ कर हमारे समाज की प्रचलित धारणाओं को बदलने की कोशिश की गयी है।

    1. अर्जुन एक गृहिणी को 'कामचोर' कहे जाने पर सख्त ऐतराज़ जताते हैं। अगर कोई प्रोफेशनल जीवन  से दूर रहकर अपनी मेहनत से एक घर को सजाती है, इसका मतलब ये नहीं की वह "घर पर बैठी है" घर के काम में शारीरिक मेहनत ज्यादा लगती है, और आप जितना जिम्मेदारी से घर सम्हालते हैं आपका घर, परिवार उतना ही उन्नति करता है, जैसे आप  की कंपनी की ग्रोथ में अपना सहयोग देते हैं, तभी वह उन्नति करती है ।

    2. अगर मर्द घर को सम्हाल रहा है तो उसे उसके लिए अपनी बीवी को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं है, उसे खाना बनाना और घर के काम करना पसंद है इसलिए वह करता है, वह अपनी बीवी पर कोई एहसान नहीं कर रहा है।

    3. संघर्ष मर्द या औरत का नहीं। कमाने वाला, और उसपर निर्भर घर चलाने वाले का है। जो कमाता है, समाज की नज़रों में वही लायक है। इसलिए अगर घर सम्हालने वाला एक क्षण के लिए लोगों की नज़रों में आ जाता है, तो कामयाब कमाने वाला जलने लगता है, उसपर निर्भर साथी की कामयाबी उससे बर्दाश्त नहीं होती। यह एक स्वाभाविक सी बात है पर यह बात इतने सहज तरीके से हमने कभी नहीं सोचा होगा।

    4. यह फिल्म इस प्रथा को ठुकराता है की औरत काम काजी  हो सकती है, लेकिन एक मर्द कभी काम छोड़ कर घर नहीं सम्हाल सकता। यहां एक औरत अपने पति से उसकी इंसानियत के लिए प्यार करती है, उसे अपनाती है, उसके पैसे या कर्म क्षेत्र में पोजीशन की वजह से नहीं। यह खुद में एक बहुत बड़ी प्रेरणा है।

     

    मैं ऊपर दिए गए लेख पर आती हूँ। जैसा मैंने कहाँ, घर के काम करने में कोई शर्म नहीं, सीखना हर किसी के लिए ज़रूरी है, चाहे वह मर्द हो या औरत। विदेश में काम वाली बाई नहीं मिलती, तो अगर आप नॉर्वे या नार्डिक जैसी जगह पर होंगे, तो आपको बाहर का खाना भी नसीब नहीं होगा, तब आपको इस कला की ज़रूरत पड़ सकती है। मैं खुद भी लेखिका हूँ, रिसर्च रिव्यु करती हूँ, कर्मरत हूँ, और फिर भी चीन और इटली के लज़ीज़ पकवान अच्छे से बना लेती हूँ। इससे मेरी समझदारी कम नहीं होती। मैं भी अपने पति के साथ राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक विषय पर चर्चा करती हूँ, विभिन्न तरह की किताबें पढ़ती हूँ। खाना बनाने में कोई शर्म नहीं, जो महिला गोल रोटी बना सकती है, वह ऑफिस जाने वाली महिला से किसी भी तरह से कम नहीं है। उसके लिए कोई भी और कला उतना ज़रूरी नहीं है। फोटोग्राफी, नृत्य इत्यादि के बगैर भी आपकी ज़िन्दगी चल जायेगी, लेकिन खाने के बगैर आप नहीं जी पाएंगे, घर साफ़ नहीं होगा, तो बीमार पड़ जाएंगे आप। तो ये काम ज़रूरी है जीने के लिए, तो इन्हें सीखने में ही समझदारी है, पुरुष हो या महिला।

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  • 11 Apr
    Janhavi Dwivedi

    लड़कियां किस प्रकार के लड़कों को पसंद करती हैं ? 

    get liked by girls

     

    सलमान खान के डोले और सिक्स पैक ऐब की लड़कियां दीवानी हैं, और अधिकतर ऐसे लड़कों को ज्यादा पसंद करती हैं। इसका क्या कारण है, आइये जानते हैं इस लेख के माध्यम से-

    किसी के बाहरी रंग रूप, उसके व्यक्तित्व और उसका मन इन सबका एक दूसरे से संबंध हमेशा से ही जटिल रहा है। देखा गया है कि जिनका आंतरिक मन अच्छा होता है वे अच्छे कार्य करते है ।

    तो क्या हम किसी के बाहरी रंग रूप को देखकर उसके व्यक्तित्व या उसकी अंतरात्मा को पहचान सकते हैं ?

