कुल 169 लेख

  • 12 May
    Oyindrila Basu

    सुबह उठने के फायदे

    good morning

     

    दोस्तों आप सब जानते हैं सुबह का उठना फायदेमंद होता है, सुबह उठने से हम दिनभर ताजगी महसूस करते हैं

    सुबह  उठनेसे दिन और जीवन की गति का पता चलता है।

    एक अंग्रेजी कथन है "जल्द सोना और जल्द उठना इंसान को समझदार और धनवान बनाता है"  

    आज इस बात की सच्चाई पता चल रही है।

    प्रातःकाल बहुत अहम होता है। आप पूरा दिन कैसा महसूस करेंगे यह इस बात पर निर्भर है कि आप सुबह को कैसे ग्रहण करते हैं ।

    सुबह जल्द उठने के कई फायदे हैं-

    1. जल्द उठने से आप का दिन बड़ा हो जाता है, आपको ज्यादा समय मिलता है।
    2. जो वक़्त आप खुद के लिए नहीं निकाल पाते, उसे सुबह आप के लिए निकालती है।
    3. शरीर और स्वास्थ्य की परिचर्चा के लिए प्रातःकाल सबसे उत्तम समय है।
    4. मन की शांति के लिए भी सुबह का समय ही बेहतर है।

    ‘The Miracle Morning’ के लेखक हाल एलरोड ये मानते हैं, कि जो व्यक्ति सुबह जल्दी उठता है, उसकी ज़िन्दगी ३६० डिग्री पलट जाती है।

    सुख समृद्धि और सफलता खुद चल कर आपके पास आती है, अगर आप सुबह उठने का अभ्यास करते हैं।

    हाल बताते हैं,"मैं परेशान था",  "मेरा घर, मेरी आधी सम्पत्ति, सब जा चुकी थी, मैं शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका था, तभी मैंने खुद से पूछा की दुनिया के सबसे सफल और कामयाब लोग क्या करते होंगे जो मैं नहीं करता। और फिर मैंने पढ़ा, इन सब में एक ही बात कॉमन है, ये सब सुबह जल्दी उठते हैं और खुद पर मेहनत करते हैं"।

    दक्षिण अमरीका में रहने वाले एलरोड हमें SAVERS का ज्ञान देते हैं।

    S से SILENCE यानी शांत- इसका मतलब है ध्यान करना, मैडिटेशन जिससे आपके शरीर और मन को अच्छा महसूस होता है ।

    A से AFFIRMATION यानी दृढ निश्चय - जीवन में सफलता पाने के लिए एक लक्ष्य, एक मंज़िल की प्राप्ति होना ज़रूरी है। खुद को और बेहतर बनाने से आप इस लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे।

    V से VISUALIZATION यानी दृष्टि- जब आपने दिन के हिसाब से लक्ष्य बना लिया है, तो खुद को उस सुन्दर स्थिति में देखिये, अपने मन की आँखों का इस्तेमाल कीजिये। इससे आपको लक्ष्य प्राप्ति के लिए कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।

    E से EXERCISE यानी व्यायाम- व्यायाम शरीर को ही नहीं, मस्तिष्क को भी ऊर्जा देता है। इससे सोच और समझ की वृद्धि होती है, स्फूर्ति रहती है।

    R से READING यानी पढ़ाई- दिन में १० मिनट पढ़ाई ज़रूर करें। चाहे वह न्यूजपेपर हो या फिर कोई भी किताब या कथन, पढ़ते रहना ज़रूरी है, इससे ज्ञान बढ़ेगा।

    S से SCRIBBING यानी लिखना- जो भी आप पढ़ें उसे अपनी भाषा में लिखने की कोशिश करें, ये अकसर काम आता है।

    लेकिन सबसे मुश्किल है सुबह उठना, तो ये काम कैसे करेंगे?

