कुल 169 लेख

  • 30 Aug
    Janhavi Dwivedi

    दुःख, पीड़ा से उबरने की यात्रा

    grief

     

    किसी नुकसान या किसी को खोने की भावनात्मक प्रतिक्रिया दुःख है। इसमें दुखी व्यक्ति सामान्यतः विभिन्न चरणों से होकर गुजरते हैं।  ये चरण हैं ;

    क्रोध

    इन्कार

    अवसाद

    सौदेबाजी

    और स्वीकार करना शामिल है।  (Kubler-Ross, 1969)

    हालाँकि बहुत से लोग किसी सदमे या दुःख को इसी क्रम में से होकर गुजरने का अनुभव करते हैं, ये  चरण (स्टेजेस ) एक दूसरे से काफी जुड़े हुए होते हैं, या ओवरलैप होते हैं।

     

    दुःख  या  सदमे  के विभिन्न चरणों के गुजरने के बाद अंत में सकारात्मक परिणामों में:

    फिर से ठीक होना(recuperation ),

    संकल्प (determination) और

    बदली स्थिति को स्वीकार कर लेना (flexibility) शामिल हैं।

    ये सब होते हुए भी अचानक आयी विपत्ति के प्रारम्भिक समय में जब व्यक्ति असहनीय दुःख से व्याकुल हो रहा होता है, तो ये परिणाम बहुत दूर प्रतीत होते हैं।

    नुकसान और गहरे दुःख से संकल्प और पुनः ठीक होने की प्रक्रिया को समझने के लिए इस प्रक्रिया में शामिल एक हिस्से को देखना सही रहेगा।

    शोक मनाना(Mourning) एक बड़ी अनहोनी के बाद उत्पन्न हुई स्थिति को दर्शाता है।

    यह कई प्रकार की प्रतिक्रियाओं को अपने अंदर समेटे रहता है, जिसमे,- अवधारणात्मक ,व्यवहारात्मक, भौतिक या शारीरिक और आध्यात्मिक प्रतिक्रियाएं शामिल हैं। दुःख शांति को पुनः पाने की आंतरिक प्रक्रिया को दर्शाता है।

    इसमें भावनात्मक और संज्ञानात्मक स्तर पर नवीनता लाने और आध्यात्मिक पक्षों के पुनराकलन को शामिल करने की आवश्यकता होती है।

    प्रत्याशित दुःख Anticipatory grief- किसी अनहोनी के बाद होने वाला दुःख प्रत्याशित दुःख(Anticipatory grief) प्रदर्शित करता है। जबकि व्यक्ति इस अचानक आयी विपत्ति के लिए तैयार नहीं होता, प्रत्याशित दुःख में कुछ समस्याओं के समाधान होने का समय मिलता है।

    इसीलिए अचानक किसी दोस्त या रिश्तेदार की मृत्यु होना उनपर आश्रित लोगों के लिए विशेष रूप से कष्टप्रद होता है, क्योंकि ये दुःख अप्रत्याशित होता है।

    शोक,  दुःख को मनाने की सामाजिक अभिव्यक्ति होती है, जिसमे  धार्मिक रीतिरिवाज शामिल होते हैं, जो समाज के द्वारा निर्धारित होते हैं।

    हालाँकि दुःख का अनुभव आन्तरिक,निजी और व्यवहार में व्यक्तिपरक होता है, पर शोक को अभिव्यक्त करने का तरीका ज्यादा बाह्य, खुला और सामाजिक होता है।

    शोक सम्वेदना दुःख की प्रतिक्रिया को सभी के सामने प्रकट करने का माध्यम होता है जिसमे उदासी का माहौल छा जाता है।

    दुःख जैसा की अधिकांशतः देखा जाता है मानसिक अशांति नही है बल्कि इसके स्थान पर यह अनहोनी के साथ खुद का समायोजन है। इस संदर्भ में, शोक को मनाने का तरीका दुःख को कम करके, फिर से सामान्य होने के मार्ग के समान होता है।

     

    इसमें दुःख की अवस्थाओं के साथ काम करना शामिल है।

    शोक(mourn) के गतिविधियों में शामिल है:

