कुल 169 लेख

  • 08 Nov
    eWellness Expert

    हर एक मन ख़ास है।

    refugees sharanarthee

     

    भेद- भाव हम हमेशा से देखते आये हैं, कभी ये भेद अमीर और गरीब के बीच होता है, तो कभी युवा और बुज़ुर्ग के बीच, कभी अच्छे और बुरे में, तो कभी गोर और काले में ।

    पर अब वक़्त आ गया है, कि हम इन भेद-भाव की दीवारों को तोड़ कर, एक दूसरे के प्रति सम्मान और आदर से पेश आएं।

     

    वहीं, जब मानसिक स्वास्थ्य या काउंसलिंग उच्च समाज में प्रधान रूप से चर्चा में था, जिसका लाभ सिर्फ कुछ प्रभावशाली लोग ही उठा सकते थे, आज हमें इसे आम जनता में भी प्रचलित करना पड़ेगा।

     

    जैसे दाल-रोटी के बिना ज़िन्दगी नहीं चल सकती, उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य का ख़याल रखना भी अनिवार्य है, क्योंकि हर एक मन ख़ास है। हर किसी को खुश रहने का अधिकार है। हम सभी इंसान है और इस धरती पर जीते हैं, इसलिए हमसे स्वस्थ्य रहने का हक़ कोई नहीं छीन सकता, एक अच्छे जीवन का हक़ सभी को है।

     

    समाज में चल रहे भेदभाव से ही बहुत ज्यादा नकारात्मक शक्ति या नेगेटिविटी वातावरण में फैलती है, और इससे इंसान के मानसिक संतुलंत को काफी हानि होती है।

     

    गरीबी, समाज का कलंक है। आर्थिक संकट में भेद-भाव से जज़्बाती प्रक्रियाओं पर गहरा असर होता है, और यही बहुत से मानसिक रोगों का कारण होता है।  वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन , के कथन "ब्रिजिंग द गैप्स " में बताते हैं कि समाज में अतिरिक्त गरीबी, और पैसे की तंगी ही सबसे घातक स्थिति होती है।

    अर्थाभाव, दुःख और तकलीफ, परेशानी का कारण होते हैं, जिससे होती है निराशा। हर देश की सरकार का ये उत्तर दायित्व है, कि वे अपने हर नागरिक की पूर्ण रूप से देखभाल करें, उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का ख़याल रखें।

     

    शरणार्थी, या जिन्हें ज़ोर-ज़बरदस्ती अपने घर से निकाला जाता है, उनके दिमाग पर हमेशा डर और आतंक का साया रहता है। वे पहचान होने के डर से दर बदर दिशाहीन घूमते हैं, और ऐसे में हमारा समाज इनका साथ देने के बजाए इन्हें और पीड़ा देता है।

     

    सीरिया में चलते राजनीतिक मतभेदों से, लगभग दो लाख जानें गयी, और ४.८ मिलियन नागरिकों को अपना घर छोड़ना पड़ा, और हालात ये है, कि वे आज भी शरणार्थियों की तरह इधर-उधर भटक रहे हैं। इंटरनेशनल मेडिकल कॉर्प्स नामक एक संस्था ने इनका ज़िम्मा उठाया है। देखा गया है, इन शरणार्थियों में ३१% मानसिक रोग के शिकार हैं, २०% निराशा और चिंता से पीड़ित हैं, और लग भग १०% स्किज़ोफ्रेनिआ के रोगी हैं।  इस संस्था ने इनकी जांच करने के लिए अपने टीम में लोगों को औपचारिक रूप से तैयार किया है, ताकि वे इन शरणार्थियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ख़याल रख सखे।

    पाकिस्तान में भी अफ़ग़ान शरणार्थियों को जिस दर्द और तकलीफ का सामना हर रोज़ करना पड़ता है, वह सोच से परे है।  अगर वे पुलिस को घूस नहीं दे पाते तो उन्हें हमेशा दर के साये में जीना पड़ता है। और इस सब का गहरा असर पड़ता है बच्चों पर, जो मासूम हैं, और जिनका मानसिक विकास अभी बाकी है।  तो हम हमारे बच्चो को ये कैसा समाज दे रहे है? ये कैसा घर है, जिसमें वह सुरक्षित नहीं है? क्या हम उन्हें जातिवाद और भेदभाव ही सिखा रहे हैं? क्या इंसान की ज़िन्दगी का कोई मोल नहीं?

