कुल 169 लेख

  • 16 Apr
    Oyindrila Basu

    10 वाक्य जो आपके चिंतित बच्चे को राहत दिला सकते  हैं ।


    anxious child
    ना सिर्फ बड़ों के लिए बल्कि बच्चों के लिए भी चिंता या एंग्जायटी परेशानी का कारण बन सकता है। बच्चे चिंता से ज्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे अपने स्कूल, सुरक्षा, पढ़ाई और परीक्षा के बारे में अधिक चिंतित होते हैं।
    पर अगर आपका बच्चा परेशान या डरा हुआ है, तो उसकी मानसिक पीड़ा को कैसे दूर करेंगे, ये आपको मालूम होना चाहिए।
    क्षणिक रूप से उसको फर्स्ट ऐड देना आपका कर्तव्य है।
    कुछ सामान्य वाक्य या शब्द भी आपके बच्चे को राहत पहुंचा सकते हैं।


    1. "गलतियां करना ठीक है, हमेशा सही होना ज़रूरी नहीं"- अपने बच्चे को बताएं अपूर्ण होना कोई बड़ा जुर्म नहीं है। आप हमेशा अव्वल आएं ये ज़रूरी नहीं; कुछ काम में आप हार भी सकते हैं, लेकिन अपनी गलतियों से सीख कर आगे बढ़ना ही सही है।

    2. "मैं यही हूँ, तुम सुरक्षित हो, बिल्कुल फ़िक्र मत करो"- अगर आपका बच्चा चिंतित है, डरा हुआ है, किसी चीज़ को लेकर परेशान है, तो उसे ये यकीन दिलाएं कि आप उसके साथ हैं; हर मुसीबत में आप उसकी सहायता करेंगे। वह अकेला नहीं है, आप हैं उसकी सुरक्षा के लिए, ये भरोसा दिलाइये। इससे बच्चा शांत हो जाएगा।

    3. "मेरे साथ अपनी समस्या को शेयर करो"- आप उसके दोस्त बनें। आपका बच्चा आपको हर बात, हर समस्या बता पाये, ऐसा सम्पर्क बनाएं। अपनी मुश्किल आपके साथ बांटने के लिए आप उसे प्रोत्साहित करें। बात बताने से चिंता, डर काफी हद तक कम हो जाता है।

    4. "गुब्बारे फुलाने की कोशिश करो"- टेंशन और एंग्जायटी में आपका बच्चा लम्बी सांस लेने से इनकार करेगा, उसे लगेगा की वह नहीं कर पाएगा, इसलिए उसे खेल की तरह समझाएं। गुब्बारे फुलाने को कहें, अगर गुब्बारा सामने नहीं है तो, झूठ मूठ उसे एक्टिंग करने को कहें, ताकि वह लम्बी सांस भर सखे, इससे मानसिक रूप से उसे काफी राहत मिलती है।

    5. "राक्षस को अपने अंदर से भगा दो"- चिंता को एक राक्षस या डायन का रूप दे कर अपने बच्चे को उस पर विजय पाने के लिए प्रोत्साहित करें। बच्चे देवता, राजा और राक्षस की कहानियों से काफी प्रभावित होते हैं। अगर आप उसे बताएँगे कि उसका डर एक राक्षस है जिसे हराना है, तो वह खुद कोशिश करेगा कि अपने चिंता रुपी राक्षस से मुक्त हो सके।

    6. "अपने डर को अंकित करके उसका एक चित्र बनाओ"- उसके डर या को मुक्त करने के लिए उसका बाहर आना ज़रूरी है, और चित्र बनाने से ध्यान उस कारीगरी पर होगा, तो परेशानी वाली चिंता दूर हो जाएगी ।

    7. "ये जल्द भाग जाएगा, तब तक आराम करो"- आराम मिलने की सम्भावना से चिंता कम हो जाती है, दिमाग को काफी सुकून मिलता है।

    8. "आज तुमने जो भी अच्छा किया है सब बताओ"- अगर आपका बच्चा परेशान है, तो उसे अच्छी चीज़ें याद दिलाइये। दिन में उसने क्या अच्छा किया है, उसे क्या अच्छा लगा है, क्या अच्छा मिला है। जब वह ये सब बताने लगेगा, तो उसमें सकारात्मक भाव आएगा, और चिंता कम हो जाएगा।


