• 28 Aug
    Nandini Harkauli

    परीक्षा का तनाव- निवारण और उपचार

    exam stress

     

    "मैं अपने माता-पिता को निराश नहीं करना चाहता।दसवीं कक्षा में 10 सीजीपीए हासिल करने के बाद ,वे बारहवीं बोर्ड में मुझसे 90% से अधिक की उम्मीद कर रहे हैं ।यहां तक ​​कि मेरे सहपाठियों ने मुझे 'नकली टॉपर' कहना शुरू कर दिया है। मैं बहुत असहाय सा महसूस करता हूँ। मुझे नहीं समझ आ रहा कि क्या करना है। मैं परीक्षा के तनाव को अब और नहीं सह पाऊँगा। "

    हाल ही में, एक छात्र ने मुझे परीक्षा तनाव के मुद्दे को लेकर संपर्क किया। इस समय का मुख्य प्रश्न यह कि--- बच्चों में तनाव का मुख्य कारण क्या है? क्या कारण बच्चों की पढ़ाई को लेकर माता पिता की उच्च अपेक्षाएं हैं या फिर शिक्षा के क्षेत्र में भीषण प्रतिस्पर्धा?

    इसका कारण दोनों, या दोनो में से एक हो सकते हैं; हालांकि सत्य यह है कि ऐसा कोई छात्र नहीं है जिसे परीक्षा में थोड़ा तनाव महसूस न होता हो। परीक्षा तनाव है क्या?

    आईए पहले समझें कि तनाव क्या है।

    आम तौर पर व्यक्ति अपनी तनाव की स्थिति व्यक्त करने के लिए, स्वयं पर दबाव महसूस करना, चिंता, घबराहट होने की भावना होना आदि शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। मनोविज्ञान के अनुसार, विशिष्ट घटनाओं (परीक्षा) के दौरान होने वाली मानसिक परेशानी की स्थिति में संतुलन बनाए रखने की शारीरिक प्रतिक्रिया को तनाव कहते हैं।
    तनाव दो प्रकार के होते हैं: डिस्ट्रेस यानी बुरा तनाव और यूस्ट्रेस्स- जैसे एक रोलर कोस्टर की सवारी करते समय पेट में होने वाली गुदगुदी। यूस्ट्रेस्स व्यक्ति के प्रदर्शन को बढ़ाता है, उसे पहले से बेहतर करने के लिए प्रेरित करता है और जीवन की अनेक चुनौतियों का सामना करने के लिए मनोबल बढ़ाता है।

    छात्रों के लिए परीक्षा का तनाव चेतावनी का संकेत क्यों है? जो छात्र परीक्षा के तनाव से ग्रस्त हैं वे विभिन्न शारीरिक, व्यवहारिक और मानसिक मांगों का सामना करते हैं जिनमें निम्न शामिल हो सकते हैं:

    • ध्यान और एकाग्रता का अभाव, जो स्मरण शक्ति को प्रभावित कर सकता है
    • आत्मविश्वास की कमी और नकारात्मक आत्म-छवि
    • भूख की कमी या बहुत अधिक खाना
    • बातचीत में कमी
    • अनिद्रा या उनींदापन
    • मिजाज़ बदलते रहना
    • सामाजिक संपर्क कम हो जाना
    • पेट या दस्त की परेशानी
    • आत्मघाती विचार ---- यदि समय पर इलाज नहीं किया जाता है तो यह क्लिनिकल डिप्रेशन का कारण बन सकता है।

    परीक्षा के तनाव किन परिस्थितियां में उत्पन्न होता है?

    परीक्षा के तनाव के आम कारणों में शामिल हैं:

    • अधिक अंक लाने के लिए स्व-निर्मित दबाव (कभी-कभी अपनी योग्यता से अधिक)
    • माता-पिता की उच्च अपेक्षाएं
    • प्रतिस्पर्धा की भावना
    • दूसरों के साथ तुलना (भाई बहन, चचेरे भाई, सहपाठियों आदि)
    • अकेले छूट जाने और अस्वीकृति का डर
    • माता-पिता, भाई-बहन, दोस्तों, शिक्षकों द्वारा उपहासित होने का डर

    "मुझे परीक्षाओं के दौरान तनाव महसूस नहीं होता। वास्तव में, मैं हर समय पढ़ाई नहीं करता ,मैं टीवी देखने के लिए भी कुछ समय निकालता हूं और परीक्षा के दौरान भी कम से कम एक घंटे बाहर खेलने जाता हूँ। "- उसी क्लास के एक अन्य छात्र ने मुझे दूसरे दिन बताया।

    सभी छात्रों को परीक्षा तनाव अनुभव नहीं होता। ऐसा क्यों है? परीक्षा तनाव तब होता है जब:

    • अध्ययन के लिए कोई संरचित योजना नहीं है
    • पुनः अध्ययन के लिए कोई संरचित योजना नहीं है
    • नींद और आराम के लिए के लिए कोई उचित तय समय नहीं है
    • स्वस्थ और पौष्टिक भोजन का सेवन नहीं किया रहा है 
    • आप अन्य नकारात्मक भावनाओं के कारण पहले ही परेशान हैं

