कुल 169 लेख

  • 09 Jun
    Oyindrila Basu

    उड़ता पंजाब-ड्रग्स के विरुद्ध एक लड़ाई।


    udta punjab

    बॉलीवुड हमेशा से सामाजिक परिवर्तन में भागीदार रहा है, चाहे वह उन्नति हो या अवनति ।  हर गम्भीर विषय पर चर्चा के द्वारा बॉलीवुड जागरूकता फैलाने में कामयाब रहा है।

    ड्रग्स और व्यसन द्रव्य भी इन्हीं में से एक विषय है, जो समाज की युवा पीढ़ी को अंदर से खोखला बना रही है।

    ड्रग ट्रैफिकिंग से सिर्फ भारत में ही नहीं पूरे विश्व में करोड़ों के व्यापार चलते हैं। हर साल टीनेज बच्चों में व्यसन और बड़ी आदतें बढ़ती नज़र आ रही है । लेकिन हमारा समाज ड्रग्स के खिलाफ कोई आवाज़ या ठोस कदम नहीं उठाता।

    ड्रग्स जैसे विषय पर बात छिड़ते ही सब कहने लगते हैं, "छी, ड्रग्स! नहीं नहीं, अच्छे घर के लोग ऐसे विषय अपने ज़बान पर नहीं लातें", समाज में फैले ऐसे कलंक और दोगलेपन से ही युवा पीढ़ी भटक रही है।

    उन्हें सही राह दिखाने वाला कोई नहीं। हम व्यसन के शिकार को कलंकित कर उन्हें समाज से दूर कर देते हैं; अपने बच्चों को ऐसे लोगों से बचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी मदद कोई नहीं करता।

    उन्हें मानसिक सहायता की ज़रूरत है, लेकिन कोई इस बात को नहीं समझता। सही रास्ता मनोरोग विशेषज्ञ के पास है, पर उस तरफ ले कर कोई नहीं जाता, और इस प्रकार नई पीढ़ी विचलित और परेशान होकर गलत दिशा में प्रेरित होते रहते हैं।

    व्यसन और ड्रग्स के बारे में सही जानकारी ज़रूरी है। और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। और इसी क्षेत्र में कदम बढ़ा रहा है Abhishek Chaubey की नई फिल्म 'उड़ता पंजाब'

    4 अलग लोगों पर आधारित 4 कहानियाँ एक दूसरे से जुडी हैं सिर्फ एक कड़ी से-ड्रग ट्रैफिकिंग यानी व्यसन व्यवसाय।

    पंजाब में बढ़ती ड्रग की समस्या पर आधारित ये फिल्म शाहिद कपूर, आलिया भट, करीना कपूर और दिलजीत दोसांज को मुख्य किरदारों में दर्शाता है। ये चार एक लड़ाई पर हैं जो युवा पीढ़ी से व्यसन जैसे नासूर को मिटाने की फ़िराक में है।

    2016 में ये फिल्म काफी चर्चा में है, पर इससे पहले भी बॉलीवुड में हमने ड्रग्स पर फिल्में देखी है, 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971) और 'नया नशा' (1973) उन्हीं में से कुछ विचित्र फिल्में हैं।

    लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद जागरूकता अधूरी रही और समाज में ये ड्रग्स नामक ज़हर फैलता गया।

    और आज फिर से हिंदी सिनेमा इस व्यसन से बुरे प्रभाव को पर्दे पर दर्शा रहा है।

    Valerie Bertinelli जैसे प्रसिद्ध व्यक्तित्व भी इस आदत के शिकार रह चुके है, पर सराहने वाली बात ये है, कि वे ड्रग्स से लड़ें और जीतें।

    " cocaine बंद करने के बाद भी मुझे सालों लगे खुद को सम्हालने में, सूरज की रौशनी को महसूस करके खुश होने में"

    कोई भी लड़ाई आसान नहीं है। ड्रग्स से लड़ना अकसर ज्यादा  मुश्किल होता है, क्योंकि शारीरिक प्रक्रियाओं पर बस नहीं होता हमारा। लेकिन नामुमकिन कुछ भी नहीं।