     

    • सोने से पहले से दृढ़ निश्चय हों कि आप सुबह जल्दी उठेंगे।
    • घड़ी पर अलार्म डाल कर सोने जाएँ, और उसे दूर रखें, ताकि सुबह आवाज़ बंद करने के लिए आपको उठ कर, चल कर उसके पास जाना पड़े ।
    •  दन्त मंजन चालु रखें, इन हरकतों से आपकी थकान दूर हो जायेगी।
    • एक या दो गिलास पानी भी पी सकते हैं।
    • फिर खुद को प्रातः भ्रमण के लिए तैयार कर लें और व्यायाम के लिए प्रस्तुत हो जाएँ।

    एलरोड बताते हैं "मैंने तो ये अभ्यास शुरू कर दिया है, और मुझे अधिक सफलता मिली है, मेरी आमदनी दुगनी हो गयी है"  

    आज उनकी किताब, 'The Miracle Morning' ऐमज़ॉन पर सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में से एक है।

    तो हम सबको इसका अभ्यास करना चाहिए ताकि हम कुछ बेहतर हासिल करने की ओर बढ़ सकें।

  • 11 May
    Janhavi Dwivedi

    तलाक -क्या बच्चे को अभिभावक चुनने का हक़ होना चाहिए ?

    should divorcing parents make their child to choose

     

    मैं किसके साथ जाऊँ? मुझे तो मम्मी-डैडी दोनों से प्यार है... 

    ऐसे बहुत से कारक होते हैं, जो यह निर्धारित करते हैं कि एक बच्चा अपने माता-पिता के बारे में क्या सोचता है। हो सकता है बच्चा माता-पिता में से किसी एक को दूसरे से ज्यादा प्राथमिकता दे, क्योंकि वह अभिभावक नियमों के प्रति उदार है, उन्हें ज्यादा देर तक बाहर रहने देता है ,उन्हें कोई दूसरा कैरियर विकल्प चुनने की आजादी देता है, आदि-आदि ।

    लेकिन जब बच्चे परिपक्व हो जाते हैं तो उन्हें समझ में आता है कि वह दोनों (माता-पिता )से बने हैं। मगर किसी एक पैरेंट के द्वारा बहुत मार् और डांट-डपट के बावजूद वे दोनों को प्यार करते हैं, लेकिन अलग तरीके से।

    हो सकता है कि वह एक(माता/पिता) के पास अनुमति लेने जाते हों, और दूसरे के पास जीवन से संबंधित सलाह के लिए। हालाँकि इन सबके लिए उन्हें दोनों के साथ एक प्रकार का बंधन होने की जरूरत होती है।

    यदि बच्चे के बड़े होते समय उसके जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में दोनों (माता-पिता )में से कोई एक अनुपस्थित या एक दूरी पर भी नहीं है, तो बच्चे के मन में सिर्फ उसकी कुछ यादें ही रहतीं हैं और प्यार एक कर्तव्य में बदल जाता है साथ ही बच्चे का दायित्व उस पैरेंट की तरफ ज्यादा बढ़ता जाता है, जो उसके सामने रहता है।

    माँ के घर संभालने और बच्चे का पालन करने की भूमिका को ध्यान में रखते हुए विशेषकर उस समाज में जहां अभी भी ये समझा जाता है कि माँ ही बच्चे की प्रमुख देखभाल करने वाली होती है, माँ के साथ बिताया गया समय बच्चे (चाहे वह लड़का हो या लड़की ) और माँ के बीच संबंध को मजबूत बनाता है, और बच्चा माँ के साथ ही रहना चाहता है।

    हम अक्सर,ये संरचना एक परिवार में देखते है, जहां पिता एक सीईओ के जैसा होता है जिसके पास आप जरूरी बातों के लिए जाते हो, और माँ एक टीम लीडर या प्रोजेक्ट लीडर के रूप में  होती है, जिससे आप अपनी सभी छोटी-बड़ी परेशानियां बताते हो।

    यह ज्यादा अच्छी तरह से काम करता है, केवल पिता-पुत्र का बंधन तब तनाव ग्र्स्त हो जाता है, जब पिता सीईओ की भूमिका को छोड़ कर वापस डैड नहीं बनते।

    तलाक के मामलों में बच्चों की कस्टडी को लेकर ये जानना दिलचस्प होता है, कि क्या बच्चे यह निर्णय कर सकते हैं कि, किस  पैरेंट को वे ज्यादा प्यार करते हैं।

