कुल 169 लेख

  • 26 Jul
    Oyindrila Basu

    एनोरेक्सिया-पतली होने की ख़ुशी 

     
    anorexia

    एनोरेक्सिया एक ऐसी शारीरिक बीमारी है, जिसमें अधिक मात्रा में वज़न घटता है, और आप अस्वाभाविक रूप से पतले दिखते हैं।

    एनोरेक्सिया से पीड़ित व्यक्ति खाने से दूर भागता है, दिन में एक या दो समय का खान छोड़ देता है, पतले होने के जुनून में स्वास्थ्य को खराब करता है।

    ऐसे लोगों में-

    १. अधिक मात्रा में वज़न घटना

    २. कमज़ोरी

    ३. थकान

    ४. चक्कर आना

    ५. कम हीमोग्लोबिन

    ६. नींद की समस्या

    ७. नमी का अभाव

    ८. ऑस्टियोपोरोसिस

    ९. ऋतु प्रभाव की समस्या

    १०. बदहज़मी

    ११. पीली त्वचा

    इत्यादि के लक्षण नज़र आते हैं।

    महिलाएं इस रोग की चपेट में ज्यादा आती हैं, क्योंकि वे सुंदरता और पूर्णता के प्रति काफी सचेत रहती हैं। महिलाओं की सुंदरता को समाज में जिस प्रकार से  दर्शाया जाता है, उससे उन्हें लगता है, कि पतले होने से, उनमें ये सुंदरता आएगी।

    पहले माना जाता था, की एनोरेक्सिया मोटा ना होने के डर से होता है, लेकिन, हाल ही में वैज्ञानिक रिसर्च द्वारा पता चला है, कि एनोरेक्सिया की बीमारी में इंसान को पतले होने में सुख महसूस होता है ।

    शोधकर्ताओं नें कुछ महिलाओं को दूसरे लोगों  की तस्वीरें दिखाई । ज्यादातर एनोरेक्सिया से पीड़ित औरतों ने पतले लोगों की तस्वीरों पर ख़ुशी ज़ाहिर की। खुद की तरह पतले शरीर वालों पर को देखने पर खुश हुईं। जबकि जो साधारण औरतें थी, उन्होंने पतले लोगों पर ऐसा कोई उत्साह नहीं दिखाया।

    खाने की समस्या अनुवांशिक भी हो सकती है, जिसके कारण भविष्य में एनोरेक्सिया की समस्या हो सकता है।

    ये एक मानसिक प्रवृत्ति है। अगर आप हर प्रकार से ठीक दिखना चाहते हैं, तो इस प्रकार खान-पान छोड़ कर आपको लगता है कि आपके स्वास्थ्य को फायदा होगा।

    एनोरेक्सिया के निम्न लक्षण हैं-

    १. दूसरों के सामने खाने से मना करना।

    २. किसी बहाने से खाना ना खाना।

    ३. वज़न पर ज़रूरत से ज्यादा ध्यान देना।

    ४. खाते वक़्त कैलोरी नापते रहना।

    ५. वज़न हर रोज़ नापना।

    ६. विभिन्न साइट्स पर खुदके पतले होने की तसवीरें डालना।

    मानसिक रूप से स्वस्थ होना अति आवश्यक है। ऐसी स्थिति में मनोचिकित्सक की मदद लेकर आप अपने भविष्य को संवाँर सकते हैं ।

  • 25 Jul
    Oyindrila Basu

    मेन्टल हेल्थ फर्स्ट ऐड-आपकी भूमिका

    mood disorders

     
    मेंटल हेल्थ फर्स्ट ऐड क्या है?
    किसी को चोट लगती है तो हम डेटोल से फर्स्ट ऐड करते हैं, लेकिन मानसिक समस्या के लिए फर्स्ट ऐड !
    जी हाँ !
    ये वह पीड़ा निवारक मदद है जो आप अचानक मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति को दे सकते हैं
    जैसे अगर कोई चिंतित है, परेशान है, क्योंकि उसकी फ्लाइट छूट गयी, तो आपका काम है उसे शांत करना, उसे समझाना, “सब ठीक हो जाएगा”, यही उसको काफी राहत पहुंचाएगी

