कुल 169 लेख

  • 22 Jul
    eWellness Expert

    बनें अपने खास बच्चे के सर्वोत्तम मनोचिकित्सक

    autism

    जब माता-पिता को बच्चे के विशेष मानसिक अवस्था के बारे में पहली बार पता चलता है, तो ये उन के लिए झटका होता है, उन्हें यकीन नहीं होता, कि उनका बच्चा स्वाभाविक नहीं है, किसी मनोवैज्ञानिक समस्या से जूझ रहा है।

    और यह अकसर बच्चे के थोड़ा बड़े होने के बाद ही पता चलता है। जब तक वह 6-7 साल का नहीं हो जाता, माता-पिता उनकी हरकतों को बचकानी मान कर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

    अचानक पता चलने पर, वे हताश और निराश हो जातें है, कभी कभी उन्हें गुस्सा आता है, कभी खुद पर धिक्कार आता है, और अपनी मानसिक समस्याओं को वे बच्चे पर बरसातें है।

     

     

    25+7 कितना होता है? अंतरा! अंतरा! तुम सुन रही हो मुझे? बताओ, कुछ बोलती क्यों नहीं?" , टीचर अन्तर की तरफ बढ़ती हैं और उसे हिला कर उससे जवाब पूछती हैं।  हेड टीचर अनुराधा से कहती हैं "आई आम सॉरी अनुराधा,  अंतरा को जाना होगा, वह दूसरे बच्चों के साथ नहीं पढ़ सकती".............. अनुराधा हैरान परेशान सी डॉक्टर के पास पहुँचती है, जहां उसे पता चलता है, " कि उसे आटिज्म है"............. अनुराधा को यकीन नहीं होता, वह हताशा से टूट जाती है, लेकिन वह फिर हिम्मत जुटा कर अंतरा से कहती है  "मैं तुम्हे दुनिया की हर ख़ुशी दूंगी, तुम बिलकुल फ़िक्र मत करो, माँ है ना!"- आप की अंतरा, ज़ी टी वी, द्वितीय एपिसोड।

     

     

    खुद का ध्यान ऐसे में रखना ज्यादा ज़रूरी है, तो आइये यह जानते हैं, खुद को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें ?

     

    1. अपनी परेशानी अपने बच्चे पर ना थोपिये: एक बच्चा जो मानसिक रूप से अस्वस्थ है, उसे डांटने या धिक्कारने से कोई फायदा नहीं, वह कुछ भी समझ नहीं पायेगा, आपकी स्थिति उसके लिए अनजान सवाल है। लेकिन आपका चिल्लाना या परेशानी ज़ाहिर करने से बच्चे को और हानि पहुंचेगी ।

     

    1. खुद को शांत रखें: शान्ति से ही हर समस्या का समाधान हो सकता है। खुद को स्थिर रखें और अपनी मानसिकता को स्वस्थ रखें। आप खुद स्वस्थ रहेंगे तभी अपने बच्चे को स्वस्थ रख पाएंगे। मनोवैज्ञानिक समस्या के बारे में जानकारी बढ़ाएं।

     

    1. खुद को दोषी ना ठहराएं: अकसर माता-पिता अपने बच्चे के रोग के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हैं। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है, कि ज्यादातर, मानसिक रोग आनुवंशिक रूप से प्रेरित नहीं होते, किसी जैविक प्रक्रिया की विकृति के कारण या जन्म के बाद, वातावरणीय समस्याओं से बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्या हो सकती है। आप अगर अपने बच्चे को प्यार से सम्हाल रहे है, तो उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या के लिए आप दोषी नहीं हैं ।

     

    1. खुद को अपने प्रति सहानुभूतिशील बनाएं: अगर आपके बच्चे में आपकी मानसिक दुर्बलता के कुछ आसार नज़र आ रहे है, तब भी खुद को दोषी ना माने, आप जान बूझ कर इस परिस्थिति में नहीं हैं। जो होना था हो गया, उस पर चर्चा करने से अच्छा है, खुद को ईमानदारी से इसके समाधान के लिए तैयार करें। गर्व महसूस करें, की आप पर ये बड़ी ज़िम्मेदारी है, सब को ये मौका नहीं मिलता। आपका बच्चा ख़ास है, तो आप भी ख़ास हैं।

