• 18 May
    Janhavi Dwivedi

    क्या करें जब हमसफ़र निकले बेवफा?

    hrithik kangana sussanne

     

     

    अनीता की जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था, वह अपनी ११ साल की बेटी और पति के साथ खुश थी। अचानक उसकी जिंदगी में भूचाल सा आ गया….. जब उसे यह पता चला कि उसके पति का अपने ऑफिस की किसी लड़की के साथ अफेयर चल रहा है।....

    अनीता से ये बात सहन नहीं हुई, और उन दोनों  पति पत्नी के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ और अंत में, अनीता ने अपना सामान पैक किया और बेटी को लेकर अपने माता-पिता के घर रवाना हो गई।

    उसके पति और ससुराल वालों ने कई बार बात-चीत की कोशिश की, किन्तु  पति पत्नी के बीच तनाव बढ़ता ही गया और बात तलाक तक पहुंच गई।

    चूँकि अनीता का पति अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था, उसने अच्छे वकीलों की मदद से अपनी बेटी की परवरिश का अधिकार प्राप्त कर लिया, और वे दोनों हमेशा के लिए अलग हो गए।

     

    आजकल महानगरों में इस तरह की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, और हमारा मध्य वर्ग अपने पारम्परिक मूल्यों और पश्चिमी रहन-सहन के बीच का युद्ध लड़ रहा है, जहां एक ओर हम पश्चिमी रहन-सहन को अपनाना चाहते हैं वहीं उसके साइड इफेक्ट्स से बचना भी चाहते हैं, फलस्वरूप विवाहेत्तर संबंधों की संख्या बढ़ने के साथ ही तलाक की संख्या में भी वृद्धि हो रही है।

    आज की महिलाएं विवाद को सुलझाने में असफल हो रही हैं, जिसका खामियाजा उनके साथ साथ पूरे परिवार और बच्चों को उठाना पड़ता है।  अनीता और उसके पति ने कुछ ऐसी गलतियां की जिनसे उनके बीच का रिश्ता एक भयावह सपने की तरह हो गया।

     

    उन्होंने अपने विवाद में इन परिणामों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। :-

     

    १. अपने बच्चे के भविष्य की परवाह नहीं की:- बच्चों की दुनिया उनके माता पिता से होती है, आपके अलग होने का सबसे ज्यादा प्रभाव उनपर पड़ेगा जहां उनसे उनका एक अभिभावक अलग हो जायेगा, वहीँ उनकी भविष्य के प्रति चिंताएं भी बढ़ जाएँगी। 

     

    २. बच्चे के बाल मन पर इस विवाद का क्या असर पड़ेगा और क्या वह जीवन में सहज रूप से रह पायेगा इस बात पर भी विचार नहीं किया :-बच्चे के मन पर मम्मी-पापा का तलाक एक नकारात्मक प्रभाव छोड़ जायेगा, उन्हें सहज होने में वक्त लग सकता है और जो शायद उनके व्यक्तित्व को भी प्रभावित करें।

     

    ३. क्या उनके बीच सुलह और सुधार की कोई गुंजायश नहीं बची थी ?: बेशक पति के विवाहेत्तर संबंध किसी भी पत्नी को स्वीकार नहीं हो सकते लेकिन यदि पति को अपनी गलती का अहसास हो गया है और वह आपको भरोसा दे रहा है कि, भविष्य में ऐसा नहीं होगा तो, ठंडे दिमाग से विचार करें, यदि आप उन्हें माफ़ कर सकतीं हैं, तो आपका फैसला आपके परिवार को बिखरने से बचा सकता है। 

     

    ४. क्या घर के बुजुर्गों ने इस रिश्ते को बचाने की कोई कोशिश की ?:-कभी-कभी घर के बुजुर्ग इन समस्याओं को बेहतर तरीके से सुलझाने में अपनी भूमिका निभाते हैं, यदि वे आपके साथ खड़े होते हैं तो आप इस परिस्थिति में भी अपने परिवार को जोड़े रख सकती हैं। 

     

    ५. क्या पति पत्नी ने अपने भविष्य के बारे में सोचा ?:- रिश्तों में कड़वाहट आने के बाद आपने आवेश में आकर अलग होने का फैसला तो कर लिया लेकिन क्या आपने सोचा कि अलग होने के बाद भी आप खुश रह सकेंगे, यदि बच्चों से भी अलग हो गए तो क्या वो खुशियां दोबारा मिल पाएंगी। 