    अक्सर बच्चे से उनकी पसंद के बारे में पूछा जाता है, हालाँकि यह कानून की अदालत के ध्यान में लाई जाने वाली बातों का सिर्फ एक पहलू होता है।

    हालाँकि यहां आपको बहुत से वकीलों को ये बताना होगा कि: बच्चे को चुनाव करने को ना कहें, बच्चा जब तक १४ साल का नहीं हो जाता/जाती एक ऐसे संसार की कल्पना करता है, जो दोनों माता -पिता के साथ पूरी होती है। पैरेंट के बीच तलाक की स्थिति उसके लिए कठिन होती है।

    बच्चे से पूछना कोई समाधान नहीं है, क्योंकि वे ये नहीं जानते कि तलाक जैसी स्थिति में उनके लिए सबसे अच्छा क्या है।

    यदि बच्चा किसी एक पैरेंट के पक्ष में अपनी राय नहीं देता है तो वह खुद को उस पैरेंट को कम बताने का दोषी समझता है और यदि वह कुछ कहता है, तो उसे लगता है कि उसने दूसरे पैरेंट को नीचे गिरा दिया।

    प्यार एक जटिल भाव है, इसे विकल्पों में नहीं बाँटना चाहिए।

    विश्व भर में बच्चों का एक ही नजरिया होता है जहां प्यार  माता-पिता दोनों के लिए होता है,और इसकी अभिव्यक्ति प्रत्येक माता-पिता के व्यक्तित्व के चरित्र लक्षण पर निर्भर करती है।

    तब,कम से कम इस केस में  विकल्प का मतलब कुछ नहीं तो परेशानी और तनाव जरूर है।

  • 02 May
    Janhavi Dwivedi

    बनें अपने पति की सच्ची जीवनसंगिनी

    life partner

     

    ऋषभ ने जब अपना स्टार्ट -अप शुरू किया तो महीनों तक कड़ी मेहनत,दिन-रात सिर्फ अपने पैशन के बारे में सोचना और दुनिया से किनारा करके दीवानगी की हद तक अपने स्टार्ट -अप से जुड़ा रहा था।  ऐसे में अगर उसे अपनी जीवन संगिनी ऋचा का साथ न मिला होता तो शायद मंजिल पाना इतना  आसान न होता। ऋचा ने न सिर्फ पत्नी बल्कि एक दोस्त बन कर उसके हर कदम में और उसके हर फैसले में उसका साथ निभाया।

    आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में पति-पत्नी के बीच का प्यार खो जाना स्वाभाविक है। पति-पत्नी  अपने काम और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त रहते हैं, कि जिंदगी एक मशीन की तरह हो जाती है, आश्चर्यजनक स्थिति तो तब होती है, जब शादी के कई साल बाद भी दोनों एक दूसरे को समझ नहीं  पाते और तब दूरियां बढ़ने लगती है।हम यहां उन बातों की चर्चा करेंगे जो आप दोनों के बीच की डोर को मजबूत करके, आपको बनाएगी उनकी सच्ची जीवनसंगिनी।  

    आमतौर पर पत्नियां सोचती हैं कि पति को पत्नी का रूप, श्रृंगार, पहनावा, प्यार और मीठे बोल  पसंद   होते हैं लेकिन क्या सिर्फ यही बातें उसे पसंद होती हैं ? बेशक, एक पति अपनी पत्नी की नेचुरल सुंदरता के साथ साज श्रृंगार और शालीनता का भी अभिलाषी होता है, साथ ही वह पत्नी की सादगी, अनुकूलता, प्रेम की गहराई और साथ निभाने वाली खूबियां भी पसंद करता है। वह चाहता है उसकी जीवन संगिनी सिर्फ नाम की ही संगिनी ना होकर एक बुद्धिमान, भावनाओं को समझने वाली उसके सुख दुःख में साथ निभाने वाली एक सपोर्टिव साथी भी हो।

