कुल 169 लेख

  • 11 Aug
    Oyindrila Basu

    ऑनलाइन काउन्सलिंग- व्यस्त महिलाओं के लिए

    online counseling

    ऑनलाइन काउंसलिंग से व्यस्त महिलाओं को काफी लाभ हो रहा है।

    आज के समाज में महिलाएं सक्रिय रूप से योगदान दे रहीं हैं उन  पर बहुत सारी  ज़िम्मेदारियाँ रहती हैं। वे शिक्षित, आत्मनिर्भर, महत्वकांशी, कर्मरत, सहानुभूतिशील, गृहिणी,माता, बहू और कार्यरत महिला हैं । 

    जिन्हें घर और बाहर दोनों को सम्हालना पड़ता है। इससे कई ज़्यादा विशेषण भी इनका वर्णन करने के लिए कम होंगे।

    एक साधारण मनुष्य जितना भार ले सकता है, उससे ज़्यादा ज़िमेदारियां एक महिला पर होती है, जब दाइत्व ज़्यादा हो, तो दबाव और मानसिक तनाव भी ज़्यादा होता है।

    हमने पहले ही अपने लेख  काम और निजी ज़िन्दगी में संतुलंत कैसे बनाएँ? में बताया है कि कैसे महिलाएं खुद को हर रूप में ढालती हैं, कैसे वे घर और बाहर की ज़िम्मेदारियों को समझकर हर कर्तव्य का पालन करती हैं।

    कर्मरत महिलाओं पर अधिक दबाव होता है, उनको दोहरी ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है।

    जो गृहिणी हैं, उनमें मानसिक रूप से निराशा और कई तरह की  परेशानियां दिखती है।

    विश्व भर में वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा पाया जाता है, की  महिलाएं  पुरुषों की तुलना में कहीं ज़्यादा मानसिक रोग से पीड़ित होती हैं। तनाव, निराशा इत्यादि महिलाओं में आम बात है। 

    पिछले ५ सालों में ४९% औरतों ने खुद को किसी न किसी मानसिक समस्या से पीड़ित बताया हैं, जब कि पुरुषों की संख्या केवल ३९% है ।

    सबसे दुखद  बात ये है कि,  महिलाओं की समस्या को सही वक़्त पर सहायता और चिकित्सा नहीं मिलती।

    उनके पास इतना वक़्त ही नहीं होता की वे डॉक्टर के साथ सम्पर्क करें और काउंसलिंग के लिए अस्पताल जाएँ।

    कुछ महिलाएं शहर से दूर रहने के कारण, इन सुविधाओं से भी वंचित रहती हैं।

    पर आजकल इस समस्या का एक बहुत ही अच्छा हल नज़र आ रहा है। ऑनलाइन काउंसलिंग क्लिनिक के बदौलत अब कोई भी स्वस्थ मानसिकता का अधिकारी हो सकता है।

    ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ क्लिनिक का प्रचलन पहले कैनेडा से शुरू हुआ, कई लोगों को इससे लाभ मिला।

    आज इन्टरनेट के युग में इतनी सुविधा हमें घर बैठे मिलती है कि, हमें कहीं जाने की ज़रूरत ही नहीं।

    ऑनलाइन थेरेपी से महिलाओं को घर बैठे काउंसलिंग और डॉक्टर से बातचीत का मौका मिलता है।

    वे छोटे शहर से भी हैं, तब भी विश्व के प्रसिद्ध मनोरोग विशेषज्ञों से वे मदद ले सकती हैं।

    उन्हें अलग से वक़्त निकालना नहीं पड़ता। काम के बीच आधे घण्टे का समय भी मिले दिन में तो काफी है।

    अकसर अपने रोज़ की समस्या के लिए महिलाएं डॉक्टर के पास जाना पसन्द नहीं करतीं, उन्हें सुझाव या सलाह चाहिए होता है, जिनसे वह समस्यों से जूझ पाएं ।

    आज कई ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ संस्थाओं पर बिना मूल्य सवाल करने की छूट है, जैसे eWellness Expert पर आप कोई भी मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधित सवाल पूछ सकते हैं, और विशेषज्ञ उनका जवाब देंगे।

    इन वेबसाइट पर कई ब्लॉग और कथन भी होते हैं, जिनसे आप प्रेरित हो सकते हैं।

    कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से कई महिलाओं में निराशा की चिकित्सा हुयी है, जिसका प्रचलन  ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ साइट ने किया है।