    बहुत से शोधकर्ता ये दावा करते हैं कि, उनके शोध में शामिल होने वाले लोग सिर्फ चेहरे को देखकर सामने वाले व्यक्ति (पुरुष/महिला ) के व्यक्तित्व के कुछ गुणों के बारे में बताने में सक्षम थे। एक अध्ययन में प्रतिभागियों को पंद्रह मिनट तक एक दूसरे के सामने शांति से बैठकर अनुभव करके एक दूसरे की बहिर्मुखता और खुलेपन के मूल्यांकन का अनुमान लगाना था। अतः व्यक्ति बात करके अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं को प्रकट करे यह सम्भव नहीं था। यह देखा गया कि प्रतिभागी बहुत ही सही निर्णय देने में सक्षम थे। यह हमारे व्यक्तित्व की विशेषताओं के द्वारा जांचा गया।   

    लीडर्स के व्यक्तित्व के गुण:-

    एक लीडर में कुछ खास विशेषतायें पसंद की जाती हैं, जो लोग भरोसेमंद (विश्वसनीय), सामर्थ्यवान (योग्य), और प्रभावशाली होते हैं अक्सर उन्हें ही किसी कम्पनी और और देश दोनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना जाता है । क्या यह संयोग मात्र है?

    नेतृत्व या आक्रामक व्यवहार में testosterone की भूमिका :-

    मानव सभ्यता के विकास काल से ही आक्रामक व्यवहार शक्ति का प्रतीक रहा है, और यह हार्मोन्स के कारण नियंत्रित होता है, उदाहरण के लिए एक व्यक्ति में testosterone का मतलब आक्रामकता या नेतृत्व हो सकता है। यह अनिवार्य रूप से अधिक शक्ति सम्पन्न कार्यों को करने के लिए ईंधन के रूप में कार्य करता है। Testosterone का मतलब यह भी है कि उस व्यक्ति के गाल की हड्डी ऊंची और  जबड़े की हड्डी चौड़ी है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि जब मानव शिकार पर निर्भर था,  उस काल में शिकार पर ऐसे व्यक्तियों के जाने की आवश्यकता होती थी जिनके चौड़े और मजबूत हड्डियों के साथ ही, शक्ति बढ़ाने के लिए testosterone हार्मोन्स की अधिकता होती थी।

    इसीलिए हम इन विशेषता वाले लोगों को आक्रामक (शक्तिशाली ) और प्रभावशाली मानते हैं शायद इसलिए क्योंकि पाषाण युग के दिनों में यह जानना हमारे लिए जरूरी और  बहुत मददगार हो सकता था कि हमसे मिलने वाला व्यक्ति शक्तिशाली है, या नही।

     

    The unconventional guide to get liked by girls

    लड़कियां किस प्रकार के चेहरे को पसंद करती हैं?

    लड़कियां उन व्यक्तियों को जिनके पास पुरुषोचित और स्त्रियोचित दोनों ही प्रकार के गुण होते हैं उन्हें पसंद करती हैं। जैसे चेहरे के मजबूत किनारे, कामुक होंठ या कोमल आँखे। इससे उन्हें साथी में सही स्तर की आक्रमकता का पता चलता है, न बहुत ज्यादा, न बहुत कम।

    इसी प्रकार किसी व्यक्ति की त्वचा का रंग, उसकी आँखों की चमक और सामान्य लक्षणों को देखकर हम यह बता सकते हैं, कि वह कितना young है और कितना healthy है। साथी के चुनाव की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण जानकारी है।

    "अगर आपको उस व्यक्ति की तलाश है जो आपका जीवन बदल देगा, तो पहले स्वयं को देखें "   

    हम किसी के व्यक्तित्व को कितना परख पाते हैं यह हमारे देखने के तरीके पर निर्भर करता है। हालाँकि इनमे कुछ हार्मोन्स का प्रभाव भी होता है। किन्तु इन सबके बाद भी किसी को पूरी  तरह से समझ पाना बहुत जटिल है, और बाहरी रंग रूप का उसके आंतरिक गुणों से पूरी तरह संबंध नही बताया जा सका है, और ऐसा होने की संभावना भी नहीं दिखाई देती है। ऐसा नहीं लगता कि सब कुछ चेहरे से अनुमानित किया जा सकता है।

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  • 10 Apr
    Janhavi Dwivedi

    हंसी संक्रामक क्यों होती है?

    laughter therapy

     

     

    हँसता  हुआ चेहरा देखकर हंसी क्यों आ जाती है ?