     

    ६. क्या दोनों पति पत्नी की अपने इतने साल पुराने रिश्ते को बचाने कोई रूचि थी ? :-पति पत्नी का रिश्ता बेहद खूबसूरत और नाजुक होता है, यदि इस रिश्ते में प्यार और विश्वास की कमी हो जाती है तो रिश्ता तकलीफ देने लगता है,लेकिन कोई भी निर्णय जल्दबाजी में या आवेश में आकर ना लें, परिवार जितना आपका है, उतना ही आपके पति का भी है, क्या आप दोनों वाकई में एक दूसरे से अलग होना चाहते हैं, शांत होकर विचार करें।

     

    तलाक के बाद के परिणाम हमेशा दुखदायी होते हैं जो बसी बसाई जिंदगी को दुःख और अवसाद के गहरे गर्त में गिरा देते हैं, जो ताउम्र पीड़ा देते हैं। कोई निर्णय लेने से पहले निम्न सलाहों पर ध्यान देकर इस अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता है :-

     

    १. आपके पति के किसी अन्य लड़की से संबंध किस स्तर तक जा पहुंचे हैं, क्या यह उसके प्रति सिर्फ आकर्षण है या कोई भावनात्मक जुड़ाव? इसे समझने की आवश्यकता है।

     

    २. यदि उनकी बेवफाई को आप भूल सकती हैं तो इस पर विचार करें।

     

    ३. कहा गया है, 'यदि सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते' उसी प्रकार यदि आपके पति भी अपराध बोध महसूस कर रहे हैं और वे आपको खोना नहीं चाहते तो आप भी पुरानी कड़वी यादों को भुलाकर अपने संबंधों को एक मौका दीजिये।

     

    ४. जब आपको कुछ समझ ना आये तो हो सके तो बुजुर्गों या किसी अनुभवी काउंसलर की मदद लीजिए, वे आपकी स्थिति को समझ कर योग्य परामर्श देंगे।

     

    ५. एक बार ये भी  सोचिये कि तलाक के बाद आपका और बच्चों का जीवन कैसा होगा?

     

     ६. पति के विवाहेत्तर संबंध को जानने के बाद आप क्रोध, निराशा और अवसाद से जूझ रही हैं, तो जल्दबाजी में कोई फैसला ना ले। पहले स्वयं को संतुलित करें और सोच समझ कर कोई निर्णय लें।

     

    यदि जोड़ने की कोशिशों पर संबंधों का अलगाव भारी पड़ जाय,

    पति की बेवफाई और उनके व्यवहार के कारण अवसाद और चिंता से आपका जीवन जीना दूभर हो गया है,

    आपका आपके पति पर से विश्वास खत्म हो गया है।

    आपका मन अब इस बंधन में नहीं रहना चाहता जहां प्यार ही नहीं बचा,

    और अपने अलग होने का फैसला कर लिया है तो सबसे पहले बच्चों को आश्वस्त करें क्योंकि आप के तलाक से सिर्फ आप पर ही नहीं बल्कि बच्चों के जीवन पर भी असर पड़ेगा, वे इस बात को पहले सोचेंगे कि पापा-मम्मी के अलग होने के बाद उनका भविष्य क्या होगा।

    उन्हें इस बात का भरोसा दिलाएं कि:

    उनके लिए आप दोनों का प्यार पहले की तरह ही रहेगा और उनकी जिंदगी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    उनके हर सवाल का उत्तर देकर उनके मन की चिंताओं को कम कीजिये, जैसे तलाक के बाद:

    घर से अलग कौन होगा?

    उन्हें घुमाने कौन ले जायेगा?

    पेरेंट्स मीटिंग में कौन जायेगा?

    होमवर्क कौन कराएगा?

