• 23 Oct
    eWellness Expert

    कब समाज मनोवैज्ञानिक समस्या को स्वाभाविक रूप से स्वीकार करेगा ?


    world mental health day

    पिछले दिन मैं एक दोस्त से मिली, वह अभी एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है, उसका दिन शुरू होता है सुबह के ५ बजे और खत्म होता है रात के १.३० बजे, वह भी ऑफिस की ही एक मीटिंग के साथ। व्यस्त दिनचर्या की वजह से वह बहुत तनाव में रहती है।

    उसके घर से शादी के लिए दबाव है, लेकिन वह किसी को पसंद नहीं करती, इसलिए शादी में पड़ना नहीं चाहती। वहकाम के दबाव से भी काफी परेशान है, धीरे-धीरे उसे निराशा ने घेर लिया है.....

    "मुझे लग रहा है मैं निराशा में जी रही हूँ, कुछ करने का मन नहीं करता, उत्साह महसूस नहीं करती मैं, कभी कभी लगता है बस यू ही बैठी रहूँ, कभी लगता है भाग जाऊँ। मैं २८ की हूँ, पर अब भी सिंगल हूँ, कोई बॉय फ्रेंड नहीं है, और प्रेम दिवस के अवसर पर बहुत मायूसी होती है, जब मेरे दूसरे दोस्त व्यस्त रहते हैं। दुखी हो जाती हूँ मैं। ऊपर से काम का प्रेशर भी है, इतना लम्बा दिन रोज़ रोज़ झेलना मुश्किल हो रहा है, मैं हड़बड़ी में गलतियां कर रही हूँ, डांट पड़ रही है, और मैं हालात को सुधार नहीं पाती हूँ।  मुझे एक दोस्त या हमदर्द की जरूरत है, जो मेरी समस्या को समझे, लेकिन अपने निराशा और तनाव की बात मैं किसी से नहीं कह पा रही हूँ। ऊपर से यह बात अगर घरवालों को पता चले,  पड़ोसी और रिश्तेदारों को भी पता चले,तो वे मुझे अजीब नजरों से देखेंगे। मैं क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आता। "

    मेरी दोस्त बहुत परेशान है, मानसिक रूप से पीड़ित है, उसे मदद की ज़रूरत है, लेकिन समाज में गलत समझे जाने के कारण चुप है।

    ऐसे हम में से कईं हैं, जिन्हें मानसिक चिकित्सक की आवश्यकता है, लेकिन क्योंकि समाज में आज भी मानसिक समस्याओं को पागलपन समझा जाता है, वहां स्वाभाविक रूप से कोई इसके बारे में बात नहीं करता।

    लोग क्या कहेंगे, ये डर सब को लगता है।

    बदनाम होने के डर से कोई कुछ कहता नहीं, रोग, अपनी जगह सुरक्षित बैठा रहता है।

    आज कल सोशल नेटवर्क साइट पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर  चर्चा चल रही है|

     'मानसिक समस्या पागलपन नहीं है' ये वह, बहुत कुछ, सभी उस पर लाइक, कमेंट और पोस्ट भी करते हैं, लेकिन उसका प्रभाव ज़्यादा समय तक नहीं रहता। क्योंकि लोग बात को मानते नहीं।

    साल में एक दो दिन मानसिक स्वास्थ्य के लिए रखा गया है, जब सब मिलकर इसे त्यौहार की तरह मनाते है, वैसे आज कल हर एक बात के लिए एक ख़ास दिन है, फिर मानसिक स्वास्थ्य क्या ख़ास है?.......

    जो असल में चाहिए, वह इन सब औपचारिकता से बढ़ कर है, और वह है सामाजिक स्वीकृति।

    सर्दी ज़ुखाम को हम जैसे स्वाभाविक रूप से मानते हैं, और डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मानना पड़ेगा, कि निराशा, तनाव जैसी चीज़ें भी सामान्य अस्वास्थ्य का कारण है, और उनका इलाज करवाना होता है।

    समाज में मानसिक असन्तोष पर जो कलंक है, उससे समाज का ही नुकसान हो रहा है। लोग खुल कर समस्या बता नहीं पाते, और भविष्य में ये समस्या बहुत बढ़ जाती है, जिससे शारीरिक क्षति भी होती है।

    कितने लोग दुःख और तकलीफ में हैं पर बताना नहीं चाहते। ये उन्नति नहीं है, ये प्रगति नहीं है।

    कई सेलिब्रिटी सामने आ रहे हैं, दीपिका पदुकोने, इलियाना दे क्रूज़ और करण जोहर ने अपनी निराशा पर खुलासा किया, ताकि दूसरों को प्रेरणा मिल सके, अब बारी हमारी है, साधारण लोगों को भी हक़ है, उनका भी कर्तव्य है, कि वे अपनी कहानी को सामने लाएं और इस कलंक को मिटायें।

