• 17 Aug
    Nandini Harkauli

    तनाव मुक्त रहने के लिए अपनाएं यह 10 आदतें !

    stress free life

    तनाव या स्ट्रेस वह रोग है जिसने हमारे दैनिक जीवन में अपनी स्थायी जगह बना ली है।

    रोज़ -रोज़ दफ़्तर/ स्कूल से आना जाना, खुद के लिए दो वक्त के खाने का बंदोबस्त करना, ऐसी सभी रोज़मर्रा की गतिविधियों में थोड़ा तनाव तो आज के युग में महसूस होना आम बात है।

    तो, इस अन्धकारमय, तनाव से ग्रस्त दुनिया में, आप स्वयं को कैसे बचा कर रख सकते हैं?  तनाव को खुद से दूर रखकर आप कैसे जीवन का पूरा आनंद ले सकते हैं?

     

    इस लेख में हम इन्हीं प्रश्नों के उत्तर जानेंगे।

    आइए शुरू करें!

     

    यूस्ट्रेस्स और डिस्ट्रेस (eustress and distress) - अच्छा और बुरा तनाव।

    मनोविज्ञान में, दो प्रकार के तनाव होते हैं --- साधारण तनाव (eustress) और परेशानी भरा तनाव (distress)।

    तनाव की अवस्था -

     States of stress

    इसे ऐसे समझें -

    • सामान्य अवस्था
      यह आपके शरीर की सामान्य स्थिति है। आपको मूल रूप से कोई तनाव नहीं है
    • यूस्ट्रेस्स: अच्छा तनाव
      तनाव हमेशा हानिकारक नहीं होता, यूस्ट्रेस्स वह तनाव है जो आपको बिस्तर से उठकर, बाहर निकलकर कुछ गतिविधि करने की ऊर्जा देता है।
    • परेशानी: खराब तनाव
      यह वह तनाव है जो आपके उच्च रक्तचाप, उच्च हृदय गति, परेशानी और अन्य सभी नकारात्मक चीजों का कारण बनता है।
       

    कहने का तात्पर्य यह है कि तनाव खुद बुरा नहीं है। यह आपके लिए कुछ गतिविधि करने, लक्ष्य हासिल करने और जीवन में सफल होने के लिए आवश्यक है।


    कहते हैं ना "अति सर्वत्र वर्जयेत्", यानि किसी भी चीज़ की अधिकांश मात्रा बुरी है ,यह बात तनाव पर भी लागू होती है।

     

    10 आदतें जिनको अपनाने से तनाव नियंत्रण में रहता है।

     

    तनाव के खिलाफ़ जंग जीतने के लिए, आपको तैयार रहना होगा,

    और यही हैं वह दस हथियार जो इस युद्ध में आपकी मदद करेंगे। चलिए देखते हैं।

      
    अपने तनाव को नियंत्रित करने के लिए 10 आदतें निम्नलिखित हैं:

    1. कसरत :

    व्यायाम करने के बाद शरीर में "अच्छा महसूस करवाने वाले हार्मोन " संचारित होते हैं, जो तनाव स्तर को कम करने में आपकी मदद करते हैं और आपको शांत रखते हैं।

    तो,शीघ्र ही व्यायाम शुरू करिए !

     

    2. उचित ख़ान-पान :

    खाना आपके शरीर के लिए वही काम करता है जो ईंधन गाड़ी के लिए, यह आपको चलाता है।

    यदि आप गाड़ी में खराब ईंधन डाल दें तो क्या होगा ?

    यह अंततः खराब हो जाएगी और आपको मरम्मत के लिए अपनी जेब से बहुत अधिक खर्चा करना पड़ेगा।

    इसी तरह अपने शरीर रूपी इंजन को ख़तरे में क्यों डालना?

     

    3. पर्याप्त नींद :

    अध्ययनों से पता चला है कि कईं रातों को न सोने और सारी रात जागकर काम पूरा करने से, आपके संयमहीन ,चिढ़चिढ़े और तनावग्रस्त होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।


    4. बात करिए :

    तनाव का कारण कभी-कभी भावनाओं को व्यक्त करने और संवाद करने में कमी भी हो सकती है।

    जब आपके भीतर भावनाओं का घड़ा भर जाता है, तब वह आपके शरीर से बाहर निकलने के लिए उत्तेजना को अपना माध्यम बनाती हैं।

    इसलिए, तनाव मुक्त रहने के लिए अपने करीबी मित्रों या परिवार के सदस्यों से अपनी समस्याओं के बारे में बात करें।

     

    5. नुक़सानदायक आदतों से दूर रहें :

    सारी रात पार्टी करना, धूम्रपान करना पसंद है?

    यह इतनी कम उम्र में आपके बालों के झड़ने का मुख्य कारण हो सकते हैं !

    धूम्रपान, शराब और नशीले ड्रग्स का सेवन करने जैसी नुक़सानदायक आदतें, आपके शरीर में तनाव के स्तर को कईं गुना बढ़ा देती हैं।

    इसके अलावा…

    नींद का अभाव भी लोगों में ऊँचे तनाव स्तर का कारण बन सकता है।

     

    6. स्मार्ट तरीके से काम करें :

    कभी-कभी आप ऐसी चीज़ से परेशान होते हैं जिसे आप बदल नहीं सकते :जैसे समय।

    हमारी दिनचर्या में अनेक ऐसे कार्य होते हैं जो एक समय सीमा में पूरे होने ज़रूरी हैं, और यह हमारे लिए तनावपूर्ण हो सकते हैं।

    आवश्यक है कि आप अपने दायित्वों के अनुसार अपने समय का प्रबंधन करें और उसका सही उपयोग करने में समर्थ रहें।

     

    7. स्वीकार करना सबसे बड़ी कुंजी है :

    हम सभी में ख़ामियां हैं।

    आप अच्छा गा नहीं सकते, नृत्य नहीं कर सकते, आपको कंप्यूटर कोडिंग नहीं आती, आदि बातों पर ज़ोर देने के बजाय, आपको ख़ुद को स्वीकार करना आना चाहिए और अपने कौशल को और निखारना चाहिए।

    आख़िर ,कोई भी हर वर्ग में उत्तम नहीं हो सकता।

     

    8. प्रतिक्रिया करने से पहले सोचें :

    आज के समय में, मनुष्य बहुत बेसब्र हो गया है और बिना सोचे समझे चीजों पर प्रतिक्रिया देने लगा है, जिससे बाद में उसे पछतावा हो सकता है।

    तो फिर क्या करना चाहिए?