    कुछ व्यक्तियों के लिए परीक्षा तनाव, यदि समय से नियंत्रित नहीं किया जाए, तो विनाशकारी साबित हो सकता है।

     

    परीक्षा तनाव को रोकने के लिए यहां कुछ सुझाव दिए गए हैं:

    • अपने अध्ययन की योजना बनाएं: एक उचित नियोजन से आप आसानी से परीक्षा तनाव पर जीत हासिल कर सकते हैं।
    • परीक्षा की तारीख को ध्यान में रखें
    • एक समय-सारणी तैयार करें और उसका पालन करें
    • पाठ्यक्रम को विभाजित करें
    • कम समय के लक्ष्य निर्धारित करें
    • अनुसूचित अध्ययन योजना में मनोरंजक गतिविधियों और अवकाश को भी शामिल करें।
    • विषयों को तब के लिए शेड्यूल करें जब आप सबसे ज़्यादा उत्पादक होते हैं जैसे कि सुबह, दोपहर, शाम, रात या देर रात।
    • ठीक ही कहा गया है, "अनुशासन सफलता की कुंजी है।"
    • अध्ययन योजना का पालन करें
    • योजना को नियमित रूप से समय समय पर जाँचते रहें
    • अपनी प्रगती का हिसाब रखें

    अगर आप अध्ययन योजना का पालन नही करते या पढ़ाई के समय बेकार के कार्यों में लगे रहते हैं,तो यह समय की सबसे बड़ी बर्बादी है।

    ध्यान और एकाग्रता: छात्रों के साथ प्रमुख मुद्दों में से एक है कि वे अध्ययन करने के दौरान लंबे समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं।

    उनके लिए:

    • अध्ययन करने के लिए एक ही समय और एक ही स्थान रखें, ताकि आपके दिमाग को उस वातावरण को अध्ययन के साथ जोड़ने की आदत हो जाए।
    • हर 30-35 मिनट के सत्र के बाद अपने मस्तिष्क को आराम देने के लिए 5-10 मिनट का ब्रेक लें।
    • अध्ययन करते समय मोबाइल फोन, टीवी, इंटरनेट, वीडियो गेम, पीएसपी, टैबलेट, आदि जैसे सभी उपकरणों को बंद करके स्वयं से दूर रखें ।
    • अपने परिवार के सदस्यों को अपने अध्ययन के समय के बारे में बताएं ताकि अध्ययन करने के लिए बैठते समय वह आपको परेशान न करें।
    • अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों आदि के किसी भी कॉल को कुछ समय के लिए स्थगित कर दें
    • सबक का पुनः शिक्षण करते हुए जल्दी-जल्दी पढ़ने की कोशिश करिए
    • फॉर्मुलास, थिओरम्स, पीरियोडिक टेबल आदि को याद करने के लिए विजुअल मैप्स और स्मृती-विज्ञान (Mnemonics) का उपयोग करें।

    " सिर्फ़ काम और कोई खेल नहीं, जैक को एक नीरस लड़का बना देता है" ----- अवकाश और मनोरंजक गतिविधियाँ परीक्षा के तनाव से छुटकारा पाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए परीक्षा के दौरान स्वयं को खुलापन और फ़ुर्सत का समय देना आवश्यक है।

    • गहरी साँस लेने का अभ्यास करें।
    • शांतिदायक संगीत सुनें
    • सैर पर जाएं
    • अपने आप से सकारात्मक बातें करें (I Can- Iwill)और दूसरों के साथ भी सकारात्मक चर्चाओं  में हिस्सा लें।
    • अपने माता-पिता, भरोसेमंद व्यक्तियों या पेशेवरों के साथ आपकी इस स्थिति के बारे में जितना हो सके उतना बात करें।
    • सफलता की कल्पना करें
    • टोकने वाले लोगों से दूर रहें
    • नींद और समयबद्ध आराम सही मात्रा में लें।
    • स्वस्थ और संतुलित आहार खाएं

     उपर्युक्त सभी बिंदुओं को ध्यान में रखें और अपने आप को शांत रखने के लिए कहें, यह सिर्फ एक परीक्षा ही तो है!

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  • 29 Aug
    Nandini Harkauli

    हाइमेन और वर्जिनिटी - कुछ मिथक

    virginity and hymen

     

    अगर आपने कभी अख़बारों के क्लसिफाईड पन्नो  पर गौर  किया है तो आपने कईं विज्ञापन देखें होंगे,जिनमे माता पिता अपने बच्चों के लिए सुयोग्य वर या वधू ढूँढ रहें हैं। हो सकता है आपने ध्यान ना भी दिया हो क्योंकि शादी के लिए जिन योग्यताओं का इनमे ज़िक्र होता है उसकी तुलना में शायद एक अच्छी मलटीनैश्‍नल कंपनी में नौकरी पाना ज़्यादा आसान है।

    इनमें से दुल्हनों के लिए दिए गए विज्ञापनों में आप देखेंगे कि अधिकांश परिवारों की एक विशेष आवश्यकता है – “वधू चरित्रवान और नैतिक रूप से पूर्ण होनी चाहिए।" यदि आपको लगता है कि वे केवल साफ़ मन की तलाश में हैं और नैतिकता की एक अच्छी समझ रखते हैं, तो आप गलत हैं।

    योनिच्छद अर्थार्थ हाइमेन क्या है?

