कुल 169 लेख

  • 18 Aug
    Oyindrila Basu

    जानिये क्यों सामान्य व्यक्ति को भी मनोचिकित्सा चाहिए

    counselling

     

    मानसिक चिकित्सा, काउंसलिंग, थेरेपी इत्यादि के मतलब समय के साथ साथ बदलते नज़र आ रहे हैं। आज हर क्षेत्र में, मानसिक स्वास्थ्य का महत्व अधिक हो गया है। कर्म, शिक्षा और अन्य जगह पर, मनोचिकित्सक को विशेष रूप से नियुक्त  किया जाता है, ताकि सभी व्यक्ति, छात्र स्वस्थ रूप से काम कर पाएं,  और समृद्धि बढ़े।

    हर महीने, एक साधारण काउंसलिंग सेशन या थेरेपी क्लास, सभी के लिए ज़रूरी है, इससे आपके मस्तिष्क को सांस लेने की फुरसत मिलती है, रोज़ मर्रा के जीवन से दूर, आप चैन और राहत से खुद का विकास कर सकते हैं। और एक अनुभवी और जानकार दोस्त से मन की हर बात बताने से बोझ भी कम होता है, आप खुश रह पाते हैं। तो सिर्फ तनाव, निराश या परेशानी के वक़्त ही थेरेपिस्ट के पास जाना आवश्यक नहीं।

    आज भी एक बड़े संख्यक लोगों को लगता है, की अगर आपका रिश्ता टूट गया है, या फिर आपने किसी को खो दिया है, या फिर आपकी नौकरी चली गयी है, तो आपको काउंसलिंग की ज़रुरत है।

    पर असल बात तो ये है, की थेरेपी वह माध्यम है जिससे आप खुद को बेहतर पहचान पाते हैं, हर गम्भीर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं।

    समस्या से पहले बचाव करना बेहतर है, ऐसा हमने हमेशा सुना है।

     

    काउंसलिंग और थेरेपी के अपने लाभ हैं-

    1. इससे आपको एक ऐसा साथी मिलता है, जो आपकी हर बात निस्वार्थ रूप से सुनता है; जिससे आप दिल की हर बात ज़ाहिर कर सकते हैं। वे एक आईने की तरह आपको अपने प्रतिबिम्ब से मिलाता है।

     

    1. एक पेशेवर थेरेपिस्ट आपको पूरा ध्यान और लगन देगा, ताकि आप खुद को पूर्ण रूप से ज़ाहिर कर सकें। यही उसका काम है; वह अपने मत या फैसले को आप पर नहीं थोपेगा; और ये अकसर नहीं होता जब हम दोस्त या घरवालों से बात करने जाते हैं।

     

    1. थेरेपी से आपका आत्मविश्वास बढ़ता है, और खुद को समझने की क्षमता भी आती है।

     

    1. किसी भी समस्या या विषय पर बात करने से अंदरूनी सच्चाई बाहर आती है, और आप क्यों नाखुश हैं ये पता चलता है, और ये अच्छा ही है, अगर आपको सच मालूम होगा, तो आप उस परिस्थिति में सुधार ला पाएंगे, ताकि आप भी खुश रहे और दूसरों को भी खुश रख पाएं।

     

    1. थेरेपी से आप और सामाजिक बनते हैं, आपमें बात करने के कौशल अच्छा होता है।

     

    1. ये आपको मन से मज़बूत बनाता है; जब आपको खुद की अच्छाई और बुराइयां पता होती है, तो आप मुश्किल परिस्थितियों में भी खुद को तैयार रख पाते हैं।

     

    1. तनाव, निराश, और परेशानी के लक्षण आपको पहले से पता होते हैं, इसलिए वक़्त आने पर आप उनसे लड़ पाते हैं।

     

    आज भी कई जगह पर साइकोथेरेपी महँगी है, पर अब नहीं; आज ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ क्लिनिक काफी अच्छा काम कर रहे हैं; जैसे eWellness Expert, जो किफायती भी है, और आप किसी भी जगह से इसके माध्यम से थेरेपी करवा सकते हैं। इसकी वजह से छोटे शहरों के लोगों को भी काफी फायदा हुआ है। और दूसरे देशों के लोग भी कम खर्च में मानसिक स्वास्थ्य का लाभ लेने लगें हैं। आप किसी भी समय थेरेपी शुरू कर सकते हैं, और जब आपको लगे की आपका लक्ष्य हासिल हो चुका है, तब आपकी  थेरेपी खत्म होती है।

