कुल 169 लेख

  • 26 Aug
    Oyindrila Basu

    हाइपोथायरायडिज्म और हमारा मानसिक स्वास्थ्य।

    hypothyroidism

     

     

    हाइपोथायरायडिज्म एक 'शिथिल-गति' रोग है, जो धीरे धीरे शरीर पर असर करता  है।

    इसका मतलब है, इससे पीड़ित व्यक्ति में थाइरोइड की कमी है। इससे शरीर में हाज़मा भी धीरे-धीरे होता है, और इसका असर शरीर और मन दोनों पर पड़ता है।

    हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित होने पर व्यक्ति मोटापा, सुस्ती, और कमज़ोरी महसूस करते हैं, जिससे मानसिक रूप से वह अकसर निराश रहते हैं।

    १०% महिलाएं हमेशा थाइरोइड में कमी की शिकार होती हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं-

    पहला - थाइरोइड ग्लैंड में जलन के कारण।

    दूसरा - आपरेशन के कारण थाइरोइड में कमी होने से

     

    वजह जो भी हो, इस बीमारी से इंसान तनाव, निराशा और परेशानी में रहता है।

    शरीर में हार्मोनल इम्बेलेंस के कारण मस्तिष्क पर इसका असर होता है; यह हमने पहले भी देखा है, की शरीर में बढ़ते या घटते एस्ट्रोजन के कारण, महिलाओं में जज़्बाती दुर्बलता और निराशा ज़्यादा असर करती है।

    शारीरिक अक्षमता भी मानसिक उदासी का कारण होती है, जो हाइपोथायरायडिज्म में होता है।

    आलसीपन, दुर्बलता, काम में अनिच्छा इत्यादि आम बातें होती हैं, जिससे आत्मविश्वास भी घटता है।

    और तो और दिमाग के सक्रिय रूप से काम करने में भी असर पड़ सकता है ।

     

    इसका उपाय डॉक्टरी इलाज ही है। लिथियम थेरेपी से अच्छा असर पाया गया है।

    पर इससे बचने के भी कुछ आसान तरीके हैं-

    ग्लूटेन से दूर रहें - गौ दूध या पैक्ड खाद्य का सेवन काम करें।  दूध पीना ही चाहते हैं, तो भेड़ या बकड़े का पियें।

    आयोडीन की मात्रा को बरकरार रखें- नमक में आयोडीन होना ज़रूरी है, अगर उससे नहीं मिल रहा है, तो आयोडीन सप्लीमेंट का इस्तेमाल करें।

    शरीर को शुद्ध करें- शरीर में धातु और अन्य दूसित पदार्थों से खुद को दूर रखें। काढा पीने से शरीर शुद्ध होता है।

    कार्बोहायड्रेट युक्त खाना कम खाएं- कार्बोहायड्रेट के बदले में अच्छे फैट का सेवन करें। चीनी ज़्यादा खाने से एस्ट्रोजन की मात्रा में बदलाव आता है, जिससे मानसिकता पर असर हो सकता है।

  • 22 Aug
    Oyindrila Basu

    काल्पनिक कहानियां हमको और सहानुभूतिशील बनाती हैं।

    reading fictions

     

    हम अपने सोच और भावनाओं को पंख देने के लिए काल्पनिक कथा और कहानियां पढ़ते हैं। कल्पना की दुनिया अनोखी होती है; उसका वास्तविक घटना और लोगों से मेल होता भी है, और कभी कभी नहीं भी होता। पर काल्पनिक चरित्र और लोग हमें अकसर प्रभावित करते हैं।

    हम उनके साथ जुड़ते हैं, उनसे मेलजोल करते हैं, और देखते ही देखते वे हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।

    पर हाल ही में, वैज्ञानिक माध्यम द्वारा पता चलता है, की काल्पनिक कथा पढ़ने से जज़्बाती रूप से भी आप प्रभावित होते हैं।

