कुल 169 लेख

  • 19 Dec
    Anjali Khurana

    बच्चों का इंट्रोवर्ट नेचर कोई बीमारी नहीं, इन बातों का रखिए ध्यान

    bacchho ka intravart nature koi bimari nahi

    कई बच्चे छोटी उम्र से ही खुद में रहना पसंद करते हैं। अकेले बैठ कर म्यूजिक सुनना या कुछ पढ़ते रहना। बच्चों की इस आदत को अकसर अभिभावक समझ ही नहीं पाते हैं और दूसरे लोगों के साथ न घुलना-मिलने के कारण टेंशन में आ जाते हैं, लेकिन जरूरी नहीं ये बच्चे पूरी जिंदगी इंट्रोवर्ट ही रहें। बढ़ती उम्र के साथ बच्चे एक्सट्रोवर्ट यानी दूसरों के साथ बातचीत करने लगते हैं। अगर आपका बच्चा दूसरों से बातचीत करने की बजाय खुद में रहना पसंद करता है तो परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। इन कुछ बातों पर ध्यान दें-

     

    पहला, इसे स्वीकार करिए।
    इंट्रोवर्ट बच्चों के पेरेंट्स को लगता है कि उनके बच्चों में एक्स-फैक्टर नहीं है। इंट्रोवर्ट नेचर के लिए बच्चों को डांटिए मत। उन्हें बताइए कि आप बाकी बच्चों से अलग हो, लेकिन जैसे हो अच्छे हो। पेरेंट्स द्वारा ऐसा कहने से बच्चों को अच्छा महसूस होगा और वे अपनी ताकत को पहचानने लगेंगे। इससे बच्चे को किसी को कॉपी करने या उस जैसा बनने की एक्टिंग करने की भी जरूरत नहीं रहेगी।
    bachho me intravert nature
    दूसरा, बैलेंस करना सीखिए। इंट्रोवर्ट बच्चे खुद के कंफर्ट ज़ोन में ही रहना चाहते हैं। ऐसे में बच्चे को थोड़ा एडवेंचरस बनना सिखाइए। बच्चों से लगातार बात करिए। उन्हें बताइए कि दूसरों से बातचीत करना, उनके साथ मिलना-जुलना एक लाइफ स्किल है, जो समाज में रहने के लिए बहुत जरूरी है। बहुत सारे कार्य एक साथ ही करने को मत करिए। उन्हें हर हफ्ते के लिए एक प्रोजेक्ट या असाइनमेंट दें, जिनसे बच्चे का सोशल कॉन्फिडेंस बढ़ने लगे। इसमें बर्थडे पार्टी का हिस्सा बनना, स्कूल असेंबली में बोलना या फैमिली फंक्शन में परफॉर्म करना शामिल होगा।
    Bachho ke sath balance kaise kare
    तीसरा, सेलिब्रेट करिए।
    एक्सट्रोवर्ट लोगों को पसंद किया जाता है, लेकिन इंट्रोवर्ट लोग ग्रेट थींकर बनते हैं। क्योंकि एक कोने में शांत बैठकर वे खुद के भीतर झांकते रहते हैं। वे दुनिया को एक्सट्रोवर्ट लोगों की अपेक्षा बेहतर तरीके से समझते हैं। इसलिए बच्चों की नेचर जैसी भी हो, उनके साथ सेलिब्रेट करिए। इंट्रोवर्ट बच्चे भी इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करने के सक्षम होता है, जिसका कारण उनकी विशेषताएं होती हैं।

    Article taken from Danik Bhaskar news paper (http://www.bhaskar.com/news/LIF-RELA-4-things-to-be-remember-with-introvert-kids-5145600-PHO.html)

    Credit for images and text goes to their respective owners, we are just helping in taking it to masses. eWellness Expert doesn't own anything in this post.

  • 19 Dec
    Shiva Raman Pandey

    ६ टिप्स जिन्हे अपना कर ऑफिस में कार्य शक्ति बढ़ाएं ।

    how to deal with work pressure

     

    हम सभी को वर्किंग working रहते हुए सामाजिक जीवन के कर्त्तव्य और और कई भूमिकाओं को एक साथ  निभाना होता है । हम में से कुछ उन जिम्मेदारियों का अच्छी तरीके से निर्वहन करते हैं, और कुछ संघर्ष के साथ कर पाते है ।

     आखिर ऐसा क्यों होता है ?

