कुल 169 लेख

  • 04 Aug
    Oyindrila Basu

    एक खत सामान्य लोगों के नाम

    woman writing letter

     

    प्रिय सामान्य लोग,

    हम आपके सामाजिक दायित्व बोध को नमन करते हैं; आप जिस प्रकार सामाजिक नियम और संस्कारों का पालन करते हैं , सच में प्रशंसनीय है।

    एक मौका नहीं छोड़ते आप हमें 'ख़ास' अहसास कराने में। कहीं हम सड़क पर दिख जाएँ, तो जिस प्रकार आप हम पर हँसते हैं , जैसे हमें भिन्न नामों से बुलाते हैं, जिस तरह हमारा मज़ाक बनाते हैं, हमें अहसास होता है, कि हम वाकई भाग्यशाली हैं, कि हमें आपका इतना ध्यान और सम्मान मिल रहा है।

    कभी कभी आप हमारे प्रति कुछ ज्यादा ही सहानुभूतिशील हो जाते हैं। हमें देख कर आप लोग कानाफूसी करते हैं, और हमारे विषय पर आलोचना करना आपकी बुद्धिमानी का परिचय देती है, अगर हम गिर गए हैं, फिर भी आप में से कोई सहायता करने के लिए आगे नहीं आता।

    हम काटते नहीं हैं, फिर भी आप स्वयं और बच्चों को हमसे दूर रखते हैं, जैसे कि हम शेर हों, आपका शुक्रिया।

     

    आप हमसे डरते हैं?.... हमसे?.. क्या  इंसान को इंसान से डरना चाहिए?..... 

    शायद हम गुमसुम रहते हैं, आप लोगों की तरह चतुर नहीं है हम, और आप के हिसाब से इसमें हमारी कमी है।

    हम पीड़ा में होते हैं, तकलीफ से गुज़रते हैं, लेकिन आपका समाज 'पागलपन', 'प्रेत का साया', 'डायन' इत्यादि नाम देकर उसे और दुखदायी बनाता है।

    हम रोते हैं, लेकिन आपको हँसी आती है, दूसरों की तकलीफ पर हँसना.... क्या यही सामान्य लोग करते है?. क्या यही इंसानियत है?

    हमें तो किसी ने ऐसा नहीं सिखाया!

    आजकल मानसिक समस्या को आप लोग विभिन्न  नामों से सम्बोधन करते हैं, और बिना सोचे समझे किसी पर भी ये नाम लागू कर देते हैं, वाह! क्या उन्नति और प्रगति है शिक्षा और सामाजिकता की!

    पड़ोस में कोई समस्या है, या कोई चिल्ला रहा है, या रो रहा है, तो आप तुरंत पहुंचेंगे वहां, पर मदद के लिए नहीं, समस्या को जान कर उस पर गपशप करने के लिए।

    आपकी नैतिकता महान है, आपको दूसरों को पागल कहने में बड़ा आनंद आता है ।

    आपकी सोच को बारम्बार नमन, जो खुद में छुपी खामियां सुधारने के बजाये, दूसरों में कमी ढूंढती है।

    मुझ में इतनी क्षमता नहीं की मैं आप से मुक़ाबला कर सकूं, लेकिन मैं हर दिन अपने आप को बेहतर बनाने की कोशिश में हूँ, ताकि मैं कुछ अच्छा काम कर सकूं। मुझे आप जैसा सामान्य इंसान नहीं बनना है। मैं जैसा हूँ खुश हूँ।

    मुझे आपकी हमदर्दी भी नहीं चाहिए, मुझे सिर्फ एक बेहतर 'मैं' बनना है।

     

    धन्यवाद,

    आपका असामान्य मित्र।

     

     

  • 02 Aug
    Janhavi Dwivedi

    अवसाद चिकित्सा के विभिन्न उपाय

    depression

     

    (यह लेख सुप्रसिद्ध साइकेट्रिस्ट (मनोरोग-विशेषज्ञ) डॉक्टर सुशील सोमपुर के द्वारा लिखे लेख का हिंदी रूपांतरण है।) 

