• 27 Aug
    Nandini Harkauli

    फेसबुक - उपयोग करते हुए सावधान रहें

    cyber bullying

     

    "अरे पता है! आज स्कूल में हमें साइबर बुलींग और सुरक्षा के बारे में बताया गया। तुम्हारे स्कूल न आने के कारण बहुत ही ज्ञानवर्धक सेशन छूट गया।"- शालिनी ने रोमा को शाम को मैदान में खेलते हुए बताया।

    "साइबर बुलींग ! यह क्या होता है? "रोमा ने पूछा

    "तुम नहीं जानती कि साइबर बुलींग क्या है? ओह चलो भी! तुम सोशल नेटवर्किंग साइट, फेसबुक, ट्विटर और न जाने कहाँ 24 * 7 व्यस्त रहती हो, और मुझसे पूछ रही हो कि साइबर बुलींग क्या है! खैर, साइबर बुलींग किसी को परेशान करने को कहते हैं, आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम मतलब इंटरनेट के जरिए धमकी भरे संदेश भेजना या डराना इसका हिस्सा है"।- शालिनी

    "सही में! कोई व्यक्ति आपको फेसबुक पर कैसे धमकी दे सकता है? लोग तो अपने सामाजिक जीवन को बढ़ाने के लिए फेसबुक पर शामिल होते हैं। "- रोमा

    "तुम्हारी बात को सही से कहें तो यह सिर्फ़ आभासी सामाजिक जीवन ज़्यादा है" - शालिनी

    "क्या अंतर है?" - रोमा

    "अच्छा, आभासी सामाजिक जीवन वह है जहां आप किसी से बातचीत करने के लिए उससे व्यक्तिगत रूप में नहीं मिल रहे हैं। असली दुनिया की तुलना में आभासी सोशल मीडिया पर रिश्ते और दोस्ती बनाए रखना बहुत आसान है। अब तुम मुझे इतनी हैरानी से न देखो "--- शालिनी ने सोच में डूबी रोमा को देखकर हंसते हुए कहा।

    "तुम्हारे प्रश्न पर वापस आते हैं कि लोगों को फेसबुक पर किस तरह से बुल्ली या परेशान किया जा सकता है? आजकल फेसबुक पर अपनी निजी जिंदगी के बारे में हर मिनट की जानकारी साझा करना लोगों की प्रवृत्ति बन गयी है और इससे हम दूसरों को अपने जीवन में कहर मचाने का बहुत आसान रास्ता दे रहे हैं। अधिकांशतः टीनेजर्स को इंटरनेट पर तंग किया जाता है और उन्हें पता भी नहीं चलता। रोमा इतनी उलझन में मत दिखो",शालिनी ने कहा।

    फिर शालिनी ने एक असल किस्सा सुनाया - "पिछले साल पड़ोस में रहने के लिए एक परिवार आया था। उनकी बेटी 15 वर्ष की थी और हम जल्द ही पक्के दोस्त बन गए थे। उसने मुझे अपने नए क्रश के बारे में बताया, जिसे वह फेसबुक पर मिली थी। लड़का उसके लिए बिलकुल अजनबी था, तब भी उसने लड़के की फ़ेसबुक फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली और जल्द ही अपने नए दोस्त के साथ घंटों ऑनलाइन बातें करना शुरू कर दिया। कुछ महीनों के भीतर ही उस लड़के ने लड़की के आगे उसकी  प्रेमिका बनने का प्रस्ताव रखा। वह पहले से ही उस लड़के के प्यार में पागल थी और बिना सोचे उसने प्रस्ताव मान लिया। चैट के उन लम्बे घंटों के दौरान उसने अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक आदि जानकारी का आदान-प्रदान किया और एक बार भी नहीं सोचा कि किसी दिन यह उसकी मुसीबत का कारण बन जाएगा।"

    "समय बीतने के साथ, अध्ययन में एकाग्रता, ध्यान की कमी और फेसबुक के बढ़ते हुए उपयोग से उसकी पढ़ाई पर असर होने लगा। उसका सामाजिक जीवन भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ, क्योंकि वह घर पर खुद को अपने कमरे में बंद करके रहना पसंद करती थी।

    उसने अपने माता-पिता के साथ भी ज़्यादा बातचीत बंद कर दी थी। जल्द ही उसके माता-पिता को वास्तविक कारण पता चल गया। वह क्रोधित होकर उस पर चिल्लाए नहीं, बल्कि उसे समझाया और फिर से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में मदद की।

