कुल 169 लेख

  • 24 Apr
    Oyindrila Basu

    ज्यादातर टीनेजर ही क्यों निराशा के शिकार होते हैं?

    teenager and depression

     

    यह आम तौर पर कहना जायज़ नहीं होगा, लेकिन मानसिक समस्याओं के शिकार टीनेजर बच्चे अधिक संख्या में होते हैं।

    लेकिन इसकी वजह क्या है? क्या वे निराशा की चपेट में ज्यादा आते हैं? पर क्यों?

    • टीनएज बचपन से जवानी के बीच का पड़ाव है- यह ऐसी एक बीच की स्थिति है, जहां मानसिकता में परिवर्तन आता है। हम दुनिया की ओर अकेले बढ़ने लगते हैं, हर चीज़ को पास से महसूस करते हैं, और नई चीज़ें सीखते हैं। ऐसे में इस परिवर्तन को स्वीकारना कठिन होता है। हर रास्ता आसान नहीं होता, पर अकेले ही पार करना होता है। सही तरह से सम्हाल ना पाने की वजह से निराशा हो सकती है।
    • अभिभावक परवाह कम करते हैं- टीनएज में माता-पिता बच्चों को ढील देने लगते हैं, उन्हें अकेले चलना सिखाते हैं, बच्चे में भी बेपरवाह सा स्वभाव पैदा होता है। वह परिवार से कट कर नई चीज़ों की पाना चाहता है। लेकिन इस प्रकार कभी कभी वे दुविधा में पड़ जाते हैं। अपनी पहचान पर कंफ्यूज हो जाते हैं, क्या सही है क्या गलत नहीं समझ पाते और निराश हो जाते हैं।
    • बच्चों पर पढ़ाई का बहुत प्रेशर होता है- टीनएज में आजकल बच्चों पर पढ़ाई का अधिक प्रेशर होता है। कई सब्जेक्ट्स और उस पर पढ़ाई, फिर ट्युसन, टेस्ट, परीक्षा इत्यादि से बच्चा थक जाता है लेकिन जूझता रहता है। इससे मानसिक विकास पर असर होता है। यह भी निराशा का कारण है।
    • अधिक उम्मीदों से परेशानी होती है- आजकल के बच्चों पर अव्वल आने का जूनून हमेशा होता है। प्रतिद्वद्विता इतनी बढ़ चुकी है, कि माता-पिता, दोस्तों और रिश्तेदारों की उम्मीदों का बोझ बच्चे पर ही आता है। मानसिक तनाव तो होता ही है, लेकिन उन उम्मीदों से अगर बच्चा पीछे रह जाए तो खुद ही निराश हो जाता है।
    • बाहरी चीज़ों से मन विचलित होता है - इस उम्र में दुनिया की अच्छी बुरी चीज़ों के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है। नशा, अड्डा, दोस्त, नई आदत, सब नव युवक को प्रभावित करती हैं , ऐसे में सही-गलत का फैसला करना मुश्किल होता है। इंसान अपनी कमज़ोरियों से विचलित हो कर निराश हो जाता है।
    • टीनएज बच्चों की कई समस्या होती है - इस उम्र में नई चीज़ों के साथ साथ नई समस्या भी आती हैं। सब कुछ एक उपलब्धि है। बच्चों की ऐसी कई समस्या होती हैं, जो वे घरवालों को बता नहीं पातें। अपने आप में परेशान होते हैं और डिप्रेशन में चले जाते हैं।
    • इस प्रकार निराश का वैज्ञानिक कारण भी है - टीनएज में डी सी सी नामक जीन के कार्यक्रम में गड़बड़ी से दिमाग के प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स पर गहरा असर होता है, और क्योंकि ये हिस्सा, अधिक व्यवहारिक कार्यों के लिए ज़िम्मेदार है, इसलिए इस पर कुछ भी बदलाव होने से मानसिक स्वास्थ्य पर असर होता है। जिससे व्यवहार परिवर्तन होता है ।

     