    हाइमेन उस झिल्ली को कहते हैं जो योनिद्वार के बाहरी प्रवेशद्वार को अधिकांशतः घेरे रहती है। यह वुल्वा का भाग है और इसकी संरचना योनि जैसी ही होती है। इसे परंपरागत रूप से कौमार्यता यानि वर्जिनिटी का प्रमाण माना जाता है।

    सुनने में कोई बड़ी बात नहीं लगती ना?

    यह झिल्ली छोटी सी है, लेकिन जिस तरह से हम सेक्स, कौमार्यता और महिलाओं को देखते हैं ,उसमे इसका बहुत बड़ा योगदान है।

    न सिर्फ भारतीय संस्कृति में, बल्कि दुनिया भर में कईं संस्कृतियों और समुदायों में, एक महिला की कौमार्यता (यानी एक बरकरार हाइमेन की उपस्थिति)  को पवित्रता का संकेत माना जाता है। वास्तव में, "कौमार्य को खोना" (लूसिंग वर्जिनिटी), यह वाक्यांश भी मूल्य में कमी होने का संकेत करता है।

    इस सब से, यह स्पष्ट होता है की जब बात कौमार्यता की आती है तब महिलाओं के साथ पक्षपात किया जाता है। ऐतिहासिक दौर से, पुरुष कौमार्य पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। और तो और, जहाँ एक से ज़्यादा यौन संबंधों को महिलाओं में आपत्तिजनक माना जाता था वहीं पुरुषों में यह मर्दानगी का रूप मानकर उनकी महिमा और अधिक बढाई जाती थी ,और आज भी यही हो रहा है।

    नई दुल्हन कुंवारी है ,यह सुनिश्चित करने के लिए लोग किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। चाहे वो शादी की पहली रात को सफेद चादर बिछाना हो, या क्रूर अग्निपरीक्षा (जहां लड़की को अंगारों पर चलना पड़ता है ,जैसे सीताजी ने रामायण में श्रीराम को अपनी निष्ठा साबित करने के लिए किया था)।

    पवित्रता के इन परीक्षणों के परिणाम से भयभीत, कि कहीं उनकी छवि और प्रतिष्ठा पर सवाल ना उठ जाए , कईं महिलाएं हेमेनोप्लास्टी का भी विकल्प चुनती हैं,जिसमें सर्जरी द्वारा हाइमेन को अस्थायी पहले जैसा रूप दे दिया जाता है।

    दुर्भाग्य से, यह जानकार कि लड़की कुंवारी नहीं है, लोगों की प्रतिक्रियाएं कुछ हैरान चेहरों तक या शादी के प्रस्ताव को अस्वीकार करने तक ही सीमित नहीं रहतीं। कईं लड़कियां अपने ही परिवारों द्वारा क्रूरता का शिकार हो जाती हैं, ससुराल एवम् समुदाय दोनों से ही उन्हें दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। ।

    कईं स्त्रियों को अनुचित उत्पीरण भुगतना पड़ता है क्योंकि हाइमेन से जुड़ी कईं गलत धारणाएं लोकप्रिय हैं।

    हाइमेन के बारे में कुछ मिथक  :

    हाइमेन योनि के द्वार को ढकता है :

    हमें हमेशा यह बताया गया है कि हाइमेन एक झिल्ली है जो पूरी तरह से योनि के छेद को ढकता है, जैसे कोई मुहर हो जो कि एक महिला के पहली बार योनि संभोग करने पर टूट जाती है। यह तार्किक रूप से असंभव है  क्योंकि अगर यह वास्तव में योनि के द्वार को पूरा ढकता तो मासिक धर्म रक्त (मेन्स्ट्रुयल ब्लड)और योनि स्राव (वेजाइनल डिसचार्ज) के बाहर आने का कोई रास्ता नहीं होता। वास्तव में, हाइमेन केवल एक झिल्ली है जो योनि छिद्र को घेरे हुए रहती है।

    पहली बार संभोग के दौरान सभी कुंवारी लड़कियों को योनिक रक्तस्राव (ब्लीडिंग) होती है :

    लगभग  50 प्रतिशत महिला आबादी में ही ऐसा होने की संभावना होती है। फिर भी, संभोग के दौरान अगर हाइमेन को कोई नुकसान होता है, तो यह खुद ही अपनी मरम्मत कर लेता है, हो सकता है की यह थोड़ा अलग दिखे, जिससे लोग इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं  कि यह "खो गया" या "टूटा हुआ" है .हालांकि, आधे से ज़्यादा समय, हाइमेन को कोई क्षति नहीं होती और यह बस थोड़ा फैल जाता है। हमारी सोच के विपरीत यह एक बहुत ही लचीली झिल्ली है और नाजुक नहीं है। कुछ महिलाएं लंबे समय तक यौन संबंधों में संलग्न रह सकती हैं और फिर भी उनका हाइमेन ज्यों का त्यों रहता है।