    रिश्ते में गहराई होनी जरूरी है :-

    पति पत्नी का रिश्ता तभी सफल होता है जब दोनों के बीच आत्मीयता हो ना कि बनावटीपन। पति को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी पत्नी जीवन की हर मुश्किल और विषम परिस्थिति में उसका साथ निभाएगी। वास्तव में, वैवाहिक बंधन पति और पत्नी को आत्मिक रूप से एक करता है। पत्नी का प्यार भरा साथ, उसकी जरूरतों को समझने की शक्ति और विश्वास ही एक पति का सहारा होती हैं जिसके दम पर वह दुनिया की तमाम उलझनों को आसानी से सुलझा सकता है।

    पति - पत्नी के रिश्ते में आपसी समझ और विश्वास का होना बहुत जरुरी है, एक पत्नी भी चाहती है कि पति उसकी भावनाओं को समझे और ऐसा सहारा बने जिसके साथ वह दुनिया की हर चुनौतियों का मुकाबला कर सके। इसलिए पति के साथ कदम मिलाकर चलें और जीवन की सारी समस्याओं के बोझ को आसानी से उतार फेंकें।

    पति की जरूरतों को समझें:-

    बहुत से पति पत्नी वर्षों तक एक दूसरे की जरूरतों और भावनाओं को नहीं समझ पाते,जिससे उनके बीच दूरियां बढ़ने लगती है और एक छत के नीचे रहते हुए भी वे एक दूसरे के लिए अजनबी बने रहते हैं,और मानसिक रूप से त्रस्त रहते हैं।  तो, यदि आप अपने पति की बेटर हाफ बनना चाहती हैं तो अपने पति की पसंद और नापसंद का ध्यान रखें।

    अरे, ना ना...... मैं जिस पसंद और न पसंद की बात कर रही हूँ वह सिर्फ खाना या पहनना नहीं है, बल्कि पति के पैशन, और उनके विचारों से जुड़ा हुआ है। उनके पैशन को पूरा करने में उनकी साथी बने। जैसे, यदि वे एक लेखक है, तो उनकी कलम को कुछ नया लिखने की शक्ति उन्हें आप से मिले। उन्हें राजनीति में दिलचस्पी है, तो आप भी अपनी जानकारी बढ़ायें और उनके साथ विमर्श करें। यदि उन्हें क्रिकेट पसंद है, तो आप भी दिलचस्पी लें, और  जब भी वे टूर पर हों तो समय - समय पर उन्हें स्कोर अपडेट करें।यकीन मानिये, इससे आप दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा और जीवन सुखमय हो जायेगा। उनके धनी होने का हर समय दिखावा न करें और ना ही उनकी कम आमदनी होने पर असंतोष या मजाक उड़ाएं।

    कहने का तात्पर्य यह है कि, अपने पति के जीवन की हर रिक्तता की पूर्ति करें। आपका सच्चा प्यार और साथ उनके जीवन की हर कमी को दूर करेगा, और उसी में ही तो है जीवन का आनंद।

    याद रखिये, जीवन में हर मोड़ पर अच्छे और बुरे दिन आते जाते रहते हैं, आप पर उनका भरोसा उन्हें विपरीत परिस्थिति में टूटने नहीं देगा, और आप बनेगीं उनकी सच्ची जीवन संगिनी।

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  • 24 Apr
    Oyindrila Basu

    ज्यादातर टीनेजर ही क्यों निराशा के शिकार होते हैं?

    teenager and depression

     

    यह आम तौर पर कहना जायज़ नहीं होगा, लेकिन मानसिक समस्याओं के शिकार टीनेजर बच्चे अधिक संख्या में होते हैं।

    लेकिन इसकी वजह क्या है? क्या वे निराशा की चपेट में ज्यादा आते हैं? पर क्यों?