    निराशा की पीड़ा का सामना करना,

    अनहोनी की सच्चाई को सहन करना

    और प्रियजन के विछोह के बाद अपनी भावनाओं को किसी दूसरे रिश्ते के साथ जोड़ना।

     

    इन गतिविधियों को पूरा करने में असमर्थता affected sorrow का कारण बन सकता है। जो की उत्साहहीनता से जुड़ा एक प्रकार के डिप्रेशन के रूप में जाना जाता है।

    Affected sorrow आगे के विकास और उन्नति के मार्ग बन्द कर सकता है। उदाहरण के लिए, शोक(mourn) में परिवार या सामाजिक सम्बल की अनुपस्थिति दुःख मनाने की प्रक्रिया को जटिल कर सकती है। 

     

    अनसुलझे दुःख unresolved grief के कुछ  शुरूआती चेतावनी के संकेत निम्न हैं :-

    अंतिम संस्कार में जाने से बचना, श्मशान या कब्रगाह नही जाना, विभिन्न अनुष्ठानों में भाग नही लेना।

    अत्यधिक दुःख  के कारण  अपने जिस प्रियजन को खो दिया है उसके विषय में कुछ भी कह पाने में असमर्थ होना   

    छोटी सी घटना पर भी अत्यधिक निराशाजनक प्रतिक्रिया करना।

    हर सामान्य बात में दुर्भाग्य के कारणों को देखना।

    प्रियजन से जुडी किसी भी वस्तु को हटाने की शक्ति या इच्छा का अभाव।

    दुःख से उबरने के लिए बुद्धि और मन से दुखद घटना को सहन करने की, और उसके बावजूद जीवन में आगे बढ़ने की जरूरत होती है।

    ऐसा होने पर ही, व्यक्ति वापस पुरानी यादों में नही जाता और इस अनुभव के साथ जीवन में आगे बढ़ता है कि, परिवर्तन ही जीवन का नियम है।

    गहरे दुःख से उबरने में समय लगता है। हालाँकि शोक से बाहर निकलने में हर किसी की समय सीमा भिन्न हो सकती है, कुछ गतिविधियां दुःख को कम करने के लिए जरूरी हैं:

     

    नीचे दर्शाये गए कार्य बहुत कुछ रीति सम्मत तरीके से किये जा सकते हैं, इसके बावजूद कि इन कार्यों के मध्य बहुत ओवरलैप है। ----

    मृत्यु के भावनात्मक दुःख का सामना करना :

    दुःख की पीड़ा को इससे दूरी रहकर या शांत रहकर नही कम किया जा सकता बल्कि इसकी जगह दुःख को व्यक्त करके और पीड़ा को सहन करके इसका सामना कर सकते हैं।

    यद्द्यपि किसी हृदय विदारक अनहोनी के बाद व्यक्ति एक बारगी स्तब्ध या सम्वेदना शून्य हो जाता है। सबसे पहला काम है,अनहोनी की असहनीय दुःख या पीड़ा का सामना करना ।

     

    अनहोनी और अपने प्रियजन के बारे में चर्चा करना :

    उसी समय या कुछ समय बाद जिस प्रिय सदस्य को खो दिया है उसके  बारे में बातें करने से अनहोनी के दर्द का सामना होता है।

    अक्सर यह एक कहानी के रूप में बार बार कहा जाना चाहिए। हालाँकि दुखद स्थिति में यह कष्टदायी होता है। कभी कभी परिवार या कम्पनी जिस पर व्यक्ति जीवन में सबसे ज्यादा भरोसा करता रहा मौके पर नजर नही आते जबकि सहयोगी, यहां तक कि बाहरी व्यक्ति जिन पर कभी भरोसा नही किया, दुःख में शामिल होने के लिए आगे आ सकते हैं।

    किसी अवसर पर ऐसे व्यक्ति से सम्पर्क करने से, जो उस प्रिय व्यक्ति से जुडी यादों को अच्छे से जानता और उसका ख्याल करता हो, दर्द को साझा करने में आसानी रहती है।

     

    सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के विचारों को शामिल करना :