    कल्पना और उससे जुड़ी घटनाएं हमें भावुक और सहानुभूतिशील बनाती है।

    और यही कारण है, कि हिंदी टी वी सीरिअल्स हमें इतना पसन्द आते हैं, और अगर वहां किसी चरित्र को दुःख या तकलीफ होती है, तो उसका अहसास हमें भी होता है।


    यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो के डॉ. कैथ ओटले जो मनोरोग विशेषज्ञ हैं, बताते हैं, की एक रिसर्च द्वारा देखा गया था, कि डाक्यूमेंट्री की तुलना में काल्पनिक टी वी सीरिअल्स से इंसानों के दिमाग पर ज़्यादा असर हो रहा था।


    जब हम जेन ऑस्टेन  की 'प्राइड एंड प्रेज्यूडिस' पढ़ते हैं तो उसके मुख्य भूमिका, एलिज़ाबेथ के लिए हमें गर्व भी होता है, और उसकी खुद्दारी को हम सलाम भी करते हैं; साथ ही उसकी गलतियों पर हमें अफ़सोस भी होता है।

    काल्पनिक कथा पढ़ने से इंसान और सामाजिक और सम्वेदनशील बनता है।

    विभिन्न चरित्र की अच्छाई और बुराइयों से हम सीखते हैं।


    fiction

    और किताबों में काल्पनिक शब्दों शब्द कोशों से हमारा मस्तिष्क ज़्यादा उत्साही होता है। "लाल किताब" "फूलती फलती हरियाली" जैसे वाक्य पर मस्तिष्क ज़्यादा प्रतिक्रिया देता है, ऐसा देखा गया है।

    सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को हम काल्पनिक कहानियों में बेहतर समझते हैं, क्योंकि ये वास्तविकता से ही प्रभावित होते हैं।

    तो अगली बार कोई आपको सीरियल देखने से टोके, तो उसे ज़रूर बताइए की काल्पनिक कहानियां आपको मानसिक रूप से सम्वेदनशील बनाते हैं, और आपको मानसिक रूप से खुशहाल और स्वस्थ भी रखते हैं।

    Image source

    Gif source

  • 19 Aug
    Oyindrila Basu

    जानिये साक्षी और सिंधु की सफलता का राज

    sakshi malik and pv sindhu

     

    17 अगस्त, साक्षी मलिक ओलंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गयीं।

    उनके अनुसार "यह 12 साल की कड़ी मेहनत का एक परिणाम है।"

    18 अगस्त, पुसरला वेंकट सिंधु, Nozomi Okuhara 2-0 (21-19, 21-10) को हराने के बाद, रियो ओलंपिक बैडमिंटन के फाइनल में प्रवेश करने वाली पहली भारतीय महिला बनी, और इस प्रकार, एक और पदक के लिए भारत आश्वस्त है।

    सिंधु कहती हैं कि, "मैं सिर्फ खेल के बारे में सोचती हूँ । अगर आप सच में अच्छी तरह से खेलते हैं तो आप खुदबखुद खेल, और पदक जीतेंगे। मैं सिर्फ अपने मैच और अगले मैच, सेमीफाइनल (Okuhara के खिलाफ) पर ध्यान केंद्रित कर रही हूँ। मुझे आशा है कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दे सकती हूँ।"

     

    वे भाग्यशाली हो पायीं, क्योंकि उन्होंने कड़ी मेहनत की, और कभी हार न मानने वाला जज्बा है ।

     

    हम अकसर कुछ लोगों को खुश किस्मत या भाग्यशाली कहते हैं, जिनके साथ सब कुछ सही होता है, जैसे वक़्त खुद उनकी तरफदारी कर रहा हो।

     

    कहते हैं, कि हर कोई अपनी किस्मत खुद लेकर आता है, या किस्मत की डोर ऊपरवाले के हाथों में होती है, पर क्या ये सच है?