    आजकल आधुनिकता की अंधी दौड़ में रिश्तों में प्यार और विश्वास की कमी हो रही है, जिसका  परिणाम है तलाक की बढ़ती संख्या। आज महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं और पति की बेवफाई के बाद साथ रहना उन्हें तनिक भी गंवारा नहीं होता।

    आज के जोड़ों में बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है, और क्रोध, प्रतिशोध और आवेश में आकर वे तलाक लेने का फैसला तो कर लेते हैं लेकिन बाद में आत्मविश्लेषण करने पर उन्हें ये जल्दबाजी में उठाया गया कदम लगता है, और तब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है।

    सबसे ज्यादा दुःख तो बच्चों को होता है, बच्चे आपके अलग होने के बाद सिर्फ अपने पापा से ही दूर नहीं होंगे बल्कि बाबा-दादी, चाचा, बुआ जैसे प्यार करने वाले रिश्तों से भी महरूम रह जायेंगे।

    आपका तलाक जैसा कठिन फैसला कहीं कई जिंदगियों में तूफान का कारण ना बन जाये। इसलिए रिश्ते को बचाकर आप कई जिंदगियों को बिखरने से बचा सकती हैं।

    बेशक पति की बेवफाई के बाद आप उनके  साथ रहना नहीं चाहतीं लेकिन क्या आवेश में आकर इतना कठिन निर्णय आपके परिवार के हित में होगा ये निर्णय आपको करना है, लेकिन याद रखें इस निर्णय  से जहां दो दिल अलग होंगे वहीं बच्चों की स्वाभाविक परवरिश भी प्रभावित होगी।

    इसलिए बिना रिश्ते को बचाने की कोई कोशिश किये, तलाक लेने का आवेदन कर देना सही नहीं है।

    याद रखें जोड़ना हमेशा सुखदायक है और तोडना पीड़ादायक।

    आगे पढ़ें: तलाक -क्या बच्चे को अभिभावक चुनने का हक़ होना चाहिए?

     

     

  • 13 May
    Janhavi Dwivedi

    क्या जीवन में पैसा सबसे महत्वपूर्ण है?

    Is money most important in life

     

     

    हम में बहुत से लोग हर सुबह ऐसी नौकरी पर जाने के लिए तैयार होते हैं जिसमे हमें ख़ुशी नहीं मिलती। या तो काम हमें अनाकर्षक लगता है, या नौकरशाही और राजनीति के चलते आप मजबूरी में फंसे हुए हैं।

    वास्तव में आप महीने के अंत में आय के रूप में मिलने वाले चेक के लिए काम कर रहे हैं। कभी, हमें उन पैसों की जरूरत होती है, कभी कम पैसों में हम काम कर सकते हैं।

    तब हम क्यों ऐसे काम करते रहते हैं, जो हमें हमारी पसंद का काम नहीं करने देता?

    इसका कारण वह प्रसिद्ध धारणा है, कि "हम तभी खुश रहेंगे जब हमारे पास धन होगा"

    हम इस धारणा को हर जगह देखते हैं : बहुत से उत्पादों के विज्ञापनों में ये बताया जाता है कि जब आप इन उत्पादों को खरीदेंगे तो आप खुश हो जायेंगे - और इन उत्पादों को खरीदने के लिए...... धन का लगातार प्रवाह होना चाहिए।    

    इस धारणा को बल देने वाला दूसरा पहलू यह है कि, हम ये सोचते हुए बड़े होते हैं कि, हर महीने अच्छा वेतन मिलने से कार्यकाल के समाप्ति तक बहुत सारी बचत हो जाएगी जो हमारे संतोषजनक सेवानिवृति के बाद काम आएगी।

    तो क्या हम ख़ुशी के लिए पैसा चाहते हैं ?

    देखा गया है कि पैसे का हमारी खुशियों पर क्षणिक प्रभाव होता है, या  हम कह सकते हैं, पैसा हमें सिर्फ थोड़ी देर के लिए ही ख़ुशी देता है - बिलकुल वैसे ही जैसे आज आपने खरीददारी की, आपकी ख़ुशी तभी तक रहेगी जब तक आप कोई नया विज्ञापन देख कर फिर से खरीददारी का नहीं सोचने लगते।

    यदि अगर आपकी आमदनी बहुत ज्यादा या बहुत काम है, तो पैसा बहुत ज्यादा अंतर् पैदा करता है- अत्यन्त समृद्ध  या अत्यन्त गरीब। उस स्थिति में जिनके पास बिलकुल भी पैसा नहीं है वे निश्चित ही उनकी अपेक्षा बहुत ज्यादा दुखी होंगे जो करोडपति हैं।

