कुल 169 लेख

  • 20 Dec
    Shiva Raman Pandey

    क्या आप मनोचिकित्सक से परामर्श सेवा Psychotherapy लेना चाहते हैं?

     

    psychotherapy kya hoti hai

    जैसे की Medicines की विभिन्न प्रकार की शाखाएं और उपचार के तरीके है,ठीक उसी तरह से मनोचिकित्सा परामर्श की भी विभिन्न शाखाएं और दृष्टिकोण हैं ।

    कुछ उपचार अधिक विशिष्ट और विशेष प्रकार के मनोरोगों के लिए उपयोगी होते हैं और कुछ सामान्य और कई लोगों के लिए प्रयोग की जाती हैं।

    सामान्यतः,मनोरोग से जुड़े विभिन्न मसलों को हल करने के लिए अलग अलग थेरेपी और तरीके होते हैं।

    चिकित्सा तब दूसरे प्रकार की होती है जब यह एक व्यक्ति,जोड़े में, समूह के लिए या परिवार के लिए होती है ।

    इसके अलावा उपचार में थेरेपिस्ट की भूमिका का भी अहम योगदान होता है।

     मनोचिकित्सकों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाली साइकोथिरैपी के विभिन्न प्रकार:

    संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी(Cognitive behaviour therapy):

    यह आज तक के  सबसे अधिक इस्तेमाल किये जाने वाले उपचारों में से एक है । इसके कारण यह है कि यह शोध पर आधारित है और अवसाद और चिंता के इलाज में काफी कारगर है, और अधिकतर लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं । सीबीटी थेरेपिस्ट अपने (client) के सोचने के तरीके में बदलाव की तकनीक सिखाते हैं। वे यह बताते हैं कि कैसे हमारे विचार, हमारी भावना और कार्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, और अगर हम हमारे विचारों में परिवर्तन लाएं तो हमारी भावनाएँ और कार्य करने के तरीके अपने आप बदल जाते हैं। सीबीटी का इस्तेमाल वैवाहिक जीवन में कलह दूर करने, नशीली दवाओं का सेवन रोकने यहां तक कि खाने से संबंधी विकार eating disorder, और दूसरी अन्य मानसिक समस्याओं को दूर करने में किया जाता है ।

    समूह थेरेपी(Group Therapy): इस थेरेपी का प्रयोग तब किया जाता है जब काफी संख्या में लोग एक ही प्रकार की मानसिक समस्या से जूझ रहे हों। ग्रुप थेरेपी तब और कारगर  होती है जब एक व्यक्ति  को विश्वास हो जाता है कि अकेले वह ही इस चिंता से नहीं जूझ रहा है बल्कि और भी बहुत से लोग हैं,जो उसी की तरह हैं । और अगर वे ठीक हो गए हैं तो मैं भी हो सकता हूँ ।

    समूह चिकित्सा के विभिन्न स्वरूपों हो सकते हैं जो उसके बनाने वाले और प्रयोग करने वाले पर निर्भर करता है।

    समूह चिकित्सा की मदद से क्रोध पर काबू रखना , शोषण से होने वाले मानसिक तनाव को कम करना,सामाजिक कौशल सिखाना, या समय प्रबंधन का महत्त्व आदि की ट्रेनिंग दी जाती है ।

    द्वंद्वात्मक व्यवहार थेरेपी(Dialectical Behaviour Therapy): यह थेरेपी सीमा व्यक्तित्व विकार(borderline personality disorders), मूड विकारों के  साथ ही अन्य व्यक्तित्व विकार के लिए उपयोगी है ।

    मन की वह अवस्था जिसमें व्यक्ति दुविधा में हमेशा रहे या दो विपरीत प्रकार के कार्य एक साथ करे,यह स्थिति थोड़े समय के लिए ठीक है परन्तु ज्यादा समय से हो तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है, घबराहट सी होती है  ।