    जब भी संदेह हो, कुछ भी प्रतिक्रिया देने से पहले अपने मस्तिष्क का उपयोग ज़रूर करें!

     

    9. अपनी उम्मीदों को नियंत्रित करें :

    कभी-कभी, आपके तनाव का मुख्य कारण आपकी बहुत अधिक अपेक्षाएं हो सकती हैं।
     
    कुछ लोगों की उम्मीदें बहुत अवास्तविक होती हैं।

    अपनी अपेक्षाओं को क़ाबू में रखने से आपको इस मामले में मदद मिल सकती है।

     

    10. हर कीमत पर उत्तेजक पदार्थों से बचें!

    अगर आप अक्सर तनाव में रहते हैं तो चाय ,कॉफी, एनर्जी ड्रिंक्स, इत्यादि जैसे उत्तेजक पदार्थों का सेवन, वास्तव में एक अच्छा विचार नहीं हैं।

    यह आपके नर्वस सिस्टम का काम बहुत बढ़ा देते हैं।

     
    अपना तनाव नियंत्रण में रखने के लिए यह आदतें ज़रूरी हैं।

     

    संक्षेप में कहूँ तो,

    तनाव मानव जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है।

    अपने तनाव को नियंत्रण में बनाए रखने के लिए सर्वोत्तम उपाय है इन अच्छी आदतों को अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपनाना। धूम्रपान छोड़िए, नियमित कसरत कीजिए, स्वस्थ भोजन का सेवन करिए, आदि। इनके प्रयास से आप अच्छा स्वास्थ्य भी प्राप्त करेंगे और तनाव मुक्त भी रहेंगे।
     
    स्मार्ट आदतें अपनाएं और तनाव से दूर रहें !

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  • 16 Aug
    Nandini Harkauli

    9 संकेत -इस रिश्ते से बाहर निकलने का समय आ गया है !

    malaika arbaaz

    जब आप एक रोमांटिक रिश्ते में होते हैं, तो आपको उस व्यक्ति के साथ की आदत हो जाती है। उनके बिना जीना असंभव सा लगता है। कईं चेतावनियों के बाद भी, आप उन्हें खुद से दूर करने से डरते हैं। किन्तु यह मत भूलिए कि ऐसा रिश्ता अगर आपको आगे बढ़ने में सहायता नहीं कर रहा, तो उस रिश्ते को अंत करने में ही आपकी भलाई है।

    यहाँ कुछ बातें हैं जो आपको बताएंगी कि, एक रिश्ते को छोड़ कर जाने का सही वक्त कब है:

     
    1. भरोसे की कमी:

    किसी भी रिश्ते में भरोसे को सबसे महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है। यह गोंद की तरह है जो रिश्ते को जोड़े रखता है। किसी भी झगड़े का अंत बिना इस प्रश्न के नहीं होता -"क्या आप मुझ पर भरोसा नहीं करते? " सारी बातें भरोसे पर ही आकर रुकती हैं। एक बार जब आपका पार्टनर आपका भरोसे तोड़ दे, तो उनके लिए उसे वापिस हासिल करना वास्तव में बहुत कठिन है। यदि आप ज़्यादातर इसी सोच में रहते हैं कि,

    'वे क्या कर रहे हैं'

    'वे कहां हैं' या 'वे किसके साथ हैं' 

    संभावना है कि आप उन पर पूरी तरह भरोसा नहीं करते हैं। अगर रिश्ते में भरोसा नहीं है, तो संभावनाएं कम हैं कि रिश्ता सकारात्मक तरह से आगे बढ़ेगा। शायद यह उन्हें खुद से दूर करने का सही समय है।

     

    2. समाधान के बिना झगड़े:

    संवाद वह साधन हैं जिसमें सब कुछ हल करने की शक्ति होती है, यही कारण है की इसे अंतिम कुंजी कहा जाता है।

    यदि आपके झगड़े ,'यह क्या हुआ' और 'यह क्यों हुआ' जैसे मुद्दों के बारे में बात करे बिना खत्म हो जाते हैं, तो यह एक बहुत बुरा संकेत है, यह आगे चलकर बड़ा संकट बन सकता है।

    एक स्वस्थ रिश्ते में, साथी आपस में बातचीत को महत्त्व देते हैं। यहां तक ​​कि अगर वे नाराज हैं या चिढ़े हुए हैं, तब भी वे समझदार वयस्कों की तरह बात करते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें एक समस्या है, और वे उसके लिए समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। इसलिए वे संवाद करते हैं, जिसकी कमी से गलतफहमी और ग़लत धारणाएं पैदा होती हैं।

    महत्वपूर्ण चर्चाओं को कभी विलंब नहीं करना चाहिए। अधिकतर, वही मुद्दे बार- बार सामने आते रहते हैं, जो अनसुलझे रह जाते हैं। तो या तो इसे बातचीत से हल कर समाप्त करें, या एक ही झगड़े को फिर से दोहराते रहें।

     
    3. अपर्याप्त समय:

    संवाद करने के लिए, पार्ट्नर्स को अपने व्यस्त दिनचर्या से समय निकालना होगा। जब बात आपके साथी की खुशी की हो, तो आपकी पहली प्राथमिकता आपका रिश्ता होना चाहिए।

    जो लोग अपने रिश्तों को अहमियत देते हैं, हमेशा अपने प्रियजनों के साथ संपर्क में रहते हैं। टैकनोलजी ने ऐसा करना हमारे लिए काफी आसान बना दिया है, अगर आपका साथी आपके साथ कईं घंटों तक संपर्क में न रहे, तो आपका नाखुश होना स्वाभाविक है।

    उनकी ओर से एक टेक्स्ट संदेश की अपेक्षा करना भी स्वाभाविक है। यदि वे आपके बार-बार अनुरोध करने के बाद भी आपके लिए समय नहीं निकालते हैं, तो यह इस रिश्ते से बाहर निकालने का समय है।

     
    4.अधिक देना, कम मिलना:

    क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ है, जैसे सारे प्रयास केवल आप ही कर रहे हैं?