     

    1. दूसरों से अपने समस्या के बारे में चर्चा करें: समस्या को बाँटने से उसका असर कम होगा। जब दूसरे आप से सहानुभूति जताएंगे, तो आपको बेहतर महसूस होगा, राहत मिलेगी, कि समस्या उतनी भी गंभीर नहीं है, सब ठीक हो जाएगा।

     

    1. परिवार को समस्या में शामिल करें: अपने ऊपर पूरी ज़िम्मेदारी ना लें। अगर आप अपने बच्चे का सम्पूर्ण दायित्व खुद पर लेते हैं, तो आप दबाव में आ जाएंगे, सामाजिक रूप से भी आपको हर हालत के लिए जिम्मेदार माना जाएगा। परिवार के दूसरे सदस्यों को अपनी समस्या में शामिल करें। उनके मत को सुने, उनसे ज्ञान और नसीहत लें, पर आप के बच्चे के लिए क्या सही है, यह आप ही तय करेंगे।

     

    1. अपने टीनेजर बच्चे से कैसे पेश आएंगे, इसका अध्ययन करें: जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, और टीनेज में होते हैं, तो उन में कई व्यवहारिक समस्या दिखती हैं। गुस्सा करना, चीखना, चिल्लाना, ये सब टीनएजर के व्यवहार में दिखाई देता है ।

     और उन्हें सम्हालना आसान नहीं होता है, उनके व्यवहार से आपका मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है। आप दुखी और अपमानित महसूस कर सकते हैं, लेकिन उनके शब्दों को नज़रअंदाज़ करना सीखें। वह कैसे पेश आ रहे है, उसे मन पर ना लें। जितना आप उनके व्यवहार को इग्नोर करेंगे, उतना ही उनकी समस्या को समझ पाएंगे।

     

    1. हर रोज़ व्यायाम का अभ्यास करें।: हर दिन खुद को स्वस्थ रखने के लिए 10 मिनट व्यायाम का अभ्यास करें। प्राणायाम भी अधिक सहायता करेगी।

     

  • 20 Jul
    Janhavi Dwivedi

    चेहरों को समझने और पहचानने का मनोविज्ञान

    How do we remember faces 

    दोस्तों, क्या ये आश्चर्यजनक नहीं लगता कि हम अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और प्रतिदिन मिलने वाले सैकड़ों लोगों के चेहरे याद कर सकते हैं, उनके नाम और यहां तक की उनके बारे में अन्य जानकारियां भी हम अच्छी तरह याद रख सकते हैं।

    सभी मनुष्यों की एक जैसी शारीरिक रचना होती है, फिर हम एक दूसरे में अंतर् कैसे समझ जाते हैं ?

    हमारे मस्तिष्क का स्पेशल भाग हमें चेहरों को स्मरण रखने, और उन्हें दोबारा याद दिलाने में मदद  करता है।  

    पहली बार किसी चेहरे को देख कर उन्हें कोड में रूपांतरित करके स्टोर करने का काम fusiform gyrus करता है, जो किसी चेहरे को देख कर सक्रिय हो जाता है।

    fusiform gyrus की कार्य क्षमता के कारण ही ज्यादातर लोग चेहरों को किसी अन्य जटिल वस्तु की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह याद कर लेते हैं।

    दूसरे शब्दों में इसे fusiform face area नाम दिया गया है, जो इस कार्य के लिए जिम्मेदार है।

    इस भाग की विशेषता है कि यह चेहरे की पहचान सीधी(ऊपर से नीचे) दिशा में करता है ना की विपरीत (नीचे से ऊपर ) दिशा में।

    ये बात इस तथ्य से समझाई जा सकती है, कि हमारे विकास के शुरूआती दिनों (पाषाण काल) से लेकर अब तक जल्दी से चेहरों को पहचानने की क्षमता हमें लोगों से बातचीत करने, लड़ने और जीवित रहने में मदद करती आई है। क्योकि उलटे चेहरे दुर्लभ होते हैं, इसलिए इन्हे पहचानने की क्षमता हमारे पास नहीं होती।       

    fusiform area तब भी सक्रिय हो जाता है जब हम कोई ऐसी वस्तु देखते हैं, जो चेहरे की तरह दिखाई देती है।