     

    लेकिन 10 साल की लंबी रिसर्च के बाद ऐसा देखा गया है, की आम तौर पर हम खुद ही अपने अच्छे या फिर बुरे किस्मत के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।

     

    समीक्षा ये भी कहती है, की किस्मत को बेहतर बनाने का अवसर हम सब को मिलता है।

     

    जो किस्मत, भाग्य इत्यादि पर धार्मिक रूप से विश्वास करते हैं, वे भाग्य परिवर्तन में इतना मशगूल हो जाते हैं, कि अपने कर्म पर ध्यान ही नहीं देते।  अपना कर्तव्य क्या है, उसे ठीक से कैसे करना है, सामने क्या-क्या शुभ अवसर है, ये वे नहीं देख पाते।

     

    इसी बारे में आइये एक कहानी सुनते हैं-


     

    रमन एक व्यवसायी था, उसे बेहद जल्द उन्नति मिलने लगी , इसलिए उसे हमेशा लगता था कि किस्मत उसकी तरफ है।

    एक बार व्यवसाय में नुकसान होने के कारण वह विचलित हो गया। उसने एक भविष्य वक्ता की मदद लेनी चाही।

    अचम्भे की बात है, ग्यानी ने, व्यवसाय के बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन कहा कि अगले ४ दिनों में, अपने शहर में ही रमन की मृत्यु होगी।

    ये बात रमन को रास नहीं आयी। वह मरना नहीं चाहता था।

    ग्यानी की ये बात उसे परेशान करती रही, और वे दिन रात नींद से उठकर सोचने लगा कि इस परिस्थिति से बचने का क्या उपाय है।

    एक रात उसने तय कर लिया की वह शहर छोड़ कर चला जायेगा, और अगर उसने ये कर लिया  तो उसकी मृत्यु टल जायेगी।

    उसने ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिए कहा, और एक बैग लेकर निकल पड़ा। अँधेरी सड़क पर वह ड्राइवर को जल्दी चलाने के लिए कहता गया।

     

    90-140 की मि /घण्टे की गति से गाड़ी भाग रही थी, हल्की बारिश के कारण सड़क साफ़ नहीं दिख रही थी, और रमन था कि, ड्राइवर से बार-बार कहता "जल्दी चलो, और तेज़", अचानक सब कुछ थम गया पहिये की चीख के साथ, अब कही भी रमन की आवाज़ नहीं थी, एक ट्रक ने गाड़ी को टक्कर मार दी थी...


    अब बताइये क्या उसका भाग्य इस हादसे के लिए ज़िम्मेदार है, या फिर रमन की विचलित मनोदशा , जो भाग्य को बदलने के फ़िराक में था, जिसे विश्वास था की वह मर जायेगा और अपने घर के सुरक्षित तट को उसने छोड़ दिया?

     

    वैज्ञानिक रिसर्च द्वारा इंसान के जीवन में अन्धविश्वास का महत्व स्पष्ट रूप से दिखता है। तावीज़, मालाएं, लकी चार्म इत्यादि ने हमारे शरीर पर अपनी जगह बना ली है।

    पर हम ये नहीं समझ पाते, की भाग्य के बारे में इस प्रकार  जुनूनियत से सोचना भी मानसिक अस्वस्थता के लक्षण है। आप जितना किस्मत के बारे में सोचेंगे, आप में परेशानी, तनाव, चिंता बढ़ेगा।

    मानसिक रूप से स्वस्थ रहने से, आपका काम सही होगा, आप अच्छे मौके का फायदा ले पाएंगे, और आपको सफलता मिलेगी। और सफलता के साथ-साथ आती है खुशहाली और भाग्य।

    मानसिक रूप से स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है, वर्ना दुर्भाग्य अवश्य आपके साथ रहेगा।

    इसके लिए आप क्या कर सकते हैं?