    अपने माता-पिता की बातों को ध्यान में रखते हुए उसने अपने फेसबुक उपयोग को नियंत्रित किया और वह केवल दिन में एक बार ही फेसबुक पर लॉग इन करने लगी। दूसरी ओर उस लड़के को इस नई व्यवस्था के बारे में पता चला तो उसने लड़की के कान भरने शुरू कर दिए। लड़का उससे कहता था कि, तुम प्रभावित मत हो क्योंकि माता-पिता जब भी संभव हो सके अपने बच्चों को सीख ही देते रहते हैं। लड़के के लगातार प्रयासों के बावजूद लड़की ने फेसबुक का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दिया। "

    "एक दिन उस लड़के ने हताश होकर लड़की का घर जाते हुए पीछा किया और उसके चेहरे पर एसिड छिड़क कर वहाँ से भाग गया।" रोमा के पास बोलने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे।

    सोशल नेटवर्किंग साइटों पर विशेष रूप से फेसबुक का उपयोग करते समय सुरक्षित रहने के लिए कुछ सुझावों को ध्यान में रखना चाहिए:

    • फेसबुक पर अंजान लोगों को नहीं जोड़ना चाहिए। जांच करें कि क्या आपके बीच म्यूचुअल दोस्तों की अच्छी संख्या है? मेरा मतलब है कि अगर 7 से 10 लोग ऐसे हैं जो आप दोनो के फ़ेसबुक पर दोस्त हैं, तब भी एक बार जांच लें कि क्या आपसी दोस्त वास्तविक / असली दोस्त हैं या केवल आभासी दोस्त हैं।
       
    • फेसबुक पर बात करते समय किसी भी निजी बात का खुलासा नहीं करना चाहिए। यदि स्क्रीन के दूसरे हिस्से पर बैठा व्यक्ति आपकी व्यक्तिगत जानकारी जानने में अधिक दिलचस्पी ले रहा है तो यह चेतावनी का संकेत है।
       
    • फेसबुक पर किसी भी व्यक्तिगत फोटो या वीडियो को साझा न करें।
       
    • आपकी प्रोफाइल कौन देख सकता है, इसका नियंत्रण करें। प्राइवेसी सेटिंग में जाकर 'केवल दोस्तों' (friends only)के विकल्प का उपयोग करके स्वयं को सुरक्षित रखें।
       
    • सोशल मीडिया पर आप किस वक्त कहाँ हैं, चेक इन या अन्य महत्वपूर्ण जानकारी साझा न करें।
       
    • किसी भी परिस्थिति में अपने किसी भी मित्र के साथ अपना पासवर्ड साझा न करें, क्योंकि वे इसका दुरुपयोग कर सकते हैं।
       
    • ऑनलाइन व्यक्ति के साथ चैट करते समय सतर्क रहें। व्यक्ति के चैटिंग पैटर्न को समझने की कोशिश करें, बहुत से लोग नकली प्रोफाइल बनाकर लोगों को धमकाते और परेशान करते हैं।
       

    अगर कोई आपको धमका रहा है या परेशान कर रहा है तो उनके शिकार मत बानिए। छिपाएं नहीं, किसी ऐसे व्यक्ति के साथ साझा करें, जिस पर आप भरोसा करते हैं (माता-पिता, शिक्षक, परामर्शदाता) ताकि आवश्यक कार्रवाई शीघ्र ही की जा सके। "

    रोमा को इस बात का एहसास नहीं था कि साइबर बुलींग के लिए फेसबुक इस हद तक एक आसान मंच है। उसने खुद भी फेसबुक पर कुछ निजी तस्वीरें साझा की थीं और एक बार भी नहीं सोचा कि उनका दुरुपयोग किया जा सकता है।

    उसने शालिनी को इसके बारे में जानकारी देने के लिए धन्यवाद कहा। घर पर पहुंचते ही उसने सबसे पहले अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर 'प्राइवेसी सेटिंग' बदली और अंजाने लोगों को अपनी फ्रेंड लिस्ट से हटाया।

    और अब उसे एहसास हो गया है कि फेसबुक एक ऐसी किताब है जिसे बहुत सावधानी से पढ़ना चाहिए ... !
     

