कुल 169 लेख

  • 02 Jun
    Janhavi Dwivedi

    उदास धुनों को सुनना हमें क्यों अच्छा लगता है?

    girl listening sad tune

     

     

    क्या आपने कभी महसूस किया है कि उदास धुनों या संगीत को सुनना आपको अच्छा क्यों लगता है?

    अरे भई, आप अकेले नहीं हैं! अधिकतर लोग हैं, जिन्हे उदास धुनों को सुनना अच्छा लगता है। लेकिन इन धुनों को सुनकर वे दुखी नही होते इतना तो पक्का है।

    ऐसा क्यों होता है?

    जब आप दुखी या उदास होते हैं, तो आपको भूख नही लगती और ना ही आपका कहीं बाहर घूमने जाने का मन करता। आप या तो कहीं भी बाहर नही जाते, और कुछ भी नही खाते, और या तो वही खाते हैं जो आपको पसन्द होता है, और वहीं जाते हैं, जहां जाना आपको पसंद होता है।

    संगीत सुनने से क्यों इस प्रकृति में बदलाव आ जाता है?

    वास्तव में उदासी से भरी धुन सुनना हम तब भी पसंद करते हैं, जब हम दुखी नही होते, तो ऐसा क्यों होता है ?

    टोक्यो में किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि उदासी से भरी धुन में दर्द और प्यार दोनों की भावना होती है। हालाँकि दुःख से भरे गाने में प्रेमियों के बिछड़ने की बातें होती हैं, लेकिन तब भी आप एक या दोनों प्रेमी के बीच प्यार की मजबूत भावना को देख सकते हैं।

    दूसरी बात, जब दर्द भरा संगीत हम सुनते हैं तो इसे एक performance के तौर पर लेते हैं, गीत में दुखद घटना किसी और के साथ हो रही हैं, हमारे साथ नहीं, इसलिए, आप इसे सिर्फ सुनते हैं और इससे ज्यादा प्रभावित नही होते। गानों को सुनने से आपको एक ऐसी सोच मिलती है, कि ऐसी समस्या आपके जीवन में आने पर आप के साथ ऐसा नही होगा।

    शोध का एक अन्य महत्वपूर्ण और दिलचस्प बात यह है कि यह निष्कर्ष व्यक्ति के संगीत का अनुभव की परवाह किए बिना निकले गए थे, इसलिए, एक प्रशिक्षित संगीतकार और एक आम आदमी दुःख भरे गीत के बाद एक ही तरह की भावनाओं को महसूस करते हैं,आपको संगीत की कितनी समझ है, इससे कोई प्रभाव नही पड़ता।

    इस अध्ययन के शोधकर्ताओं को लगता था कि,उदास गानों को सुनने और एक सोचने का तरीका विकसित करने से आपको अपने जीवन में आने वाले गमों को कम करने में मदद मिलती है। आप ये महसूस करते हैं,कि अनजाने में ही संगीत का कुछ तो प्रभाव आपके मन पर पड़ता है, जैसे की आप जीवन में आने वाली परेशानियों से अपने आप निपटना सीख सीख सकते हैं।

    यह बहुत से लोगो के लिए लाभप्रद हो सकता है जो प्रेमी की बेवफाई से दुखी हैं, इन गानो से उन्हें अनजाने में ही अच्छा महसूस होता है।

    इसलिए ये पता चलता है कि संगीत  का उपचारात्मक  महत्व है। जैसे बच्चे गेम के माध्यम से बहुत सी चीजें सीख जाते हैं,क्योंकि उन्हें लगता है कि गेम में जो कुछ भी हो रहा है, गेम के कैरेक्टर के साथ हो रहा है, उनके साथ नही, उन्हें किसी बात का डर महसूस नही होता, और इसलिए वे अच्छे से सीखते हैं। उसी प्रकार बड़े लोग भी उदासी से भरा संगीत सुनकर बहुत कुछ सीखते हैं और बहुत से गम और दुःख को हल करते हैं(गीत में ), जो वे सीधे तौर पर नही हल कर सकते, क्योंकि दुःख बहुत भारी होता है। 

    शायद यही वजह है, कि भारतीय शास्त्रीय रागों में भी बहुत सी उदास धुनें होती हैं जिससे सुनने वाले स्वतः ही अपने दुःख और गम को भूलकर सुखद भावनायेँ महसूस करते हैं।