    संबंधों की वृद्धि के लिए समझौते महत्वपूर्ण हैं, वे बड़े हों या छोटे। अपने साथी की खुशी या रिश्ते के लिए समझौता करना व स्वयं में छोटे-छोटे बदलाव करना एक बहुत अच्छा संकेत है। हालांकि, अगर आपके समझौते की सराहना नहीं की जा रही है, या यदि अकेले आप ही समझौते कर रहे हैं, तो यह काफी निराशाजनक हो सकता है। अगर आपको अपने साथी से बदले में वही प्रयास नहीं मिल रहे हैं, जो आप उनके प्रति दिखाते हैं और उनसे उम्मीद करते हैं, तो शायद इस रिश्ते को छोड़ने का समय आ गया  है।

     

     5. अतीत में रहना:

    अतीत में रहने से कुछ बेहतर नहीं होगा। अतीत का अतीत होना किसी कारण के लिए है, है ना?

    यदि आपका साथी अपने अतीत, या आपके अतीत को पीछे नहीं छोड़ पा रहा, तो यह अच्छा संकेत नहीं है। आप उस अतीत से आगे बढ़ गए हैं, बड़े हो गए हैं और बेहतर व्यक्ति बन गए हैं। आपको हर वक्त अपने अतीत के स्मरण की आवश्यकता नहीं है।

    यदि आपका साथी महीनों पहले हुई, एक ही चीज़ के बारे में लड़ता रहता है, या सालों पहले हुई आपकी किसी ग़लती के बारे में बार-बार बात करता है, तो वक्त आ गया है कि आप उन्हें बताएं, कि आपको अपने जीवन में इस तरह की नकारात्मकता की आवश्यकता नहीं है।

     

     6. गलतियों को दोहराना:

    ग़लती करना गलत नहीं है, वे हमें बेहतर बनाती हैं। लेकिन वही ग़लती फिर से बार-बार दोहराना बहुत गलत है। अपनी गलतियों से सीखना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हर बार 'सॉरी' का एक ढाल के रूप में प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

    एक ही ग़लती से बार-बार अपने साथी को चोट पहुंचाने में कोई समझदारी नहीं है। यदि आपका साथी वही पुरानी बात दोहराता रहता है जिसपर आप दोनों सौ बार झगड़ चुके हैं, तो इस रिश्ते से बाहर निकलने का समय आ गया है।

     

     7. अपने साथी के साथ लूका-छुपी न खेलें:

    लूका-छुपी बच्चों का एक खेल है, जिसमें वे छिप जाते हैं और फिर प्रकट होते हैं। एक मज़बूत रिश्ते में, किसी प्रकार के राज़ के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए और न ही कोई झूठ होना चाहिए,  फिर राज़ चाहे कितना बड़ा या छोटा हो।

    साथी अक्सर एक दूसरे से चीजों को छिपाते हैं, वह सोचते हैं कि बताने से सब बर्बाद हो जाएगा, या उनका साथी गुस्सा या परेशान हो जाएगा, या सिर्फ इसलिए कि वे उन्हें बताने का साहस नहीं रखते। पर बाद में जब समय के साथ रहस्य खुलते हैं, तब वे केवल अपने किए के लिए ज़िम्मेदार नहीं होते, बल्कि वे इसके भी ज़िम्मेदार होते हैं, कि बात जल्द से जल्द बताने की बजाय वह उसे छिपाते रहे।

    चीजों को खुद तक सीमित रखने से रिश्ते में विश्वास की कमी बढ़ जाती है, जो आप दोनों को जिस भी रास्ते ले जाए,कभी साथ तो नहीं लाएगा।


     
    8. "हमें अलग चीजें चाहिए":

    कईं बार, भले ही दोनों पार्ट्नर्स एक-दूसरे से प्यार करते हैं और उनके बीच सबकुछ ठीक है, पर रिश्तों को खत्म करना पड़ता है।

    अगर दोनों साझेदारों के जीवन में अलग-अलग लक्ष्य हैं, या जीने के अलग-अलग तरीके हैं, या बस अलग-अलग जीवन शैली हैं, और वे ऐसी बातों पर आपसी सहमती नहीं बना पा रहे हैं, तो उनके पास रिश्ते को अंत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि ऐसी स्थिति में, किसी की कोई ग़लती नहीं है। ग़लती या दोष का तो प्रश्न ही नहीं है; यह बस समझने की बात है क़ी दोनों लोगों की बेहतरी के लिए क्या सही है।

     
    9. प्यार की कमी और नफरत की कमी:

    रिश्तों में झगड़े और खुशियाँ दोनों का ही एक के बाद आते रहना, जितना दिखता है उतना बुरा नहीं है। इस तरह, जहाँ झगड़े हैं, वहाँ उनसे उबरने का पर्याप्त समय भी है। पर जब कोई रिश्ता आगे न बढ़े और उसमें कोई ऊर्जा न बची हो, तो रिश्ते खराब हो जाते हैं। ऐसे रिश्ते में व्यक्ति अपने विचारों को व्यक्त करने की ज़रूरत महसूस करना बंद कर देते हैं, भले ही वे अपने पार्टनर की बात से सहमत न हों। वह एक दूसरे से किसी प्रकार की आशा नहीं रखते।

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  • 21 Sep
    Nandini Harkauli

    व्याकुलता विकार - क्या आप लोगों की नज़रों में आने से बचते हैं ?

    social anxiety

     

    निम्न परिदृश्यों के बारे में सोचें:
    1) नए स्कूल, कॉलेज या कार्यस्थल में आपका पहला दिन
    2) मंच पर प्रदर्शन
    3) एक पार्टी में शामिल होना जहां ज्यादातर लोग अजनबी हैं

    यह परिस्थितियां आपको किस प्रकार की भावनाएं ध्यान में लाती हैं? और क्यों?

    यह संभावना है कि आपको अधिक घबराहट या आशंका महसूस होती है और यह भाव, अपने आस-पास के लोगों के सामने अच्छी छवि बनाने की आवश्यकता के कारण पैदा होते हैं।

    हम में से कुछ लोगों के लिए अपरिचित सामाजिक परिस्थितियों में अपने आप को अनिश्चित महसूस करना सामान्य बात है और इन अनिश्चितता की भावनाओं को प्रबंधित भी किया जा सकता है। हम शुरू में नए लोगों के बीच परेशान महसूस कर सकते हैं, लेकिन कुछ समय बाद यह घबराहट कम हो जाती है और हमें उनके साथ अच्छा महसूस होता है और हम उनके साथ का आनंद भी लेते हैं।
    हालांकि, कुछ लोग इतने भाग्यशाली नहीं होते हैं।