    कोशिश करते रहना ही अहम बात है। और ड्रग्स और व्यसन के खिलाफ ये कोशिश करने आई है 'उड़ता पंजाब' और इससे जुड़ी जुर्मों को मिटाने के लिए हम सब साथ में कहेंगे, "ड्रग्स दी माँ दी"

  • 03 Jun
    Janhavi Dwivedi

    चेतन भगत -चिंता छोड़ो, खुश रहो

    indian woman

     

    चेतन भगत अपने एक लेख में भारतीय महिलाओं के साथ किये जा रहे व्यवहार पर चिंता जाहिर करते हुए विकसित देश बनने के लिए इसमें बदलाव लाने की मांग करते हैं, और साथ ही महिलाओं को भी तनाव मुक्त होकर खुश रहने के टिप्स देते हैं……

    उनके शब्दों में, हाल ही में एक सर्वे में ये रिपोर्ट आई है कि पूरे विश्व में भारतीय महिलाएं सबसे ज्यादा तनाव ग्र्स्त रहती हैं : 87 प्रतिशत भारतीय महिलाएं ज्यादा समय तनाव महसूस करती हैं।

    इन आंकड़ों से परेशान होना स्वाभाविक है, जबकि अमेरिका जैसे देश जहां अधिकतर लोग काम में डूबे रहते हैं, केवल ५३ प्रतिशत महिलाएं ही तनाव का अनुभव करती हैं।

    हम ये अपने देश की महिलाओं के साथ क्या कर रहें हैं?

    हो सकता है मैं पक्षपात कर रहा हूँ लेकिन भारतीय महिलाएं विश्व में सबसे ज्यादा सुंदर होती हैं। माँ, बहन, बेटी, सहयोगी, पत्नी और प्रेमिका के रूप में हम उन्हें प्यार करते हैं।

     

    क्या बिना महिलाओं के संसार की आप कल्पना कर सकते हैं ?

    ये अव्यवस्थाओं से भरा एक संसार होगा…..आक्रामक और अहम से भरे लोग इस संसार को चला रहे होंगे… बिना किसी कारण के एक दूसरे को पछाडने की होड़ चल रही होगी….चारो तरफ पसीने की दुर्गन्ध होगी, गंदे मोज़े फर्श पर बिखरे होंगे और फ्रिज में शायद खाने के लिए कुछ भी ना हो। और मनोरंजन उद्योग तो शायद ठप ही हो जायेगा। बिना हीरोइन की फिल्मों को कौन देखना चाहेगा ?

    बच्चे शायद उपेक्षा का शिकार होकर दस वर्ष की उम्र में ही नशे के आदी या मनोरोगी बन जाये….जल्दी ही विश्व भर के सारे पुरुष लीडर्स थोड़ी सी बात पर अपना धैर्य खोकर एक दूसरे के देश पर बमों की वर्षा करने लगेगें। संक्षेप में, महिलाओं और उनके विवेक के बिना ये संसार नष्ट हो जायेगा।

    फिर भी, कैसे हमारे इस आध्यात्मिक देश में कुछ लोग महिलाओं के साथ इतनी ज्यादती करते हैं, जन्म से पहले ही उन्हें मार् देते हैं….उनके पालन पोषण की उपेक्षा करते हैं….उन्हें प्रताड़ित करते हैं…उन्हें तंग करते हैं….उन्हें बेचते हैं… उनका बलात्कार करते हैं और उनका आत्म सम्मान खत्म कर देते हैं। बेशक, ये सभी अपराध करने वाले लोगों की संख्या कम है।    

    हालाँकि, हममे से अधिकतर लोग छोटे अपराध करते हैं, उनकी आलोचना करते हैं, उनसे बहुत ज्यादा अपेक्षा करते हैं, उन्हें पनपने का मौका नहीं देते और उनके व्यक्तित्व का गला घोंट देते हैं।

    कल्पना कीजिये यदि इतना सबकुछ एक आदमी के साथ हो तो क्या वह तनाव ग्रस्त नहीं हो जायेगा?