    लेकिन अधिकांश लोग इन ध्रुवों पर नहीं होते, विशेष रूप से उन देशों में जिनकी जीडीपी प्रति वर्ष बढ़ रही है, तो मध्य वर्ग के लिए यह विचार का मसला होता है।

    यही विचार हमें जॉब में लगाए रखता है, जहां हमारी सारी क्रिएटिविटी ऑफिस पॉलिटिक्स की भेंट चढ़ जाती है। लोग स्वयं को धनी लोगों के बराबर खुश बनाने की मृगतृष्णा के चक़्कर में एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हैं। सीनियर पोजिशन पर लोगों को भत्ते दिए जाते हैं, जो प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या को बढ़ाता है।

     

    इसका परिणाम क्या होगा?

    तनाव, चिंता, अवसाद, संतुष्टि के स्तर में कमी हमे सहज रूप में कार्य स्थल पर महसूस हो सकती है। और स्वाभाविक रूप से हम अपने साथ इसके प्रभाव (खराब मूड और काम का बोझ) अपने घर और दोस्तों के बीच ले जाते है, जो ऑफिस के बाहर हमारी लाइफ को बदरंग बना देता है।

     

    तो इसका समाधान क्या है?

    आप जिस प्रकार के काम को पसंद करते हैं उस प्रकार के कार्य करने वाली कम्पनी को ज्वाइन करें या अपना खुद का स्टार्ट-अप शुरू करें ! स्टार्ट-अप पारम्परिक कम्पनियों की तुलना में, पूरे विश्व में नए रोजगार के अवसर सृजन, करा रहे हैं। या अपने रूचि के क्षेत्र में शुरुवात करें। भारत में बहुत से इंजीनियर्स नौकरी छोड़ कर सामाजिक या मीडिया के क्षेत्र में शामिल हो रहे है। इसमें कभी देर नहीं होती !

     

    तो संक्षेप में, यदि पैसा नहीं तो क्या हम संतुष्ट रहते हैं?

    यह किन कामों में आप कितना समय बिताते हैं, इस पर निर्भर करता है। अगर आपके लिए ख़ुशी का मतलब है किताबें पढ़ना, और अपनों के साथ समय बिताना है और आप काम, उससे जुड़े मसलों, और जॉब में अधिक समय बिताते हैं (क्योंकि ज्यादा आय का मतलब ज्यादा जिम्मेदारियां) तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आप खुश नहीं रहते।

    अपनी रूचि का कार्य करिये, और धन अपने आप आप कमाने लगेंगे ।

  • 12 May
    Oyindrila Basu

    सुबह उठने के फायदे

    good morning

     

    दोस्तों आप सब जानते हैं सुबह का उठना फायदेमंद होता है, सुबह उठने से हम दिनभर ताजगी महसूस करते हैं

    सुबह  उठनेसे दिन और जीवन की गति का पता चलता है।

    एक अंग्रेजी कथन है "जल्द सोना और जल्द उठना इंसान को समझदार और धनवान बनाता है"  

    आज इस बात की सच्चाई पता चल रही है।

    प्रातःकाल बहुत अहम होता है। आप पूरा दिन कैसा महसूस करेंगे यह इस बात पर निर्भर है कि आप सुबह को कैसे ग्रहण करते हैं ।

    सुबह जल्द उठने के कई फायदे हैं-

    1. जल्द उठने से आप का दिन बड़ा हो जाता है, आपको ज्यादा समय मिलता है।
    2. जो वक़्त आप खुद के लिए नहीं निकाल पाते, उसे सुबह आप के लिए निकालती है।
    3. शरीर और स्वास्थ्य की परिचर्चा के लिए प्रातःकाल सबसे उत्तम समय है।
    4. मन की शांति के लिए भी सुबह का समय ही बेहतर है।

    ‘The Miracle Morning’ के लेखक हाल एलरोड ये मानते हैं, कि जो व्यक्ति सुबह जल्दी उठता है, उसकी ज़िन्दगी ३६० डिग्री पलट जाती है।

    सुख समृद्धि और सफलता खुद चल कर आपके पास आती है, अगर आप सुबह उठने का अभ्यास करते हैं।