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  • 27 Aug
    Nandini Harkauli

    खुशहाल जीवन

    joyful living

     

    अपने बचपन के दिनों को याद करिए जब आप बिना किसी कारण ही खुश रहते थे।..... छोटी-छोटी चीजें आपके चेहरे पर मुस्कान ले आती थीं.......... एक छोटी सी टॉफ़ी आपके लिए खुशी का स्रोत थी। ........अगर कोई आपको देख मुस्कुराता था तो आप भी प्यार से खिलखिलाके हँस देते थे। .....आप दुनिया को उत्सुकता और उत्साह की नज़र से देखते थे।

    दुनिया आपके लिए आश्चर्य की जगह थी। आप सुबह पक्षियों की चहचहाहट की गूँज का आनंद लेते थे। मस्त चलती हवा में अपने चेहरे पे उड़ते बालों का आनंद लेते थे। बाहर खुले आसमान में खेलते थे। रेत के घर बनाते थे, पत्तियों को खेल में पैसे की तरह उपयोग करते थे, बारिश में कागज की नाव बनाते थे। पूरी दुनिया आपके लिए खेल का मैदान और प्रकृति में हर वस्तु आपके खेल का एक उपकरण थी। आप बहुत संतुष्ट और खुश रहते थे।

    आपमें हर सुबह उठकर नया जोश और उमंग रहता था, और दिन भर करने के लिए बहुत सारे काम होते थे। न भविष्य को लेकर चिंता थी, न ही अतीत का कोई पछतावा। हम वर्तमान में जीते थे,और प्रत्येक क्षण खुशी से जीते थे।

    लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े हुए, हमने अपनी बचपन की मासूमियत को कहीं खो दिया। अपनी मौलिक प्रकृति के अलावा सब कुछ हमारे भीतर विकसित हो जाता है। हम अपने परिवार, समाज, विद्यालय, कॉलेज, ऑफिस से प्रभावित होते हैं, और बड़े होने की इस प्रक्रिया में हम खुशहाल रहने की अपनी प्रकृति को खो देते हैं।

    अधिक धन, अधिक शक्ति और भौतिक चीज़ों की इच्छा के साथ जीवन भी अधिक जटिल हो गया है। हमारे बचपन के विपरीत, हमारी वयस्कता तनाव, चिंता, उदासी, भय और अवसाद से भरी हुई हो गई है।

    एक सुखी व्यक्ति से उदास व्यक्ति होने के हमारे पतन के लिए कौन जिम्मेदार है?

    जैसा कि हम सब जानते हैं कि हम शुरू से ऐसे नहीं थे, फिर हमारी वह बचपन के उल्लास भरे दिन भाँप की तरह कहाँ उड़ गए ? 

    इसके पीछे का कारण क्या है ? क्या आपने कभी खुद से यह सवाल पूछा है ?

    क्या इसका कारण हमारा परिवार है ? या समाज है? या हमारे दोस्त हैं ?

    जितना हम बड़े हो रहे हैं, उतना ही हम बचपन के दिन क्यों याद करते हैं ?
     

    आइए देखें हम बड़े होकर कैसे हैं?

    वयस्कों के रूप में हम हमेशा अपने बच्चों को, क्या करना है और क्या नहीं करना, क्या सही है और क्या गलत, क्या खेलना है और क्या नहीं आदि सिखाते हैं।

    सीखने की इस प्रक्रिया में, बच्चे धीरे-धीरे अपनी मूल प्रकृति खो देते हैं। हम बच्चों पर अपने अनुभवों का दबाव डालकर उन्हें प्राकृतिक तरीके से अपनी खुद की समझ विकसित करने का मौका नहीं दे रहे।

    हमें बच्चों को ऐसा वातावरण प्रदान करना चाहिए जहां वह स्वतंत्र और रचनात्मक रूप से सोच सकें, ताकि वह अपनी क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित करने में सक्षम हो सकें। एक अनुकूल माहौल में, जहां बच्चे को प्यार मिले और वह सुरक्षित महसूस करे, वह एक खुशहाल वयस्क के रूप में बड़ा होगा।

    मैं आपको फिर से बताना चाहती हूँ, "खुशी एक विकल्प है।" हम केवल तब खुश और उल्लासपूर्ण हो सकते हैं जब हम "अब" खुश होने का चयन करें। हमें अपने जीवन के हर पल का उत्साह से आनंद लेने के लिए वर्तमान में जीना होगा। बड़े होने पर, हममें से अधिकतर लोग बीते हुए समय में रहते हैं या अपने भविष्य के बारे में भयभीत और चिंतित रहते हैं।