  • 02 Jun
    Janhavi Dwivedi

    पेशेवर मनोचिकित्सक की पहचान कैसे करें?

    prefessional mental health counselor

     

     

    बहुत से देशों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सही तरह से लागू नही किया गया है, जिसके कारण ऐसे लोग जो प्रोफेशनली योग्य नही हैं, वे काउंसलिंग या मनोचिकित्सा करने लग जाते हैं।

    यह बहुत ही नुकसानदायक सौदा होता है, क्योंकि हम अपनी भावनाओं को किसी ऐसे व्यक्ति के सामने खोलते हैं,जो इन्हे संभालने के योग्य नही है।

     

    इसलिए कैसे पता करें की आपका काउंसलर एक प्रोफेशनल व्यक्ति है ?

     

    नीचे कुछ टिप्स दिए जा रहे हैं :-

    1.योग्यता :-

    आमतौर पर प्रोफेशनल व्यक्ति अपनी योग्यता को प्रदर्शित करते हैं, जिससे लोगों को सही व्यक्ति ढूढ़ने में आसानी होती है। आप उनके नाम के नीचे या उनके ऑफिस में टँगी उनकी उपाधि को देख सकते हैं।

    कोशिश कीजिये किसी  मास्टर्स की डिग्री वाले या कम से कम एक साल के डिप्लोमाधारी व्यक्ति के पास जाएँ, और यदि उसके पास डॉक्टरेट की उपाधि है,तो ये बहुत ही अच्छा है। यदि ये कहीं भी नही लिखा दिख रहा है, तो उनसे उनकी डिग्री के विषय में बात करें, ये आपका अधिकार है, इसलिए इसमें हिचकिचाएं नही।

     

    2.अनुभव :-

    कभी कभी डिग्री होने के बावजूद कुछ लोग इसे पेशेवर तौर पर नही लेते और ज्यादा समय तक इस फील्ड में नहीं रहते, इसलिए यदि किसी काउंसलर के पास कुछ सालों का अनुभव है, तो इसका मतलब उन्हें मालूम है कि उन्हें क्या करना है। आपको ना केवल उनके अनुभव को देखना चाहिए बल्कि ये भी देखना चाहिए कि उनकी फीस उनके अनुभव के अनुरूप है, या नही।

        

    3.आचार संहिता:-

    एक प्रोफेशनल काउंसलर फीस, मीटिंग्स, थेरेपी नोट्स, शेड्यूलिंग और रीशेड्यूलिंग और ऐसे अन्य पहलुओं के बारे में सख्त शिष्टाचार का पालन करेंगे। अगर वे बेतरतीब ढंग से आचरण करते हैं, और खुद ही इतने अनिश्चित रहते है, कि वे आप में कोई विश्वास की भावना पैदा नहीं कर पाते, तो वे प्रोफेशनल नहीं हैं।

     

    4.ज्ञान की गहराई :-

    यदि आपको लगता है कि, आपका काउंसलर सिर्फ सामान्य समझ की बातें बताता है, और वास्तव में, आपके मन के उन पहलुओं या भावनाओं के विषय में नही बताता, जो आप पहले से नही जानते, तो वे प्रोफेशनल नही हो सकते। यदि वे एक ही बार में आपसे बहुत ही कठिन शब्दों में बात करते हैं, और उन शब्दों  का अर्थ भी नही बताते, तो इसका मतलब उनके पास ज्ञान की गहनता नही है।

     

    5.उपचारात्मक कौशल :-

    क्या आपको लगता है, कि काउंसलर ने आपको सुना है, और समझा हैं?

    क्या  आपने कोई धारणा बनाई है,या किसी नए कौशल को सीखा है?

    यदि नहीं, तो आप ने एक प्रोफेशनल काउंसलर को नही देखा है। 2 या 3 सेशन में ही यह साफ हो जाता है, कि इन सेशन से आपको मदद मिल रही है, या नही।

     

    6.ग्राहक :-

    नियमानुसार,एक काउंसलर हमेशा एक के बाद दूसरे ग्राहक में व्यस्त रहता हैं। इसलिए क्या आपके काउंसलर का शेड्यूल बहुत ही व्यस्त है?