    व्यापक स्तर पर, यह सिर्फ महिलाओं के बारे में ही नहीं है, हम भारतीयों की आदत ही है, कमजोरों  का शोषण करने की। और दूसरी तरफ, ताकतवर के साथ चिपके रहने की।

    हम भ्रष्ट नेताओं को ही देखते हैं, उन्हें मतदान करके दोबारा ले आते हैं, और ये सोचते हैं कि उन्हें हम सीधे सादे लोगों को लूटने का पूरा अधिकार है, क्योंकि वे सत्ता में हैं।

    वास्तव में, हम ताकत से इतना ज्यादा प्यार करते हैं कि, जब यह शक्ति किसी महिला के पास आती है, हम उनका भी उसी प्रकार सम्मान करने लगते हैं।

    देवियां, महिला राजनीतिज्ञ, वयो वृद्ध माता जिसके पास में परिवार की सत्ता की मजबूत पकड़ हो - ये सब हमारा सम्मान पाती हैं, अन्य कोई नहीं

    इस प्रकार का समाज अधिक उन्नति नहीं करता, जहां न्याय और समानता से ज्यादा शक्ति को महत्व दिया जाता हो।

    ये समाज पिछड़ी जनजातियों के समान होते हैं, क्योंकि वे बिना शक्ति के किसी को भी ऊपर उठने नहीं देते, चाहे उनमे कितनी भी प्रतिभा हो।

    जब हम महिलाओं को आगे आने नहीं देंगे, और यदि वे ऐसा करती हैं, तो उन्हें दबाते हैं तो इसका मतलब हम आधी आबादी को आगे बढ़ने नहीं दे रहे।

    यदि हम अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते हैं तो हम समाज में योगदान करने की उस शोषित व्यक्ति की इच्छा को मारते हैं।

    जब हम ये विश्वास करते हैं कि शक्तिशाली लोग हमेशा सही होते हैं, और कमजोरों को कुचल देना चाहिए तो हम जानवरों के जंगल के समान हैं, और प्रगति जानवरों की नहीं होती, मनुष्यों की होती है। ये पिछड़े ख्याल बदलने में समय लगेगा।

     

    अभी के लिए मैं भारतीय महिलाओं को तनाव कम करने के पांच सुझाव देना चाहता हूँ। -

    1  पहला कभी भी अपने आप को कमजोर मत समझो। बनो वो जो तुम हो, ना कि जैसा दूसरे तुम्हे बनाना चाहते हैं। कोई तुम्हे नहीं पसंद करता ? ये उसकी प्रॉबलम है।

     

    2  दूसरा, यदि आप ऑफिस में अच्छा काम कर रही हैं, और आपका बॉस आपको महत्व नहीं देता तो उसे ये बात बताएं या नौकरी छोड़ दें। प्रतिभाशाली और कठिन परिश्रम करने वाले लोगों की डिमांड हर जगह होती है।

     

    3  तीसरा, खुद को किसी कौशल में दक्ष करें,ये जाने की किस प्रकार आप आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकती हैं। जिससे अगली बार यदि कोई आपसे कहे कि आप अच्छी बहू, अच्छी माँ या अच्छी पत्नी नहीं हैं तो आप उन्हें         अपनी क्षमता बारे में बता सकती हैं।

     

    4  चौथा, कभी परिवार और काम की दोहरी जिम्मेदारी को लेकर तनाव मत महसूस करें। ये कठिन है लेकिन असम्भव नहीं है….क्योंकि जीवन में हमेशा हर काम में अव्वल रहने की अपेक्षा ना करें। आप कोई इम्तिहान नहीं दे     रही, और कोई भी शत प्रतिशत मार्क्स नहीं पा सकता…..कोई बात नहीं यदि आप लंच के लिए चार प्रकार के पकवान नहीं बनाती, एक पकवान से भी पेट भर सकता है….और कोई बात नहीं यदि आप आधी रात तक नहीं     काम करती और आपको प्रमोशन नहीं मिलता।

     