    जो व्यक्ति अवसाद की स्थिति से गुजर रहा होता है, उसके लिए ये कोई पाप की सजा या किसी पिछले जन्म के अपराध की सजा के जैसी लगती है, और जिन लोगों का उपचार किया गया और वे बेहतर हो गए उन्हें ये किसी दूसरी बीमारी की तरह लगती है, उन्हें डाक़्टर से परामर्श लेने और उन्हें मौका देने का फायदा मिलता है, और इसका लाभ उन्हें मिलता है।

    मनोवैज्ञानिक समस्या इतनी व्यक्तिगत होती हैं कि, इनकी पहचान करना सिवाय अनुभवी मनोचिकित्सक के मुश्किल होता है, और इसलिए उसके निदान के लिए किसी को आश्वस्त करना बहुत कठिन होता है।

    इसलिए जो भी उपाय वर्तमान में अवसाद की चिकित्सा के लिए अपनाये जाते हैं, वे पूरी तरह से कारगर होंगे ये कहना बहुत ही चुनौतीपूर्ण होगा।

    इससे पहले कि हम अवसाद ग्रस्त होने पर किये जाने वाले उपायों पर चर्चा करें, हम ये समझते हैं कि अवसाद होता क्या है ?

    अवसाद या डिप्रेशन एक मानसिक स्वास्थ्य विकार है, जिसमें आप हमेशा नकारात्मक विचारों को सोचते  है , मन उदास रहता है ,नींद कम आती है, भूख कम लगती है अथवा  ज्यादा लगती है और जीवन में एक सामान्य उदासीनता सी छाई रहती है । अब तक आप  जिन कार्यों को करने में खुशी महसूस करते थे, अब उन्ही कार्यों को करने में आपका मन नहीं लगता है, अकारण ही अपराधबोध महसूस करना, और मन  में आत्मघाती विचार आना।

       

    क्या इन सबके लिए कोई सहज उपाय हैं ?

    ...हाँ, अवसाद के बहुत से सहज इलाज हैं, जिनका मेडिकल की किताबों में वर्णन है।

     

    व्यायाम (exercise)- शारीरिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम के महत्व के विषय में हम सभी को जानकारी होती है, हालाँकि शायद ही हमने विचार किया हो कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी यह इतना ही जरूरी है।

    हल्के व्यायाम को दैनिक दिनचर्या में शामिल करना चाहिए और यदि अधिक श्रमसाध्य व्यायाम करते हैं तो नियमित अंतराल पर करना चाहिए जैसे सप्ताह में 2-3 दिन।

    व्यायाम का कोई निर्धारित मापदण्ड नही है, इसका मतलब ये आपकी इच्छा पर है कि जो भी आपको सुविधाजनक लगे उसी तरह  का व्यायाम करिये। प्रमुख बात है, आपको व्यायाम नियमित करना है।

    जिम जाने वाले व्यक्ति के लिए नियमित व्यायाम  में 40 मिनट की initial stretching और 20-20 मिनट की isometric और isotonic exercise शामिल होगी।

    इसमें weights and cardio training दोनों शामिल होंगे।

    व्यायाम के पीछे का साइंस ये है कि, व्यायाम करने से मस्तिष्क में एक हार्मोन का स्राव होता है, जिसे endorphins कहा जाता है।

    Endorphin हार्मोन एक प्रकार का नशीला अहसास कराता है, जो दर्द से राहत देता है, और आनंद का अहसास कराता है।

     

    भोजन- सामान्यतः भोजन स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, और अधिकतर लोग सोचते होंगे कि, भोजन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए होता है। हालाँकि जब शारीरिक स्वास्थ्य के लिए निर्धारित भोजन की मात्रा ली जाय, तो यह मानसिक स्वास्थय के लिए भी फायदेमंद होता है।

    ऐसे खाद्य पदार्थ जो कि कई तरह के विटामिन और खनिजों जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, अवसाद में मददगार होते हैं।

    ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर खाद्य पदार्थ लेने की सलाह अवसादग्रस्त लोगों को दी जाती है।  यह देखा गया है कि, अवसाद ग्रस्त लोगों के भोजन में कुछ विशेष प्रकार की फिश को शामिल करना अच्छा रहता है क्योंकि यह अवसाद के लक्षणों को कम करता है।

