• 22 Dec
    eWellness Expert

    क्या अतिरिक्त लाड प्यार से बच्चों का भविष्य नष्ट हो सकता है?

    working child and mental health counselling

     

     

    माता पिता हमेशा चाहते हैं, कि उनके बच्चे खुशहाल और समृद्ध रहें, उन्हें कोई कमी ना हो।

    अपने जीवन में कमी भले रही हो, लेकिन संतान के जीवन को वे हर सुख, सुविधा से पूर्ण करना चाहते हैं। और इसी ममता की भावना से उन्हें लगता है, कि कोई भी काम करने से बच्चों को कष्ट होगा, उन्हें शारीरिक तकलीफ पहुंचेगी।

    माता पिता, ख़ास कर भारत में अपने बच्चों को अतिरिक्त लाड प्यार देने की कोशिश करते हैं, विशेष रूप से, अगर उनका एक ही बच्चा हो।

    उसे कोई काम नहीं देतें, सच्चाई से दूर रखते हैं, वह जो चाहते हैं, जायज़ हो या नहीं, वह उसे लाकर देते हैं।

    कभी उन्हें समस्या का सामना करना ना पड़े, इस मनोभावना से बच्चों को कहीं भी आगे भेजते ही नहीं, कठिन काम की ज़िम्मेदारी माता पिता स्वयं लेते हैं।

    यहाँ तक कि, उम्र बढ़ने के बाद भी माता पिता का रवैया अपने बच्चों के प्रति समान रूप सम्वेदनशील रहता है।

    बच्चे के लिए सभी फैसले वे खुद लेना चाहते हैं, उन्हें लगता है, बच्चों को उतनी समझ नहीं है, वह सोचेंगे, फैसला लेंगे तो उन्हें दिक्कत होगी।

    बड़े हो जाने के बाद भी सन्तान को वास्तविकता से दूर रखना ही जैसे माता पिता का धर्म है, ऐसा समझते हैं।

    भारत में आज भी, बच्चा बड़ा हो जाने के बाद भी, माँ उसे उसके बचपन के नाम से ही पुकारती है, उसे महसूस ही नहीं होने देते, कि वह बड़ा हो चुका है।

    ये केवल ममता है, ऐसा कहना सही नहीं होगा, इसके साथ एक मानसिक सोच जुडी होती है, अकसर माता-पिता को लगता है, कि उनके बच्चों पर उनका अधिकार है, और जब तक वे उन पर निर्भर करेंगे, स्वतंत्र नहीं होंगे, तब तक ये अधिकार बना रहेगा।

    अगर बच्चों ने खुद अपना सारा काम करना शुरू कर दिया, तब उन्हें माता पिता की ज़रूरत नहीं होगी, और वे उनका ख्याल नहीं रखेंगे, ऐसी चिंता से भी माता-पिता अपने बच्चों के प्रति रक्षात्मक बनते हैं।

     

    atirikt laad pyaar

    लेकिन क्या इस प्रकार बच्चों की भलाई होती है?

    ऐसे लाड प्यार और क्रूर सचेतन भाव से बच्चों पर गलत असर पड़ता है।

    वे केवल मांगने वाले दरिंदे बनते हैं, दान की भावना तो उनमें होती नहीं।

    वे स्वार्थी बन जाते हैं, भविष्य में यही बच्चे हर जगह अपना रुतबा जमाने की कोशिश करते हैं, सोचते हैं, जैसे उनके माता-पिता ने उनकी हर ख्वाहिश को सराहा, हर जगह सभी उनकी बात मानेंगे, सही गलत नहीं बताएंगे, पर ऐसा नहीं होता। ऐसे बच्चे लोभी होते हैं, चीज़ की कीमत उन्हें कभी नहीं होती, केवल खर्चा करना ही उनकी आदत बन जाती है।