    उदाहरण के लिए,  किसी घर को देखना, जिसकी खिड़कियां दो आँखों की तरह दिखाई देती हैं ! इस स्थिति को pareidolia कहते हैं जिसमे कहीं भी किसी भी वस्तु में चेहरे दिखाई दे जाते हैं।

    prosopagnosia एक ऐसी स्थिति है जिसमे व्यक्ति चेहरे नहीं पहचान सकता, और इसके कारण उसकी डेली लाइफ बहुत ज्यादा प्रभावित होती है। इसका कारण fusiform area को नुकसान पहुंचना है। विश्व भर के २.५ % लोग इस स्थिति से प्रभावित है। 

    दूसरा भाग जो चेहरे याद करने में मदद करता है वह है विज़ुअल शॉर्ट टर्म मेमोरी या VSTM.

    ऐसा विश्वास किया जाता था कि, VSTM सिर्फ वस्तुओं को पहचानने में मदद करता है, और जीवन भर स्थिर रहता है। लेकिन हाल के शोधों से पता चला है कि, VSTM स्मरण रखने और उन्हें याद दिलाने में मदद करने के साथ ही उम्र के साथ अपनी कार्य क्षमता बेहतर करता जाता है, और 34-35 वर्ष की उम्र में यह अपने शिखर पर होता है। 

    इसलिए जब भी हम किसी चेहरे को पहली बार देखते हैं, तो fusiform area हमारी मेमोरी में चेहरे की  कोडिंग करने में मदद करता है, और इससे जुडी जानकारियां मस्तिष्क के दूसरे भाग में संगृहीत करता है। 

    उसके बाद जब भी अगली बार हम उस व्यक्ति को देखते हैं, तुरंत VSTM में इस चेहरे की जांच होती  है और  इससे  संबंधित अन्य  जानकारियां  fusiform area से एकत्रित की जाती है।

    चेहरों को याद रखना और उन जानकारियों का इस्तेमाल हमारे आपसी व्यवहार के लिए करना, हमारे सामाजिक जीवन का बहुत महत्वपूर्ण भाग है।

    यह शायद  हमारे  दैनिक  जीवन  के लिए  आसान  और अपने  आप चलने वाली क्रियाएं लगती है, जिसे हम ज्यादा महत्व नहीं देते लेकिन prosopagnosia से  प्रभावित व्यक्ति के लिए बहुत कठिनाई भरी स्थिति होती है। 

    यह स्थिति मेमोरी  डिसऑर्डर  और बढ़ती  उम्र  के  साथ  होने  वाले विकार जैसे अल्जाइमर्स और डिमेंशिया में भी लोगों को प्रभावित करती है।  

       

  • 08 Jul
    Janhavi Dwivedi

    क्या सफलता पाने के लिए सिर्फ ‘बौद्धिक ज्ञान’ ही जरूरी है?

    Is Intelligence the only ingredient to success?- EQ, BQ, MQ 

    विनय को उसके ऑफिस में उसके सीनियर और जूनियर सभी पसंद करते हैं, उसके ऑफिस का माहौल खुशनुमा और तनावमुक्त रहता है, सभी अपने काम बिना किसी शिकायत के करते हैं, क्योंकि विनय अपने व्यवहार से सबकी समस्याओं को चुटकी में सुलझा देता है, और वहीं दूसरी तरफ सुशांत के ऑफिस में सभी उससे असंतुष्ट रहते हैं। एक ही कॉलेज से पढ़े होने के बावजूद दोनों की सफलता में अंतर् था।

    क्या है ये अंतर् आइये इस लेख के माध्यम से समझते हैं।

    हमारे स्कूल और कॉलेज का समय हमारे बुद्धि और स्मरणशक्ति की एक के बाद दूसरी परीक्षाओं में गुजरता है। कई बार तो छात्रों को वे जो कुछ सीख रहें हैं उसका वास्तविक जीवन में क्या महत्व है,ये भी नहीं पता होता। वे सिर्फ इसे याद करके  पेपर पर उतार देते हैं।