    परेशानी और दुःख से इंसान के मन मिज़ाज पर गहरा असर पड़ता है, तो ऐसे लक्षण कैसे समझेंगे और क्या करेंगे मदद के लिए? आइये जानते हैं ।

    1. दोस्त के व्यवहार में छोटे छोटे बदलाव को भी ध्यान दें- आपका दोस्त अचानक से चुप रहने लगा है, या फिर सबसे भागता फिर रहा है, तो ज़ाहिर है वह समस्या में है। उसके व्यवहारिक बदलाव को नज़र अंदाज़ ना करें। हर कोई पीड़ित व्यक्ति एक प्रकार के लक्षण नहीं दिखाते, हर किसी के ज़ाहिर करने का तरीका अलग होता है।

    2. अगर आप मदद करना चाहते हैं, तो खुद का ज्ञान बढ़ाएं- आपका दोस्त मानसिक पीड़ा से जूझ रहा है, तो उसकी मदद करने के लिए आपको खुद का ज्ञान बढ़ाना होगा। मानसिक स्वास्थ्य पर किताबें पढ़ें, जो आपको बता सके की ऐसी स्थिति में कैसे मदद करनी चाहिए ।

    3. आपका ध्यान आपके दोस्त पर ही होना चाहिए- जब आप उससे बात करें तो ध्यान रखें की वह आप से अकेले में बात कर रहा हो। सबके सामने वह ठीक महसूस नहीं करेगा। और सिमट जाएगा। आप उसे यकीन दिलाएं की आपने उसमें बदलाव देखा है, इससे उसे पता चलेगा की आप उसके लिए चिंतित हैं।

    4. आपका समर्थन ज़रूरी है- अपने दोस्त की पीड़ा को समझें। उसे दोषी न दें, उसके साथ खड़े रहे। सिर्फ इतना बोलना भी काफी होता है, "चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा"

    5. उनको मेडिकल हेल्प लेने के लिए उत्साहित करें- सच्चाई को सही रूप से समझाना ज़रूरी है। उन्हें समझाएं की उनको प्रोफेशनल मदद लेना ज़रूरी है। ये उनकी बेहतरी के लिए है।

    6. आत्मघाती लक्षण को समझें- अगर आपके दोस्त कभी भी आत्महत्या के बारे में कुछ बताते हैं, तो उसे गंभीरता से लें, और उससे खुल कर बात करें, आत्मघाती चिंताओं से किसी को मुक्त करने के लिए उसके बारे में जानकारी देना ज़रूरी है।

     

     

  • 22 Jul
    eWellness Expert

    बनें अपने खास बच्चे के सर्वोत्तम मनोचिकित्सक

    autism

    जब माता-पिता को बच्चे के विशेष मानसिक अवस्था के बारे में पहली बार पता चलता है, तो ये उन के लिए झटका होता है, उन्हें यकीन नहीं होता, कि उनका बच्चा स्वाभाविक नहीं है, किसी मनोवैज्ञानिक समस्या से जूझ रहा है।

    और यह अकसर बच्चे के थोड़ा बड़े होने के बाद ही पता चलता है। जब तक वह 6-7 साल का नहीं हो जाता, माता-पिता उनकी हरकतों को बचकानी मान कर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

    अचानक पता चलने पर, वे हताश और निराश हो जातें है, कभी कभी उन्हें गुस्सा आता है, कभी खुद पर धिक्कार आता है, और अपनी मानसिक समस्याओं को वे बच्चे पर बरसातें है।

     

     

    25+7 कितना होता है? अंतरा! अंतरा! तुम सुन रही हो मुझे? बताओ, कुछ बोलती क्यों नहीं?" , टीचर अन्तर की तरफ बढ़ती हैं और उसे हिला कर उससे जवाब पूछती हैं।  हेड टीचर अनुराधा से कहती हैं "आई आम सॉरी अनुराधा,  अंतरा को जाना होगा, वह दूसरे बच्चों के साथ नहीं पढ़ सकती".............. अनुराधा हैरान परेशान सी डॉक्टर के पास पहुँचती है, जहां उसे पता चलता है, " कि उसे आटिज्म है"............. अनुराधा को यकीन नहीं होता, वह हताशा से टूट जाती है, लेकिन वह फिर हिम्मत जुटा कर अंतरा से कहती है  "मैं तुम्हे दुनिया की हर ख़ुशी दूंगी, तुम बिलकुल फ़िक्र मत करो, माँ है ना!"- आप की अंतरा, ज़ी टी वी, द्वितीय एपिसोड।