    ऐसे लोग बड़े होने के बाद भी दुर्बल रह जाते हैं, कोई भी काम वे मदद के बगैर नहीं कर पाते, घर साफ़ करना, खाना पकाना, बाजार में सामान खरीदना इत्यादि रोज़ के काम जिन्होंने कभी किया  ही नहीं, वे इन सब कार्यों से दूर ही रहते हैं, और जब इन्हें कहीं बाहर जाकर पढ़ाई या नौकरी करनी पड़ती है, तब  यह सब उन्हें तकलीफ नज़र आती है।

    सच्चाई और वास्तविकता से ये बहुत दूर रहते हैं। भारत में हर काम के लिए कर्मी या नौकर हमें कम दाम में मिल जातें है, इसलिए अपना हल्का सामान भी कोई खुद नहीं उठाता, बच्चे को भी नहीं उठाने देते, कुली बुला लेते हैं। पर दूसरे देश में ऐसा नहीं होता, सबको अपना काम खुद ही करना पड़ता है, तब जाकर इन बच्चों को मुश्किल होती है, क्योंकि ना उन्हें आदत है, ना इच्छा।

    बच्चों को प्यार देना ज़रूरी है, पर सही शिक्षा भी ज़रूरी है। ममता अगर अंधी हो जाए, तो बच्चों के भविष्य के लिए सही नहीं।

    हर बच्चे को सक्षम बनाना ही माता-पिता का कर्तव्य है, ना कि उनसे ज़िम्मेदारी चुराना। उन्हें वास्तविकता का सामना करवाना भी माता-पिता का कर्तव्य है, ताकि आगे चलकर उन्हें कोई समस्या ना हो। चीज़ और अर्थ की कदर करना हर बच्चे को सीखना चाहिए।

    माता-पिता को ही सब सिखाना चाहिए, क्योंकि बच्चे माँ-बाप की आँखों से ही दुनिया देखते हैं, उनसे ही सब सीखते हैं, इसलिए दायित्व पूर्ण परवरिश अति आवश्यक है।

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  • 24 Nov
    eWellness Expert

    अगोराफोबिया- डर का सामना कैसे करेंगे?

     agoraphobia


    फोबिया का मतलब है भय, या डर। कई तरह के डर हम में होते हैं। जैसे कॉकरोच का डर, छिपकली का डर, ऊँची जगह का डर वगैरा-वगैरा। पर ये साधारण व्यवहार है, जो हम रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में करते हैं, और इसे फोबिया या कोई मानसिक समस्या के हिसाब से नहीं जानते। पर इनकी जड़ों को जानना ज़रूरी है,तभी इनकी सही चिकित्सा हो सकती है।


    आज हम 'अगोराफोबिया' पर बात करेंगे, जो आतंक विकार के नाम से पहचाना जाता है। कई बार ज्यादा भीड़ में जाने से यह विकार देखा जाता है, कुछ लोगों में, जैसे एयरपोर्ट, बाज़ार, मॉल जैसी जगह पर ये विकार अधिक होता है ।

    उन्हें अचानक पैनिक होने लगता है, और इसके लक्षण हैं, पसीना आना, दिल का ज़ोर से धड़कना, कँपकँपी होना, उल्टी की संभावना, सर घूमना, इत्यादि। इस रोग में इंसान ऐसी जगह पर खुद को असुरक्षित महसूस करता है।


    'अगोराफोबिया', ये नाम, ग्रीस के एक मनो वैज्ञानिक, कार्ल फ्रेडरिच ने रखा था, जिस में, 'अगोरा' का मतलब है, 'जन बहुल इलाका/बाज़ार' और 'फोबिया' मतलब 'भय' .


    ये विकार ज्यादा तनाव के कारण हो सकता है, या फिर किसी और रोग के दुष्प्रभाव से भी हो सकता है। कई बार अधिक नींद की गोलियों के सेवन से भी ये रोग हो सकता है।


    इससे कैसे लड़ेंगे?


