• 02 Aug
    Nandini Harkauli

    समय सारे घाव भर देता है।

    time heals wound

    बचपन से हमें सिखाया जाता है कि यदि आप समय बर्बाद करते हैं, तो समय भी आगे जाकर आपको बर्बाद कर देगा। यह बात ध्यान में रखते हुए हम समय का सम्मान करते हैं।  हालांकि आज मैं समय के एक और पहलू के बारे में बात कर रही हूँ।

    यह सच है कि, समय हर घाव को ठीक कर सकता है, यह हमेशा कहा जाता है कि सब कुछ पूर्वनिर्धारित समय पर या सही समय पर होता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि, किसी प्रियजन के लिए अपना समय निकालने से, उनके घाव तुलनात्मक रूप से अधिक जल्दी भरते हैं।

     

    यह हम में से ज्यादातर के साथ, बल्कि हम सभी के साथ होता है।  हम अपनी दिनचर्या में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमारे आस-पास जो लोग हैं, उन्हें समय देने के बारे में भूल जाते हैं।

    जब आप किसी को अपना समय देते हैं तो आप उन्हें बहुत अनमोल तोहफा दे रहे हैं, क्योंकि बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता है, और यह रिश्ते में नई जान डालने का काम करता है। आजकल पैसा हर चीज़ बन गया है क्योंकि हम इसके बिना जीवित नहीं रह सकते हैं, लेकिन हमारे रिश्तों का क्या, हम उन्हें बनाए रखने का प्रयास बंद क्यों कर देते हैं।

    इससे कई मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। मनुष्य सांस लेती, भावनाओं से भरी जीवित कठपुतलियों की तरह हैं, इन भावनाओं को संजोने और जीवित रखने की ज़रूरत है, लेकिन धन और करियर बनाने की अंधी दौड़ में हम इन भावनाओं को अनदेखा कर देते हैं। एक बिन धूप और पानी के पौधे की तरह, रिश्ते भी ध्यान नहीं दिए जाने पर मुरझा जाते हैं।

    यहाँ बात नज़रअंदाज़ करने की नहीं है, किसी को अनदेखा करने और समय ना दे पाने में थोड़ा अंतर है।  काम का दबाव और कार्यस्थल में प्रतिद्वंद्विता व्यक्ति की पूरी एकाग्रता, सफलता पाने की ओर केंद्रित कर देती है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी हम जीवन में रिश्तों की अहमीयत भूल जाते हैं। हम कब अपने प्रियजनों से दूर हो जाते हैं ,पता भी नहीं चलता।

    आपको किसी व्यक्ति को, आपके ज़िन्दगी में उनके महत्व का एहसास दिलाने के लिए उनके साथ दिन में 24 घंटो बैठकर बात करने की ज़रूरत नहीं है, केवल कुछ ही पल जादू कर सकते हैं। कभी-कभी स्नेहपूर्वक ज़ोर से गले मिलना भी प्रभावशाली होता है।

    सभी व्यक्तियों को अपनी ज़िंदगी की बैटरी को फिर रीचार्ज करने की तरफ थोड़ा ध्यान देना चाहिए। आपके प्रत्येक रिश्ते को आपकी समान रूप से ज़रूरत है, चाहे आपका परिवार हो या आपके सहकर्मी।

    परिवार आपको प्रेरणा और सहकर्मी आपको स्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण प्रदान करते हैं। सहकर्मियों के साथ एक अच्छा संबंध आपको काम का बोझ महसूस नहीं होने देता।

    एक अच्छी टीम हिस्सा होना निस्संदेह उत्पादकता के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी बढ़ाती है। यही तथ्य परिवार के लिए भी सच है।

    परिवार एक व्यक्ति के जीवन में सबसे बड़ा सहारा है, जिससे हमे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह प्राप्त होता है। एक सकारात्मक वातावरण हमें मानसिक थकान से बचाने की शक्ति रखता है।

    मेरा सुझाव है कि कभी-कभी प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यस्त काम से समय निकालकर रिश्ते रूपी पौधे को सींचना और पोषित करना चाहिए। पूरे दिन के लंबे संघर्ष के बाद भी सुखी रहने का यह सबसे अच्छा उपाय है।

    यह आपके रिश्तों और करियर दोनो को ही संवार सकता है। परिवार जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंश है, यह हमें आगे बढ़ने और सफलता हासिल करने की शक्ति देता है।

