• 04 Aug
    umair hussain

    हिंदुस्तान में यौन शिक्षा

    sex education

    यौन। एक ऐसा शब्द जो आप सार्वजनिक तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते, जिसके बारे में बात नहीं की जा सकती- जैसे ये कुछ भयानक है हैरी पॉर्टर सीरीज़ के लार्ड वोल्डेमोर्ट की तरह।

    कितना अजीब है कैसे हम हर चीज़ के बारे में बात करते हैं, राजनीति से लेकर फ़ालतू टेलीविज़न सीरीज तक, लेकिन जब बात यौन की आती है तो हर मुंह बंद हो जाता है- जैसे कुछ बहुत ख़राब कह दिया गया हो; जैसे ये कुछ ऐसा हो जिसपर हमें शर्म आनी चाहिए। ये भी एक व्यंग है के जो चीज़ हमें जिंदा रखती है और हमें अस्तित्व देती है, उसके बारे में कभी भारत जैसे विकासशील देश में कभी बात ही नहीं की जाती है। वह शिक्षा जो हमें आदमी और औरत के शरीर की भिन्नता से अवगत कराये, उसे यौन शिक्षा कहते हैं। इसका सम्बन्ध है यौन, लैंगिगता, गर्भावस्था जैसे मसलों को ठीक तरीके से बताना, खासकर के युवाओं को।

    हम एक इसे समाज में रहते हैं जहाँ आसान से आसान चीज़ें भी मुश्किल कर दी जाती हैं। और ‘बच्चे कैसे पैदा होते हैं?’ जैसे सवाल का जवाब भगवान और आध्यात्मिकता के नाम पर कहानियाँ बनाकर दिया जाता है।

    अपने मुद्दे पर वापस आते हैं- हिंदुस्तान में यौन शिक्षा को वर्जित क्यूँ समझा जाता है?

    1. छोटी सोच:

    हमने देखा है कैसे हमारे नेता यौन को घिनौना और इसकी शिक्षा को युवाओं के लिए बुरा प्रभाव बताते हैं।

    सन २००७ में जब मानव संसाधन और विकास मंत्रालय यौन शिक्षा को स्कूलों के लिए ज़रूरी करने की पहल की थी, तब इस फैसले का काफी लोगों ने विरोध किया था क्योंकि उनके अनुसार ये परंपरागत हिन्दुस्तानी सभ्यता के खिलाफ है। उनका दावा था कि इस तरह की जागरूकता युवाओं में पश्चिमी सभ्यता को लागू कर सकती है। हमारे द्वारा चुने गए विरोधी पार्टी के मंत्रियों ने ही यौन शिक्षा को देश के 8 राज्यों में प्रतिबन्ध करवा दिया।

    1. शिक्षकों का इसके बारे में बात करने से बचना:

    नेशनल काउन्सिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की एक मीटिंग में देखा गया कि शिक्षक नवयुवाओं से इसके बारे में सीधे बात करने से बचते हैं। जबकि ये पाठ्यक्रम का एक हिस्सा बना दिया गया है जीव विज्ञान के अन्दर, लेकिन तब भी शिक्षक इसके कलंकित होने की वजह से इसका विषय छोड़ देते हैं।

    1. बच्चे और माँ-बाप में संवाद की कमी:

    चाहे माँ-बाप कितना भी विकसित और आधुनिक हो, जब बात आती है यौन की, तब सारे माँ-बाप एक जैसे होते हैं। उनका विचार यही है कि उन साधारण चीज़ों के बारे में बात नहीं करना है जो की किशोरों के लिए जानना ज़रूरी है और उन्हें ये समझने दें के बच्चे ऊपर वाले की दया से पैदा होते हैं। उन्हें पता भी नहीं चलता जब उनके बच्चे बड़े हो जाते हैं और इसका सत्य खुद ही जान लेते हैं। पर इस पूरे सिद्धांत में एक ही निकलने का रास्ता है-उनके पास जो विद्या है उसका कोई भरोसा नहीं है- और दुर्भाग्य से इसी से बड़ा फर्क पड़ता है।

     

    इसके नतीजे:

    1. जानकारी के गलत साधनों की तरफ जाना: ये इंसानी फितरत है के हम वह चीज़ें जानना चाहते हैं जिनके बारे में जानने की हमें इजाज़त नहीं है। आसानी से मिलने वाले इन्टरनेट की लपेट में आकर, नवयुवाओं की जिज्ञासा उन्हें गलत जानकारी की तरफ ले जाती है। बहुत ढेर सारे ज्ञान की लाइब्रेरी होने के बावजूद भी इन्टरनेट भरोसेमंद नहीं है। उत्तेजित होकर विद्यार्थी अकसर अपने सहपाठियों के साथ वह ज्ञान बांटते हैं, जिससे फिर आधा-अधूरा ज्ञान आगे जाता है। नतीजतन, विद्यार्थियों को वह कुछ नहीं पता लग पता जो उन्हें पता होना चाहिए और काल्पनिकता धारण कर लेते हैं।
    2. किशोरावस्था में गर्भ और यौन सम्बन्ध से फैलने वाली बीमारियाँ (एसटीडी): जागरूकता की कमी किशोरों को अपनी जीवनशैली से छेड़खानी करवा देती है। और वह असुरक्षित यौन सम्बन्ध बना बैठते हैं। हिंदुस्तान उन देशों में से है जहाँ किशोरावस्था के गर्भ के अनुमान काफी जादा हैं। हालांकि इसकी एक वजह जल्दी शादी होना भी है, लेकिन दूसरी वजह जन्म निरोध और सुरक्षित यौन की शिक्षा की कमी है।

    असुरक्षित यौन की वजह से यौन सम्बन्ध द्वारा फैलने वाली बीमारियाँ जैसे, क्लामिडिया, सिफिलिस, और एड्स भी भयानक तरीके से बड़ रही हैं। वर्ष 2015 में पाया गया है की करीब 108000 लोग एड्स के अलावा दूसरे एसटीडी से मरे थे।

    1. बालक ज़ाहिर करने की बजाये छिपाने लगते हैं: शिक्षक और माँ-बाप के द्वारा बनाये गए कलंक की वजह से किशोर समझते हैं के यौन कोई शर्मनाक चीज़ है क्यूंकि इसे हमेशा गलत रौशनी में देखा जाता है। इसलिये किशोर अपनी परेशानियाँ और डर घर वालों की बजाये अपने दोस्तों से को बताना जादा बेहतर समझते हैं।

     

    क्या किया जा सकता है?

    • यौन शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
    • शिक्षकों और माता-पिता को यौन की विषय में अपने बच्चों से बात करने से बचना नहीं चाहिए। उन्हें मार्गदर्शक का काम करना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए के बच्चे भी उनसे बात करने में झिझके नहीं। शिक्षकों को ये भी ख्याल रखना चाहिए के बच्चों के पास जो ज्ञान है वह सही है के नहीं।
    • स्कूलों में ऐसे कामों के लिए सलाहकार होना चाहिए। ऐसे स्कूल भी हैं जहाँ बच्चे गुमनाम रूप से यौन स्वास्थ्य के बारे में कोई भी सवाल पूछ सकते हैं।
    • पुरुष और स्त्री प्रजनन क्रिया और वह कैसे काम करते हैं इसके बारे में जागरूकता फैलाना अनिवार्य है, इससे पहले के युवा खुद इसके बारे में जानें और अपनी जिंदगी के फैसलों में भटकें।

    मेरा मानना है के युवाओं में यौन शिक्षा के सम्बन्ध में जागरूकता फैलाना बहुत ज़रूरी है। इसलिये नहीं कि वह ऐसी उम्र में हैं जहाँ उन्हें ये सब चीज़ें पता होना चाहिए, लेकिन इसलिये के उन्हें इस सब के बारे में पता होना चाहिए इससे पहले की वह कोई गलत फैसला ले लें, मार्गदर्शन के बिना।

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  • 03 Aug
    Nandini Harkauli

    क्या आप टैकनोलजी के ग़ुलाम हैं ?

     

    phone addiction 

     

    "हे! मेरी नई शर्ट देखी, मैं कैसा लग रहा हूँ? "- उत्साहित स्वर में सिद्धार्थ ने अपने दोस्त, रोहन से पूछा।

    रोहन ने सिद्धार्थ के सवाल को अनसुना कर दिया और अपने मोबाइल फोन पर गेम खेलना जारी रखा।

    "रोहन! चल यार ! यहाँ भी देखले!", सिद्धार्थ ने चिल्ला कर कहा।

    "हाँ! तुम बहुत अच्छे लग रहे हो", रोहन ने अनमने ढंग से कहा और अपने मोबाइल पर फिर गेम खेलने में व्यस्त हो गया।

