• 06 Jul
    Janhavi Dwivedi

    मनोभ्रम (Dementia) से प्रभावित बुजुर्गों का कैसे रखें ख्याल

    How to tackle Dementia of your loved one

     

     

    वृद्धावस्था में अक्सर मनोभ्रम(dementia) या अल्जाइमर(alzheimer) के रोग बढ़ जाते हैं, जिसमे अक्सर बुजुर्ग गुस्सा करना, चिल्लाना और कभी कभी मार-पीट जैसे प्रतिकूल व्यवहार करने लगते है।

    dementia से प्रभावित बुजुर्गों के साथ रहना, काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए dementia को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।

    dementia मानसिक क्रिया में आया एक पुराना या लगातार चलनेवाला विकार है जो मस्तिष्क की बीमारी या किसी चोट के कारण होता है और याद्दाश्त में विकार, व्यक्तित्व में बदलाव, और विवेक शक्ति में कमी से पहचाना जाता है।

    सामान्य शब्दों में 'डेमेंशिया', मानसिक क्षमता में कमी है,जो प्रति दिन के जीवन में अत्यधिक गम्भीर परेशानियां उत्पन्न करता है।

    डेमेंशिया के बारे में :-

    डेमेंशिया कोई विशेष बीमारी नहीं है, यह याद्दाश्त या सोचने समझने की क्षमता में कमी के उन सभी लक्षणों की व्याख्या करता है, जिससे व्यक्ति को अपने रोजमर्रा के कामकाज करने में दिक्क़ते होती हैं।

    अल्जाइमर बीमारी का आंकड़ा 60-70 प्रतिशत होता है। दूसरीडेमेंशिया का प्रकार जो ज्यादा देखा जाता है वह है, वैस्कुलर डेमेंशिया जो एक स्ट्रोक के बाद होता है।

    लेकिन कुछ ऐसी स्थितियां जैसे थायरायड की समस्या और विटामिन की कमी भी डेमेंशिया के लक्षणों का कारण हो सकती हैं।

    डेमेंशिया को हमेशा से ही गलत ढंग से  'बुढ़ापा' या बुढ़ापे की जड़बुद्धि'  के रूप में इंगित किया जाता है, जो उन पुराने जमाने की गलत धारणा को प्रदर्शित करता है, कि 'गम्भीर मानसिक गिरावट' उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा है।       

    डेमेंशिया में याद्दाश्त में कमी और दूसरे लक्षण :

    डेमेंशिया के लक्षणों में भिन्नता हो सकती है, निम्नलिखित मुख्य मानसिक गतिविधियों में से कम से कम दो गतिविधियों में विकार होने पर इसे डिमेंशिया माना जाना चाहिए।

    १. याद्दाश्त

    २. बातचीत और भाषा ]

    ३. केंद्रीकरण और ध्यान देने की क्षमता

    ४. तर्क और निर्णय लेने की क्षमता

    ५. दृश्यों को समझने की क्षमता

    डेमेंशिया से पीड़ित लोगो को शॉर्ट टर्म मेमोरी के कारण परेशानी हो सकती है, जैसे कि किताबों,पेन और चश्मे को सही जगह पर रखना, बिल जमा करना, भोजन बनाने में, तारीख याद रखने में या घर से बाहर पड़ोस तक टहलने में परेशानी।

    डेमेंशिया के कारण होने वाले व्यवहार परिवर्तन को समझना :-

    जब कभी हमारे अपने मित्र या परिवार के सदस्य प्रौढ़ावस्था के डेमेंशिया का शिकार हो जाते हैं, परिणाम स्वरूप उनके व्यवहार में आया बदलाव उन पारिवारिक सदस्यों के लिए भारी पड़ जाता है, जो अभी तक उनकी देखभाल करते आ रहे हैं।

    डेमेंशिया पीड़ित व्यक्ति में अचानक ही क्रोध, उदासी, व्यामोह, आक्रामकता और भ्रम के भाव झलकने लगते हैं, और कभी भी व्यक्ति हिंसक हो सकता है।

    आप अपने प्रिय जन के इस व्यवहार पर कैसी प्रतिक्रिया करेंगे।

    आक्रामक व्यवहार की कैसी प्रतिक्रिया करें :