    दिन के अंत में सभी व्यक्तियों को मानसिक शांति और शरीर के लिए आराम की आवश्यकता होती है, अपने प्रियजनों के साथ समय बिताने से यह कार्य बहुत आसान हो जाता है।

    आज के युग में हमारा शरीर एक मशीन बन गया है, और मशीन की भाँति इसे भी अच्छी तरह से देखभाल की ज़रूरत है, जिस तरह बैटरी बिजली से चार्ज होती है, हमे भी अपने मन और शरीर को चार्ज करने की आवश्यकता होती है, और हमारे प्रियजन यह बेहद अच्छे से कर सकते हैं।

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  • 02 Aug
    Nandini Harkauli

    मानसिक रोग और समाज की मानसिकता

    mental Illness

    रीमा को हमेशा से मानव मनोविज्ञान में बेहद रूचि थी। वह उच्च विद्यालय में इसे विषय के रूप में पढ़ने के लिए काफी उत्साहित थी। वह याद करती है --- "मैंने अपने विषय चयन के एक दिन पहले, रात को अपने माता-पिता के साथ मनोविज्ञान में दिलचस्पी के बारे में चर्चा की। मेरे माता-पिता दोनों ने ही मेरी बात पर ज़्यादा गौर नहीं किया और मज़ाक में कहा, "अब तुम क्या पागलों का इलाज करोगी?"  यही शुरुआत थी मेरी समाज के खिलाफ लड़ाई की, मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक रोग के बारे में लोगों की राय बदलने के प्रण की! रीमा इस लड़ाई में अकेली नहीं है!

    नई पीढ़ी यानि जनरेशन X की जीवनशैली को टेक्नोलॉजी क्षेत्र की उन्नति ने अस्तव्यस्त करके रख दिया है, जो समाज के लिए कईं नई चुनौतियाँ लेकर आया है - लिव-इन रेलेशनशिप्स, देर से विवाह या विवाह न करना, समलैंगिकता, पतियों का घर पर रहकर घर का काम करना (house-husbands), और सबसे महत्वपूर्ण, मानसिक रोग और उनका इलाज।

    आज भी भारत में लोग, सकिज़ोफ्रेनीया (schizophrenia), हिस्टीरिया (hysteria), डिप्रेशन (depression), आत्महत्या के विचार (suicidal ideation), चिंता विकार (anxiety disorders), लर्निंग डिसेबिलिटी (learning disability), ऑटिज़म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर (autism spectrum disorders) आदि, जैसे मनोवैज्ञानिक समस्याओं के लिए उपचार को जब तक हो सके टालना पसंद करते हैं, और अगर किसी भी तरह उपचार के लिए तैय्यार हो भी गए, तो उसे दूसरों से छिपाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

    एक विख्यात स्कूल काउंसेलर ने बताया -- "माता-पिता को उनके बच्चे की स्थिति के बारे में समझाना एक बहुत मुश्किल काम है - 'महोदय, आपकी बेटी को डिस्लेक्सिया (dyslexia) है। इसमें कोई शक नहीं है कि, वह जीवन में सफलता प्राप्त करेगी, लेकिन अगर समय से इलाज नहीं किया गया, तो निश्चित रूप से उसकी पढ़ाई में प्रदर्शन प्रभावित होगा।' माता-पिता यह वास्तविकता स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं थे, और वह आगे के इलाज के लिए कभी नही लौटे।"

    एक मनोवैज्ञानिक के अनुसार "लोग स्कूली छात्रों के बीच हिस्टीरिया (hysteria) की संभवता को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। यह स्कूलों में छात्रों की निरंतर अनुपस्थिति का एक प्रमुख कारण है। अगर यह एक न्यूरोलॉजिकल समस्या होती तो माता-पिता बहुत आसानी से मान जाते, लेकिन मनोवैज्ञानिक समस्या स्वीकार करने से वह साफ इनकार कर देते हैं, जिससे यह समस्या और गंभीर बन जाती है। ऐसे मामलों में हम असहाय महसूस करते हैं और समय बीतने के साथ स्थिति बदतर होती चली जाती है। "