    हम हमेशा सोचते हैं कि हम कुछ इच्छाओं के पूरे होने के बाद ही खुश होंगे। उदाहरण के लिए, "मैं ------ के बाद खुश रहूंगा।" फिर एक दिन आपकी इच्छा पूरी हो जाती है और आप बहुत खुश भी होते हैं। पर यह संतुष्टि की भावना कुछ दिन तक रहती है, और कोई अन्य इच्छा आपके दिमाग में बस जाती है। फिर अंतहीन इच्छाएं ऐसी होती हैं जिनके साथ हम अपनी खुशियों को जोड़ देते हैं।

    जब तक हम वर्तमान क्षण में खुश नहीं हैं, हम भविष्य में खुश नहीं हो सकते। जैसा कि हम सभी जानते हैं, "कल कभी नहीं आता"। हमें वर्तमान में रहकर, आज इसी पल का आनंद लेने की ज़रूरत है और हमारा कल खुद ही बेहतर बन जाएगा। जब हम अपना ध्यान इधर-उधर भटकाने की बजाय 'अभी' और 'यहीं' पर केंद्रित करेंगे, उसी समय हमारे खुश रहने की शुरआत हो जाएगी।

    वर्तमान में रहना निस्संदेह जीवन का पूरी तरह से आनंद लेने का एकमात्र तरीका है। तो, हम वर्तमान क्षण में अधिक उपस्थिति कैसे रख सकते हैं? इसका जवाब है: "माइंडफुलनेस्स" यानि " सचेत रहना।" अपनी चेतना को हर समय उजागर रखने से आप भोजन करने का, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताने का, सभी कार्यों का, और भी अधिक आनंद लेते हैं।

    यहां तक ​​कि ऐसी चीजें जो आपको उबाऊ लगती हैं ,जैसे घर के काम, वर्तमान में जीने से आपके लिए अद्भुत बन जाते हैं। जब आप पूरी तरह से सचेत रहते हैं, तो बर्तन धोना, सफाई करना, खाना पकाना इत्यादि कार्य भी सुखद बन सकते हैं।

    एक समय पर एक ही काम करिए, बहुत सारे कार्य एक साथ करने की कोशिश मत करिए। अपने पूरे सामर्थ्य से जो कार्य कर रहे हैं, उस ही पर पूरा ध्यान दें, तो आपको सफल परिणाम ज़रूर मिलेंगे। खुशी और आनन्द आपका साथ कभी नहीं छोड़ेंगे।

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  • 02 May
    Janhavi Dwivedi

    बनें अपने पति की सच्ची जीवनसंगिनी

    life partner

     

    ऋषभ ने जब अपना स्टार्ट -अप शुरू किया तो महीनों तक कड़ी मेहनत,दिन-रात सिर्फ अपने पैशन के बारे में सोचना और दुनिया से किनारा करके दीवानगी की हद तक अपने स्टार्ट -अप से जुड़ा रहा था।  ऐसे में अगर उसे अपनी जीवन संगिनी ऋचा का साथ न मिला होता तो शायद मंजिल पाना इतना  आसान न होता। ऋचा ने न सिर्फ पत्नी बल्कि एक दोस्त बन कर उसके हर कदम में और उसके हर फैसले में उसका साथ निभाया।

    आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में पति-पत्नी के बीच का प्यार खो जाना स्वाभाविक है। पति-पत्नी  अपने काम और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त रहते हैं, कि जिंदगी एक मशीन की तरह हो जाती है, आश्चर्यजनक स्थिति तो तब होती है, जब शादी के कई साल बाद भी दोनों एक दूसरे को समझ नहीं  पाते और तब दूरियां बढ़ने लगती है।हम यहां उन बातों की चर्चा करेंगे जो आप दोनों के बीच की डोर को मजबूत करके, आपको बनाएगी उनकी सच्ची जीवनसंगिनी।  

    आमतौर पर पत्नियां सोचती हैं कि पति को पत्नी का रूप, श्रृंगार, पहनावा, प्यार और मीठे बोल  पसंद   होते हैं लेकिन क्या सिर्फ यही बातें उसे पसंद होती हैं ? बेशक, एक पति अपनी पत्नी की नेचुरल सुंदरता के साथ साज श्रृंगार और शालीनता का भी अभिलाषी होता है, साथ ही वह पत्नी की सादगी, अनुकूलता, प्रेम की गहराई और साथ निभाने वाली खूबियां भी पसंद करता है। वह चाहता है उसकी जीवन संगिनी सिर्फ नाम की ही संगिनी ना होकर एक बुद्धिमान, भावनाओं को समझने वाली उसके सुख दुःख में साथ निभाने वाली एक सपोर्टिव साथी भी हो।