     

     

    खुद का ध्यान ऐसे में रखना ज्यादा ज़रूरी है, तो आइये यह जानते हैं, खुद को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें ?

     

    1. अपनी परेशानी अपने बच्चे पर ना थोपिये: एक बच्चा जो मानसिक रूप से अस्वस्थ है, उसे डांटने या धिक्कारने से कोई फायदा नहीं, वह कुछ भी समझ नहीं पायेगा, आपकी स्थिति उसके लिए अनजान सवाल है। लेकिन आपका चिल्लाना या परेशानी ज़ाहिर करने से बच्चे को और हानि पहुंचेगी ।

     

    1. खुद को शांत रखें: शान्ति से ही हर समस्या का समाधान हो सकता है। खुद को स्थिर रखें और अपनी मानसिकता को स्वस्थ रखें। आप खुद स्वस्थ रहेंगे तभी अपने बच्चे को स्वस्थ रख पाएंगे। मनोवैज्ञानिक समस्या के बारे में जानकारी बढ़ाएं।

     

    1. खुद को दोषी ना ठहराएं: अकसर माता-पिता अपने बच्चे के रोग के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हैं। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है, कि ज्यादातर, मानसिक रोग आनुवंशिक रूप से प्रेरित नहीं होते, किसी जैविक प्रक्रिया की विकृति के कारण या जन्म के बाद, वातावरणीय समस्याओं से बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्या हो सकती है। आप अगर अपने बच्चे को प्यार से सम्हाल रहे है, तो उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या के लिए आप दोषी नहीं हैं ।

     

    1. खुद को अपने प्रति सहानुभूतिशील बनाएं: अगर आपके बच्चे में आपकी मानसिक दुर्बलता के कुछ आसार नज़र आ रहे है, तब भी खुद को दोषी ना माने, आप जान बूझ कर इस परिस्थिति में नहीं हैं। जो होना था हो गया, उस पर चर्चा करने से अच्छा है, खुद को ईमानदारी से इसके समाधान के लिए तैयार करें। गर्व महसूस करें, की आप पर ये बड़ी ज़िम्मेदारी है, सब को ये मौका नहीं मिलता। आपका बच्चा ख़ास है, तो आप भी ख़ास हैं।

     

    1. दूसरों से अपने समस्या के बारे में चर्चा करें: समस्या को बाँटने से उसका असर कम होगा। जब दूसरे आप से सहानुभूति जताएंगे, तो आपको बेहतर महसूस होगा, राहत मिलेगी, कि समस्या उतनी भी गंभीर नहीं है, सब ठीक हो जाएगा।

     

    1. परिवार को समस्या में शामिल करें: अपने ऊपर पूरी ज़िम्मेदारी ना लें। अगर आप अपने बच्चे का सम्पूर्ण दायित्व खुद पर लेते हैं, तो आप दबाव में आ जाएंगे, सामाजिक रूप से भी आपको हर हालत के लिए जिम्मेदार माना जाएगा। परिवार के दूसरे सदस्यों को अपनी समस्या में शामिल करें। उनके मत को सुने, उनसे ज्ञान और नसीहत लें, पर आप के बच्चे के लिए क्या सही है, यह आप ही तय करेंगे।

     

    1. अपने टीनेजर बच्चे से कैसे पेश आएंगे, इसका अध्ययन करें: जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, और टीनेज में होते हैं, तो उन में कई व्यवहारिक समस्या दिखती हैं। गुस्सा करना, चीखना, चिल्लाना, ये सब टीनएजर के व्यवहार में दिखाई देता है ।