    एंटीऑक्सीडेंट युक्त खाद्य पदार्थ (जैसे,- विटामिन ई, विटामिन सी और बीटा कैरोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ) अवसाद और अन्य मानसिक समस्या में सहायक होते हैं।

    जटिल कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन भी अवसाद चिकित्सा में सहायक होता है।  मेडीटरेरियन भोजन संतुलित, स्वास्थ्यकर होते हैं, क्योंकि उनमें भरपूर मात्रा में  फल, मेवा, सब्जियां, अनाज, फलियां, और मछली शामिल होते हैं।

    कैल्शियम और विटामिन ‘डी’ भी मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, खासतौर पर उनके लिए जिन्हें सूर्य की कम रोशनी मिलती है, या  सांस्कृतिक या जलवायुविक कारणों से वे खुद को ढंक कर रखते हैं। 

    सीमित मात्रा में सेलेनियम (Selenium) से भरपूर पदार्थ जैसे, नट्स भी अवसाद की चिकित्सा में  सहायक होते हैं।

    लाइफ स्टाइल या जीवनचर्या में बदलाव करने से भी अवसाद में राहत मिलता है।

    यदि  नियमित रूप से शराब या अन्य कोई नशा लिया जाता है, तो यह भी अवसाद कारक हो सकता है। 

    यदि ऐसा है तो यह बहुत जरूरी है कि आप शराब या किसी अन्य नशे से खुद को दूर करें।

    कभी कभी इन नशीले पदार्थों को मनोचिकित्सक द्वारा दी गयी दवाओं के साथ लेने से अवसादरोधी दवाएं व्यर्थ चली जाती हैं। कुछ अन्य पदार्थ जैसे कैफीन को सोने जाने से पहले अधिक मात्रा में लेने से नींद अच्छी नही आती और परिणाम स्वरूप अवसाद और चिंता के लक्षण प्रकट होते हैं। 

    अतः इन स्थितियों में सोने से पहले कैफीन लेने की आदत खत्म करना और दिनभर में ली जाने वाली  कैफीन की कुल मात्रा में कमी करना सही रहता है।

     

    क्या दवाइयों द्वारा भी अवसाद का इलाज होता है ?

    हाँ, मनोचिकित्सक के उपचार प्रक्रिया में बहुत सी दवाइयां होती हैं जो अवसाद के लक्षणों को कम करने में मदद करती हैं।

    इनमे से बहुत सी दवाइयां बिना किसी अन्य उपचार के (सिर्फ दवाओं द्वारा ) अवसाद से निजात दिलाने में सहायक सिद्ध हुई हैं।

    इसलिए यदि कोई व्यक्ति अवसाद से ग्रस्त हो गया है तो बिना दवाओं के उपचार का तरीका अपनाने के स्थान पर वह दवाईयों द्वारा भी निश्चित रूप से ठीक हो सकता है।

    सभी दवाएं विशेषज्ञ चिकित्सक के देखरेख में ही लेनी चाहिए।

    किसी अन्य बीमारी की तरह अवसाद में भी दवाइयों के इस्तेमाल के साइड इफेक्ट्स  होते है, और ये साइड इफेक्ट्स हर किसी में अलग अलग होते हैं। 

    इसलिए एक अच्छा मनोचिकित्सक ही दवाओं के चुनाव में निर्णायक के रूप में होगा।

    इसलिये प्लीज़ अवसाद की स्थिति में पूरी वस्तुस्थिति समझने और दवाओं के निर्धारण के लिए एक मनोचिकित्सक से परामर्श लें।     

    मनोवैज्ञानिक समस्याओं और विशेष कर अवसाद के उपचार में दवाइयों के सफलता और प्रभाविकता को लेकर लोगों के मन में एक सामान्य प्रश्न उठता है।

    अन्य प्रश्न दवाओं के प्रति  'लत' की सम्भावना से जुड़ा हुआ है।

     

    अवसाद निवारक दवाओं के प्रति चिंता दूर करने के लिए स्पष्टीकरण - ये मनोदशा सुधारने वाली दवाओं से किसी प्रकार की 'लत' नही होती और इनकी प्रभाविकता सिद्ध हो चुकी है, इन दवाओं की सफलता के बहुत से प्रमाण हैं। 