    क्या उनके आपसे पहले और बाद में भी appointments हैं ? यदि हाँ, तो वे प्रफेशनल काउंसलर हैं, और जिनके पास अच्छा कौशल है, जिसके कारण लोग उनके पास काउंसलिंग के लिए आना चाहते हैं।

    शायद सबसे महत्वपूर्ण बात जो ध्यान में रखनी चाहिए की आपको काउंसलर के विषय में कहाँ से पता चला।

    क्या आपको किसी विश्वस्त डॉक्टर या वेबसाइट से पता चला ? यदि हाँ तो आपको उन्हें २-३ सेशन का समय देकर देखना चाहिए कि, आपको कैसा लगता है।

    एक प्रोफेशनल काउंसलर आपको ये अहसास कराता है, कि उसने आपकी बात को ध्यान से सुना और समझा है। 

  • 01 Jun
    Janhavi Dwivedi

    कैसे युवावस्था के लिए अपने बेटे को तैयार करें

    son puberty

    विक्की की उम्र १६ साल है, उसकी माँ उसकी आदतों और व्यवहार को लेकर बहुत ही चिंतित रहती हैं। बात बात पर चिल्लाना, आवेश दिखाना और दोस्तों के साथ ज्यादा समय बिताना, इन सब से माँ को लगता है कि कहीं उनका बेटा गलत आदतों में फंस कर अपने भविष्य के साथ खिलवाड़  ना  कर  ले। एक माँ होने के नाते उनकी ये चिंता स्वाभाविक है।

     

    किशोरावस्था में आने पर लगभग सभी बच्चों के व्यवहार में ऐसे बदलाव देखे जाते हैं।

     

    किशोरावस्था, यानि उम्र का वह नाजुक दौर, जब बच्चा उस दहलीज पर कदम रखता है जहां ना तो वह बच्चों की श्रेणी में रहता है और ना ही बड़ों की श्रेणी में।

     

    बाल्यावस्था पार् करते ही बच्चों में कई तरह के शारीरिक परिवर्तन होते हैं। जहां लड़कियों में ये बदलाव शांत और लगातार प्रक्रिया होती है, वहीं लड़कों में ये बदलाव लहरों के रूप  में होता है। इन लहरों के अंतराल में अक्सर हम भूल जाते हैं कि वे भी बदलाव से गुजर रहे हैं। इसलिए अपने बच्चे से बात करने के पहले उन बातों की सीमा को समझ लेना चाहिए ।

     

    उसके पश्चात इन जानकारियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है :-

     

    शारीरिक बदलाव :- सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बदलाव जिनके विषय में आपको उनसे बात करनी है। 

    उन्हें बताएं कि उनकी आवाज फट सकती है क्योंकि आगे चलकर उनकी आवाज  वयस्क पुरुष की तरह की हो जाएगी।

    उन्हें बताएं कि अन्य पुरुषों की तरह उनके चेहरे पर भी दाढ़ी और मूंछे आएँगी और वे भी शेविंग करेंगे। उनके शरीर के विभिन्न भागों में रोएं आएंगे जिससे उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है।

    उन्हें बताएं कि ये सब बदलाव हार्मोन्स में परिवर्तन की वजह होते हैं और इसी से उनका मूड ज्यादा अस्थिर हो सकता है, और हो सकता है लड़कियों को वे अलग नजर से देखें और लोगों या वस्तुओं को तुरंत पसंद या नापसंद कर दें।

    उन्हें ये समझायें कि जहां तक सम्भव हो आवेग में आकर कोई भी काम ना करें।

     

    आक्रामकता में वृद्धि :-एक लड़के से एक आदमी में परिवर्तन के दौरान testosterone हार्मोन के स्तर में वृद्धि होती है। इसमें आक्रामक प्रवत्तियों की भी वृद्धि हो सकती है।

    सबसे पहले स्वयं को समझाएं और फिर अपने बच्चे को बताएं कि ये सामान्य है। यदि आप को इन बदलाव की उम्मीद होगी और आप सामान्य रहेंगे तो इसे सम्भालना आसान हो जायेगा। क्रोध या रोष भी अपेक्षित होता है। आपको अपने बेटे को शांत होकर समझाते रहना चाहिए, ताकि वह स्वयं को अनियंत्रित होने से बचा सके।

    इसके अलावा उसे खेलकूद जैसी रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करें जहां वह आक्रामकता का सही दिशा में सदुपयोग कर सके।

     

    स्वच्छ्ता और देखभाल :-आपको उन्हें बताना होगा कि अपने शरीर की सफाई और देखभाल आवश्यक है। उन्हें बताइए कि प्राइवेट पार्ट्स की भी नियमित सफाई आवश्यक है। इस विषय में अकेले में और समझदार रवैये के साथ उन्हें जानकारी दें।