    भारतीय समाज में लोग हर लिंग, उम्र, व्यवसाय या परिवार के लोगों के बारे में राय बनाने और आलोचना करने में पीछे नही रहते। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायता लेने वाला व्यक्ति लोगों के लिए चर्चा का विषय बन जाता है। वे यह नहीं समझ पाते कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायता लेना केवल मानसिक रोगों तक ही सीमित नहीं है। लोग मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों से, किसी परिस्थिति या समस्या के लिए, जो उनके मानसिक संतुलन अथवा दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को प्रभिवित कर रही, परामर्श कर सकते हैं।

    संबंध टूटना, परीक्षा में असफलता, माता-पिता की अधिक अपेक्षाएं, नौकरी में असंतोष, वैवाहिक कलह, ड्रग्स का उपयोग / दुरुपयोग, करियर विकल्पों को लेकर परेशानी, आत्मनिर्भरता की कमी, आक्रामकता, जीवन उद्देश्य पहचानने में असमर्थता, घर पर ज़रूरत से ज़्यादा निगरानी रखने वाले माता-पिता (Helicopter Parents), असंतुष्ट पारिवारिक जीवन, काम को टालने की आदत, संकल्प में दृढ़ न रहना आदि, कईं भिन्न समस्याएं हैं, जो हमारे काम और जीवन के संतुलन को प्रभावित करती हैं।

    मानसिक बीमारी को, कैंसर और मधुमेह जैसी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की भाँति गंभीरता से क्यों नहीं लिया जाता? क्यों लोग अभी भी इसके बारे में खुलकर बात करने में संकोच करते हैं? एक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से परामर्श करने के लिए लोगों में इतनी झिझक क्यों है? उन्हें अपनी इलाज प्रक्रिया को छिपाना क्यों पड़ता है? आख़िर क्यों?

    सबसे पहले, यह समझना ज़रूरी है कि असल में मानसिक बीमारी है क्या? क्या यह जैसा कि रीमा के माता-पिता ने कहा, "पागलपन" है? मानसिक बीमारी एक व्यक्ति की व्यवहार या सोच के ऐसी स्थिति / पैटर्न है, जो अन्य बीमारियों की तरह चिकित्सकीय रूप से गंभीर है, और जिसे जल्द से जल्द चिकित्सीय परामर्श और इलाज की आवश्यकता है।

    भारत में 'कोटा' या अन्य कॉलेज परिसरों में छात्रों के आत्महत्या के बढ़ते मामलों के कारण, सरकार ने छात्रों को तनाव मुक्त करने हेतु, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उनके लिए 'डी-स्ट्रेसिंग प्रोग्राम' आयोजित करना शुरू किया है। स्थिति की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, स्कूल स्तर पर सीबीएसई (CBSE) ने अपने सभी संबंधित स्कूलों में काउंसलर्स / मनोचिकित्सकों की नियुक्ति अनिवार्य कर दी है। इससे छात्रों की विभिन्न समस्याओं पर ध्यान दिया जा सकेगा। कॉलेज स्तर पर, परामर्श कक्ष (counselling cells) वर्षभर काम करते हैं, विशेष रूप से परीक्षाओं (आत्महत्याओं की संभावना अधिक रहती है) के दौरान,वह और भी जागरूक रहते हैं।

    टेक्नोलॉजी में उन्नति के साथ, कईं प्लेटफार्म मौजूद हैं जो ऑनलाइन मानसिक स्वास्थ्य सेशन्स प्रदान करते हैं। यह उन लोगों को भी सलाह देते हैं जो "सामाजिक लेबल" के डर से व्यक्तिगत रूप से मनोचिकित्सक/ काउन्सलर से परामर्श करना पसंद नहीं करते हैं।

    हमारे समाज में मानसिक बीमारी के साथ जुड़ी ज़ो हिचकिचाहट और हीन भावना है, उसके खिलाफ लड़ने के लिए हमारा एक जूट होकर खड़े रहना महत्वपूर्ण है। समाज के विभिन्न समूहों के लिए, विशेष रूप से "शिक्षित" समूह के लिए मानसिक स्वास्थ्य के बारे में और जानकारी हासिल करने के अवसर आयोजित करना, समय की एक सख्त आवश्यकता है। सरकारी और साथ ही गैर-सरकारी संगठन, कॉलेज और सामुदायिक स्तर पर मानसिक रोग अथवा उनके इलाज के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने का जो प्रयास कर रहे हैं, वह प्रशंसनीय हैं।

    हमें मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों की मुश्किलें बढ़ानी नहीं है, बल्कि एक समाज के रूप में उनके विकास और समर्थन के लिए अभी भी बहुत से कदम उठाने की ज़रूरत है। 