    अवसाद के लिए हर व्यक्ति को अलग दवाओं की जरूरत होती है और बेहतर परिणाम के लिए समयानुसार डोज़ प्रभावी बनाने में इन दवाओं के अनुमापन  की आवश्यकता पड़ सकती है।

    उपचार का सबसे प्रमुख लक्ष्य होता है- रोग से मुक्ति, मतलब उपचार का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को अवसाद के सभी लक्षणों से पूरी तरह से छुटकारा दिलाना, और व्यक्ति को उसकी कार्य करने की क्षमता फिर से प्राप्त कराना होता है।

     

    काउंसलिंग या talk therepy क्या है ?

    हाँ, मनोचिकित्सा या दूसरे शब्दों में काउंसलिंग अवसाद चिकित्सा का एक रूप है।

    कई प्रकार की मनोचिकित्सा होती है उदाहरण के लिए,

    अंतर व्यक्तिगत थेरेपी (Inter-Personal Therapy )(IPT),

    संज्ञानात्मक थेरेपी (Cognitive Therapy) (CT),

    व्यवहार थेरेपी (Behavioral therapy) (BT),

    संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (Cognitive Behavioral Therapy) (CBT),

    अतींद्रिय मनोचिकित्सा (Psychodynamic psychotherapy), आदि।               

    अलग अलग प्रकार के मसलों के. लिए अलग प्रकार की थेरेपी की जाती है।               

    जिन्हें चिकित्सक की सहायता से व्यक्ति कर सकता है, तथा उसकी देखभाल करने वाले भी इस प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं ।

     

  • 01 Aug
    Oyindrila Basu

    एक प्रेरणादायक गूगल वीडियो

    google video

    जानिये कैसे एक गूगल वीडियो आपको नकारात्मकता से लड़ने में मदद करता है।
    नकारात्मक सोच और उनसे जुडी चिंताएं काफी प्रबल और काफी मुश्किल होती हैं । और अगर आप इन्हें खुद पर हावी होने देंगे, तो ये आप में से सकारात्मक सोच वाली ताक़त और ऊर्जा को निचोड़ लेंगे।


    अक्सर जब आप किसी कार्य में असफल होते हैं, तो दुबारा उस कार्य से जुड़े स्थान, लोगों से मिलना पसंद नहीं करते और साथ ही हम उस हताशा को जीवन भर खुद में पालते हैं। ये सही नहीं है। अपने अंदर की शक्ति से नकारात्मक सोच को सकारात्मक सोच में बदलना ही इंसान का काम है।


    इस वीडियो में देखिये कैसे एक पिता में छुपे नकारात्मक भाव को कैसे एक बेटा अच्छी आशावादी सोच में परिवर्तित करता है।


    हमने कई बार बताया है कि अपनी दुर्बलता को ही अपना ढाल बनाना पड़ता है, पर आसान तो नहीं होता। बुरे विचार मानसिक रूप से हमें तोड़ने की कोशिश करते हैं, और इसके साथ जुड़ा होता है एक शब्द, "अगर"

    यहाँ इन तीन बातों से आप अपने अंदर की नकारात्मक सोच को दूर कर सकते हैं-

     

    1. अपने अंदर छुपी नकारात्मक चिंताओं को पहचाने- अगर आप खुद से अकसर कहते हैं, "मैं सबसे नालायक व्यक्ति हूँ, मेरा इस जीवन में कुछ नहीं हो सकता", अगर आप सोचते हैं, " क्या होगा अगर कल मुझे स्कूल में दण्ड मिले?", "क्या होगा अगर कल मेरे पास पैसे ना हों?" "क्या होगा अगर मेरी नौकरी चली जाये?", और ऐसे कई "अगर" से संबंधित प्रश्न अगर आपके मन में आ रहे हैं, तो कुछ तो गड़बड़ है।


    अगर आप खुद ही खुद को बार-बार कोसते है, तो आप नकारात्मक सोच रखते हैं।


    अगर हर परिस्थिति के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हैं, तो आप दुश्चिंता कर रहे हैं।