     

    अवांछित चीजों का आदान प्रदान :- इस उम्र में लड़के अश्लील सामग्रियों का आदान प्रदान करते हैं। ये गलत है और उन्हें सेक्स के बारे में गलत जानकारी दे सकते हैं। उन्हें बताएं कि यह हो सकता है और यदि उन्हें सेक्स के बारे में सही जानकारी चाहिए तो वे उसे उचित माध्यम से प्राप्त करें।

    उन्हें मना मत करें क्योंकि उनकी ये उत्सुकता स्वाभाविक है, और गलत जगह से जानकारी प्राप्त करने से बेहतर है उनकी जिज्ञासा को सही जानकारी से संतुष्ट किया जाय। इसी वक्त,उन्हें ये बता दें कि ऐसी किसी भी जानकारी पर अमल करने के लिए बड़े होने तक इंतजार करें। एक व्यक्ति जो चाहता है कि आप सही जानकारी प्राप्त करें, वह जब उन्हें इंतजार करने को कहता है, तो वे उसकी बात जरूर सुनेगें।

     

    कुछ हरकतों में साथियों का दबाव :- स्मोकिंग, ड्रिंक्स, ड्रग्स, देर रात तक बाहर रहना जैसी हरकते अक्सर लड़के साथियों के दबाव में करने की कोशिश करते हैं।

    उन्हें पहले से बताएं कि अन्य लड़के इन बातों के लिए तुम्हारे ऊपर दबाव डाल सकते हैं, लेकिन तुम्हे उनके जाल में नहीं फंसना है क्योंकि ये तुम्हे तुम्हारे लक्ष्य से भटका सकता है।

    उन्हें बताएं कि स्वस्थ मनोरंजन के लिए वे म्युज़िक कंसर्ट्स और बाहर खाने जैसे कामों के लिए जा सकते हैं लेकिन इससे ज्यादा नहीं। उनके दोस्त बनिए और उनसे सहानुभूति रखिये वे जरूर आपकी सुनेंगे।

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  • 18 May
    Janhavi Dwivedi

    क्या करें जब हमसफ़र निकले बेवफा?

    hrithik kangana sussanne

     

     

    अनीता की जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था, वह अपनी ११ साल की बेटी और पति के साथ खुश थी। अचानक उसकी जिंदगी में भूचाल सा आ गया….. जब उसे यह पता चला कि उसके पति का अपने ऑफिस की किसी लड़की के साथ अफेयर चल रहा है।....

    अनीता से ये बात सहन नहीं हुई, और उन दोनों  पति पत्नी के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ और अंत में, अनीता ने अपना सामान पैक किया और बेटी को लेकर अपने माता-पिता के घर रवाना हो गई।

    उसके पति और ससुराल वालों ने कई बार बात-चीत की कोशिश की, किन्तु  पति पत्नी के बीच तनाव बढ़ता ही गया और बात तलाक तक पहुंच गई।

    चूँकि अनीता का पति अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था, उसने अच्छे वकीलों की मदद से अपनी बेटी की परवरिश का अधिकार प्राप्त कर लिया, और वे दोनों हमेशा के लिए अलग हो गए।

     

    आजकल महानगरों में इस तरह की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, और हमारा मध्य वर्ग अपने पारम्परिक मूल्यों और पश्चिमी रहन-सहन के बीच का युद्ध लड़ रहा है, जहां एक ओर हम पश्चिमी रहन-सहन को अपनाना चाहते हैं वहीं उसके साइड इफेक्ट्स से बचना भी चाहते हैं, फलस्वरूप विवाहेत्तर संबंधों की संख्या बढ़ने के साथ ही तलाक की संख्या में भी वृद्धि हो रही है।

    आज की महिलाएं विवाद को सुलझाने में असफल हो रही हैं, जिसका खामियाजा उनके साथ साथ पूरे परिवार और बच्चों को उठाना पड़ता है।  अनीता और उसके पति ने कुछ ऐसी गलतियां की जिनसे उनके बीच का रिश्ता एक भयावह सपने की तरह हो गया।

     

    उन्होंने अपने विवाद में इन परिणामों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। :-

     