    समय बीतने के साथ रोहन का दूसरों के प्रति बेपरवाह व्यवहार बढ़ता ही रहा। भोजन करते समय भी वह अपने माता-पिता से बात करने की बजाय अपने फोन के साथ कुछ न कुछ काम करता रहता था।  

    पारिवारिक समारोह में भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी, वह अपनी उम्र के अन्य बच्चों के साथ खेलने के बजाय अपना सर झुकाए, हाथों में मोबाइल लिए कमरे के एक कोने में बैठना पसंद करता था।

    वह अपने पुराने मित्रों के साथ भी नहीं रहता था, उसके नए दोस्त कॉलेज के बड़े लड़के थे जिनकी संगति में उसने जुआ खेलना भी शुरू कर दिया था।

    वह घंटों देर रात तक अपने मोबाइल पर सक्रिय रहता था, नतीजतन, उसकी निद्रा चक्र पर इसका प्रभाव पड़ा। कॉलेज में क्लासेज़ के दौरान वह आँखें खुली रख सोता था, जिससे उसकी ध्यानशक्ति और एकाग्रता के स्तर कम हो रहे थे।

    उसके मोबाइल की लत का असर उसके परीक्षा अंकों पर भी दिख रहा था। वह अपने कक्षा के काम को समय पर पूरा नहीं कर पाता था, इसके अलावा, उसने कॉलेज जाना भी कम कर दिया था, विशेष रूप से उस दिन जब असाइनमेंट प्रस्तुत करने होते थे।

    वह अपना पूरा दिन कॉलेज के कैफेटेरिया में, आँखे मोबाइल में डूबी हुई, बैठे व्यतीत कर देता था। उसे भूख न प्यास किसी का होश नहीं रहता था, जिससे उसका शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा था।  

    जल्द ही, रोहन को तीव्र सिरदर्द, आँखें में जलन, नज़र का धुन्दलापन आदि शिकायते होने लगीं। लगातार मोबाइल उपयोग के कारण उसे कोहनी, हाथ और गर्दन में भी दर्द होने लगा था।

    पढ़ते समय वह हर कुछ मिनटों के बाद अपने फोन की जांच करने से खुद को रोक नहीं  पाता था। कभी-कभी उसे बिना बजे ही अपने फ़ोन की आवाज़ सुनाई देती थी।

    वह अब अपने मोबाइल फोन से छुटकारा चाहता था लेकिन ऐसा करने में असक्षम था, मोबाइल की लत ने उसे नशे की लत की तरह ही असहाय बना दिया था।

    हाँ! रोहन स्मार्ट फोन की लत की बीमारी से ग्रसित है, जिसे लोकप्रिय रूप से नोमोफोबिया के नाम से भी जाना जाता है!

    नोमोफोबिया मुख्य रूप से मोबाइल फोन के संपर्क में न रहने के डर से होने वाली व्याकुलता को कहते हैं।  इसमें मोबाइल को बार-बार जांचने की अनियंत्रित इच्छा होती है ,यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई कॉल, संदेश या सूचना उनसे छूट तो नहीं गई।   शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया कि नोमोफ़ोबिया द्वारा सबसे प्रभावित आबादी युवा वयस्कों की है।

    नोमोफ़ोबिया के प्रमुख मनोवैज्ञानिक प्रभावों में शामिल हैं:

    • डर और आतंक
    • आक्रामकता और बेचैनी
    • आत्मसम्मान की कमी
    • ध्यान और एकाग्रता की कमी
    • फीलिंग ऑफ मिस्सिंग आउट (या अकेलापन महसूस करना)
    • स्थितिभ्रान्ति की भावना
    • समय पर इलाज नहीं किए जाने पर डिप्रेशन का कारण बन सकता है

    नोमोफोबिया के, प्रमुख मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों के साथ-साथ शारीरिक प्रभाव भी हैं:

    • शरीर में दर्द
    • उंगलियों, हाथों और कोहनी में दर्द
    • आँखों में जलन और पानी आना
    • कंपन
    • पसीना
    • उत्तेजना और बेचैनी
    • टेकिकार्डिया (tachycardia)
    • नींद की समस्या

    एक माँ ने अपनी 6 साल की बेटी से कहा - " नहीं बच्चे! शोर मत करो, हम जल्द ही घर चल रहे हैं", लड़की चिल्लाती रही, जिससे माँ अपनी दोस्त से ठीक से बात नही कर पा रही थी, तब माँ ने एक आसान रास्ता निकाला, बच्चे को मोबाइल फोन थमा दिया और कहा-"जब तक मैं बात कर रही हूँ ,तुम इससे खेलो। "