    हाल बताते हैं,"मैं परेशान था",  "मेरा घर, मेरी आधी सम्पत्ति, सब जा चुकी थी, मैं शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका था, तभी मैंने खुद से पूछा की दुनिया के सबसे सफल और कामयाब लोग क्या करते होंगे जो मैं नहीं करता। और फिर मैंने पढ़ा, इन सब में एक ही बात कॉमन है, ये सब सुबह जल्दी उठते हैं और खुद पर मेहनत करते हैं"।

    दक्षिण अमरीका में रहने वाले एलरोड हमें SAVERS का ज्ञान देते हैं।

    S से SILENCE यानी शांत- इसका मतलब है ध्यान करना, मैडिटेशन जिससे आपके शरीर और मन को अच्छा महसूस होता है ।

    A से AFFIRMATION यानी दृढ निश्चय - जीवन में सफलता पाने के लिए एक लक्ष्य, एक मंज़िल की प्राप्ति होना ज़रूरी है। खुद को और बेहतर बनाने से आप इस लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे।

    V से VISUALIZATION यानी दृष्टि- जब आपने दिन के हिसाब से लक्ष्य बना लिया है, तो खुद को उस सुन्दर स्थिति में देखिये, अपने मन की आँखों का इस्तेमाल कीजिये। इससे आपको लक्ष्य प्राप्ति के लिए कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।

    E से EXERCISE यानी व्यायाम- व्यायाम शरीर को ही नहीं, मस्तिष्क को भी ऊर्जा देता है। इससे सोच और समझ की वृद्धि होती है, स्फूर्ति रहती है।

    R से READING यानी पढ़ाई- दिन में १० मिनट पढ़ाई ज़रूर करें। चाहे वह न्यूजपेपर हो या फिर कोई भी किताब या कथन, पढ़ते रहना ज़रूरी है, इससे ज्ञान बढ़ेगा।

    S से SCRIBBING यानी लिखना- जो भी आप पढ़ें उसे अपनी भाषा में लिखने की कोशिश करें, ये अकसर काम आता है।

    लेकिन सबसे मुश्किल है सुबह उठना, तो ये काम कैसे करेंगे?

     

    • सोने से पहले से दृढ़ निश्चय हों कि आप सुबह जल्दी उठेंगे।
    • घड़ी पर अलार्म डाल कर सोने जाएँ, और उसे दूर रखें, ताकि सुबह आवाज़ बंद करने के लिए आपको उठ कर, चल कर उसके पास जाना पड़े ।
    •  दन्त मंजन चालु रखें, इन हरकतों से आपकी थकान दूर हो जायेगी।
    • एक या दो गिलास पानी भी पी सकते हैं।
    • फिर खुद को प्रातः भ्रमण के लिए तैयार कर लें और व्यायाम के लिए प्रस्तुत हो जाएँ।

    एलरोड बताते हैं "मैंने तो ये अभ्यास शुरू कर दिया है, और मुझे अधिक सफलता मिली है, मेरी आमदनी दुगनी हो गयी है"  

    आज उनकी किताब, 'The Miracle Morning' ऐमज़ॉन पर सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में से एक है।

    तो हम सबको इसका अभ्यास करना चाहिए ताकि हम कुछ बेहतर हासिल करने की ओर बढ़ सकें।

  • 11 May
    Janhavi Dwivedi

    तलाक -क्या बच्चे को अभिभावक चुनने का हक़ होना चाहिए ?

    should divorcing parents make their child to choose

     

    मैं किसके साथ जाऊँ? मुझे तो मम्मी-डैडी दोनों से प्यार है... 

