कुल 169 लेख

  • 25 Sep
    Oyindrila Basu

    पत्नी का दिल घर के बाहर के कार्य करके जीतें

    man doing housework

     

     

    क्या आप सोचते हैं, की पत्नी के घरेलु कार्य में मदद कर आप उनका दिल जीत सकते हैं , तो जरा ठहरिये , और अपनी इस धारणा पर पुनः विचार करें ।

    रिसर्च द्वारा देखा जा रहा है, कि  की जिन घरों में स्त्री घर के काम करती हैं, जैसे खाना पकाना, घर साफ़ करना, कपड़े धोना इत्यादि। और पुरुष, व्यवहारिक सामग्री के लिए बिल भरते हैं, गाड़ी की रिपेयरिंग करवाते है, ऑफिस और अन्य बाहरी कामों में व्यस्त रहते हैं।

    अगर इस रूप से परिवार चलता है, तो देखा गया है, वहां पुरुषों में शारीरिक सम्पर्क बनाने की चाह ज़्यादा होती है। अगर पुरुष को घर के कामों की ज़िम्मेदारी उठानी नहीं पड़ती तो वे यौन में अधिक रुचि रखते हैं, तुलना में उनके जो घर के काम में हाथ बटाते हैं।

    जो पुरुष घर में खाना पकाते हैं, या फिर घर साफ़ करने में मदद करते हैं, ऐसा नहीं है की वे  यौन  सम्पर्क नहीं करते, पर उन में ये रुचि कम दिखाई देती है।

    इसके कई कारण हो सकते है-

    गृह कार्य मानसिक रूप से मर्दों को स्फूर्ति प्रदान नहीं करते, और  उन्हें करते हुए थकान महसूस होती है, और तब उतनी स्फूर्ति या ऊर्जा नहीं रहती कि यौन सम्पर्क के प्रति आकर्षण महसूस करें।

    जो महिलाओं में ज़्यादातर देखा जाता है। महिलाएं अगर बाहर काम करती भी हैं, तो भी घर के अधिक काम उन्हें ही करने पड़ते हैं, और इस सर्व रूप से दायित्व निभाते निभाते उन में योन की चाह बेअसर नहीं, पर कम हो जाती है।

    इसी प्रकार जो पुरुष गृह कार्य निभाते हैं, उनकी मानसिकता भी कई हद तक महिलाओं जितनी सम्वेदनशील होती है, और ये मानसिकता भी कुछ हद तक योन रुचि कम होने का कारण है, उनके लिए शारीरिक सुख उतना महत्व नहीं रखता।

    आज के दिन में घर सम्हालना किसी अकेले की ज़िम्मेदारी नहीं है। स्त्री-पुरुष को घर और बाहर दोनों के काम, कंधे से कन्धा मिलाकर करना पड़ता है; पर ऐसे में अपने वैवाहिक जीवन को भी स्वाभाविक और सुखमय कैसे रखेंगे ये सोचना ज़रूरी है।

    काम की ज़िम्मेदारियों को हटाकर दिन में कुछ समय अपने लिए भी निकालें, जब आप आराम करें ।

    अपने साथी के साथ वक़्त बिताएं; आराम से शरीर को राहत मिलती है, इस समय दिन भर की चिंताओं को दूर रखिये, सिर्फ अपने साथी पर ध्यान दीजिये, ऐसे शरीर को स्वस्थ रखने से शारीरिक सम्पर्क में भी बाधा नहीं आएगी। और जीवन खुशहाल चलेगा।

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  • 17 Sep
    eWellness Expert

    ख़ुशी को हमेशा के लिए कायम करने के नुस्खे।

    man ko khush karne wale kaary

     

     

    हम सभी खुश रहना चाहते हैं, लेकिन हम हर वक्त खुश नहीं रह पाते । विभिन्न चीज़ों से परेशान हो जाते हैं हम। और ख़ुशी दूर भाग जाती है। पर हाल ही में एक रिसर्च द्वारा पता चलता है, की अगर हम हमारे मिज़ाजी दोमुहेपन को सही रूप से सम्हाल सकें, तब हम हमेशा ही खुश रह सकते हैं।