    कुछ लोगों के लिए, घबराहट की यह भावना इतनी तीव्र होती है कि वे इन परिस्थितियों से पूरी तरह से बचने की कोशिश करते हैं, उनके लिए ये बहुत असुविधाजनक स्थिति बन जाती है, जिसके कारण वह सामाजिक संबंधों का आनंद लेने में असमर्थ रहते हैं। वे हमेशा दूसरों द्वारा नकारात्मक मूल्यांकन के डर में रहते हैं और घबराते हैं कि वे कुछ ग़लत न कह दें या खुद को शर्मिंदा न कर लें।

    इस दूसरे समूह के अनुभव सामाजिक व्याकुलता विकार के लक्षण हैं, या सामाजिक चिंता (पहले सामाजिक फ़ोबिया के रूप में जाना जाता था)।

    यह दूसरों के सामने प्रदर्शन करने तक ही सीमित हो सकता है (जहां व्यक्ति को बोलने और प्रतिभा प्रदर्शित करने में समस्याएं हैं, जैसे कि एक भीड़ से पहले गायन और नृत्य करना), इस समस्या को प्रदर्शन चिंता कहते हैं, लेकिन ये भावनाएं किसी भी अपरिचित सामाजिक स्थिति के दौरान उत्पन्न हो सकती हैं जहां व्यक्ति जांच के अधीन होने की संभावना महसूस करता है।

    दूसरे मनोवैज्ञानिक विकारों की तरह, सामाजिक चिंता के भी कईं आलोचक हैं। उनके अनुसार इतने सामान्य बात के लिए निदान और पेशेवर मदद की क्या आवश्यकता है?


    हालांकि, विकार से ग्रस्त लोगों के लिए, भय और चिंता की भावना बहुत वास्तविक है। घबराहट संबंधी विकार वाले अधिकांश लोगों की तरह, सामाजिक चिंता विकार वाले लोगों को पता होता है कि उनका भय अकर्मक है और स्थिति अनुसार अत्यधिक है, जिस वजह से उनकी चिंता बढ़ जाती है।
    अपरिचित सामाजिक स्थितियों से बचना रीत बन जाती है, इस हद तक कि उनके सामाजिक, पेशेवर और दैनिक गतिविधियों में हस्तक्षेप बन जाती हैं।

    इस तरह की बातचीत के दौरान, सामाजिक चिंता से ग्रस्त व्यक्ति को पसीने, कांप, शुष्क मुंह, तेज़ हृदयगाति, चक्कर आना और मांसपेशियों में तनाव जैसे शारीरिक लक्षणों का अनुभव हो सकता है, जो कि एक घबराहट की प्रतिक्रिया या आतंक विकार के हमले के दौरान भी अनुभव होता है।

    वे मनोवैज्ञानिक लक्षणों का अनुभव भी कर सकते हैं जैसे कि एक सामाजिक घटना से दिनों या सप्ताहों पहले चिंता, शर्मिंदगी / सार्वजनिक अपमान के साथ व्यस्तता, चिंता करना कि दूसरे आपकी घबराहट देख रहे हैं और यथासंभव सामाजिक स्थितियों से बचने के तरीकों की तलाश करना। कुछ मामलों में सामाजिक स्थिति को आसान बनाने के लिए लोग मादक द्रव्यों के सेवन को उपाय बना लेते हैं।

    सामाजिक घटनाओं से बचने के साथ-साथ, वे छोटी-छोटी गतिविधियों से भी बचते हैं जहाँ बातचीत की संभावनाएं होती है और जहां उन्हें जाँचा या मापा जाए, जैसे कि फोन पर बात करना, सार्वजनिक जगह भोजन करना, सार्वजनिक विश्रामगृह का उपयोग करना या दिशा-निर्देश पूछना।

    सामाजिक चिंता का कारण क्या है?

    पिछले बुरे अनुभव, जैसे कि अति-आलोचक माता-पिता, धमकियों या दुर्व्यवहार का शिकार होना, किसी भी प्रकार के सामाजिक संपर्क से बचने के कारण बन सकते हैं।
    हालांकि, कुछ अनुसंधान से सबूत मिले हैं जो बताते हैं कि सामाजिक चिंता आनुवंशिक भी हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके कुछ लक्षण जैसे घबराहट या आत्म-घृणात्मक होना एक पीढ़ी से दूसरी में भी आ जाते हैं।
    एक अन्य कारण सेरोटोनिन के स्तर में असंतुलन हो सकता है ( न्यूरोट्रांसमीटर सेरोटोनिन मनोदशा और भाव को विनियमित करने में मदद करता है) या अत्यधिक सक्रिय एमिग्डाला ( मस्तिष्क का एक हिस्सा है जो भय प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है) हो सकता है।

    इसे कैसे संसाधित किया जाए?

    ऐसे कईं चिंता विरोधी दवाएं हैं जिन्हें सामाजिक व्याकुलता से पीड़ित लोगों के लिए निर्धारित किया जा सकता है। उनमें बीटा-ब्लॉकर्स शामिल हैं (जो एड्रेनालाईन के उत्तेजक प्रभाव को अवरुद्ध करते हैं और हृदय गति, रक्तचाप और कंपन को कम करते हैं) और सिलेक्टिव सेरोटोनिन रीआप्टेक इनहिबिटर (या एसएसआरआई, जो सेरोटोनिन स्तर बनाए रखने में सहायता करते हैं) शामिल हैं।
    सामाजिक चिंता के लिए चिकित्सा का सबसे लोकप्रिय रूप संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी है (cognitive behaviour therapy), जहां चिकित्सक नकारात्मक विचारों को बदलने और स्वयं-छवि में सुधार करने में आपकी मदद करते हैं।
    एक्सपोजर-आधारित संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (Exposure-Based Cognitive Behaviour Therapy) में, क्लाइंट के साथ भय-उत्पादन स्थितियों को संभालने में कुशलता प्राप्त करने की ओर काम किया जाता है और उनके स्थिति से बचने वाले व्यवहार को एक -एक करके दूर करने का लक्ष्य बनाया जाता है।

    क्या सामाजिक व्याकुलता को प्रतिबंध किया जा सकता है? यदि हां, तो कैसे?