     

  • 19 Oct
    Oyindrila Basu

    क्या रोना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही है ?

    obama crying

     

     

    आपने अक्सर देखा होगा कि, जब भी कोई सड़क या बहुत लोगों के बीच रोता है, तो आपको लगता है, ज़रूर कोई गड़बड़ है। ज़रूर कुछ बहुत बुरा हुआ है, इसलिए या तो हम उसकी और रहम की नज़रों के साथ दौड़ कर उसके पास जाते हैं, या फिर उससे दूर ही रहना पसंद करते हैं।

    हमें रोना तब आता है, जब हम किसी वजह से अतिरिक्त दुखी होते हैं। आंसू जज़्बात का प्रकाश है। जब हम बहुत ज़्यादा जज़्बाती हो जाते हैं, तो आँखों में आंसू आते हैं, या ख़ुशी से या फिर गम से।

    पर लोग ये समझ नहीं पातें; सबके सामने रोना बुरी बात है, लोग इससे हम पर हसेंगे, ऐसा बचपन से बताया जाता है। "अच्छे बच्चे नहीं रोतें", या "लड़के रोते नहीं", और इस हिसाब से सभी, ख़ास कर मर्द समझते हैं, की रोना एक सामाजिक कलंक है।

    लेकिन कम लोग ही ये समझ पाते हैं, कि रोना एक जज़्बाती बहाव है, और इससे मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

     

    रोने से दिमाग पर जज़्बातों का बोझ हल्का हो जाता है। आप के अंदर दबी शारीरिक अस्वस्थता बाहर आ जाती है, और इस कारण आप बाद में मानसिक रूप से स्वस्थ महसूस करते हैं।

    इसलिए किसी भी बड़े हादसे के बाद (जैसे किसी अपने की मृत्यु ) ये सुझाव दिया जाता है, कि आप ५ हिस्सों में अपने दुःख का निवारण करें, जी भर कर रो लें, तो हल्का महसूस करेंगे।

    इसके अलावा, आंसू हमारे आँखों को  साफ़ करता है। हर रोज़ हमारे आँखों में आंसू पैदा होते हैं, और किसी कारण उनका बहना भी ज़रूरी है, ताकि हमारे आँखों के कोने में जमी हुयी मैल इत्यादि साफ़ हो सखे।

    आँखों का स्नेहन करके, उन्हें सींच कर आंसू हमारी दृष्टि को स्वस्थ रखते हैं।

    यानी आंसू के हम पर कई अहसान है।

    मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए रोना ज़रूरी है।

  • 17 Oct
    eWellness Expert

    क्या आप रोज सुबह ईमेल चेक करते हैं ?

    man on a laptop

     

     

    अद्भुत है ये इन्टरनेट की दुनिया, यहां से दोस्त और दुश्मन साथ आते हैं।

    प्रगति इस प्रकार सफल है आज, की पूरे विश्व के साथ हम सम्पर्क कर सकते हैं, केवल अपने कंप्यूटर के माध्यम से। इन्टरनेट द्वारा लोगों से मेलजोल बनाये रखने को आज सोशल नेटवर्किंग कहा जाता है।

    इस क्षेत्र में सर्व प्रथम गूगल चैट और इ-मेल का इस्तेमाल किया जाता था।

    पर आज इ-मेल का इस्तेमाल काफी गम्भीर कामों में होता है। आजकल ज़्यादातर कर्म-क्षेत्र के मामलों में बातचीत करने के लिए इ-मेल व्यवहार में आता है। आधिकारिक कार्य के लिए भी इ-मेल को आदर्श माना जाता है। इस ख़ास पत्र माध्यम का उपकार तो बहुत है, पर साथ ही, ये मानसिक चिंता और तनाव का कारण भी  है।

    हर दिन ज़रूरी और व्यर्थ, दोनों प्रकार की कई मेल हमारे इ- मेल-बॉक्स मेंआती हैं, लेकिन इन्हें खोल कर पढ़ना ही हमारा दिन में पहला कर्तव्य हो जाता है।

    हर दिन सुबह उठकर हम देखते हैं की हमारा मेल-बॉक्स नए पत्रों से भर चुका है, हम उसे नकार नहीं सकते, कौन सा ज़रूरी है, कौन सा आधिकारिक, और कौन सा जरूरी नहीं है, ये जानने के लिए भी उन्हें पढ़ना ज़रूरी है, और इसमें बहुत वक़्त बर्बाद  होता है; खतरनाक बात तो ये है, की इससे हमारे मस्तिष्क पर दबाव पड़ता है, और हम तनाव के शिकार होते हैं। कैसे?