    स्वल्प समय के लाभ को भुलाकर लम्बे समय के लिए खुश रहना होगा।  छोटे छोटे स्वार्थ को त्यागने से दूर तक हम खुश रह पाएंगे।

    जैसे, अगर स्कूल के  रेस में  आप फर्स्ट नहीं आएं है, तो उस पर दुखी रहने के बजाये, और बेहतर करने के लिए खुद को प्रोत्साहित करें। अभ्यास बढ़ाएंगे, तो आगे जा कर ये हार याद भी नहीं रहेगी, हो सकता है, खेल को ठीक से सीखने के बाद आप ही चैंपियन बन जाएँ।

     

    और हर दिन इसी प्रकार खुश रहने के लिए कुछ नुस्खे अपनाने होंगे।

    दिन भर के काम को समय और मिज़ाज अनुसार बाँट लेने से दुःख और तकलीफ दूर होगी।

    मस्तिष्क के प्रक्रिया अनुसार, हम अलग अलग वक़्त पर, अलग तरह का व्यवहार करते हैं; कभी हम खुश मिज़ाज होते हैं, तो कभी उदास; कारण सही रूप से पता नहीं होता, पर एक दिन में कई जज़्बात हम में आते जाते हैं।

    जिस वक़्त आपका मिज़ाज दुर्बल हो, यानी आप उदास महसूस कर रहे हैं, तो उस वक़्त पढ़ाई, या ऑफिस का काम लेकर ना बैठें, घर के काम  भी कुछ देर के लिए पीछे छोड़ दें। सुबह उठकर अगर बेहाल और दुखी हैं, तो गरमा गर्म चाय बनाएं, और पीने के बाद, कुछ देर व्यायाम करें, साथ में मैडिटेशन भी।

    अच्छी धुन सुने, गाना बजाएं। जब मिज़ाज बेहतर हो जाये, और अंदर से फुर्तीला महसूस करने लगें  आप, तब रसोई, झाड़ू पोंछा, और ऑफिस के काम पर ध्यान दें। इस प्रकार नियम पूर्वक  काम को सही रूप से बांटने पर ख़ुशी बरकरार रह सकती है।

    पर प्लानिंग भी ज़रूरी है। हर दिन के लिए एक रूटीन सेट करें और क्रमानुसार काम करें, पर अगर मिज़ाज किसी काम के लिए सही ना हो, तो उसे छोड़ दें, विश्राम लें, जब बेहतर लगे, तब बाकी काम करें। इससे शरीर और मन दोनों का संतुलन ठीक रहता है।

  • 12 Sep
    Oyindrila Basu

    अद्भुत व्यसन !

    आम तौर पर व्यसन या लत की बात की जाए, तो शराब, सिगरेट और जुए के किस्से ही हमें याद आते हैं।
    इन चीज़ों की आदत लग जाए तो छोड़ना बहुत ही मुश्किल होता है, और इसी कारण आजकल बहुत सी संस्थाएं हैं, जो नशे या आदत को मिटाने के लिए प्रयास कर रहीं हैं, ताकि हम मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकें।
    लेकिन, नशीले पदार्थ के अलावा भी हमारे रोज़-मर्रा के जीवन में कई आदतें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम बड़ी आदत या लत के रूप से पहचानते ही नहीं।
    अजीब हैं ये आदतें । एक बार लग जाए तो छोड़ना मुश्किल होता है।


    smartphone addiction

    स्मार्ट फ़ोन और टेबलेट-

    आज कल हम सभी के पास ये यंत्र अवश्य होते हैं। स्मार्ट फ़ोन में ऐसा क्या है पता नहीं, लेकिन एक आम मोबाइल यूजर दिन में लगभग १५० बार इसके स्क्रीन पर कुछ ढूंढता रहता है।

    अगर हम फ़ोन पर बात नहीं भी कर रहे हैं, तब भी स्क्रीन पर स्क्रॉल करना एक आदत, या यूँ कहें, व्यसन की तरह है, कुछ तो देखना पड़ेगा, फ़ोन में कुछ तो देखना पड़ेगा।