    क्या करें :- उनके उग्र व्यवहार पर कोई प्रतिक्रिया देने की अपेक्षा इस बात का पता लगाएं कि उनके इस व्यवहार का क्या कारण है।

    • इस बात को सुनिश्चित करें कि वे खुद को या दूसरों को किसी खतरे में नहीं डाल रहे, और फिर शांति पूर्वक उनका ध्यान दूसरी तरफ केंद्रित करने का प्रयत्न करें।
    • शांत और आश्वस्त तरीके से बात करें। हो सकता है, उनका व्यवहार ऐसा ही बना रहे, तब ये सुनिश्चित करके की वे अनुचित रूप से अपने को हानि ना पहुँचायें, उन्हें शांत होने के लिए कमरे में अकेला छोड़ दें।

     

    क्या ना करें :-  ऐसी स्थिति से गुजर रहे व्यक्ति से कभी भी बहस ना करें। आपको उन्हें बलपूर्वक शांत करने से बचना चाहिए, अन्यथा यह उनकी सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकता है। 

     

    स्थान या समय की भ्रान्ति का जवाब कैसे दें :-

     क्या करें :- ऐसी स्थिति में जब आपके प्रिय भ्रमित हो जाते हैं, कि वे कहां हैं। उन्हें बुनियादी जानकारी देने की कोशिश करें। आप इस काम में पिक्चर या दूसरी याद दिलाने वाली चीज दिखा सकते हैं।

    हो सकता है, आपके परिजन नई जगह में उबन महसूस कर रहे हों,आप उनका ध्यान दूसरी जगह केंद्रित करने के लिए घुमाने ले जाइये, या उनके साथ किसी गतिविधि में भाग लीजिए।

    कुछ ऐसी  स्थिति में, जब वे पूछें कि, हम वापस घर कब जायेंगे?, आप उनसे स्वास्थयवर्धक झूठ बोल सकते हैं, जैसे, जब तक कुछ ट्रैफिक लाइट नहीं जल जातीं हम यहां से नहीं जा सकते, या अब बहुत देर हो चुकी है हम  रात भर यहीं रहेंगे सुबह जायेंगे। अंत में, आप जो कहना चाह रहे हैं, समझ आने पर उन्हें ढाढ़स होगा।

    क्या ना करें:- वे कहाँ हैं, और आप क्या कर रहें हैं, आदि के बारे में लम्बे स्पष्टीकरण देने से बचें। यह उन्हें अधिक भ्रमित करने का काम  करेगा।

    निर्णय लेने की असफलता पर कैसी प्रतिक्रिया करें :-

    क्या करें :- यदि आपके प्रिय बुजुर्ग निर्णय लेने में असमर्थता प्रदर्शित करते हैं, जैसे वे यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहें हैं कि उनके बिलों का भुगतान हो रहा है, तो आप उनकी मदद करने की पेशकश कर सकते हैं। इससे आपको उनके एकाउंट्स देखने का मौका मिल जाएगा, और वे आश्वस्त हो सकेंगे कि उनके बिलों का भुगतान समय से हो रहा है।

    क्या ना करें :- उनकी क्षमता के अनुसार एकाउंट्स रिकॉर्ड्स और चेकबुक से जरूरी दूरी बनाए रखें। हो सकता है, आपके प्रिय बुजुर्ग ये समझें की आप उनपर गलत निर्णय लेने का आरोप लगा रहें है, तब विवाद हो सकता है।

    प्रभावित व्यक्ति से बातचीत करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    इन नियमों का पालन करने की कोशिश करें :-