    यही कारण है कि कुछ कुंवारी महिलाओं को पहली बार संभोग के दौरान खून नहीं आता और इस तथ्य के कारण वह अपनी कौमार्यता का प्रमाण देने में विफल हो जाती हैं।

    हाइमेन केवल सेक्स के दौरान फट सकता है:

    हाइमेन सेक्स के अलावा कईं कारणों से फट या फैल सकता  है, जैसे कठोर एथलेटिक गतिविधियों, उदाहरण के लिए घुड़सवारी और जिम्नास्टिक, या टैम्पोन के उपयोग से। कुछ महिलाओं को थोड़ा दर्द महसूस हो सकता है, कुछ को थोड़ा खून आ सकता है और कुछ को दोनो ही नहीं होते।

    हाइमेन के बारे में ये तथ्य 100 से अधिक वर्षों तक चिकित्सा पेशेवरों को ज्ञात हैं, लेकिन फिर भी, हम मिथकों पर विश्वास रखते हैं। यह साबित करता है कि हमें कौमार्यता से जुड़ी जो कहानियाँ सुनाई गई हैं वह केवल महिलाओं की कामुकता को नियंत्रित करने की एक चाल है।

    हम अपनी लड़कियों को सिखाते हैं कि उनका मूल्य पवित्रता के इस तथाकथित सूचक से जुड़ा हुआ है, और उनको डराया जाता है कि वह अपने शरीर के लिए जो भी निर्णय लेती  हैं, वह गुप्त नहीं रखा जा सकता है

    ये असुरक्षाएं उन्हें हाइमेनॉप्लॅस्टी ,अपनी शादी की रात के लिए नकली हाइमेन, जानवरों का रक्त और यहां तक ​​कि अपने गुप्तांगों को नुकसान पहुँचाने जैसी प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं, जिससे एक निश्चित मात्रा में खून बहे और उनके पति और ससुराल वालों के लिए कौमार्यता का प्रमाण बन सके।

    हालांकि, हाल के वर्षों में, नारीवादी आंदोलन और शारीरिक स्वतंत्रता पर ज़ोर के कारण, अधिक से अधिक महिलाएं अपनी कामुकता और यौन अनुभवों के बारे में खुल रहीं हैं। अब महिलाएँ अपनी कौमार्यता को अपने आत्मसम्मान का मापदंड मानने से इंकार करती हैं।

    शादी से पहले यौन सम्बंध अब निषिद्ध नहीं माना जाता है, कम से कम एक महानगरीय वातावरण में तो नहीं। नए युग के जोड़ों के लिए सेक्शुअल कंपॅटिबिलिटी वास्तव में शादी से पहले एक शर्त बन गई है और कईं लोग विवाह-बंधन का निर्णय लेने से पहले रोमांटिक और यौन रिश्तों में रहना पसंद करते हैं।

    कईं लोग कभी शादी नहीं करते हैं और लिव-इन सम्बंधों का विकल्प चुनते हैं। हमारे माता-पिता और दादा-दादी के समय में शादी करके घर बसाने का जो दबाव था, आज बहुत कम है।  बिना किसी भी वादे के आकस्मिक यौन संबंध भी आम होते जा रहें।

    एक स्त्री अपने शरीर के लिए क्या चयन करती है, चाहे हम उसे पसंद करें या नहीं, हमें उस इच्छा का सम्मान करना ही चाहिए।

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  • 04 Aug
    umair hussain

    हिंदुस्तान में यौन शिक्षा

    sex education

    यौन। एक ऐसा शब्द जो आप सार्वजनिक तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते, जिसके बारे में बात नहीं की जा सकती- जैसे ये कुछ भयानक है हैरी पॉर्टर सीरीज़ के लार्ड वोल्डेमोर्ट की तरह।

    कितना अजीब है कैसे हम हर चीज़ के बारे में बात करते हैं, राजनीति से लेकर फ़ालतू टेलीविज़न सीरीज तक, लेकिन जब बात यौन की आती है तो हर मुंह बंद हो जाता है- जैसे कुछ बहुत ख़राब कह दिया गया हो; जैसे ये कुछ ऐसा हो जिसपर हमें शर्म आनी चाहिए। ये भी एक व्यंग है के जो चीज़ हमें जिंदा रखती है और हमें अस्तित्व देती है, उसके बारे में कभी भारत जैसे विकासशील देश में कभी बात ही नहीं की जाती है। वह शिक्षा जो हमें आदमी और औरत के शरीर की भिन्नता से अवगत कराये, उसे यौन शिक्षा कहते हैं। इसका सम्बन्ध है यौन, लैंगिगता, गर्भावस्था जैसे मसलों को ठीक तरीके से बताना, खासकर के युवाओं को।

    हम एक इसे समाज में रहते हैं जहाँ आसान से आसान चीज़ें भी मुश्किल कर दी जाती हैं। और ‘बच्चे कैसे पैदा होते हैं?’ जैसे सवाल का जवाब भगवान और आध्यात्मिकता के नाम पर कहानियाँ बनाकर दिया जाता है।

    अपने मुद्दे पर वापस आते हैं- हिंदुस्तान में यौन शिक्षा को वर्जित क्यूँ समझा जाता है?