    रिश्ते में गहराई होनी जरूरी है :-

    पति पत्नी का रिश्ता तभी सफल होता है जब दोनों के बीच आत्मीयता हो ना कि बनावटीपन। पति को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी पत्नी जीवन की हर मुश्किल और विषम परिस्थिति में उसका साथ निभाएगी। वास्तव में, वैवाहिक बंधन पति और पत्नी को आत्मिक रूप से एक करता है। पत्नी का प्यार भरा साथ, उसकी जरूरतों को समझने की शक्ति और विश्वास ही एक पति का सहारा होती हैं जिसके दम पर वह दुनिया की तमाम उलझनों को आसानी से सुलझा सकता है।

    पति - पत्नी के रिश्ते में आपसी समझ और विश्वास का होना बहुत जरुरी है, एक पत्नी भी चाहती है कि पति उसकी भावनाओं को समझे और ऐसा सहारा बने जिसके साथ वह दुनिया की हर चुनौतियों का मुकाबला कर सके। इसलिए पति के साथ कदम मिलाकर चलें और जीवन की सारी समस्याओं के बोझ को आसानी से उतार फेंकें।

    पति की जरूरतों को समझें:-

    बहुत से पति पत्नी वर्षों तक एक दूसरे की जरूरतों और भावनाओं को नहीं समझ पाते,जिससे उनके बीच दूरियां बढ़ने लगती है और एक छत के नीचे रहते हुए भी वे एक दूसरे के लिए अजनबी बने रहते हैं,और मानसिक रूप से त्रस्त रहते हैं।  तो, यदि आप अपने पति की बेटर हाफ बनना चाहती हैं तो अपने पति की पसंद और नापसंद का ध्यान रखें।

    अरे, ना ना...... मैं जिस पसंद और न पसंद की बात कर रही हूँ वह सिर्फ खाना या पहनना नहीं है, बल्कि पति के पैशन, और उनके विचारों से जुड़ा हुआ है। उनके पैशन को पूरा करने में उनकी साथी बने। जैसे, यदि वे एक लेखक है, तो उनकी कलम को कुछ नया लिखने की शक्ति उन्हें आप से मिले। उन्हें राजनीति में दिलचस्पी है, तो आप भी अपनी जानकारी बढ़ायें और उनके साथ विमर्श करें। यदि उन्हें क्रिकेट पसंद है, तो आप भी दिलचस्पी लें, और  जब भी वे टूर पर हों तो समय - समय पर उन्हें स्कोर अपडेट करें।यकीन मानिये, इससे आप दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा और जीवन सुखमय हो जायेगा। उनके धनी होने का हर समय दिखावा न करें और ना ही उनकी कम आमदनी होने पर असंतोष या मजाक उड़ाएं।

    कहने का तात्पर्य यह है कि, अपने पति के जीवन की हर रिक्तता की पूर्ति करें। आपका सच्चा प्यार और साथ उनके जीवन की हर कमी को दूर करेगा, और उसी में ही तो है जीवन का आनंद।

    याद रखिये, जीवन में हर मोड़ पर अच्छे और बुरे दिन आते जाते रहते हैं, आप पर उनका भरोसा उन्हें विपरीत परिस्थिति में टूटने नहीं देगा, और आप बनेगीं उनकी सच्ची जीवन संगिनी।

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  • 24 Apr
    Oyindrila Basu

    ज्यादातर टीनेजर ही क्यों निराशा के शिकार होते हैं?

    teenager and depression

     

    यह आम तौर पर कहना जायज़ नहीं होगा, लेकिन मानसिक समस्याओं के शिकार टीनेजर बच्चे अधिक संख्या में होते हैं।

    लेकिन इसकी वजह क्या है? क्या वे निराशा की चपेट में ज्यादा आते हैं? पर क्यों?