    9. "तुम्हारी समस्या तो कुछ भी नहीं, मैं जब स्कूल में थी तो इससे ज्यादा मुश्किलों में पड़ती थी"- उसकी समस्या की गम्भीरता को कम करने के लिए, अपनी कोई बचपन की समस्या बताएं जो और गम्भीर हो, इससे उसकी परेशानी घटेगी, वह चिंता मुक्त होगा ये सोचकर की समस्या उतनी भी गहरी नहीं है।

    10. "तुम डरे हुए हो, अच्छा है, चलो इस डर के बारे में और जानते हैं"- उसकी डर और परेशानी के बारे में उससे सवाल करें, बच्चे को डर का सामना करना सिखाइए। जब वह जवाब देगा, तब वह असल में अपनी चिंताओं को बातचीत के द्वारा जाहिर कर रहा होगा, और इस प्रकार उसकी चिंताएं दिमाग से बाहर आ जायेगी।

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  • 15 Apr
    Janhavi Dwivedi

    यदि आप फ्रेशर हैं, और अनुभवहीन हैं तो परवाह ना करें ।

    4 reasons you should not worry about lack of work experience as fresher



    ज्यादातर फ्रेशर्स के मन में लगातार ये डर बना रहता है, कि कहीं अनुभव की कमी के कारण वे निकाल ना दिए जाएँ। इंटरनेट पर बहुत से जोक्स इसी बारे में होते हैं, कि कम्पनियां बहुत कम वेतन में ज्यादा अनुभव और काम में बढ़िया वर्कर्स को चाहती हैं।
    तो क्यों हर कोई काम करने के अनुभव के बारे में इतना ज्यादा परवाह करता है? यह कितना महत्वपूर्ण है?
    कुछ ऐसी जॉब्स होती हैं, जिनमे अनुभव के साथ व्यक्ति बेहतर होता जाता है।
    कुछ सामान्य जॉब्स जैसे, प्रबंधकीय और राजनयिक की भूमिका। इन जॉब्स में लोगों को समझना, काम के बोझ का प्रबंधन और नौकरी की छोटी-छोटी परेशानियां ठीक करना, ‘समय और अनुभव’ के साथ बेहतर होती जाती हैं।
    हालाँकि यह बात भी पूरी तरह से लागू नहीं होती, क्योंकि जहां बात नए और आविष्कारी विचारों की हो तो यह नौसिखिए और शुरूआती लोगों के लिए ज्यादा आसान होती है।


    1. ज्यादा सफल स्टार्ट -अप युवा उद्यमियों की है।
    अपने दम पर जोखिम उठने के लिए आपकी सही उम्र है।
    आपको उम्र के कारण आने वाली बाधाओं के बिना स्वयं को साबित करने की जरूरत है। आप नए उत्पादों और अलग तरह की मार्केटिंग के तरीके के बारे में सोच सकते हैं, क्योंकि आप अभी अभ्यस्त नहीं हुए हैं।
    यह मुश्किल होगा, यदि आप इन धारणाओं पर काबू पा सकते हैं, कि अनुभव के साथ ही ज्यादा समझ आती है, "कुछ नया करें"। .


    2.आपके पास सही दर्शकों तक पहुंचने की काबिलियत है।
    यदि किसी को सही दर्शकों तक पहुंचना है तो, उपभोक्ता की पसंद और नापसंद समझने की क्षमता आनी चाहिए।
    पहले के जमाने में ये सब इतना महत्वपूर्ण नहीं था,क्योंकि तब बाजार में ज्यादा कम्पनियाँ नहीं होती थी, और उनके बीच इतनी प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी। अब के समय में वो बात नहीं रही।


    3.आपके पास उपभोक्ता के नजरिए से सोचने की क्षमता है 
    मार्केटिंग और विज्ञापन बहुत महंगे हो गए हैं। इसलिए इन्हे पहले शॉट में ही सही करने की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में, यह बहुत मायने रखता है कि कोई कितना अधिक उपभोक्ता के दिल और दिमाग में उतर पाया है,और उनके हिसाब से सोच सका है।
    यह उनके लिए बहुत मुश्किल होता है, जो अनुभवी हो गए हैं, और जिनके दिमाग में समय के साथ ढेर सारी जानकारी इकट्ठा हो गई है और जिससे उनका सोचने का तरीका बदल चुका है। वे आसानी से अपनी सोच को नहीं बदल पाते, और इसलिए एक उपभोक्ता की तरह नहीं सोच पाते।