    1. छोटी सोच:

    हमने देखा है कैसे हमारे नेता यौन को घिनौना और इसकी शिक्षा को युवाओं के लिए बुरा प्रभाव बताते हैं।

    सन २००७ में जब मानव संसाधन और विकास मंत्रालय यौन शिक्षा को स्कूलों के लिए ज़रूरी करने की पहल की थी, तब इस फैसले का काफी लोगों ने विरोध किया था क्योंकि उनके अनुसार ये परंपरागत हिन्दुस्तानी सभ्यता के खिलाफ है। उनका दावा था कि इस तरह की जागरूकता युवाओं में पश्चिमी सभ्यता को लागू कर सकती है। हमारे द्वारा चुने गए विरोधी पार्टी के मंत्रियों ने ही यौन शिक्षा को देश के 8 राज्यों में प्रतिबन्ध करवा दिया।

    1. शिक्षकों का इसके बारे में बात करने से बचना:

    नेशनल काउन्सिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की एक मीटिंग में देखा गया कि शिक्षक नवयुवाओं से इसके बारे में सीधे बात करने से बचते हैं। जबकि ये पाठ्यक्रम का एक हिस्सा बना दिया गया है जीव विज्ञान के अन्दर, लेकिन तब भी शिक्षक इसके कलंकित होने की वजह से इसका विषय छोड़ देते हैं।

    1. बच्चे और माँ-बाप में संवाद की कमी:

    चाहे माँ-बाप कितना भी विकसित और आधुनिक हो, जब बात आती है यौन की, तब सारे माँ-बाप एक जैसे होते हैं। उनका विचार यही है कि उन साधारण चीज़ों के बारे में बात नहीं करना है जो की किशोरों के लिए जानना ज़रूरी है और उन्हें ये समझने दें के बच्चे ऊपर वाले की दया से पैदा होते हैं। उन्हें पता भी नहीं चलता जब उनके बच्चे बड़े हो जाते हैं और इसका सत्य खुद ही जान लेते हैं। पर इस पूरे सिद्धांत में एक ही निकलने का रास्ता है-उनके पास जो विद्या है उसका कोई भरोसा नहीं है- और दुर्भाग्य से इसी से बड़ा फर्क पड़ता है।

     

    इसके नतीजे:

    1. जानकारी के गलत साधनों की तरफ जाना: ये इंसानी फितरत है के हम वह चीज़ें जानना चाहते हैं जिनके बारे में जानने की हमें इजाज़त नहीं है। आसानी से मिलने वाले इन्टरनेट की लपेट में आकर, नवयुवाओं की जिज्ञासा उन्हें गलत जानकारी की तरफ ले जाती है। बहुत ढेर सारे ज्ञान की लाइब्रेरी होने के बावजूद भी इन्टरनेट भरोसेमंद नहीं है। उत्तेजित होकर विद्यार्थी अकसर अपने सहपाठियों के साथ वह ज्ञान बांटते हैं, जिससे फिर आधा-अधूरा ज्ञान आगे जाता है। नतीजतन, विद्यार्थियों को वह कुछ नहीं पता लग पता जो उन्हें पता होना चाहिए और काल्पनिकता धारण कर लेते हैं।
    2. किशोरावस्था में गर्भ और यौन सम्बन्ध से फैलने वाली बीमारियाँ (एसटीडी): जागरूकता की कमी किशोरों को अपनी जीवनशैली से छेड़खानी करवा देती है। और वह असुरक्षित यौन सम्बन्ध बना बैठते हैं। हिंदुस्तान उन देशों में से है जहाँ किशोरावस्था के गर्भ के अनुमान काफी जादा हैं। हालांकि इसकी एक वजह जल्दी शादी होना भी है, लेकिन दूसरी वजह जन्म निरोध और सुरक्षित यौन की शिक्षा की कमी है।

    असुरक्षित यौन की वजह से यौन सम्बन्ध द्वारा फैलने वाली बीमारियाँ जैसे, क्लामिडिया, सिफिलिस, और एड्स भी भयानक तरीके से बड़ रही हैं। वर्ष 2015 में पाया गया है की करीब 108000 लोग एड्स के अलावा दूसरे एसटीडी से मरे थे।

    1. बालक ज़ाहिर करने की बजाये छिपाने लगते हैं: शिक्षक और माँ-बाप के द्वारा बनाये गए कलंक की वजह से किशोर समझते हैं के यौन कोई शर्मनाक चीज़ है क्यूंकि इसे हमेशा गलत रौशनी में देखा जाता है। इसलिये किशोर अपनी परेशानियाँ और डर घर वालों की बजाये अपने दोस्तों से को बताना जादा बेहतर समझते हैं।

     

    क्या किया जा सकता है?