    जिस प्रकार पुरे विश्व में ये सिस्टम चल रहा है, ऐसा लगता है, की कुछ सालों में ये और महिलाओं को  मानसिक स्वास्थ्य पाने में मदद करेगी।

  • 11 Aug
    Oyindrila Basu

    प्रिसमा-भावनाओं को सुन्दर रूप देने का माध्यम

    prisma image

     

    प्रिसमा! प्रिसमा! प्रिसमा! चारों तरफ इन्टरनेट पर इसका शोर है। फेसबुकऔर ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्क साइट्स पर इसकी चर्चा ज़ोर शोर से चल रही है।

    इस ऐप के माध्यम से आप अपनी शक्ल को एक सुन्दर छवि का रूप दे सकते हैं।

    किसी चित्रकार से रची तस्वीर के सामान आपकी छवि भी सौंदर्य प्राप्त करेगी।

    पर ये सिर्फ एक तस्वीर नहीं, ये आपके जज़्बातों को भी एक सुन्दर रूप देता है।

    आप को ये आत्मा-संतुष्टि देता है, आप खुद पर खुश होते हैं, ये आपको अपने पसंदीदा कॉमिक करैक्टर की तरह दिखने का मौका भी देता है, और आपको मोनालिसा की खूबसूरती देता है।

    हम सभी चाहते हैं कि कोई हमें मॉडल बना कर हमारा चित्रांकन करे, रंगों से हमें भी सजाया जाय, कैमरे से खींची तस्वीर उसकी बराबरी नहीं कर पाती, और आज प्रिसमा ऐप द्वारा ये चमत्कार सम्भव है।

    यह ऐप हमारा आत्मा-विश्वास बढ़ाता है, हमें ख़ूबसूरत महसूस करवाता है, और मानसिक रूप से खुश रखता है। हम खुद पर गर्व महसूस करते हैं।

    आर्ट यानी कला के माध्यम से इंसानी दिमाग को बारीकी से बहलाया जा सकता है, कला से प्रशंसा की क्षमता बढ़ती है। हम और भी सम्वेदनशील बनते हैं।

    प्रिसमा ऐप में हम चित्रकार भी हैं और दर्शक भी; हम दोनों रूप से कला से जुड़े हुए हैं।

    हम खुद अपना चित्र बनाते हैं, उसमें विभिन्न फिल्टर्स द्वारा रंग भरते हैं, और दूसरों के चित्र को भी साइट पर देखते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं।

    ये चित्र वैन गोह के चित्र जैसे ही खूबसूरत हैं, और इस प्रकार हमें बताना ज़रूरी है, कि ये महान चित्रकार मानसिक रूप से पीड़ित थे, ये निराश और तनाव के शिकार थे जिसकी वजह से उनकी मौत भी हुयी, पर इसका असर उनके काम पर नहीं था।

    कला ने उन्हें जीवित रखा, उनकी कला, और उनके चित्र विश्व भर में आज भी मशहूर हैं।

    उन्होंने खुद के कई चित्र बनाये थे, जिनसे हमे पता चलता है, की खुद को कला का हिस्सा बनाना तब भी प्रचलित था। और आज भी सेल्फी खींच कर हम उसी  भावना की संतुष्टि करते हैं।

    प्रिसमा के बदौलत अब भी हम वैन गोह के चित्रकारिता की झलक अपने चित्रों में पातें है, और इस कारण हमें ख़ुशी होती है।

    इस ख़ुशी से हम तनाव मुक्त होते हैं, दिन में कुछ क्षण शान्ति से बिताते हैं, कला की प्रशंसा करने से हमारे मस्तिष्क के अन्य क्षमताओं में भी बेहतरी नज़र आती है।

     तकनीकी उन्नति के साथ जुड़े रहते हुए भी कला की चर्चा बहुत अच्छी कोशिश है। उम्मीद है, यह ऐप मानसिक रूप से हमें और समाज को स्वस्थ बना रहा है।

  • 11 Aug
    Janhavi Dwivedi

    क्या है सोशल स्नैकिंग?

    jab we met

     

    कैसे अपने आसपास के लोगों के साथ की गयी छोटी सहभागिता हमारी ख़ुशी में उत्प्रेरक का काम करती  है।