    4.शिक्षा के क्षेत्र में नए टीचर्स नई शैक्षणिक रणनीतियों से पढ़ाते हैं।
    वास्तव में,एक अध्ययन के अनुसार, पारम्परिक क्षेत्रों में भी जहाँ अनुभव बहुत ज्यादा मायने रखता है, जैसे टीचिंग और एजुकेशन इन क्षेत्रों में नए टीचर्स बच्चों के सिर्फ ग्रेड या मार्क्स के लिए नहीं बल्कि समग्र विकास के लिए नई शैक्षणिक रणनीतियों को अपनाते हैं।
    इससे बच्चों को लगता है, कि टीचर उनकी परवाह करते हैं, और उन्हें अच्छी तरह से समझते हैं, और वे अपनी तरफ से बेहतर करने की पूरी कोशिश करते हैं।
    इससे सजा और जुर्माना लगाने वाली पुरानी पद्धति की तुलना में ज्यादा अच्छे और अनवरत परिणाम मिलते हैं। हालाँकि अनुभवी शिक्षकों को इन पद्धतियों में इतना विश्वास होता हैं कि वे नई बातों को अपनाने की कभी कोशिश नहीं करते।


    तो,क्या अनुभव महत्वपूर्ण है ?
    हाँ, कुछ क्षेत्रों में,सीमित स्तर पर।


    क्या नौसिखिया होने के कारण स्वयं को अपराधी समझना चाहिए?
    निश्चित रूप से नहीं, नए होने से वे अधिक खुलकर सोच पाने में सक्षम हैं, वे आश्चर्यजनक विचारों के साथ आगे आते हैं, और असफल होने की परवाह किये बिना समस्या का सामना करते हैं।
    यदि एक अनुभवी व्यक्ति असफल होता है तो वह मनोवैज्ञानिक तौर पर इसे नहीं स्वीकार कर पाता, क्योंकि उनके लिए असफल होने का मतलब, 'सारा अनुभव बेकार था'।
    यह आशंका एक नौसिखिए को कभी परेशान नहीं करेगी, बल्कि सुनहरे कल के लिए योजनाएं लाकर उन्हें सही उम्मीदवार बनाती है।

  • 14 Apr
    Oyindrila Basu

    द जंगल बुक-क्यों हम आज भी इस फिल्म के दीवाने हैं ?

     


    "जंगल जंगल बात चली है पता चला है..तू रु रु रु... अरे चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है"
    एक हफ्ते का इंतज़ार एक साल जितना लम्बा लगता था, रविवार की सुबह हम ९० दशक के बच्चों के लिए खुशियों का मौसम लाता था। हम बेसब्री से इन्तजार करते थे कब हमारा साँवला दोस्त चोटी बांध कर पीली चड्डी में अपने दोस्तों के साथ आएगा, और पप्पू, बगीरा और भालू के साथ हमें खुश कर के जाएगा। हम शेर खान के लिए भी उतने ही बेसब्र होते थे।

    the jungle book


    इस साल, #आयरन मैन के निर्देशक, Jon Favreau हमारे लिए फिर से लाएं है मोगली का जादू, अंग्रेजी फिल्म 'द जंगल बुक' के साथ। ९० के दशक के बच्चों के लिए मोगली को फिर से देख पाना एक सपने जैसा है।
    पर क्या वजह है की हम ९० में पैदा हुए लोग, जंगल बुक से इतना प्रेम करते हैं?
    १. दूरदर्शन में जंगल बुक हिंदी में आता था, और यही अनुष्ठान सबसे लोकप्रिय हुआ, ख़ास कर भारत और उसके प्रादेशिक देशों में। हर एक किरदार हिंदी और उर्दू में बात करता था, इससे हम दर्शक उससे जुड़ जाते थें।
    २. जंगल बुक किताब भारत के वातावरण को ध्यान में रख कर लिखी गई है। रुडयार्ड किपलिंग जंगल के जीवन से प्रेरित हो कर ये किताब लिखते हैं। इसके सभी किरदारों के नाम भारतीय है। 'भालू', 'शेर खान' 'मोगली' और 'का' सभी भारतीय नाम हैं।
    ३. ९० के दशक में केबल या डिश टीवी नहीं था। बहुत सारे चैनल्स भी नहीं थे। सिर्फ दूरदर्शन और मेट्रो चैनल ही टीवी पर आते थे। इसलिए कोई भी प्रोग्राम जो हमें आता वही हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाता। इसीलिए शक्तिमान, चन्द्रकान्ता, महाभारत जैसे शो भी काफी प्रसिद्ध हुए। और बच्चे जिन्हें कार्टून पसंद थे, उनके लिए मोगली ही सर्वश्रेष्ठ बन गया।
    ४. कार्टून या एनीमेशन धीरे धीरे चढ़ाव ले रहा था। हम अचम्भित थे कि पशु भी बात कर रहे हैं। हमें पता था शेर दहाड़ता है, और गाय रंभाती है। लेकिन जंगल बुक में सभी पशु इंसानों की तरह बोल रहे थें, और हम बच्चे चौंक कर देखते थे की ये कैसे सम्भव है। सन २००० के बाद जन्मे व्यक्ति इस ख़ास अनुभूति को कभी नहीं समझ पाएंगे।
    ५. हमारी नानी हमें कहानियां सुनाती थीं, कि बच्चों को खूंखार जानवर उठा कर ले जाते हैं, ताकि हम जंगली जीवों से डरें और उनसे सावधान रहना सीखें। पर जंगल बुक ने पहली बार दिखाया की जानवर में भी जज़्बात होते हैं, और वे भी हमारे दोस्त बन सकते हैं। ये बात बच्चों को बहुत भा गयी।
    ६. आज भी जब हम कहीं 'चड्डी पहन के फूल खिला है' गाना सुनते हैं तो एक बार वो यादें दिमाग में आती हैं। वह रविवार के दिन, वो आलसी दोपहर याद आते हैं, जब होमवर्क का मतलब था, रंगों के नाम बताना, या फिर १ से ५ तक गिनती करना।