    ऐसे बहुत से कारक होते हैं, जो यह निर्धारित करते हैं कि एक बच्चा अपने माता-पिता के बारे में क्या सोचता है। हो सकता है बच्चा माता-पिता में से किसी एक को दूसरे से ज्यादा प्राथमिकता दे, क्योंकि वह अभिभावक नियमों के प्रति उदार है, उन्हें ज्यादा देर तक बाहर रहने देता है ,उन्हें कोई दूसरा कैरियर विकल्प चुनने की आजादी देता है, आदि-आदि ।

    लेकिन जब बच्चे परिपक्व हो जाते हैं तो उन्हें समझ में आता है कि वह दोनों (माता-पिता )से बने हैं। मगर किसी एक पैरेंट के द्वारा बहुत मार् और डांट-डपट के बावजूद वे दोनों को प्यार करते हैं, लेकिन अलग तरीके से।

    हो सकता है कि वह एक(माता/पिता) के पास अनुमति लेने जाते हों, और दूसरे के पास जीवन से संबंधित सलाह के लिए। हालाँकि इन सबके लिए उन्हें दोनों के साथ एक प्रकार का बंधन होने की जरूरत होती है।

    यदि बच्चे के बड़े होते समय उसके जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में दोनों (माता-पिता )में से कोई एक अनुपस्थित या एक दूरी पर भी नहीं है, तो बच्चे के मन में सिर्फ उसकी कुछ यादें ही रहतीं हैं और प्यार एक कर्तव्य में बदल जाता है साथ ही बच्चे का दायित्व उस पैरेंट की तरफ ज्यादा बढ़ता जाता है, जो उसके सामने रहता है।

    माँ के घर संभालने और बच्चे का पालन करने की भूमिका को ध्यान में रखते हुए विशेषकर उस समाज में जहां अभी भी ये समझा जाता है कि माँ ही बच्चे की प्रमुख देखभाल करने वाली होती है, माँ के साथ बिताया गया समय बच्चे (चाहे वह लड़का हो या लड़की ) और माँ के बीच संबंध को मजबूत बनाता है, और बच्चा माँ के साथ ही रहना चाहता है।

    हम अक्सर,ये संरचना एक परिवार में देखते है, जहां पिता एक सीईओ के जैसा होता है जिसके पास आप जरूरी बातों के लिए जाते हो, और माँ एक टीम लीडर या प्रोजेक्ट लीडर के रूप में  होती है, जिससे आप अपनी सभी छोटी-बड़ी परेशानियां बताते हो।

    यह ज्यादा अच्छी तरह से काम करता है, केवल पिता-पुत्र का बंधन तब तनाव ग्र्स्त हो जाता है, जब पिता सीईओ की भूमिका को छोड़ कर वापस डैड नहीं बनते।

    तलाक के मामलों में बच्चों की कस्टडी को लेकर ये जानना दिलचस्प होता है, कि क्या बच्चे यह निर्णय कर सकते हैं कि, किस  पैरेंट को वे ज्यादा प्यार करते हैं।

    अक्सर बच्चे से उनकी पसंद के बारे में पूछा जाता है, हालाँकि यह कानून की अदालत के ध्यान में लाई जाने वाली बातों का सिर्फ एक पहलू होता है।

    हालाँकि यहां आपको बहुत से वकीलों को ये बताना होगा कि: बच्चे को चुनाव करने को ना कहें, बच्चा जब तक १४ साल का नहीं हो जाता/जाती एक ऐसे संसार की कल्पना करता है, जो दोनों माता -पिता के साथ पूरी होती है। पैरेंट के बीच तलाक की स्थिति उसके लिए कठिन होती है।

    बच्चे से पूछना कोई समाधान नहीं है, क्योंकि वे ये नहीं जानते कि तलाक जैसी स्थिति में उनके लिए सबसे अच्छा क्या है।

    यदि बच्चा किसी एक पैरेंट के पक्ष में अपनी राय नहीं देता है तो वह खुद को उस पैरेंट को कम बताने का दोषी समझता है और यदि वह कुछ कहता है, तो उसे लगता है कि उसने दूसरे पैरेंट को नीचे गिरा दिया।

    प्यार एक जटिल भाव है, इसे विकल्पों में नहीं बाँटना चाहिए।

    विश्व भर में बच्चों का एक ही नजरिया होता है जहां प्यार  माता-पिता दोनों के लिए होता है,और इसकी अभिव्यक्ति प्रत्येक माता-पिता के व्यक्तित्व के चरित्र लक्षण पर निर्भर करती है।

    तब,कम से कम इस केस में  विकल्प का मतलब कुछ नहीं तो परेशानी और तनाव जरूर है।

  • 27 Aug
    Nandini Harkauli

    फेसबुक - उपयोग करते हुए सावधान रहें

    cyber bullying

     