    अमित घर से दूर दूसरे शहर में नौकरी करता है, सप्ताहांत में वह अपने घर जाने के लिए ट्रेन में सफर करता है, ट्रेन में सफर करने के दौरान भी वह अपने आस पास के लोगों से पॉलिटिक्स, क्रिकेट या दूसरे अन्य विषयों पर चर्चा करता है, इससे न सिर्फ उसे दूसरों को जानने समझने का मौका मिलता है,   बल्कि उसका सफर भी उबाऊ या थकान भरा नही महसूस होता।

    सामान्यतया, सामाजिक मनोविज्ञान के शोधों से ये बात सामने आयी है कि, अपने जीवन में जितना ज्यादा हम दूसरे लोगों के साथ जुड़ते हैं, हम उतना खुश रहते हैं। 

    लेकिन क्या हम हमेशा ये बात मानते हैं?... क्या कभी ऐसा होता है कि हम दूसरे लोगों से सम्पर्क करना या बातें करना नहीं चाहते क्योंकि हमें लगता है कि, इससे हमें कोई ख़ुशी नही मिलेगी?...

    कल्पना  कीजिये आप काम पर जाने के लिए ट्रेन में सफर कर रहे हैं, और कोई अजनबी आपके बगल वाली सीट पर आकर बैठ जाये। क्या आप ये सोचेंगे कि मेरा सफर ज्यादा खुशनुमा और सुखद होगा यदि मैं अकेले काम करूँ, पढूं या कोई गेम खेलूँ या फिर आप उस अजनबी के साथ बातें करने का फैसला करते हैं?

    ज्यादातर लोग सोचेंगे कि उनका सफर ज्यादा आरामदायक होगा यदि वे सिर्फ अपने तक रहेंगे और अपना काम करेंगे। हमारी धारणा यही रहती है कि, दूसरों से बातें करने में सिर्फ समय की बर्बादी होंगी, और बाद में हमें पछतावा होगा कि हमने अपना कीमती समय एक अजनबी के साथ फालतू की बातें करने में व्यर्थ कर दिया।

    वास्तव में, जब शोधकर्ताओं ने एक बड़े रेलवे स्टेशन पर जनमत संग्रह किया तो यही बातें सामने आयीं : सफर करने वाले सोचते थे कि अजनबियों से बातें करने की अपेक्षा, अपने तक रहने से सफर ज्यादा खुशनुमा रहता है।

    तो क्या हम सही हैं? क्या इन परिस्थितियों में अकेले एकांत में हम वास्तव में खुश रहते हैं? बिल्कुल नही !

    उन्ही शोधकर्ताओं ने एक रोचक प्रयोग की रुपरेखा तैयार की। वे रेलवे स्टेशन गए और उन्होंने सुबह दैनिक यात्रियों से कहा कि क्या वे एक सामान्य से शोध का हिस्सा बनना चाहेंगे।  उन्होंने उन यात्रियों से तीन में से एक तरीके से सफर करने को कहा। कुछ लोगों से कहा गया कि वे ट्रेन में अजनबी लोगों के साथ मेल जोल करें। कुछ लोगों से कहा गया कि, वे ट्रेन में एकांत में बैठे रहें। और बाकि लोगों से कहा गया कि वे हमेशा की तरह यात्रा करें। 

    सभी को एक लिफाफा दिया गया था जिसमे एक छोटा सा सर्वे था जिसे उन्हें अपने गन्तव्य पर पहुंच कर पूरा करना था। उस सर्वे में यात्रियों के अनुभव और उनकी यात्रा कैसी रही के विषय में प्रश्न पूछे गए थे। यात्रियों ने इसे पूरा करके वापस शोधकर्ताओं के पास भेज दिया।

    क्या अजनबियों के साथ मेलजोल का कुछ असर होता है ? चलिए इस ग्रुप के लोगों को क्या करने को कहा गया था इस पर नजर डालते हैं।

    उन्हें विशेष निर्देश था कि :

    आज ट्रेन पर एक नए व्यक्ति के साथ  बातें करें।

    उनके साथ सम्पर्क बनाने की कोशिश करें।

    उनके विषय में कुछ रोचक जानकारी पता करें और अपने बारे में भी उन्हें कुछ बताएं।

    जितना ज्यादा बातें हों उतना अच्छा।

    आज सुबह आपका  उद्देश्य अपने आसपास के लोगों के विषय में जानकारी लेने की कोशिश करना है।