    ये कुछ ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर सा है, जिसमें इंसान बार बार आदतन एक ही काम करता है।

    हाथ में हमेशा फ़ोन लेकर घूमने से आपकी नज़र स्वाभाविक रूप से उस पर पड़ती है, और आप उसे कुरेदने लगते हैं, और इसी प्रकार स्क्रॉलिंग एक आदत बन जाती है।



    nail biting

    नाखून कुरेदना, और चबाना-

    ये भी एक अजीब आदत है, नाखून चबाना कोई नई बात नहीं, बच्चों से लेकर जवान तक, हम सभी में ये आदत है।

    कुछ लोग, नाखून के पास वाले हिस्से को कुरेदते रहते हैं, ये भी एक आदत है। ये नाखून की बात नहीं, इससे मस्तिष्क को एक अजीब तरह की राहत मिलती है, फ्रायड ने इन सभी अहसासों को यौन का आनंद मिलने वाला माना है। जैसे बच्चे को ऊँगली चूसने में मज़ा आता है, क्योंकि इससे उसके शरीर में कुछ हॉर्मोन के संचालन होते हैं।

     

    spray tanning

    टैनिंग-

    यानी धूप में चमड़े को सेकना। आश्चर्य की बात है, जब की भारत में, हम आज भी सफ़ेद त्वचा के पीछे पागल है, वही विदेश के कई भागों में, लोग सांवला रंग पाने के लिए घंटों धूप में बैठे रहते हैं।

    और धीरे धीरे ये एक आदत बन जाती है। उन्हें समझ में नहीं आता कि धूप से निकलने वाले अल्ट्रावायलेट रेज़ से उनके शरीर को अधिक नुकसान हो सकता है। ये सूर्यताप उन्हें धीरे-धीरे आरामदायक लगने लगता है।



    lip balm addiction

    लिप बाम-

    कई लोगों को बैग में लिप बाम लेकर चलना पसंद है, हम सोचते हैं, ये शारीरिक रूप से अपना ख़ास ख़याल रखते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, लिप बाम की नमी धीरे धीरे एक आदत बन जाती है, फिर हर वक़्त होठों पर कुछ न कुछ लगाते रहना पड़ेगा, इस लिए विभिन्न स्वाद के लिप बाम भी आज कल उपलब्ध हैं।


    love addiction

    प्यार में पड़ना-

    बार बार प्यार में लोग पड़ते रहते हैं, और फिर अकेले रह ही नहीं पाते हैं। ये भी एक आदत है, हर वक़्त एक साथी की ज़रूरत महसूस होती है इन्हें।


    fitness classes

    व्यायाम-

    एक्सरसाइज और व्यायाम करना अच्छी बात है, लेकिन जो इसे रोज़ करते हैं, और दिन के साथ-साथ बढाते रहते हैं, उनके लिए ये एक अजीब आदत बन जाती है; फिर किसी कीमत पर ये व्यायाम करना छोड़ नहीं सकते, अगर बीमार हैं, या फिर चोट लगी है, तब भी नहीं।



    व्यसन से लड़ने के उपाय हमने पहले भी चर्चा की है-

    1 कॉग्निटिव बेहवियरल थेरेपी अधिक लाभ दायक है।
    2 अपने जीवन में एक ठहराव लाना भी ज़रूरी है।
    3 अपने आप प्रयास कीजिये, एक दिन अपने आप से वादा कीजिये कि अपनी कमज़ोरी को आज से खत्म करेंगे, और खुद से किये गए इस वादे को निभाएं ।
    4 दोस्तों से अपनी समस्या शेयर कीजिये।
    5 हमेशा अच्छे काम में खुद को व्यस्त रखिये।

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  • 08 Sep
    eWellness Expert

    अवसाद और वैवाहिक जीवन ।

    depression and marriage life

     

    अवसाद ग्रस्त रहना आज के दिनों में एक आम समस्या बन चुका है। काम का दबाव और  आगे बढ़ते रहने की चाहत में इंसान बहुत थक जाता है, और शारीरिक और मानसिक रूप से सुस्त हो जाता है, तभी अवसाद मन में जगह बना लेता है।