    ऐसी स्थिति से निकलने के लिए Mindfulness therapy का प्रयोग किया जाता है ।Mindfulness पूरी तरह से पल में जीने में विश्वास रखता है,मतलब अगर आप एक कार्य कर रहे हैं तो उसे मन लगा कर अच्छे से करिये दूसरे तरफ ध्यान मत लगाइये ।

    आजकल, mindfulness के प्रभाव को बढ़ाने के लिए डीबीटी और सीबीटी दोनों थेरेपी का एक साथ प्रयोग किया जाता है ।

    परिवार थेरेपी(Family Therapy): परिवार में कलह होने की एक प्रमुख वजह होती है विचारो की असहमति । और उस स्थिति में पूरा परिवार बिखरने लगता है,अतः फैमिली थेरेपी में,पूरे परिवार को एक साथ बैठा कर मतभेदो को सुलझाने की थेरेपी होती है । परिवार के सदस्यों के बीच आपसी बात-चीत बढे ,और समस्या का समाधान हो,यह इस थेरपी का प्रमुख उद्देश्य होता है ।

    इन सभी विभिन्न प्रकार की मनोचिकित्सा के अलावा, एक योग्य मनोचिकित्सक की भूमिका भी अहम होती है ।

    और साथ ही साथ  अपने थेरेपिस्ट को थेरेपी के बाद हुए बदलाव की जानकारी देना ,और उसका असर आपके जीवन पर कितना हुआ,यह सब भी थेरेपी के प्रभाव को बढ़ाते हैं ।

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  • 20 Dec
    Shiva Raman Pandey

    क्या करें जब आपका अपना मनोविकृति का शिकार हो?

     kya kare jab aap manovikrit se pidit ho

    मेरे मन की ये बेचैनी को कोई सुन नहीं सकता ।
    मैं आवाजों को सुनता हूँ, कोई मुझको बुलाता है ।
    यहाँ सब लोग मुझको ही बस पागल समझते हैं ।
    मेरे अपनों का बस मुझको एक सहारा चाहिए ।
    दिल का दर्द समझे जो वो एक अपना चाहिए ।

    यह पंक्तियाँ उस मन की अभिव्यक्ति हैं जो एक ऐसे स्थिति से जूझ रहा है जिसमें व्यक्ति वास्तविकता और कल्पना की स्थिति में अंतर नहीं कर पाता । इसे हम मनोविकृति (सायकोसिस) कहते हैं ।इस रोग से परेशान व्यक्ति को जब सायकोटिक अटैक होता है तो भ्रम की स्थिति में वे जो भी देखते,सुनते,या अनुभव करते हैं, वह ना हमें दिखाई देता है और ना ही सुनाई देता है। ऐसी स्थिति में रोगी को होने वाले भ्रम से आप समझ नहीं पाते कि क्या करें? उनके द्वारा देखी,सुनी बातों पर यकीन करे,या ना यकीन करें अथवा कुछ भी ना करें। इसके अलावा उनके हिंसक होने की स्थिति में आप क्या करें? सायकोटिक अटैक के दौरे मरीज को कई बार होते हैं, अतः हम यहां आपको कुछ जानकारी दे रहें है जिनको इस प्रकार के दौरों में आप जानकारी के रूप में प्रयोग कर सकते हैं | आप मरीज से पूछ सकते हैं, कि दौरे पड़ने के दौरान

    उन्हें क्या हुआ था?
    उन्होनें क्या देखा और सुना?
    दौरे के दौरान क्या वे आक्रामक हुए थे?
    उन्हें इस एपिसोड से निकलने में कितना समय लगा?
    अगर वे बात करने की स्थिति में है तो आप उनसे बात करके एक कार्यप्रणाली तैयार कर सकते हैं|

    एक बहुत ही प्रमुख बात जो ध्यान देने योग्य है कि उनकी जल्द से जल्द दवा चिकित्सा शुरू की जाय ।

