• 02 Aug
    umair hussain

    अपने स्मार्टफोन से दूर साप्ताहिक छुट्टियों के मज़े लेना

    smartphone

    मैंने अपनी छुट्टियों की सारी तैयारियां कर ली थीं। अपना स्मार्टफोन पूरा चार्ज कर के मैं मस्ती भरे वो दो दिन बिताने को तैयार था। लेकिन तभी मेरी सारी खुशियां चूर-चूर हो गयीं जब मेरी माँ ने मेरी छुट्टियों के इरादों से परेशान होकर मेरा स्मार्टफोन छीन लिया; वो भी ऐन मौके पर। बेचारा मैं, जब रोने और गिड़गिड़ाने से भी काम न चला तो मेरे पास कोई चारा नहीं बचा सिवाए इसके के में छुट्टियां बिताने के लिए कोई दूसरा रास्ता निकालूँ । लेकिन मेरा यकीन मानें, वो दो दिन जो मैंने स्मार्टफोन से दूर बिताये वो मेरी उम्मीद के खिलाफ बेहद मस्ती भरे और मज़ेदार बीते।

    ये रही कुछ चीज़ें जो आप स्मार्टफोन से दूर रोमांचकारी छुट्टियां बिताने के लिए कर सकते हो:

    1.पहली बात पहले:

    अपने स्मार्टफोन से दूर छुट्टियाँ बिताने के तरीके ढूंढ़ने से पहले तो अपने स्मार्टफोन से ही छुटकारा पाना होगा। उसको या तो अलमारी में बंद कर दें या उसका मोबाइल डाटा ही बंद कर दें। अगर फ़ोन चार्ज करना है तो उसे अपने बिस्तर से कही दूर रख कर करें।

    2.पन्ने पलटना:

    छुट्टियों में खुद को व्यस्त रखने का एक मज़ेदार तरीका है कोई उपन्यास पड़ना। अपनी पसंद के अनुसार कोई भी शैली उठा लीजिये और सारी छुट्टियां उसी के विषय और पात्र में खो जाएये।

    3.अपनी मानसिक अवस्था का नवीनीकरण करें:

    आजकल हर किसी की अख़बार पड़ने की आदत ही नहीं है। साप्ताहिक छुट्टी एक अच्छा मौका है हफ्ते भर के अख़बारों को रचनात्मक तरीके से पड़ने के लिए, छांटकर ज़रूरी खबरों को संभाल कर रखें। इस तरह आपको पता रहेगा आपके आस पास दुनिया में क्या चल रहा है और आप मौजूदा घटनाक्रम के प्रति सचेत भी रहेंगे। यकीन मानें, इस कार्य से आपको एक ज्ञानी और विज्ञ होने का एक सुखद एहसास होगा।

    4.बेकार के वर्चुअल गेम्स को छोड़ दें:

    साप्ताहिक छुट्टी आपको आलस छोड़कर बाहर खेलने का मौका भी देती है। अपनी पसंद का खेल खेलें। अपने दोस्तों को भी साथ ले लें। और शाम में ताज़गी देने वाली टहल भी एक अच्छा उपाए है।

    5.फेसबुक छोड़ें, फेस-टू-फेस मिलें:

    अपने दोस्तों के घर जाएँ या उनको अपने घर बुला लें। उनके साथ बाहर टहलने जाएँ, या किसी अच्छे भोजनालय जाएँ, या सिर्फ कॉफ़ी के साथ गपशप करें। घंटों फ़ोन पर इमोजी या अनगिनत मेसेज भेजने से ज्यादा सुखद है की उनके साथ बैठकर थोड़े ठहाके लगाएं।

    6.मदद करें:

    आपको नहीं आपकी ज़रा सी मदद आपके माँ-बाप या भाई-बहनों के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। अपनी माँ की घरेलु काम में मदद करें। शायद आपकी छोटी बहन को होमवर्क करने में मदद चाहिए हो। आगे बढ़ें, खुद को पेश करें उन लोगो के लिए जिनके आप काम आ सकते हों और जिनके लिए आपकी मदद बहुत महत्वपूर्ण हो।

    7.अपनी जान पहचान मज़बूत करें:

    शायद जिन घर वालो से अपने स्मार्टफोन में ज्यादा व्यस्त रहने की वजह से आप ज़्यादा बात न कर पा रहें हों, स्मार्टफोन से दूर होने के बाद उनसे रिश्ते मज़बूत करने का मौका मिले। बीएस बात करिये। उनसे उनकी दिनचर्या पूछिए। यकीन मानिये परिवार में कुछ दुनिया के बहुत प्यारे जीव पाए जाते हैं।

    8.मांसपेशियों को हिलाइये:

    सप्ताह के दोनों आखिरी दिनों में एक एक घंटा व्यायाम के लिए निकला जा सकता है। योग करने और ध्यान लगाने से हफ्ते भर का सारा तनाव निकल जाता है। मामूली सी साँस और खिचाव की कसरत से काफी आराम मिल जाता है।

    9.रात में आराम की नींद लें:

    ज्यादातर देखा गया है कि रात का वक़्त स्मार्टफोन यूज़र्स के लिए सबके सक्रिय वक़्त है। इस लिए उन्हें रात की आरामदायक नींद नहीं मिल पाती है। अब जब स्मार्टफोन दूर है तो 6-8 घंटों की आरामदेह नींद लीजिये । और अगले दिन सुबह में चुस्त उठिये बिना किसी सर-दर्द या आँखों के दर्द के।

    10.अनुभव लिख लें:

    अपने स्मार्टफोन से दूर साप्ताहिक छुट्टी बिताने के सुखद अनुभव को कहीं लिख लें। यकीन मानें, फिर कभी आप इसे पड़ेंगें तो दोबारा ऐसी ही छुट्टी बिताना चाहेंगे।

    अपने स्मार्टफोन से आप जितना दूर भागेंगे, उतना आप खुदकी तरफ बढ़ेंगे।

    तो अब किसका इंतज़ार है? शायद ये साप्ताहिक छुट्टी आपको खुदको पाने का एक बढ़िया मौका दे।

    Read in English

     

  • 02 Aug
    umair hussain

    किसी अपने को खोने के ग़म से उबरना

     

    grief

    आपको उनकी मौजूदगी की आदत हो गयी है, उनसे बात करना और उनका साथ होना, उनके जाने के बाद आपकी रोज़ की ज़िन्दगी में कुछ अधूरापन छोड़ जाता है अचानक से कोई नहीं मिलता है कुछ मज़ेदार सुनाने को, खाना खाने में एक अजीब सन्नाटा होता है और और जन्मदिन का एक उपहार कम खरीदना पड़ता है।

     

     

    चाहे वो एक अचानक हादसा हो या कोई लम्बी बीमारी की वजह से, किसी अपने की मृत्यु बेहद ग़मगीन होती है। जब कोई ऐसा शख्स जो की आपकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा हो, ना रहे, तो ज़िन्दगी में एक खाली जगह छोड़ जाता है। ज़िंदगी बेरंग और सूनी पड़ जाती है और आप सोचने लगते हैं की ऐसी ज़िंदगी का क्या फायदा जो ऐसे ही एक दिन बीत जानी है।

    पर आप परेशान न हों- ये एहसास हमेशा नहीं रहने वाला। आप कभी खुश थे, और आप दोबारा खुश भी हो सकते हैं। शायद आज नहीं, शायद कल या परसो भी नहीं, लेकिन कभी न कभी ज़रूर।

     

    आप शायद उस अपने के जाने के ग़म से पूरी तरह ना निकल पाए, पर ज़िंदगी ज़रूर आसान हो जायगी।

     

    एलिज़ाबेथ कुबलेर-रॉस ने 1969 में कुबलेर-रॉस मॉडल या ग़म के पांच पड़ाव (फाइव स्टेजेस ऑफ़ ग्रीफ) दिया था। ये उन सभी मनोभावनाओं की बात करता है जो किसी अपने के बिछड़ जाने पर पेश आते हैं। इन मनोभावनाओं का क्रम अलग-अलग इंसानो के लिए अलग-अलग तरह हो सकता है। ग़म के पांच पड़ाव इस प्रकार हैं:

    • अस्वीकारता: किसी को खो देने पर हमारी पहली प्रतिक्रिया सदमे और इंकार की होती है। सब कुछ निरर्थ लगने लगता है और हम सोचने लगते हैं के काश ये सब एक बुरा सपना हो, और सब कुछ ठीक हो।