    • टीनएज बचपन से जवानी के बीच का पड़ाव है- यह ऐसी एक बीच की स्थिति है, जहां मानसिकता में परिवर्तन आता है। हम दुनिया की ओर अकेले बढ़ने लगते हैं, हर चीज़ को पास से महसूस करते हैं, और नई चीज़ें सीखते हैं। ऐसे में इस परिवर्तन को स्वीकारना कठिन होता है। हर रास्ता आसान नहीं होता, पर अकेले ही पार करना होता है। सही तरह से सम्हाल ना पाने की वजह से निराशा हो सकती है।
    • अभिभावक परवाह कम करते हैं- टीनएज में माता-पिता बच्चों को ढील देने लगते हैं, उन्हें अकेले चलना सिखाते हैं, बच्चे में भी बेपरवाह सा स्वभाव पैदा होता है। वह परिवार से कट कर नई चीज़ों की पाना चाहता है। लेकिन इस प्रकार कभी कभी वे दुविधा में पड़ जाते हैं। अपनी पहचान पर कंफ्यूज हो जाते हैं, क्या सही है क्या गलत नहीं समझ पाते और निराश हो जाते हैं।
    • बच्चों पर पढ़ाई का बहुत प्रेशर होता है- टीनएज में आजकल बच्चों पर पढ़ाई का अधिक प्रेशर होता है। कई सब्जेक्ट्स और उस पर पढ़ाई, फिर ट्युसन, टेस्ट, परीक्षा इत्यादि से बच्चा थक जाता है लेकिन जूझता रहता है। इससे मानसिक विकास पर असर होता है। यह भी निराशा का कारण है।
    • अधिक उम्मीदों से परेशानी होती है- आजकल के बच्चों पर अव्वल आने का जूनून हमेशा होता है। प्रतिद्वद्विता इतनी बढ़ चुकी है, कि माता-पिता, दोस्तों और रिश्तेदारों की उम्मीदों का बोझ बच्चे पर ही आता है। मानसिक तनाव तो होता ही है, लेकिन उन उम्मीदों से अगर बच्चा पीछे रह जाए तो खुद ही निराश हो जाता है।
    • बाहरी चीज़ों से मन विचलित होता है - इस उम्र में दुनिया की अच्छी बुरी चीज़ों के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है। नशा, अड्डा, दोस्त, नई आदत, सब नव युवक को प्रभावित करती हैं , ऐसे में सही-गलत का फैसला करना मुश्किल होता है। इंसान अपनी कमज़ोरियों से विचलित हो कर निराश हो जाता है।
    • टीनएज बच्चों की कई समस्या होती है - इस उम्र में नई चीज़ों के साथ साथ नई समस्या भी आती हैं। सब कुछ एक उपलब्धि है। बच्चों की ऐसी कई समस्या होती हैं, जो वे घरवालों को बता नहीं पातें। अपने आप में परेशान होते हैं और डिप्रेशन में चले जाते हैं।
    • इस प्रकार निराश का वैज्ञानिक कारण भी है - टीनएज में डी सी सी नामक जीन के कार्यक्रम में गड़बड़ी से दिमाग के प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स पर गहरा असर होता है, और क्योंकि ये हिस्सा, अधिक व्यवहारिक कार्यों के लिए ज़िम्मेदार है, इसलिए इस पर कुछ भी बदलाव होने से मानसिक स्वास्थ्य पर असर होता है। जिससे व्यवहार परिवर्तन होता है ।

     

    टीनएज बच्चों के माता-पिता और शिक्षकों की ज़िम्मेदारी है कि वे उनसे दोस्ती का रिश्ता बनाएं, जिससे उन्हें उनकी समस्याओं का ज्ञान हो सके।

  • 23 Apr
    Oyindrila Basu

    सामाजिक गपशप से व्यवसाय वृद्धि कैसे करेंगे?

    word of mouth

     

    Word Of Mouth या सामाजिक गपशप व्यवसाय में कोई नई बात नहीं है, लेकिन ये सामाजिक गपशप का मतलब है सिर्फ अपने परिचित लोगों में अनौपचारिक रूप से किसी विषय पर चर्चा करना। जिसे हम गपशप कहते हैं, ये गपशप बड़े ही काम की चीज़ है, इसके माध्यम से हम अकसर काफी ज़रूरी जानकारी  बांटते हैं।

    जैसे अगर आप किसी ब्यूटी पार्लर में गए, और वहां के परिचर्चा से अति प्रसन्न हुए, तो आप खुश हो कर इस बात को अपने दोस्तों में भी बांटना चाहेंगे। जब भी आपके दोस्त आपके नए रूप से प्रभावित हो कर आपकी प्रशंसा करेंगे, तब आप उस पार्लर या सैलून के बारे में चर्चा करेंगे, उसकी प्रशंसा करेंगे, उनके व्यवहार की प्रशंसा करेंगे जो आपकी खूबसूरती के लिए ज़िम्मेदार हैं। इस प्रकार से आप उस व्यवसाय का प्रचार कर रहे हैं, और उनकी ग्राहक वृद्धि में भी सहायता कर रहे हैं।