    इस बात का आश्वासन तो नहीं दिया जा सकता कि स्वयं की मनो-प्रतिरक्षित करने की कोशिश से सक्रिय रूप से सामाजिक चिंता को रोका जा सकता है क्योंकि इससे कईं जैविक और आनुवांशिक कारक भी जुड़े हुए हैं।
    हालांकि, निम्नलिखित सुझाव निश्चित रूप से हमारे समग्र मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में मदद कर सकते हैं :

    • एक स्वस्थ आत्म-सम्मान विकसित करना:                                                                                                                                                                                                जब आप स्वयं को सकारात्मक रूप से देखते हैं, तो आप बहुत ज्यादा चिंता नहीं करेंगे। संभावना है, आप परवाह नहीं करेंगे। आप कौन हैं इसके बारे में सुरक्षित महसूस करना और अपनी ताकत और कमजोरियों के बारे में यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने से सामाजिक संपर्कों को शांति से निपटने में आपकी काफी मदद हो सकती है।अपने कुछ पहलुओं पर काम करने से जहाँ सुधार की आवश्यकता है, आपको अधिक आत्‍मविश्वासी महसूस करने में मदद मिल सकती है। यहां तक ​​कि अगर आप एक हद के पार परिवर्तन करने में असमर्थ हैं, तो आप कम से कम कोशिश करने के लिए अपने बारे में बेहतर महसूस करेंगे।

     

    • स्वयं की दूसरों से अपेक्षाओं को कम करें:                                                                                                                                                                                                क्या आप जिस भी व्यक्ति से मिलते हैं, हर एक को पसंद करते हैं? निश्चित रूप से नहीं। उसी तरह, जो भी व्यक्ति आप से मिलते हैं, ज़रूरी नहीं कि वह आपको पसंद करें और वे उस राय के हकदार हैं। कुछ लोगों की आपस में नहीं बनती हैं और आप इस नियम के अपवाद नहीं हैं। जितनी जल्दी आप यह बात समझ जाएंगे, उतना कम आप दूसरों द्वारा पसंद किए जाने का दबाव महसूस करेंगे। आप अपना उत्तम प्रदर्शन करें, जैसे हैं वैसे ही रहें और सब अच्छा होने की आशा करें।

     

    • एक स्वस्थ जीवन शैली को अपनाना:                                                                                                                                                                                                      उन पदार्थों से बचें जो आपकी बेचैनी को बढ़ाएँ और आपको अधिक चिंता की ओर ले जाएं। इसमें कैफीन, अत्यधिक चीनी और कुछ दवाएं शामिल हैं जो मस्तिष्क को उत्तेजित करती हैं (उदाहरण के लिए, प्रदर्शन बढ़ाने वाले पदार्थ जैसे एम्फ़ेटामीन्स और हैलुसिनोजन जैसे मारिजुआना)।

             सामाजिक व्याकुलता शराब के सेवन का एक आम कारण है। इस परेशानी से ग्रसित व्यक्ति ये दावा करते हैं कि यह किसी सामाजिक समारोह से पहले उन्हें आराम पाने में और चिंता दूर करने में मदद करती है और उन्हें          इन स्थितियों से निपटने के लिए आत्मविश्वास देती है। याद रखें कि शराब "आपको आत्मविश्वास नहीं देती", यह आपके संकोच को कम करती है, इसलिए यदि आप कभी-कभी पीने या धूम्रपान का आनंद लेते हैं, तो                  सुनिश्चित करें कि आप इसे विशुद्ध रूप से मनोरंजक उद्देश्यों के लिए ही करें और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आराम पाने के लिए उन पर निर्भर न रहें।
             नियमित रूप से व्यायाम करें क्योंकि शरीर में एंडोर्फिन रिलीज़ होते हैं जो मनोदशा को संतुलित करते हैं।

    • संकेतों को जल्दी पहचानें:
      जितना पहले कि आप समस्या के लक्षणों को पहचान कर पकड़ते हैं, उतनी जल्दी आप इसे आगे बढ़ने से रोक सकते हैं। यदि आप या आपके परिचित व्यक्ति, सामाजिक व्याकुलता के लक्षण दिखा रहे हैं, तो तुरंत एक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से परामर्श करें।
       

    यदि आपको लक्षण अत्यधिक नहीं हैं लेकिन थोड़ी मात्रा में आप बचने वाले व्यवहार के संस्करणों को दिखाते हैं, जो लेख में पहले वर्णित है, तो इन्हें छिपाएं या नकारे नहीं, बल्कि इन पर काम करें ताकि यह गंभीर रूप लेने से पहले ही नियंत्रित किया जा सकें।

  • 10 Sep
    Nandini Harkauli

    बॉडी लैंगुएज - अनकही भाषा !

     

    क्या आपने कभी सोचा है कि आप कुछ लोगों की तरफ ज़्यादा क्यों आकर्षित होते हैं, जबकि कुछ लोगों से  दूर रहना पसन्द करते हैं? कुछ लोगों से आप अपने मन की बात कहने में काफी सहज महसूस करते हैं और कुछ के सामने कम ही बोलना सही समझते हैं? कैसे कुछ लोग, बिना एक शब्द बोले, अपनी उपस्थिति से सम्मान के पात्र बन जाते हैं?

    मनुष्य बिना कुछ बोले एक-दूसरे को प्रभावित करने में सक्षम होते हैं और हम इन गैर-मौखिक संकेतों को पहचानने में काफ़ी माहिर होते हैं।
    हम खुद ही लोगों के गैर मौखिक संवाद को समझना सीख जाते हैं और हमारे व्यवहार को उसके अनुसार संशोधित करते हैं।
    उदाहरण के लिए आप किसी, कभी न मुस्कुराने वाले व्यक्ति की तुलना में उस व्यक्ति की उपस्थिति में ज़्यादा सहज महसूस करते हैं जो अक्सर मुस्कुराते हैं। आप इसे महसूस नहीं करते, लेकिन किसी व्यक्ति की मुस्कान से आप उनके बारे में धारणा बना लेते हैं कि वह स्नेहशील, शांत और अनौपचारिक स्वाभाव के होंगे।
    हम अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए इन संशोधनों को अपनाते हैं क्योंकि हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जिन लोगों के साथ हम बातचीत करते हैं वह हमारे बारे में अच्छी धारणा रखते हैं और इसलिए दूसरों की उपस्थिति में हम अपनी सर्वोत्तम छवि प्रस्तुत करते हैं।

    हालांकि, कई बार लोगों की बातों में और उनकी नीयत में अंतर होता है। कहते कुछ हैं और करते हैं कुछ और। इसलिए यदि आप कभी, किसी से बातचीत करते हुए यह जानना चाहते थे कि दूसरा व्यक्ति वास्तव में क्या सोच रहा था, या यदि आप हमेशा से लोगों के मन पढ़ने में सक्षम होना चाहते थे तो यहां आपकी मदद के लिए कुछ ज़रूरी बातें दी हुई हैं-