    सही दवा और मनोचिकित्सा से इस मनोविकृति के बार बार आने की तीव्रता में कमी आती है और इस मनोविकृति के बारे में जानकारी होने से अधिक से अधिक मदद मिल सकती है।

    दूसरी बात यह सुनिश्चित कर लें कि मरीज के रहने वाले स्थान पर कोई भी धारदार हथियार ना हो, जिसे वे खुद को या दूसरों को हानि पहुँचने के लिए प्रयोग कर सकें। उस स्थान पर कोई भी खिड़की या बालकनी ना हो जिससे वे वहां से कोई खतरनाक कार्य ना करें ।

    रोगी को जब भी मानसिक दौरे पड़ते हैं, और उन्हें भ्रम की स्थिति होती है, तो आप कभी भी उनके इस भ्रम से सहमत ना हों, अन्यथा उनका भ्रम विश्वास में बदल जायेगा, परन्तु यह भी ध्यान रखें कि उनसे असहमति भी मत रखिये, अन्यथा वे और अधिक हिंसक और उत्तेजित हो सकते हैं ।

    सबसे अच्छी बात यह होगी कि आप उनको प्यार से समझाएं, उनके साथ सहनभूति रखें, उनसे कहें कि जो भी वो देख रहे या सुन रहे हैं वह आपको नहीं दिख रहा, आप उन्हें कह सकते हैं कि आप उनके साथ हैं, और उन्हें हर संभव मदद करेंगे ।

    मानसिक विछिप्तता की स्थिति में मरीज को यह और भी डरावना लगता है कि कोई कैमरा लेकर उसका पीछा कर रहा है, इस स्थिति में अगर आपको मरीज को देखने के लिए किसी प्रशिक्षित और अनुभवी व्यक्ति की मदद मिल जाये तो बेहतर होगा, साथ ही आप को तनाव और थकान से राहत मिलेगी ।

    जब भी आपका अपने बात करने की स्थिति में हों, उनसे बात करनी चाहिए । अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ है कि, अगर मरीज को उनको पड़ने वाले दौरों के बारे में उन्हें जानकारी दी जाए, विस्तृत विवरण उपलब्ध कराया जाए, तो वे उपचार के लिए तैयार रहते हैं, और उनको बेहोश किये जाने की स्थिति में वे ज्यादा विरोध नहीं करते ।

    मनोविकृति को लेकर जितनी भी अफवाह हैं वे सभी हम सब को मिल कर दूर करना होगा । यह मधुमेह जैसी बीमारियों की तरह ही है, समय से उपचार और जागरूकता से यह कंट्रोल में आ सकती है ।

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  • 20 Dec
    Shiva Raman Pandey

    सेल्फ़ी क्या है? और युवा इसके पीछे पागल क्यों हैं?

    selfi kya hai aaj selfi ka itna badhava kyo hai

    आइये मिलते है नेहा से एक २० वर्षीय युवती है जिसे सेल्फ़ी लेने की आदत सी है वह जहां जाती है वहाँ अपनी 4-5 सेल्फ़ी लेती है, और फिर उन्हें अपने  दोस्तों और  रिश्तेदारो  के बीच दिखाती (शेयर करती)  है। दोस्तों नेहा सिर्फ एक उदहारण है कि आज के युवाओं में सेल्फ़ी का कितना क्रेज है,हर सेकंड अकेले फेसबुक पर दस हज़ार से ज्यादा सेल्फ़ी अपलोड होती है वह भी केवल भारत से !!!!!!!!!!!

    आइये जानते हैं सेल्फ़ी क्या है? और युवा इसके पीछे पागल क्यों है?