    अवसाद का असर हमारे वैवाहिक जीवन पर भी पड़ता है, और हमारे व्यक्तिगत रिश्तों पर इसका असर पड़ रहा है ।

    अवसाद का  एक मुख्य लक्षण है प्यार की अभिव्यक्ति को महसूस करने में असमर्थता

    हमारा मस्तिष्क हर एक छुअन को महसूस कर हमें उत्तेजित करता है। हर प्रकार के अनुभव को ठीक से समझने का ज़िम्मा मस्तिष्क का ही है, पर निराशा की वजह से दिमाग के कई हिस्से कमज़ोर पड़ जाते हैं, और हमारे अनुभव करने की शक्ति कम हो जाती है। जज़्बात सुन्न हो जाते हैं, और इसीलिए किसी भी शारीरिक क्रिया में रुचि नहीं होती।

    इसका सीधा असर हमारे वैवाहिक जीवन पर पड़ता है। ज़्यादातर महिलाओं में निराशा सफल रूप से घर कर लेती है, और उनके लिए सम्बन्ध बनाने में सुस्ती महसूस करना आम बात है।

    मर्दों में अनिच्छा के भी कई कारण है। एक निराश मर्द में शारीरिक अक्षमता भी नज़र आती है, तनाव की वजह से इरेक्टाइल डिस्फन्क्शन हो सकता है ।

    जिसकी वजह से वे सही रूप से ये क्रिया नहीं कर पाते।

    इसके अलावा, कई निराशा की दवाइयों के भी साइड इफेक्ट्स होते हैं, जिसके चलते शारीरिक सम्पर्क में धीमापन नज़र आता है।

     

    ऐसे में आप क्या कर सकते हैं, जिससे आपके वैवाहिक और व्यक्तिगत रिश्तों पर प्रभाव ना पड़े?

     

    कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी- इससे निराशा को सही रूप से दूर किया जा सकता है। इसमें थोड़ा वक़्त लगता है। पर इस चिकित्सा के कारण, आप के अंदर की नकारात्मक चिंताएं मिट जाती है, और स्वच्छ, शुद्ध चिंताओं से आपका दिमाग जागरूक हो जाता है।

    दवाइयों में बदलाव भी आपकी शारीरिक गति को सुधार सकता है- अपने चिकित्सक से बात करें। निराशा की कुछ दवाइयों से भी सम्बन्ध बनाने की इच्छा में कमी आती है।

     

    अपने साथी से सम्पर्क बनाये रखें-  निराश की वजह से जब ये दूरी बढ़ जाती है, तो उनसे बातचीत करते रहना ज़रूरी है, मानसिक रूप से उनसे जुड़े रहिये, ताकि वह आपको बेहतर समझ पाएं।

     

    प्यार करना बंद ना करें- शारीरिक सम्पर्क ही हमेशा ज़रूरी नहीं, रिश्ते में प्यार और सहारा होना ज़रूरी है; हाथ पकड़ना, झप्पी देना, छूना, ये सब भी सम्पर्क के अनेक तरीके हैं, जो आपके रिश्ते को लम्बे अरसे के लिए मज़बूत बनाते हैं। आगे चल कर जीवन में यही काम आते हैं, जो आपके साथी को भरोसा दिलाएगा कि आप उनसे प्यार करते हैं, और आपका रिश्ता भी स्वस्थ रहेगा।

     साथ ही अवसाद की चिकित्सा अवश्य पूरी करें।

  • 05 Sep
    eWellness Expert

    शिक्षक आपके सबसे अच्छे परामर्शदाता

    teacherday

     