    नकारात्मक सोच रखने वाले हमेशा ज़िन्दगी के बुरे वक़्त और बुरी चीज़ों को ही देखते हैं।
    ऐसे इंसान कभी भी जो है उससे संतुष्ट नहीं होते।

    2. नकारात्मक चिंताओं को उनके हाल पर छोड़ दें- बुरी चिंताएं आएँगी, जो भी आस पास हो रहा है, वह आपको परेशान भी करेंगी, लेकिन उन चिंताओं को बदलने के लिए ज्यादा मेहनत ना लगाएं, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें, वह आएंगे और चले जाएंगे, बस ये ध्यान रखें की उन चिंताओं को खुद पर हावी ना होने दें, उनमें खुद को व्यस्त ना करें।



    3. अब अपने नकारात्मक चिंताओं को सकारात्मकता से बदल दें- जीवन में जो भी घट रहा है, उसके अच्छे पक्ष पर ध्यान दें।


    अगर आपको जॉइंट एंट्रेंस में जगह नहीं मिली, और आप विज्ञान पर ग्रेजुएशन कर रहे हैं, तो इसमें क्या हानि है?


    खुद को भाग्यशाली माने कि आपको ज्यादा पढ़ने का, ज्यादा ज्ञान उपलब्ध करने का मौका मिल रहा है।


    उच्च शिक्षा से समाज में आपका नाम होगा, सम्मान होगा, जल्द नौकरी नहीं मिली तो क्या! अगर आपकी नौकरी चली गयी है, तो ये ज़रूर अच्छी बात नहीं, लेकिन हर परिस्थिति का एक दूसरा पहलू भी होता है।


    आपको आर्थिक समस्या हो रही है, इसलिए आप पैसे का मोल जान पा रहे हैं, खर्च सोच समझ कर, कर रहे हैं।


    इस वीडियो में भी आपने देखा की पिता बम्बई में फिल्मस्टार तो नहीं बन पाये, लेकिन उन्हें एक अच्छा परिवार मिला, एक समझदार बेटा मिला और उनकी नौकरी की वजह से सिनेमा से उनका सम्पर्क जुड़ा रहा, उनका हिंदी फिल्मों से जो प्रेम था, वह बरकरार रहा, क्योंकि उन्हें हर फिल्म को पहले ही देख लेने का सौभाग्य था, और जितनी बार चाहे वह देख सकते थें।


    सबसे ज़रूरी बात, आपके पास जो भी है, उसकेलिए शुक्रगुज़ार हों।


    खुद पर विश्वास रखें, कि जो आप चाहते हैं, वह आप कर पाएंगे।

  • 27 Jul
    Janhavi Dwivedi

    पुनर्विवाह और उसके कुछ तथ्य

    remarriage

    दूसरे विवाह की जटिलताओं के विषय में बहुत सी महिलाओं द्वारा काफी कुछ कहा जाता रहा है, और इस विषय पर बहुत कुछ कई किताबों में लिखा गया है।

    वे महिलाएं जो अपने पति की दूसरी पत्नी बनकर ससुराल आती हैं, उनमे अधिकांश का विवाह ऐसे व्यक्ति से होता है, जिसकी पहली प्रिय पत्नी की मृत्यु हो चुकी होती है, या कुछ का विवाह तब होता है जब उस व्यक्ति का अपनी पूर्व पत्नी से किसी कारण वश तलाक हो चुका होता है।

    विवाह दो लोगों को एक बंधन में बांधता है। हर लड़की के मन में अपने जीवन साथी को लेकर कुछ आशाएं होती हैं,जिन्हे वह अपने  भावी पति में देखना चाहती है।

    लेकिन यदि इस बंधन में लड़की को पति की पहली पत्नी की जगह पर लाया जाता है, तो ये स्थिति उसके लिए जटिलताएं पैदा कर सकती है।

     

    आइये देखते हैं पुनर्विवाह की जटिलताएं:-

    नई पत्नी पर दबाव

    नई पत्नी पर इस बात का बहुत बड़ा दबाव हो सकता है कि, वह ठीक उसी तरह से कार्य करें जैसा कि पहली प्यारी पत्नी करती थी। यह बात उच्च वर्गीय और पारम्परिक परिवारों और घरानों के लिए विशेष रूप से सत्य है।