     और उन्हें सम्हालना आसान नहीं होता है, उनके व्यवहार से आपका मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है। आप दुखी और अपमानित महसूस कर सकते हैं, लेकिन उनके शब्दों को नज़रअंदाज़ करना सीखें। वह कैसे पेश आ रहे है, उसे मन पर ना लें। जितना आप उनके व्यवहार को इग्नोर करेंगे, उतना ही उनकी समस्या को समझ पाएंगे।

     

    1. हर रोज़ व्यायाम का अभ्यास करें।: हर दिन खुद को स्वस्थ रखने के लिए 10 मिनट व्यायाम का अभ्यास करें। प्राणायाम भी अधिक सहायता करेगी।

     

  • 20 Jul
    Janhavi Dwivedi

    चेहरों को समझने और पहचानने का मनोविज्ञान

    How do we remember faces 

    दोस्तों, क्या ये आश्चर्यजनक नहीं लगता कि हम अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और प्रतिदिन मिलने वाले सैकड़ों लोगों के चेहरे याद कर सकते हैं, उनके नाम और यहां तक की उनके बारे में अन्य जानकारियां भी हम अच्छी तरह याद रख सकते हैं।

    सभी मनुष्यों की एक जैसी शारीरिक रचना होती है, फिर हम एक दूसरे में अंतर् कैसे समझ जाते हैं ?

    हमारे मस्तिष्क का स्पेशल भाग हमें चेहरों को स्मरण रखने, और उन्हें दोबारा याद दिलाने में मदद  करता है।  

    पहली बार किसी चेहरे को देख कर उन्हें कोड में रूपांतरित करके स्टोर करने का काम fusiform gyrus करता है, जो किसी चेहरे को देख कर सक्रिय हो जाता है।

    fusiform gyrus की कार्य क्षमता के कारण ही ज्यादातर लोग चेहरों को किसी अन्य जटिल वस्तु की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह याद कर लेते हैं।

    दूसरे शब्दों में इसे fusiform face area नाम दिया गया है, जो इस कार्य के लिए जिम्मेदार है।

    इस भाग की विशेषता है कि यह चेहरे की पहचान सीधी(ऊपर से नीचे) दिशा में करता है ना की विपरीत (नीचे से ऊपर ) दिशा में।

    ये बात इस तथ्य से समझाई जा सकती है, कि हमारे विकास के शुरूआती दिनों (पाषाण काल) से लेकर अब तक जल्दी से चेहरों को पहचानने की क्षमता हमें लोगों से बातचीत करने, लड़ने और जीवित रहने में मदद करती आई है। क्योकि उलटे चेहरे दुर्लभ होते हैं, इसलिए इन्हे पहचानने की क्षमता हमारे पास नहीं होती।       

    fusiform area तब भी सक्रिय हो जाता है जब हम कोई ऐसी वस्तु देखते हैं, जो चेहरे की तरह दिखाई देती है।

    उदाहरण के लिए,  किसी घर को देखना, जिसकी खिड़कियां दो आँखों की तरह दिखाई देती हैं ! इस स्थिति को pareidolia कहते हैं जिसमे कहीं भी किसी भी वस्तु में चेहरे दिखाई दे जाते हैं।

    prosopagnosia एक ऐसी स्थिति है जिसमे व्यक्ति चेहरे नहीं पहचान सकता, और इसके कारण उसकी डेली लाइफ बहुत ज्यादा प्रभावित होती है। इसका कारण fusiform area को नुकसान पहुंचना है। विश्व भर के २.५ % लोग इस स्थिति से प्रभावित है। 

    दूसरा भाग जो चेहरे याद करने में मदद करता है वह है विज़ुअल शॉर्ट टर्म मेमोरी या VSTM.