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  • 22 Dec
    eWellness Expert

    क्या अतिरिक्त लाड प्यार से बच्चों का भविष्य नष्ट हो सकता है?

    working child and mental health counselling

     

     

    माता पिता हमेशा चाहते हैं, कि उनके बच्चे खुशहाल और समृद्ध रहें, उन्हें कोई कमी ना हो।

    अपने जीवन में कमी भले रही हो, लेकिन संतान के जीवन को वे हर सुख, सुविधा से पूर्ण करना चाहते हैं। और इसी ममता की भावना से उन्हें लगता है, कि कोई भी काम करने से बच्चों को कष्ट होगा, उन्हें शारीरिक तकलीफ पहुंचेगी।

    माता पिता, ख़ास कर भारत में अपने बच्चों को अतिरिक्त लाड प्यार देने की कोशिश करते हैं, विशेष रूप से, अगर उनका एक ही बच्चा हो।

    उसे कोई काम नहीं देतें, सच्चाई से दूर रखते हैं, वह जो चाहते हैं, जायज़ हो या नहीं, वह उसे लाकर देते हैं।

    कभी उन्हें समस्या का सामना करना ना पड़े, इस मनोभावना से बच्चों को कहीं भी आगे भेजते ही नहीं, कठिन काम की ज़िम्मेदारी माता पिता स्वयं लेते हैं।

    यहाँ तक कि, उम्र बढ़ने के बाद भी माता पिता का रवैया अपने बच्चों के प्रति समान रूप सम्वेदनशील रहता है।

    बच्चे के लिए सभी फैसले वे खुद लेना चाहते हैं, उन्हें लगता है, बच्चों को उतनी समझ नहीं है, वह सोचेंगे, फैसला लेंगे तो उन्हें दिक्कत होगी।

    बड़े हो जाने के बाद भी सन्तान को वास्तविकता से दूर रखना ही जैसे माता पिता का धर्म है, ऐसा समझते हैं।

    भारत में आज भी, बच्चा बड़ा हो जाने के बाद भी, माँ उसे उसके बचपन के नाम से ही पुकारती है, उसे महसूस ही नहीं होने देते, कि वह बड़ा हो चुका है।

    ये केवल ममता है, ऐसा कहना सही नहीं होगा, इसके साथ एक मानसिक सोच जुडी होती है, अकसर माता-पिता को लगता है, कि उनके बच्चों पर उनका अधिकार है, और जब तक वे उन पर निर्भर करेंगे, स्वतंत्र नहीं होंगे, तब तक ये अधिकार बना रहेगा।

    अगर बच्चों ने खुद अपना सारा काम करना शुरू कर दिया, तब उन्हें माता पिता की ज़रूरत नहीं होगी, और वे उनका ख्याल नहीं रखेंगे, ऐसी चिंता से भी माता-पिता अपने बच्चों के प्रति रक्षात्मक बनते हैं।

     

    atirikt laad pyaar

    लेकिन क्या इस प्रकार बच्चों की भलाई होती है?

    ऐसे लाड प्यार और क्रूर सचेतन भाव से बच्चों पर गलत असर पड़ता है।

    वे केवल मांगने वाले दरिंदे बनते हैं, दान की भावना तो उनमें होती नहीं।

    वे स्वार्थी बन जाते हैं, भविष्य में यही बच्चे हर जगह अपना रुतबा जमाने की कोशिश करते हैं, सोचते हैं, जैसे उनके माता-पिता ने उनकी हर ख्वाहिश को सराहा, हर जगह सभी उनकी बात मानेंगे, सही गलत नहीं बताएंगे, पर ऐसा नहीं होता। ऐसे बच्चे लोभी होते हैं, चीज़ की कीमत उन्हें कभी नहीं होती, केवल खर्चा करना ही उनकी आदत बन जाती है।

    ऐसे लोग बड़े होने के बाद भी दुर्बल रह जाते हैं, कोई भी काम वे मदद के बगैर नहीं कर पाते, घर साफ़ करना, खाना पकाना, बाजार में सामान खरीदना इत्यादि रोज़ के काम जिन्होंने कभी किया  ही नहीं, वे इन सब कार्यों से दूर ही रहते हैं, और जब इन्हें कहीं बाहर जाकर पढ़ाई या नौकरी करनी पड़ती है, तब  यह सब उन्हें तकलीफ नज़र आती है।