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  • 18 Aug
    Oyindrila Basu

    क्या सेक्स के प्रति लोगों का जोश घट रहा है ?

    couple on smartphone

     

    हैरानी की बात है, ऐसे युग में, जहां सेक्स के बारे में हर जगह से हमें पूरी जानकारी मिल रही है, ताकि इस विषय पर कोई भी अज्ञात ना रहे, हमारे रोज़ के जीवन में इस स्वाभाविक प्राकृतिक हरकत  का घटाव नज़र आ रहा है।


    सांख्यिकीय रूप से जांच करने पर पता चलता है, की 16-44 वर्षीय लोगों में, महिलाएं महीने में ४.५ बार सेक्स में भाग लेते हैं, और  पुरुष 4.9 बार, जब की आज से 10 साल पहले की समीक्षा में ऐसा नहीं था, तब संख्या 6.1 और 6.4  था।


    स्वस्थ सेक्स हमें कई प्रकार से लाभ देता  है।

    • ये हमें खुद के बारे में अच्छी धारणा देता है, ये हमें संतुष्टि देता है ।

     

    • ये अपना प्रेम भाव अपने साथी को जताने के लिए एक अच्छा उपाय है । 

     

    • ये हमको शारीरिक रूप से भी स्वस्थ रखता है।

     

    • विशेषज्ञ बताते हैं, की आम तौर पर शादी शुदा मर्द और औरतों में सर्दी, खासी, अस्थमा, और अन्य इन्फेक्शन स्वस्थ सेक्स जीवन की वजह से कम होते हैं ।

     

    • ये प्रसव की ओर एक अहम माध्यम है, एक नए जीवन का जन्म इससे होता है।

     

    • सेक्स हमें मानसिक रूप से भी बहुत स्वस्थ और खुशहाल रखता है।

     

    पर हमारी आज की पीढ़ी  को आखिर हुआ क्या है?

    खुले विचार रखने वाले और अपने सम्पर्क के प्रति रूढ़िवादी ना रहनेवाली  युवा पीढ़ी, सेक्स के प्राकृतिक विधि को सम्मान नहीं दे रही ।

    पहले सिनेमा में, नायक-नायिका के बीच शारीरिक मिलाप दिखाने के लिए दो फूलों को मिलाया जाता था, पर आज ऐसा नहीं है, शारीरिक प्रक्रिया का ज्ञान सभी को होना चाहिए, यौन विषय पर शिक्षा भी ज़रूरी है, और इसीलिए आज कल फिल्में, डाक्यूमेंट्री, और अन्य कार्यक्रम इस क्षेत्र में काफी प्रचार कर रहे हैं।

    स्वस्थ सेक्स को सामाजिक स्वीकृति मिल रही है, पर यौन कार्य का महत्व घट रहा है।  इसकी क्या वजह हो सकती है?

    समीक्षा के दौरान ये भी देखा गया है कि, आज की पीढ़ी, जो शादी-शुदा है, या जो अपने साथी के साथ रहते हैं, ज़्यादातर लोगों में, सेक्स के प्रति एक अद्भुत चिंता और भय दिखता है।

    सही तरीका बहुत अहम होता नज़र आ रहा है। आज इंसान कुछ भी करने से पहले बहुत सोचता है। और जिस विषय पर आप बहुत ज़्यादा जानकारी लगाएंगे, कुछ ही दिनों में आप का उस पर से आकर्षण चला जाना स्वाभाविक ही है, क्योंकि फिर आपके सामने, उसकी अच्छाई के साथ साथ उसके नग्न रूप भी होंगे।

    जैसे एक गयनोकॉलोजिस्ट को सेक्स के प्रति कोई अलग आकर्षण नहीं होता, क्योंकि हर रोज़ वे महिला शरीर को बहुत नज़दीक से जांच करते  है, एक डॉक्टर को उसकी बारीकियाँ मालूम है, वह उसके काम का हिस्सा है । उस डॉक्टर के लिए सेक्स एक काम से जुड़े चीज़ का हिस्सा है, तो मानसिक रूप से उसे कोई स्फूर्ति नहीं होती। जिनकी पत्नियां भी गयनोकॉलोजिस्ट होते हैं, उन्हें ये बात बेहतर समझ आती है।