    "अरे पता है! आज स्कूल में हमें साइबर बुलींग और सुरक्षा के बारे में बताया गया। तुम्हारे स्कूल न आने के कारण बहुत ही ज्ञानवर्धक सेशन छूट गया।"- शालिनी ने रोमा को शाम को मैदान में खेलते हुए बताया।

    "साइबर बुलींग ! यह क्या होता है? "रोमा ने पूछा

    "तुम नहीं जानती कि साइबर बुलींग क्या है? ओह चलो भी! तुम सोशल नेटवर्किंग साइट, फेसबुक, ट्विटर और न जाने कहाँ 24 * 7 व्यस्त रहती हो, और मुझसे पूछ रही हो कि साइबर बुलींग क्या है! खैर, साइबर बुलींग किसी को परेशान करने को कहते हैं, आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम मतलब इंटरनेट के जरिए धमकी भरे संदेश भेजना या डराना इसका हिस्सा है"।- शालिनी

    "सही में! कोई व्यक्ति आपको फेसबुक पर कैसे धमकी दे सकता है? लोग तो अपने सामाजिक जीवन को बढ़ाने के लिए फेसबुक पर शामिल होते हैं। "- रोमा

    "तुम्हारी बात को सही से कहें तो यह सिर्फ़ आभासी सामाजिक जीवन ज़्यादा है" - शालिनी

    "क्या अंतर है?" - रोमा

    "अच्छा, आभासी सामाजिक जीवन वह है जहां आप किसी से बातचीत करने के लिए उससे व्यक्तिगत रूप में नहीं मिल रहे हैं। असली दुनिया की तुलना में आभासी सोशल मीडिया पर रिश्ते और दोस्ती बनाए रखना बहुत आसान है। अब तुम मुझे इतनी हैरानी से न देखो "--- शालिनी ने सोच में डूबी रोमा को देखकर हंसते हुए कहा।

    "तुम्हारे प्रश्न पर वापस आते हैं कि लोगों को फेसबुक पर किस तरह से बुल्ली या परेशान किया जा सकता है? आजकल फेसबुक पर अपनी निजी जिंदगी के बारे में हर मिनट की जानकारी साझा करना लोगों की प्रवृत्ति बन गयी है और इससे हम दूसरों को अपने जीवन में कहर मचाने का बहुत आसान रास्ता दे रहे हैं। अधिकांशतः टीनेजर्स को इंटरनेट पर तंग किया जाता है और उन्हें पता भी नहीं चलता। रोमा इतनी उलझन में मत दिखो",शालिनी ने कहा।

    फिर शालिनी ने एक असल किस्सा सुनाया - "पिछले साल पड़ोस में रहने के लिए एक परिवार आया था। उनकी बेटी 15 वर्ष की थी और हम जल्द ही पक्के दोस्त बन गए थे। उसने मुझे अपने नए क्रश के बारे में बताया, जिसे वह फेसबुक पर मिली थी। लड़का उसके लिए बिलकुल अजनबी था, तब भी उसने लड़के की फ़ेसबुक फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली और जल्द ही अपने नए दोस्त के साथ घंटों ऑनलाइन बातें करना शुरू कर दिया। कुछ महीनों के भीतर ही उस लड़के ने लड़की के आगे उसकी  प्रेमिका बनने का प्रस्ताव रखा। वह पहले से ही उस लड़के के प्यार में पागल थी और बिना सोचे उसने प्रस्ताव मान लिया। चैट के उन लम्बे घंटों के दौरान उसने अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक आदि जानकारी का आदान-प्रदान किया और एक बार भी नहीं सोचा कि किसी दिन यह उसकी मुसीबत का कारण बन जाएगा।"

    "समय बीतने के साथ, अध्ययन में एकाग्रता, ध्यान की कमी और फेसबुक के बढ़ते हुए उपयोग से उसकी पढ़ाई पर असर होने लगा। उसका सामाजिक जीवन भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ, क्योंकि वह घर पर खुद को अपने कमरे में बंद करके रहना पसंद करती थी।

    उसने अपने माता-पिता के साथ भी ज़्यादा बातचीत बंद कर दी थी। जल्द ही उसके माता-पिता को वास्तविक कारण पता चल गया। वह क्रोधित होकर उस पर चिल्लाए नहीं, बल्कि उसे समझाया और फिर से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में मदद की।