    टैकनोलजी की उन्नति और लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार ने न सिर्फ युवा बल्कि 4-5 वर्ष आयु के छोटे बच्चों को पूरी तरह से मोबाइल में तल्लीन कर दिया है ।

    स्मार्ट-फोन की लत को रोकने की प्रमुख जिम्मेदारी माता-पिता, खासकर नई पीढ़ी के माता-पिता के हाथों में है, जो भविष्य में छिपे नतीजों के बारे में सोचे बिना अपने बच्चों की हर ज़िद्द को पूरा करते हैं।

    कुछ माता-पिता अपने कम उम्र के बच्चों की मोबाइल फोन संचालन की योग्यता को सरहाते हैं और गर्व महसूस करते हैं। छोटी उम्र में मोबाइल फोन का अधिक उपयोग बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित करता है।

    किशोरावस्था के बच्चों के बीच अत्यधिक मोबाइल उपयोग एक खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। मोबाइल लत के प्रभाव से लोगों के बीच पारिवारिक और सामाजिक समूहों में, आमने सामने बैठ कर वार्तालाप और चर्चा का चलन भी कम हो गया है।  

    जिम्मेदार व्यसक होने के नाते, हमें युवाओं और स्कूली छात्रों के अत्यधिक मोबाइल उपयोग को रोकने के लिए तत्काल कदम उठानें चाहिए।

    छोटे बच्चों के माता-पिता को अपने बच्चों को मोबाइल फोन की पहुँच से दूर रखना चाहिए और उन्हे घर से बाहर खेल-कूद के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चे से मनचाहा व्यवहार करवाने के लिए कभी भी मोबाइल फोन या उसके इस्तेमाल की लालच या प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए।

    समस्या को जड़ से उखाड़ देना, अपनी सारी जिंदगी को दुखद बनाने से बेहतर है .....

     

  • 03 Aug
    Nishi agarwal

    सी बी टी  (कॉग्नेटिव बिहेवियर चिकित्सा) क्या है ?

    cognitive behavioural therapy

    मान लीजिये कि आपको किसी अंजान कारण की वजह से नौकरी से निकाल दिया जाता है, तो आप दुखी हो कर,  निराश चुप-चाप बैठ जाते हैं। पर आप असल में अपने दोस्तों से मिल-जुल कर समाज में ज़्यादा क्रियाशील हो सकते हैं, जो आपको एक बेहतर नौकरी दिलवा सकती है। सी बी टी (कॉग्नेटिव बिहेवियर चिकित्सा) आपको नकारात्मक सोच से दूर रहना सिखाता है । यह आपके समाज में आपका अस्तित्व बढ़ाएगा। और आपके अंदर सकारात्मक भाव भर देता है।

    सी बी टी  (कॉग्नेटिव बिहेवियर चिकित्सा) में हमारी भारी भरकम दिक्कतों या परेशानियों को 5 हिस्सों में बाँट दिया जाता है ।

    ये पाँच भाग हैं -

    1. परिस्थितियां Situations
    2. सोच Thoughts
    3. भावना Emotions
    4. शारीरिक एहसास Physical feelings
    5. कर्म Actions

    cognitive therapy

    सी बी टी के अनुसार यह पाँचों एक दूसरे से जुड़े हैं और एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं । परिस्थितियां सोच और एहसास की तरफ ले जाती है जो कि आगे जा कर भावनाएं और कार्यो में बहने लगती है। उलझन को दोस्ताने अंदाज़ से सुलझाने में और नकारात्मक सोच की लहर को रोकने में सी बी टी बाकी सभी साइकोथेरेपी से काफी अलग है।

    सी बी टी दुविधाओं को टुकड़ो में बाटकर उनको सुलझाना आसान कर देता है, जिससे कि आप नकारात्मक सोच पर नियंत्रण रख पाते है। आपकी मुश्किलों को सुलझाने लायक बना कर ही सी बी टी आपको कुछ समय में अपनी मुश्किलों का सामना बिना चिकित्सक के करना सिखा देती है। यही सी बी टी का अंतिम लक्ष्य होता है।

    CBT sessions,  सी बी टी थेरेपिस्ट के साथ सीधे सीधे बात कर के भी किया जाता है या फिर वह सभी लोग जो आपके जैसी ही मुश्किल में फंसे है उनके साथ groups में भी किया जा सकता है।