    हिंसा और डर को सामने देखते हुए, ये बच्चे घबराहट और डर के साये में जीना सीखते हैं।

    ये तो अंतर्राष्ट्रीय समस्या है, रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में ताकेंगे तो नज़र आएगा कि कितना भेदभाव हम खुद रोज़ करते हैं।  हमें इंसानो को मोटा, पतला, नाटा, 'नीग्रो' और 'चिंकी' जैसे नाम से बुलाने में  बहुत मज़ा आता है। अपने अंदर की दुर्बलता को ढकने के लिए हम दूसरों पर ऊँगली उठाते हैं।  ये सिर्फ शर्मनाक ही नहीं, दूसरे के लिए अपमानजनक है, इससे हमारा मानसिक स्वास्थ्य भी पीड़ित होता है, और दूसरे का भी।

    आज भी जातिवाद के नाम पर भेदभाव होते हैं, और भिन्न मत रखने वाले को मौत का तोहफा मिलता है।  ये एक सामाजिक कलंक है।  इंसान के मन पर इसका गहरा असर होता है।  वह चिंता में जीता है, और प्रेमभाव से विमुख हो जाता है।

    ये हम सब का दायित्व है, कि हम एक स्वस्थ्य समाज की स्थापना करें। एक दूसरे का आदर और सम्मान करें।  जितना हम अपने मन के बारे में सोचते हैं, उतना ही दूसरों के बारे में भी सोचें।  तभी एक स्वच्छ भारत का निर्माण हो सकता है। समान अधिकार, समान इज़्ज़त सब को मिलनी चाहिए, क्यों कि हर एक मन ख़ास है।

     

  • 01 Nov
    eWellness Expert

    अनचाही आलोचना का सामना कैसे करें?

     

    unsolicited criticism

     

    "रोबर्ट, कैसे हो तुम? बहुत अच्छे तो नहीं दिखते! ये कैसे कपड़े पहने है तुमने? ये टोपी बिलकुल मेल नहीं खाती। कल मैंने तुम्हारे लेख को पढ़ा, कुछ ख़ास नहीं लिखा है तुमने। बहुत ही साधारण सा ज्ञान मिलता है उससे। लगता नहीं, कि स्कूल की मैगज़ीन के लिए तुम्हारा लेख चुना जाएगा। "

    ये हमारी ज़िन्दगी में आम बात है। हमारे दोस्त, परिजन, और जिनसे हम मिलते हैं, वक़्त बेवक्त काम की निंदा, आलोचना करके मुफ्त की सलाह देते हैं। ये बातें हमें गुस्सा और दुःख देती हैं, परेशान करती हैं। हमें लगता है, कि वे बिना अधिकार चर्चा कर रहे हैं। "तुमसे सलाह, मांगी है क्या किसी ने? कुछ अच्छा नहीं बोल सकते, तो मुंह बंद भी नहीं रख सकते क्या!' अकसर ऐसे ख़याल आते है। और इस तरह परेशान होने से, हमारी मानसिक स्थिति पर भी असर होता है।

    तो ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे, जिससे अनचाही आलोचना आपको ज्यादा परेशान ना करें?

     

    1. आलोचना से खुद को दबने ना दें- 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना', अकसर अनचाही आलोचना को इसी तरह से नकारना होगा आपको। निंदा से दुखी हो कर, मायूस हो कर कोई फायदा नहीं। उसे सीखने का माध्यम बना सकते हैं, या फिर अगर कोई आपकी झूठ-मूठ निंदा कर रहे हैं, तो सिर्फ नज़रअंदाज़ करना सीखें। उनके कठोर वचनों से डर कर, घबरा कर, बेहतर करने की इच्छा को ना मिटने दें।

     

    1. जो आपकी निंदा कर रहे हैं उन्हें शत्रु ना समझें - जो आपसे रोज़ मिलते हैं, वे आपके मित्र या परिजन हैं, शुभचिंतक भी हो सकते हैं। क्योंकि वे आपके काम पर आलोचना कर रहे है, इसका अर्थ ये नहीं कि वे आपके दुश्मन हैं। अकसर हम खुद को एक तरफ करके, बाकी सब को 'दूसरे' की नज़र से तौलते हैं, जैसे वे हमारे दुश्मन हैं, हमारी निंदा कर रहे हैं, हमारे लिए बुरा सोच रहे हैं। ये सही नहीं है, इससे आपके व्यक्तिगत रिश्तों पर असर पर सकता है।

     

    1. आपसे गलती हो सकती है- हम सभी गलती करते हैं। आपसे भी गलती हुई होगी ऐसा मान कर चलें। अनचाही आलोचना को खुश हो कर स्वीकारें, और उन बातों को ध्यान में रख कर काम को और बेहतर बनाने की कोशिश करें।