    1. अपने डर से दूर रहना, समाधान नहीं है। हम अपने दिमाग में पैदा हुए खतरे से बचने के लिए, सुरक्षा के उपाय ढूंढ़ते हैं, पर ये सुरक्षा एक छलावा है, क्योंकि ये उपाय हमें सुरक्षा नहीं दे सकते, क्योंकि ये खुद समस्या का हिस्सा है, और इन पर अमल करना मतलब, अपने डर को बढ़ावा देना है।

    2. अगर आपको सड़क यातायात से डर लगता है, तो 2 मिनट की चलन को बचाने के लिए, गाड़ी न निकालें, सड़क पार करने का अभ्यास करें। ट्रैफिक सिगनल का ध्यान रखें, खुद को और तत्पर बनाएं।

    3. मनो रोग विशेषज्ञ की मदद अवश्य लें, ये न सोचें कि एक दिन में आपका डर दूर हो जाएगा, वे आपको आपके डर का सामना करने में, आपकी सहायता करेंगे।
    कोशिश आप से ही शुरू होगी। जब आप अपने डर पर काबू पाएंगे, तब एक अद्भुत आत्मविश्वास महसूस करेंगे आप। एक विजयी भाव का आनंद उठा पाएंगे।

  • 18 Nov
    eWellness Expert

    करियर काउंसलर का महत्व।

     

    career counseling

     

     

    जब मैं स्कूल में थी, तब ग्यारहवीं क्लास में सब्जेक्ट सिलेक्शन के वक़्त बहुत उलझन में थी। हयूमैनिटिज़ में मुझे रुचि थी, लेकिन केवल अंग्रेजी के विषय में मैं माहिर थी, ऊपर से मेरे सारे दोस्त विज्ञान के भाग में जा रहे थे।

    मुझे क्या करना चाहिए, कौन से विषय में पढ़ाई करने से भविष्य बेहतर हो सकता है, समझ में नहीं आ रहा था। तब मेरे भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर ने मुझे समझाया, कि स्कूल खत्म होने तक, विज्ञान का माध्यम बेहतर होगा, कॉलेज में मुझे जो भी अच्छा लगे वह पढ़ सकती हूँ। इस सहायता की ज़रूरत हम सब को है।

    सभी शिक्षार्थी जब कॉलेज में दाखिल होते हैं, वह चाहते हैं की सबसे अच्छे  सब्जेक्ट पर पढ़ाई करें, ताकि भविष्य में कोई समस्या ना हों। और यह निर्णय लेने में हमारी सहायता करते हैं एक उत्कृष्ट काउंसलर या सलाहकार।

    स्कूल और कॉलेज के छात्रों में और भी कई मानसिक समस्या देखी जाती है, जिनका हल सिर्फ एक अच्छा सलाहकार ही ढूंढ सकता है।

     

    १. एक अच्छा काउंसलर आपको पूर्ण रूप से जानने के लिए आप से व्यक्तिगत सवाल भी पूछेंगे, और इस प्रकार आप खुद को भी बेहतर जान पाएंगे। आपके परिवार, स्कूल, कॉलेज, सम्पर्क, दोस्त इत्यादि से जुडी हर बात काउंसलर जानना चाहेंगे, ताकि आपकी समस्या की जड़ पता चले।

     

    २. एक काउंसलर का काम है, आपकी रुचि को समझना, साथ-साथ, आपकी प्रतिभा को जान कर बढ़ावा देना।

     

    ३. एक काउंसलर आपको किस प्रकार की नौकरी करनी चाहिए, इसकी सलाह भी देते हैं, एक विशेष प्रकार की नौकरी के फायदे और नुक्सान आपके समक्ष रख कर आपको निर्णय लेने में मदद करते हैं।

     

    ४. एक करियर काउंसलर का काम केवल आपका भविष्य सवारना ही नहीं है, वह मानसिक रूप से भी आपकी मदद करते हैं। आप अगर किसी समस्या में हैं, तो उसको समझकर उसका समाधान एक मानसिक सलाहकार का काम है।

     