    the jungle book

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    इसीलिए जब अंग्रेजी जंगल बुक का प्रोमो पहली बार टीवी पर आया, तो हम ९० के बच्चे उछल कर खड़े हो गये।
    हम सभी हमारे सुख के दिनों को बार-बार जीना चाहते हैं, बचपन तो नहीं रहा, पर उनकी यादों से खुद को खुश करना चाहते हैं।
    हाल ही में खबर है कि जंगल बुक फिल्म को हिंदी में डब किया जा रहा है। यानी फिर से वापसी नाना पाटेकर और ओम पुरी जी का।
    जंगल बुक केवल एक सिनेमा नहीं, यह हमारा बचपन है।

  • 14 Apr
    Oyindrila Basu

    रिजेक्ट होने का दर्द मानसिक और शारीरिक दोनों रूप में होता है ।

    brain treat rejection as physical pain

     

     

    रिजेक्ट होने का दिल पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। सामाजिक हो, या व्यक्तिगत क्षेत्र, हम में से कोई भी ठुकराया जाना नहीं चाहता। लेकिन हमें नहीं पता होता की ठुकराए जाने का दर्द शारीरिक पीड़ा जैसी ही होती है, और यह केवल मानसिक दर्द न होकर शरीर पर भी असर दिखाता है । 

    वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हमारा मस्तिष्क रिजेक्शन को शारीरिक दर्द, पीड़ा और तकलीफ के बराबर मानता है, इसलिए रिजेक्ट होने पर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया भी वैसी ही होती है।

    1. रिजेक्शन से, मस्तिष्क के उन्ही भाग को ज्यादा असर होता है, जो शारीरिक चोट से प्रभावित होते है। एम आर आई स्टडी से हमें पता चलता है, कि मस्तिष्क रिजेक्ट होने पर वैसी ही प्रतिक्रिया देता है, जैसा शारीरिक चोट लगने पर देता है ।
    2. कहते हैं जब इंसान सभ्यता की सीढ़ी चढ़ रहा था, तब वे झुण्ड में चलते थे, और ostracism या समाज से निकाला जाना मृत्युदंड के सामान था। इंसान तब अकेले नहीं जी सकता था। समाज का ठुकराया व्यक्ति शारीरिक रूप से भी कमज़ोर हो जाता था। इसलिए कहा जाता है कि इंसानी दिमाग ने इस आदत को अपने अंदर कैद कर लिया, और यह आदत जैविक रूप से आज भी इंसानों के अंदर ज़िंदा है।
    3. ठोकर ज्यादा तकलीफ देती है क्योंकि हमारी यादाश्त उसे समर्थन करती है- शरीर के ज़ख्म दवाई से भर जाते हैं, और उसकी पीड़ा दूर हो जाती है, लेकिन मस्तिष्क पर लगी ठोकर की चोट इंसान को बार-बार याद आती रहती है, वह क्षण, वह हादसा उसे भविष्य में भी सताता रहता है। मस्तिष्क उस दर्द को भूलना नहीं चाहता, इसलिए दर्द ज्यादा होता है।
    4. ठुकराए जाने पर हमारे आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचती है- आत्मविश्वास टूटने पर तकलीफ ज्यादा होता है। ठुकराए जाने पर हमारा खुद पर से गुरूर मिट जाता है, और अंदर का इंसान मर जाता है।
    5. जब आत्मसम्मान नहीं रहता तो साथ जीने की इच्छा भी चली जाती है- इंसान हमेशा किसी दल के द्वारा अपनाया जाना चाहता है। यही चाहत उसे सामाजिक बनाती है। लेकिन नकारे जाने से ये इच्छा भी नहीं रहती।
    6. ठुकराए जाने पर इंसान को बहुत गुस्सा आता है- क्रोध खतरनाक है। सिर्फ मस्तिष्क को ही नहीं, यह शरीर को भी काफी हानि पहुंचाता है। इसलिए दर्द का प्रभाव भी ज्यादा होता है।