    सी बी टी, थेरेपिस्ट के क्लिनिक में, शोर गुल वाले वातावरण से दूर किया जाता है। यह आपके घर में भी किया जा सकता है खास कर अगर आपको भीड़-भाड़ का डर हो तो। घर का आराम न छोड़ के भी स्काइप/ टेलीफोन सेशन भी किया जा सकता है।

    एक CBT session आधे से एक घंटे का हो सकता है और अगर आप अकेले ही थेरेपिस्ट से सेशन ले रहे हो तो थेरेपिस्ट से 5 से 20 हफ्ते के सेशन के लिए उसके समय के अनुसार मिलने आना होगा। अक्सर सी बी टी एक अच्छे योग्य साइकियाट्रिस्ट, साइकोलोजिस्ट, मेन्टल हेल्थ नर्स या एक जनरल डॉक्टर के द्वारा किया जाता है।

    पहला सेशन: पहले यह देखा जाता है की सी बी टी आपके के लिए सही उपचार है या नहीं और आपके लिए यह प्रतिक्रिया सुविधाजनक है या नहीं। थेरेपिस्ट यह अनुमान लगाता है कि आपकी हालत में कितना प्रतिशत योगदान आपके परिवार, कार्य, एवं समाज का है। आगे के सेशंस में आपकी मुसीबत को अलग हिस्सों में बाँटने में थेरेपिस्ट आपकी मदद करेगा। हो सकता है थेरेपिस्ट आपको एक डायरी में अपने विचार और व्यवहार लिखने को बोले ।

    अगले पड़ाव में आपकी भावनाओं को, सोच को और व्यवहार को समझा जाता है ताकि नकली फालतू और नाकाम चीज़ों को सही चीज़ों से अलग किया जा सके।इस चिकित्सा के बाद अगर आप कुछ बदलते हैं, तो उसके बाद थेरेपिस्ट उस बदलाव को आपकी रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में अभ्यास करने की सलाह देता है।

    कुछ स्थिति और उनके असर का उदाहरण नीचे दिया गया है:

    स्थिति 

    आपने अपने एक दोस्त को रास्ते में देखा पर उसने आपको अनदेखा कर दिया। 

    नकारात्मक सोच: उसने मुझे अनदेखा किया यानी वह मुझे पसंद नही करता। 

    भावना: दुःख एवं गुस्सा। 

    शारीरिक एहसास: बहुत ही कम एनर्जी, बीमार-बीमार लगना। 

    कार्य: आगे जा के उस दोस्त को आपने भी अनदेखा कर दिया।

    उसी स्थिति को अगर हम सकारात्मक तरीके से देखे तो कैसे नतीजा बदल जाता है:

    स्थिति 

    आपने अपने एक दोस्त को रास्ते में देखा पर उसने आपको अनदेखा कर दिया। 

    सकारात्मक सोच: उसने मुझे देखा नही। वह थोड़ा परेशान लग रहा है। शायद वो किसी चीज़ में व्यस्त है। 

    भावना: सकारात्मक  

    शारीरिक एहसास: आम (हर दिन जैसा) 

    कार्य: दोस्त को फ़ोन कर के यह देखे की वह सही तो है ना

    दोनों ही उदाहरणों में एक ही स्थिति के सोच पर आधारित अलग-अलग नतीजे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि हमारी सोच का सीधा प्रभाव हमारे भाव और कार्य पर पर होता पड़ता है।

    सी बी टी की सबसे अच्छी बात है कि, उपचार के खत्म होने के बाद भी आप उसे अपनी रोज़ की ज़िन्दगी में प्रयोग में सकते हैं। आज कल बहुत सारे सॉफ्टवेर आ गए है जिससे हम सी बी टी का लाभ उठा सकते है।

    CBT sessions कैसे प्राप्त करें

    किसी थेरेपिस्ट के पास जा कर आमने सामने थेरेपिस्ट के साथ सेशन करें। वर्चुअल सेशन के लिए आप ऑनलाइन काउंसलिंग साइट्स (जैसे की eWellness Expert) का इस्तेमाल भी कर सकते है। आप खुद की मदद सी बी टी की किताबें और एप से भी कर सकते हैं।

    इंग्लिश में पढ़ें

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  • 02 Aug
    umair hussain