    सच्चाई और वास्तविकता से ये बहुत दूर रहते हैं। भारत में हर काम के लिए कर्मी या नौकर हमें कम दाम में मिल जातें है, इसलिए अपना हल्का सामान भी कोई खुद नहीं उठाता, बच्चे को भी नहीं उठाने देते, कुली बुला लेते हैं। पर दूसरे देश में ऐसा नहीं होता, सबको अपना काम खुद ही करना पड़ता है, तब जाकर इन बच्चों को मुश्किल होती है, क्योंकि ना उन्हें आदत है, ना इच्छा।

    बच्चों को प्यार देना ज़रूरी है, पर सही शिक्षा भी ज़रूरी है। ममता अगर अंधी हो जाए, तो बच्चों के भविष्य के लिए सही नहीं।

    हर बच्चे को सक्षम बनाना ही माता-पिता का कर्तव्य है, ना कि उनसे ज़िम्मेदारी चुराना। उन्हें वास्तविकता का सामना करवाना भी माता-पिता का कर्तव्य है, ताकि आगे चलकर उन्हें कोई समस्या ना हो। चीज़ और अर्थ की कदर करना हर बच्चे को सीखना चाहिए।

    माता-पिता को ही सब सिखाना चाहिए, क्योंकि बच्चे माँ-बाप की आँखों से ही दुनिया देखते हैं, उनसे ही सब सीखते हैं, इसलिए दायित्व पूर्ण परवरिश अति आवश्यक है।

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  • 24 Nov
    eWellness Expert

    अगोराफोबिया- डर का सामना कैसे करेंगे?

     agoraphobia


    फोबिया का मतलब है भय, या डर। कई तरह के डर हम में होते हैं। जैसे कॉकरोच का डर, छिपकली का डर, ऊँची जगह का डर वगैरा-वगैरा। पर ये साधारण व्यवहार है, जो हम रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में करते हैं, और इसे फोबिया या कोई मानसिक समस्या के हिसाब से नहीं जानते। पर इनकी जड़ों को जानना ज़रूरी है,तभी इनकी सही चिकित्सा हो सकती है।


    आज हम 'अगोराफोबिया' पर बात करेंगे, जो आतंक विकार के नाम से पहचाना जाता है। कई बार ज्यादा भीड़ में जाने से यह विकार देखा जाता है, कुछ लोगों में, जैसे एयरपोर्ट, बाज़ार, मॉल जैसी जगह पर ये विकार अधिक होता है ।

    उन्हें अचानक पैनिक होने लगता है, और इसके लक्षण हैं, पसीना आना, दिल का ज़ोर से धड़कना, कँपकँपी होना, उल्टी की संभावना, सर घूमना, इत्यादि। इस रोग में इंसान ऐसी जगह पर खुद को असुरक्षित महसूस करता है।


    'अगोराफोबिया', ये नाम, ग्रीस के एक मनो वैज्ञानिक, कार्ल फ्रेडरिच ने रखा था, जिस में, 'अगोरा' का मतलब है, 'जन बहुल इलाका/बाज़ार' और 'फोबिया' मतलब 'भय' .


    ये विकार ज्यादा तनाव के कारण हो सकता है, या फिर किसी और रोग के दुष्प्रभाव से भी हो सकता है। कई बार अधिक नींद की गोलियों के सेवन से भी ये रोग हो सकता है।


    इससे कैसे लड़ेंगे?


    1. अपने डर से दूर रहना, समाधान नहीं है। हम अपने दिमाग में पैदा हुए खतरे से बचने के लिए, सुरक्षा के उपाय ढूंढ़ते हैं, पर ये सुरक्षा एक छलावा है, क्योंकि ये उपाय हमें सुरक्षा नहीं दे सकते, क्योंकि ये खुद समस्या का हिस्सा है, और इन पर अमल करना मतलब, अपने डर को बढ़ावा देना है।

    2. अगर आपको सड़क यातायात से डर लगता है, तो 2 मिनट की चलन को बचाने के लिए, गाड़ी न निकालें, सड़क पार करने का अभ्यास करें। ट्रैफिक सिगनल का ध्यान रखें, खुद को और तत्पर बनाएं।