    5  पांचवीं, और सबसे महत्वपूर्ण बात दूसरी महिलाओं से प्रतिस्पर्धा कभी मत करें। सबकी अलग विशेषताएं होती हैं। अपना बेहतर करें, परिणाम की चिंता न करें, हमेशा अव्व्ल आने की अपेक्षा ना करें। इस संसार में कोई भी      आदर्श महिला नहीं है, और यदि आप ऐसा बनने की कोशिश करेंगी तो निश्चित ही एक चीज आपको जरूर मिलेगी और वह है - तनाव।

     

    इसलिए टेंशन छोड़ें, शांत होकर गहरी साँस लें। खुद को बताए कि आप खूबसूरत हैं, अपना बेहतर करें और शांतिपूर्ण जीवन जियें। कोई भी जो आपसे इसका अधिकार छीनने की कोशिश करता है, तो गलती वह कर रहा है, आप नहीं।

    इस दुनिया में आने का आपका उद्देश्य हर किसी को खुश करना नहीं है। आपका उद्देश्य है- जो आपके पास है, वह इस संसार को देना, और बदले में अच्छा जीवन जीना। 

    अगली बार जब इस तरह की सर्वे रिपोर्ट आये, तो मैं भारतीय महिलाओं को इस लिस्ट में सबसे ऊपर नहीं देखना चाहता। मैं उन्हें विश्व में सबसे खुश महिलाएं बनते देखना चाहता हूँ।

    चलो मुस्कुराओ,  इससे पहले कि तुम्हरी सासू माँ मेरा लेख पढ़ने में समय बर्बाद करने के लिए तुम्हे डांटें…..:)

    चेतन भगत का यह लेख भारत की महिलाओं के लिए प्रेरणा दायक है।

  • 02 Jun
    Janhavi Dwivedi

    क्या मूंछे किसी के प्रति धारणा को प्रभावित करती हैं ?

    ranveer singh

     

    मेरे पति ने हाल ही में अपनी मूंछे उगा ली हैं, और मुझे अब वे पहले से ज्यादा मैच्योर लग रहे हैं, पर मेरा किशोर बेटा और बेटी कह रहे हैं कि "अब पापा का चेहरा  गुस्सैल लगता है।"

    क्या मूंछे किसी के प्रति धारणा को प्रभावित करती हैं ?

    दाढ़ी-मूंछे  पुरुष सौंदर्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है, जिलेट कम्पनी ने Well-groomed HR professionals पर एक शोध किया, यह दिखाने के लिए कि रोज शेविंग करने के क्या फायदे हैं, और इसलिए उन्हें उनके उत्पाद खरीदने चाहिए।

    इसलिए आइये जानते हैं कि चेहरे के बाल कितने महत्वपूर्ण हैं, और ये दूसरों के ऊपर कैसा प्रभाव डालते हैं।

    अभी हाल ही में आपने रणबीर सिंह की मूंछे देखी होगी,और उसके पहले क्रिकेटर शिखर धवन ने इस ट्रेंड को शुरू किया था। आपने देखा होगा कि कितनी जल्दी इस तरह की मूंछे फैशन बन गयीं।

    इसलिए हमारा लुक फैशन और सामाजिक धारणा दोनों से प्रभावित होता है। फैशन और सामाजिक धारणा दोनों ही काफी हद तक एक दूसरे से जुडी हुई है, फिर चाहे ये हमारी दाढ़ी और मूंछे ही क्यों ना हो।

    समय के साथ हुए अध्ययन से ये संकेत मिलते हैं :-

     

    सामान्य सामाजिक धारणा:-

    दाढ़ी के प्रति समाज में दो तरह की धारणाएं देखी जाती हैं।

    एक यह है कि दाढ़ी वाले पुरुष परिपक्व और बुद्धिमान हो सकते हैं, और दूसरा यह है कि वे गुस्सैल और प्रभावशाली हो सकते हैं।

     

    और इसके विपरीत चिकने गाल वाले पुरुषों को कम उम्र के, अच्छे से तैयार होने वाले और शांतचित्त माना जाता है।

     

    छोटे बालों वाली दाढ़ी से सबसे ज्यादा नकारात्मक धारणा को बढ़ावा मिलता है।

     