    गर्मियों की छुट्टी में बच्चों के सीखने के लिए 10 कलाएं

    गर्मियां करीब हैं और बच्चों को गर्मी की तपन और सुबह सवेरे दिनचर्या से छुटकारा मिलने वाला है। उनके लिए तो मज़े  हैं पर उनके माता पिता की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। उनके लिए तो मज़े कम और काम ज़ादा होने वाला है। उनकी तो छुट्टियां बस बच्चों के होम-वर्क की चिंता में निकल जाती हैं, और उसके अलावा भी जो वक़्त बच जाता है वो अपने बच्चों की फ़िक्र में निकल जाता है, जो घर में इधर उधर घूमते फिरते हैं या दीवार फांदते फिरते हैं। तो माता पिता कुछ ऐसे तरीके ढूंढ़ते हैं ताकि अपने बच्चों को व्यस्त रखकर खुदके लिए भी वक़्त निकाल सकें।

    • और अगर मैं आपको बताऊँ के ऐसे बहुत से तरीके हैं, जिससे आप अपने बच्चों को व्यस्त रख सकते हैं उनकी छुट्टियों में भी? ये लेख उन कलाओं को सम्बोधित है जो आप अपने बच्चों को उनकी छुट्टियों में सिखा सकते हैं। ये रही ऐसी 10 कलाओं की सूचि:

    child learning music

    1. संगीत सीखना

    संगीत ज़िन्दगी में ताज़गी का एक अच्छा स्रोत है। अगर आपके बच्चे को संगीत सुनना पसंद है और उसको सीखने में दिलचस्पी भी है, तो ऐसी बहुत से क्लासेज हैं जो उसकी मदद कर सकती हैं। ऐसी क्लासेजआपको विभिन्न तरीके के संगीत उपकरण बजाना सिखाते हैं जैसे कि, गिटार, सितार, पियानो, आदि और हिंदुस्तानी या पश्चिमी तरीके के गाने गाना भी सिखाते हैं। एक हुनरबाज़ संगीतकार हमेशा सराहा जाता है।

    child learning drama

    2. नाटकीय कला

    नाटक आपके बच्चे की सिर्फ भाव अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि उसकी बोलने की कला भी सुधार सकता है। ऐसे बहुत से क्लासेज हैं जो नाटकीय के माध्यम से अंग्रेजी भी सिखाते हैं। कई शैक्षिक संस्था भी ऐसे क्लासेज का प्रचार करती हैं। अपने पड़ोस में ही ऐसे क्लासेज ढूंढ कर अपने बच्चों का दाखिला ज़रूर करवाएं।

    child learning swimming

    3. तैराकी सीखना

    तैराकी अपने शरीर को आराम देने के लिए एक अच्छा साधन है। एक तो ये आपके बच्चे के विकास में मदद करेगी और उसके ऊपर से उसे एक कला सीखने को भी मिलेगी। एक अच्छा तैराक सिर्फ खुदकी जान ही नहीं बल्कि दूसरों की जान भी बचा सकता है। तैराकी एक खेल के तौर पर भी कई शैक्षिक संस्थाओं द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है, क्योंकि आप नहीं जानते किस में अगला माइकल फेल्प्स बनने का सामर्थ्य हो।

    4.खेल

    कोई भी खेल सीखना आपके बच्चे के लिए एक अच्छा गुण हो सकता है। बैडमिंटन, क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, टेनिस, आदि जैसे खेल आपके बच्चे की सिर्फ शारीरिक विकास में ही नहीं बल्कि मानसिक विकास में भी मदद करते हैं। खेल आपके बच्चे में अच्छी खेल भावना पैदा करते हैं और उसके व्यक्तित्व को भी मज़बूत बनाते हैं। ऊपर से विभिन खेलों में मिले सर्टिफिकेट और मैडल आपके बच्चे के बायो डाटा को भी चमका सकते हैं जब वो 18 साल का होकर ग्रेजुएशन के लिए अच्छे कॉलेज की तलाश में होगा।

    child doing arts and crafts

    5. चित्रकारी और कारीगरी

    चित्रकारी और कारीगरी आपके बच्चे के दिमाग में रचनात्मकता पैदा करने के सबसे अच्छे तरीके हैं। इन गर्मियों की छुट्टियों में उसे या कला सीखकर उसके अंदर की बेहतरीन कला को बहार लाएँ। चित्रकारी, पुराने कबाड़ से कलाकारी, पेपर से कला, आदि कुछ ऐसे कार्य हैं जिनमे आपका बच्चा लग सकता है।

    child reading books

    6. पढ़ना और लिखना

    नयी किताबें पढ़ने और अपने विचार लिखने से सिर्फ उसकी शब्द कला ही नहीं बढ़ेगी बल्कि उसके ज्ञान में भी वृद्धि आएगी। उसे खुदपर और ज़ादा आत्मविश्वास आएगा। अपने विचार लिखने से उसके विचारों की गति भी बढ़ेगी और उसे शब्दों का सही उपयोग करना भी आएगा।