    1. काउन्सलिंग या मनोचिकित्सक की सलाह लें।
    2. आत्म-समर्थन और खुद पर विश्वास होना ज़रूरी है।
    3. लक्ष्य तय करना ज़रूरी है, ताकि सही रूप से सफलता की ओर बढ़ते रहे।
    4. खुद पर भरोसा रखें।
  • 18 Aug
    Oyindrila Basu

    जानिये क्यों सामान्य व्यक्ति को भी मनोचिकित्सा चाहिए

    counselling

     

    मानसिक चिकित्सा, काउंसलिंग, थेरेपी इत्यादि के मतलब समय के साथ साथ बदलते नज़र आ रहे हैं। आज हर क्षेत्र में, मानसिक स्वास्थ्य का महत्व अधिक हो गया है। कर्म, शिक्षा और अन्य जगह पर, मनोचिकित्सक को विशेष रूप से नियुक्त  किया जाता है, ताकि सभी व्यक्ति, छात्र स्वस्थ रूप से काम कर पाएं,  और समृद्धि बढ़े।

    हर महीने, एक साधारण काउंसलिंग सेशन या थेरेपी क्लास, सभी के लिए ज़रूरी है, इससे आपके मस्तिष्क को सांस लेने की फुरसत मिलती है, रोज़ मर्रा के जीवन से दूर, आप चैन और राहत से खुद का विकास कर सकते हैं। और एक अनुभवी और जानकार दोस्त से मन की हर बात बताने से बोझ भी कम होता है, आप खुश रह पाते हैं। तो सिर्फ तनाव, निराश या परेशानी के वक़्त ही थेरेपिस्ट के पास जाना आवश्यक नहीं।

    आज भी एक बड़े संख्यक लोगों को लगता है, की अगर आपका रिश्ता टूट गया है, या फिर आपने किसी को खो दिया है, या फिर आपकी नौकरी चली गयी है, तो आपको काउंसलिंग की ज़रुरत है।

    पर असल बात तो ये है, की थेरेपी वह माध्यम है जिससे आप खुद को बेहतर पहचान पाते हैं, हर गम्भीर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं।

    समस्या से पहले बचाव करना बेहतर है, ऐसा हमने हमेशा सुना है।

     

    काउंसलिंग और थेरेपी के अपने लाभ हैं-

    1. इससे आपको एक ऐसा साथी मिलता है, जो आपकी हर बात निस्वार्थ रूप से सुनता है; जिससे आप दिल की हर बात ज़ाहिर कर सकते हैं। वे एक आईने की तरह आपको अपने प्रतिबिम्ब से मिलाता है।

     

    1. एक पेशेवर थेरेपिस्ट आपको पूरा ध्यान और लगन देगा, ताकि आप खुद को पूर्ण रूप से ज़ाहिर कर सकें। यही उसका काम है; वह अपने मत या फैसले को आप पर नहीं थोपेगा; और ये अकसर नहीं होता जब हम दोस्त या घरवालों से बात करने जाते हैं।

     

    1. थेरेपी से आपका आत्मविश्वास बढ़ता है, और खुद को समझने की क्षमता भी आती है।

     

    1. किसी भी समस्या या विषय पर बात करने से अंदरूनी सच्चाई बाहर आती है, और आप क्यों नाखुश हैं ये पता चलता है, और ये अच्छा ही है, अगर आपको सच मालूम होगा, तो आप उस परिस्थिति में सुधार ला पाएंगे, ताकि आप भी खुश रहे और दूसरों को भी खुश रख पाएं।

     

    1. थेरेपी से आप और सामाजिक बनते हैं, आपमें बात करने के कौशल अच्छा होता है।

     

    1. ये आपको मन से मज़बूत बनाता है; जब आपको खुद की अच्छाई और बुराइयां पता होती है, तो आप मुश्किल परिस्थितियों में भी खुद को तैयार रख पाते हैं।

     

    1. तनाव, निराश, और परेशानी के लक्षण आपको पहले से पता होते हैं, इसलिए वक़्त आने पर आप उनसे लड़ पाते हैं।

     