    आमतौर पर ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पहली प्रिय पत्नी काफी लंबे समय से घर का एक हिस्सा रही थी, और हर कोई उसके काम के तरीकों का आदी हो चुका हुआ होता है।

     

    नई पत्नी को depersonalization 

    ये बात शायद किसी अन्य कोई बड़ी बात न लगे लेकिन नई बहू जो पहले से ही नए माहौल को लेकर परेशानी झेल रही होती है, उससे हर बात में पहले वाली चहेती बहू की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा करना उसके लिए एक बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है। उसके अंदर depersonalization की भावना विकसित हो सकती है, क्योंकि आगे चलकर वह भ्रमित हो सकती है कि वह कौन है, और उसे क्या होना चाहिए।  

     

    नई पत्नी के मन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव 

    नई पत्नी पर अपेक्षाओं और आलोचनाओं  का दबाव उसके मन में मनवैज्ञानिक दबाव डालता है, कि वह पहली पसंदीदा पत्नी की तरह नहीं है, जिससे वह ससुराल में सबसे बहिष्कृत और अकेलापन महसूस कर सकती है। इसके कारण अवसाद, चिंता के शारीरिक और मानसिक लक्षण सामने आ सकते हैं।

     

    उसका मन अपराध भावना से ग्रस्त हो सकता है 

    पहली पसंदीदा पत्नी की तरह वर्ताव करके वह परिवार के सदस्यों की प्रशंसा तो प्राप्त कर लेती है, लेकिन उस वक्त उसे यह लगता है कि वह स्वयं से झूठ बोल रही है, और दूसरों को बेवकूफ बना रही है, जिससे वह खुद को अपराधी समझने लगती है।

     

    उसका व्यवहार में अधिकार जमाने वाली घटनाएं हो सकती हैं

    भारत जैसे संयुक्त परिवार वाली संस्कृति में ये देखा गया है कि इस तरह की महिलाओं के स्वास्थ्य और हितों में कमी होने लगती और अधिकार जमाने की प्रवत्ति भी शुरू होने लगती है। क्योंकि वास्तव में इस दौरान ही इन दमित महिलाओं को खुद के होने का अहसास होता है, और कोई भी उन्हें परेशान  नहीं करता।

     

    पुनर्विवाह का मतलब है नए रिश्ते से उपचार 

    इस प्रकार के दबाव और अशांति से बचने के लिए वे व्यक्ति जो पुनर्विवाह के इच्छुक हैं, उन्हें पहले पहली पत्नी के चले जाने के दुःख को कम करने की कोशिश करनी चाहिए।  पुनर्विवाह जीवन में ख़ुशी लाने के लिए होना चाहिए, ना कि किसी दूसरे की मानसिक स्थिति खराब करने के लिए।

     

    उसके नजरिए से भी पुनर्विचार करें 

    उन्हें पुनर्विवाह के कारणों पर भी विचार करना चाहिए ; क्या वे वास्तव में जीवन साथी चाहतें है, या सिर्फ सामाजिक दायित्वों की पूर्ति करने के लिए ही विवाह करना चाहते हैं,यदि आप सिर्फ सामाजिक दायित्वों की पूर्ति करने के लिए ही विवाह करना चाहते हैं, तो आपको अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। आपका सही फैसला ना सिर्फ भावी पत्नी को बल्कि  पूरे परिवार को मानसिक अशांति से बचा सकता है।

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  • 27 Jul
    Janhavi Dwivedi

    जानिए क्या है फैमिली थेरेपी

    know all about family therapy 

     

    'फैमिली थेरेपी' का स्वरूप और तरीका पारम्परिक थेरेपी('एक व्यक्ति की थेरेपी') से बिलकुल अलग तरह का होता है।

    इस थेरेपी के भी बहुत से स्कूल हैं। हालाँकि ये थेरेपी परिवार के सभी या ज्यादातर सदस्यों के साथ होती है,फिर भी यह एक सदस्य के साथ भी की जा  सकती है।

