कुल 169 लेख

  • 21 Apr
    Oyindrila Basu

    दुविधा की स्थिति में निर्णय कैसे लें ?

    दुविधा
     

    हम अक्सर ज़रूरी और सुविधाजनक के बीच चुनने से डरते हैं। हम अपने आसान और आरामदायक खोल से निकलना नहीं चाहते। हम जोखिम से डरते हैं। इन सबसे कभी कभी हम सिर्फ कन्फ्यूज्ड ही होते हैं, हमें पता नहीं होता कि क्या चाहिए। स्ट्रॉबेरी चाहिए या चॉकलेट, #फैन मूवी देखना है या #जंगल बुक, शायद इस वक़्त यही लोगों  की सबसे बड़ी दुविधा है:)

     

    खैर, अगर आप समस्या में हैं, तो कैसे उसका समाधान करके एक फैसला लेंगे?

    • खुद से पूछिए कि आप क्या चाहते हैं- कभी कभी हम एक ऐसा कार्य, नौकरी करने में जीवन बिता देते हैं, जिसमें हमारे करने, बढ़ने लायक कुछ नहीं होता, काम भी अच्छा नहीं होता, हम सिर्फ इसलिए काम कर रहे होते हैं कि हमें वेतन मिलता है। पर ऐसे में आप खुद से सवाल करें की आप आखिर क्या चाहते हैं? वही काम करें जो आपको पसंद है। सुविधा की चिंता ना करें। इससे फैसला लेने में सुविधा होगी। बाद में अफ़सोस नहीं होगा कि कोशिश क्यों नहीं की।

     

    • ज्यादा अनुकूल विकल्प को चुने और दुविधा मिटायें- चॉकलेट और स्ट्रॉबेरी में से जिस स्वाद की तरफ आपका ज्यादा झुकाव है उसे चुनें। फैन और जंगल बुक में से जिस फिल्म के शो का समय नज़दीक के मॉल में है उसे चुने तो दुविधा मिटेगी और आप एक फैसले पर पहुँच पाएंगे।

     

     

    • खुद से पूछें क्या आप आईने में अपनी शक्ल देख पाएंगे- कुछ अधिक पैसों के लिए अगर आप एक गलत टेंडर पास करने के बारे में सोचते हैं, तो आप में दुविधा होती है, नैतिकता को चुने या परिवार की खुशहाली। तब खुद से ये सवाल पूछें की ऐसा कार्य करके आप को क्या मानसिक शांति मिल पाएगी? ज़मीर के विरुद्ध जा कर कोई फैसला ना लें।

     

    • जब भी आपको सचेतन रूप से जोखिम लेने से डर लगे, तो याद रखें की गलतियों से ही इंसान आगे बढ़ता है- जन्म से कोई हर काम सही करना नहीं सीखता। आमिर खान जी ने भी जीवन की शुरुआत में  'आतंक ही  आतंक', ‘तुम मेरे हो' और 'मेला' जैसी फिल्में की थी, तभी आज वे Perfectionist हैं :) अपनी गलतियों से ही इंसान सीखता है और बेहतर बनता है। सोच समझ का इस्तमाल करें, लेकिन ज्यादा  सोचने से Confused हो जाएंगे। जो सही लगे फैसला लीजिए, गलत भी हुआ तो ठीक है।

     

    • दुविधा को दोस्तों के साथ बाटें- जनमत कभी कभी हमें और परेशान कर सकती है, लेकिन दोस्तों के अनुभव हमें ज़रूर काम आते हैं। जब आप फैसला ना ले पाएं, तो दोस्तों को आप के लिए फैसला लेने दें। छोटे फैसलों के लिए दिमाग और बड़े फैसलों के लिए दिल का इस्तमाल करें।

     

    • खुद से पूछें क्या आप किसी सही उद्देश्य से काम कर रहे है- हर काम का एक उद्देश्य होना ज़रूरी है। खुद की उन्नति या समाज की उन्नति के लिए हम काम करते हैं। खुद से पूछें आपका उद्देश्य क्या है, तो सही फैसला ले पाएंगे।