    हमे लगता है के अब आगे कुछ नहीं कर सकते और और हम अपनी उस शख्स के बिना आगे बढ़ने की क्षमता को सवाल करने लगते हैं। एक तरह से अस्वीकारता उस इंसान के जाने के ग़म और उसके बाद आने वाले भावों के बीच प्रतिरोधक का काम करता है।

     

    • गुस्सा: उस इंसान की कमी आपको महसूस कराने लगती है के आपको अकेला छोड़ दिया गया है या ठुकरा दिया गया है। आपका गुस्सा उस शख्स पर भी केंद्रित हो सकता है के वो आपको अकेला छोड़ गए या किसी ऊंची शक्ति पर भी (जैसे खुदा या किस्मत) के उन्होंने उस शख्स को आपसे छीन लिया। आपको लगेगा वो शख्स मौत का हक़दार नहीं था या इस बात से कुढ़ेंगे की और भी बुरे लोगों को जीने का मौका मिला है।

     

    • सौदाकारी: किसी को खोने से पहले हम कायनात की हर ताकत से सौदा करने की कोशिश करते हैं के वो शख्स जी जाये। मिसाल के लिए, "अगर वो जी गयी तो मैं अपनी माँ से कभी नहीं लडूंगा" या "अगर मेरा भाई बच गया तो मैं ज्यादा धार्मिक हो जाऊंगा"।

    उनको खोने के बाद हम सोचने लगते हैं कि कैसा होता अगर वो अब भी हमारे पास होते या अगर हम कुछ अलग करते तो वो हमारे पास होते। ये 'काश कि' और 'अगर सिर्फ' हमे खुद को दोष देने पर मजबूर कर सकते हैं।

     

    • उदासी: ये एक बेहद ग़म का चरण होता है और ऐसा लगता है कि एक ग़म का बदल हर समय हमारे सर पर मंडरा रहा हो और वो हमारे हर काम पर साया डाल रहा हो। ऐसा लगता है कि ये उदासी हमेशा रहेगी, पर ऐसा होता नहीं है।

    उदासी उस वक़्त तक ठीक है जब तक आपकी ज़िंदगी पूरी तरह से रुक न जाये या आप आप अब भी अपना ख्याल रख रहे हों। और ज़रूरी है कि आप डिप्रेशन (उदासी का मानसिक रोग) की निशानियों को पहचाने क्यूंकि गहरी उदासी अक्सर इसका कारण बन जाती है।

     

    • स्वीकारता: ये ग़म का आखिरी चरण होता है जहाँ हम जाने वाले शख्स के बिना जीना सीख लेते हैं और ज़िन्दगी के दूसरे हिस्सों में ख़ुशी ढूंढ लेते हैं। इसका मतलब ये नहीं कि हमें उनके जाने से फर्क नहीं पड़ता अब लेकिन बस हमने उनके बिना जीना सीख लिया और ये कि ज़िन्दगी आसान हो गयी है। हम ये मान लेते हैं कि ज़िन्दगी अब ऐसी ही है और हम उस शख्स की कमी पूरी करने के तरीके ढूंढ लेते हैं।

    ग़म से बाहर आना और उसको स्वीकार लेना ज्यादातर के लिए एक नियमित प्रक्रिया है और ये अपना वक़्त लेती है पर हम कुछ चीज़े कर सकते हैं इस प्रक्रिया को आसान करने के लिए।

     

    कुछ चीज़े जो आप ग़म से उबरने के लिए कर सकते हैं-

    • इस बात को मानें के उदास होने कोई बुरी बात नहीं है:

    हालाँकि सबके सामने उदास होना आपको कमज़ोर और आलोचनीय महसूस करा सकता है, लेकिन ये ग़मग़ीन होने की क्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जितना चाहें उतना रोयें और गुस्सा करें और कुछ भी अंदर ना दबाएं। बीच बीच में अपने जज़्बातो को बाहर निकलना अंदर ही अंदर समेटने से बेहतर है।

    • अपनी ज़िंदगी को वापस समेटें:

    अपने ग़म को कम करने क लिए खुद को आराम देने के बाद, अब आपको ज़रूरत है के अपनी ज़िंदगी को वापस पहले की तरह बनाएँ। इसको करने में शायद थोड़ी ज़ादा मेहनत लगे क्यूंकि आप शायद तैयार न हों ज़िंदगी के बहाव में वापस बहने के लिए, लेकिन अगर आप खुद को ज़रा सा धकेल लें तो आप पाएंगे के उसके साथ बहना उतना मुश्किल नहीं था जितना आपको लग रहा था। अगर आप अपना दिन पहले की तरह एक बार बिता लें तो आप चीज़ों को काफी हद तक अपने काबू में पायंगे।

    • खुदको को व्यस्त रखें:

    अपने स्कूल/कॉलेज/काम के अलावा कुछ नए कार्य या प्रोजेक्ट शुरू करें। इस तरह आपके पास खाली  सोचने का कम वक़्त होगा। कोई नया हुनर सीखें, कोई नया शौक बनायें, चाहे जानवरो की रक्षा के लिए कोई स्वयं सेवा का काम हो- कुछ भी जो आपकी ज़िंदगी को बेहतर बनाये और आपको धनात्मकता दे। ये आपकी बेहतरी के लिए एक और कदम होगा।

    • उनकी यादों को संजोयें:

    सिर्फ इस लिए के आपके करीबी आपके पास नहीं रहे तो आप उन्हें बिलकुल भूल जाएँ। उनके साथ बिताये हुए हर अच्छे पल को यद् रखें और उनकी दी हुई सीखों को कभी ना भूलें।

    लेकिन ये बात में मन में साफ़ कर लें के ये सब करने से वो वापस नहीं आने वाले। गुज़रा हुआ वक़्त सैर के लिए अच्छा है पर वहां रहने के लिए नहीं।

    • दूसरों से सहारा लें:

    ग़म आपको सारा वक़्त अकेले बिताने और उदासीन होने पर मजबूर कर सकता है। हालाँकि कभी-कभी विचार करने के लिए अकेले रहना बेहतर है, लेकिन आपके चाहने वाले और आपको सहारा देने वाले लोगों से बिलकुल नाता मत तोड़ लिए। उनके साथ भी थोड़ा वक़्त बिताये। इससे आपको भी अच्छा लगेगा और आपको दूसरों का सहारा भी मिलेगा जिसकी आपको सबसे ज्यादा ज़रूरत है। ज़रूरत पड़ने पर दुसरो की मदद मांगने से कभी ना घबराएँ।

     

    किसी को खोने के घाव कोई नहीं भर सकता, और किसी के प्यार की यादें कोई नहीं छीन सकता।

     Read in English

  • 02 Aug
    Nandini Harkauli

    समय सारे घाव भर देता है।

    time heals wound

    बचपन से हमें सिखाया जाता है कि यदि आप समय बर्बाद करते हैं, तो समय भी आगे जाकर आपको बर्बाद कर देगा। यह बात ध्यान में रखते हुए हम समय का सम्मान करते हैं।  हालांकि आज मैं समय के एक और पहलू के बारे में बात कर रही हूँ।

    यह सच है कि, समय हर घाव को ठीक कर सकता है, यह हमेशा कहा जाता है कि सब कुछ पूर्वनिर्धारित समय पर या सही समय पर होता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि, किसी प्रियजन के लिए अपना समय निकालने से, उनके घाव तुलनात्मक रूप से अधिक जल्दी भरते हैं।

     

    यह हम में से ज्यादातर के साथ, बल्कि हम सभी के साथ होता है।  हम अपनी दिनचर्या में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमारे आस-पास जो लोग हैं, उन्हें समय देने के बारे में भूल जाते हैं।

    जब आप किसी को अपना समय देते हैं तो आप उन्हें बहुत अनमोल तोहफा दे रहे हैं, क्योंकि बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता है, और यह रिश्ते में नई जान डालने का काम करता है। आजकल पैसा हर चीज़ बन गया है क्योंकि हम इसके बिना जीवित नहीं रह सकते हैं, लेकिन हमारे रिश्तों का क्या, हम उन्हें बनाए रखने का प्रयास बंद क्यों कर देते हैं।

    इससे कई मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। मनुष्य सांस लेती, भावनाओं से भरी जीवित कठपुतलियों की तरह हैं, इन भावनाओं को संजोने और जीवित रखने की ज़रूरत है, लेकिन धन और करियर बनाने की अंधी दौड़ में हम इन भावनाओं को अनदेखा कर देते हैं। एक बिन धूप और पानी के पौधे की तरह, रिश्ते भी ध्यान नहीं दिए जाने पर मुरझा जाते हैं।