    रिसर्च द्वारा ये साबित हुआ है क़ि मुंह ज़बानी इंसान के मस्तिष्क में एक विशेष उत्तेजक सूचना के कारण होता है। जिस विषय पर आप ज्ञान बाँट रहे हैं, उसके नाम से ही आपके  ह्रदय में   कम्पन बढ़ जाता है, सांस जोर से चलती है, और आप खुद में एक विशेष प्रेरणा महसूस करते हैं।

    मानसिक तौर पर, हम अगर किसी चीज़ से प्रभावित होते हैं, तो हम उस अनुभूति की चर्चा करना चाहते हैं, क्योंकि हम सामाजिक जीव हैं।

    मनोवैज्ञानिक बर्जर Berger इसी माध्यम को सब से उपयुक्त बताते हैं।

    इसके कई कारण हैं -

    1. हम अपनी अनुभूति बताते हैं क्योंकि हम खुद को समाज में ग्यानी साबित करना चाहते हैं; अपने दोस्तों में बातचीत के दौरान, खुद को अधिक समझदार साबित करना चाहते हैं।
    2. हम खुद को किसी दोस्त की मदद करने के आनंद से दूर नहीं रख पातें।
    3. अगर हमें कुछ पसंद आया है, तो हम तुरंत उसे बताना चाहते हैं, क्योंकि पेट में बात नहीं पचती। :)

     

    पर ये अच्छी भावना किसी भी दुकान या सामान के बारे में तब तक रहती है, जब तक उसके विक्रेता हमसे हमारी अनुभव चर्चा करने के लिए अनुरोध ना करें।

    जब तक हम अपने मन से चर्चा करते हैं तब तक सब अच्छा लगता है, दूसरे की अनुरोध से हम क्रोधित हो जाते हैं।

    एक अच्छे व्यवसायी को पता होना चाहिए कि ग्राहक की मुंह ज़बानी को कैसे इस्तेमाल किया जाए।

    • वितरण से ही बातचीत पनपती है- अपने सामान या कंपनी को रोचक रूप से पेश करें ताकि ग्राहक उसके बारे में बात करने के लिए मजबूर हो। बहुत अच्छी या बहुत बड़ी बातों का प्रचार करें ताकि आपकी चीज़ नज़र में आये। ऐसे ही चेतन भगत जी की किताबें भी मशहूर होती हैं। कुछ उनकी किताब को बकवास मानते हैं, लेकिन आलोचक उन्हें बेस्ट सेलर बनाते हैं, तो आप एक ग्राहक के रूप में एक बार तो वह किताब खरीदेंगे ही, जानने के लिए की आखिर सच क्या है।
    • ग्राहक की ज़रूरतों को समझिए- अपने मत से ज़्यादा अपने खरीददारों की इच्छा पर ध्यान दें। उन्हें संतुष्ट करना अधिक ज़रूरी है, तभी आपके सामान की चर्चा होगी।
    • अगर सामान का प्रचार करना है, तो उसके प्रचार के बारे में अधिक ना सोचें- लोगों के दरवाजे खटखटाना आज के दिन में अच्छी बात नहीं। अपनी वस्तु के प्रचार के लिए किसी से बिनती करना, या फिर अनुरोध करने से कुछ नहीं होता, बल्कि इसका उलटा प्रभाव पड़ता है। अपने आप ग्राहक को अपनी सामाजिक गपशप का इस्तेमाल करने दीजिये।
    • नई तकनीकों का इस्तेमाल करें- आज कंप्यूटर से हम लोगों के और करीब आ गए हैं। इस माध्यम का सही इस्तेमाल करें, अपनी वस्तु के प्रचार के लिए।

    इससे लोगों में खबर जल्द फैलेगी। एक ग्राहक को फायदा होगा तो वे अपने दोस्तों को बताएंगे।

    तो गपशप से व्यवसाय को काफी फायदा हो सकता है।