     

    लेकिन शरीर ठोकर की चिकित्सा खुद ब खुद करती है। ठुकराए जाने पर दिमाग कुछ ख़ास पदार्थ जिसे chemical opioids कहते हैं, तैयार करता  है। इनका काम होता है जज़्बातों को शांत करना।

    लेकिन जो लोग सोशल एंग्जायटी  के शिकार होते हैं वे इसका ज्यादा लाभ नहीं उठा पातें।

    acetaminophen (tyrenol) भी जज़्बाती दर्द को कम करने में मदद करता है।

    तो अगर आपको लगे, कि रिजेक्ट होने पर आपका शरीर दर्द महसूस करता है तो,  निश्चिन्त रहें, ये स्वाभाविक है।

     

  • 13 Apr
    Oyindrila Basu

    ‘की और का’ के बराबर योगदान से ही अच्छा घर, अच्छा समाज और अच्छा रिश्ता बनता है।

    ki aur ka movie

     

    http://www.idiva.com/news-relationships/new-age-indian-bride-who-cant-cook-and-clean/33629

    मैं उल्लिखित लेख पर अपना तर्क शुरू करना चाहूंगी। इन बातों पर मैंने भी गौर किया, और पाया कि ये सारी बातें सच है। मुझे नहीं लगता है कि इस लेख का उद्देश्य गृहिणी का असम्मान करना है, लेकिन पूरी बातचीत में लेखक वही कर रही है। आज के ज़माने में वर्किंग महिला को गृहिणी से ज्यादा मज़बूत बताना कोई गर्व की बात नहीं। इससे महिला की स्थिति समाज में किसी भी रूप से उन्नति नहीं पाती। घर सम्भालना एक कला होती  है और जो भी मर्द या औरत खाना बनाना पसंद करते हैं, वे कलाकार हैं। (तभी देश में शेफ उच्च वेतन पानेवालों में से एक है) यानी अगर कोई औरत आलू- मटर बना रही है, तो वह पसीने में जीवन व्यर्थ कर रही है ये कहना गलत होगा। वह खुद को एक कला में माहिर कर रही है। मैं लेखक से एक बात पर सहमत हूँ कि समाज में अच्छी गृह वधू को कभी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हक़दार है । हालाँकि समाज महिलाओं को निपुण गृहिणी बनने की सलाह ज़रूर देता है।

    मैं ये भी मानती हूँ कि अगर आपको घर के काम पसंद नहीं है, तो सिर्फ समाज कहता है इसलिए उसे सीखने की कोई ज़रूरत नहीं। सब को सब कुछ आना ज़रूरी तो नहीं। सच है। लेकिन हर मर्द और औरत को कुछ घर के काम आने ही चाहिए, क्योंकि आप नहीं जानते कब आपको खुद वह काम करने की ज़रूरत पड़ जाए। दूसरी ओर घर में बना खाना बाई के खाने से हमेशा स्वस्थ और लज़ीज़ होता है। आज अमरीका की पौष्टिक संस्था भी इस बात को प्रचार करती है, कि रोज़ का खाना घर में ही बनना चाहिए।

    अब यह आप की इच्छा पर निर्भर है की आप क्या करेंगे। अगर आप कुछ घर के काम सीख लेंगे तो बाई झंझट से मुक्त होंगे। अगर नहीं भी सीखना चाहते तो नहीं करेंगे।

    लेकिन लेखिका से एक प्रश्न यहां ज़रूरी है - अगर आप घर के काम नहीं सीखना चाहते, और आपका पति काम नहीं करना चाहे, ऑफिस ना जाना चाहे, जीवन में सफलता से दूर रहना चाहे, तो क्या आप इस बात को भी स्वीकार पाएंगे??