    आज इंटरनेट पर सेल्फ़ी की बाढ़ सी आ गई है। हालाँकि कुछ सेल्फ़िज़ ख़ास अवसरों (काम,शादी,जीत की ख़ुशी, उपलब्धि आदि) पर ली जाती है।पर ज्यादातर सेल्फ़िज़ को किसी भी अवसर की आवकश्यकता नहीं होती है। स्पेशल फ़िल्टर Apps जैसे इंस्टाग्राम और स्नैपचैट यह सुनिश्चित करते हैं की हम सिर्फ अच्छी सेल्फ़िज़ फ़िल्टर कर पोस्ट करें।

    हम सेल्फ़िज़ क्यों लेते है?

    सबसे बड़ा स्पष्टीकरण है,नियंत्रण:

    • हम सेल्फ़ी को लेते समय तस्वीर की गुणवत्ता को नियंत्रित कर सकते हैं।यह उस समय नहीं हो सकता जबकि कोई अन्य हमारी तस्वीर लेता है।
    • हम कई फिल्टर्स से कोई एक सेल्फ़ी चुन सकते हैं जो हमे पसंद हो।
    • हम कोण(Angle) और प्रकाश का चुनाव कर सकते हैं।
    • हम कई तस्वीरें ले सकते हैं और फिर उनमें से सबसे अच्छी तस्वीर चुन सकते हैं। यह उस समय नहीं हो सकता जबकि कोई अन्य हमारी तस्वीर लेता है।

    अतः सेल्फ़ी दूसरों को हम कैसे दिखते हैं,इसके नियंत्रण में हमें मदद करती है।

    तो हम कैसे दिखते हैं,इसका नियंत्रण हम क्यों चाहते हैं?

    इसका उत्तर स्वयं को आईने में देखने जैसा है।यह परिकल्पना इस तर्क पर आधारित है कि डिजिटल रूप से जुडी दुनिया में दूसरों की आँखों में अपना मूल्य पाने की धारणा बहुत बढ़ गई है।अक्सर लोग इस बात को भी पोस्ट कर रहे हैं कि वे हर मिनट क्या कर रहे हैं।इसी प्रतिस्पर्धा में कि हमारे जीवन में क्या हो रहा है,इसकी तस्वीर भी हम पोस्ट करना चाहते हैं ।हम उन्ही तस्वीरों को पोस्ट करना चाहते हैं जिनमें हम अच्छे और खुश नज़र आते हैं।

    आज कल हमारा आत्मसम्मान पहले की अपेक्षा अब इस बात पर ज्यादा केंद्रित है कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं। अधिक  प्रशंसा ना मिलने पर लोग अपना धैर्य खो रहे हैं। इसीलिये जब लोग अपना सम्मान और आत्म विश्वास दूसरों के नज़रिये से देखने लगे हैं,वे स्वयं को सबसे अच्छा दिखाना चाहते हैं,ज्यादा से ज्यादा लोगों की प्रशंसा और ध्यान पाना चाहते हैं और स्वयं के बारे में अच्छा अनुभव करना चाहते हैं।

    तो क्या हम अब खुश हैं क्योकि अब हम बहुत सारी सेल्फ़ी ले रहे हैं?

    इन पर हुए शोध काफी बंटे हुए हैं। कुछ  महिलाओ पर हुए अध्ययन में यह पाया गया है कि उनकी ज्यादा प्रशंसा और सकारात्मक टिप्पणी स्वयं के बारे में अच्छा सोचने और अनुभव करने में मदद करती है।

    कुछ दूसरे अध्ययन यह बताते हैं की लोग सोशल मीडिया पर प्रशंसा (लाइक्स) पर इतना भरोसा करते हैं कि नकारात्मक टिप्पणी मिलने पर उनका आत्मविश्वास बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। इसलिए स्वयं के बारे में ज्यादा मूल्यांकन, प्रशंसा या नकारात्मक टिप्पणी हमारे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के लिए हानिकारक हो सकता है। एक और  अध्ययन के अनुसार सेल्फ़िज़ की सनक वाले जो लोग अधिक सेल्फ़ी लेते हैं वे अहंकारी होते है अथवा वे लोग जो हद से ज्यादा के स्तर पर स्वयं को प्यार करते हैं, इतनी अधिक सेल्फ़िज़ के द्वारा वे अपनी आत्मप्रशंसा की इच्छा को पूरी करते हैं। हालाँकि अध्ययन यह भी कहते हैं कि अहंकारी लोगों का स्वयं के प्रति संदेह गंभीर स्तर पर होता है। इसलिए वे बहुत सारी प्रशंसा पहले स्थान से पाना चाहते हैं।

    इन अध्ययनों से अलग, एक प्रश्न समय की मांग है कि, क्या हम तस्वीरों को नियंत्रित करते हैं,या तस्वीरें हमें?