    अपने माता-पिता की बातों को ध्यान में रखते हुए उसने अपने फेसबुक उपयोग को नियंत्रित किया और वह केवल दिन में एक बार ही फेसबुक पर लॉग इन करने लगी। दूसरी ओर उस लड़के को इस नई व्यवस्था के बारे में पता चला तो उसने लड़की के कान भरने शुरू कर दिए। लड़का उससे कहता था कि, तुम प्रभावित मत हो क्योंकि माता-पिता जब भी संभव हो सके अपने बच्चों को सीख ही देते रहते हैं। लड़के के लगातार प्रयासों के बावजूद लड़की ने फेसबुक का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दिया। "

    "एक दिन उस लड़के ने हताश होकर लड़की का घर जाते हुए पीछा किया और उसके चेहरे पर एसिड छिड़क कर वहाँ से भाग गया।" रोमा के पास बोलने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे।

    सोशल नेटवर्किंग साइटों पर विशेष रूप से फेसबुक का उपयोग करते समय सुरक्षित रहने के लिए कुछ सुझावों को ध्यान में रखना चाहिए:

    • फेसबुक पर अंजान लोगों को नहीं जोड़ना चाहिए। जांच करें कि क्या आपके बीच म्यूचुअल दोस्तों की अच्छी संख्या है? मेरा मतलब है कि अगर 7 से 10 लोग ऐसे हैं जो आप दोनो के फ़ेसबुक पर दोस्त हैं, तब भी एक बार जांच लें कि क्या आपसी दोस्त वास्तविक / असली दोस्त हैं या केवल आभासी दोस्त हैं।
       
    • फेसबुक पर बात करते समय किसी भी निजी बात का खुलासा नहीं करना चाहिए। यदि स्क्रीन के दूसरे हिस्से पर बैठा व्यक्ति आपकी व्यक्तिगत जानकारी जानने में अधिक दिलचस्पी ले रहा है तो यह चेतावनी का संकेत है।
       
    • फेसबुक पर किसी भी व्यक्तिगत फोटो या वीडियो को साझा न करें।
       
    • आपकी प्रोफाइल कौन देख सकता है, इसका नियंत्रण करें। प्राइवेसी सेटिंग में जाकर 'केवल दोस्तों' (friends only)के विकल्प का उपयोग करके स्वयं को सुरक्षित रखें।
       
    • सोशल मीडिया पर आप किस वक्त कहाँ हैं, चेक इन या अन्य महत्वपूर्ण जानकारी साझा न करें।
       
    • किसी भी परिस्थिति में अपने किसी भी मित्र के साथ अपना पासवर्ड साझा न करें, क्योंकि वे इसका दुरुपयोग कर सकते हैं।
       
    • ऑनलाइन व्यक्ति के साथ चैट करते समय सतर्क रहें। व्यक्ति के चैटिंग पैटर्न को समझने की कोशिश करें, बहुत से लोग नकली प्रोफाइल बनाकर लोगों को धमकाते और परेशान करते हैं।
       

    अगर कोई आपको धमका रहा है या परेशान कर रहा है तो उनके शिकार मत बानिए। छिपाएं नहीं, किसी ऐसे व्यक्ति के साथ साझा करें, जिस पर आप भरोसा करते हैं (माता-पिता, शिक्षक, परामर्शदाता) ताकि आवश्यक कार्रवाई शीघ्र ही की जा सके। "

    रोमा को इस बात का एहसास नहीं था कि साइबर बुलींग के लिए फेसबुक इस हद तक एक आसान मंच है। उसने खुद भी फेसबुक पर कुछ निजी तस्वीरें साझा की थीं और एक बार भी नहीं सोचा कि उनका दुरुपयोग किया जा सकता है।

    उसने शालिनी को इसके बारे में जानकारी देने के लिए धन्यवाद कहा। घर पर पहुंचते ही उसने सबसे पहले अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर 'प्राइवेसी सेटिंग' बदली और अंजाने लोगों को अपनी फ्रेंड लिस्ट से हटाया।

    और अब उसे एहसास हो गया है कि फेसबुक एक ऐसी किताब है जिसे बहुत सावधानी से पढ़ना चाहिए ... !
     

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