    'फैमिली थेरेपी' को ‘पागलपन और अन्य मानसिक विकारों’ (जिसमे व्यक्ति खुद को इन लक्षणों का दोष देता है) के निदान के तौर पर शुरू किया गया।

    फॅमिली थेरेपी के रिसर्च में ये बताया गया है, कि ऐसे परिवार के बच्चे जहां पारिवारिक सदस्यों का आपसी व्यवहार त्रुटिपूर्ण होता है, बड़े होने पर उन बच्चों में ऐसे विकार होने की ज्यादा सम्भावना होती है।

    बेशक इन गम्भीर मनोविकारों को थेरेपी के माध्यम से सामान्य कर दिया जाता है, लेकिन इसमें गलत पारिवारिक संवाद की भूमिका बताई जाती है।

    फैमिली थेरेपी में जोर देकर कहा जाता है, कि  हालाँकि, पहचान तो सिर्फ 'एक रोगी' की होती है, लेकिन परेशानी पूरे फैमिली सिस्टम में होती है।

    हालाँकि, यदि 'मानसिक विकारग्रस्त व्यक्ति' को सच में बेहतर होना है,तो जरूरत  'फैमिली सिस्टम’ को बदलने की है। हो सकता है, परिवार में एक या ज्यादा लोग बुरे वर्ताव करने वाले हों,जिसके कारण परिवार में तनाव का माहौल बना रहता हो और जो मानसिक विकार होने का कारण हो सकता है।

    फैमिली थेरेपी में काउंसलर पूरे परिवार के सदस्यों से बात करता है,और उन्हें एक दूसरे से अच्छी तरह से बात करने के लिए प्रेरित करता है, और उनके बीच संवाद हीनता और समस्याओं की पहचान करता है।

    एक बार समझ लेने के बाद सेशन में इस स्वरूप को ठीक किया जाता है, धीरे धीरे ये बदलाव थेरेपी रूम के बाहर भी उसी तरह से अपनाए जाते हैं। उनके बीच सीमायें subsystem को दूसरे से अलग करने तक होती हैं।

    माता- पिता एक subsystem हैं, और बच्चे दूसरे subsystem, यदि माता-पिता बच्चे के जीवन में जरूरत से ज्यादा शामिल होते हैं,तो यह ‘enmeshed’ सीमा है। जबकि यदि उनकी भागीदारी बेतरतीब है तो इसे ‘diffused’ सीमा कहते हैं।

    एक बार इन विकारों के होने की वजह ये सीमाएं हैं, समझ जाने के बाद, धीरे -धीरे थेरेपी रूम में उन्हें समझा कर अभ्यास के द्वारा सही व्यवहार सिखाया जाता है, और बाद में इसे जीवन में भी अपनाया जाता है।

    जब पूरा परिवार थेरेपी के लिए आने में सक्षम नहीं होता है, तो बाकी के सदस्यों से परिवार के स्वरूप के बारे में प्रश्न किया जाता है, और उनसे अपनी प्रतिक्रिया में बदलाव लाने को कहा जाता है, जिससे बाकी के सदस्य प्रभावित होते हैं,और फलस्वरूप पूरे सिस्टम में सुधार आता है।

    फैमिली थेरेपी विशेषरुप से रिश्ते संबंधी समस्याओं (जैसे, तलाक या जब  परिवार में कोई स्पेशल बच्चा है) में प्रभावकारी है।

    जब बार -बार मनोचिकित्सा की दवाएं बेअसर होने लगती हैं, तो ये माना जाता है, की  पारिवारिक समस्याओं के कारण वह अपनी पुरानी आदतों को भुला नहीं पा रहा है,और उस स्थिति में भी फैमिली थेरेपी का उपयोग किया जाता है।

    फैमिली थेरेपी के काउंसलर को फैमिली सिस्टम को समझने और दोषपूर्ण स्वरूप के सफलतापूर्वक निरीक्षण के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता  होती है।

    एक व्यक्ति की काउंसलिंग की अपेक्षा फैमिली थेरेपी बहुत कठिन होती है, क्योंकि परिवार के झगड़े थेरेपी रूम में भी फूट पड़ते हैं, और इसलिए काउंसलर को इन स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा दक्ष होने की आवश्यकता होती है।