    • यौन शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
    • शिक्षकों और माता-पिता को यौन की विषय में अपने बच्चों से बात करने से बचना नहीं चाहिए। उन्हें मार्गदर्शक का काम करना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए के बच्चे भी उनसे बात करने में झिझके नहीं। शिक्षकों को ये भी ख्याल रखना चाहिए के बच्चों के पास जो ज्ञान है वह सही है के नहीं।
    • स्कूलों में ऐसे कामों के लिए सलाहकार होना चाहिए। ऐसे स्कूल भी हैं जहाँ बच्चे गुमनाम रूप से यौन स्वास्थ्य के बारे में कोई भी सवाल पूछ सकते हैं।
    • पुरुष और स्त्री प्रजनन क्रिया और वह कैसे काम करते हैं इसके बारे में जागरूकता फैलाना अनिवार्य है, इससे पहले के युवा खुद इसके बारे में जानें और अपनी जिंदगी के फैसलों में भटकें।

    मेरा मानना है के युवाओं में यौन शिक्षा के सम्बन्ध में जागरूकता फैलाना बहुत ज़रूरी है। इसलिये नहीं कि वह ऐसी उम्र में हैं जहाँ उन्हें ये सब चीज़ें पता होना चाहिए, लेकिन इसलिये के उन्हें इस सब के बारे में पता होना चाहिए इससे पहले की वह कोई गलत फैसला ले लें, मार्गदर्शन के बिना।

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  • 03 Aug
    Nandini Harkauli

    क्या आप टैकनोलजी के ग़ुलाम हैं ?

     

    phone addiction 

     

    "हे! मेरी नई शर्ट देखी, मैं कैसा लग रहा हूँ? "- उत्साहित स्वर में सिद्धार्थ ने अपने दोस्त, रोहन से पूछा।

    रोहन ने सिद्धार्थ के सवाल को अनसुना कर दिया और अपने मोबाइल फोन पर गेम खेलना जारी रखा।

    "रोहन! चल यार ! यहाँ भी देखले!", सिद्धार्थ ने चिल्ला कर कहा।

    "हाँ! तुम बहुत अच्छे लग रहे हो", रोहन ने अनमने ढंग से कहा और अपने मोबाइल पर फिर गेम खेलने में व्यस्त हो गया।

    समय बीतने के साथ रोहन का दूसरों के प्रति बेपरवाह व्यवहार बढ़ता ही रहा। भोजन करते समय भी वह अपने माता-पिता से बात करने की बजाय अपने फोन के साथ कुछ न कुछ काम करता रहता था।  

    पारिवारिक समारोह में भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी, वह अपनी उम्र के अन्य बच्चों के साथ खेलने के बजाय अपना सर झुकाए, हाथों में मोबाइल लिए कमरे के एक कोने में बैठना पसंद करता था।

    वह अपने पुराने मित्रों के साथ भी नहीं रहता था, उसके नए दोस्त कॉलेज के बड़े लड़के थे जिनकी संगति में उसने जुआ खेलना भी शुरू कर दिया था।

    वह घंटों देर रात तक अपने मोबाइल पर सक्रिय रहता था, नतीजतन, उसकी निद्रा चक्र पर इसका प्रभाव पड़ा। कॉलेज में क्लासेज़ के दौरान वह आँखें खुली रख सोता था, जिससे उसकी ध्यानशक्ति और एकाग्रता के स्तर कम हो रहे थे।

    उसके मोबाइल की लत का असर उसके परीक्षा अंकों पर भी दिख रहा था। वह अपने कक्षा के काम को समय पर पूरा नहीं कर पाता था, इसके अलावा, उसने कॉलेज जाना भी कम कर दिया था, विशेष रूप से उस दिन जब असाइनमेंट प्रस्तुत करने होते थे।

    वह अपना पूरा दिन कॉलेज के कैफेटेरिया में, आँखे मोबाइल में डूबी हुई, बैठे व्यतीत कर देता था। उसे भूख न प्यास किसी का होश नहीं रहता था, जिससे उसका शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा था।  

    जल्द ही, रोहन को तीव्र सिरदर्द, आँखें में जलन, नज़र का धुन्दलापन आदि शिकायते होने लगीं। लगातार मोबाइल उपयोग के कारण उसे कोहनी, हाथ और गर्दन में भी दर्द होने लगा था।

    पढ़ते समय वह हर कुछ मिनटों के बाद अपने फोन की जांच करने से खुद को रोक नहीं  पाता था। कभी-कभी उसे बिना बजे ही अपने फ़ोन की आवाज़ सुनाई देती थी।

    वह अब अपने मोबाइल फोन से छुटकारा चाहता था लेकिन ऐसा करने में असक्षम था, मोबाइल की लत ने उसे नशे की लत की तरह ही असहाय बना दिया था।

    हाँ! रोहन स्मार्ट फोन की लत की बीमारी से ग्रसित है, जिसे लोकप्रिय रूप से नोमोफोबिया के नाम से भी जाना जाता है!