    उसी प्रकार, जब आज हम इस शारीरिक प्रथा के बारे में ज़्यादा पढाई और जांच करते है, तो गहराई से शरीर और शारीरिक प्रथाओं को जानने के बाद, उसे खुद करने से पहले हम बहुत सोचते हैं, कौन सा तरीका सही होगा उस पर ज़रूरत से ज़्यादा गौर करते हैं। तब इच्छा और आनंद ही चला जाता है।

    दूसरा कारण ये भी है, की हम आज के जीवन में बहुत व्यस्त हो चुके हैं। हमारे परिवार के लिए हमारे पास वक़्त नहीं। हमारे साथी, के लिए भी समय नहीं। हम काम से लौटते हैं, टी वी चला कर बैठ जाते हैं, या फिर इन्टरनेट पर पता नहीं क्या देखते रहते हैं; जो चीज़ें, हम सोचते हैं, हमें सामाजिक बना रही है, असल में वह चीज़ें हमें अपनों से दूर ले जाती हैं। और जब सब ज़रूरी काम खत्म हो गए, तब जा कर, अपने साथी पर प्रेम जताने का ख़याल आ सकता है, या फिर वह उतना ज़रूरी नहीं लगता, दिन भर की अहम ज़िम्मेदारियों के बाद, थक कर सो जाते हैं।

    हम रोबोट बनते जा रहे हैं, हम इन्टरनेट पर सेक्स के वीडियोस, लेख और कथन पढ़ेंगे, पर उसे खुद अनुभव करने का वक़्त नहीं है। दिन भर व्हाट्स-ऐप और इंस्टाग्राम पर जमे रहेंगे, पर परिवार से बातचीत का वक़्त नहीं है।

     

    आप को अपने व्यक्तिगत जीवन पर ध्यान देना होगा।

    • हर रोज़ ५ मिनट बिना कुछ किये, चुप-चाप एक जगह पर बैठ कर बिताएं।

     

    • काम से वापस आ कर अपने साथी के साथ चाय बनाये, टी वी बाद में आता है।

     

    • ऐसा प्रण लें की दिन में आधे घण्टे से ज़्यादा, इन्टरनेट पर बेकार सर्फिंग नहीं करेंगे ।

     

    • सेक्स से जुडे अजीब अजीब विडियो ना देखें।

     

    • सेक्स पर हर किताब, या हर लेखन पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं।

     

    • जितना वक़्त आप जीवन साथी के साथ बिताएंगे, उतना ही आप उसके प्रति आकर्षित होंगे।

     

    • संचार मुक्त हो कर अपने जीवन साथी के साथ छुट्टियों पर जाएँ।

     

    सेक्स एक स्वाभाविक प्राकृतिक प्रथा है, ये हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखता है। ये स्वाभाविक रूप से हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है।

  • 11 Aug
    Oyindrila Basu

    ऑनलाइन काउन्सलिंग- व्यस्त महिलाओं के लिए

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    ऑनलाइन काउंसलिंग से व्यस्त महिलाओं को काफी लाभ हो रहा है।

    आज के समाज में महिलाएं सक्रिय रूप से योगदान दे रहीं हैं उन  पर बहुत सारी  ज़िम्मेदारियाँ रहती हैं। वे शिक्षित, आत्मनिर्भर, महत्वकांशी, कर्मरत, सहानुभूतिशील, गृहिणी,माता, बहू और कार्यरत महिला हैं । 

    जिन्हें घर और बाहर दोनों को सम्हालना पड़ता है। इससे कई ज़्यादा विशेषण भी इनका वर्णन करने के लिए कम होंगे।

    एक साधारण मनुष्य जितना भार ले सकता है, उससे ज़्यादा ज़िमेदारियां एक महिला पर होती है, जब दाइत्व ज़्यादा हो, तो दबाव और मानसिक तनाव भी ज़्यादा होता है।

    हमने पहले ही अपने लेख  काम और निजी ज़िन्दगी में संतुलंत कैसे बनाएँ? में बताया है कि कैसे महिलाएं खुद को हर रूप में ढालती हैं, कैसे वे घर और बाहर की ज़िम्मेदारियों को समझकर हर कर्तव्य का पालन करती हैं।