    यहाँ बात नज़रअंदाज़ करने की नहीं है, किसी को अनदेखा करने और समय ना दे पाने में थोड़ा अंतर है।  काम का दबाव और कार्यस्थल में प्रतिद्वंद्विता व्यक्ति की पूरी एकाग्रता, सफलता पाने की ओर केंद्रित कर देती है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी हम जीवन में रिश्तों की अहमीयत भूल जाते हैं। हम कब अपने प्रियजनों से दूर हो जाते हैं ,पता भी नहीं चलता।

    आपको किसी व्यक्ति को, आपके ज़िन्दगी में उनके महत्व का एहसास दिलाने के लिए उनके साथ दिन में 24 घंटो बैठकर बात करने की ज़रूरत नहीं है, केवल कुछ ही पल जादू कर सकते हैं। कभी-कभी स्नेहपूर्वक ज़ोर से गले मिलना भी प्रभावशाली होता है।

    सभी व्यक्तियों को अपनी ज़िंदगी की बैटरी को फिर रीचार्ज करने की तरफ थोड़ा ध्यान देना चाहिए। आपके प्रत्येक रिश्ते को आपकी समान रूप से ज़रूरत है, चाहे आपका परिवार हो या आपके सहकर्मी।

    परिवार आपको प्रेरणा और सहकर्मी आपको स्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण प्रदान करते हैं। सहकर्मियों के साथ एक अच्छा संबंध आपको काम का बोझ महसूस नहीं होने देता।

    एक अच्छी टीम हिस्सा होना निस्संदेह उत्पादकता के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी बढ़ाती है। यही तथ्य परिवार के लिए भी सच है।

    परिवार एक व्यक्ति के जीवन में सबसे बड़ा सहारा है, जिससे हमे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह प्राप्त होता है। एक सकारात्मक वातावरण हमें मानसिक थकान से बचाने की शक्ति रखता है।

    मेरा सुझाव है कि कभी-कभी प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यस्त काम से समय निकालकर रिश्ते रूपी पौधे को सींचना और पोषित करना चाहिए। पूरे दिन के लंबे संघर्ष के बाद भी सुखी रहने का यह सबसे अच्छा उपाय है।

    यह आपके रिश्तों और करियर दोनो को ही संवार सकता है। परिवार जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंश है, यह हमें आगे बढ़ने और सफलता हासिल करने की शक्ति देता है।

    दिन के अंत में सभी व्यक्तियों को मानसिक शांति और शरीर के लिए आराम की आवश्यकता होती है, अपने प्रियजनों के साथ समय बिताने से यह कार्य बहुत आसान हो जाता है।

    आज के युग में हमारा शरीर एक मशीन बन गया है, और मशीन की भाँति इसे भी अच्छी तरह से देखभाल की ज़रूरत है, जिस तरह बैटरी बिजली से चार्ज होती है, हमे भी अपने मन और शरीर को चार्ज करने की आवश्यकता होती है, और हमारे प्रियजन यह बेहद अच्छे से कर सकते हैं।

    Read in English

     

  • 02 Aug
    Nandini Harkauli

    मानसिक रोग और समाज की मानसिकता

    mental Illness

    रीमा को हमेशा से मानव मनोविज्ञान में बेहद रूचि थी। वह उच्च विद्यालय में इसे विषय के रूप में पढ़ने के लिए काफी उत्साहित थी। वह याद करती है --- "मैंने अपने विषय चयन के एक दिन पहले, रात को अपने माता-पिता के साथ मनोविज्ञान में दिलचस्पी के बारे में चर्चा की। मेरे माता-पिता दोनों ने ही मेरी बात पर ज़्यादा गौर नहीं किया और मज़ाक में कहा, "अब तुम क्या पागलों का इलाज करोगी?"  यही शुरुआत थी मेरी समाज के खिलाफ लड़ाई की, मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक रोग के बारे में लोगों की राय बदलने के प्रण की! रीमा इस लड़ाई में अकेली नहीं है!