    ये करें:-

    • उनके साथ सम्मान और गरिमा के साथ बातचीत करें।
    • बाते संक्षेप में करें। स्प्ष्ट और समझने योग्य भाषा का उपयोग करें।
    • बात करते समय स्वयं को उनकी आँखों के आगे रखकर आँखों का सम्पर्क बने रखें। बात शुरू करने से पहले ये सुनिश्चित करें कि उनका ध्यान आपकी तरफ है। हमेशा पहले अपना परिचय दें, और आप उनसे क्या कहने जा रहें हैं ये स्प्ष्ट करें।
    • कुछ बिंदुओं पर समझनेयोग्य दृश्य संकेतों का प्रयोग करें।
    • उनकी उम्मीदों को समझने योग्य बनें।
    • उनकी उन बातों को समझने का प्रयास करें जो वे नहीं बोल पा रहें हैं।
    • आपके बोलने का तरीका संक्षिप्त, शांत और सांत्वना देने वाला हो।
    • धीरे बोलें और हर शब्द स्पष्ट हो। उन्हें हर बात सुनाई दे इसका ध्यान रखें।
    • उन चीजों पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित करें जिनसे वे परिचित हैं।
    • स्पर्श तभी करें, जब ऐसा करना उपयुक्त हो।

    क्या ना करें :-

    • उनसे ऐसे बात करना जैसे आप किसी बच्चे से बात कर रहे हैं।
    • जटिल शब्दों और लम्बे वाक्यांशों का प्रयोग करना।
    • बात करते समय उन्हें गुस्से से देखना।
    • बिना ये स्प्ष्ट करे कि, आप कौन हैं, और आपको क्या काम है, बात शुरू कर देना।
    • आँखों के सम्पर्क के बिना बात करना, जैसे दराज की सफाई करने के दौरान ड्रेस के चुनाव की बात करना। व्यवधानमुक्त माहौल में बात करने की कोशिश करें। 
    • असम्भव इच्छा या उनसे एक समय में एक से अधिक काम करने का अनुरोध करने से आफत हो सकती है।
    • अपने हाव- भाव की उपेक्षा करना।
    • ध्यान भंग करने वाली बातों की उपेक्षा करना।
    • चिल्लाना या बहुत तेजी से बात करना।
    • यदि वे भय या क्रोध में हैं, तो उन्हें स्पर्श करना या उनके निजी मामलों में दखल देना।

    जबकि अल्जाइमर या डेमेंशिया से पीड़ित अपने प्रियजनों का सहयोग मिलना मुश्किल होता है, फिर भी ये दिशा निर्देश उनकी देखभाल करने वाले को काफी मदद कर सकते हैं।

    Article translated from: How to tackle Dementia of your loved one by Dr K V Anand (Psychologist) 

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  • 05 Jul
    Janhavi Dwivedi

    कैसे निभाए ससुराल में

    saas bahoo kalah

     

    ससुराल में खासकर नई बहू के लिए सास- ससुर के साथ निभाना मुश्किल हो सकता है, विशेष कर इसलिए क्योंकि उनका आपके पति के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

    अपनी इच्छाओं और जरूरतों को दूसरों की इच्छाओं और जरूरतों के साथ संतुलित करना आसान नहीं होता। इन सबके बीच आपको सावधान रहकर परिवार में एकता बनाए रखना होता है।

    आइए पढ़ें, कुछ सुझाव उनके लिए जिन्हे ससुराल में निभाने में मुश्किल होती है।

    • सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात है कि, जो चीजें आपके दायरे से बाहर हो जाएँ उन्हें अपने पति के साथ शेयर करें, आपकी आधी परेशानी तभी सुलझ जाएगी जब आपके पति आपकी जरूरतों और अपेक्षाओं को समझ लेंगें। हर छोटी बात को लेकर अपने पति के पास मत जाइये इससे उन्हें परेशानी होगी,और कभी भी उनसे खुद के या किसी अन्य रिश्ते के बीच चुनाव करने को ना कहें।

    इस बात को समझिए कि, भले ही आपके लिए आपके पति के माता पिता का अहम स्थान ना हो, लेकिन आखिर वे आपके पति के माता पिता हैं।

     

    • दूसरी महत्वपूर्ण बात जो इस तथ्य से जुडी हुई है कि, आपका ससुराल आपके द्वारा प्रशंसनीय नहीं है, या दूसरे शब्दों में आपके मायके जैसा नहीं है। अपने नए घर और मायके की तुलना करना बंद करें। चीजें हमेशा एक जैसी नहीं हो सकती, और आपको उन्हें वैसे ही स्वीकार करना चाहिए।