    एक अध्ययन में पाया गया कि जब दाढ़ी वाले और बिना दाढ़ी के पुरुषों को एक ही प्रकार चेहरे का भाव, जैसे -चिल्लाते हुए, मुस्कुराते हुए, आदि के साथ दिखाया गया, तो दाढ़ी वाले पुरुष अन्य लोगों की तुलना में अधिक गुस्सैल माने गए। इसका कारण है की दाढ़ी testosterone का सूचक होता है - क्योंकि महिलाओं में कम testosterone की वजह से चेहरे के बाल नही पाये जाते। इसलिए, हम अपने आप ही दाढ़ी वाले लोगों को गुस्सैल मान लेते हैं, चाहे वह ऐसा नही हो।

     

    नौकरी और साक्षात्कार:-

    जब जॉब और इंटरव्यू की बात आती है, तो कुछ मिले जुले निष्कर्ष देखे जाते हैं। चिकने चेहरे वाले लोग निश्चित ही शुरूआती जॉब के लिए पसंद किये जाते हैं। और अच्छी दाढ़ी वाले लोगों को उच्च पदों के योग्य माना जाता है। अच्छे दाढ़ी वाले लोग मैच्योर, प्रभावशाली और ज्यादा जानकारी वाले माने जाते हैं, और इससे इस बात को बढ़ावा मिलता है, आपकी टीम आप को सुनने और आपके निर्णय के लिए आप पर भरोसा कर सकती है। stubbles (छोटी दाढ़ी )वाले लोग बेतरतीब समझे जाते हैं।

     

    रोमांस और डेटिंग:-

    शायद चेहरे के बालों पर सबसे कन्फ़्यूज़िंग धारणा जीवनसाथी के चुनाव के समय देखी जाती हैं।

    कुछ महिलाओं को निश्चित तौर पर चिकने चेहरे वाले पुरुष पसंद होते हैं, क्योंकि वे अधिक सरल और मित्रवत लगते हैं।

    दूसरी महिलाएं सोचती हैं कि दाढ़ी वाले पुरुष मैच्योर होते हैं,उन्होंने जीवन देखा है और वे आवेश में आकर एक क्षण में उन्हें नही छोड़ेंगे।

    उन्हें ऐसा लगता है कि दाढ़ी वाला पुरुष उनके लिए ही बनाया गया है, और जो उनका ख्याल रखेगा।

    हालांकि,stubbles जो हमेशा ही नकारात्मक रूप में देखे जाते हैं कुछ समय के लिए किसी महिला की पसंद बन सकते हैं लेकिन इन पुरुषों को वादा निभाने वाला नही समझा जाता है।

    इसलिए यदि आप ‘साथ निभाने वाले जीवनसाथी’ की तलाश  कर रही हैं तो, वह या तो चिकने चेहरे वाला होगा या एक अच्छी दाढ़ी वाला होगा।

    अंत में, यह देखा गया है की दाढ़ी से स्वयं के प्रति सोच भी प्रभावित होती है। कई बार अच्छी तरह से उगाई गयी दाढ़ी व्यक्ति को अधिक आत्मविश्वास का अनुभव कराती है।

  • 02 Jun
    Janhavi Dwivedi

    उदास धुनों को सुनना हमें क्यों अच्छा लगता है?

    girl listening sad tune

     

     

    क्या आपने कभी महसूस किया है कि उदास धुनों या संगीत को सुनना आपको अच्छा क्यों लगता है?

    अरे भई, आप अकेले नहीं हैं! अधिकतर लोग हैं, जिन्हे उदास धुनों को सुनना अच्छा लगता है। लेकिन इन धुनों को सुनकर वे दुखी नही होते इतना तो पक्का है।

    ऐसा क्यों होता है?

    जब आप दुखी या उदास होते हैं, तो आपको भूख नही लगती और ना ही आपका कहीं बाहर घूमने जाने का मन करता। आप या तो कहीं भी बाहर नही जाते, और कुछ भी नही खाते, और या तो वही खाते हैं जो आपको पसन्द होता है, और वहीं जाते हैं, जहां जाना आपको पसंद होता है।

    संगीत सुनने से क्यों इस प्रकृति में बदलाव आ जाता है?