    नई पीढ़ी यानि जनरेशन X की जीवनशैली को टेक्नोलॉजी क्षेत्र की उन्नति ने अस्तव्यस्त करके रख दिया है, जो समाज के लिए कईं नई चुनौतियाँ लेकर आया है - लिव-इन रेलेशनशिप्स, देर से विवाह या विवाह न करना, समलैंगिकता, पतियों का घर पर रहकर घर का काम करना (house-husbands), और सबसे महत्वपूर्ण, मानसिक रोग और उनका इलाज।

    आज भी भारत में लोग, सकिज़ोफ्रेनीया (schizophrenia), हिस्टीरिया (hysteria), डिप्रेशन (depression), आत्महत्या के विचार (suicidal ideation), चिंता विकार (anxiety disorders), लर्निंग डिसेबिलिटी (learning disability), ऑटिज़म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर (autism spectrum disorders) आदि, जैसे मनोवैज्ञानिक समस्याओं के लिए उपचार को जब तक हो सके टालना पसंद करते हैं, और अगर किसी भी तरह उपचार के लिए तैय्यार हो भी गए, तो उसे दूसरों से छिपाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

    एक विख्यात स्कूल काउंसेलर ने बताया -- "माता-पिता को उनके बच्चे की स्थिति के बारे में समझाना एक बहुत मुश्किल काम है - 'महोदय, आपकी बेटी को डिस्लेक्सिया (dyslexia) है। इसमें कोई शक नहीं है कि, वह जीवन में सफलता प्राप्त करेगी, लेकिन अगर समय से इलाज नहीं किया गया, तो निश्चित रूप से उसकी पढ़ाई में प्रदर्शन प्रभावित होगा।' माता-पिता यह वास्तविकता स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं थे, और वह आगे के इलाज के लिए कभी नही लौटे।"

    एक मनोवैज्ञानिक के अनुसार "लोग स्कूली छात्रों के बीच हिस्टीरिया (hysteria) की संभवता को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। यह स्कूलों में छात्रों की निरंतर अनुपस्थिति का एक प्रमुख कारण है। अगर यह एक न्यूरोलॉजिकल समस्या होती तो माता-पिता बहुत आसानी से मान जाते, लेकिन मनोवैज्ञानिक समस्या स्वीकार करने से वह साफ इनकार कर देते हैं, जिससे यह समस्या और गंभीर बन जाती है। ऐसे मामलों में हम असहाय महसूस करते हैं और समय बीतने के साथ स्थिति बदतर होती चली जाती है। "

    भारतीय समाज में लोग हर लिंग, उम्र, व्यवसाय या परिवार के लोगों के बारे में राय बनाने और आलोचना करने में पीछे नही रहते। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायता लेने वाला व्यक्ति लोगों के लिए चर्चा का विषय बन जाता है। वे यह नहीं समझ पाते कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायता लेना केवल मानसिक रोगों तक ही सीमित नहीं है। लोग मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों से, किसी परिस्थिति या समस्या के लिए, जो उनके मानसिक संतुलन अथवा दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को प्रभिवित कर रही, परामर्श कर सकते हैं।

    संबंध टूटना, परीक्षा में असफलता, माता-पिता की अधिक अपेक्षाएं, नौकरी में असंतोष, वैवाहिक कलह, ड्रग्स का उपयोग / दुरुपयोग, करियर विकल्पों को लेकर परेशानी, आत्मनिर्भरता की कमी, आक्रामकता, जीवन उद्देश्य पहचानने में असमर्थता, घर पर ज़रूरत से ज़्यादा निगरानी रखने वाले माता-पिता (Helicopter Parents), असंतुष्ट पारिवारिक जीवन, काम को टालने की आदत, संकल्प में दृढ़ न रहना आदि, कईं भिन्न समस्याएं हैं, जो हमारे काम और जीवन के संतुलन को प्रभावित करती हैं।

    मानसिक बीमारी को, कैंसर और मधुमेह जैसी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की भाँति गंभीरता से क्यों नहीं लिया जाता? क्यों लोग अभी भी इसके बारे में खुलकर बात करने में संकोच करते हैं? एक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से परामर्श करने के लिए लोगों में इतनी झिझक क्यों है? उन्हें अपनी इलाज प्रक्रिया को छिपाना क्यों पड़ता है? आख़िर क्यों?