     

    • परेशानी को लिख कर उसका समाधान करें- अगर आप दुविधा में हैं, तो एक कागज़ पर आपकी चिंताओं को लिख कर व्यक्त करें। आप क्या चाहते हैं ये भी लिखें। और ऑप्शन को सामने रखें फिर उन पर टिक मार्क कर के फैसला लें।

     

    • दृढ़ता से फैसला करना भी एक आदत है- इसका अभ्यास करें, सही गलत को ठीक से समझें। इससे निर्णय लेना आसान हो जाएगा।

     

  • 19 Apr
    Janhavi Dwivedi

    मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के प्रकार और उनकी भूमिका

    Types of Mental Health Professionals and their roles

     

     

    मानसिक स्वास्थ्य एक जटिल विषय है, और इसे पूरी तरह से समझने के लिए समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। हमारे मन में विचारों की, भावनाओं की, और हमारे सामाजिक और भौतिक वातावरण की बहुत सी परतें होती हैं।

    आज हम  मुख्य मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक और उनकी भूमिका के बारे में बात करते हैं, जिनमें प्रमुख निम्न हैं।

    1.काउंसलर /थेरेपिस्ट :-

    ये प्रोफेशनल शायद सबसे ज्यादा अच्छी तरह से जाने जाते हैं।

    एक काउंसलर या थेरेपिस्ट ‘मनोविज्ञान’ या ‘मानव विकास’ विषय में प्रशिक्षित होते हैं, और काउंसलिंग के कौशल को सीख कर ये अपने इस ज्ञान को और बढ़ाते हैं।

    यह चर्चा का विषय होता है कि, क्या थेरेपिस्ट और काउंसलर का मतलब एक ही है, कुछ लोग ये कहते हैं कि, काउंसलिंग थोड़े समय के लिए और दैनिक जीवन की समस्याओं के लिए हो सकती है। जबकि थेरेपी लम्बे समय तक चलने वाली और  तेज प्रक्रिया है, जिसमे मन में गहराई तक जमी समस्याओं को देखा जाता है।

    2.क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट:-

    क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट ज्यादातर एक सीमा में मनोरोग का परीक्षण और उपचार करते हैं।

    वे परीक्षण और साइकोपैथोलॉजी में विशेष प्रशिक्षण लेते हैं। उनके क्लिनिक या हॉस्पिटल जैसी जगहों में काम करने की ज्यादा सम्भावना होती है।

    उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो अवसाद से पीड़ित है। वे उसके अवसाद का स्तर जानने के लिए टेस्ट करते हैं, और उसके आधार पर काउन्सलिंग की रुपरेखा बनाते हैं। जैसे नकारात्मक विचारों का आना, व्यवहार की सक्रियता आदि पर काम करना।

    3.मनोचिकित्सक:-

    मनोचिकित्सकों के पास मेडिकल ट्रेनिंग होती है। एमबीबीएस के बाद एमडी या उसके समकक्ष डिग्री। 

    वे मस्तिष्क और उसकी कार्यप्रणाली का विस्तृत अध्ययन करते हैं। साथ ही विभिन्न विकारों और मनोरोग दवाएं और इनसे क्या मदद मिलेगी के बारे में अध्ययन करते हैं।

    आदर्श रूप में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर के साथ मिलकर काम करते हैं, जिससे दोनों के विचारों से जैवरासायनिक(biochemistry) समस्याओं को हल किया जा सकता है। 

    4.स्पीच थेरेपिस्ट :-

     कुछ मानसिक समस्याओं में कार्य और स्पीच थेरेपी की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से जो बच्चों को प्रभावित करती हैं, जैसे,- ऑटिज़्म, ADHD और अन्य विकास के साथ होने वाले विकार।