    क्या आप विश्वास करेंगे कि पहली सेल्फ़ी 1939 में Robert Cornelius ने ली थी? यहाँ पर सेल्फ़ी के बारे में कुछ तथ्य दिए गये हैं।:

    1) आज कल परफेक्ट सेल्फ़ी लेने की कोचिंग भी शुरू हो गई है। विद्यार्थियों में ज्यादातर महिलाएँ होती हैं।

    2) सेल्फ़ी इतनी पॉपुलर है कि आतंकवादी भी आज कल इसे लेने लगे हैं।

    3) जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश जाते हैं तो कम से कम २ सेल्फ़ी लेते हैं।

    4) बराक ओबामा भी रोज़ 1 सेल्फ़ी लेते हैं ।

  • 20 Dec
    Shiva Raman Pandey

    प्रसव उपरांत व्यवहार परिवर्तन का कारण

    prasav uprant vyohar parivartan ke karn

     

    "बच्चे के जन्म के बाद विशाल को पापा बनने की ख़ुशी है, मिसेज शर्मा को दादी बनने की, पूरे घर में ख़ुशी का माहौल है, लेकिन सीमा का बदलता मूड कोई समझ नहीं पा रहा । जरा -जरा सी बात पर उदास हो जाना, कोई चीज़ पसंद नहीं आने पर रोने लगना । बच्चे को लेकर चिंता करना और चिड़चिड़ाना। सीमा के इस व्यवहार को लेकर विशाल ने मनोचिकित्सक से बात की । तो आइये जानते हैं क्या है प्रसव उपरांत इस व्यवहार परिवर्तन का कारण।

    बेबी ब्लूज या प्रसव पश्चात अवसाद :- एक बच्चे का जन्म इंसान के जीवन  की सबसे बड़ी ख़ुशी होती है। महीनों की परेशानी ,हर समय सावधान रहना ,जीवन शैली में परिवर्तन और उसके बाद डर और ख़ुशी से भरी जन्म देने की प्रक्रिया , सच में ये सब माता - पिता के लिए रोलर -कोस्टर की सवारी जैसा है , और इन्ही कारणों से माता -पिता बच्चे को सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।हालाँकि कभी-कभी माँ जन्म देने के बाद बेहतर नहीं   महसूस करती । यहाँ दो प्रकार की भावनायें या मूड से संबंधित कारण हो सकते हैं। पहला- बच्चे को लेकर चिंता या 'बेबी ब्लूज'

    और दूसरा- प्रसव पश्चात अवसाद या 'पोस्ट पार्टम डिप्रेशन' । प्रसवोत्तर चिंता या मनोविकृति का रूप आमतौर पर कम होता है।

    बेबी ब्लूज के लक्षण :-  यह आपके बच्चे के जन्म के एक या दो हफ़्तों के उपरांत ख़त्म हो जाता है , इसके लक्षण हैं :

    मूड बदलना

    चिंता

    उदासी

    चिड़चिड़ापन

    व्याकुलता महसूस करना

    रोना

    एकाग्रता में कमी

    भूख की समस्या

    नींद में कमी

    दूसरी ओर प्रसव पश्चात अवसाद ज्यादा समय तक चलता है और बहुत ज्यादा गंभीर होता है। जन्म देने के छः महीनो तक यह रह सकता है। अगर इसका उपचार न किया जाये और माँ के देखभाल करने की क्षमता और शिशु के प्रति उसके लगाव के साथ हस्तक्षेप करने पर यह और ज्यादा लम्बे समय तक जारी रह सकता है।