     

    • किसी मसले पर आमने सामने बात कर लेना ज्यादा अच्छा होता है। पीठ पीछे किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए। चुगली करने से किसी समस्या का हल नहीं निकलता। यदि आपको अपने सास ससुर से कोई बात करनी है तो बेहतर होगा आप सीधे उनसे बात करें और अच्छा होगा बातचीत के समय आपके पार्टनर भी मौजूद रहें, जिससे वे भी हर बात में बराबर के भागीदार रहें और कोई भी बात उनसे छिपी ना रहे।

     

    • यदि आप अपने सास ससुर को नहीं मना पाती, या वे अपनी बात पर अड़े हैं तो उस बात को वैसे ही रहने दीजिये। वे आपसे बड़ें हैं, इस बात का सम्मान कीजिये। परेशान होने या उनके खिलाफ कुढ़ने का कोई मतलब नहीं है। बड़बड़ाना या अपना आपा खोकर उनके ऊपर चिल्लाइये नहीं। इससे बात बिगड़ जाएगी।

     

    • जितना सम्भव हो सास ससुर से उन बातों पर बातचीत करने से बचें जिनसे आपके बीच झगड़े भड़कते हों। जब कभी ऐसे संवेदनशील विषय पर चर्चा का समय आये अपने साथी(पति/पत्नी ) से इस विषय में बात करने को कहें।

     

    • छोटे मोटे झगड़ों और तानो से परेशान मत होइए। जीवन की बड़ी योजनाओं में इन महत्वहीन झगड़ों से कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने जीवन साथी के साथ एक खास रिश्ता मजबूत करना महत्वपूर्ण है। खुद  को ससुराल वालों के लिए अच्छा बनने को बाध्य मत करें।

     

    • अपनी सीमाओं को समझिए। अपने आप को ससुराल वालों की इच्छा के अनुसार मत बदलिए और ना ही ससुराल वालों को अपनी इच्छा के अनुसार बदलिए। व्यक्तिवादी बनें। सबसे अच्छा रास्ता है कि आप उन्हें उनकी बातों को स्वीकार करने की अपनी सीमायें बता दें।

     

    समय समय पर अपने मायके जाएँ। तनाव से मुक्ति पाने का ये एक अच्छा तरीका है।

    अंत में, परिवार में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। कृपया टी. वी पर आने वाले डेली सोप (धरावाहिक) को मत देखें,ये आपको प्रभावित कर सकते हैं।

  • 05 Jul
    Oyindrila Basu

    महिलाओं को मानसिक तनाव पुरुषों के मुकाबले ज्यादा क्यों होता है?

    indian woman painting

     

    तनाव की शिकार अक्सर महिलाएं ज्यादा क्यों होती हैं, आइये इसका मनोवैज्ञानिक कारण जानने की कोशिश करते हैं ।

    APA की Journal of Abnormal Psychology में कहा गया है, की महिलाएं अपनी भावनाओं को छुपा कर रखने में सक्षम होती हैं;  वे अंदर ही अंदर अपनी समस्याओं का समाधान ढूँढती है;

    समाज में ज्यादा स्वीकारे  जाने के लिए, और खुद को मज़बूत दिखाने के लिए वे सब कुछ मन में दबाये रखती है। इससे उनके मस्तिष्क पर तनाव ज्यादा होता है, और जब समस्याएं बढ़ जाती हैं, तो तनाव ज्यादा होता है।

    दूसरी ओर, मर्द किसी चीज़ की परवाह ना करते हुए अकसर तात्कालिक परिस्थिति केअनुसार व्यवहार करते हैं। वे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कर लेते हैं, इससे उनके मस्तिष्क पर ज्यादा तनाव नहीं होता, और नकारात्मक ऊर्जा का निष्कासन होता है।

    वैज्ञानिक रूप से, हॉर्मोन की अलग-अलग प्रक्रियाओं से भी औरतों में मानसिक समस्या ज्यादा होती है।

    औरतों में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम होती है, और इसी वजह से, उनके दिमाग में भी सेरोटोनिन कम मात्रा में तैयार होता है, जो कि दिमाग को शांत रखने में अधिक मददगार होता है; पर इसकी कमी से महिलाओं में तनाव का असर भी ज्यादा होता है।