    "हँसो और दुनिया तुम्हारे साथ हँसती है", ये सिर्फ एक कहावत नही है, जिसे हम बचपन से सुनते आये हैं। वैज्ञानिक खोजों से यह पता चला है कि हँसी संक्रामक होती है। शोध बताते हैं कि जब हम अन्य लोगों के चेहरों पर किसी भी तरह की भावनात्मक अभिव्यक्ति देखते हैं, हमारा मस्तिष्क उसे प्रतिबिंबित करने के कोशिश करता है, जिससे हम उस व्यक्ति के साथ संबंध मजबूत करने के लिए उसकी भावनाओं में भागीदार हो सकें। मनुष्य के लिए शुरू से ही अपने समूह के सदस्यों  के साथ मजबूत रिश्ते बनाना महत्वपूर्ण रहा है, और अभी भी यह प्रक्रिया जारी है और यही वजह है कि मस्तिष्क इस तरह का व्यवहार करता है। यह क्षमता हमारे सामाजिक वातावरण को बनाये रखने में मदद करती है।

    हालांकि, यह पता चला है कि सकारात्मक भावनाओं के लिए, हमारा मस्तिष्क अधिक और बहुत तेजी से प्रतिक्रिया करता है। इस वजह से सकारात्मक भावनाओं से अधिक संबंध बनने की संभावना होती है। ये भी Immune system को मजबूत करने वाला माना जाता है, और इसलिए मस्तिष्क उनपर अधिक responds करता है। इसलिए, जब हम किसी को हँसते हुए देखते हैं या कोई joke सुनते हैं तो हमारा मस्तिष्क अनायास ही चेहरे की मांसपेशियों को हँसने के लिए तैयार करता है और हम मुस्कुरा देते हैं।

    डॉ सोफी स्कॉट, इस research प्रोजेक्ट की प्रमुख ने टिप्पणी की है :-

    "हम आम तौर पर कई लोगों के बीच हँसी या वाहवाही जैसी सकारात्मक भावनाओं का सामना करते हैं। जैसे, परिवार के साथ बैठकर कॉमेडी प्रोग्राम या दोस्तों के साथ फुटबॉल मैच देखना। यह मस्तिष्क में प्रतिक्रिया करता है और हमें अपने आप हँसी या मुस्कान आ जाती है। जो की समूह के व्यवहार को प्रतिबिम्बित करने का ऐसा तरीका है, जो समूह में व्यवहार करने में हमारी मदद करता है। यह समूह के सदस्यों के बीच मजबूत संबंध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।“

    इसीलिए शायद जब दो अनजान लोग आपस में मिलते हैं, तो उनके  बीच  की चुप्पी को तोड़ने के लिए मजाक का इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है, कि किसी भी प्रकार की औपचारिक या अनौपचारिक  स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक कौशल में से एक यही है।

    उदास मन को अच्छा करने में Laughter therapy मदद करती है। 

    उदासी या अन्य किसी मनोवैज्ञनिक विकार के लिए Laughter therapy बहुत मदद  करती है। Laughter therapy में किसी भी joke का इस्तेमाल नही किया जाता बल्कि प्रशिक्षक  की साधारण हँसी ही आपको हंसने के लिए प्रेरित करती है।

    यह मस्तिष्क की सकारात्मक भावनाओं की नकल उतारने में  मैकनिज़्म काम  करता है और उपयोगी होता है। अवसाद में कुछ भी ख़ुशी देने वाली चीजें पाना  बहुत मुश्किल हो सकता है, लेकिन Laughter therapy मस्तिष्क के ऑटोमैटिक  सिस्टम पर काम करता है, और सकारात्मक भावनाओं को बढ़ाता है और फील गुड का अहसास करने वाले हार्मोन डोपामाइन को रिलीज़  करता है। इसका   प्रभाव कई गुना होता है, जैसा की हम देखते हैं, पूरा ग्रुप हँसने लगता है।

    आपकी कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, यदि आप में हंसाने की क्षमता है।

    हँसी पसंद को भी बढ़ावा देती है। उदाहरण के लिए, बच्चों को वे अंकल या टीचर अच्छे लगते हैं जो उन्हें हँसाते हैं। यदि किसी में हँसाने की कला होती है तो हम आसानी से उसकी कमियों की अनदेखी कर देते हैं।

    हँसना हमारे इम्यून सिस्टम को बढ़ाता है।

    कुछ शोध ये बताते हैं कि, हमारे पूर्वजों को पहले से ही हँसने से स्वाथ्य लाभ की जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने योग में चेहरे के व्यायाम में हँसने और हँसने के भावों को शामिल  किया है। यह संक्रामक होने के साथ-साथ स्वास्थ्यकर भी है। यहाँ तक कि जो मांसपेशियों हँसने में इस्तेमाल होती हैं, उन्ही मांसपेशियों का इस्तेमाल करके हम फील गुड कर सकते हैं, और स्वास्थ्य लाभ कर सकते हैं।