    टीनएज बच्चों के माता-पिता और शिक्षकों की ज़िम्मेदारी है कि वे उनसे दोस्ती का रिश्ता बनाएं, जिससे उन्हें उनकी समस्याओं का ज्ञान हो सके।

  • 23 Apr
    Oyindrila Basu

    सामाजिक गपशप से व्यवसाय वृद्धि कैसे करेंगे?

    word of mouth

     

    Word Of Mouth या सामाजिक गपशप व्यवसाय में कोई नई बात नहीं है, लेकिन ये सामाजिक गपशप का मतलब है सिर्फ अपने परिचित लोगों में अनौपचारिक रूप से किसी विषय पर चर्चा करना। जिसे हम गपशप कहते हैं, ये गपशप बड़े ही काम की चीज़ है, इसके माध्यम से हम अकसर काफी ज़रूरी जानकारी  बांटते हैं।

    जैसे अगर आप किसी ब्यूटी पार्लर में गए, और वहां के परिचर्चा से अति प्रसन्न हुए, तो आप खुश हो कर इस बात को अपने दोस्तों में भी बांटना चाहेंगे। जब भी आपके दोस्त आपके नए रूप से प्रभावित हो कर आपकी प्रशंसा करेंगे, तब आप उस पार्लर या सैलून के बारे में चर्चा करेंगे, उसकी प्रशंसा करेंगे, उनके व्यवहार की प्रशंसा करेंगे जो आपकी खूबसूरती के लिए ज़िम्मेदार हैं। इस प्रकार से आप उस व्यवसाय का प्रचार कर रहे हैं, और उनकी ग्राहक वृद्धि में भी सहायता कर रहे हैं।

    रिसर्च द्वारा ये साबित हुआ है क़ि मुंह ज़बानी इंसान के मस्तिष्क में एक विशेष उत्तेजक सूचना के कारण होता है। जिस विषय पर आप ज्ञान बाँट रहे हैं, उसके नाम से ही आपके  ह्रदय में   कम्पन बढ़ जाता है, सांस जोर से चलती है, और आप खुद में एक विशेष प्रेरणा महसूस करते हैं।

    मानसिक तौर पर, हम अगर किसी चीज़ से प्रभावित होते हैं, तो हम उस अनुभूति की चर्चा करना चाहते हैं, क्योंकि हम सामाजिक जीव हैं।

    मनोवैज्ञानिक बर्जर Berger इसी माध्यम को सब से उपयुक्त बताते हैं।

    इसके कई कारण हैं -

    1. हम अपनी अनुभूति बताते हैं क्योंकि हम खुद को समाज में ग्यानी साबित करना चाहते हैं; अपने दोस्तों में बातचीत के दौरान, खुद को अधिक समझदार साबित करना चाहते हैं।
    2. हम खुद को किसी दोस्त की मदद करने के आनंद से दूर नहीं रख पातें।
    3. अगर हमें कुछ पसंद आया है, तो हम तुरंत उसे बताना चाहते हैं, क्योंकि पेट में बात नहीं पचती। :)

     

    पर ये अच्छी भावना किसी भी दुकान या सामान के बारे में तब तक रहती है, जब तक उसके विक्रेता हमसे हमारी अनुभव चर्चा करने के लिए अनुरोध ना करें।

    जब तक हम अपने मन से चर्चा करते हैं तब तक सब अच्छा लगता है, दूसरे की अनुरोध से हम क्रोधित हो जाते हैं।

    एक अच्छे व्यवसायी को पता होना चाहिए कि ग्राहक की मुंह ज़बानी को कैसे इस्तेमाल किया जाए।