    वास्तव में उदासी से भरी धुन सुनना हम तब भी पसंद करते हैं, जब हम दुखी नही होते, तो ऐसा क्यों होता है ?

    टोक्यो में किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि उदासी से भरी धुन में दर्द और प्यार दोनों की भावना होती है। हालाँकि दुःख से भरे गाने में प्रेमियों के बिछड़ने की बातें होती हैं, लेकिन तब भी आप एक या दोनों प्रेमी के बीच प्यार की मजबूत भावना को देख सकते हैं।

    दूसरी बात, जब दर्द भरा संगीत हम सुनते हैं तो इसे एक performance के तौर पर लेते हैं, गीत में दुखद घटना किसी और के साथ हो रही हैं, हमारे साथ नहीं, इसलिए, आप इसे सिर्फ सुनते हैं और इससे ज्यादा प्रभावित नही होते। गानों को सुनने से आपको एक ऐसी सोच मिलती है, कि ऐसी समस्या आपके जीवन में आने पर आप के साथ ऐसा नही होगा।

    शोध का एक अन्य महत्वपूर्ण और दिलचस्प बात यह है कि यह निष्कर्ष व्यक्ति के संगीत का अनुभव की परवाह किए बिना निकले गए थे, इसलिए, एक प्रशिक्षित संगीतकार और एक आम आदमी दुःख भरे गीत के बाद एक ही तरह की भावनाओं को महसूस करते हैं,आपको संगीत की कितनी समझ है, इससे कोई प्रभाव नही पड़ता।

    इस अध्ययन के शोधकर्ताओं को लगता था कि,उदास गानों को सुनने और एक सोचने का तरीका विकसित करने से आपको अपने जीवन में आने वाले गमों को कम करने में मदद मिलती है। आप ये महसूस करते हैं,कि अनजाने में ही संगीत का कुछ तो प्रभाव आपके मन पर पड़ता है, जैसे की आप जीवन में आने वाली परेशानियों से अपने आप निपटना सीख सीख सकते हैं।

    यह बहुत से लोगो के लिए लाभप्रद हो सकता है जो प्रेमी की बेवफाई से दुखी हैं, इन गानो से उन्हें अनजाने में ही अच्छा महसूस होता है।

    इसलिए ये पता चलता है कि संगीत  का उपचारात्मक  महत्व है। जैसे बच्चे गेम के माध्यम से बहुत सी चीजें सीख जाते हैं,क्योंकि उन्हें लगता है कि गेम में जो कुछ भी हो रहा है, गेम के कैरेक्टर के साथ हो रहा है, उनके साथ नही, उन्हें किसी बात का डर महसूस नही होता, और इसलिए वे अच्छे से सीखते हैं। उसी प्रकार बड़े लोग भी उदासी से भरा संगीत सुनकर बहुत कुछ सीखते हैं और बहुत से गम और दुःख को हल करते हैं(गीत में ), जो वे सीधे तौर पर नही हल कर सकते, क्योंकि दुःख बहुत भारी होता है। 

    शायद यही वजह है, कि भारतीय शास्त्रीय रागों में भी बहुत सी उदास धुनें होती हैं जिससे सुनने वाले स्वतः ही अपने दुःख और गम को भूलकर सुखद भावनायेँ महसूस करते हैं।

  • 02 Jun
    Janhavi Dwivedi

    पेशेवर मनोचिकित्सक की पहचान कैसे करें?

    prefessional mental health counselor

     

     

    बहुत से देशों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सही तरह से लागू नही किया गया है, जिसके कारण ऐसे लोग जो प्रोफेशनली योग्य नही हैं, वे काउंसलिंग या मनोचिकित्सा करने लग जाते हैं।

    यह बहुत ही नुकसानदायक सौदा होता है, क्योंकि हम अपनी भावनाओं को किसी ऐसे व्यक्ति के सामने खोलते हैं,जो इन्हे संभालने के योग्य नही है।

     

    इसलिए कैसे पता करें की आपका काउंसलर एक प्रोफेशनल व्यक्ति है ?