    child summer vacation

    7. खाना पकाना

    अगर आपके बच्चे का दिल खाना बनाने की ओर है तो उसे खाने बनाने की क्लासेज करवाए। ऐसे क्लासेज आपके बच्चे को माहिर तो नहीं बना सकते पर हाँ उसमे खाना बनाने के कुछ मूल गुड़ तो आ जायेंगे। यूट्यूब के काफी चैनलों पर डू-इट-योरसेल्फ के ऊपर काफी ऐसी वीडियोस हैं जो आपके बच्चे को ये गुड़ सीखा सकती हैं।

    child in gardening

    8. बागवानी

    बागबानी आपके बच्चे को पर्यावरण से जोड़ने और उसकी सफाई में हिस्सा लेने का सबसे अच्छा तरीका है। इससे वो सामाजिक तौर पर पर्यावरण की ओर ज़िम्मेदार बनेगा। बागबानी के अलावा उसे ऐसे क्रिया-कलापों में हिस्सा दिलवाएं जिनसे वो कुदरत के आस पास रहे।

    9. उसे नयी ज़बान सिखाना

    उसे कोई दूसरी ज़बान सिखाएं जिसको वो अभी तक नहीं जनता हो। इससे उसकी ज्ञान वृद्धि भी होगी और उसमे आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।

    child learning computer10. कंप्यूटर सीखना

    में मानता हूँ आजकल कोई बच्चा कंप्यूटर, लैपटॉप्स, स्मार्टफोन्स, आदि जैसी तकनीकों से अनजान नहीं है, लेकिन इनके बारे में थोड़ा और ज्ञान लेने में कोई नुकसान तो नहीं। तेज़ टाइपिंग या माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के बारे में थोड़ा सीखना उसके आगे के लिए बहुत फायदेमंद होगा। लेकिन उसकी हरकतों की निगरानी रखें और ध्यान रखें कि वो अपनी छुट्टियों में अच्छे से अच्छा सीखे और अपनी उम्र के हिसाब से किसी गलत चीज़ में ना पड़े।

    स्कूली पढ़ाई के अलावा अपने बच्चे को कुछ अलग सीखना आपके बच्चे के व्यक्तित्व के विकास के लिए बहुत फायदेमंद है। लेकिन कुछ नया सीखना तभी अच्छा है जब तक वो चीज़ बच्चे के खुद के पसंद की हो। अपने बच्चे को कभी ज़बरदस्ती वो न करवाएं जो वो ना करना चाहता हो। उसे उस चीज़ में आनंद आना चाहिए जो वो कर रहा है, तभी उसके बेहतरीन परिणाम मिल सकते हैं।

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  • 02 Aug
    umair hussain

    अपने स्मार्टफोन से दूर साप्ताहिक छुट्टियों के मज़े लेना

    smartphone

    मैंने अपनी छुट्टियों की सारी तैयारियां कर ली थीं। अपना स्मार्टफोन पूरा चार्ज कर के मैं मस्ती भरे वो दो दिन बिताने को तैयार था। लेकिन तभी मेरी सारी खुशियां चूर-चूर हो गयीं जब मेरी माँ ने मेरी छुट्टियों के इरादों से परेशान होकर मेरा स्मार्टफोन छीन लिया; वो भी ऐन मौके पर। बेचारा मैं, जब रोने और गिड़गिड़ाने से भी काम न चला तो मेरे पास कोई चारा नहीं बचा सिवाए इसके के में छुट्टियां बिताने के लिए कोई दूसरा रास्ता निकालूँ । लेकिन मेरा यकीन मानें, वो दो दिन जो मैंने स्मार्टफोन से दूर बिताये वो मेरी उम्मीद के खिलाफ बेहद मस्ती भरे और मज़ेदार बीते।

    ये रही कुछ चीज़ें जो आप स्मार्टफोन से दूर रोमांचकारी छुट्टियां बिताने के लिए कर सकते हो:

    1.पहली बात पहले:

    अपने स्मार्टफोन से दूर छुट्टियाँ बिताने के तरीके ढूंढ़ने से पहले तो अपने स्मार्टफोन से ही छुटकारा पाना होगा। उसको या तो अलमारी में बंद कर दें या उसका मोबाइल डाटा ही बंद कर दें। अगर फ़ोन चार्ज करना है तो उसे अपने बिस्तर से कही दूर रख कर करें।