    हो सकता है कि जो प्रिय व्यक्ति गुजर गया वह इतना प्रशंसनीय हो, जिससे बाकि लोग उसकी सिर्फ अच्छी या सकारात्मक बातें ही याद करते हों, जबकि बिना अस्तित्व के वह प्रिय व्यक्ति बेकार, लाचार और कष्टदायी हो सकता है।

    विभिन्न अवसरों पर, बीते हुए समय के मुश्किल दिनों की यादें अप्रत्याशित मुस्कान ला सकती हैं। यादों को साझा करना जारी रखने से और जीवन के वैकल्पिक रूप का सामना करना शुरू करने से लम्बे समय में जीवन की इच्छा शक्ति अधिक व्यवहारिक हो जातीहै।   

    लम्बे समय में बीते समय की चमकीली यादों से आशा और ख़ुशी का दिलासा मिल सकता है।

     

    अनहोनी की वास्तविकता को सहन करना :

    इस बात का कोई टाइम टेबल ना होने के बावजूद धीरे धीरे प्रिय व्यक्ति को खोने का गम अंत में खत्म हो जायेगा, और उसके बिना रहने का सच स्वीकार्य हो जायेगा।

    जैसे जैसे व्यक्ति वापस सहज होने की प्रक्रिया में धीरे धीरे आगे बढ़ना जारी रखता है, एक और जीवन बनाने की दिशा में कदम बढ़ाता है, नए जीवन की वास्तविकता की स्वीकार्यता धीरे धीरे दिखाई देना शुरू करने लगती है।

     

    अनुभव से महत्व की खोज:

    शोकाकुल व्यक्ति अपने इस कष्टदायी अनुभव से एक मायने(अर्थ ) को खोज पाने में सक्षम होगा, एक ऐसा मायने जो उसे आगे एक सार्थक जीवन जीने की दिशा में प्रेरित करेगी।

    भावनात्मक पीड़ा धीरे धीरे कम होती जाती है: शुरुआत में दुःख का आवेग बहुत ही शक्तिशाली होता है। ऐसा लगता है मानो दुखों का पहाड़ उसके ऊपर टूट पड़ा हो, और अंदर तक उसकी अंतरात्मा बिखर कर हार जाती है। कुछ समय के बाद दुःख का आवेग कम और कम होने लगता है, जबकि शांत होने का समय लम्बा होता है।   

    लम्बे समय के बाद इन यादों का कुछ पलों का हल्का झोंका ही शेष रह जाता है।

    किसी अनहोनी के शोक मनाने का कष्टदायी अनुभव अंत में फिर से स्वस्थ होने(recuperation), संकल्प (determination) और वापस सहज होने (resilience) की दिशा में सकारात्मक परिणामों की ओर ले जाता है। 

    फिर से स्वस्थ होने (recuperation) में शामिल है, शोक के स्टेजेस की जानकर कार्यपद्धति के साथ काम करना।

    संकल्प (determination) में शामिल है, जितना सम्भव हो मनोवैज्ञानिक और आंतरिक रूप से अनहोनी के सच को सहन करना और जीवन के पहलुओं को फिर से व्यवस्थित करना।

    पुनः सहज होना(Resilience) सम्बन्धित है, व्यक्ति की भविष्य में आने वाले संकट और मुश्किल हालातों के अनुसार ढलने(अनुकूल होने ) की क्षमता।  

    जबकि बहुत से व्यक्तियों को दुःख मनाने के सभी क्रिया कर्मों का दायित्व अकेले ही निभाना पड़ता है, पुनः स्वस्थ होने की प्रक्रिया मनोवैज्ञानिक (जो काउंसलिंग करने का विशेषज्ञ हो) से बातचीत करके आगे बढ़ाई जा सकती है।

    हालाँकि ये आसान नही, जब कोई किसी अपने के साथ हुई अनहोनी के बाद दुःख से व्याकुल हो रहा होता है, और इस असहनीय गम से उबरने की कल्पना करना उसके लिए सम्भव नही होता, तब शोक(दुःख) के विभिन्न चरणों के माध्यम से कुछ व्यवहारिक तरीकों द्वारा सकारात्मक परिणाम पाए जा सकते हैं।

    यह लेख Grief: The Venture towards Resilience and adjustment का हिंदी रूपांतरण है 

     

  • 27 Aug
    Oyindrila Basu

    क्या खाएं जब तनाव ग्रस्त हों ?