    आज भी कई जगह पर साइकोथेरेपी महँगी है, पर अब नहीं; आज ऑनलाइन मेन्टल हेल्थ क्लिनिक काफी अच्छा काम कर रहे हैं; जैसे eWellness Expert, जो किफायती भी है, और आप किसी भी जगह से इसके माध्यम से थेरेपी करवा सकते हैं। इसकी वजह से छोटे शहरों के लोगों को भी काफी फायदा हुआ है। और दूसरे देशों के लोग भी कम खर्च में मानसिक स्वास्थ्य का लाभ लेने लगें हैं। आप किसी भी समय थेरेपी शुरू कर सकते हैं, और जब आपको लगे की आपका लक्ष्य हासिल हो चुका है, तब आपकी  थेरेपी खत्म होती है।

    Image source

  • 18 Aug
    Oyindrila Basu

    क्या सेक्स के प्रति लोगों का जोश घट रहा है ?

    couple on smartphone

     

    हैरानी की बात है, ऐसे युग में, जहां सेक्स के बारे में हर जगह से हमें पूरी जानकारी मिल रही है, ताकि इस विषय पर कोई भी अज्ञात ना रहे, हमारे रोज़ के जीवन में इस स्वाभाविक प्राकृतिक हरकत  का घटाव नज़र आ रहा है।


    सांख्यिकीय रूप से जांच करने पर पता चलता है, की 16-44 वर्षीय लोगों में, महिलाएं महीने में ४.५ बार सेक्स में भाग लेते हैं, और  पुरुष 4.9 बार, जब की आज से 10 साल पहले की समीक्षा में ऐसा नहीं था, तब संख्या 6.1 और 6.4  था।


    स्वस्थ सेक्स हमें कई प्रकार से लाभ देता  है।

    • ये हमें खुद के बारे में अच्छी धारणा देता है, ये हमें संतुष्टि देता है ।

     

    • ये अपना प्रेम भाव अपने साथी को जताने के लिए एक अच्छा उपाय है । 

     

    • ये हमको शारीरिक रूप से भी स्वस्थ रखता है।

     

    • विशेषज्ञ बताते हैं, की आम तौर पर शादी शुदा मर्द और औरतों में सर्दी, खासी, अस्थमा, और अन्य इन्फेक्शन स्वस्थ सेक्स जीवन की वजह से कम होते हैं ।

     

    • ये प्रसव की ओर एक अहम माध्यम है, एक नए जीवन का जन्म इससे होता है।

     

    • सेक्स हमें मानसिक रूप से भी बहुत स्वस्थ और खुशहाल रखता है।

     

    पर हमारी आज की पीढ़ी  को आखिर हुआ क्या है?

    खुले विचार रखने वाले और अपने सम्पर्क के प्रति रूढ़िवादी ना रहनेवाली  युवा पीढ़ी, सेक्स के प्राकृतिक विधि को सम्मान नहीं दे रही ।

    पहले सिनेमा में, नायक-नायिका के बीच शारीरिक मिलाप दिखाने के लिए दो फूलों को मिलाया जाता था, पर आज ऐसा नहीं है, शारीरिक प्रक्रिया का ज्ञान सभी को होना चाहिए, यौन विषय पर शिक्षा भी ज़रूरी है, और इसीलिए आज कल फिल्में, डाक्यूमेंट्री, और अन्य कार्यक्रम इस क्षेत्र में काफी प्रचार कर रहे हैं।

    स्वस्थ सेक्स को सामाजिक स्वीकृति मिल रही है, पर यौन कार्य का महत्व घट रहा है।  इसकी क्या वजह हो सकती है?