    ये प्रोफेशनल्स बच्चे के finemotor और gross motor skill पर काम करते हैं,  जिससे बच्चा अपने अंगों और मांसपेशियों पर अधिक नियंत्रण करना सीख जाये और ADHD  की स्थिति में अधिक ऊर्जा का प्रबंधन भी कर सके।

    स्पीच थेरेपी मस्तिष्क के धीमे विकास के कारण भाषा और बोलचाल में उत्पन्न होने वाली समस्याओं से निपटने में मदद करता है।

    5.मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता:-

    मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता, मानसिक रोगियों को जॉब और आत्मसम्मान सहित उनके अधिकारों को पाने में मदद करते हैं।

    वे उन संगठनों को जानते हैं जो मानसिक रोगियों के साथ काम करते हैं, और उनकी मदद करते हैं।

    अक्सर, वे मनोरोगियों के परिवार से भी निपटते हैं, और उन्हें उनके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बारे में बताते हैं।

    6.मनोरोग नर्स:-

    वे उनकी देखभाल में मदद करती हैं, जो मानसिक रोग से बहुत ज्यादा ग्रस्त है, और कार्य नहीं कर सकते  या बिस्तर पर पडे है।  

    उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है,कि कैसे एक व्यक्ति जो मानसिक बीमारी से पीड़ित है की देखभाल करें।

    7.कपल और फैमिली थेरेपिस्ट :-

    ये थेरेपिस्ट, कपल और फैमिली के साथ आपसी व्यवहार और उनकी सीमाओं पर काम करते हैं।

    वे किसी व्यक्ति को बीमार के तौर पर नहीं देखते, बल्कि वे इसमें उनके सिस्टम की गलती को समझते हैं, और हर व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए सिस्टम को अंदर से बदलने की कोशिश करते हैं।

    8.न्यूरो साइकोलॉजिस्ट :-

    ये प्रोफेशनल्स याददाश्त में कमी या समन्वय की समस्या होने पर कार्य करते हैं।

    ये स्मृति और समन्वय का परीक्षण करते हैं, और फिर इस समस्या को हल करने में मदद करते हैं।

    ये मस्तिष्क में चोट लगने, विक्षिप्तावस्था, पर्किंसंस अल्जाइमर्स आदि मनोरोग पर काम करते हैं।

  • 17 Apr
    Oyindrila Basu

    लोगों से बात करने में नजर मिलाने का महत्व self improvement in hindi

    eye contact

     

    जब भी दो या अधिक लोग आपस में बातें करतें हैं तो शब्दों के अलावा भी कुछ बातें बिना बोले भी कह दी जातीं हैं। बिन बोले भाषा में शारीरिक भाव,चेहरे के भाव ,बोलने का लहजा, आवाज का भारीपन और आवाज के दूसरे गुण शामिल हैं

    ये बिना बोले समझी जाने वाली  भाषा अक्सर हमें ये संकेत देती है कि बोलने वाला सच बोल रहा है या उसकी बातें विश्वास योग्य है या नही।

    उदाहरण के लिए किसी दुखद घटना को बताते समय यदि कोई मुस्कुराता है तो यह मेल नही करता, और उसकी बातों पर सावधानी से विश्वास करना चाहिए।

    हम कैसे अपने वातावरण के साथ प्रतिक्रिया करते हैं इसमें हमारी नजरें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। :-

    मानव शुरुआत से ही प्रकृति को देखकर समझने का आदि रहा है। चूँकि प्रकाश की चाल ध्वनि की चाल से  अधिक होती है, इसलिए दिखने वाली सूचनाएं मस्तिष्क में पहले पहुंचती हैं, और सुनने योग्य सूचनाएं बाद में। हम कैसे अपने आस -पास के वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं इसमें हमारी आँखों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

    नजरें मिलाकर बात करने का मतलब है कि बोलने  वाले की बातों को ध्यान से सुना जा रहा है।