    एक नया मेल यानी एक और दाइत्व, जिस पर हमे वक़्त और मेहनत देना होगा, यानी मानसिक दबाव।

    ऊपर से मैं अगर सुबह उठकर देखूं, कि मेरे ऑफिस से १० नए मेल आये हैं, तो स्वाभाविक रूप से मुझे चिंता होती है, "क्या मैंने कुछ गलत किया?", "क्या वक़्त पर कुछ जमा करना था जो मैं भूल गयी?", "क्या ये मेल मुझे याद दिलाने के लिए है?", "क्या ऑफिस के लोग मुझसे असन्तुष्ट हैं?", "क्या मेरी नौकरी चली जायेगी?", आप देख सकते हैं, हमारे सोच की गति-विधि किस प्रकार बढ़ती है। नौकरी की चिंता यानी हम अधिक तनाव में हैं, और इसका कारण है, आपके इनबॉक्स में नया मेल।

    बार बार मेल पर ध्यान देने से आपका वक़्त भी बर्बाद होता है, समय का काम समय पर नहीं होता।

    ये एक अजीब आदत भी बन सकती है।

    इस प्रकार अनावश्यक तनाव से खुद को कैसे बचाएंगे?

    • सुबह उठकर पहला काम मेल-चेक नहीं होना चाहिए। एक कप गरम चाय या कॉफ़ी लें, फिर अपने पसंदीदा कोई भी चीज़ पढें, खबर या फिर कोई किताब; वीडियो भी देख सकते हैं।

     

    • यह मान कर चलें की आप अधिक मेल आने को प्रगति में बाधक न मानें, हर चीज़ की एक अच्छी बात होती है, ज़्यादा आधिकारिक मेल, यानी ज़्यादा काम, और ज़्यादा जिम्मेदारी यानी आपकी नौकरी सुरक्षित है, है न? laughing जब किसी खराब चीज़ के लिए तैयार रहेंगे, तो वैसा होने पर झटका या परेशानी कम लगेगी। और अगर कम मेल आते हैं, तो फिर मज़े हैं, दबाव कम पड़ेगा।

     

    • पत्र पढ़ने से पहले परेशान ना हों।

     

    • हर सुबह प्राणायाम का अभ्यास करें। इससे चिंता कम करने में मदद मिलती है ।
  • 07 Oct
    Oyindrila Basu

    ख़ुशी से खेलें, सफलता जरूर मिलेगी ।

    usain bolt

     

    आज हम एक ऐसे शोध का जिक्र करने जा रहे हैं, जिससे यह पता चला है कि, जब खिलाड़ी खेल को प्रतियोगिता मुक्त होकर खेलते हैं, तो वे ज्यादा खुश और जोश से खेलते हैं, और ऐसी स्थिति में उनकी सफलता भी दूर नहीं रहती । खेल में स्फूर्ति से बने रहना एक बहुत बड़ी बात होती है, आप नई-नई तकनीक सीखते हैं, खेल में महारत हासिल होती है, और ऐसे ही खेलते वक़्त आपको मज़ा आता है।

    एक प्रतियोगिता मुक्त परिवेश आपको तनाव मुक्त रहने में मदद करती है, और इससे आपको खेल खेलने में रुचि रहती है; अगर जीत और हार आप के लिए खेल से ज़्यादा महत्व रखता है तो खेल में हार होने से आप निराश के शिकार हो सकते हैं ।

    rio winner

    Rafael Nadal जैसे विख्यात खिलाड़ी सिर्फ खेल में मज़ा और स्फूर्ति उपभोग करने के लिए १२ वर्षीय उम्र में फुटबॉल और टेनिस खेलने लगे , जब की Andre Agasie जबरन टेनिस खिलाड़ी बनने के चक्कर में खेल पर से ही रुचि खो बैठे।

    आजकल ऑनलाइन विडियो गेम में भी जीतने से ज्यादा जरूरी स्कोर पाने पर जोर दिया जाता है,  खुश मिज़ाज खिलाड़ी केवल अपने अच्छे स्कोर से ही काफी खुश रहते हैं, गेम में जिसे किल-डेथ रेशियो कहा जाता है, वह ज़्यादा ज़रूरी हो रहा है।

     

    यह भी एक बढ़िया बात है, विडियो और कंप्यूटर गेम के प्रभाव से लोगों को जो व्यसन या लत लगती है, अगर जीत की चिंता ना हो, तो ये कई हद तक कम हो  सकता है, और इससे आपका काफी समय बचेगा।

    अगर जीत हर हाल पर हासिल करने का जुनून आप में ना हो, तो आप  मानसिक रूप से स्वस्थ  रहते हैं।

    तो क्या इसका ये मतलब है, कि  खेलते वक़्त जीतने की कोशिश भी ना करें?