    सबसे पहले, यह समझना ज़रूरी है कि असल में मानसिक बीमारी है क्या? क्या यह जैसा कि रीमा के माता-पिता ने कहा, "पागलपन" है? मानसिक बीमारी एक व्यक्ति की व्यवहार या सोच के ऐसी स्थिति / पैटर्न है, जो अन्य बीमारियों की तरह चिकित्सकीय रूप से गंभीर है, और जिसे जल्द से जल्द चिकित्सीय परामर्श और इलाज की आवश्यकता है।

    भारत में 'कोटा' या अन्य कॉलेज परिसरों में छात्रों के आत्महत्या के बढ़ते मामलों के कारण, सरकार ने छात्रों को तनाव मुक्त करने हेतु, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उनके लिए 'डी-स्ट्रेसिंग प्रोग्राम' आयोजित करना शुरू किया है। स्थिति की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, स्कूल स्तर पर सीबीएसई (CBSE) ने अपने सभी संबंधित स्कूलों में काउंसलर्स / मनोचिकित्सकों की नियुक्ति अनिवार्य कर दी है। इससे छात्रों की विभिन्न समस्याओं पर ध्यान दिया जा सकेगा। कॉलेज स्तर पर, परामर्श कक्ष (counselling cells) वर्षभर काम करते हैं, विशेष रूप से परीक्षाओं (आत्महत्याओं की संभावना अधिक रहती है) के दौरान,वह और भी जागरूक रहते हैं।

    टेक्नोलॉजी में उन्नति के साथ, कईं प्लेटफार्म मौजूद हैं जो ऑनलाइन मानसिक स्वास्थ्य सेशन्स प्रदान करते हैं। यह उन लोगों को भी सलाह देते हैं जो "सामाजिक लेबल" के डर से व्यक्तिगत रूप से मनोचिकित्सक/ काउन्सलर से परामर्श करना पसंद नहीं करते हैं।

    हमारे समाज में मानसिक बीमारी के साथ जुड़ी ज़ो हिचकिचाहट और हीन भावना है, उसके खिलाफ लड़ने के लिए हमारा एक जूट होकर खड़े रहना महत्वपूर्ण है। समाज के विभिन्न समूहों के लिए, विशेष रूप से "शिक्षित" समूह के लिए मानसिक स्वास्थ्य के बारे में और जानकारी हासिल करने के अवसर आयोजित करना, समय की एक सख्त आवश्यकता है। सरकारी और साथ ही गैर-सरकारी संगठन, कॉलेज और सामुदायिक स्तर पर मानसिक रोग अथवा उनके इलाज के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने का जो प्रयास कर रहे हैं, वह प्रशंसनीय हैं।

    हमें मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों की मुश्किलें बढ़ानी नहीं है, बल्कि एक समाज के रूप में उनके विकास और समर्थन के लिए अभी भी बहुत से कदम उठाने की ज़रूरत है। 

    Read in English

     

  • 22 Dec
    eWellness Expert

    क्या अतिरिक्त लाड प्यार से बच्चों का भविष्य नष्ट हो सकता है?

    working child and mental health counselling

     

     

    माता पिता हमेशा चाहते हैं, कि उनके बच्चे खुशहाल और समृद्ध रहें, उन्हें कोई कमी ना हो।

    अपने जीवन में कमी भले रही हो, लेकिन संतान के जीवन को वे हर सुख, सुविधा से पूर्ण करना चाहते हैं। और इसी ममता की भावना से उन्हें लगता है, कि कोई भी काम करने से बच्चों को कष्ट होगा, उन्हें शारीरिक तकलीफ पहुंचेगी।

    माता पिता, ख़ास कर भारत में अपने बच्चों को अतिरिक्त लाड प्यार देने की कोशिश करते हैं, विशेष रूप से, अगर उनका एक ही बच्चा हो।

    उसे कोई काम नहीं देतें, सच्चाई से दूर रखते हैं, वह जो चाहते हैं, जायज़ हो या नहीं, वह उसे लाकर देते हैं।

    कभी उन्हें समस्या का सामना करना ना पड़े, इस मनोभावना से बच्चों को कहीं भी आगे भेजते ही नहीं, कठिन काम की ज़िम्मेदारी माता पिता स्वयं लेते हैं।

    यहाँ तक कि, उम्र बढ़ने के बाद भी माता पिता का रवैया अपने बच्चों के प्रति समान रूप सम्वेदनशील रहता है।