    नोमोफोबिया मुख्य रूप से मोबाइल फोन के संपर्क में न रहने के डर से होने वाली व्याकुलता को कहते हैं।  इसमें मोबाइल को बार-बार जांचने की अनियंत्रित इच्छा होती है ,यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई कॉल, संदेश या सूचना उनसे छूट तो नहीं गई।   शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया कि नोमोफ़ोबिया द्वारा सबसे प्रभावित आबादी युवा वयस्कों की है।

    नोमोफ़ोबिया के प्रमुख मनोवैज्ञानिक प्रभावों में शामिल हैं:

    • डर और आतंक
    • आक्रामकता और बेचैनी
    • आत्मसम्मान की कमी
    • ध्यान और एकाग्रता की कमी
    • फीलिंग ऑफ मिस्सिंग आउट (या अकेलापन महसूस करना)
    • स्थितिभ्रान्ति की भावना
    • समय पर इलाज नहीं किए जाने पर डिप्रेशन का कारण बन सकता है

    नोमोफोबिया के, प्रमुख मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों के साथ-साथ शारीरिक प्रभाव भी हैं:

    • शरीर में दर्द
    • उंगलियों, हाथों और कोहनी में दर्द
    • आँखों में जलन और पानी आना
    • कंपन
    • पसीना
    • उत्तेजना और बेचैनी
    • टेकिकार्डिया (tachycardia)
    • नींद की समस्या

    एक माँ ने अपनी 6 साल की बेटी से कहा - " नहीं बच्चे! शोर मत करो, हम जल्द ही घर चल रहे हैं", लड़की चिल्लाती रही, जिससे माँ अपनी दोस्त से ठीक से बात नही कर पा रही थी, तब माँ ने एक आसान रास्ता निकाला, बच्चे को मोबाइल फोन थमा दिया और कहा-"जब तक मैं बात कर रही हूँ ,तुम इससे खेलो। "

    टैकनोलजी की उन्नति और लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार ने न सिर्फ युवा बल्कि 4-5 वर्ष आयु के छोटे बच्चों को पूरी तरह से मोबाइल में तल्लीन कर दिया है ।

    स्मार्ट-फोन की लत को रोकने की प्रमुख जिम्मेदारी माता-पिता, खासकर नई पीढ़ी के माता-पिता के हाथों में है, जो भविष्य में छिपे नतीजों के बारे में सोचे बिना अपने बच्चों की हर ज़िद्द को पूरा करते हैं।

    कुछ माता-पिता अपने कम उम्र के बच्चों की मोबाइल फोन संचालन की योग्यता को सरहाते हैं और गर्व महसूस करते हैं। छोटी उम्र में मोबाइल फोन का अधिक उपयोग बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित करता है।

    किशोरावस्था के बच्चों के बीच अत्यधिक मोबाइल उपयोग एक खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। मोबाइल लत के प्रभाव से लोगों के बीच पारिवारिक और सामाजिक समूहों में, आमने सामने बैठ कर वार्तालाप और चर्चा का चलन भी कम हो गया है।  

    जिम्मेदार व्यसक होने के नाते, हमें युवाओं और स्कूली छात्रों के अत्यधिक मोबाइल उपयोग को रोकने के लिए तत्काल कदम उठानें चाहिए।

    छोटे बच्चों के माता-पिता को अपने बच्चों को मोबाइल फोन की पहुँच से दूर रखना चाहिए और उन्हे घर से बाहर खेल-कूद के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चे से मनचाहा व्यवहार करवाने के लिए कभी भी मोबाइल फोन या उसके इस्तेमाल की लालच या प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए।

    समस्या को जड़ से उखाड़ देना, अपनी सारी जिंदगी को दुखद बनाने से बेहतर है .....

     

  • 03 Aug
    Nishi agarwal

    सी बी टी  (कॉग्नेटिव बिहेवियर चिकित्सा) क्या है ?

    cognitive behavioural therapy

    मान लीजिये कि आपको किसी अंजान कारण की वजह से नौकरी से निकाल दिया जाता है, तो आप दुखी हो कर,  निराश चुप-चाप बैठ जाते हैं। पर आप असल में अपने दोस्तों से मिल-जुल कर समाज में ज़्यादा क्रियाशील हो सकते हैं, जो आपको एक बेहतर नौकरी दिलवा सकती है। सी बी टी (कॉग्नेटिव बिहेवियर चिकित्सा) आपको नकारात्मक सोच से दूर रहना सिखाता है । यह आपके समाज में आपका अस्तित्व बढ़ाएगा। और आपके अंदर सकारात्मक भाव भर देता है।

    सी बी टी  (कॉग्नेटिव बिहेवियर चिकित्सा) में हमारी भारी भरकम दिक्कतों या परेशानियों को 5 हिस्सों में बाँट दिया जाता है ।

    ये पाँच भाग हैं -

    1. परिस्थितियां Situations
    2. सोच Thoughts
    3. भावना Emotions
    4. शारीरिक एहसास Physical feelings
    5. कर्म Actions

    cognitive therapy

    सी बी टी के अनुसार यह पाँचों एक दूसरे से जुड़े हैं और एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं । परिस्थितियां सोच और एहसास की तरफ ले जाती है जो कि आगे जा कर भावनाएं और कार्यो में बहने लगती है। उलझन को दोस्ताने अंदाज़ से सुलझाने में और नकारात्मक सोच की लहर को रोकने में सी बी टी बाकी सभी साइकोथेरेपी से काफी अलग है।