    १. अपने बच्चे के भविष्य की परवाह नहीं की:- बच्चों की दुनिया उनके माता पिता से होती है, आपके अलग होने का सबसे ज्यादा प्रभाव उनपर पड़ेगा जहां उनसे उनका एक अभिभावक अलग हो जायेगा, वहीँ उनकी भविष्य के प्रति चिंताएं भी बढ़ जाएँगी। 

     

    २. बच्चे के बाल मन पर इस विवाद का क्या असर पड़ेगा और क्या वह जीवन में सहज रूप से रह पायेगा इस बात पर भी विचार नहीं किया :-बच्चे के मन पर मम्मी-पापा का तलाक एक नकारात्मक प्रभाव छोड़ जायेगा, उन्हें सहज होने में वक्त लग सकता है और जो शायद उनके व्यक्तित्व को भी प्रभावित करें।

     

    ३. क्या उनके बीच सुलह और सुधार की कोई गुंजायश नहीं बची थी ?: बेशक पति के विवाहेत्तर संबंध किसी भी पत्नी को स्वीकार नहीं हो सकते लेकिन यदि पति को अपनी गलती का अहसास हो गया है और वह आपको भरोसा दे रहा है कि, भविष्य में ऐसा नहीं होगा तो, ठंडे दिमाग से विचार करें, यदि आप उन्हें माफ़ कर सकतीं हैं, तो आपका फैसला आपके परिवार को बिखरने से बचा सकता है। 

     

    ४. क्या घर के बुजुर्गों ने इस रिश्ते को बचाने की कोई कोशिश की ?:-कभी-कभी घर के बुजुर्ग इन समस्याओं को बेहतर तरीके से सुलझाने में अपनी भूमिका निभाते हैं, यदि वे आपके साथ खड़े होते हैं तो आप इस परिस्थिति में भी अपने परिवार को जोड़े रख सकती हैं। 

     

    ५. क्या पति पत्नी ने अपने भविष्य के बारे में सोचा ?:- रिश्तों में कड़वाहट आने के बाद आपने आवेश में आकर अलग होने का फैसला तो कर लिया लेकिन क्या आपने सोचा कि अलग होने के बाद भी आप खुश रह सकेंगे, यदि बच्चों से भी अलग हो गए तो क्या वो खुशियां दोबारा मिल पाएंगी। 

     

    ६. क्या दोनों पति पत्नी की अपने इतने साल पुराने रिश्ते को बचाने कोई रूचि थी ? :-पति पत्नी का रिश्ता बेहद खूबसूरत और नाजुक होता है, यदि इस रिश्ते में प्यार और विश्वास की कमी हो जाती है तो रिश्ता तकलीफ देने लगता है,लेकिन कोई भी निर्णय जल्दबाजी में या आवेश में आकर ना लें, परिवार जितना आपका है, उतना ही आपके पति का भी है, क्या आप दोनों वाकई में एक दूसरे से अलग होना चाहते हैं, शांत होकर विचार करें।

     

    तलाक के बाद के परिणाम हमेशा दुखदायी होते हैं जो बसी बसाई जिंदगी को दुःख और अवसाद के गहरे गर्त में गिरा देते हैं, जो ताउम्र पीड़ा देते हैं। कोई निर्णय लेने से पहले निम्न सलाहों पर ध्यान देकर इस अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता है :-

     

    १. आपके पति के किसी अन्य लड़की से संबंध किस स्तर तक जा पहुंचे हैं, क्या यह उसके प्रति सिर्फ आकर्षण है या कोई भावनात्मक जुड़ाव? इसे समझने की आवश्यकता है।

     

    २. यदि उनकी बेवफाई को आप भूल सकती हैं तो इस पर विचार करें।

     

    ३. कहा गया है, 'यदि सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते' उसी प्रकार यदि आपके पति भी अपराध बोध महसूस कर रहे हैं और वे आपको खोना नहीं चाहते तो आप भी पुरानी कड़वी यादों को भुलाकर अपने संबंधों को एक मौका दीजिये।

     

    ४. जब आपको कुछ समझ ना आये तो हो सके तो बुजुर्गों या किसी अनुभवी काउंसलर की मदद लीजिए, वे आपकी स्थिति को समझ कर योग्य परामर्श देंगे।

     

    ५. एक बार ये भी  सोचिये कि तलाक के बाद आपका और बच्चों का जीवन कैसा होगा?