     

    नीचे कुछ टिप्स दिए जा रहे हैं :-

    1.योग्यता :-

    आमतौर पर प्रोफेशनल व्यक्ति अपनी योग्यता को प्रदर्शित करते हैं, जिससे लोगों को सही व्यक्ति ढूढ़ने में आसानी होती है। आप उनके नाम के नीचे या उनके ऑफिस में टँगी उनकी उपाधि को देख सकते हैं।

    कोशिश कीजिये किसी  मास्टर्स की डिग्री वाले या कम से कम एक साल के डिप्लोमाधारी व्यक्ति के पास जाएँ, और यदि उसके पास डॉक्टरेट की उपाधि है,तो ये बहुत ही अच्छा है। यदि ये कहीं भी नही लिखा दिख रहा है, तो उनसे उनकी डिग्री के विषय में बात करें, ये आपका अधिकार है, इसलिए इसमें हिचकिचाएं नही।

     

    2.अनुभव :-

    कभी कभी डिग्री होने के बावजूद कुछ लोग इसे पेशेवर तौर पर नही लेते और ज्यादा समय तक इस फील्ड में नहीं रहते, इसलिए यदि किसी काउंसलर के पास कुछ सालों का अनुभव है, तो इसका मतलब उन्हें मालूम है कि उन्हें क्या करना है। आपको ना केवल उनके अनुभव को देखना चाहिए बल्कि ये भी देखना चाहिए कि उनकी फीस उनके अनुभव के अनुरूप है, या नही।

        

    3.आचार संहिता:-

    एक प्रोफेशनल काउंसलर फीस, मीटिंग्स, थेरेपी नोट्स, शेड्यूलिंग और रीशेड्यूलिंग और ऐसे अन्य पहलुओं के बारे में सख्त शिष्टाचार का पालन करेंगे। अगर वे बेतरतीब ढंग से आचरण करते हैं, और खुद ही इतने अनिश्चित रहते है, कि वे आप में कोई विश्वास की भावना पैदा नहीं कर पाते, तो वे प्रोफेशनल नहीं हैं।

     

    4.ज्ञान की गहराई :-

    यदि आपको लगता है कि, आपका काउंसलर सिर्फ सामान्य समझ की बातें बताता है, और वास्तव में, आपके मन के उन पहलुओं या भावनाओं के विषय में नही बताता, जो आप पहले से नही जानते, तो वे प्रोफेशनल नही हो सकते। यदि वे एक ही बार में आपसे बहुत ही कठिन शब्दों में बात करते हैं, और उन शब्दों  का अर्थ भी नही बताते, तो इसका मतलब उनके पास ज्ञान की गहनता नही है।

     

    5.उपचारात्मक कौशल :-

    क्या आपको लगता है, कि काउंसलर ने आपको सुना है, और समझा हैं?

    क्या  आपने कोई धारणा बनाई है,या किसी नए कौशल को सीखा है?

    यदि नहीं, तो आप ने एक प्रोफेशनल काउंसलर को नही देखा है। 2 या 3 सेशन में ही यह साफ हो जाता है, कि इन सेशन से आपको मदद मिल रही है, या नही।

     

    6.ग्राहक :-

    नियमानुसार,एक काउंसलर हमेशा एक के बाद दूसरे ग्राहक में व्यस्त रहता हैं। इसलिए क्या आपके काउंसलर का शेड्यूल बहुत ही व्यस्त है?

    क्या उनके आपसे पहले और बाद में भी appointments हैं ? यदि हाँ, तो वे प्रफेशनल काउंसलर हैं, और जिनके पास अच्छा कौशल है, जिसके कारण लोग उनके पास काउंसलिंग के लिए आना चाहते हैं।

    शायद सबसे महत्वपूर्ण बात जो ध्यान में रखनी चाहिए की आपको काउंसलर के विषय में कहाँ से पता चला।

    क्या आपको किसी विश्वस्त डॉक्टर या वेबसाइट से पता चला ? यदि हाँ तो आपको उन्हें २-३ सेशन का समय देकर देखना चाहिए कि, आपको कैसा लगता है।

    एक प्रोफेशनल काउंसलर आपको ये अहसास कराता है, कि उसने आपकी बात को ध्यान से सुना और समझा है।