    3. मनो रोग विशेषज्ञ की मदद अवश्य लें, ये न सोचें कि एक दिन में आपका डर दूर हो जाएगा, वे आपको आपके डर का सामना करने में, आपकी सहायता करेंगे।
    कोशिश आप से ही शुरू होगी। जब आप अपने डर पर काबू पाएंगे, तब एक अद्भुत आत्मविश्वास महसूस करेंगे आप। एक विजयी भाव का आनंद उठा पाएंगे।

  • 18 Nov
    eWellness Expert

    करियर काउंसलर का महत्व।

     

    career counseling

     

     

    जब मैं स्कूल में थी, तब ग्यारहवीं क्लास में सब्जेक्ट सिलेक्शन के वक़्त बहुत उलझन में थी। हयूमैनिटिज़ में मुझे रुचि थी, लेकिन केवल अंग्रेजी के विषय में मैं माहिर थी, ऊपर से मेरे सारे दोस्त विज्ञान के भाग में जा रहे थे।

    मुझे क्या करना चाहिए, कौन से विषय में पढ़ाई करने से भविष्य बेहतर हो सकता है, समझ में नहीं आ रहा था। तब मेरे भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर ने मुझे समझाया, कि स्कूल खत्म होने तक, विज्ञान का माध्यम बेहतर होगा, कॉलेज में मुझे जो भी अच्छा लगे वह पढ़ सकती हूँ। इस सहायता की ज़रूरत हम सब को है।

    सभी शिक्षार्थी जब कॉलेज में दाखिल होते हैं, वह चाहते हैं की सबसे अच्छे  सब्जेक्ट पर पढ़ाई करें, ताकि भविष्य में कोई समस्या ना हों। और यह निर्णय लेने में हमारी सहायता करते हैं एक उत्कृष्ट काउंसलर या सलाहकार।

    स्कूल और कॉलेज के छात्रों में और भी कई मानसिक समस्या देखी जाती है, जिनका हल सिर्फ एक अच्छा सलाहकार ही ढूंढ सकता है।

     

    १. एक अच्छा काउंसलर आपको पूर्ण रूप से जानने के लिए आप से व्यक्तिगत सवाल भी पूछेंगे, और इस प्रकार आप खुद को भी बेहतर जान पाएंगे। आपके परिवार, स्कूल, कॉलेज, सम्पर्क, दोस्त इत्यादि से जुडी हर बात काउंसलर जानना चाहेंगे, ताकि आपकी समस्या की जड़ पता चले।

     

    २. एक काउंसलर का काम है, आपकी रुचि को समझना, साथ-साथ, आपकी प्रतिभा को जान कर बढ़ावा देना।

     

    ३. एक काउंसलर आपको किस प्रकार की नौकरी करनी चाहिए, इसकी सलाह भी देते हैं, एक विशेष प्रकार की नौकरी के फायदे और नुक्सान आपके समक्ष रख कर आपको निर्णय लेने में मदद करते हैं।

     

    ४. एक करियर काउंसलर का काम केवल आपका भविष्य सवारना ही नहीं है, वह मानसिक रूप से भी आपकी मदद करते हैं। आप अगर किसी समस्या में हैं, तो उसको समझकर उसका समाधान एक मानसिक सलाहकार का काम है।

     

    इस हिसाब से एक काउंसलर का काम है-

    १. आप में आत्मविश्वास जगाना।

    २. आप की प्रतिभा पर रोशनी डाल कर आपको उस ओर प्रोत्साहित करना।

    ३. आपका मनोबल बढाना।

    ४. आपके भविष्य के लिए सबसे सही निर्णय बताना।

    ५. सही नौकरी की चुनौती में मदद करना, ताकि आपको काम में संतुष्टि भी मिले और आर्थिक रूप से सुरक्षा भी मिले।

    ६. आपको भविष्य में आर्थिक सुरक्षा का अर्थ समझाना।

    ७. आपकी महत्वाकांक्षा को हासिल करने में आपकी सहायता करना।

     

    मानसिक सलाहकार केवल छात्र और उम्मीदवार को ही नहीं, उनके परिवार की भी मानसिक रूप से मदद करते हैं, ताकि वे अपने बच्चों को समझ पाएं, और अपने विचार उन पर ना रखें। इस प्रकार पूर्ण रूप से एक इंसान की सहायता एक करियर काउंसलर करता है, ताकि सक्षम रूप से, परिवार की स्वीकृति से वह अपने इच्छाओं को पर दे सके ।

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