    सी बी टी दुविधाओं को टुकड़ो में बाटकर उनको सुलझाना आसान कर देता है, जिससे कि आप नकारात्मक सोच पर नियंत्रण रख पाते है। आपकी मुश्किलों को सुलझाने लायक बना कर ही सी बी टी आपको कुछ समय में अपनी मुश्किलों का सामना बिना चिकित्सक के करना सिखा देती है। यही सी बी टी का अंतिम लक्ष्य होता है।

    CBT sessions,  सी बी टी थेरेपिस्ट के साथ सीधे सीधे बात कर के भी किया जाता है या फिर वह सभी लोग जो आपके जैसी ही मुश्किल में फंसे है उनके साथ groups में भी किया जा सकता है।

    सी बी टी, थेरेपिस्ट के क्लिनिक में, शोर गुल वाले वातावरण से दूर किया जाता है। यह आपके घर में भी किया जा सकता है खास कर अगर आपको भीड़-भाड़ का डर हो तो। घर का आराम न छोड़ के भी स्काइप/ टेलीफोन सेशन भी किया जा सकता है।

    एक CBT session आधे से एक घंटे का हो सकता है और अगर आप अकेले ही थेरेपिस्ट से सेशन ले रहे हो तो थेरेपिस्ट से 5 से 20 हफ्ते के सेशन के लिए उसके समय के अनुसार मिलने आना होगा। अक्सर सी बी टी एक अच्छे योग्य साइकियाट्रिस्ट, साइकोलोजिस्ट, मेन्टल हेल्थ नर्स या एक जनरल डॉक्टर के द्वारा किया जाता है।

    पहला सेशन: पहले यह देखा जाता है की सी बी टी आपके के लिए सही उपचार है या नहीं और आपके लिए यह प्रतिक्रिया सुविधाजनक है या नहीं। थेरेपिस्ट यह अनुमान लगाता है कि आपकी हालत में कितना प्रतिशत योगदान आपके परिवार, कार्य, एवं समाज का है। आगे के सेशंस में आपकी मुसीबत को अलग हिस्सों में बाँटने में थेरेपिस्ट आपकी मदद करेगा। हो सकता है थेरेपिस्ट आपको एक डायरी में अपने विचार और व्यवहार लिखने को बोले ।

    अगले पड़ाव में आपकी भावनाओं को, सोच को और व्यवहार को समझा जाता है ताकि नकली फालतू और नाकाम चीज़ों को सही चीज़ों से अलग किया जा सके।इस चिकित्सा के बाद अगर आप कुछ बदलते हैं, तो उसके बाद थेरेपिस्ट उस बदलाव को आपकी रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में अभ्यास करने की सलाह देता है।

    कुछ स्थिति और उनके असर का उदाहरण नीचे दिया गया है:

    स्थिति 

    आपने अपने एक दोस्त को रास्ते में देखा पर उसने आपको अनदेखा कर दिया। 

    नकारात्मक सोच: उसने मुझे अनदेखा किया यानी वह मुझे पसंद नही करता। 

    भावना: दुःख एवं गुस्सा। 

    शारीरिक एहसास: बहुत ही कम एनर्जी, बीमार-बीमार लगना। 

    कार्य: आगे जा के उस दोस्त को आपने भी अनदेखा कर दिया।

    उसी स्थिति को अगर हम सकारात्मक तरीके से देखे तो कैसे नतीजा बदल जाता है:

    स्थिति 

    आपने अपने एक दोस्त को रास्ते में देखा पर उसने आपको अनदेखा कर दिया। 

    सकारात्मक सोच: उसने मुझे देखा नही। वह थोड़ा परेशान लग रहा है। शायद वो किसी चीज़ में व्यस्त है। 

    भावना: सकारात्मक  

    शारीरिक एहसास: आम (हर दिन जैसा) 

    कार्य: दोस्त को फ़ोन कर के यह देखे की वह सही तो है ना

    दोनों ही उदाहरणों में एक ही स्थिति के सोच पर आधारित अलग-अलग नतीजे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि हमारी सोच का सीधा प्रभाव हमारे भाव और कार्य पर पर होता पड़ता है।

    सी बी टी की सबसे अच्छी बात है कि, उपचार के खत्म होने के बाद भी आप उसे अपनी रोज़ की ज़िन्दगी में प्रयोग में सकते हैं। आज कल बहुत सारे सॉफ्टवेर आ गए है जिससे हम सी बी टी का लाभ उठा सकते है।

    CBT sessions कैसे प्राप्त करें

    किसी थेरेपिस्ट के पास जा कर आमने सामने थेरेपिस्ट के साथ सेशन करें। वर्चुअल सेशन के लिए आप ऑनलाइन काउंसलिंग साइट्स (जैसे की eWellness Expert) का इस्तेमाल भी कर सकते है। आप खुद की मदद सी बी टी की किताबें और एप से भी कर सकते हैं।

    इंग्लिश में पढ़ें

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