     

    mood boosting foods

     

     

    क्या आप तनाव में हैं? किसी चीज़ की चिंता कर रहे हैं? क्या आज आप बिलकुल ही सुस्त हैं और बिस्तर से उठना नहीं चाहते?

    जोर लगाइए, उठिए और अपने लिए एक पौष्टिक नाश्ता बनाइये। हताशा में, पौष्टिक आहार मूड ठीक भी करता है।

    mood boosting foods

    कुछ लोग सही कहते हैं, चॉकलेट खाने से मिज़ाज अच्छा हो जाता है।

    कुछ विशेष खाद्य पदार्थ लेने से मानसिक स्थिति पर अच्छा असर पड़ता है, और निराश, दर्द, तनाव इत्यादि दूर हो जाते हैं।

    ये वस्तु आसानी से बन भी जाती हैं, और आपका ज्यादा वक़्त नहीं लेती और आप दिन भर के काम भी ठीक से कर सकते हैं।

     

    तो आइए देखते हैं कि मिज़ाज बिगड़ने पर कौन सा खाना खाया जाये-

     

    mood boosting foods

    ओट्स- आजकल बाजार में ओट्स आसानी से मिल जाता है और लोग इसे खाते भी हैं क्योंकि इससे आपका मोटापा घटता है। इसके सिर्फ यही गुण नहीं है ; कम लोग ही जानते हैं की ओट्स खाने से ब्लड शुगर नियंत्रण में रहता है और तनाव से होनेवाली  मुश्किलों से शरीर को बचाता है।

     

    केला- ऑफिस जाते वक़्त एक केला उठा लें और स्वस्थ रहें। ये एक अच्छा कार्बोहाइड्रेट है, जिसमें पोटैशियम भी काफी मात्रा में होता है। ये मस्तिष्क में सेरोटोनिन की मात्रा को बढ़ाता है और दिमाग को शान्ति पहुंचाता है।

     

    आमला- इसके हरे रंग से ही नज़रों को हलकी शांति मिलती है। ये विटामिन सी से भरपूर है, जो आपके हृद-दीवारों को सक्षम रखता है, ताकि तनाव से बढ़ते रक्त चाप से, दिल को कोई हानि ना पहुंचे।

     

    mood boosting foods

    टरकि- अगर आप विदेशी भोजन के शौक़ीन हैं तो आप को जान कर ख़ुशी होगी की टर्की खाने से आपकी निराशा दूर होगी। इससे भी सेरोटोनिन की वृद्धि होती है।

    अंडे, हरी सब्ज़ी, बादाम और दाल विटामिन बी से भरपूर है, जिसकी कमी से बेवजह ही निराश हो सकती है।  जिससे हमारे शरीर को लाभ होता है और हमारे दिमाग को चुस्ती मिलती है।

     

    खाद्य जो निराशा में नहीं लेने चाहिए-

    mood boosting foods

    चीनी- चीनी या मीठा खाने से आप त्वरित चुस्ती महसूस करेंगे , लेकिन २० मिनट के बाद शरीर में कमज़ोरी और थकान महसूस होती, जिससे मानसिक सुस्ती आ जायेगी।

     

    सोडा और कैफीन युक्त पानी- कोल्ड ड्रिंक, कॉफ़ी इत्यादि से नींद में समस्या हो सकती है। नींद अच्छी ना होने पर आप चिड़चिड़े हो जाएंगे।

     

    शराब- ये आपके नसों को सुस्त कर देती है। जज़्बाती व्यवहार पर आपका कोई संयम नहीं रहता। धीरे धीरे आप चीज़ें भूलने लगते हैं। सम्भावनाएं हैं, की शराब के सेवन से आप और निराश हो जाएंगे।

     