    कल हमने अमरीका में 'की और का' देखी। अर्जुन और करीना ने अपनी अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। अगर एक महिला कर्म क्षेत्र में सफल होना चाहती है, और एक पुरुष घर सम्हालने में खुश है तो इस में कोई हर्ज नहीं। ख़ास बात ये नहीं की फिल्म में एक मर्द घर सम्हाल रहा है, फिल्म में कई ख़ास मुद्दे हैं जिन्हें  छेड़ कर हमारे समाज की प्रचलित धारणाओं को बदलने की कोशिश की गयी है।

    1. अर्जुन एक गृहिणी को 'कामचोर' कहे जाने पर सख्त ऐतराज़ जताते हैं। अगर कोई प्रोफेशनल जीवन  से दूर रहकर अपनी मेहनत से एक घर को सजाती है, इसका मतलब ये नहीं की वह "घर पर बैठी है" घर के काम में शारीरिक मेहनत ज्यादा लगती है, और आप जितना जिम्मेदारी से घर सम्हालते हैं आपका घर, परिवार उतना ही उन्नति करता है, जैसे आप  की कंपनी की ग्रोथ में अपना सहयोग देते हैं, तभी वह उन्नति करती है ।

    2. अगर मर्द घर को सम्हाल रहा है तो उसे उसके लिए अपनी बीवी को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं है, उसे खाना बनाना और घर के काम करना पसंद है इसलिए वह करता है, वह अपनी बीवी पर कोई एहसान नहीं कर रहा है।

    3. संघर्ष मर्द या औरत का नहीं। कमाने वाला, और उसपर निर्भर घर चलाने वाले का है। जो कमाता है, समाज की नज़रों में वही लायक है। इसलिए अगर घर सम्हालने वाला एक क्षण के लिए लोगों की नज़रों में आ जाता है, तो कामयाब कमाने वाला जलने लगता है, उसपर निर्भर साथी की कामयाबी उससे बर्दाश्त नहीं होती। यह एक स्वाभाविक सी बात है पर यह बात इतने सहज तरीके से हमने कभी नहीं सोचा होगा।

    4. यह फिल्म इस प्रथा को ठुकराता है की औरत काम काजी  हो सकती है, लेकिन एक मर्द कभी काम छोड़ कर घर नहीं सम्हाल सकता। यहां एक औरत अपने पति से उसकी इंसानियत के लिए प्यार करती है, उसे अपनाती है, उसके पैसे या कर्म क्षेत्र में पोजीशन की वजह से नहीं। यह खुद में एक बहुत बड़ी प्रेरणा है।

     

    मैं ऊपर दिए गए लेख पर आती हूँ। जैसा मैंने कहाँ, घर के काम करने में कोई शर्म नहीं, सीखना हर किसी के लिए ज़रूरी है, चाहे वह मर्द हो या औरत। विदेश में काम वाली बाई नहीं मिलती, तो अगर आप नॉर्वे या नार्डिक जैसी जगह पर होंगे, तो आपको बाहर का खाना भी नसीब नहीं होगा, तब आपको इस कला की ज़रूरत पड़ सकती है। मैं खुद भी लेखिका हूँ, रिसर्च रिव्यु करती हूँ, कर्मरत हूँ, और फिर भी चीन और इटली के लज़ीज़ पकवान अच्छे से बना लेती हूँ। इससे मेरी समझदारी कम नहीं होती। मैं भी अपने पति के साथ राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक विषय पर चर्चा करती हूँ, विभिन्न तरह की किताबें पढ़ती हूँ। खाना बनाने में कोई शर्म नहीं, जो महिला गोल रोटी बना सकती है, वह ऑफिस जाने वाली महिला से किसी भी तरह से कम नहीं है। उसके लिए कोई भी और कला उतना ज़रूरी नहीं है। फोटोग्राफी, नृत्य इत्यादि के बगैर भी आपकी ज़िन्दगी चल जायेगी, लेकिन खाने के बगैर आप नहीं जी पाएंगे, घर साफ़ नहीं होगा, तो बीमार पड़ जाएंगे आप। तो ये काम ज़रूरी है जीने के लिए, तो इन्हें सीखने में ही समझदारी है, पुरुष हो या महिला।

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