    प्रसव पश्चात अवसाद के लक्षणों में शामिल है :-

    o        उदास मन या गंभीर मिज़ाज़

    o        अत्यधिक रोना

    o        अपने बच्चे के साथ जुड़ाव में कठिनाई

    o        अपने दोस्तों और परिवार से दूर होना

    o        भूख में कमी या सामान्य से बहुत अधिक खाना

    o        अनिद्रा या अत्यधिक सोना

    o        भारी थकान या ऊर्जा की कमी

    o        आनंद और ख़ुशी वाली गतिविधियों में कम रूचि लेना

    o        तीव्र चिड़चिड़ापन और क्रोध

    o        यह डर कि आप एक अच्छी माँ नहीं बन सकती हैं

    o        बेकार होने का ,शर्म अपराध या अपूर्णता का एहसास होना

    o        स्पष्ट सोचने की क्षमता ,एकाग्रता या निर्णय लेने की क्षमता में कमी।

    o        गंभीर चिंता और भययुक्त दौरे।

    o        अपने आप को या बच्चो को नुकसान पहुँचाने का  विचार।    

    o        मौत या आत्म हत्या के बारंबार विचार।

     

    प्रसव पश्चात मनोविकृति या चिंता दुर्लभ है लेकिन फिर भी यह हो सकता है। इसके लक्षण इस प्रकार है :-

    घबराहट या चिंता की स्थिति

    भ्रम या भटकाव

    बच्चे के बारे में जुनूनी विचार

    माया और भ्रम

    निद्रा सम्बन्धी परेशानियाँ

    मानसिक उन्माद

    अपने आपको या बच्चे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करना

    प्रसव उपरांत मनोविकृति,जीवन के लिए खतरनाक विचार और व्यहार को बढाती है और इसके तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है।

    अच्छी खबर यह है की इन सभी स्थितियों का उपचार किया जा सकता है। कृपया सम्बंधित मदद के लिए रजिस्टर्ड मेडिकल विशेषज्ञ से जल्दी संपर्क करे।

    आप हमारे अन्य लेखों में पढ़ सकते हैं कि इन स्थितियों के कारण क्या हैं ?

    आनुवंशिक और वातावरण के जोखिम क्या है?

    इन स्थितियों के प्रभाव क्या हैं ?

    और हम कैसे अच्छे हो या मदद कैसे प्राप्त करें?

    अगर आपके मन में आत्महत्या कर विचार आ रहे हों,अपने या बच्चे को हानि पहुँचाने का प्रयास कर चुके हों तो आपको यह सलाह है कि आप अपने मित्र या प्रियजनो से बात करें,  और स्वयं को अस्पताल में दाखिल करवाएं।

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  • 23 Dec
    Shiva Raman Pandey

    प्रसव पश्चात अवसाद (Post partum depression) को समझना:-जोखिम के कारक और कारण

    prasav paschat avsad

     

    पहले लेख में जन्म देने की प्रक्रिया से संबंधित प्रसव पश्चात अवसाद और दूसरे मन से संबंधित मसलों  का संक्षिप्त परिचय यह इशारा करता है कि ये मसले  नई माँ पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। अमेरिका  में हुए  अध्ययन के अनुसार दस में से एक नई माँ को प्रसव पश्चात अवसाद होता है और यह बहुत सी माँओं को होने का खतरा होता है।