    जमे तेल- डालडा, घी, मक्खन इत्यादि से शरीर में कोलेस्ट्रॉल और फैट बढ़ता है, जिससे दिल पर बुरा असर पड़ता है।

     

    अब आपको पता है, कौन से तत्व इस्तेमाल करने से खान और पौष्टिक बनेगा और स्वादिष्ट भी। तो तनाव, निराशा से डरने की ज़रूरत नहीं, मिज़ाज को मस्त बनाइये पौष्टिक आहार के साथ।

  • 26 Aug
    Oyindrila Basu

    हाइपोथायरायडिज्म और हमारा मानसिक स्वास्थ्य।

    hypothyroidism

     

     

    हाइपोथायरायडिज्म एक 'शिथिल-गति' रोग है, जो धीरे धीरे शरीर पर असर करता  है।

    इसका मतलब है, इससे पीड़ित व्यक्ति में थाइरोइड की कमी है। इससे शरीर में हाज़मा भी धीरे-धीरे होता है, और इसका असर शरीर और मन दोनों पर पड़ता है।

    हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित होने पर व्यक्ति मोटापा, सुस्ती, और कमज़ोरी महसूस करते हैं, जिससे मानसिक रूप से वह अकसर निराश रहते हैं।

    १०% महिलाएं हमेशा थाइरोइड में कमी की शिकार होती हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं-

    पहला - थाइरोइड ग्लैंड में जलन के कारण।

    दूसरा - आपरेशन के कारण थाइरोइड में कमी होने से

     

    वजह जो भी हो, इस बीमारी से इंसान तनाव, निराशा और परेशानी में रहता है।

    शरीर में हार्मोनल इम्बेलेंस के कारण मस्तिष्क पर इसका असर होता है; यह हमने पहले भी देखा है, की शरीर में बढ़ते या घटते एस्ट्रोजन के कारण, महिलाओं में जज़्बाती दुर्बलता और निराशा ज़्यादा असर करती है।

    शारीरिक अक्षमता भी मानसिक उदासी का कारण होती है, जो हाइपोथायरायडिज्म में होता है।

    आलसीपन, दुर्बलता, काम में अनिच्छा इत्यादि आम बातें होती हैं, जिससे आत्मविश्वास भी घटता है।

    और तो और दिमाग के सक्रिय रूप से काम करने में भी असर पड़ सकता है ।

     

    इसका उपाय डॉक्टरी इलाज ही है। लिथियम थेरेपी से अच्छा असर पाया गया है।

    पर इससे बचने के भी कुछ आसान तरीके हैं-

    ग्लूटेन से दूर रहें - गौ दूध या पैक्ड खाद्य का सेवन काम करें।  दूध पीना ही चाहते हैं, तो भेड़ या बकड़े का पियें।

    आयोडीन की मात्रा को बरकरार रखें- नमक में आयोडीन होना ज़रूरी है, अगर उससे नहीं मिल रहा है, तो आयोडीन सप्लीमेंट का इस्तेमाल करें।

    शरीर को शुद्ध करें- शरीर में धातु और अन्य दूसित पदार्थों से खुद को दूर रखें। काढा पीने से शरीर शुद्ध होता है।

    कार्बोहायड्रेट युक्त खाना कम खाएं- कार्बोहायड्रेट के बदले में अच्छे फैट का सेवन करें। चीनी ज़्यादा खाने से एस्ट्रोजन की मात्रा में बदलाव आता है, जिससे मानसिकता पर असर हो सकता है।

  • 22 Aug
    Oyindrila Basu

    काल्पनिक कहानियां हमको और सहानुभूतिशील बनाती हैं।

    reading fictions

     

    हम अपने सोच और भावनाओं को पंख देने के लिए काल्पनिक कथा और कहानियां पढ़ते हैं। कल्पना की दुनिया अनोखी होती है; उसका वास्तविक घटना और लोगों से मेल होता भी है, और कभी कभी नहीं भी होता। पर काल्पनिक चरित्र और लोग हमें अकसर प्रभावित करते हैं।

    हम उनके साथ जुड़ते हैं, उनसे मेलजोल करते हैं, और देखते ही देखते वे हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।