    "मैं जब दसवीं कक्षा में थी, तो एक दिन, बीमारी का बहाना करके, क्लास से निकल गयी और सिकरूम मेंअगले पीरियड में जो परीक्षा थी, उसकी तैयारी करने लगी, । मैट्रन आई, और उन्होंने मेरी किताब ले ली। अगले पीरियड में, किताब के बारे में पूछे जाने पर मैंने कहा की मैट्रन जी ने किताब ली है। बाद में गणित के टीचर ने मुझे ये अहसास दिलाया, की बात छिपा के मैंने झूठ कहा है। गलती मेरी थी, मुझे सिकरूम में पढ़ाई नहीं करनी चाहिए थी, पर मैंने दोष मैट्रन पर डाल दी। मुझे तो पता ही नहीं था की एक बात छिपाने से मेरी बात झूठ हो रही है, या फिर मैट्रन जी दोषी बन रही है, पर इस घटना में, मुझे दुःख हुआ, जो मुझसे इतना स्नेह करते थे, उनकी नज़रों में गिर के, उनसे डांट खा के मुझे सबक मिला, कि बात छिपाना भी झूठ होता है, और मैंने मैट्रन से माफ़ी मांग ली। "

    ऐसे ही शिक्षक हमें कई बार ज़िन्दगी के वह बहुमूल्य सबक देते है, जो किताबों में भी नहीं मिलता।

    और ऐसे ही शिक्षक हमारे सबसे अच्छे परामर्शदाता बन सकते हैं।

    वह दिन गए, जब मानसिक परामर्शदाताओं की ज़रुरत सिर्फ उन्माद के लिए बताया जाता था।

    वह दिन भी गए, जब शिक्षक अपने बच्चों को सिर्फ पढ़ाई पूरी ना होने पर मुर्गा बनाते थे।

    आजकल बच्चों को काफी गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है। उनकी मानसिकता जटिल होती जा रही है, हमारे आज के समाज में रहकर, बच्चे वक़्त से पहले देखते हैं, और वक़्त से ज्यादा सीखते हैं।

    ऐसे में एक अच्छे परामर्शदाता की उन्हें सख्त ज़रुरत होती है, जो उन्हें सही गलत का फर्क समझा सखें।

    सिर्फ व्यक्तिगत समस्या के लिए ही नहीं, बच्चों को अपनी ज़िन्दगी में पढ़ाई को लेकर क्या सोचना है, ये भी एक अच्छे परामर्शदाता ही उन्हें बता सकते हैं। इसी को "काउन्सलिंग" कहते है।

    और आज के दिन में एक शिक्षक या टीचर ये काम सबसे बेहतर कर सकती है।

    बच्चों और शिक्षकों का संबंध एक अच्छे पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। शिक्षक बच्चों के दोस्त भी हैं।

    पर उनको ये भी समझना ज़रूरी है, कि उनकी भूमिका क्या है।

    शिक्षक आवश्यक रूप से बच्चों से एक व्यक्तिगत मेल भाव रखें, ताकि बच्चे उनसे डरने की बजाए, उनसे अपने व्यक्तिगत अच्छी और बुरी बातों का विचार-विमर्श करें, जो अकसर वे अपने घर पे नहीं बता सकतें।

    इससे टीचर बच्चे की समस्याओं को समझकर उनका हल कर सकते हैं। और सही गलत की समझ भी दे सकते हैं बच्चों को, एक मित्रता के भाव के साथ।

    ऊँची शिक्षा के लिए कौन सा विषय चुनना चाहिए ये एक टीचर से बेहतर कोई ऑफिस में बैठे कार्यकर्ता नहीं बता सकते ।

    मानसिक परामर्शदाता या काउंसलर का काम होता है, हर व्यक्ति विशेष को व्यक्तिगत रूप से पहचानना।

    शिक्षक को अपने कक्षा के हर बच्चे के बारे में अलग ही ज्ञान होता है। कौन किस विषय में तेज़ है, किस काम में बच्चे की रूचि है, यह एक शिक्षक के लिए जानना महत्वपूर्ण है, और उसे समझकर बच्चों को सही रास्ता दिखाना भी। अगर गणित से ज्यादा, बच्चा, खेल या नृत्य में रूचि रखता है, तो शिक्षक का कर्तव्य है, की वे बच्चे को उत्साह दें, और उनके माता पिता को भी समझाएं, की क्या करने से बच्चे की उन्नति होगी।

    ऐसे ही धीरे धीरे शिक्षक दोस्त बनेंगे, और बच्चों के सबसे अच्छे परामर्शदाता।