    • टीनएज बचपन से जवानी के बीच का पड़ाव है- यह ऐसी एक बीच की स्थिति है, जहां मानसिकता में परिवर्तन आता है। हम दुनिया की ओर अकेले बढ़ने लगते हैं, हर चीज़ को पास से महसूस करते हैं, और नई चीज़ें सीखते हैं। ऐसे में इस परिवर्तन को स्वीकारना कठिन होता है। हर रास्ता आसान नहीं होता, पर अकेले ही पार करना होता है। सही तरह से सम्हाल ना पाने की वजह से निराशा हो सकती है।
    • अभिभावक परवाह कम करते हैं- टीनएज में माता-पिता बच्चों को ढील देने लगते हैं, उन्हें अकेले चलना सिखाते हैं, बच्चे में भी बेपरवाह सा स्वभाव पैदा होता है। वह परिवार से कट कर नई चीज़ों की पाना चाहता है। लेकिन इस प्रकार कभी कभी वे दुविधा में पड़ जाते हैं। अपनी पहचान पर कंफ्यूज हो जाते हैं, क्या सही है क्या गलत नहीं समझ पाते और निराश हो जाते हैं।
    • बच्चों पर पढ़ाई का बहुत प्रेशर होता है- टीनएज में आजकल बच्चों पर पढ़ाई का अधिक प्रेशर होता है। कई सब्जेक्ट्स और उस पर पढ़ाई, फिर ट्युसन, टेस्ट, परीक्षा इत्यादि से बच्चा थक जाता है लेकिन जूझता रहता है। इससे मानसिक विकास पर असर होता है। यह भी निराशा का कारण है।
    • अधिक उम्मीदों से परेशानी होती है- आजकल के बच्चों पर अव्वल आने का जूनून हमेशा होता है। प्रतिद्वद्विता इतनी बढ़ चुकी है, कि माता-पिता, दोस्तों और रिश्तेदारों की उम्मीदों का बोझ बच्चे पर ही आता है। मानसिक तनाव तो होता ही है, लेकिन उन उम्मीदों से अगर बच्चा पीछे रह जाए तो खुद ही निराश हो जाता है।
    • बाहरी चीज़ों से मन विचलित होता है - इस उम्र में दुनिया की अच्छी बुरी चीज़ों के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है। नशा, अड्डा, दोस्त, नई आदत, सब नव युवक को प्रभावित करती हैं , ऐसे में सही-गलत का फैसला करना मुश्किल होता है। इंसान अपनी कमज़ोरियों से विचलित हो कर निराश हो जाता है।
    • टीनएज बच्चों की कई समस्या होती है - इस उम्र में नई चीज़ों के साथ साथ नई समस्या भी आती हैं। सब कुछ एक उपलब्धि है। बच्चों की ऐसी कई समस्या होती हैं, जो वे घरवालों को बता नहीं पातें। अपने आप में परेशान होते हैं और डिप्रेशन में चले जाते हैं।
    • इस प्रकार निराश का वैज्ञानिक कारण भी है - टीनएज में डी सी सी नामक जीन के कार्यक्रम में गड़बड़ी से दिमाग के प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स पर गहरा असर होता है, और क्योंकि ये हिस्सा, अधिक व्यवहारिक कार्यों के लिए ज़िम्मेदार है, इसलिए इस पर कुछ भी बदलाव होने से मानसिक स्वास्थ्य पर असर होता है। जिससे व्यवहार परिवर्तन होता है ।

     

    टीनएज बच्चों के माता-पिता और शिक्षकों की ज़िम्मेदारी है कि वे उनसे दोस्ती का रिश्ता बनाएं, जिससे उन्हें उनकी समस्याओं का ज्ञान हो सके।

  • 23 Apr
    Oyindrila Basu

    सामाजिक गपशप से व्यवसाय वृद्धि कैसे करेंगे?

    word of mouth

     

    Word Of Mouth या सामाजिक गपशप व्यवसाय में कोई नई बात नहीं है, लेकिन ये सामाजिक गपशप का मतलब है सिर्फ अपने परिचित लोगों में अनौपचारिक रूप से किसी विषय पर चर्चा करना। जिसे हम गपशप कहते हैं, ये गपशप बड़े ही काम की चीज़ है, इसके माध्यम से हम अकसर काफी ज़रूरी जानकारी  बांटते हैं।