    उनकी प्रतिक्रियाएं उम्मीद के विपरीत थी। अपने तक सीमित रहने वाले यात्रियों की तुलना में जब यात्रियों से किसी अजनबी सहयात्री के साथ सम्पर्क करने को कहा गया तब उनके अनुभव काफी सुखद रहे।

    इतना ही नही उन्हें ऐसा लगा जैसे उनका ये सबसे सुखद सफर रहा। कुल मिलाकर उन्हें बेहतर महसूस हुआ और सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने ये बिलकुल भी महसूस नही किया की उनका समय व्यर्थ जा रहा है।     

      

    "ख़ुशी" और "social snacking "

    इस लेख में ये सन्देश है, कि "सोशल स्नैक्स" (जिसे कुछ लोग कहते हैं ) उन पलों में सामाजिक सम्बन्ध बनाता है, जिसमे आप आगे शायद न हों। संसार में दूसरे लोगों को जानना, चाहे यह लम्बी चलने वाली दोस्ती में न बदले। अपने आस पास के लोगों से जुड़ने के मौके खोजकर आप ज्यादा खुशहाल,ज्यादा सकारात्मक जीवन जी सकते हैं।

    Image source

  • 10 Aug
    Oyindrila Basu

    मेन्टल हेल्थकेअर बिल 2013

    parliament

     

    भारत अब धीरे धीरे स्वच्छ बन रहा है। कलंक और गलत भावनाओं से मुक्त होने के लिए भारत सरकार ने अहम कदम उठाया है, मेन्टल हेल्थ केयर बिल 2013 को राज्य सभा ने सोमवार को  पास किया है, और उसे जल्द ही लोक सभा में भी पढा जाएगा।

    पिछले दिन quora में किसी ने मुझसे पूछा, कि वह  एसपर्जर सिंड्रोम (Asperger’s Syndrome) से जूझते व्यक्ति को पसन्द नहीं करता, तो ये सही है या नहीं; मैंने उसे समझाया की वे खुद अपने मानसिकता को गलत तरफ ले जा रही हैं  और उसे हम अपने देश को भविष्य में कैसा देखना चाहते हैं? पढ़ने के लिए दिया; उस पर एक और व्यक्ति ने मज़ाकिया  रूप  से  कमेंट किया, कि "भारत को स्वच्छ होने में अभी पीढ़ियों लग जाएंगे।"

    मुझे बेहद बुरा लगा, लेकिन आज मैं गर्व के साथ कह सकती हूँ, की नहीं, भारत को पीढ़ियों नहीं लगेंगे खुद को कलंक मुक्त करने के लिए।

    मानसिक रोग से जूझते लोगों को भारत सरकार से काफी मदद और भरोसा मिल रहा है, ताकि वे अपने अधिकार और चिकित्सा का सही लाभ उठा सकें।

    2013 का ये बिल 1987 के बिल के परिवर्तन में लाया गया है, जिनमें कुछ अहम बदलाव किये गए हैं।

    आज तक, निराश, तनाव और परेशानी से जूझते व्यक्ति चिकित्सा के लिए कतराते थे, क्योंकि, या तो उनके निकट स्थान पर कोई सही  मानसिक चिकित्सालय नहीं था, या फिर इस डर से की लोग उन्हें 'पागल' समझेंगे। मेन्टल हेल्थ केयर बिल 2013 ये बात स्पष्ट करती है, कि हर व्यक्ति को अपने साथ होनेवाले बर्ताव का समर्थन और विरोध करने का पूरा हक़ है। इस बिल के साथ ये भी स्थिर हुआ है, की हर अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र में मानसिक स्वास्थ्य के लिए अलग विभाग रखा जाएगा, ताकि हर व्यक्ति को मानसिक इलाज की सुविधा मिले। और हर तरह के इलाज का वे लाभ उठा सके।

    जब किसी भी व्यवहार को कानूनन गलत बताया जाएगा, तभी समाज में मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों के प्रति कलंक में सुधार आएगा। जैसे दहेज़ और गृह निर्यातन के वक़्त हुआ था।

    सबसे अहम दो बदलाव जो इस बिल में लाये गए हैं,  वह आत्मघात और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बीमा योजना से सम्बन्धित है।