     

    1. औरों के प्रति सहानुभूतिशील रहे- अगर कोई आपकी निंदा कर रहा है, ज़रूरी नहीं उसकी हर बात सही हो, लेकिन वह ऐसा क्यों कर रहा है, ये समझने की कोशिश करें। हो सकता है, कि वे खुद परेशानी या निराशा में है, और खुद को संतुष्ट करने के लिए वे आप में खामियां निकाल रहा है। वे आपके दोस्त या रिश्तेदार ही हैं, तो उनके हमदर्द बने रहें। उनकी मानसिकता को समझें।

     

    1. आलोचना के डर से लोगों से बातचीत बंद ना करें- अकसर जो स्वयं की निंदा नहीं बर्दाश्त कर पातें, वे इस डर से लोगों से बातचीत बंद कर देतें है। ये सही नहीं है। इसका मतलब आप चिंता में हैं, अपने डर का सामना करें। लोग आप के बारे में बात करेंगे, ये स्वाभाविक है, अगर आप में कमी है, तो उसका भी सामना करें, इससे आपको लाभ होगा, अगर आप आलोचना से बचने की कोशिश करेंगे, तो कभी भी पूरा ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाएंगे।

     

    1. आप परफेक्ट नहीं हैं- कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं है, गलतियां सबसे होती है, और हम उनसे सीख ले कर खुद को बेहतरी की ओर ले जाते हैं। गलतियां करना बुरी बात नहीं, पर उनको पहचान कर उन्हें सुधारना ज़रूरी है। तो फिर करें #सच का सामना और आलोचना से सीख लें।

     

    अगर इन बातों को आप खुद में ला पाएंगे, तो खुश रहेंगे, और तरक्की करेंगे, और अनचाही आलोचना का सही रूप में सामना पाएंगे।

  • 23 Oct
    eWellness Expert

    कब समाज मनोवैज्ञानिक समस्या को स्वाभाविक रूप से स्वीकार करेगा ?


    world mental health day

    पिछले दिन मैं एक दोस्त से मिली, वह अभी एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है, उसका दिन शुरू होता है सुबह के ५ बजे और खत्म होता है रात के १.३० बजे, वह भी ऑफिस की ही एक मीटिंग के साथ। व्यस्त दिनचर्या की वजह से वह बहुत तनाव में रहती है।

    उसके घर से शादी के लिए दबाव है, लेकिन वह किसी को पसंद नहीं करती, इसलिए शादी में पड़ना नहीं चाहती। वहकाम के दबाव से भी काफी परेशान है, धीरे-धीरे उसे निराशा ने घेर लिया है.....

    "मुझे लग रहा है मैं निराशा में जी रही हूँ, कुछ करने का मन नहीं करता, उत्साह महसूस नहीं करती मैं, कभी कभी लगता है बस यू ही बैठी रहूँ, कभी लगता है भाग जाऊँ। मैं २८ की हूँ, पर अब भी सिंगल हूँ, कोई बॉय फ्रेंड नहीं है, और प्रेम दिवस के अवसर पर बहुत मायूसी होती है, जब मेरे दूसरे दोस्त व्यस्त रहते हैं। दुखी हो जाती हूँ मैं। ऊपर से काम का प्रेशर भी है, इतना लम्बा दिन रोज़ रोज़ झेलना मुश्किल हो रहा है, मैं हड़बड़ी में गलतियां कर रही हूँ, डांट पड़ रही है, और मैं हालात को सुधार नहीं पाती हूँ।  मुझे एक दोस्त या हमदर्द की जरूरत है, जो मेरी समस्या को समझे, लेकिन अपने निराशा और तनाव की बात मैं किसी से नहीं कह पा रही हूँ। ऊपर से यह बात अगर घरवालों को पता चले,  पड़ोसी और रिश्तेदारों को भी पता चले,तो वे मुझे अजीब नजरों से देखेंगे। मैं क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आता। "

    मेरी दोस्त बहुत परेशान है, मानसिक रूप से पीड़ित है, उसे मदद की ज़रूरत है, लेकिन समाज में गलत समझे जाने के कारण चुप है।

    ऐसे हम में से कईं हैं, जिन्हें मानसिक चिकित्सक की आवश्यकता है, लेकिन क्योंकि समाज में आज भी मानसिक समस्याओं को पागलपन समझा जाता है, वहां स्वाभाविक रूप से कोई इसके बारे में बात नहीं करता।