    • वितरण से ही बातचीत पनपती है- अपने सामान या कंपनी को रोचक रूप से पेश करें ताकि ग्राहक उसके बारे में बात करने के लिए मजबूर हो। बहुत अच्छी या बहुत बड़ी बातों का प्रचार करें ताकि आपकी चीज़ नज़र में आये। ऐसे ही चेतन भगत जी की किताबें भी मशहूर होती हैं। कुछ उनकी किताब को बकवास मानते हैं, लेकिन आलोचक उन्हें बेस्ट सेलर बनाते हैं, तो आप एक ग्राहक के रूप में एक बार तो वह किताब खरीदेंगे ही, जानने के लिए की आखिर सच क्या है।
    • ग्राहक की ज़रूरतों को समझिए- अपने मत से ज़्यादा अपने खरीददारों की इच्छा पर ध्यान दें। उन्हें संतुष्ट करना अधिक ज़रूरी है, तभी आपके सामान की चर्चा होगी।
    • अगर सामान का प्रचार करना है, तो उसके प्रचार के बारे में अधिक ना सोचें- लोगों के दरवाजे खटखटाना आज के दिन में अच्छी बात नहीं। अपनी वस्तु के प्रचार के लिए किसी से बिनती करना, या फिर अनुरोध करने से कुछ नहीं होता, बल्कि इसका उलटा प्रभाव पड़ता है। अपने आप ग्राहक को अपनी सामाजिक गपशप का इस्तेमाल करने दीजिये।
    • नई तकनीकों का इस्तेमाल करें- आज कंप्यूटर से हम लोगों के और करीब आ गए हैं। इस माध्यम का सही इस्तेमाल करें, अपनी वस्तु के प्रचार के लिए।

    इससे लोगों में खबर जल्द फैलेगी। एक ग्राहक को फायदा होगा तो वे अपने दोस्तों को बताएंगे।

    तो गपशप से व्यवसाय को काफी फायदा हो सकता है।

  • 21 Apr
    Oyindrila Basu

    दुविधा की स्थिति में निर्णय कैसे लें ?

    दुविधा
     

    हम अक्सर ज़रूरी और सुविधाजनक के बीच चुनने से डरते हैं। हम अपने आसान और आरामदायक खोल से निकलना नहीं चाहते। हम जोखिम से डरते हैं। इन सबसे कभी कभी हम सिर्फ कन्फ्यूज्ड ही होते हैं, हमें पता नहीं होता कि क्या चाहिए। स्ट्रॉबेरी चाहिए या चॉकलेट, #फैन मूवी देखना है या #जंगल बुक, शायद इस वक़्त यही लोगों  की सबसे बड़ी दुविधा है:)

     

    खैर, अगर आप समस्या में हैं, तो कैसे उसका समाधान करके एक फैसला लेंगे?

    • खुद से पूछिए कि आप क्या चाहते हैं- कभी कभी हम एक ऐसा कार्य, नौकरी करने में जीवन बिता देते हैं, जिसमें हमारे करने, बढ़ने लायक कुछ नहीं होता, काम भी अच्छा नहीं होता, हम सिर्फ इसलिए काम कर रहे होते हैं कि हमें वेतन मिलता है। पर ऐसे में आप खुद से सवाल करें की आप आखिर क्या चाहते हैं? वही काम करें जो आपको पसंद है। सुविधा की चिंता ना करें। इससे फैसला लेने में सुविधा होगी। बाद में अफ़सोस नहीं होगा कि कोशिश क्यों नहीं की।

     

    • ज्यादा अनुकूल विकल्प को चुने और दुविधा मिटायें- चॉकलेट और स्ट्रॉबेरी में से जिस स्वाद की तरफ आपका ज्यादा झुकाव है उसे चुनें। फैन और जंगल बुक में से जिस फिल्म के शो का समय नज़दीक के मॉल में है उसे चुने तो दुविधा मिटेगी और आप एक फैसले पर पहुँच पाएंगे।

     

     

    • खुद से पूछें क्या आप आईने में अपनी शक्ल देख पाएंगे- कुछ अधिक पैसों के लिए अगर आप एक गलत टेंडर पास करने के बारे में सोचते हैं, तो आप में दुविधा होती है, नैतिकता को चुने या परिवार की खुशहाली। तब खुद से ये सवाल पूछें की ऐसा कार्य करके आप को क्या मानसिक शांति मिल पाएगी? ज़मीर के विरुद्ध जा कर कोई फैसला ना लें।