    माँ के साथ ही पिता भी इससे प्रभावित हो सकते  हैं, क्योंकि प्रसव पश्चात अवसाद या दूसरे मूडmood के स्वरूप संबंधों में तनाव ला सकते हैं और आपसी लड़ाई,चिंता और संवाद समस्या का कारण होते हैं। यह उनके तनाव को बढ़ा सकता है क्यों की उन्हें नई माँ की देखभाल के साथ ही घर के काम और ऑफिस भी जाना पड़ता है।अनुपचारित माताओं के बच्चे ADHD,ADD और उदासीनता जैसे मानसिक रोग का शिकार हो सकते हैं । ऐसे बच्चों को अभिभावक का प्यार न मिलना उनके सामाजिक, भावनात्मक विकास पर असर डाल सकता है । 

    अतः अगर आप इससे निपटने में मदद चाहते हैं, तो प्रसव पश्चात अवसाद के कारण को समझना सबसे ज्यादा जरूरी  है। इसके कारणों में काफी हद तक गर्भावस्था(pregnency) और प्रसव(delivery) के दौरान शरीर में होने वाले हार्मोनल प्रक्रियाओं को जिम्मेदार माना जाता है।जबकि हार्मोन्स जटिल रूप से भावनाओं से जुड़े होते हैं। कभी -कभी गर्भावस्था और प्रसव पीड़ा को लेकर मन में होने वाला तनाव बढ़ जाता है ।वास्तविक प्रसव (डिलिवरी ) एक दर्दनाक प्रक्रिया हो सकती है और यह भी अवसाद को बढ़ा सकती है।

    प्रसव पश्चात अवसाद किसी भी बच्चे के जन्म के बाद हो सकता है ,ना कि सिर्फ पहले बच्चे के जन्म के बाद। इसका जोखिम अधिक होता है, यदि

    • आपको पहले कभी अवसाद हो चुका हो,या तो गर्भावस्था के दौरान या किसी अन्य समय पर।
    • आपको दो ध्रुवी अवसाद (bipolar depression) हो।
    • आपको पहले गर्भावस्था के दौरान प्रसव पश्चात अवसाद था।
    • आपके परिवार के सदस्यों में किसी को अवसाद या मन से संबंधी कोई समस्या हो।
    • आपके साथ पिछले वर्ष कोई तनाव पूर्ण घटना हुई हो ,जैसे -गर्भावस्था की जटिलताएं ,बीमारी या जॉब का खोना।
    • आपके बच्चे को कोई स्वास्थ्य समस्या है या कोई विशेष आवश्यकता।
    • आपको स्तनपान कराने में परेशानी होती है।
    • आपको अपने साथी या किसी विशेष के साथ संबंधों में परेशानी होती है।
    • आपके पास सहयोगियों की कमी है।
    • आपको आर्थिक समस्या है।
    • गर्भावस्था अनियोजित या अनचाही थी।

    यह महत्वपूर्ण है की जल्दी से इसका पता लग जाय क्योंकि प्रसव पश्चात अवसाद  चिंता बढ़ कर मनोविकृति या गंभीर अवसादग्रस्त विकार में बदल सकता है। अगर आपको हल्का सा भी  मानसिक अशांति  का अहसास हो तो आप इंतजार मत करिये। प्रसव पश्चात अवसाद को बिना इलाज नही छोड़ना चाहिए। इसका उपचार अत्यंत आवश्यक है। अगर समय रहते इसका इलाज न हो तो यह आपसी संबंधों को बर्बाद कर देता है और नवजात के विकास को प्रभावित कर सकता है।

    अगर आप प्रसव पश्चात अवसाद से ग्रस्त माँ के साथी हैं ,तो उसको त्याग देना नही चाहिए बल्कि उसको प्यार और देखभाल की जरूरत है। आपको यह समझने की आवश्यकता है , कि यह एक ऐसी माँ है जो गंभीर भावनात्मक मनोविचारों की गिरफ्त में है। उससे थेरेपी और दवाओं के लिए आग्रह करें। आप स्वयं के लिए भी यह सुनिश्चित करें कि आपके ऊपर देखभाल और काम का अधिक बोझ ना हो ,और आपको कोई सहयोग करे। और जल्दी से जल्दी एक प्रोफेशनल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सम्पर्क करें।

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