     

     ६. पति के विवाहेत्तर संबंध को जानने के बाद आप क्रोध, निराशा और अवसाद से जूझ रही हैं, तो जल्दबाजी में कोई फैसला ना ले। पहले स्वयं को संतुलित करें और सोच समझ कर कोई निर्णय लें।

     

    यदि जोड़ने की कोशिशों पर संबंधों का अलगाव भारी पड़ जाय,

    पति की बेवफाई और उनके व्यवहार के कारण अवसाद और चिंता से आपका जीवन जीना दूभर हो गया है,

    आपका आपके पति पर से विश्वास खत्म हो गया है।

    आपका मन अब इस बंधन में नहीं रहना चाहता जहां प्यार ही नहीं बचा,

    और अपने अलग होने का फैसला कर लिया है तो सबसे पहले बच्चों को आश्वस्त करें क्योंकि आप के तलाक से सिर्फ आप पर ही नहीं बल्कि बच्चों के जीवन पर भी असर पड़ेगा, वे इस बात को पहले सोचेंगे कि पापा-मम्मी के अलग होने के बाद उनका भविष्य क्या होगा।

    उन्हें इस बात का भरोसा दिलाएं कि:

    उनके लिए आप दोनों का प्यार पहले की तरह ही रहेगा और उनकी जिंदगी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    उनके हर सवाल का उत्तर देकर उनके मन की चिंताओं को कम कीजिये, जैसे तलाक के बाद:

    घर से अलग कौन होगा?

    उन्हें घुमाने कौन ले जायेगा?

    पेरेंट्स मीटिंग में कौन जायेगा?

    होमवर्क कौन कराएगा?

    आजकल आधुनिकता की अंधी दौड़ में रिश्तों में प्यार और विश्वास की कमी हो रही है, जिसका  परिणाम है तलाक की बढ़ती संख्या। आज महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं और पति की बेवफाई के बाद साथ रहना उन्हें तनिक भी गंवारा नहीं होता।

    आज के जोड़ों में बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है, और क्रोध, प्रतिशोध और आवेश में आकर वे तलाक लेने का फैसला तो कर लेते हैं लेकिन बाद में आत्मविश्लेषण करने पर उन्हें ये जल्दबाजी में उठाया गया कदम लगता है, और तब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है।

    सबसे ज्यादा दुःख तो बच्चों को होता है, बच्चे आपके अलग होने के बाद सिर्फ अपने पापा से ही दूर नहीं होंगे बल्कि बाबा-दादी, चाचा, बुआ जैसे प्यार करने वाले रिश्तों से भी महरूम रह जायेंगे।

    आपका तलाक जैसा कठिन फैसला कहीं कई जिंदगियों में तूफान का कारण ना बन जाये। इसलिए रिश्ते को बचाकर आप कई जिंदगियों को बिखरने से बचा सकती हैं।

    बेशक पति की बेवफाई के बाद आप उनके  साथ रहना नहीं चाहतीं लेकिन क्या आवेश में आकर इतना कठिन निर्णय आपके परिवार के हित में होगा ये निर्णय आपको करना है, लेकिन याद रखें इस निर्णय  से जहां दो दिल अलग होंगे वहीं बच्चों की स्वाभाविक परवरिश भी प्रभावित होगी।

    इसलिए बिना रिश्ते को बचाने की कोई कोशिश किये, तलाक लेने का आवेदन कर देना सही नहीं है।

    याद रखें जोड़ना हमेशा सुखदायक है और तोडना पीड़ादायक।

    आगे पढ़ें: तलाक -क्या बच्चे को अभिभावक चुनने का हक़ होना चाहिए?

     

     

  • 13 May
    Janhavi Dwivedi

    क्या जीवन में पैसा सबसे महत्वपूर्ण है?

    Is money most important in life

     

     

    हम में बहुत से लोग हर सुबह ऐसी नौकरी पर जाने के लिए तैयार होते हैं जिसमे हमें ख़ुशी नहीं मिलती। या तो काम हमें अनाकर्षक लगता है, या नौकरशाही और राजनीति के चलते आप मजबूरी में फंसे हुए हैं।

    वास्तव में आप महीने के अंत में आय के रूप में मिलने वाले चेक के लिए काम कर रहे हैं। कभी, हमें उन पैसों की जरूरत होती है, कभी कम पैसों में हम काम कर सकते हैं।

    तब हम क्यों ऐसे काम करते रहते हैं, जो हमें हमारी पसंद का काम नहीं करने देता?