    शरीर मुद्रा:

    आपकी शरीर की स्थिर स्थिति भी, आप जिस तरह से बैठे हैं या खड़े हैं, बहुत कुछ बता सकती है। जो लोग एकदम सीधे अपने कंधों को पीछे खींचकर खड़े होते हैं, उन्हें अधिक जोशीले, ऊर्जावान और आत्म विश्वासी व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। उनकी मौजूदगी उन लोगों की तुलना में अधिक सम्मानीय होती है, जो कंधे झुकाकर रहते हैं। हमारी नज़र में वह आलसी और आत्मविश्वास की कमी रखने वाले होते हैं। 

    हाथों को सीधा रखके शरीर का आरामदायक मुद्रा में होना यह इंगित करता है कि आपसे बात करना आसान है और आप खुले दिमाग के व्यक्ति हैं। आप एक ऐसे व्यक्ति के साथ वार्तालाप करने की अधिक संभावना रखते हैं जो इस तरह खड़ा होता है। उनके मुक़ाबले वह व्यक्ति जो हाथ मोड़कर खड़े रहते हैं यह बताते हैं की उनकी सोच कम व्यापक है और अधिक संभावना है कि वह व्यक्ति आपके विचारों को स्वीकार नहीं करेंगे।

    मुस्कुराहट की वास्तविकता:

    कभी-कभी लोग विनम्र दिखने के लिए या वास्तव में क्या सोच रहे हैं यह छिपाने के लिए मुस्कुराते हैं। किसी की मुस्कुराहट असली है या नकली इसका जवाब उनकी आंखों में होता है। अगर मुस्कुराहट किसी के आँखों को कोनों पर सिलवटें ले आए, तो मुस्कुराहट वास्तविक है। अगर किसी की मुस्कान उनकी आंखों तक नहीं पहुंचती है, तो हो सकता है वह वास्तविक नहीं है।

    आँख से संपर्क बनाए रखना:

    आँखों से संपर्क बनाए रखना और बातचीत की आवश्यकता के अनुसार बीच-बीच में नज़रे हटाना निष्कपटता और आत्मविश्वास का संकेत होता है। बहुत ज्यादा देर तक आई कॉन्टैक्ट लोगों को असहज महसूस करा सकता और उन्हें ऐसा लग सकता है जैसे उनकी जाँच की जा रही है। हम में से बहुत से लोग तब नज़रें मिलाने से बचते हैं जब पूरी तरह से सच नहीं कह रहे होते। हालांकि, कुछ लोग झूठ को छिपाने की कोशिश में दूसरों की आँखों में ज़रूरत से ज़्यादा देर तक घूरते हैं और दूसरे व्यक्ति को इससे परेशानी भी होने लगती है। ग़लत तरीके से किया गया आई कॉन्टैक्ट बेईमानी और कपटता का संकेत देता है। पर कईं बार जब व्यक्ति के नज़रें इधर उधर भटकती रहें तो यह डर या बेचैनी के संकेत हो सकता है, उदाहरण के लिए अगर उनके आस-पास के वातावरण में कोई वस्तु या व्यक्ति उन्हें परेशान कर रहा है।

    चेहरे के हाव - भाव:

    वास्तविक मुस्कुराहट अच्छा और भ्रूभंग (frown) बुरा संकेत होते हैं, यह तो सब जानते हैं, लेकिन व्यक्ति की चेहरे की मांसपेशियों के तनाव से भी बहुत सी बातें पता लगाई जा सकती हैं।
    ऊपर उठीं हुईं भौहें चिंता, डर या आश्चर्य का संकेत देती हैं। जो व्यक्ति शांति से बातचीत कर रहा है वह कभी अपनी भौहें नहीं चढ़ाएगा। वहीं शिकन से सिकुड़ी हुई भौहें यह संकेत देती हैं कि व्यक्ति परेशान है या घबराया हुआ है। जबड़े को भींचना या गर्दन की अकड़न व्यक्ति के तनावग्रस्त होने के संकेत हैं।

    ये सभी संकेत देते हैं कि व्यक्ति बातचीत में कही जा रहा चीज़ों से असहज है या किसी और चीज़ के बारे में चिंतित है और उनका ध्यान कहीं और है।

    हाथ,पैर,सिर हिलाने की आदत:

    जो लोग स्थिर खड़े या बैठे होते हैं, वे उन लोगों की तुलना में दूसरों पर बेहतर प्रभाव डालते हैं जो लगातार हिलते रहते हैं। चंचलता से पूर्ण लोगों को बेपरवाह, व्याकुल, कम आत्मविश्वासी व्यक्ति के रूप में देखा जाता है।
    बार-बार सिर हिलाने से यह तो दिखता है कि आप ध्यान से सब सुन रहें हैं, लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा ऐसा करने से यह लगता है कि आप बोलने वाले व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर खींचकर उनसे प्रशंसा पाने के लिए ज़्यादा चिंतित हैं।

    स्पेस:

    जिन लोगों के साथ आप बातचीत कर रहे हैं, उनके और आपके बीच की दूरी इस बात का संकेत है कि आपके रिश्ते कितने करीबी हैं। आप उसी व्यक्ति को आपने बहुत पास खड़ा होना पसंद करेंगे जिनके साथ आप सुरक्षित और सहज महसूस करते हैं।

    आप उस व्यक्ति को अपने पर्सनल स्पेस में नहीं आने देना चाहेंगे जो सिर्फ एक सहयोगी है या जिससे सिर्फ़ जान पहचान है।


    व्यक्ति के साथ आपके संबंधों के अनुसार उपयुक्त दूरी बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत करीब रहने से दूसरों को असहज महसूस हो सकता है और बहुत दूर खड़े होने से ऐसा लग सकता है जैसे आप सबसे कट कर अलग रहना चाहते हैं। नए लोगों से या उन लोगों से बात करते हुए जिनके आपसे करीबी संबंध नहीं है, एक हाथ की दूरी रखना उपयुक्त है।

    आवाज मॉड्यूलेशन:

    हालाँकि यह हमारे बोलने की भाषा में एकीकृत है, आवाज़ मॉड्यूलेशन, टोन और पिच गैर मौखिक संचार का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। टोन और वॉल्यूम में बहुत सारे बदलाव करने वाले व्यक्ति, एक लय में बोलने वाले लोगों से अधिक एनिमेटेड और दिलचस्प लगते हैं।

    बोलते हुए अलग- अलग शब्दों पर ज़ोर दिए जाने से वाक्य के अर्थ भी भिन्न हो जाते हैं।