    ऐसा विश्वास किया जाता था कि, VSTM सिर्फ वस्तुओं को पहचानने में मदद करता है, और जीवन भर स्थिर रहता है। लेकिन हाल के शोधों से पता चला है कि, VSTM स्मरण रखने और उन्हें याद दिलाने में मदद करने के साथ ही उम्र के साथ अपनी कार्य क्षमता बेहतर करता जाता है, और 34-35 वर्ष की उम्र में यह अपने शिखर पर होता है। 

    इसलिए जब भी हम किसी चेहरे को पहली बार देखते हैं, तो fusiform area हमारी मेमोरी में चेहरे की  कोडिंग करने में मदद करता है, और इससे जुडी जानकारियां मस्तिष्क के दूसरे भाग में संगृहीत करता है। 

    उसके बाद जब भी अगली बार हम उस व्यक्ति को देखते हैं, तुरंत VSTM में इस चेहरे की जांच होती  है और  इससे  संबंधित अन्य  जानकारियां  fusiform area से एकत्रित की जाती है।

    चेहरों को याद रखना और उन जानकारियों का इस्तेमाल हमारे आपसी व्यवहार के लिए करना, हमारे सामाजिक जीवन का बहुत महत्वपूर्ण भाग है।

    यह शायद  हमारे  दैनिक  जीवन  के लिए  आसान  और अपने  आप चलने वाली क्रियाएं लगती है, जिसे हम ज्यादा महत्व नहीं देते लेकिन prosopagnosia से  प्रभावित व्यक्ति के लिए बहुत कठिनाई भरी स्थिति होती है। 

    यह स्थिति मेमोरी  डिसऑर्डर  और बढ़ती  उम्र  के  साथ  होने  वाले विकार जैसे अल्जाइमर्स और डिमेंशिया में भी लोगों को प्रभावित करती है।  

       

  • 08 Jul
    Janhavi Dwivedi

    क्या सफलता पाने के लिए सिर्फ ‘बौद्धिक ज्ञान’ ही जरूरी है?

    Is Intelligence the only ingredient to success?- EQ, BQ, MQ 

    विनय को उसके ऑफिस में उसके सीनियर और जूनियर सभी पसंद करते हैं, उसके ऑफिस का माहौल खुशनुमा और तनावमुक्त रहता है, सभी अपने काम बिना किसी शिकायत के करते हैं, क्योंकि विनय अपने व्यवहार से सबकी समस्याओं को चुटकी में सुलझा देता है, और वहीं दूसरी तरफ सुशांत के ऑफिस में सभी उससे असंतुष्ट रहते हैं। एक ही कॉलेज से पढ़े होने के बावजूद दोनों की सफलता में अंतर् था।

    क्या है ये अंतर् आइये इस लेख के माध्यम से समझते हैं।

    हमारे स्कूल और कॉलेज का समय हमारे बुद्धि और स्मरणशक्ति की एक के बाद दूसरी परीक्षाओं में गुजरता है। कई बार तो छात्रों को वे जो कुछ सीख रहें हैं उसका वास्तविक जीवन में क्या महत्व है,ये भी नहीं पता होता। वे सिर्फ इसे याद करके  पेपर पर उतार देते हैं।

    एक ताजे अध्ययन के अनुसार ,जिन नौकरियों में लोगों से ज्यादा सम्पर्क और व्यवहार होता है उन नौकरियों में तनाव का स्तर सबसे अधिक होता है। यदि आप एक प्रोग्रामर हैं तो, आपको आपके कोड जरूर पता होंगे, जिससे आप एक अच्छा प्रोग्राम बना सकते हैं।

    लेकिन आप अलग-अलग तरह के लोगों के साथ कैसे deal करेंगें? लोग जो बड़ी टीमों का प्रबंधन करते हैं, या दिन भर लोगों की समस्याओं को बातचीत करके हल करते रहते हैं, बहुत ज्यादा तनाव में रहते हैं।

    यदि बुद्धिमत्ता और ज्ञान ही आवश्यक होता, तो MBA की किताबों का सारा ज्ञान प्रबंधकों की मदद करता, और वे कभी भी इतने तनाव ग्रस्त नहीं होते। जबकि सच ये है, कि कुछ 'व्यवहारिक कुशलताएं होती हैं, जो हमें 'बुद्धिमत्ता' से ज्यादा सफल बनाती हैं। इन कुशलताओं के मुख्य पक्ष हैं,:

     

    भावनात्मक समझदारी (emotional intelligence),

    शारीरिक  हाव-भाव(body language)