    2.पन्ने पलटना:

    छुट्टियों में खुद को व्यस्त रखने का एक मज़ेदार तरीका है कोई उपन्यास पड़ना। अपनी पसंद के अनुसार कोई भी शैली उठा लीजिये और सारी छुट्टियां उसी के विषय और पात्र में खो जाएये।

    3.अपनी मानसिक अवस्था का नवीनीकरण करें:

    आजकल हर किसी की अख़बार पड़ने की आदत ही नहीं है। साप्ताहिक छुट्टी एक अच्छा मौका है हफ्ते भर के अख़बारों को रचनात्मक तरीके से पड़ने के लिए, छांटकर ज़रूरी खबरों को संभाल कर रखें। इस तरह आपको पता रहेगा आपके आस पास दुनिया में क्या चल रहा है और आप मौजूदा घटनाक्रम के प्रति सचेत भी रहेंगे। यकीन मानें, इस कार्य से आपको एक ज्ञानी और विज्ञ होने का एक सुखद एहसास होगा।

    4.बेकार के वर्चुअल गेम्स को छोड़ दें:

    साप्ताहिक छुट्टी आपको आलस छोड़कर बाहर खेलने का मौका भी देती है। अपनी पसंद का खेल खेलें। अपने दोस्तों को भी साथ ले लें। और शाम में ताज़गी देने वाली टहल भी एक अच्छा उपाए है।

    5.फेसबुक छोड़ें, फेस-टू-फेस मिलें:

    अपने दोस्तों के घर जाएँ या उनको अपने घर बुला लें। उनके साथ बाहर टहलने जाएँ, या किसी अच्छे भोजनालय जाएँ, या सिर्फ कॉफ़ी के साथ गपशप करें। घंटों फ़ोन पर इमोजी या अनगिनत मेसेज भेजने से ज्यादा सुखद है की उनके साथ बैठकर थोड़े ठहाके लगाएं।

    6.मदद करें:

    आपको नहीं आपकी ज़रा सी मदद आपके माँ-बाप या भाई-बहनों के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। अपनी माँ की घरेलु काम में मदद करें। शायद आपकी छोटी बहन को होमवर्क करने में मदद चाहिए हो। आगे बढ़ें, खुद को पेश करें उन लोगो के लिए जिनके आप काम आ सकते हों और जिनके लिए आपकी मदद बहुत महत्वपूर्ण हो।

    7.अपनी जान पहचान मज़बूत करें:

    शायद जिन घर वालो से अपने स्मार्टफोन में ज्यादा व्यस्त रहने की वजह से आप ज़्यादा बात न कर पा रहें हों, स्मार्टफोन से दूर होने के बाद उनसे रिश्ते मज़बूत करने का मौका मिले। बीएस बात करिये। उनसे उनकी दिनचर्या पूछिए। यकीन मानिये परिवार में कुछ दुनिया के बहुत प्यारे जीव पाए जाते हैं।

    8.मांसपेशियों को हिलाइये:

    सप्ताह के दोनों आखिरी दिनों में एक एक घंटा व्यायाम के लिए निकला जा सकता है। योग करने और ध्यान लगाने से हफ्ते भर का सारा तनाव निकल जाता है। मामूली सी साँस और खिचाव की कसरत से काफी आराम मिल जाता है।

    9.रात में आराम की नींद लें:

    ज्यादातर देखा गया है कि रात का वक़्त स्मार्टफोन यूज़र्स के लिए सबके सक्रिय वक़्त है। इस लिए उन्हें रात की आरामदायक नींद नहीं मिल पाती है। अब जब स्मार्टफोन दूर है तो 6-8 घंटों की आरामदेह नींद लीजिये । और अगले दिन सुबह में चुस्त उठिये बिना किसी सर-दर्द या आँखों के दर्द के।

    10.अनुभव लिख लें:

    अपने स्मार्टफोन से दूर साप्ताहिक छुट्टी बिताने के सुखद अनुभव को कहीं लिख लें। यकीन मानें, फिर कभी आप इसे पड़ेंगें तो दोबारा ऐसी ही छुट्टी बिताना चाहेंगे।

    अपने स्मार्टफोन से आप जितना दूर भागेंगे, उतना आप खुदकी तरफ बढ़ेंगे।

    तो अब किसका इंतज़ार है? शायद ये साप्ताहिक छुट्टी आपको खुदको पाने का एक बढ़िया मौका दे।

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