    लोग क्या कहेंगे, ये डर सब को लगता है।

    बदनाम होने के डर से कोई कुछ कहता नहीं, रोग, अपनी जगह सुरक्षित बैठा रहता है।

    आज कल सोशल नेटवर्क साइट पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर  चर्चा चल रही है|

     'मानसिक समस्या पागलपन नहीं है' ये वह, बहुत कुछ, सभी उस पर लाइक, कमेंट और पोस्ट भी करते हैं, लेकिन उसका प्रभाव ज़्यादा समय तक नहीं रहता। क्योंकि लोग बात को मानते नहीं।

    साल में एक दो दिन मानसिक स्वास्थ्य के लिए रखा गया है, जब सब मिलकर इसे त्यौहार की तरह मनाते है, वैसे आज कल हर एक बात के लिए एक ख़ास दिन है, फिर मानसिक स्वास्थ्य क्या ख़ास है?.......

    जो असल में चाहिए, वह इन सब औपचारिकता से बढ़ कर है, और वह है सामाजिक स्वीकृति।

    सर्दी ज़ुखाम को हम जैसे स्वाभाविक रूप से मानते हैं, और डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मानना पड़ेगा, कि निराशा, तनाव जैसी चीज़ें भी सामान्य अस्वास्थ्य का कारण है, और उनका इलाज करवाना होता है।

    समाज में मानसिक असन्तोष पर जो कलंक है, उससे समाज का ही नुकसान हो रहा है। लोग खुल कर समस्या बता नहीं पाते, और भविष्य में ये समस्या बहुत बढ़ जाती है, जिससे शारीरिक क्षति भी होती है।

    कितने लोग दुःख और तकलीफ में हैं पर बताना नहीं चाहते। ये उन्नति नहीं है, ये प्रगति नहीं है।

    कई सेलिब्रिटी सामने आ रहे हैं, दीपिका पदुकोने, इलियाना दे क्रूज़ और करण जोहर ने अपनी निराशा पर खुलासा किया, ताकि दूसरों को प्रेरणा मिल सके, अब बारी हमारी है, साधारण लोगों को भी हक़ है, उनका भी कर्तव्य है, कि वे अपनी कहानी को सामने लाएं और इस कलंक को मिटायें।

  • 19 Oct
    Oyindrila Basu

    क्या रोना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही है ?

    obama crying

     

     

    आपने अक्सर देखा होगा कि, जब भी कोई सड़क या बहुत लोगों के बीच रोता है, तो आपको लगता है, ज़रूर कोई गड़बड़ है। ज़रूर कुछ बहुत बुरा हुआ है, इसलिए या तो हम उसकी और रहम की नज़रों के साथ दौड़ कर उसके पास जाते हैं, या फिर उससे दूर ही रहना पसंद करते हैं।

    हमें रोना तब आता है, जब हम किसी वजह से अतिरिक्त दुखी होते हैं। आंसू जज़्बात का प्रकाश है। जब हम बहुत ज़्यादा जज़्बाती हो जाते हैं, तो आँखों में आंसू आते हैं, या ख़ुशी से या फिर गम से।

    पर लोग ये समझ नहीं पातें; सबके सामने रोना बुरी बात है, लोग इससे हम पर हसेंगे, ऐसा बचपन से बताया जाता है। "अच्छे बच्चे नहीं रोतें", या "लड़के रोते नहीं", और इस हिसाब से सभी, ख़ास कर मर्द समझते हैं, की रोना एक सामाजिक कलंक है।

    लेकिन कम लोग ही ये समझ पाते हैं, कि रोना एक जज़्बाती बहाव है, और इससे मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।

     

    रोने से दिमाग पर जज़्बातों का बोझ हल्का हो जाता है। आप के अंदर दबी शारीरिक अस्वस्थता बाहर आ जाती है, और इस कारण आप बाद में मानसिक रूप से स्वस्थ महसूस करते हैं।

    इसलिए किसी भी बड़े हादसे के बाद (जैसे किसी अपने की मृत्यु ) ये सुझाव दिया जाता है, कि आप ५ हिस्सों में अपने दुःख का निवारण करें, जी भर कर रो लें, तो हल्का महसूस करेंगे।

    इसके अलावा, आंसू हमारे आँखों को  साफ़ करता है। हर रोज़ हमारे आँखों में आंसू पैदा होते हैं, और किसी कारण उनका बहना भी ज़रूरी है, ताकि हमारे आँखों के कोने में जमी हुयी मैल इत्यादि साफ़ हो सखे।