    इस हिसाब से एक काउंसलर का काम है-

    १. आप में आत्मविश्वास जगाना।

    २. आप की प्रतिभा पर रोशनी डाल कर आपको उस ओर प्रोत्साहित करना।

    ३. आपका मनोबल बढाना।

    ४. आपके भविष्य के लिए सबसे सही निर्णय बताना।

    ५. सही नौकरी की चुनौती में मदद करना, ताकि आपको काम में संतुष्टि भी मिले और आर्थिक रूप से सुरक्षा भी मिले।

    ६. आपको भविष्य में आर्थिक सुरक्षा का अर्थ समझाना।

    ७. आपकी महत्वाकांक्षा को हासिल करने में आपकी सहायता करना।

     

    मानसिक सलाहकार केवल छात्र और उम्मीदवार को ही नहीं, उनके परिवार की भी मानसिक रूप से मदद करते हैं, ताकि वे अपने बच्चों को समझ पाएं, और अपने विचार उन पर ना रखें। इस प्रकार पूर्ण रूप से एक इंसान की सहायता एक करियर काउंसलर करता है, ताकि सक्षम रूप से, परिवार की स्वीकृति से वह अपने इच्छाओं को पर दे सके ।

  • 17 Nov
    Oyindrila Basu

    क्या है डोनाल्ड ट्रम्प की सफलता का राज ?

     

    donald trump

    हाल ही में अमरीका के प्रेसिडेंटियल इलेक्शन्स का अंत हुआ। लोगों की बढ़ती  उत्तेजना का भी अंत हुआ, कौन जीतेगा इस टेंशन का निष्काशन हुआ, जब डोनाल्ड ट्रम्प की विजय हुई।

    कई ने इस बात की काफी निंदा की, कि ट्रम्प जैसे इंसान को वो अपना राष्ट्रपति नहीं मानेंगे,  पर एक बार हो चुका फैसला स्थाई होता है।

    डोनाल्ड ट्रम्प, आज कई दिनों से चर्चा में हैं, अपने अजीबोगरीब  उक्ति और हैरतंगेज़ हरकतों के लिए।

    ये इंसान इंसानियत के खिलाफ है, ऐसा कहना है लोगों का, वह महिलाओं की इज़्ज़त नहीं करता, ऐसा भी मानते हैं लोग, लेकिन अंत में जीत इस आदमी की हुयी, और इससे साबित होता है कि, चर्चा और आलोचना जैसी भी हो, अच्छी हो या बुरी, चर्चा होना ही अहम है, लोग आपको भूल ना सके यही ध्यान रखना होता है।

    अमरीका में कुछ लोगों का ये भी कहना है, कि ट्रम्प नें उनके अंदर छिपी प्रतिभा को बाहर लाने में मदद की है।

    सही मूल्य की बात तो ये है, कि डोनाल्ड ट्रम्प ने जो करना चाहा, उसमें सफल हुए। जीत उनकी हुयी।

    हर काम को सफल करने के पीछे क्या राज़ है?

    कुछ लोगों का मानना है, कि डोनाल्ड ट्रम्प अपने अवचेतन मन की शक्ति का सदुपयोग करते हैं और उसी कारण उनको सफलता मिलती है।

    आईये देखते हैं कि, ट्रम्प ने और क्या क्या किया है जिसकी  वजह से वह चर्चा में रहे-

    tour de trump

    टूर दे ट्रम्प- ट्रम्प ने यूरोपियन साइकिल रेस के आधार पर अमरीका में एक रेस का आयोजन किया और नाम दिया अपने नाम पर। ये बहुत मशहूर हुआ था।

    ट्रम्प ने अपने बालों का सौदा भी कर दिया एक डब्लू डब्लू इ चैंपियनशिप के लिए।

    वह इतने मशहूर हुए कि डोनाल्ड ट्रम्प के एक्शन फिगर्स अमेज़न पर अच्छे भाव में बिकने लगे ।