     

    • जब भी आपको सचेतन रूप से जोखिम लेने से डर लगे, तो याद रखें की गलतियों से ही इंसान आगे बढ़ता है- जन्म से कोई हर काम सही करना नहीं सीखता। आमिर खान जी ने भी जीवन की शुरुआत में  'आतंक ही  आतंक', ‘तुम मेरे हो' और 'मेला' जैसी फिल्में की थी, तभी आज वे Perfectionist हैं :) अपनी गलतियों से ही इंसान सीखता है और बेहतर बनता है। सोच समझ का इस्तमाल करें, लेकिन ज्यादा  सोचने से Confused हो जाएंगे। जो सही लगे फैसला लीजिए, गलत भी हुआ तो ठीक है।

     

    • दुविधा को दोस्तों के साथ बाटें- जनमत कभी कभी हमें और परेशान कर सकती है, लेकिन दोस्तों के अनुभव हमें ज़रूर काम आते हैं। जब आप फैसला ना ले पाएं, तो दोस्तों को आप के लिए फैसला लेने दें। छोटे फैसलों के लिए दिमाग और बड़े फैसलों के लिए दिल का इस्तमाल करें।

     

    • खुद से पूछें क्या आप किसी सही उद्देश्य से काम कर रहे है- हर काम का एक उद्देश्य होना ज़रूरी है। खुद की उन्नति या समाज की उन्नति के लिए हम काम करते हैं। खुद से पूछें आपका उद्देश्य क्या है, तो सही फैसला ले पाएंगे।

     

    • परेशानी को लिख कर उसका समाधान करें- अगर आप दुविधा में हैं, तो एक कागज़ पर आपकी चिंताओं को लिख कर व्यक्त करें। आप क्या चाहते हैं ये भी लिखें। और ऑप्शन को सामने रखें फिर उन पर टिक मार्क कर के फैसला लें।

     

    • दृढ़ता से फैसला करना भी एक आदत है- इसका अभ्यास करें, सही गलत को ठीक से समझें। इससे निर्णय लेना आसान हो जाएगा।

     

  • 19 Apr
    Janhavi Dwivedi

    मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के प्रकार और उनकी भूमिका

    Types of Mental Health Professionals and their roles

     

     

    मानसिक स्वास्थ्य एक जटिल विषय है, और इसे पूरी तरह से समझने के लिए समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। हमारे मन में विचारों की, भावनाओं की, और हमारे सामाजिक और भौतिक वातावरण की बहुत सी परतें होती हैं।

    आज हम  मुख्य मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक और उनकी भूमिका के बारे में बात करते हैं, जिनमें प्रमुख निम्न हैं।

    1.काउंसलर /थेरेपिस्ट :-

    ये प्रोफेशनल शायद सबसे ज्यादा अच्छी तरह से जाने जाते हैं।

    एक काउंसलर या थेरेपिस्ट ‘मनोविज्ञान’ या ‘मानव विकास’ विषय में प्रशिक्षित होते हैं, और काउंसलिंग के कौशल को सीख कर ये अपने इस ज्ञान को और बढ़ाते हैं।

    यह चर्चा का विषय होता है कि, क्या थेरेपिस्ट और काउंसलर का मतलब एक ही है, कुछ लोग ये कहते हैं कि, काउंसलिंग थोड़े समय के लिए और दैनिक जीवन की समस्याओं के लिए हो सकती है। जबकि थेरेपी लम्बे समय तक चलने वाली और  तेज प्रक्रिया है, जिसमे मन में गहराई तक जमी समस्याओं को देखा जाता है।

    2.क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट:-

    क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट ज्यादातर एक सीमा में मनोरोग का परीक्षण और उपचार करते हैं।

    वे परीक्षण और साइकोपैथोलॉजी में विशेष प्रशिक्षण लेते हैं। उनके क्लिनिक या हॉस्पिटल जैसी जगहों में काम करने की ज्यादा सम्भावना होती है।

    उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो अवसाद से पीड़ित है। वे उसके अवसाद का स्तर जानने के लिए टेस्ट करते हैं, और उसके आधार पर काउन्सलिंग की रुपरेखा बनाते हैं। जैसे नकारात्मक विचारों का आना, व्यवहार की सक्रियता आदि पर काम करना।

    3.मनोचिकित्सक:-

    मनोचिकित्सकों के पास मेडिकल ट्रेनिंग होती है। एमबीबीएस के बाद एमडी या उसके समकक्ष डिग्री। 

    वे मस्तिष्क और उसकी कार्यप्रणाली का विस्तृत अध्ययन करते हैं। साथ ही विभिन्न विकारों और मनोरोग दवाएं और इनसे क्या मदद मिलेगी के बारे में अध्ययन करते हैं।

    आदर्श रूप में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर के साथ मिलकर काम करते हैं, जिससे दोनों के विचारों से जैवरासायनिक(biochemistry) समस्याओं को हल किया जा सकता है। 

    4.स्पीच थेरेपिस्ट :-

     कुछ मानसिक समस्याओं में कार्य और स्पीच थेरेपी की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से जो बच्चों को प्रभावित करती हैं, जैसे,- ऑटिज़्म, ADHD और अन्य विकास के साथ होने वाले विकार।

    ये प्रोफेशनल्स बच्चे के finemotor और gross motor skill पर काम करते हैं,  जिससे बच्चा अपने अंगों और मांसपेशियों पर अधिक नियंत्रण करना सीख जाये और ADHD  की स्थिति में अधिक ऊर्जा का प्रबंधन भी कर सके।

    स्पीच थेरेपी मस्तिष्क के धीमे विकास के कारण भाषा और बोलचाल में उत्पन्न होने वाली समस्याओं से निपटने में मदद करता है।

    5.मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता:-

    मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता, मानसिक रोगियों को जॉब और आत्मसम्मान सहित उनके अधिकारों को पाने में मदद करते हैं।

    वे उन संगठनों को जानते हैं जो मानसिक रोगियों के साथ काम करते हैं, और उनकी मदद करते हैं।

    अक्सर, वे मनोरोगियों के परिवार से भी निपटते हैं, और उन्हें उनके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बारे में बताते हैं।

    6.मनोरोग नर्स:-

    वे उनकी देखभाल में मदद करती हैं, जो मानसिक रोग से बहुत ज्यादा ग्रस्त है, और कार्य नहीं कर सकते  या बिस्तर पर पडे है।  

    उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है,कि कैसे एक व्यक्ति जो मानसिक बीमारी से पीड़ित है की देखभाल करें।

    7.कपल और फैमिली थेरेपिस्ट :-

    ये थेरेपिस्ट, कपल और फैमिली के साथ आपसी व्यवहार और उनकी सीमाओं पर काम करते हैं।

    वे किसी व्यक्ति को बीमार के तौर पर नहीं देखते, बल्कि वे इसमें उनके सिस्टम की गलती को समझते हैं, और हर व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए सिस्टम को अंदर से बदलने की कोशिश करते हैं।

    8.न्यूरो साइकोलॉजिस्ट :-

    ये प्रोफेशनल्स याददाश्त में कमी या समन्वय की समस्या होने पर कार्य करते हैं।

    ये स्मृति और समन्वय का परीक्षण करते हैं, और फिर इस समस्या को हल करने में मदद करते हैं।

    ये मस्तिष्क में चोट लगने, विक्षिप्तावस्था, पर्किंसंस अल्जाइमर्स आदि मनोरोग पर काम करते हैं।

  • 17 Apr
    Oyindrila Basu

    लोगों से बात करने में नजर मिलाने का महत्व self improvement in hindi

    eye contact

     

    जब भी दो या अधिक लोग आपस में बातें करतें हैं तो शब्दों के अलावा भी कुछ बातें बिना बोले भी कह दी जातीं हैं। बिन बोले भाषा में शारीरिक भाव,चेहरे के भाव ,बोलने का लहजा, आवाज का भारीपन और आवाज के दूसरे गुण शामिल हैं