    एक ताजे अध्ययन के अनुसार ,जिन नौकरियों में लोगों से ज्यादा सम्पर्क और व्यवहार होता है उन नौकरियों में तनाव का स्तर सबसे अधिक होता है। यदि आप एक प्रोग्रामर हैं तो, आपको आपके कोड जरूर पता होंगे, जिससे आप एक अच्छा प्रोग्राम बना सकते हैं।

    लेकिन आप अलग-अलग तरह के लोगों के साथ कैसे deal करेंगें? लोग जो बड़ी टीमों का प्रबंधन करते हैं, या दिन भर लोगों की समस्याओं को बातचीत करके हल करते रहते हैं, बहुत ज्यादा तनाव में रहते हैं।

    यदि बुद्धिमत्ता और ज्ञान ही आवश्यक होता, तो MBA की किताबों का सारा ज्ञान प्रबंधकों की मदद करता, और वे कभी भी इतने तनाव ग्रस्त नहीं होते। जबकि सच ये है, कि कुछ 'व्यवहारिक कुशलताएं होती हैं, जो हमें 'बुद्धिमत्ता' से ज्यादा सफल बनाती हैं। इन कुशलताओं के मुख्य पक्ष हैं,:

     

    भावनात्मक समझदारी (emotional intelligence),

    शारीरिक  हाव-भाव(body language)

    नैतिकता(morality)।

     

    भावनात्मक समझदारी, अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने की क्षमता,और इस जानकरी का इस्तेमाल लोगों से अधिक अच्छे तरीके से बातचीत  करने में करना है।

    उदाहरण के लिए, यदि मुझे पता है कि, मेरे किसी सहयोगी ने किसी अपने को खो दिया है,और हो सकता है, उनका मन बहुत ही नाजुक स्थिति में हो जिससे उनके काम में कमी हो सकती है। ऐसी स्थिति में एक ऐसा व्यक्ति जिसकी भावनात्मक समझ कम है, उन्हें डांटेगा, या उनपर चिल्लाएगा । जिससे दूसरा व्यक्ति गुस्सा या उल्टा जवाब दे सकता है,और काम तो तब भी नहीं होगा।

    दूसरी तरफ एक व्यक्ति जिसकी भावनात्मक समझ  ज्यादा है, उनके साथ दिल की बातें करेगा ,और उनके मन को तसल्ली देगा और आखिर में उनसे अनुरोध करेगा कि, हो सके तो थोड़ी देर के लिए दुखी यादों से बचने के लिए काम पर ध्यान लगाएं। इससे काम तो होगा ही साथ ही संबंध भी बरकरार रहेंगे।

     

    शारीरिक हाव-भाव(Body language) भी हमें बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, सबसे मिलने-जुलने वाले खुले दिल के व्यक्ति को पदोन्नति, नौकरी, और यहां तक की नेतृत्व की कमान मिलने की सम्भावना ज्यादा होती है।

    शक्ति मुद्रा का मतलब है शारीरिक मुद्रा इस प्रकार की रखना जिससे शक्ति (ताकत) का प्रदर्शन हो। यह ना सिर्फ दूसरों को प्रभावित करती है, बल्कि हमे भी प्रभावित करती है। जब हम अपना शारीरिक हाव- भाव अच्छा रखते हैं, तो हमें स्वयं में अच्छा और ताकतवर होने का अहसास होता है।

      

    सदाचार और नैतिकता (Morality or ethics) महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लोग उन्ही लोगो को कोई प्रस्ताव  देना पसंद करते हैं, जिनपर वे विश्वास कर सकें। किन्ही नियमों का अनुसरण करना, और उनके प्रति निष्ठावान रहना दूसरों के मन में विश्वास को बढ़ा देता है । 

    इसलिए जब कोई नियम विरुद्ध होता है, तो  उसे किसी कार्य को करने में बहुत सी  परेशानियाँ आ सकती हैं, क्योंकि लोग उनके साथ आसानी से काम करने के लिए विश्वास नहीं करते।