    और इसी वजह से उन्हें सफल कहा जा सकता है।

    अवचेतन मन की ताक़त अधिक होती है, और ये सफलता की ओर पहुँचने में  काफी सहायक होते है।

    उद्देश्य और लक्ष्य को स्थिर रखें- आप चाहते क्या हैं, वह सही रूप से पहचाने। कौन सा काम आपको बेहतर लगता है, किस्में आप माहिर है, आपका उद्देश्य क्या है, यह सुनिश्चित करना जरूरी है।

    अवचेतन मन में कई चिंता और अनुभूति होती है, जिसे सही दिशा देने से आपको तरक्की मिल सकती है।

    अपने आप पर भरोसा करना ज़रूरी है। खुद पर संदेह ना करें। अगर किसी काम में आप असफल हुए, तो अपनी गलतियों को सुधारने के लिए उस पर काम करें, गलती कहाँ हुयी, उसको ढूंढे।

    अवचेतन मन आपके रोज़ के जीवन में बदलाव ला सकता है।

    आप अंदर से कैसा महसूस करेंगे, यह आप पर निर्भर करता है। कोई भी चीज़ अच्छी या बुरी नहीं होती, आप किस प्रकार अपना नजरिया बनाते हैं, वह सुनिश्चित करता है, आप कैसा महसूस करेंगे।

    अवचेतन मन को उत्साहित करने के लिए आपको रोज़ के रूटीन में कुछ परिवर्तन लाना ज़रूरी है, खुदको सरप्राइज दीजिये। आप कुछ-कुछ नया काम रोज़ करते रहें।

    मैडिटेशन का अभ्यास करें।

    मनोबल को स्थिर करके, लक्ष्य साधन करके, अगर आप खुद पर भरोसा करेंगे, तो आपके अवचेतन मन की शक्ति को स्फूर्ति मिलेगी, और सकारात्मक सोच का प्रसार होगा, और इससे आपकी मानसिकता और बेहतर होती जायेगी।

     

  • 08 Nov
    eWellness Expert

    हर एक मन ख़ास है।

    refugees sharanarthee

     

    भेद- भाव हम हमेशा से देखते आये हैं, कभी ये भेद अमीर और गरीब के बीच होता है, तो कभी युवा और बुज़ुर्ग के बीच, कभी अच्छे और बुरे में, तो कभी गोर और काले में ।

    पर अब वक़्त आ गया है, कि हम इन भेद-भाव की दीवारों को तोड़ कर, एक दूसरे के प्रति सम्मान और आदर से पेश आएं।

     

    वहीं, जब मानसिक स्वास्थ्य या काउंसलिंग उच्च समाज में प्रधान रूप से चर्चा में था, जिसका लाभ सिर्फ कुछ प्रभावशाली लोग ही उठा सकते थे, आज हमें इसे आम जनता में भी प्रचलित करना पड़ेगा।

     

    जैसे दाल-रोटी के बिना ज़िन्दगी नहीं चल सकती, उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य का ख़याल रखना भी अनिवार्य है, क्योंकि हर एक मन ख़ास है। हर किसी को खुश रहने का अधिकार है। हम सभी इंसान है और इस धरती पर जीते हैं, इसलिए हमसे स्वस्थ्य रहने का हक़ कोई नहीं छीन सकता, एक अच्छे जीवन का हक़ सभी को है।

     

    समाज में चल रहे भेदभाव से ही बहुत ज्यादा नकारात्मक शक्ति या नेगेटिविटी वातावरण में फैलती है, और इससे इंसान के मानसिक संतुलंत को काफी हानि होती है।

     

    गरीबी, समाज का कलंक है। आर्थिक संकट में भेद-भाव से जज़्बाती प्रक्रियाओं पर गहरा असर होता है, और यही बहुत से मानसिक रोगों का कारण होता है।  वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन , के कथन "ब्रिजिंग द गैप्स " में बताते हैं कि समाज में अतिरिक्त गरीबी, और पैसे की तंगी ही सबसे घातक स्थिति होती है।