    इसके अलावा, महिलाओं पर गर्भ-धारण, जन्म, और मातृत्व जैसी गम्भीर ज़िम्मेदारी होती है।

    डर और दुखद घटनाओं का शिकार भी महिलाएं ज्यादा होती हैं। इस कारण उनमें PTSD, १०% अधिक रूप में पाया जाता है, जब की पुरुषों में सिर्फ ४% में यह  घटना देखा गयी है।

    शादी शुदा औरतों को नए घर, नए परिवार में खुद को ढालना पड़ता है, उनके हर काम को नापा जाता है, उनका मत स्वीकारा नहीं जाता, और इन सभी कारणों की वजह से वे दुखी रहती हैं।

    अगर महिला ऑफिस में काम करती हो, तो वे घर में ज्यादा वक़्त नहीं दे पाने के लिए खुद को दोषी मानती हैं, पुरुष इस प्रकार नहीं सोचते; सामाजिक रूप से वे बाहर का काम करने के लिए ही अभ्यस्त हैं, अगर इच्छा हो तो घर का काम करेंगे, लेकिन औरतों को दोनों काम पर बराबर ध्यान देना होता है। इससे खुद के लिए वक़्त नहीं मिलता उन्हें, अधिक काम करके थक जाती हैं, और तनाव बढ़ता है।

    कर्म-क्षेत्र में भी लिंग जनित कारण के लिए अगर वेतन कम  मिले तो इससे महिलाओं के आत्मसम्मान को अधिक ठेस पहुँचाती है।

    इलाज करवाने जाओ तो वहां भी भेद-भाव। औरत अगर निराशा ज़ाहिर करें, तो लोग अकसर उसे स्वाभाविक 'जज़्बाती' व्यवहार बताते हैं, लेकिन पुरुष को तनाव हो, तो जल्द दवाई और चिकित्सा का सुझाव बताया जाता है।

    ध्यान रखें महिलाओं की मानसिक समस्या को नज़र अंदाज़ किया जाए, तो भविष्य में और गहरी समस्याओं का कारण हो सकती है।

    ऐसे में क्या करें महिलाएं?

    १. हर परिस्थिति में खुद को शांत रखने की कोशिश करें।

    २. अपने लिंग के बाकी लोगों से प्रतिस्पर्धा या मुक़ाबला ना करें।

    ३. विश्वास रखें की आप बेहतरीन हैं, और जो भी काम करें १००% उसमें डालें।

    ४. काम और व्यक्तिगत जीवन में सन्तुलंत बनाए रखना एक कला है। कभी खुद को दोषी ना माने।

    ५. आप अपने चारो तरफ की स्थिति को सम्हाल नहीं सकते, खुद पर नियंत्रण रखें, अपनी एक दुनिया बनाएं, पढ़ाई करते रहे; अच्छी फिल्में देखें।

    ६. व्यायाम और मैडिटेशन बहुत ज़रूरी है।

    ७. पौष्टिक आहार लें। ताज़ी हरी सब्ज़ियां, मछली का तेल, प्रोटीन इत्यादि सेरोटोनिन  की वृद्धि के लिए ज़रूरी है।

    ८. आप जैसे हैं वैसे रहे।

  • 23 Aug
    umair hussain

    इसी कारण एकल अभिभावक सराहना के पात्र हैं

    family

     

    जब प्रियंका कोअपने जुड़वा बच्चों के साथ अकेला छोड़ दिया गया, जिनमें से एक को एस्पर्गस (Asperger’s) की बीमारी थी, तो वह खुद को असहाय महसूस करने लगी।

    उसके जुड़वा बच्चे अब 8 साल के हो चुके थे, और लड़कों के पैदा होने के सिर्फ 18 महीने बाद ही उसे काम पर वापस लौटना पड़ा। तब उसे 2 साल बाद  काम से निकाल दिया गया, अपनी और अपने बच्चों की देखभाल करने के सभी दबावों की वजह से।