    कोई भी मौका हो चाहे कोई इंटरव्यू हो या किसी दोस्त या परिवार के सदस्य के साथ बातचीत हो या कोई डेटिंग हो यदि आँखों का उचित सम्पर्क नहीं होता तो बातों का प्रभाव अच्छा नही पड़ता।

    आवेश में या घबराहट में लोग की आँखे तनी हुए या नजर ना मिलाने वाली होती हैं।

    तनी हुई नजरें :-तनी हुई नजरों का मतलब एकटक देखना या घूरना हो सकता है। जब कोई इन नजरों से बोलने वाले की ओर देखता है तो उसे लगता है कि जानबूझ कर ऐसा किया जा रहा है और वह सावधान हो जाता है, इन नजरों से उसे असुविधा होती है। कभी कभी ऊँचे पदों के अधिकारी अपने जूनियर को किसी स्थिति में धमकाने के लिए इस प्रकार की नजरों का प्रयोग करते हैं।

    अस्थिर नजरें :- जब सुनने वाला बोलने वाले की ओर देखते समय अगले ही पल किसी और तरफ देखने लगे और ये बार बार हो, तो  इसे अस्थिर नजर कहते हैं। इस प्रकार की नजरें बहुत ही परेशान करने वाली होती हैं, क्योंकि इससे बोलने वाले का ध्यान भंग होता है, और विचार करने और बोलने में बाधा होती है। अक्सर झूठ बोलते समय भी लोग सामने वाले से नजर नहीं  मिला पाते। कभी कभी इस प्रकार की नजरों से उनका झूठ ना पकड़ लिया जाये इसलिए वे घूरने वाली नजरों से देखने लगते हैं ताकि लोगों को लगे कि वह  सच बोल रहा है। इस प्रकार की नजरें अस्वाभाविक होती हैं।

    स्वाभाविक नजरें :-जब नजरें कोमलता के साथ सुनने वाले की ओर केंद्रित हों तो उन्हें स्वाभाविक नजरें कहा जाता है। हमारी सभ्यता के विकास के साथ ही यह हमसे जुडी है ,क्योकि नजर मिलाने के तरीके से ही हमारे पूर्वज यह पता लगा लेते थे कि सामने वाली जनजाति के लोग विश्वास योग्य हैं या नही। जनजातियों के बीच  नजरें आपसी प्रभाव के स्तर को बताने में मदद करती थीं जैसे जनजाति के प्रधान की नजरों से कोई भी नजरें नहीं मिला सकता था।

    वीडियो चैटिंग का महत्व :-

    नजदीकी रिश्तों के लिए दिन में एक बार फेस टू फेस बात करना जरूरी होता है, इससे रिश्तों में विश्वास और निकटता बनी रहती है। इसलिए दूर बैठे प्रियजनों से बात करने के लिए वीडियो चैटिंग अच्छा विकल्प हो सकता है।

  • 17 Apr
    Oyindrila Basu

    क्या किसी दुखद घटना के बाद दुखी होना ठीक है?

    5 stages of loss and grief


    दुःख और तकलीफ हर इंसान के जीवन का हिस्सा होता है। किसी अपने की मृत्यु पर हम शोक मनाते हैं, कुछ अहम खो जाता है, तो हम उस नुकसान पर दुःख प्रकट करते हैं। दुःख या शोक तो आएगा जरूर, इससे कोई बच नहीं सकता। लेकिन कभी कभी अज्ञानतावश या अनजाने में हमारे पास उस शोक को समझने का वक़्त नहीं होता, जिसके कारण हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
    तो आइये जानते हैं कि कौन से वो चरण हैं जिन्हे जानना हम सबके लिए बेहद जरूरी है ।

    1. Denial-यानी दुःख को नकारना। किसी भी दुखद घटना के बाद हम गहरे सदमे में होते हैं, और सच को स्वीकार नहीं कर पातें। हम गुमसुम हो जाते हैं, चुप्पी साध लेते है, यकीन नहीं होता कि घटना घटी है। इस स्थिति में हम सबसे खुद को दूर कर लेते हैं, ताकि कोई हमें हमारे नुकसान की याद ना दिला पाये।