    अर्थाभाव, दुःख और तकलीफ, परेशानी का कारण होते हैं, जिससे होती है निराशा। हर देश की सरकार का ये उत्तर दायित्व है, कि वे अपने हर नागरिक की पूर्ण रूप से देखभाल करें, उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का ख़याल रखें।

     

    शरणार्थी, या जिन्हें ज़ोर-ज़बरदस्ती अपने घर से निकाला जाता है, उनके दिमाग पर हमेशा डर और आतंक का साया रहता है। वे पहचान होने के डर से दर बदर दिशाहीन घूमते हैं, और ऐसे में हमारा समाज इनका साथ देने के बजाए इन्हें और पीड़ा देता है।

     

    सीरिया में चलते राजनीतिक मतभेदों से, लगभग दो लाख जानें गयी, और ४.८ मिलियन नागरिकों को अपना घर छोड़ना पड़ा, और हालात ये है, कि वे आज भी शरणार्थियों की तरह इधर-उधर भटक रहे हैं। इंटरनेशनल मेडिकल कॉर्प्स नामक एक संस्था ने इनका ज़िम्मा उठाया है। देखा गया है, इन शरणार्थियों में ३१% मानसिक रोग के शिकार हैं, २०% निराशा और चिंता से पीड़ित हैं, और लग भग १०% स्किज़ोफ्रेनिआ के रोगी हैं।  इस संस्था ने इनकी जांच करने के लिए अपने टीम में लोगों को औपचारिक रूप से तैयार किया है, ताकि वे इन शरणार्थियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ख़याल रख सखे।

    पाकिस्तान में भी अफ़ग़ान शरणार्थियों को जिस दर्द और तकलीफ का सामना हर रोज़ करना पड़ता है, वह सोच से परे है।  अगर वे पुलिस को घूस नहीं दे पाते तो उन्हें हमेशा दर के साये में जीना पड़ता है। और इस सब का गहरा असर पड़ता है बच्चों पर, जो मासूम हैं, और जिनका मानसिक विकास अभी बाकी है।  तो हम हमारे बच्चो को ये कैसा समाज दे रहे है? ये कैसा घर है, जिसमें वह सुरक्षित नहीं है? क्या हम उन्हें जातिवाद और भेदभाव ही सिखा रहे हैं? क्या इंसान की ज़िन्दगी का कोई मोल नहीं?

    हिंसा और डर को सामने देखते हुए, ये बच्चे घबराहट और डर के साये में जीना सीखते हैं।

    ये तो अंतर्राष्ट्रीय समस्या है, रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में ताकेंगे तो नज़र आएगा कि कितना भेदभाव हम खुद रोज़ करते हैं।  हमें इंसानो को मोटा, पतला, नाटा, 'नीग्रो' और 'चिंकी' जैसे नाम से बुलाने में  बहुत मज़ा आता है। अपने अंदर की दुर्बलता को ढकने के लिए हम दूसरों पर ऊँगली उठाते हैं।  ये सिर्फ शर्मनाक ही नहीं, दूसरे के लिए अपमानजनक है, इससे हमारा मानसिक स्वास्थ्य भी पीड़ित होता है, और दूसरे का भी।

    आज भी जातिवाद के नाम पर भेदभाव होते हैं, और भिन्न मत रखने वाले को मौत का तोहफा मिलता है।  ये एक सामाजिक कलंक है।  इंसान के मन पर इसका गहरा असर होता है।  वह चिंता में जीता है, और प्रेमभाव से विमुख हो जाता है।

    ये हम सब का दायित्व है, कि हम एक स्वस्थ्य समाज की स्थापना करें। एक दूसरे का आदर और सम्मान करें।  जितना हम अपने मन के बारे में सोचते हैं, उतना ही दूसरों के बारे में भी सोचें।  तभी एक स्वच्छ भारत का निर्माण हो सकता है। समान अधिकार, समान इज़्ज़त सब को मिलनी चाहिए, क्यों कि हर एक मन ख़ास है।

     

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