     

    कुल मिलाकर, पसंद किया जाना भी उतना ही  महत्वपूर्ण है, जितना की ज्ञानवान और स्मार्ट होना।

    रिसर्च बताते हैं कि, किसी रूखे और घमंडी व्यक्ति से कोई अच्छी चीज खरीदने की तुलना में लोग उसकी चीजें खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं , जिसे वे पसंद करते हैं, चाहे वो खराब उत्पाद ही क्यों ना हो।

    और पसंदीदा होने के लिए, अच्छा भावनात्मक स्तर, सदाचार या नैतिकता और अच्छा हाव - भाव होना महत्वपूर्ण है। और सबसे अच्छी बात तो ये है, कि ये सब बातें सिर्फ शौकिया तौर पर ही सीखी जा सकती हैं।

    इसलिए सारांश ये है कि वह व्यक्ति जिसके पास अच्छा बौद्धिक ज्ञान (IQ)होने के  साथ अच्छी भावनात्मक पक्ष(EQ), नैतिक पक्ष (MQ) और अच्छा शारीरिक हाव-भाव का पक्ष (BQ)  है ,उसकी जीवन में ऐसे व्यक्ति से ज्यादा सफल होने की सम्भावना होगी, जिसके पास सिर्फ बहुत ज्यादा ‘बौद्धिक ज्ञान’ है। आजकल कैरियर में विनोदी स्वभाव और अच्छी समझ रखने की महत्वपूर्ण भूमिका है।

  • 06 Jul
    Janhavi Dwivedi

    मनोभ्रम (Dementia) से प्रभावित बुजुर्गों का कैसे रखें ख्याल

    How to tackle Dementia of your loved one

     

     

    वृद्धावस्था में अक्सर मनोभ्रम(dementia) या अल्जाइमर(alzheimer) के रोग बढ़ जाते हैं, जिसमे अक्सर बुजुर्ग गुस्सा करना, चिल्लाना और कभी कभी मार-पीट जैसे प्रतिकूल व्यवहार करने लगते है।

    dementia से प्रभावित बुजुर्गों के साथ रहना, काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए dementia को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।

    dementia मानसिक क्रिया में आया एक पुराना या लगातार चलनेवाला विकार है जो मस्तिष्क की बीमारी या किसी चोट के कारण होता है और याद्दाश्त में विकार, व्यक्तित्व में बदलाव, और विवेक शक्ति में कमी से पहचाना जाता है।

    सामान्य शब्दों में 'डेमेंशिया', मानसिक क्षमता में कमी है,जो प्रति दिन के जीवन में अत्यधिक गम्भीर परेशानियां उत्पन्न करता है।

    डेमेंशिया के बारे में :-

    डेमेंशिया कोई विशेष बीमारी नहीं है, यह याद्दाश्त या सोचने समझने की क्षमता में कमी के उन सभी लक्षणों की व्याख्या करता है, जिससे व्यक्ति को अपने रोजमर्रा के कामकाज करने में दिक्क़ते होती हैं।

    अल्जाइमर बीमारी का आंकड़ा 60-70 प्रतिशत होता है। दूसरीडेमेंशिया का प्रकार जो ज्यादा देखा जाता है वह है, वैस्कुलर डेमेंशिया जो एक स्ट्रोक के बाद होता है।

    लेकिन कुछ ऐसी स्थितियां जैसे थायरायड की समस्या और विटामिन की कमी भी डेमेंशिया के लक्षणों का कारण हो सकती हैं।

    डेमेंशिया को हमेशा से ही गलत ढंग से  'बुढ़ापा' या बुढ़ापे की जड़बुद्धि'  के रूप में इंगित किया जाता है, जो उन पुराने जमाने की गलत धारणा को प्रदर्शित करता है, कि 'गम्भीर मानसिक गिरावट' उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा है।       

    डेमेंशिया में याद्दाश्त में कमी और दूसरे लक्षण :