    इसके बाद, वह full time रोजगार पाने के लिए संघर्ष करती रही कम पैसे होने के कारण जीवन तंगहाली में गुजरने लगा। तब उसने ज्यादा आमदनी के लिए वकालत की पढ़ाई शुरू की, परन्तु यह सफर भी आसान न था ।

    इस दौरान, उसने सुनिश्चित किया कि उसके बेटों को किसी भी मनोवैज्ञानिक परेशानियों का सामना न करना पड़े, हालांकि, और दुर्भाग्यवश, उन्हें सामना करना ही पड़ा -10 stories of single mothers, 2017


    लेकिन यह सच है कि एक अकेली मां (या पिता) अपने हाथों में सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनके बच्चे बड़े होने तक स्वस्थ रहें।

    उनके यही विचार हैं जो उस रिश्ते को बहुत खूबसूरत बनाते हैं, और यहां कुछ ऐसे कारण हैं जो बताते हैं कि क्यों हर एकल माता या पिता की और अधिक सराहना की जानी चाहिए।


    1) तनाव और भावनात्मक कठिनाइयाँ


    मुझे लगता है कि यह कहना ठीक है कि चाहे आप कोई भी हों, यदि आपको दो व्यक्ति की नौकरी करना पड़े, तो तनाव बढ़ता है।

    खैर, कम से कम मैं करता हूं पर क्या मुझे इस बारे में चिंतित होना चाहिए?

    ठीक है, हम इसे किसी दूसरे दिन चर्चा का विषय बनाते हैं।....... खैर, मुख्य बिंदु पर वापस जाते हैं। एकल माता-पिता शायद अपने सहयोगियों का समर्थन पाने वाले माता-पिताओं के मुकाबले में अधिक तनाव और भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करते हैं।

    खासकर वह एकल माता-पिता के परिवार, जो गरीबी के चक्र में फंसें हैं। एकल माता-पिता, खासकर की माँओं में आर्थिक तनाव और खराब मानसिक स्वास्थ्य में काफी सहसम्बन्ध पाया गया है (मैकलॉयड एट अल, 1994) (McLoyd et al., 1994)।

    इसलिए, जब आप इसके बारे में सोचते हैं, तो उनके हिस्से में बहुत कुछ होता है, और दिलचस्प बात यह है कि चाहे उनकी वित्तीय स्थिति और समाज उन्हें कितना भी तनाव देते हों, उनके जीवन में एक उद्देश्य और लक्ष्य रहता है, और वह अपने बच्चों को खुश रखना है।


    2) उनके दैनिक संघर्ष


    इस मामले में, मैं इस बिंदु को कुछ उप-श्रेणियों में विभाजित करना चाहूंगा:

    • समाज के साथ संपर्क: एक बार फिर, हमारे प्रिय समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति और मानदंड निर्देशित करते हैं कि किसी का जीवन कैसा होना चाहिए और उन्हें "खुश करने के लिए" क्या करना चाहिए। एकल माता-पिता को केवल मांगों से भरी दुनिया और उनको नीचा दिखाने वाले लोगों से ही नहीं निपटना पड़ता है, लेकिन उन्हें इस बात से भी निपटना होता है कि उनके बच्चों पर इन सब का क्या असर होगा।

     

    • एक से अधिक बच्चों की मांगों को पूरा करना बहुत मुश्किल हो जाता है जब वह विपरीत लिंग के हों। उनकी जरूरतें स्पष्ट रूप से अलग हैं और इसलिए उन मांगों को पूरा करना और अधिक कठिन हो जाता है।

     

    • अपने बच्चों को प्यार और स्नेह प्रदान करना, जिसकी उन्हें आवश्यकता है। और शायद यह सबसे कठिन हिस्सा है। क्योंकि उनसे दो माता-पिता होने, और अपने काम-काज के साथ-साथ बच्चों को भी देखने की उम्मीद की जाती है। यह सच है कि सभी माता-पिता उतने सहनशील और दयालु नहीं हो सकते हैं, लेकिन अध्ययनों से पता चला है कि एकल माता पिता हमेशा अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं।

    sushmita sen daughters


    3) वे सभी कठिन वक्त से ऊपर उठते हैं

    यह मेरा पसंदीदा बिंदु है। अध्ययनों से पता चला है कि हालात चाहे कितने मुश्किल हों, अभिभावक कितना तनाव और अवसाद से गुज़रते हों, फिर भी वे वास्तविकता का सामना करते हैं और स्थिति में खुद को समायोजित करते हैं।