     

    दिलचस्प सांस्कृतिक विभिन्नता -

    हालांकि इनमें से कुछ शारीरिक भाषा के संकेत (जैसे चेहरे का भाव) सारी संस्कृतियों में समान हैं, कुछ संकेत भिन्न भी हैं। इशारों और संकेतों का अर्थ एक संस्कृति में कुछ, और किसी दूसरी संस्कृति में काफी अलग हो सकता है। व्यक्तिगत दूरीऔर आवाज मॉडुलन के पैटर्न भी बदल सकते हैं।

    इस प्रकार के कुछ उदाहरण निम्नानुसार हो सकते हैं:
                     
     

    • अपने अंगूठे और तर्जनी उंगली को गोलाई में जोड़कर, बची हुई तीन उंगलियों को सीधा रखना भारत में 'ओके' या 'सब ठीक/ अच्छा है' के प्रतीक हैं, लेकिन दूसरे देशों में यह मुद्रा पूरी तरह से अलग मायने रखती है।
    • यह संकेत जापान में "पैसे" का प्रतीक है। इसे कभी-कभी रिश्वत लेने या देने का संकेत माना जा सकता है। फ्रांस और बेल्जियम में, इस मुद्रा को "शून्य" के रूप में समझा जाता है और इसका इस्तेमाल अपमान के रूप में या यह बताने के लिए किया जाता है कि आपको कुछ पसंद नहीं है।

    • अंगूठे को ऊपर करना व्यापक रूप से प्रशंसा या सहमति व्यक्त करने के लिए उपयोग किया जाता है, लेकिन ग्रीस व दक्षिण और पश्चिम अफ्रीका के कईं क्षेत्रों में यह बेहद अपमानजनक मुद्रा है। इन देशों में इसका अर्थ बेहद ही अभद्र होता है।

    • अपनी तर्जनी और बीच की ऊँगली से 'V'का चिन्ह बनाना ब्रिटेन में अभद्र अर्थ रखता है। जर्मनी में इसका अर्थ 'विजय' और एंग्लो-सक्सोन देशों में 'दो' संख्या होता है।
    • सभी देशों में हिदायत में सिर ऊपर- नीचे हिलाना 'हाँ' और सिर दाएँ- बाएँ हिलाना 'नहीं' के प्रतीक नहीं होते। वास्तव में, बुल्गारिया और अल्बानिया में, इनके अर्थ काफी विपरीत है! ग्रीस में, पहले एक बाहिनेऔर फिर दाहिने ओर सिर का झुकाव 'हाँ' माना जाता है और सिर का पहले ऊपर फिर नीचे झुकाव का अर्थ होता है 'नहीं'।
    • इसके अतिरिक्त, अलग-अलग संस्कृतियां व्यक्तिगत दूरी के अलग मापदंड रखती हैं। इटली और लैटिन अमेरिका जैसे देशों में, अजनबियों के दोनों गालों पर चुंबन देकर मिलना स्वीकार्य है। उत्तर अमेरिकियों और ब्रिटिश लोगों में हाथ मिलाने को पसंद किया जाता हैं। मध्य-पूर्व में बहुत से देशों में, छूने को बिल्कुल भी प्रोत्साहित नहीं किया जाता है

    गैर-मौखिक संचार सभी सामाजिक संपर्कों का एक महत्वपूर्ण अंग है। किस चीज़ का अर्थ क्या है, यह जान लेने से आपका पारस्परिक कौशल बढ़ता है और दूसरों के साथ आपके व्यवहार को भी बेहतर बनाता है। कभी-कभी, अनकही बातें आपको मौखिक भाषा के द्वारा व्यक्त की गई बातों से अधिक जानकारी प्रदान कर सकती हैं।

  • 05 Sep
    Nandini Harkauli

    क्या 'वचनबद्धता' अतीत का विचार हो गया है?

     

    वचनबद्धता का मतलब है किसी मुद्दे, गतिविधि या व्यक्ति के प्रति समर्पित होना, तब भी जब ऐसा करने में आपकी स्वतंत्रता सीमित हो रही हो।


    committement

     

    दुर्भाग्य से वर्तमान पीढ़ी कहती ज़्यादा है, करती कम है। अधिकांश युवा प्रतिबद्धता से डरते हैं, प्रतिबद्धता मेरे लिए भी मुश्किल है; इतना कि मैं एक स्थायी टैटू बनवाने से झिझकती हूँ क्योंकि यह एक जीवन भर का निर्णय है।

    निराशाजनक बात है कि प्रतिबद्धता से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है- "शायद"। आप आज के युवा से कुछ भी पूच लीजिए , जवाब एक ही आएगा - 'शायद'

    प्रश्न- "क्या कल सुबह सैर के लिए चलोगे?"

    उत्तर- "अगर जल्दी उठ गया, तो शायद।"

    प्रश्न- "तुम्हें गोवा घूमने जाना था ना, अगले सप्ताह के अंत में चलें क्या?"

    उत्तर- "मैं अभी पक्का कुछ नहीं कह सकता, लेकिन हम योजना बना लेते हैं।"

    प्रश्न- "क्या तुम सच में उस लड़की को इतना पसंद करते हो, जो उसके सामने प्यार का प्रस्ताव रखने जा रहे हो?

    उत्तर- "मैं उससे मुझसे शादी करने के लिए नहीं कह रहा हूं, आगे चलकर क्या होगा कौन जानता है, लेकिन अभी मैं उसे पसंद करता हूँ "

     

    commitment

    सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से, हमारे जवाब क्लिफ़हैंगर में बदल रहे हैं। निश्चितता अब अनिश्चितता में बदल रही है। जिम्मेदारियां उठाना प्रतिबद्धता के डर में परिवर्तित हो रहा हैं। ऐसा होने कि कईं कारण हैं।

    हम असंख्य संभावनाओं की दुनिया में रह रहे हैं। कईं अवसर हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। हमारे पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है और बहुत सारे विकल्प हैं। पर हमें उन सब विकल्पों में से एक को चुनना पड़ता है और एक चीज़ की प्रतिबद्धता का मतलब है दूसरे विकल्पों को न चुनना, जिससे हमें ऐसा महसूस होता है की हम ऐसा विकल्प छोड़ रहें है जिसे हमारा छोड़ने का मन नहीं था। हमारे मन में ऐसे विचार आते हैं जैसे, 'कौन जानता है, कुछ बेहतर मिल सकता था? नौकरी में और अधिक वेतन हो सकता था? या बेहतर जीवन साथी मिल सकता था?' इस वजह से एक विकल्प के चुनाव के बाद भी हम असंतुष्ट महसूस करते हैं। एक विकल्प चुनना और उस पर स्थिर रहना मुश्किल है!