    डेमेंशिया के लक्षणों में भिन्नता हो सकती है, निम्नलिखित मुख्य मानसिक गतिविधियों में से कम से कम दो गतिविधियों में विकार होने पर इसे डिमेंशिया माना जाना चाहिए।

    १. याद्दाश्त

    २. बातचीत और भाषा ]

    ३. केंद्रीकरण और ध्यान देने की क्षमता

    ४. तर्क और निर्णय लेने की क्षमता

    ५. दृश्यों को समझने की क्षमता

    डेमेंशिया से पीड़ित लोगो को शॉर्ट टर्म मेमोरी के कारण परेशानी हो सकती है, जैसे कि किताबों,पेन और चश्मे को सही जगह पर रखना, बिल जमा करना, भोजन बनाने में, तारीख याद रखने में या घर से बाहर पड़ोस तक टहलने में परेशानी।

    डेमेंशिया के कारण होने वाले व्यवहार परिवर्तन को समझना :-

    जब कभी हमारे अपने मित्र या परिवार के सदस्य प्रौढ़ावस्था के डेमेंशिया का शिकार हो जाते हैं, परिणाम स्वरूप उनके व्यवहार में आया बदलाव उन पारिवारिक सदस्यों के लिए भारी पड़ जाता है, जो अभी तक उनकी देखभाल करते आ रहे हैं।

    डेमेंशिया पीड़ित व्यक्ति में अचानक ही क्रोध, उदासी, व्यामोह, आक्रामकता और भ्रम के भाव झलकने लगते हैं, और कभी भी व्यक्ति हिंसक हो सकता है।

    आप अपने प्रिय जन के इस व्यवहार पर कैसी प्रतिक्रिया करेंगे।

    आक्रामक व्यवहार की कैसी प्रतिक्रिया करें :

    क्या करें :- उनके उग्र व्यवहार पर कोई प्रतिक्रिया देने की अपेक्षा इस बात का पता लगाएं कि उनके इस व्यवहार का क्या कारण है।

    • इस बात को सुनिश्चित करें कि वे खुद को या दूसरों को किसी खतरे में नहीं डाल रहे, और फिर शांति पूर्वक उनका ध्यान दूसरी तरफ केंद्रित करने का प्रयत्न करें।
    • शांत और आश्वस्त तरीके से बात करें। हो सकता है, उनका व्यवहार ऐसा ही बना रहे, तब ये सुनिश्चित करके की वे अनुचित रूप से अपने को हानि ना पहुँचायें, उन्हें शांत होने के लिए कमरे में अकेला छोड़ दें।

     

    क्या ना करें :-  ऐसी स्थिति से गुजर रहे व्यक्ति से कभी भी बहस ना करें। आपको उन्हें बलपूर्वक शांत करने से बचना चाहिए, अन्यथा यह उनकी सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकता है। 

     

    स्थान या समय की भ्रान्ति का जवाब कैसे दें :-

     क्या करें :- ऐसी स्थिति में जब आपके प्रिय भ्रमित हो जाते हैं, कि वे कहां हैं। उन्हें बुनियादी जानकारी देने की कोशिश करें। आप इस काम में पिक्चर या दूसरी याद दिलाने वाली चीज दिखा सकते हैं।

    हो सकता है, आपके परिजन नई जगह में उबन महसूस कर रहे हों,आप उनका ध्यान दूसरी जगह केंद्रित करने के लिए घुमाने ले जाइये, या उनके साथ किसी गतिविधि में भाग लीजिए।

    कुछ ऐसी  स्थिति में, जब वे पूछें कि, हम वापस घर कब जायेंगे?, आप उनसे स्वास्थयवर्धक झूठ बोल सकते हैं, जैसे, जब तक कुछ ट्रैफिक लाइट नहीं जल जातीं हम यहां से नहीं जा सकते, या अब बहुत देर हो चुकी है हम  रात भर यहीं रहेंगे सुबह जायेंगे। अंत में, आप जो कहना चाह रहे हैं, समझ आने पर उन्हें ढाढ़स होगा।

    क्या ना करें:- वे कहाँ हैं, और आप क्या कर रहें हैं, आदि के बारे में लम्बे स्पष्टीकरण देने से बचें। यह उन्हें अधिक भ्रमित करने का काम  करेगा।