    अगर एक बच्चे को ये पता हो, कि  जीतना ज़रूरी नहीं है, तो वह खेल में जीतने की कोशिश भी नहीं करेगा। फिर जीवन में अगर आपको हक़ीक़त में लड़ना पड़े, तो इस रवैये से आपको मुश्किलें हो सकती है। अगर रास्ते में गुंडों से आप लड़ रहे हैं, तो जीत की कोशिश ना करने से आप को सब मार कर चले जाएंगे?

    अगर परीक्षा में प्रथम होना ज़रूरी ना हो, तो बच्चा पढ़ाई ही क्यों करेगा?

    इसलिए स्कूल में बच्चों में एक स्वस्थ प्रतियोगिता पूर्वक मस्तिष्क  तैयार किया जाता है, ताकि वे आपके लगन और  मेहनत को कम ना होने दें। पर जीत के साथ साथ हार को भी समान रूप से स्वीकारना चाहिए।

    जीतना बढ़िया बात है, और कुछ कुछ क्षेत्र में ज़रूरी भी है, लेकिन खेल का मज़ा लेना मानसिक स्वास्थ्य के लिए ज़्यादा ज़रूरी है; किसी भी हालत में जीतना होगा, ऐसी चिंता स्वास्थ्य और खिलाड़ी सचेतनता के लिए हानिकारक है।

    खुश रहें, और ख़ुशी से खेलें।

  • 27 Sep
    Oyindrila Basu

    अधिक क्रोध आपका दिमागी संतुलन भी बिगाड़ता है ।

    anger management therapy

     

     

    गुस्सा सेहत के लिए हानिकारक है, ये हम सभी जानते हैं। इससे केवल मानसिक तनाव ही नहीं होता, बल्कि हमारे इस कार्य से दूसरों को भी तकलीफ पहुँचती है। गुस्से की वजह से दूसरों को दुःख पहुँचता है, हमारा सामाजिक सम्बन्ध बिगड़ता है और शारीरिक नुकसान भी होता है।

    पर हम में से शायद कम ही लोग जानते हैं, की अतिरिक्त गुस्सा करने से दिमागी सन्तुलन और मस्तिष्क का संचालन भी बिगड़ सकता है।

    गुस्से और उत्तेजना की वजह से दिमाग में सेरोटोनिन की मात्रा में कमी आती है; ये सेरोटोनिन हमें शांत और खुशहाल रखने में मदद करता है, ये पदार्थ तनाव और निराशा से लड़ने में मददगार होता है जो अतिरिक्त गुस्सा करने से प्रभावित होता है।

     

    अमरीका में हुए एक रिसर्च द्वारा लैब में देखा गया है, जब चूहों को दूसरे समजातीय जीव पर आक्रमण करने का मौका दिया गया, तो शुरुआत में उनकी उत्तेजना कम मात्रा में थी, जो धीरे धीरे बढ़ती गयी और वे अधिक आक्रामक होते गये, इस दौरान उनके दिमाग में सेरोटोनिन की मात्रा की जांच की गयी, और यह साबित हुआ, की इस पदार्थ की मात्रा में कमी आयी है, जिसकी वजह से उनमें क्रूरता बढ़ती गयी।

    शिकागो में हुए रिसर्च द्वारा ये भी पता चलता है, की कम उम्र के लोगों में गुस्सा जल्दी आता है, खूनी और अपराधियों में भी इस सेरोटोनिन का परिमाप सही रूप से नहीं रहता जिसकी वजह से उनका मस्तिष्क सही रूप से काम नहीं करता, उन्हें क्रोध भी दूसरों से ज़्यादा आता है।

    गुस्से को कम ना करने से मस्तिष्क की कार्य विधि में फर्क आता है, और इसके कारण आप और भी हिंसक बन जाते हैं।

     

     इस प्रवृत्ति को कम करने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

    1. हर दिन सुबह १५ मिनट प्राणायाम कीजिये; अच्छे-बुरे ख़याल आएंगे, पर आप उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें, उनमें ना उलझें।

    2. जब भी गुस्सा आये, कमरे में जा कर 'ॐ' शब्द का उच्चारण कीजिये, ये शब्द सार्वभौमिकता  का प्रतीक है, और इस शब्द में एक सकारात्मक ऊर्जा है, जो आपको शांत करती है, और मस्तिष्क में सेरोटोनिन की मात्रा को बढ़ाती है।

    3. अधिक पानी पियें।

    4. कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी एक प्रकार की काउंसलिंग है, जिससे आप गुस्से को काबू में ला सकते है; ये आप के भीतर के नकारात्मक चिंताओं को निकाल कर खुशहाली पैदा करती है।

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