    युवा पीढ़ी में हम में से बहुत से अक्सर एक कठिनाई पैदा होने पर बस इसलिए हार मान लेते हैं कि हम जो चाहते हैं उसे प्राप्त नहीं कर पाते। लेकिन, कृपया आप इन लोगों से सीखें।

    सब कुछ आपके चारों ओर नहीं घूमता है और यदि आप अपनी परीक्षाओं में असफल होते हैं या आपके माता-पिता आपको अपने दोस्तों के साथ यात्रा पर जाने नहीं दे रहे, तो मेरा विश्वास करिये कि यह दुनिया का अंत नहीं है।

    यहां ऐसे लोग भी हैं जो आपकी परिस्थितियों से तीन गुना ज्यादा झेलते हैं, और शायद आपके कारण आपको समझ में आते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ज़रूरी है कि हम सभी एकल माता-पिता से ये सब सीखें।

    और यह आश्चर्यजनक है ​​कि इन एकल माता-पिता के बच्चे भी इतने कड़े और समायोज्य होते हैं। हां, दो माता-पिता के बच्चों की तुलना में भी अधिक। एक माता पिता होने का अभाव ज्यादातर समय हानि या निराशा के रूप में नहीं देखा जाता बल्कि ताकत के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

    ये वही बच्चे हैं जो बाकी आबादी की तुलना में जल्दी स्वतंत्र और परिपक्व हो जाते हैं। और मैं व्यक्तिगत तौर पर सोचता हूं कि एकल माता-पिता के साथ, उनके बच्चे भी प्रशंसा के योग्य हैं।


    4) वे कम से कम शिकायत करेंगे

    घर का खर्चा चलाने, बिल भरने, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और उन्हें आंकने वाले, घुसपैठीय  और अप्रिय पड़ोसियों और आंटियों से लड़ाई के बीच में, वह इन सब परेशानियों से खुद ही निबटना चाहते हैं।

    और मुझे लगता है कि ये कला व्यक्ति में चरित्र और ताकत पैदा करती है। वे अपने बच्चों को यह कभी नहीं पता चलने देते कि वे किन परिस्थितियों से गुज़रते हैं, वे फिर भी अपने बच्चों के चारों ओर एक सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखने और उन्हें खुश रखने की कोशिश करते हैं, चाहे कितना भी मुश्किल हो।

    यह रहे, वे सभी कारण जो हमें एकल माता-पिता का सम्मान और सलाम करने के लिए आवश्यक हैं। हमें एक समाज के रूप में जानने की ज़रूरत है कि उनके अकेले होने के लिए चाहे जो भी हालात ज़िम्मेदार हो, उनकी मदद करना और उनको ना आंकना सांस्कृतिक नियमों में से एक होना चाहिए, जिनका हमें पालन करना चाहिए।

    तो क्या हुआ अगर अगले अपार्टमेंट में महिला / पुरुष तलाकशुदा है? या उनका शादी से पहले बच्चा था?

    आखिरी चीज जो वह अभी चाहेंगे वह है आपका उनको आंकना और आपकी अनावश्यक राय। जैसे कोई भी आपसे नहीं पूछ रहा, और अगर आप उसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं कि वे कौन हैं और उनके हिस्से में क्या है, तो कृपया उनके रास्ते से बाहर रहें और उन्हें ऊपर उठता और अकेले लड़ते देखें, अपने बच्चों को बराबर से लिए।

    Read in English

  • 04 Jul
    Janhavi Dwivedi

    सच्ची ख़ुशी क्या है ?