    2. Anger-यानी गुस्सा। ये दूसरा पहलू है, जब हमें परिस्थिति पर गुस्सा आता है। हम नाकाम हैं, इस बात पर गुस्सा आता है, अब नुकसान कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता, गयी हुयी चीज़ वापस नहीं आ सकती इस बात पर क्रोध होता है। पर यह चरण ज़रूरी है। गुस्से के बाहर आने से जज़्बाती विकास होता है, और मन थोड़ा हल्का होता है। गुस्से को दबाने से बाद में गहरी मानसिक समस्या हो सकती है।

    3. Bargaining-सौदेबाजी- जब कोई हमसे बिछड़ने वाला होता है, तब हम भगवन से सौदा करते हैं। "हे भगवन अब मैं कभी भी गुस्सा नहीं करूँगा, किसी से नहीं लड़ूंगा, प्लीज मेरी पत्नी को अच्छा कर दीजिये", लेकिन जब कोई भयानक नुकसान हो ही जाता है, तब हम खुद को सच्चाई से दूर रखने के लिए सौदा करते हैं, "हे भगवन मैं आपकी हर बात मानूंगा, ये सब एक बुरा सपना हो यही कामना करता हूँ" इससे मन को कुछ देर के लिए आशा मिलती है, जो असल में एक झूठ होता है।

    4. Depression- निराश के इस क्षण में इंसान को मालूम होता है की अब कुछ ठीक नहीं हो सकता, और हार मान कर वह गम में डूब जाता है। सब कुछ उसे खाली सा लगता है, अब जीने का कोई मतलब नहीं ऐसा सोचने लगता है। खाना छोड़ देता है, सोने जाता है तो उठना नहीं चाहता। खालीपन ही ज़िन्दगी हो जाती है।

    5. Acceptance- इस चरण में इंसान सच्चाई को स्वीकार लेता है। एक दुखद घटना घटी है, वह इंसान या चीज़ अब वापस नहीं आएगी, हम इस बात को मान लेता है। इसका या मतलब नहीं की वह ठीक है। अभी तो सिर्फ ठीक होने के लक्षण नज़र आते हैं। दिल्ली अभी दूर है। सच को मान कर आगे बढ़ने की कोशिश जारी रहती है।

    तो शोक का पालन करने में कोई कमज़ोरी नहीं। इन 5 चरण से गुज़र कर ही आप स्वस्थ हो सकते हैं। अभी कमज़ोर पड़िए, जी भर के रो लीजिए, ताकि भविष्य में आप मन से और ज्यादा मज़बूत हो पाएं।

  • 16 Apr
    Oyindrila Basu

    10 वाक्य जो आपके चिंतित बच्चे को राहत दिला सकते  हैं ।


    anxious child
    ना सिर्फ बड़ों के लिए बल्कि बच्चों के लिए भी चिंता या एंग्जायटी परेशानी का कारण बन सकता है। बच्चे चिंता से ज्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे अपने स्कूल, सुरक्षा, पढ़ाई और परीक्षा के बारे में अधिक चिंतित होते हैं।
    पर अगर आपका बच्चा परेशान या डरा हुआ है, तो उसकी मानसिक पीड़ा को कैसे दूर करेंगे, ये आपको मालूम होना चाहिए।
    क्षणिक रूप से उसको फर्स्ट ऐड देना आपका कर्तव्य है।
    कुछ सामान्य वाक्य या शब्द भी आपके बच्चे को राहत पहुंचा सकते हैं।


    1. "गलतियां करना ठीक है, हमेशा सही होना ज़रूरी नहीं"- अपने बच्चे को बताएं अपूर्ण होना कोई बड़ा जुर्म नहीं है। आप हमेशा अव्वल आएं ये ज़रूरी नहीं; कुछ काम में आप हार भी सकते हैं, लेकिन अपनी गलतियों से सीख कर आगे बढ़ना ही सही है।