    हमारे पास इतने सारे भिन्न विकल्प हैं- यह कहा जाता है कि वैरायटी इज़ द स्पाइस ऑफ लाइफ। खैर, दुख की बात है कि यह मसाला हमारे लिए काम नहीं कर रहा है। हमें इस आज़ादी के बोझ का सामना करना पड़ रहा है; चुनाव करने की स्वतंत्रता, सही चुनाव करने का बोझ बन जाती है।

    हमारे जीवन में 'क्या होगा अगर.... " इस सोच कि अति हो गई है। अगर मैं एक साल बाद शादी करूँ तो, क्या होगा अगर मैं अपना काम शुरू करने के लिए नौकरी से इस्तीफा दे दूँ ? अगर मैं अभी बाहर जाऊं और बाद में अध्ययन करूं तो क्या होगा?" एक बात पर निर्णय लेने का अर्थ है अनंत और अवसरों को ठुकराना।

    बेहतर चीजों का पीछा करने की निरंतर इच्छा- हमें हमेशा और अधिक प्राप्त करने की उम्मीद करते हैं; अधिक महंगा, अधिक सुंदर,अधिक रोचक और अधिक आरामदायक, हम ज़्यादा की लालच कभी नहीं छोड़ते। यही कारण है कि हम जो कुछ भी करते हैं उससे हम संतुष्ट नहीं रहते और उसकी तरफ समर्पित नहीं रह पाते। या कह सकते हैं की हम कुछ बेहतर खोने से डरते हैं पर जो हाथ में है,उसे भी पास रखना चाहते हैं। हम किसी उद्देश्य या व्यक्ति के प्रति पूरी तरह से समर्पित नहीं रह पाते हैं। संतुष्टि की कमी प्रतिबद्धता की कमी को जन्म देती है।

    दूसरी ओर, किसी और का भरोसा तोड़ने का भय भी रहता है, "क्या होगा अगर मैं अभी वचन दूं, लेकिन बाद में कुछ ऐसी परिस्थिति आ जाए कि मैं इसे पूरा न कर पाऊँ?" दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा न करने का डर भी प्रतिबद्धता के डर का कारण बन जाता है। हम हर किसी को खुश करने की इतनी कोशिश करते हैं कि हम "नहीं" कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। लेकिन हम 'हाँ' भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि कौन जानता है कि आगे क्या हो सकता है, इसलिए हम विलंब करते हैं। हम किसी न किसी बहाने से बात को नम्रतापूर्वक टालकर उसे भविष्य की तिथि के लिए छोड़ देते हैं। ऊफ्फ! जान बची!

    आज, हमारे पास जानकारी का भंडार है। सीखने, देखने और करने के लिए बहुत सी बातें हैं! क्या करना है और क्या नहीं करना है, यही मुख्य प्रश्न है।

    हम अपनी पूरी कोशिश करते हैं कि जितना हासिल कर सकते हैं करें; हम जो थे उससे बेहतर बनें, लेकिन वास्तव में, यह हमें कहाँ लेकर जा रहा है? एक ही समय पर कई चीजों को करने की कोशिश में, हमारी प्रतिबद्धता भी विभाजित हो जाती है; न केवल संख्या में बल्कि ताकत में भी। धीरे-धीरे, हम शुरू की गई किसी भी चीज के प्रति मुश्किल से प्रतिबद्ध रहते हैं और हताश महसूस करते हैं। हम पूरी तरह से स्वयं को दोषी नहीं ठहरा सकते। हर कार्य सोच समझकर करना आसान नहीं है।

    एक और दृष्टिकोण, "स्वयं" पर फोकस हो सकता है। हम किसी और से प्यार करने से पहले अपने आप को प्यार करना सीखने पर ज्यादा ज़ोर दे रहे हैं। स्वयं के प्रति यह ध्यान, हालांकि स्वस्थ और आवश्यक है; आपको आत्म-केंद्रितता की दिशा में ले जाता है। शायद हमने खुद को इतना महत्व देना शुरू कर दिया है कि हमें दूसरे लोगों के मूल्य का एहसास नहीं होता।

    परंपरागत विवाह, जो दो लोगों का मेल है, कहीं न कहीं लोकप्रियता खो रहा है क्योंकि स्वयं से प्रतिबद्धता की एक दिलचस्प अवधारणा सामने आई है - "सोलोगमी"।

    सोलोगमी का अर्थ है कि किसी व्यक्ति का स्वयं से विवाह करना। यह स्व-प्रेम और आत्म-करुणा के रूप में जाना जाता है। कुछ लोग इससे सहमति रखते हैं, कहते हैं कि यह आपको एक खुशहाल जीवन की ओर ले जाता है। कुछ लोग इसे अहंकार और नारीवाद के चरम संयोजन के रूप में देखते हैं। यह स्वयं के लिए प्यार को थोड़ा उच्च स्तर पर ले जाता है, लेकिन यह निश्चित रूप से तय है कि, यदि किसी गतिविधि या व्यक्ति के लिए न सही कम से कम हम अपने खुद के लिए अभी भी प्रतिबद्ध हो सकते हैं।

    भारत में आकस्मिक शारीरिक संबंधों की बढ़ती प्रवृत्ति के साथ,समाज अधिक उदार बन रहा है और लिव-इन रिश्तों को स्वीकार कर रहा है। देर से विवाह करने के बढ़ते चलन के लिए लिव-इन संबंध एक मुख्य कारण है। लोग किसी को एक आजीवन प्रतिबद्धता देने से बचना चाहते हैं। शायद उनकी सूची में अन्य चीजें हैं,उम्मीद है, जिनके लिए वे प्रतिबद्ध हैं।

    सामान्य तौर पर, आज के युवा यक़ीनन इस खतरनाक शब्द 'वचनबद्धता' से दूर ही भागते हैं, लेकिन यह उन्हें सफलता की ओर नहीं ले जाएगा। हालांकि प्रतिबद्ध रहना बहुत कठिन काम लग सकता है, पर यह अपने साथ संतोष और खुशी की भावना भी लेकर आता है।

    एक विकल्प चुनें, इसे पूरी तरह से जाँच लें, प्रतिबद्ध रहें और पीछे कभी न देखें।

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