    कर्मरत महिलाओं पर अधिक दबाव होता है, उनको दोहरी ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है।

    जो गृहिणी हैं, उनमें मानसिक रूप से निराशा और कई तरह की  परेशानियां दिखती है।

    विश्व भर में वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा पाया जाता है, की  महिलाएं  पुरुषों की तुलना में कहीं ज़्यादा मानसिक रोग से पीड़ित होती हैं। तनाव, निराशा इत्यादि महिलाओं में आम बात है। 

    पिछले ५ सालों में ४९% औरतों ने खुद को किसी न किसी मानसिक समस्या से पीड़ित बताया हैं, जब कि पुरुषों की संख्या केवल ३९% है ।

    सबसे दुखद  बात ये है कि,  महिलाओं की समस्या को सही वक़्त पर सहायता और चिकित्सा नहीं मिलती।

    उनके पास इतना वक़्त ही नहीं होता की वे डॉक्टर के साथ सम्पर्क करें और काउंसलिंग के लिए अस्पताल जाएँ।

    कुछ महिलाएं शहर से दूर रहने के कारण, इन सुविधाओं से भी वंचित रहती हैं।

    पर आजकल इस समस्या का एक बहुत ही अच्छा हल नज़र आ रहा है। ऑनलाइन काउंसलिंग क्लिनिक के बदौलत अब कोई भी स्वस्थ मानसिकता का अधिकारी हो सकता है।

    ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ क्लिनिक का प्रचलन पहले कैनेडा से शुरू हुआ, कई लोगों को इससे लाभ मिला।

    आज इन्टरनेट के युग में इतनी सुविधा हमें घर बैठे मिलती है कि, हमें कहीं जाने की ज़रूरत ही नहीं।

    ऑनलाइन थेरेपी से महिलाओं को घर बैठे काउंसलिंग और डॉक्टर से बातचीत का मौका मिलता है।

    वे छोटे शहर से भी हैं, तब भी विश्व के प्रसिद्ध मनोरोग विशेषज्ञों से वे मदद ले सकती हैं।

    उन्हें अलग से वक़्त निकालना नहीं पड़ता। काम के बीच आधे घण्टे का समय भी मिले दिन में तो काफी है।

    अकसर अपने रोज़ की समस्या के लिए महिलाएं डॉक्टर के पास जाना पसन्द नहीं करतीं, उन्हें सुझाव या सलाह चाहिए होता है, जिनसे वह समस्यों से जूझ पाएं ।

    आज कई ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ संस्थाओं पर बिना मूल्य सवाल करने की छूट है, जैसे eWellness Expert पर आप कोई भी मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधित सवाल पूछ सकते हैं, और विशेषज्ञ उनका जवाब देंगे।

    इन वेबसाइट पर कई ब्लॉग और कथन भी होते हैं, जिनसे आप प्रेरित हो सकते हैं।

    कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से कई महिलाओं में निराशा की चिकित्सा हुयी है, जिसका प्रचलन  ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ साइट ने किया है।

    जिस प्रकार पुरे विश्व में ये सिस्टम चल रहा है, ऐसा लगता है, की कुछ सालों में ये और महिलाओं को  मानसिक स्वास्थ्य पाने में मदद करेगी।

  • 11 Aug
    Oyindrila Basu

    प्रिसमा-भावनाओं को सुन्दर रूप देने का माध्यम

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    प्रिसमा! प्रिसमा! प्रिसमा! चारों तरफ इन्टरनेट पर इसका शोर है। फेसबुकऔर ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्क साइट्स पर इसकी चर्चा ज़ोर शोर से चल रही है।

    इस ऐप के माध्यम से आप अपनी शक्ल को एक सुन्दर छवि का रूप दे सकते हैं।

    किसी चित्रकार से रची तस्वीर के सामान आपकी छवि भी सौंदर्य प्राप्त करेगी।

    पर ये सिर्फ एक तस्वीर नहीं, ये आपके जज़्बातों को भी एक सुन्दर रूप देता है।

    आप को ये आत्मा-संतुष्टि देता है, आप खुद पर खुश होते हैं, ये आपको अपने पसंदीदा कॉमिक करैक्टर की तरह दिखने का मौका भी देता है, और आपको मोनालिसा की खूबसूरती देता है।