    2. "मैं यही हूँ, तुम सुरक्षित हो, बिल्कुल फ़िक्र मत करो"- अगर आपका बच्चा चिंतित है, डरा हुआ है, किसी चीज़ को लेकर परेशान है, तो उसे ये यकीन दिलाएं कि आप उसके साथ हैं; हर मुसीबत में आप उसकी सहायता करेंगे। वह अकेला नहीं है, आप हैं उसकी सुरक्षा के लिए, ये भरोसा दिलाइये। इससे बच्चा शांत हो जाएगा।

    3. "मेरे साथ अपनी समस्या को शेयर करो"- आप उसके दोस्त बनें। आपका बच्चा आपको हर बात, हर समस्या बता पाये, ऐसा सम्पर्क बनाएं। अपनी मुश्किल आपके साथ बांटने के लिए आप उसे प्रोत्साहित करें। बात बताने से चिंता, डर काफी हद तक कम हो जाता है।

    4. "गुब्बारे फुलाने की कोशिश करो"- टेंशन और एंग्जायटी में आपका बच्चा लम्बी सांस लेने से इनकार करेगा, उसे लगेगा की वह नहीं कर पाएगा, इसलिए उसे खेल की तरह समझाएं। गुब्बारे फुलाने को कहें, अगर गुब्बारा सामने नहीं है तो, झूठ मूठ उसे एक्टिंग करने को कहें, ताकि वह लम्बी सांस भर सखे, इससे मानसिक रूप से उसे काफी राहत मिलती है।

    5. "राक्षस को अपने अंदर से भगा दो"- चिंता को एक राक्षस या डायन का रूप दे कर अपने बच्चे को उस पर विजय पाने के लिए प्रोत्साहित करें। बच्चे देवता, राजा और राक्षस की कहानियों से काफी प्रभावित होते हैं। अगर आप उसे बताएँगे कि उसका डर एक राक्षस है जिसे हराना है, तो वह खुद कोशिश करेगा कि अपने चिंता रुपी राक्षस से मुक्त हो सके।

    6. "अपने डर को अंकित करके उसका एक चित्र बनाओ"- उसके डर या को मुक्त करने के लिए उसका बाहर आना ज़रूरी है, और चित्र बनाने से ध्यान उस कारीगरी पर होगा, तो परेशानी वाली चिंता दूर हो जाएगी ।

    7. "ये जल्द भाग जाएगा, तब तक आराम करो"- आराम मिलने की सम्भावना से चिंता कम हो जाती है, दिमाग को काफी सुकून मिलता है।

    8. "आज तुमने जो भी अच्छा किया है सब बताओ"- अगर आपका बच्चा परेशान है, तो उसे अच्छी चीज़ें याद दिलाइये। दिन में उसने क्या अच्छा किया है, उसे क्या अच्छा लगा है, क्या अच्छा मिला है। जब वह ये सब बताने लगेगा, तो उसमें सकारात्मक भाव आएगा, और चिंता कम हो जाएगा।


    9. "तुम्हारी समस्या तो कुछ भी नहीं, मैं जब स्कूल में थी तो इससे ज्यादा मुश्किलों में पड़ती थी"- उसकी समस्या की गम्भीरता को कम करने के लिए, अपनी कोई बचपन की समस्या बताएं जो और गम्भीर हो, इससे उसकी परेशानी घटेगी, वह चिंता मुक्त होगा ये सोचकर की समस्या उतनी भी गहरी नहीं है।

    10. "तुम डरे हुए हो, अच्छा है, चलो इस डर के बारे में और जानते हैं"- उसकी डर और परेशानी के बारे में उससे सवाल करें, बच्चे को डर का सामना करना सिखाइए। जब वह जवाब देगा, तब वह असल में अपनी चिंताओं को बातचीत के द्वारा जाहिर कर रहा होगा, और इस प्रकार उसकी चिंताएं दिमाग से बाहर आ जायेगी।

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