    आत्मघाती को मानसिक रूप से विचलित माना जाएगा, और इस बिल के हिसाब से, उन्हें कोई सज़ा नहीं होगी। हर किसी को शॉक ट्रीटमेंट देना भी कानूनन अवैध होगा।

    दूसरी ओर, ये बिल ये भी सिद्ध करता है, की मानसिक चिकित्सा अब से स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत सम्हाली जायेगी।

    हर मानसिक स्वास्थ्य केंद्र को सरकारी रजिस्ट्रेशन करवाना ज़रूरी होगा।  तो अब ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ संस्थाओं को भी असुविधा नहीं होगी, उनका भी रजिस्ट्रेशन शायद हो सकता है ऐसा माना जा रहा है।

    पर इस बिल के लागू होने पर कुछ बाधाएं भी है। मानसिक रूप से अस्वस्थ्य व्यक्ति की देखभाल कौन करेगा, इस पर बिल में कोई उल्लेख नहीं है।

    यहाँ तक की, स्वास्थ्य केंद्र में जो चिकित्सा दी जायेगी, उसका वित्त पोषण कहाँ से होगा उसके बारे में भी कोई खुलासा नहीं किया गया है।

    पर आशा करते हैं, की इस विषय पर लोक सभा और राज्य सभा में सोच-विचार ज़रूर होगा।

    पर इस संविधानिक बदलाव के कारण, समाज में कलंक निवारण ज़रूर होगा, और मानसिक स्वास्थ्य से सम्बंधित जागरूकता भी बढ़ेगी जो बेहद उत्तम बात है।

  • 10 Aug
    Oyindrila Basu

    भावनाओं को समझने की कला

    girl helping other girl


    दूसरों को समझने के लिए उनके जज़्बातों को नाम देना ज़रूरी है।


    "मैं तंग आ चुकी हूँ... अब और नहीं, मैंने सोच लिए है, की मैं उससे जल्द ही ब्रेक अप कर लूंगी", ऐसी बातें हमको रोज़ सुनने को मिलती हैं। हमारे दोस्त हमसे अपने दिल की बात करते हैं। ऐसी स्थिति में, हम कैसा जवाब देते हैं? ज़्यादा तर समय हम कहते हैं "तुझे पहले सोचना चाहिए था", या "सही है, छोड़ दे उसे" या फिर "तू देख क्या करेगी" पर हम ये समझने में असफल हो जाते हैं, की हमारे दोस्त हमसे सिर्फ सम्वेदनशीलता की आशा रखते हैं। अगर हम उन्हें समझ पाएं यही उनके लिए काफी है।
    तो हमें ऐसी स्थिति में कहना चाहिए, "मैं समझती हूँ, तू बहुत निराश हुयी है, चिंतित भी है", इससे आप उनके जज़्बातों को नाम दे कर उनका वर्णन कर रहे हैं, और तब आपके दोस्त को सच में लगेगा कि आप उन्हें समझते हैं और वे अकेले नहीं हैं।
    हम हमेशा यही अपेक्षा करते हैं, कि हमें समझा जाए, सब हमारे साथ सोच विचार से पेश आये, लेकिन पहला कदम हमें ही उठाना होगा; हमारे बर्ताव से प्रेरित होकर ही दूसरे हमें समझेंगे।
    लोगों को समझना आसान नहीं, पर उतना मुश्किल भी नहीं-

    1. वाक्य सब कुछ नहीं होता।
    अकसर जो हम कहते हैं, वह हमारा मतलब नहीं होता। शब्द सिर्फ एक माध्यम है, पर जज़्बातों के लिए वाक्य हमेशा सही नहीं होते।

    जैसे अगर मैं रात के ११ बजे घर लौटती हूँ, तो मेरी माँ गुस्से से लाल, बेलन के साथ आती हैं और कहती हैं, "मैं तुम्हें मार डालूँगी", पर क्या इसका मतलब ये है की वह मुझे सच में मारना चाहती है? नहीं न? वह असन्तुष्ट है की मैंने घर का नियम तोड़ा, वह मेरे लिए बहुत परेशान थी, चिंता में थी, और निराश थी, की मैंने उनको महत्व नहीं दिया, और ये सारे जज़्बात, गुस्से में व्यक्त हुए ।