    निर्णय लेने की असफलता पर कैसी प्रतिक्रिया करें :-

    क्या करें :- यदि आपके प्रिय बुजुर्ग निर्णय लेने में असमर्थता प्रदर्शित करते हैं, जैसे वे यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहें हैं कि उनके बिलों का भुगतान हो रहा है, तो आप उनकी मदद करने की पेशकश कर सकते हैं। इससे आपको उनके एकाउंट्स देखने का मौका मिल जाएगा, और वे आश्वस्त हो सकेंगे कि उनके बिलों का भुगतान समय से हो रहा है।

    क्या ना करें :- उनकी क्षमता के अनुसार एकाउंट्स रिकॉर्ड्स और चेकबुक से जरूरी दूरी बनाए रखें। हो सकता है, आपके प्रिय बुजुर्ग ये समझें की आप उनपर गलत निर्णय लेने का आरोप लगा रहें है, तब विवाद हो सकता है।

    प्रभावित व्यक्ति से बातचीत करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    इन नियमों का पालन करने की कोशिश करें :-

    ये करें:-

    • उनके साथ सम्मान और गरिमा के साथ बातचीत करें।
    • बाते संक्षेप में करें। स्प्ष्ट और समझने योग्य भाषा का उपयोग करें।
    • बात करते समय स्वयं को उनकी आँखों के आगे रखकर आँखों का सम्पर्क बने रखें। बात शुरू करने से पहले ये सुनिश्चित करें कि उनका ध्यान आपकी तरफ है। हमेशा पहले अपना परिचय दें, और आप उनसे क्या कहने जा रहें हैं ये स्प्ष्ट करें।
    • कुछ बिंदुओं पर समझनेयोग्य दृश्य संकेतों का प्रयोग करें।
    • उनकी उम्मीदों को समझने योग्य बनें।
    • उनकी उन बातों को समझने का प्रयास करें जो वे नहीं बोल पा रहें हैं।
    • आपके बोलने का तरीका संक्षिप्त, शांत और सांत्वना देने वाला हो।
    • धीरे बोलें और हर शब्द स्पष्ट हो। उन्हें हर बात सुनाई दे इसका ध्यान रखें।
    • उन चीजों पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित करें जिनसे वे परिचित हैं।
    • स्पर्श तभी करें, जब ऐसा करना उपयुक्त हो।

    क्या ना करें :-

    • उनसे ऐसे बात करना जैसे आप किसी बच्चे से बात कर रहे हैं।
    • जटिल शब्दों और लम्बे वाक्यांशों का प्रयोग करना।
    • बात करते समय उन्हें गुस्से से देखना।
    • बिना ये स्प्ष्ट करे कि, आप कौन हैं, और आपको क्या काम है, बात शुरू कर देना।
    • आँखों के सम्पर्क के बिना बात करना, जैसे दराज की सफाई करने के दौरान ड्रेस के चुनाव की बात करना। व्यवधानमुक्त माहौल में बात करने की कोशिश करें। 
    • असम्भव इच्छा या उनसे एक समय में एक से अधिक काम करने का अनुरोध करने से आफत हो सकती है।
    • अपने हाव- भाव की उपेक्षा करना।
    • ध्यान भंग करने वाली बातों की उपेक्षा करना।
    • चिल्लाना या बहुत तेजी से बात करना।
    • यदि वे भय या क्रोध में हैं, तो उन्हें स्पर्श करना या उनके निजी मामलों में दखल देना।

    जबकि अल्जाइमर या डेमेंशिया से पीड़ित अपने प्रियजनों का सहयोग मिलना मुश्किल होता है, फिर भी ये दिशा निर्देश उनकी देखभाल करने वाले को काफी मदद कर सकते हैं।

    Article translated from: How to tackle Dementia of your loved one by Dr K V Anand (Psychologist) 

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  • 05 Jul
    Janhavi Dwivedi

    कैसे निभाए ससुराल में

    saas bahoo kalah

     