    इसका कारण वह प्रसिद्ध धारणा है, कि "हम तभी खुश रहेंगे जब हमारे पास धन होगा"

    हम इस धारणा को हर जगह देखते हैं : बहुत से उत्पादों के विज्ञापनों में ये बताया जाता है कि जब आप इन उत्पादों को खरीदेंगे तो आप खुश हो जायेंगे - और इन उत्पादों को खरीदने के लिए...... धन का लगातार प्रवाह होना चाहिए।    

    इस धारणा को बल देने वाला दूसरा पहलू यह है कि, हम ये सोचते हुए बड़े होते हैं कि, हर महीने अच्छा वेतन मिलने से कार्यकाल के समाप्ति तक बहुत सारी बचत हो जाएगी जो हमारे संतोषजनक सेवानिवृति के बाद काम आएगी।

    तो क्या हम ख़ुशी के लिए पैसा चाहते हैं ?

    देखा गया है कि पैसे का हमारी खुशियों पर क्षणिक प्रभाव होता है, या  हम कह सकते हैं, पैसा हमें सिर्फ थोड़ी देर के लिए ही ख़ुशी देता है - बिलकुल वैसे ही जैसे आज आपने खरीददारी की, आपकी ख़ुशी तभी तक रहेगी जब तक आप कोई नया विज्ञापन देख कर फिर से खरीददारी का नहीं सोचने लगते।

    यदि अगर आपकी आमदनी बहुत ज्यादा या बहुत काम है, तो पैसा बहुत ज्यादा अंतर् पैदा करता है- अत्यन्त समृद्ध  या अत्यन्त गरीब। उस स्थिति में जिनके पास बिलकुल भी पैसा नहीं है वे निश्चित ही उनकी अपेक्षा बहुत ज्यादा दुखी होंगे जो करोडपति हैं।

    लेकिन अधिकांश लोग इन ध्रुवों पर नहीं होते, विशेष रूप से उन देशों में जिनकी जीडीपी प्रति वर्ष बढ़ रही है, तो मध्य वर्ग के लिए यह विचार का मसला होता है।

    यही विचार हमें जॉब में लगाए रखता है, जहां हमारी सारी क्रिएटिविटी ऑफिस पॉलिटिक्स की भेंट चढ़ जाती है। लोग स्वयं को धनी लोगों के बराबर खुश बनाने की मृगतृष्णा के चक़्कर में एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हैं। सीनियर पोजिशन पर लोगों को भत्ते दिए जाते हैं, जो प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या को बढ़ाता है।

     

    इसका परिणाम क्या होगा?

    तनाव, चिंता, अवसाद, संतुष्टि के स्तर में कमी हमे सहज रूप में कार्य स्थल पर महसूस हो सकती है। और स्वाभाविक रूप से हम अपने साथ इसके प्रभाव (खराब मूड और काम का बोझ) अपने घर और दोस्तों के बीच ले जाते है, जो ऑफिस के बाहर हमारी लाइफ को बदरंग बना देता है।

     

    तो इसका समाधान क्या है?

    आप जिस प्रकार के काम को पसंद करते हैं उस प्रकार के कार्य करने वाली कम्पनी को ज्वाइन करें या अपना खुद का स्टार्ट-अप शुरू करें ! स्टार्ट-अप पारम्परिक कम्पनियों की तुलना में, पूरे विश्व में नए रोजगार के अवसर सृजन, करा रहे हैं। या अपने रूचि के क्षेत्र में शुरुवात करें। भारत में बहुत से इंजीनियर्स नौकरी छोड़ कर सामाजिक या मीडिया के क्षेत्र में शामिल हो रहे है। इसमें कभी देर नहीं होती !

     

    तो संक्षेप में, यदि पैसा नहीं तो क्या हम संतुष्ट रहते हैं?

    यह किन कामों में आप कितना समय बिताते हैं, इस पर निर्भर करता है। अगर आपके लिए ख़ुशी का मतलब है किताबें पढ़ना, और अपनों के साथ समय बिताना है और आप काम, उससे जुड़े मसलों, और जॉब में अधिक समय बिताते हैं (क्योंकि ज्यादा आय का मतलब ज्यादा जिम्मेदारियां) तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आप खुश नहीं रहते।

    अपनी रूचि का कार्य करिये, और धन अपने आप आप कमाने लगेंगे ।