    नैतिकता(morality)।

     

    भावनात्मक समझदारी, अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने की क्षमता,और इस जानकरी का इस्तेमाल लोगों से अधिक अच्छे तरीके से बातचीत  करने में करना है।

    उदाहरण के लिए, यदि मुझे पता है कि, मेरे किसी सहयोगी ने किसी अपने को खो दिया है,और हो सकता है, उनका मन बहुत ही नाजुक स्थिति में हो जिससे उनके काम में कमी हो सकती है। ऐसी स्थिति में एक ऐसा व्यक्ति जिसकी भावनात्मक समझ कम है, उन्हें डांटेगा, या उनपर चिल्लाएगा । जिससे दूसरा व्यक्ति गुस्सा या उल्टा जवाब दे सकता है,और काम तो तब भी नहीं होगा।

    दूसरी तरफ एक व्यक्ति जिसकी भावनात्मक समझ  ज्यादा है, उनके साथ दिल की बातें करेगा ,और उनके मन को तसल्ली देगा और आखिर में उनसे अनुरोध करेगा कि, हो सके तो थोड़ी देर के लिए दुखी यादों से बचने के लिए काम पर ध्यान लगाएं। इससे काम तो होगा ही साथ ही संबंध भी बरकरार रहेंगे।

     

    शारीरिक हाव-भाव(Body language) भी हमें बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, सबसे मिलने-जुलने वाले खुले दिल के व्यक्ति को पदोन्नति, नौकरी, और यहां तक की नेतृत्व की कमान मिलने की सम्भावना ज्यादा होती है।

    शक्ति मुद्रा का मतलब है शारीरिक मुद्रा इस प्रकार की रखना जिससे शक्ति (ताकत) का प्रदर्शन हो। यह ना सिर्फ दूसरों को प्रभावित करती है, बल्कि हमे भी प्रभावित करती है। जब हम अपना शारीरिक हाव- भाव अच्छा रखते हैं, तो हमें स्वयं में अच्छा और ताकतवर होने का अहसास होता है।

      

    सदाचार और नैतिकता (Morality or ethics) महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लोग उन्ही लोगो को कोई प्रस्ताव  देना पसंद करते हैं, जिनपर वे विश्वास कर सकें। किन्ही नियमों का अनुसरण करना, और उनके प्रति निष्ठावान रहना दूसरों के मन में विश्वास को बढ़ा देता है । 

    इसलिए जब कोई नियम विरुद्ध होता है, तो  उसे किसी कार्य को करने में बहुत सी  परेशानियाँ आ सकती हैं, क्योंकि लोग उनके साथ आसानी से काम करने के लिए विश्वास नहीं करते।

     

    कुल मिलाकर, पसंद किया जाना भी उतना ही  महत्वपूर्ण है, जितना की ज्ञानवान और स्मार्ट होना।

    रिसर्च बताते हैं कि, किसी रूखे और घमंडी व्यक्ति से कोई अच्छी चीज खरीदने की तुलना में लोग उसकी चीजें खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं , जिसे वे पसंद करते हैं, चाहे वो खराब उत्पाद ही क्यों ना हो।

    और पसंदीदा होने के लिए, अच्छा भावनात्मक स्तर, सदाचार या नैतिकता और अच्छा हाव - भाव होना महत्वपूर्ण है। और सबसे अच्छी बात तो ये है, कि ये सब बातें सिर्फ शौकिया तौर पर ही सीखी जा सकती हैं।

    इसलिए सारांश ये है कि वह व्यक्ति जिसके पास अच्छा बौद्धिक ज्ञान (IQ)होने के  साथ अच्छी भावनात्मक पक्ष(EQ), नैतिक पक्ष (MQ) और अच्छा शारीरिक हाव-भाव का पक्ष (BQ)  है ,उसकी जीवन में ऐसे व्यक्ति से ज्यादा सफल होने की सम्भावना होगी, जिसके पास सिर्फ बहुत ज्यादा ‘बौद्धिक ज्ञान’ है। आजकल कैरियर में विनोदी स्वभाव और अच्छी समझ रखने की महत्वपूर्ण भूमिका है।