    ससुराल में खासकर नई बहू के लिए सास- ससुर के साथ निभाना मुश्किल हो सकता है, विशेष कर इसलिए क्योंकि उनका आपके पति के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

    अपनी इच्छाओं और जरूरतों को दूसरों की इच्छाओं और जरूरतों के साथ संतुलित करना आसान नहीं होता। इन सबके बीच आपको सावधान रहकर परिवार में एकता बनाए रखना होता है।

    आइए पढ़ें, कुछ सुझाव उनके लिए जिन्हे ससुराल में निभाने में मुश्किल होती है।

    • सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात है कि, जो चीजें आपके दायरे से बाहर हो जाएँ उन्हें अपने पति के साथ शेयर करें, आपकी आधी परेशानी तभी सुलझ जाएगी जब आपके पति आपकी जरूरतों और अपेक्षाओं को समझ लेंगें। हर छोटी बात को लेकर अपने पति के पास मत जाइये इससे उन्हें परेशानी होगी,और कभी भी उनसे खुद के या किसी अन्य रिश्ते के बीच चुनाव करने को ना कहें।

    इस बात को समझिए कि, भले ही आपके लिए आपके पति के माता पिता का अहम स्थान ना हो, लेकिन आखिर वे आपके पति के माता पिता हैं।

     

    • दूसरी महत्वपूर्ण बात जो इस तथ्य से जुडी हुई है कि, आपका ससुराल आपके द्वारा प्रशंसनीय नहीं है, या दूसरे शब्दों में आपके मायके जैसा नहीं है। अपने नए घर और मायके की तुलना करना बंद करें। चीजें हमेशा एक जैसी नहीं हो सकती, और आपको उन्हें वैसे ही स्वीकार करना चाहिए।

     

    • किसी मसले पर आमने सामने बात कर लेना ज्यादा अच्छा होता है। पीठ पीछे किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए। चुगली करने से किसी समस्या का हल नहीं निकलता। यदि आपको अपने सास ससुर से कोई बात करनी है तो बेहतर होगा आप सीधे उनसे बात करें और अच्छा होगा बातचीत के समय आपके पार्टनर भी मौजूद रहें, जिससे वे भी हर बात में बराबर के भागीदार रहें और कोई भी बात उनसे छिपी ना रहे।

     

    • यदि आप अपने सास ससुर को नहीं मना पाती, या वे अपनी बात पर अड़े हैं तो उस बात को वैसे ही रहने दीजिये। वे आपसे बड़ें हैं, इस बात का सम्मान कीजिये। परेशान होने या उनके खिलाफ कुढ़ने का कोई मतलब नहीं है। बड़बड़ाना या अपना आपा खोकर उनके ऊपर चिल्लाइये नहीं। इससे बात बिगड़ जाएगी।

     

    • जितना सम्भव हो सास ससुर से उन बातों पर बातचीत करने से बचें जिनसे आपके बीच झगड़े भड़कते हों। जब कभी ऐसे संवेदनशील विषय पर चर्चा का समय आये अपने साथी(पति/पत्नी ) से इस विषय में बात करने को कहें।

     

    • छोटे मोटे झगड़ों और तानो से परेशान मत होइए। जीवन की बड़ी योजनाओं में इन महत्वहीन झगड़ों से कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने जीवन साथी के साथ एक खास रिश्ता मजबूत करना महत्वपूर्ण है। खुद  को ससुराल वालों के लिए अच्छा बनने को बाध्य मत करें।

     

    • अपनी सीमाओं को समझिए। अपने आप को ससुराल वालों की इच्छा के अनुसार मत बदलिए और ना ही ससुराल वालों को अपनी इच्छा के अनुसार बदलिए। व्यक्तिवादी बनें। सबसे अच्छा रास्ता है कि आप उन्हें उनकी बातों को स्वीकार करने की अपनी सीमायें बता दें।

     

    समय समय पर अपने मायके जाएँ। तनाव से मुक्ति पाने का ये एक अच्छा तरीका है।

    अंत में, परिवार में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। कृपया टी. वी पर आने वाले डेली सोप (धरावाहिक) को मत देखें,ये आपको प्रभावित कर सकते हैं।