    हम सभी चाहते हैं कि कोई हमें मॉडल बना कर हमारा चित्रांकन करे, रंगों से हमें भी सजाया जाय, कैमरे से खींची तस्वीर उसकी बराबरी नहीं कर पाती, और आज प्रिसमा ऐप द्वारा ये चमत्कार सम्भव है।

    यह ऐप हमारा आत्मा-विश्वास बढ़ाता है, हमें ख़ूबसूरत महसूस करवाता है, और मानसिक रूप से खुश रखता है। हम खुद पर गर्व महसूस करते हैं।

    आर्ट यानी कला के माध्यम से इंसानी दिमाग को बारीकी से बहलाया जा सकता है, कला से प्रशंसा की क्षमता बढ़ती है। हम और भी सम्वेदनशील बनते हैं।

    प्रिसमा ऐप में हम चित्रकार भी हैं और दर्शक भी; हम दोनों रूप से कला से जुड़े हुए हैं।

    हम खुद अपना चित्र बनाते हैं, उसमें विभिन्न फिल्टर्स द्वारा रंग भरते हैं, और दूसरों के चित्र को भी साइट पर देखते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं।

    ये चित्र वैन गोह के चित्र जैसे ही खूबसूरत हैं, और इस प्रकार हमें बताना ज़रूरी है, कि ये महान चित्रकार मानसिक रूप से पीड़ित थे, ये निराश और तनाव के शिकार थे जिसकी वजह से उनकी मौत भी हुयी, पर इसका असर उनके काम पर नहीं था।

    कला ने उन्हें जीवित रखा, उनकी कला, और उनके चित्र विश्व भर में आज भी मशहूर हैं।

    उन्होंने खुद के कई चित्र बनाये थे, जिनसे हमे पता चलता है, की खुद को कला का हिस्सा बनाना तब भी प्रचलित था। और आज भी सेल्फी खींच कर हम उसी  भावना की संतुष्टि करते हैं।

    प्रिसमा के बदौलत अब भी हम वैन गोह के चित्रकारिता की झलक अपने चित्रों में पातें है, और इस कारण हमें ख़ुशी होती है।

    इस ख़ुशी से हम तनाव मुक्त होते हैं, दिन में कुछ क्षण शान्ति से बिताते हैं, कला की प्रशंसा करने से हमारे मस्तिष्क के अन्य क्षमताओं में भी बेहतरी नज़र आती है।

     तकनीकी उन्नति के साथ जुड़े रहते हुए भी कला की चर्चा बहुत अच्छी कोशिश है। उम्मीद है, यह ऐप मानसिक रूप से हमें और समाज को स्वस्थ बना रहा है।

  • 11 Aug
    Janhavi Dwivedi

    क्या है सोशल स्नैकिंग?

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    कैसे अपने आसपास के लोगों के साथ की गयी छोटी सहभागिता हमारी ख़ुशी में उत्प्रेरक का काम करती  है।

    अमित घर से दूर दूसरे शहर में नौकरी करता है, सप्ताहांत में वह अपने घर जाने के लिए ट्रेन में सफर करता है, ट्रेन में सफर करने के दौरान भी वह अपने आस पास के लोगों से पॉलिटिक्स, क्रिकेट या दूसरे अन्य विषयों पर चर्चा करता है, इससे न सिर्फ उसे दूसरों को जानने समझने का मौका मिलता है,   बल्कि उसका सफर भी उबाऊ या थकान भरा नही महसूस होता।

    सामान्यतया, सामाजिक मनोविज्ञान के शोधों से ये बात सामने आयी है कि, अपने जीवन में जितना ज्यादा हम दूसरे लोगों के साथ जुड़ते हैं, हम उतना खुश रहते हैं। 

    लेकिन क्या हम हमेशा ये बात मानते हैं?... क्या कभी ऐसा होता है कि हम दूसरे लोगों से सम्पर्क करना या बातें करना नहीं चाहते क्योंकि हमें लगता है कि, इससे हमें कोई ख़ुशी नही मिलेगी?...