    बच्चे के लिए सभी फैसले वे खुद लेना चाहते हैं, उन्हें लगता है, बच्चों को उतनी समझ नहीं है, वह सोचेंगे, फैसला लेंगे तो उन्हें दिक्कत होगी।

    बड़े हो जाने के बाद भी सन्तान को वास्तविकता से दूर रखना ही जैसे माता पिता का धर्म है, ऐसा समझते हैं।

    भारत में आज भी, बच्चा बड़ा हो जाने के बाद भी, माँ उसे उसके बचपन के नाम से ही पुकारती है, उसे महसूस ही नहीं होने देते, कि वह बड़ा हो चुका है।

    ये केवल ममता है, ऐसा कहना सही नहीं होगा, इसके साथ एक मानसिक सोच जुडी होती है, अकसर माता-पिता को लगता है, कि उनके बच्चों पर उनका अधिकार है, और जब तक वे उन पर निर्भर करेंगे, स्वतंत्र नहीं होंगे, तब तक ये अधिकार बना रहेगा।

    अगर बच्चों ने खुद अपना सारा काम करना शुरू कर दिया, तब उन्हें माता पिता की ज़रूरत नहीं होगी, और वे उनका ख्याल नहीं रखेंगे, ऐसी चिंता से भी माता-पिता अपने बच्चों के प्रति रक्षात्मक बनते हैं।

     

    atirikt laad pyaar

    लेकिन क्या इस प्रकार बच्चों की भलाई होती है?

    ऐसे लाड प्यार और क्रूर सचेतन भाव से बच्चों पर गलत असर पड़ता है।

    वे केवल मांगने वाले दरिंदे बनते हैं, दान की भावना तो उनमें होती नहीं।

    वे स्वार्थी बन जाते हैं, भविष्य में यही बच्चे हर जगह अपना रुतबा जमाने की कोशिश करते हैं, सोचते हैं, जैसे उनके माता-पिता ने उनकी हर ख्वाहिश को सराहा, हर जगह सभी उनकी बात मानेंगे, सही गलत नहीं बताएंगे, पर ऐसा नहीं होता। ऐसे बच्चे लोभी होते हैं, चीज़ की कीमत उन्हें कभी नहीं होती, केवल खर्चा करना ही उनकी आदत बन जाती है।

    ऐसे लोग बड़े होने के बाद भी दुर्बल रह जाते हैं, कोई भी काम वे मदद के बगैर नहीं कर पाते, घर साफ़ करना, खाना पकाना, बाजार में सामान खरीदना इत्यादि रोज़ के काम जिन्होंने कभी किया  ही नहीं, वे इन सब कार्यों से दूर ही रहते हैं, और जब इन्हें कहीं बाहर जाकर पढ़ाई या नौकरी करनी पड़ती है, तब  यह सब उन्हें तकलीफ नज़र आती है।

    सच्चाई और वास्तविकता से ये बहुत दूर रहते हैं। भारत में हर काम के लिए कर्मी या नौकर हमें कम दाम में मिल जातें है, इसलिए अपना हल्का सामान भी कोई खुद नहीं उठाता, बच्चे को भी नहीं उठाने देते, कुली बुला लेते हैं। पर दूसरे देश में ऐसा नहीं होता, सबको अपना काम खुद ही करना पड़ता है, तब जाकर इन बच्चों को मुश्किल होती है, क्योंकि ना उन्हें आदत है, ना इच्छा।

    बच्चों को प्यार देना ज़रूरी है, पर सही शिक्षा भी ज़रूरी है। ममता अगर अंधी हो जाए, तो बच्चों के भविष्य के लिए सही नहीं।

    हर बच्चे को सक्षम बनाना ही माता-पिता का कर्तव्य है, ना कि उनसे ज़िम्मेदारी चुराना। उन्हें वास्तविकता का सामना करवाना भी माता-पिता का कर्तव्य है, ताकि आगे चलकर उन्हें कोई समस्या ना हो। चीज़ और अर्थ की कदर करना हर बच्चे को सीखना चाहिए।

    माता-पिता को ही सब सिखाना चाहिए, क्योंकि बच्चे माँ-बाप की आँखों से ही दुनिया देखते हैं, उनसे ही सब सीखते हैं, इसलिए दायित्व पूर्ण परवरिश अति आवश्यक है।

    Image source