    पर हाल ही में, वैज्ञानिक माध्यम द्वारा पता चलता है, की काल्पनिक कथा पढ़ने से जज़्बाती रूप से भी आप प्रभावित होते हैं।

    कल्पना और उससे जुड़ी घटनाएं हमें भावुक और सहानुभूतिशील बनाती है।

    और यही कारण है, कि हिंदी टी वी सीरिअल्स हमें इतना पसन्द आते हैं, और अगर वहां किसी चरित्र को दुःख या तकलीफ होती है, तो उसका अहसास हमें भी होता है।


    यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो के डॉ. कैथ ओटले जो मनोरोग विशेषज्ञ हैं, बताते हैं, की एक रिसर्च द्वारा देखा गया था, कि डाक्यूमेंट्री की तुलना में काल्पनिक टी वी सीरिअल्स से इंसानों के दिमाग पर ज़्यादा असर हो रहा था।


    जब हम जेन ऑस्टेन  की 'प्राइड एंड प्रेज्यूडिस' पढ़ते हैं तो उसके मुख्य भूमिका, एलिज़ाबेथ के लिए हमें गर्व भी होता है, और उसकी खुद्दारी को हम सलाम भी करते हैं; साथ ही उसकी गलतियों पर हमें अफ़सोस भी होता है।

    काल्पनिक कथा पढ़ने से इंसान और सामाजिक और सम्वेदनशील बनता है।

    विभिन्न चरित्र की अच्छाई और बुराइयों से हम सीखते हैं।


    fiction

    और किताबों में काल्पनिक शब्दों शब्द कोशों से हमारा मस्तिष्क ज़्यादा उत्साही होता है। "लाल किताब" "फूलती फलती हरियाली" जैसे वाक्य पर मस्तिष्क ज़्यादा प्रतिक्रिया देता है, ऐसा देखा गया है।

    सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को हम काल्पनिक कहानियों में बेहतर समझते हैं, क्योंकि ये वास्तविकता से ही प्रभावित होते हैं।

    तो अगली बार कोई आपको सीरियल देखने से टोके, तो उसे ज़रूर बताइए की काल्पनिक कहानियां आपको मानसिक रूप से सम्वेदनशील बनाते हैं, और आपको मानसिक रूप से खुशहाल और स्वस्थ भी रखते हैं।

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  • 19 Aug
    Oyindrila Basu

    जानिये साक्षी और सिंधु की सफलता का राज

    sakshi malik and pv sindhu

     

    17 अगस्त, साक्षी मलिक ओलंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गयीं।

    उनके अनुसार "यह 12 साल की कड़ी मेहनत का एक परिणाम है।"

    18 अगस्त, पुसरला वेंकट सिंधु, Nozomi Okuhara 2-0 (21-19, 21-10) को हराने के बाद, रियो ओलंपिक बैडमिंटन के फाइनल में प्रवेश करने वाली पहली भारतीय महिला बनी, और इस प्रकार, एक और पदक के लिए भारत आश्वस्त है।

    सिंधु कहती हैं कि, "मैं सिर्फ खेल के बारे में सोचती हूँ । अगर आप सच में अच्छी तरह से खेलते हैं तो आप खुदबखुद खेल, और पदक जीतेंगे। मैं सिर्फ अपने मैच और अगले मैच, सेमीफाइनल (Okuhara के खिलाफ) पर ध्यान केंद्रित कर रही हूँ। मुझे आशा है कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दे सकती हूँ।"

     

    वे भाग्यशाली हो पायीं, क्योंकि उन्होंने कड़ी मेहनत की, और कभी हार न मानने वाला जज्बा है ।

     

    हम अकसर कुछ लोगों को खुश किस्मत या भाग्यशाली कहते हैं, जिनके साथ सब कुछ सही होता है, जैसे वक़्त खुद उनकी तरफदारी कर रहा हो।

     

    कहते हैं, कि हर कोई अपनी किस्मत खुद लेकर आता है, या किस्मत की डोर ऊपरवाले के हाथों में होती है, पर क्या ये सच है?