    समीक्षा के दौरान ये भी देखा गया है कि, आज की पीढ़ी, जो शादी-शुदा है, या जो अपने साथी के साथ रहते हैं, ज़्यादातर लोगों में, सेक्स के प्रति एक अद्भुत चिंता और भय दिखता है।

    सही तरीका बहुत अहम होता नज़र आ रहा है। आज इंसान कुछ भी करने से पहले बहुत सोचता है। और जिस विषय पर आप बहुत ज़्यादा जानकारी लगाएंगे, कुछ ही दिनों में आप का उस पर से आकर्षण चला जाना स्वाभाविक ही है, क्योंकि फिर आपके सामने, उसकी अच्छाई के साथ साथ उसके नग्न रूप भी होंगे।

    जैसे एक गयनोकॉलोजिस्ट को सेक्स के प्रति कोई अलग आकर्षण नहीं होता, क्योंकि हर रोज़ वे महिला शरीर को बहुत नज़दीक से जांच करते  है, एक डॉक्टर को उसकी बारीकियाँ मालूम है, वह उसके काम का हिस्सा है । उस डॉक्टर के लिए सेक्स एक काम से जुड़े चीज़ का हिस्सा है, तो मानसिक रूप से उसे कोई स्फूर्ति नहीं होती। जिनकी पत्नियां भी गयनोकॉलोजिस्ट होते हैं, उन्हें ये बात बेहतर समझ आती है।

    उसी प्रकार, जब आज हम इस शारीरिक प्रथा के बारे में ज़्यादा पढाई और जांच करते है, तो गहराई से शरीर और शारीरिक प्रथाओं को जानने के बाद, उसे खुद करने से पहले हम बहुत सोचते हैं, कौन सा तरीका सही होगा उस पर ज़रूरत से ज़्यादा गौर करते हैं। तब इच्छा और आनंद ही चला जाता है।

    दूसरा कारण ये भी है, की हम आज के जीवन में बहुत व्यस्त हो चुके हैं। हमारे परिवार के लिए हमारे पास वक़्त नहीं। हमारे साथी, के लिए भी समय नहीं। हम काम से लौटते हैं, टी वी चला कर बैठ जाते हैं, या फिर इन्टरनेट पर पता नहीं क्या देखते रहते हैं; जो चीज़ें, हम सोचते हैं, हमें सामाजिक बना रही है, असल में वह चीज़ें हमें अपनों से दूर ले जाती हैं। और जब सब ज़रूरी काम खत्म हो गए, तब जा कर, अपने साथी पर प्रेम जताने का ख़याल आ सकता है, या फिर वह उतना ज़रूरी नहीं लगता, दिन भर की अहम ज़िम्मेदारियों के बाद, थक कर सो जाते हैं।

    हम रोबोट बनते जा रहे हैं, हम इन्टरनेट पर सेक्स के वीडियोस, लेख और कथन पढ़ेंगे, पर उसे खुद अनुभव करने का वक़्त नहीं है। दिन भर व्हाट्स-ऐप और इंस्टाग्राम पर जमे रहेंगे, पर परिवार से बातचीत का वक़्त नहीं है।

     

    आप को अपने व्यक्तिगत जीवन पर ध्यान देना होगा।

    • हर रोज़ ५ मिनट बिना कुछ किये, चुप-चाप एक जगह पर बैठ कर बिताएं।

     

    • काम से वापस आ कर अपने साथी के साथ चाय बनाये, टी वी बाद में आता है।

     

    • ऐसा प्रण लें की दिन में आधे घण्टे से ज़्यादा, इन्टरनेट पर बेकार सर्फिंग नहीं करेंगे ।

     

    • सेक्स से जुडे अजीब अजीब विडियो ना देखें।

     

    • सेक्स पर हर किताब, या हर लेखन पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं।

     

    • जितना वक़्त आप जीवन साथी के साथ बिताएंगे, उतना ही आप उसके प्रति आकर्षित होंगे।

     

    • संचार मुक्त हो कर अपने जीवन साथी के साथ छुट्टियों पर जाएँ।

     

    सेक्स एक स्वाभाविक प्राकृतिक प्रथा है, ये हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखता है। ये स्वाभाविक रूप से हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है।