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    इस भौतिकतावादी संसार में ख़ुशी के मायने बदल गए हैं, लोग ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना और अधिक से अधिक सुख सुविधा के साधन जुटाने में ही ख़ुशी समझते हैं। जबकि ये चीजे ख़ुशी का सिर्फ बाहरी दिखावा भर हैं।

    आज हम आपको एक कहानी सुनाते हैं, जो आपको जीवन को सही तरीके से जीने के लिए प्रेरित करेगी ।

     

    ये कहानी एक खूबसूरत और महंगे कपड़ों से सजी एक ऐसी महिला के बारे में है, जो अपने मनोचिकित्सक के पास यह  शिकायत ले कर गई, कि उसे लगता था, उसका पूरा जीवन निरर्थक है, और उसके जीवन का कोई मतलब नहीं है।

    और वह काउंसलर के पास ख़ुशी पाने के लिए आई थी। काउंसलर ने अपने ऑफिस में फर्श साफ करने वाली एक बूढी महिला को बुलाया, और उनसे कहा कि, आप इन अमीर महिला  को बताएं कि आपने सच्ची ख़ुशी कैसे प्राप्त की ।

    बूढी औरत ने अपनी झाड़ू रख दी और कुर्सी पर बैठ, गई और अपनी कहानी बताने लगी....

    मेरे पति की मृत्यु मलेरिया से हो गयी थी, और उसके तीन महीने के बाद मेरा बेटा भी एक कार एक्सीडेंट में चल बसा।… मेरे पास कोई नहीं था, और मेरे पास कुछ नहीं बचा था।

    मैं रात को सो नहीं सकती थी, मैं ठीक से खा नहीं पाती थी, मेरे चेहरे पर कभी मुस्कान नहीं आती थी।

    यहां तक कि मैं अपना जीवन समाप्त करने  के बारे में सोचने लगी थी।

    फिर एक दिन काम से घर लौटते वक्त एक बिल्ली मेरा पीछा करने लगी, पता नहीं कैसे मुझे उस बिल्ली पर दया आ गयी..... बाहर बहुत ठंड थी तो मैंने उस बिल्ली को घर के अंदर आने दिया....

    मैं थोड़ा दूध लेकर आई, और वह चाट कर पूरी प्लेट साफ कर गई.... और फिर म्याऊँ म्याऊं करके मेरे पैर को सहलाने लगी, महीनों बाद पहली बार ..... मैं मुस्कुराई।

    उसके बाद मैंने अपनी सोच बदल ली, यदि एक छोटी सी बिल्ली की मदद करने से मेरे चेहरे पर स्माइल आ सकती है तो शायद दूसरे जरूरत मंद लोगों के लिए कुछ करने से मुझे और ख़ुशी मिले।

    इसलिए अगले दिन मैंने कुछ नाश्ता बनाया और उसे लेकर अपने पड़ोसी के पास गई, जो बिस्तर पर बीमार पड़ा था।

    हर दिन मैं किसी न किसी के लिए कुछ अच्छा करती। दूसरों को खुश देख कर मुझे इतनी ख़ुशी मिलती। आज मैं अपने सिवा किसी अन्य को नहीं जानती जो मुझसे बेहतर भोजन और नींद लेता हो। “दूसरों को ख़ुशी देकर मैंने सच्ची ख़ुशी प्राप्त कर ली।“

    यह सब सुन कर वह अमीर महिला रोने लगी। उसके पास वह सब कुछ था जो पैसे से खरीदा जा सकता है, लेकिन उसने वो चीजे खो दी थी, जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।

     

    मित्रों ‘जीवन की सुंदरता इस पर निर्भर नहीं करती कि आप कितना खुश हैं, बल्कि, दूसरे आपकी वजह से कितना खुश हो सकते हैं…, इस पर निर्भर करती है।‘

    खुशी एक मंजिल नहीं है, यह एक यात्रा है। ख़ुशी कल में नहीं, अभी में है। ख़ुशी निर्भरता नहीं, निर्णय है। ख़ुशी आप क्या हैं ये है, ना कि आप के पास क्या है इसमें है।“

    लीडर्स अपने लोगों में सफलता के प्रति आशा और अपने आप में एक विश्वास जगाते हैं। सकारात्मक सोच वाले लीडर्स लोगों को अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिया सशक्त बनाते हैं।

    "ख़ुशी का एक स्रोत बनें इसी में जीवन का सच्चा आनंद है। "     

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