     

    लेकिन 10 साल की लंबी रिसर्च के बाद ऐसा देखा गया है, की आम तौर पर हम खुद ही अपने अच्छे या फिर बुरे किस्मत के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।

     

    समीक्षा ये भी कहती है, की किस्मत को बेहतर बनाने का अवसर हम सब को मिलता है।

     

    जो किस्मत, भाग्य इत्यादि पर धार्मिक रूप से विश्वास करते हैं, वे भाग्य परिवर्तन में इतना मशगूल हो जाते हैं, कि अपने कर्म पर ध्यान ही नहीं देते।  अपना कर्तव्य क्या है, उसे ठीक से कैसे करना है, सामने क्या-क्या शुभ अवसर है, ये वे नहीं देख पाते।

     

    इसी बारे में आइये एक कहानी सुनते हैं-


     

    रमन एक व्यवसायी था, उसे बेहद जल्द उन्नति मिलने लगी , इसलिए उसे हमेशा लगता था कि किस्मत उसकी तरफ है।

    एक बार व्यवसाय में नुकसान होने के कारण वह विचलित हो गया। उसने एक भविष्य वक्ता की मदद लेनी चाही।

    अचम्भे की बात है, ग्यानी ने, व्यवसाय के बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन कहा कि अगले ४ दिनों में, अपने शहर में ही रमन की मृत्यु होगी।

    ये बात रमन को रास नहीं आयी। वह मरना नहीं चाहता था।

    ग्यानी की ये बात उसे परेशान करती रही, और वे दिन रात नींद से उठकर सोचने लगा कि इस परिस्थिति से बचने का क्या उपाय है।

    एक रात उसने तय कर लिया की वह शहर छोड़ कर चला जायेगा, और अगर उसने ये कर लिया  तो उसकी मृत्यु टल जायेगी।

    उसने ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिए कहा, और एक बैग लेकर निकल पड़ा। अँधेरी सड़क पर वह ड्राइवर को जल्दी चलाने के लिए कहता गया।

     

    90-140 की मि /घण्टे की गति से गाड़ी भाग रही थी, हल्की बारिश के कारण सड़क साफ़ नहीं दिख रही थी, और रमन था कि, ड्राइवर से बार-बार कहता "जल्दी चलो, और तेज़", अचानक सब कुछ थम गया पहिये की चीख के साथ, अब कही भी रमन की आवाज़ नहीं थी, एक ट्रक ने गाड़ी को टक्कर मार दी थी...


    अब बताइये क्या उसका भाग्य इस हादसे के लिए ज़िम्मेदार है, या फिर रमन की विचलित मनोदशा , जो भाग्य को बदलने के फ़िराक में था, जिसे विश्वास था की वह मर जायेगा और अपने घर के सुरक्षित तट को उसने छोड़ दिया?

     

    वैज्ञानिक रिसर्च द्वारा इंसान के जीवन में अन्धविश्वास का महत्व स्पष्ट रूप से दिखता है। तावीज़, मालाएं, लकी चार्म इत्यादि ने हमारे शरीर पर अपनी जगह बना ली है।

    पर हम ये नहीं समझ पाते, की भाग्य के बारे में इस प्रकार  जुनूनियत से सोचना भी मानसिक अस्वस्थता के लक्षण है। आप जितना किस्मत के बारे में सोचेंगे, आप में परेशानी, तनाव, चिंता बढ़ेगा।

    मानसिक रूप से स्वस्थ रहने से, आपका काम सही होगा, आप अच्छे मौके का फायदा ले पाएंगे, और आपको सफलता मिलेगी। और सफलता के साथ-साथ आती है खुशहाली और भाग्य।

    मानसिक रूप से स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है, वर्ना दुर्भाग्य अवश्य आपके साथ रहेगा।

    इसके लिए आप क्या कर सकते हैं?

    1. काउन्सलिंग या मनोचिकित्सक की सलाह लें।
    2. आत्म-समर्थन और खुद पर विश्वास होना ज़रूरी है।
    3. लक्ष्य तय करना ज़रूरी है, ताकि सही रूप से सफलता की ओर बढ़ते रहे।
    4. खुद पर भरोसा रखें।