    जैसे अगर आप किसी ब्यूटी पार्लर में गए, और वहां के परिचर्चा से अति प्रसन्न हुए, तो आप खुश हो कर इस बात को अपने दोस्तों में भी बांटना चाहेंगे। जब भी आपके दोस्त आपके नए रूप से प्रभावित हो कर आपकी प्रशंसा करेंगे, तब आप उस पार्लर या सैलून के बारे में चर्चा करेंगे, उसकी प्रशंसा करेंगे, उनके व्यवहार की प्रशंसा करेंगे जो आपकी खूबसूरती के लिए ज़िम्मेदार हैं। इस प्रकार से आप उस व्यवसाय का प्रचार कर रहे हैं, और उनकी ग्राहक वृद्धि में भी सहायता कर रहे हैं।

    रिसर्च द्वारा ये साबित हुआ है क़ि मुंह ज़बानी इंसान के मस्तिष्क में एक विशेष उत्तेजक सूचना के कारण होता है। जिस विषय पर आप ज्ञान बाँट रहे हैं, उसके नाम से ही आपके  ह्रदय में   कम्पन बढ़ जाता है, सांस जोर से चलती है, और आप खुद में एक विशेष प्रेरणा महसूस करते हैं।

    मानसिक तौर पर, हम अगर किसी चीज़ से प्रभावित होते हैं, तो हम उस अनुभूति की चर्चा करना चाहते हैं, क्योंकि हम सामाजिक जीव हैं।

    मनोवैज्ञानिक बर्जर Berger इसी माध्यम को सब से उपयुक्त बताते हैं।

    इसके कई कारण हैं -

    1. हम अपनी अनुभूति बताते हैं क्योंकि हम खुद को समाज में ग्यानी साबित करना चाहते हैं; अपने दोस्तों में बातचीत के दौरान, खुद को अधिक समझदार साबित करना चाहते हैं।
    2. हम खुद को किसी दोस्त की मदद करने के आनंद से दूर नहीं रख पातें।
    3. अगर हमें कुछ पसंद आया है, तो हम तुरंत उसे बताना चाहते हैं, क्योंकि पेट में बात नहीं पचती। :)

     

    पर ये अच्छी भावना किसी भी दुकान या सामान के बारे में तब तक रहती है, जब तक उसके विक्रेता हमसे हमारी अनुभव चर्चा करने के लिए अनुरोध ना करें।

    जब तक हम अपने मन से चर्चा करते हैं तब तक सब अच्छा लगता है, दूसरे की अनुरोध से हम क्रोधित हो जाते हैं।

    एक अच्छे व्यवसायी को पता होना चाहिए कि ग्राहक की मुंह ज़बानी को कैसे इस्तेमाल किया जाए।

    • वितरण से ही बातचीत पनपती है- अपने सामान या कंपनी को रोचक रूप से पेश करें ताकि ग्राहक उसके बारे में बात करने के लिए मजबूर हो। बहुत अच्छी या बहुत बड़ी बातों का प्रचार करें ताकि आपकी चीज़ नज़र में आये। ऐसे ही चेतन भगत जी की किताबें भी मशहूर होती हैं। कुछ उनकी किताब को बकवास मानते हैं, लेकिन आलोचक उन्हें बेस्ट सेलर बनाते हैं, तो आप एक ग्राहक के रूप में एक बार तो वह किताब खरीदेंगे ही, जानने के लिए की आखिर सच क्या है।
    • ग्राहक की ज़रूरतों को समझिए- अपने मत से ज़्यादा अपने खरीददारों की इच्छा पर ध्यान दें। उन्हें संतुष्ट करना अधिक ज़रूरी है, तभी आपके सामान की चर्चा होगी।
    • अगर सामान का प्रचार करना है, तो उसके प्रचार के बारे में अधिक ना सोचें- लोगों के दरवाजे खटखटाना आज के दिन में अच्छी बात नहीं। अपनी वस्तु के प्रचार के लिए किसी से बिनती करना, या फिर अनुरोध करने से कुछ नहीं होता, बल्कि इसका उलटा प्रभाव पड़ता है। अपने आप ग्राहक को अपनी सामाजिक गपशप का इस्तेमाल करने दीजिये।
    • नई तकनीकों का इस्तेमाल करें- आज कंप्यूटर से हम लोगों के और करीब आ गए हैं। इस माध्यम का सही इस्तेमाल करें, अपनी वस्तु के प्रचार के लिए।

    इससे लोगों में खबर जल्द फैलेगी। एक ग्राहक को फायदा होगा तो वे अपने दोस्तों को बताएंगे।

    तो गपशप से व्यवसाय को काफी फायदा हो सकता है।