    कल्पना  कीजिये आप काम पर जाने के लिए ट्रेन में सफर कर रहे हैं, और कोई अजनबी आपके बगल वाली सीट पर आकर बैठ जाये। क्या आप ये सोचेंगे कि मेरा सफर ज्यादा खुशनुमा और सुखद होगा यदि मैं अकेले काम करूँ, पढूं या कोई गेम खेलूँ या फिर आप उस अजनबी के साथ बातें करने का फैसला करते हैं?

    ज्यादातर लोग सोचेंगे कि उनका सफर ज्यादा आरामदायक होगा यदि वे सिर्फ अपने तक रहेंगे और अपना काम करेंगे। हमारी धारणा यही रहती है कि, दूसरों से बातें करने में सिर्फ समय की बर्बादी होंगी, और बाद में हमें पछतावा होगा कि हमने अपना कीमती समय एक अजनबी के साथ फालतू की बातें करने में व्यर्थ कर दिया।

    वास्तव में, जब शोधकर्ताओं ने एक बड़े रेलवे स्टेशन पर जनमत संग्रह किया तो यही बातें सामने आयीं : सफर करने वाले सोचते थे कि अजनबियों से बातें करने की अपेक्षा, अपने तक रहने से सफर ज्यादा खुशनुमा रहता है।

    तो क्या हम सही हैं? क्या इन परिस्थितियों में अकेले एकांत में हम वास्तव में खुश रहते हैं? बिल्कुल नही !

    उन्ही शोधकर्ताओं ने एक रोचक प्रयोग की रुपरेखा तैयार की। वे रेलवे स्टेशन गए और उन्होंने सुबह दैनिक यात्रियों से कहा कि क्या वे एक सामान्य से शोध का हिस्सा बनना चाहेंगे।  उन्होंने उन यात्रियों से तीन में से एक तरीके से सफर करने को कहा। कुछ लोगों से कहा गया कि वे ट्रेन में अजनबी लोगों के साथ मेल जोल करें। कुछ लोगों से कहा गया कि, वे ट्रेन में एकांत में बैठे रहें। और बाकि लोगों से कहा गया कि वे हमेशा की तरह यात्रा करें। 

    सभी को एक लिफाफा दिया गया था जिसमे एक छोटा सा सर्वे था जिसे उन्हें अपने गन्तव्य पर पहुंच कर पूरा करना था। उस सर्वे में यात्रियों के अनुभव और उनकी यात्रा कैसी रही के विषय में प्रश्न पूछे गए थे। यात्रियों ने इसे पूरा करके वापस शोधकर्ताओं के पास भेज दिया।

    क्या अजनबियों के साथ मेलजोल का कुछ असर होता है ? चलिए इस ग्रुप के लोगों को क्या करने को कहा गया था इस पर नजर डालते हैं।

    उन्हें विशेष निर्देश था कि :

    आज ट्रेन पर एक नए व्यक्ति के साथ  बातें करें।

    उनके साथ सम्पर्क बनाने की कोशिश करें।

    उनके विषय में कुछ रोचक जानकारी पता करें और अपने बारे में भी उन्हें कुछ बताएं।

    जितना ज्यादा बातें हों उतना अच्छा।

    आज सुबह आपका  उद्देश्य अपने आसपास के लोगों के विषय में जानकारी लेने की कोशिश करना है।

    उनकी प्रतिक्रियाएं उम्मीद के विपरीत थी। अपने तक सीमित रहने वाले यात्रियों की तुलना में जब यात्रियों से किसी अजनबी सहयात्री के साथ सम्पर्क करने को कहा गया तब उनके अनुभव काफी सुखद रहे।

    इतना ही नही उन्हें ऐसा लगा जैसे उनका ये सबसे सुखद सफर रहा। कुल मिलाकर उन्हें बेहतर महसूस हुआ और सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने ये बिलकुल भी महसूस नही किया की उनका समय व्यर्थ जा रहा है।     

      

    "ख़ुशी" और "social snacking "

    इस लेख में ये सन्देश है, कि "सोशल स्नैक्स" (जिसे कुछ लोग कहते हैं ) उन पलों में सामाजिक सम्बन्ध बनाता है, जिसमे आप आगे शायद न हों। संसार में दूसरे लोगों को जानना, चाहे यह लम्बी चलने वाली दोस्ती में न बदले। अपने आस पास के लोगों से जुड़ने के मौके खोजकर आप ज्यादा खुशहाल,ज्यादा सकारात्मक जीवन जी सकते हैं।

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