    ये बिना बोले समझी जाने वाली  भाषा अक्सर हमें ये संकेत देती है कि बोलने वाला सच बोल रहा है या उसकी बातें विश्वास योग्य है या नही।

    उदाहरण के लिए किसी दुखद घटना को बताते समय यदि कोई मुस्कुराता है तो यह मेल नही करता, और उसकी बातों पर सावधानी से विश्वास करना चाहिए।

    हम कैसे अपने वातावरण के साथ प्रतिक्रिया करते हैं इसमें हमारी नजरें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। :-

    मानव शुरुआत से ही प्रकृति को देखकर समझने का आदि रहा है। चूँकि प्रकाश की चाल ध्वनि की चाल से  अधिक होती है, इसलिए दिखने वाली सूचनाएं मस्तिष्क में पहले पहुंचती हैं, और सुनने योग्य सूचनाएं बाद में। हम कैसे अपने आस -पास के वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं इसमें हमारी आँखों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

    नजरें मिलाकर बात करने का मतलब है कि बोलने  वाले की बातों को ध्यान से सुना जा रहा है।

    कोई भी मौका हो चाहे कोई इंटरव्यू हो या किसी दोस्त या परिवार के सदस्य के साथ बातचीत हो या कोई डेटिंग हो यदि आँखों का उचित सम्पर्क नहीं होता तो बातों का प्रभाव अच्छा नही पड़ता।

    आवेश में या घबराहट में लोग की आँखे तनी हुए या नजर ना मिलाने वाली होती हैं।

    तनी हुई नजरें :-तनी हुई नजरों का मतलब एकटक देखना या घूरना हो सकता है। जब कोई इन नजरों से बोलने वाले की ओर देखता है तो उसे लगता है कि जानबूझ कर ऐसा किया जा रहा है और वह सावधान हो जाता है, इन नजरों से उसे असुविधा होती है। कभी कभी ऊँचे पदों के अधिकारी अपने जूनियर को किसी स्थिति में धमकाने के लिए इस प्रकार की नजरों का प्रयोग करते हैं।

    अस्थिर नजरें :- जब सुनने वाला बोलने वाले की ओर देखते समय अगले ही पल किसी और तरफ देखने लगे और ये बार बार हो, तो  इसे अस्थिर नजर कहते हैं। इस प्रकार की नजरें बहुत ही परेशान करने वाली होती हैं, क्योंकि इससे बोलने वाले का ध्यान भंग होता है, और विचार करने और बोलने में बाधा होती है। अक्सर झूठ बोलते समय भी लोग सामने वाले से नजर नहीं  मिला पाते। कभी कभी इस प्रकार की नजरों से उनका झूठ ना पकड़ लिया जाये इसलिए वे घूरने वाली नजरों से देखने लगते हैं ताकि लोगों को लगे कि वह  सच बोल रहा है। इस प्रकार की नजरें अस्वाभाविक होती हैं।

    स्वाभाविक नजरें :-जब नजरें कोमलता के साथ सुनने वाले की ओर केंद्रित हों तो उन्हें स्वाभाविक नजरें कहा जाता है। हमारी सभ्यता के विकास के साथ ही यह हमसे जुडी है ,क्योकि नजर मिलाने के तरीके से ही हमारे पूर्वज यह पता लगा लेते थे कि सामने वाली जनजाति के लोग विश्वास योग्य हैं या नही। जनजातियों के बीच  नजरें आपसी प्रभाव के स्तर को बताने में मदद करती थीं जैसे जनजाति के प्रधान की नजरों से कोई भी नजरें नहीं मिला सकता था।

    वीडियो चैटिंग का महत्व :-

    नजदीकी रिश्तों के लिए दिन में एक बार फेस टू फेस बात करना जरूरी होता है, इससे रिश्तों में विश्वास और निकटता बनी रहती है। इसलिए दूर बैठे प्रियजनों से बात करने के लिए वीडियो चैटिंग अच्छा विकल्प हो सकता है।