    स्वाभाविक रूप से वाक्य हम सोच समझकर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वह अकसर हमारे असल सोच को ज़ाहिर नहीं कर पाते।

    2. अपने जज़्बातों को पीछे रख कर सिर्फ अपने दोस्त की बात सुनें।
    हम हमेशा झट से नतीजे पर पहुँच जाते हैं। और ये धारणा हमारे अपने अनुभव और जज़्बात से पनपते हैं। किसी भी परिस्थिति में एक मत पैदा कर लेना सही नहीं है।

    मान लें की आपके दोस्त आपसे अपने पारिवारिक झगड़े के बारे में बात कर रहे हैं, अगर आपका हाल ही में विच्छेद हुआ हो तो आपको लगेगा की समस्या ज़रूर बहुत गहरी है, और आप कहेंगे, "ये तो होना ही था, मर्द आज नहीं कल, धोखा देंगे ही", अब ये सही नहीं है। इसका असर बुरा हो सकता है।

    आपका दोस्त जो इस वक़्त अपने पति से नाराज़ है, वह आपसे प्रभावित होकर अपनी शादी-शुदा ज़िंदगी को नष्ट कर सकता है, या फिर उनको ऐसा भी लग सकता है, की आप सिर्फ अपनी कथा सुना रहे हैं, और उनकी कोई परवाह नहीं आपको। इसीलिए जब दूसरे की सुन रहे हैं, तो खुद को और अपनी समस्याओं को पीछे रखें।

    3. उनके जज़्बातों का विश्लेषण करे:-
    दूसरों के जज़्बातों को समझने के लिए उनकी हरकतों पर ध्यान दें। वह आपसे कहेंगे, "मैं ठीक हूँ", पर आप उनकी आवाज़, आँखें, हाथ पैर की स्थिति, हँसी, आंसू इत्यादि पर ध्यान दें, तभी आप उनके सही हाल को समझ पाएंगे।

    उनकी ओर अपना हाथ बढाएं, उनके हाथ को थाम लें, या फिर उनके पीठ को थपथपाएं, और कहें "मैं समझती हूँ", इस प्रकार आप भी उनके जज़्बातों से जुड़ जाएंगे, और उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होगा।

     

    4. हम सभी अकेले हैं-

    हम सभी चाहते हैं की कोई हमारी बात सुने और उन्हें समझें। हम सामाजिक जीव हैं, और अपनी बात जब तक किसी से कह नहीं लेतें, चैन नहीं।

     

    5. हम सब को भूलने की आदत है-

    हम सभी चाहते हैं, की हमारे बारे में, दोस्त, रिश्तेदार, साथी, और परिवार, छोटी से छोटी बात भी याद रखें।

    जन्म दिन, सालगिरह, प्रिय रंग, खाना सब कुछ, पर क्या हम सब के बारे में सब कुछ याद रख पाते हैं? नहीं, हम नाम, फ़ोन नंबर अकसर भूल जाते हैं।

    ऐसे गलत अपेक्षा अपने प्रियजनों से ना रखें। अगर कोई आपका जन्म दिन भूल गया है, तो उसने जान बूझकर ऐसा नहीं किया, ये साधारण इंसान ही करते हैं।

    इस बात को भी समझें, पर इसके लिए भी 'मैं' को पीछे रखना पड़ेगा।

    6. दूसरों के जज़्बातों को नाम दें और उन्हें समझें-
    जज़्बातों को नाम देकर वर्णन करने से आप आसानी से जता पाएंगे की आप अपने दोस्त को समझते हैं और उनकी परवाह करते हैं।

    अगर वह आपसे यूनिवर्सिटी में दाखिल ना होने के बारे में बता रहे हैं, तो बजाये ये कहने के की "चिंता मत करो, कहीं और कॉलेज में मिल जाएगा", (यह तो उसे भी पता है) आपको कहना चाहिए "मुझे पता है, तुम निराश हुयी, पर तुम आत्मविश्वासी हो, और तुम्हारा आत्मविश्वास तुम्हें सफलता ज़रूर दिलाएगा", यहाँ आपने "निराशा" और "आत्मविश्वास" दोनों जज़्बातों का वर्णन किया, और इससे, आपके दोस्त को बहुत हौसला मिलेगा, क्योंकि उसे पता होगा की आप उन्हें समझते हैं, और उन पर भरोसा करते हैं।