    आँखों का स्नेहन करके, उन्हें सींच कर आंसू हमारी दृष्टि को स्वस्थ रखते हैं।

    यानी आंसू के हम पर कई अहसान है।

    मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए रोना ज़रूरी है।

  • 17 Oct
    eWellness Expert

    क्या आप रोज सुबह ईमेल चेक करते हैं ?

    man on a laptop

     

     

    अद्भुत है ये इन्टरनेट की दुनिया, यहां से दोस्त और दुश्मन साथ आते हैं।

    प्रगति इस प्रकार सफल है आज, की पूरे विश्व के साथ हम सम्पर्क कर सकते हैं, केवल अपने कंप्यूटर के माध्यम से। इन्टरनेट द्वारा लोगों से मेलजोल बनाये रखने को आज सोशल नेटवर्किंग कहा जाता है।

    इस क्षेत्र में सर्व प्रथम गूगल चैट और इ-मेल का इस्तेमाल किया जाता था।

    पर आज इ-मेल का इस्तेमाल काफी गम्भीर कामों में होता है। आजकल ज़्यादातर कर्म-क्षेत्र के मामलों में बातचीत करने के लिए इ-मेल व्यवहार में आता है। आधिकारिक कार्य के लिए भी इ-मेल को आदर्श माना जाता है। इस ख़ास पत्र माध्यम का उपकार तो बहुत है, पर साथ ही, ये मानसिक चिंता और तनाव का कारण भी  है।

    हर दिन ज़रूरी और व्यर्थ, दोनों प्रकार की कई मेल हमारे इ- मेल-बॉक्स मेंआती हैं, लेकिन इन्हें खोल कर पढ़ना ही हमारा दिन में पहला कर्तव्य हो जाता है।

    हर दिन सुबह उठकर हम देखते हैं की हमारा मेल-बॉक्स नए पत्रों से भर चुका है, हम उसे नकार नहीं सकते, कौन सा ज़रूरी है, कौन सा आधिकारिक, और कौन सा जरूरी नहीं है, ये जानने के लिए भी उन्हें पढ़ना ज़रूरी है, और इसमें बहुत वक़्त बर्बाद  होता है; खतरनाक बात तो ये है, की इससे हमारे मस्तिष्क पर दबाव पड़ता है, और हम तनाव के शिकार होते हैं। कैसे?

    एक नया मेल यानी एक और दाइत्व, जिस पर हमे वक़्त और मेहनत देना होगा, यानी मानसिक दबाव।

    ऊपर से मैं अगर सुबह उठकर देखूं, कि मेरे ऑफिस से १० नए मेल आये हैं, तो स्वाभाविक रूप से मुझे चिंता होती है, "क्या मैंने कुछ गलत किया?", "क्या वक़्त पर कुछ जमा करना था जो मैं भूल गयी?", "क्या ये मेल मुझे याद दिलाने के लिए है?", "क्या ऑफिस के लोग मुझसे असन्तुष्ट हैं?", "क्या मेरी नौकरी चली जायेगी?", आप देख सकते हैं, हमारे सोच की गति-विधि किस प्रकार बढ़ती है। नौकरी की चिंता यानी हम अधिक तनाव में हैं, और इसका कारण है, आपके इनबॉक्स में नया मेल।

    बार बार मेल पर ध्यान देने से आपका वक़्त भी बर्बाद होता है, समय का काम समय पर नहीं होता।

    ये एक अजीब आदत भी बन सकती है।

    इस प्रकार अनावश्यक तनाव से खुद को कैसे बचाएंगे?

    • सुबह उठकर पहला काम मेल-चेक नहीं होना चाहिए। एक कप गरम चाय या कॉफ़ी लें, फिर अपने पसंदीदा कोई भी चीज़ पढें, खबर या फिर कोई किताब; वीडियो भी देख सकते हैं।

     

    • यह मान कर चलें की आप अधिक मेल आने को प्रगति में बाधक न मानें, हर चीज़ की एक अच्छी बात होती है, ज़्यादा आधिकारिक मेल, यानी ज़्यादा काम, और ज़्यादा जिम्मेदारी यानी आपकी नौकरी सुरक्षित है, है न? laughing जब किसी खराब चीज़ के लिए तैयार रहेंगे, तो वैसा होने पर झटका या परेशानी कम लगेगी। और अगर कम मेल आते हैं, तो फिर मज़े हैं, दबाव कम पड़ेगा।

     

    • पत्र पढ़ने से पहले परेशान ना हों।

     

    • हर सुबह प्राणायाम का अभ्यास करें। इससे चिंता कम करने में मदद मिलती है ।