    सफलतापूर्वक काम के दबाव से निपटने के लिए कई पहलू हैं। इस बारे में अनुसन्धानों से यह पता चला है कि,निम्न टिप्स को अगर आप पालन करें तो आप भी इस दबाव से  निकल सकते हैं |

    Jeevan me samay kya mahtva hai

    समय प्रबंधन

    हम सभी के  काम के घंटे सीमित है, और यह जरूरी है की हमें अपने दिन भर में जो भी काम करना है उसका एक टाइम शेडूल बना लें । इससे न केवल हम पूरे कार्य के लिए एक समय सीमा तय कर पाते हैं, बल्कि  प्रत्येक छोटे कार्य के लिये एक समय सीमा निर्धारित करने में मदद मिलती है। इसलिए, चाहे एक कदम ही उस कार्य को करने में लिया जाए, परन्तु इससे आपको उस कार्य को करने में जो समय लिया जाना है आपको वह पता चल जायेगा ।

    apne laghya ki prapti kaise kare

    लक्ष्य निर्धारण

    टाइम मैनेजमेंट के बाद अगला जरूरी स्टेप है अपने टारगेटTarget को निर्धारित करना । लक्ष्य व्यवस्थित, प्राप्य और समय-सीमा में होना चाहिए। बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल होने की उम्मीद कम होती है । हर स्टेपStep में आगे बढ़ने से पहले जरूरी है कि उसके पहले का स्टेप पूर्ण हो ।

    Apne din ki suruaat kaise kare

     

    तनाव प्रबंधन

    हमारा तनाव हमें यह अहसास कराता है कि हमें कार्य को समय से पूर्ण करना है । हालाँकि अगर इस तनाव की वजह से हमारे कार्य करने में दिक्कत आ रही है तो, शारीरिक व्यायाम, सांस लेने की तकनीक, विश्राम, योग और एक सामान्य स्वस्थ जीवन शैली अपना कर अपने लक्ष्य  को पूरा करना  चाहिए ।

    सहयोगियों से सम्बंध

    हम सभी काम में सहयोग पाने के लिए हमारे जूनियर, वरिष्ठ लोगों और अपने सहयोगियों की मदद की लेते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि हमारे सम्बन्ध उनसे मधुर बने रहें । लोगों को उनके अच्छे काम के लिए बधाई देना, उनके साथ मित्रवत व्यवहार और सबसे महत्वपूर्ण किसी कार्य में असहमति होने पर आक्रामक होने के बजाय मिल जुल कर उस कार्य को पूर्ण किया जाना चाहिए ।

    krodh ke dushprabhav

    क्रोध पर नियन्त्रण

    बहुत सारे प्रतिभावान कर्मचारी भी अपने गुस्से को काबू में ना कर पाने की वजह से टॉप पर नहीं आ पाते, उनका क्रोध उन्हें  उनके कार्य में में फोकस नहीं करने देता, और इस स्वभाव की वजह से उनके सम्बन्ध  मैनेजर, जूनियर और सहयोगियों के साथ अच्छे नहीं रह पाते, और उनकी उन्नति में रुकावट बनते हैं । क्रोध को बढ़ने से पूर्व ही निम्न दिमागी कसरत जैसे जटिल गणना, बैकवर्ड गिनती करना, गहरी सांस लेना अथवा प्राणायाम करके रोका जा सकता है।

    कार्य और निजी जीवन में संतुलन

    अंत में एक अत्यधिक मूल्यवान कर्मचारी वह है जो कार्य करने में खुशी और ताजगी  महसूस करे। आप नए विचार, और उच्च गुणवत्ता वाले काम तभी सोच पाते है जब आप अपने कार्य से एक अवकाश लें । जब आप घर पर भी कार्य का बोझ लेकर जाते हैं तब यह संभव नहीं हो पाता। इसका कारण है की जब आप कार्य से एक ब्रेक नहीं लेते तो आपकी  मस्तिष्क की कोशिकाओं का एक  गुच्छा लगातार एक ही काम करने से थक जाता है और वो ठीक से कार्य नहीं कर पातीं। यह उसी तरह से है जैसे कि  परीक्षा से पहले अंतिम मिनट की पढ़ाई आपके स्कोर बढ़ाने में मदद नहीं कर सकती । इसलिए परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत और अच्छी नींद भी काम के दबाव को संभालने के लिए  महत्वपूर्ण है। 

     Image source

     

  • 19 Dec
    Anjali Khurana

    क्या है मानसिक विकार(Mansik vikar)?

    mansik vikar

    क्या है मानसिक विकार ?

    आप सोच रहे हैं कि मानसिक विकार का मतलब क्या होता है ?

    क्या कमजोर लोग ही मनोचिकित्सा करवाते हैं ?

    क्या इस रोग से ग्रसित व्यक्ति नियन्त्रण में नहीं रह पाते  ?

    क्या मानसिक स्वास्थ्य विकार होने का मतलब आप पागल हैं ?

    या यह बीमारी संक्रामक होती है ?

    अथवा  ग्रसित व्यक्ति के संपर्क में आने से आप को भी यह बीमारी हो जाएगी ?

    इस तरह के और कई अन्य सवाल आपके मन में होंगे । हम नीचे आप के लिए उनमें से कुछ के जवाब दे रहे हैं ।

    मानसिक बीमारी के कारण

    मानसिक विकार में शामिल विभिन्न कारण हैं । ये कारण हैं:

    किसी प्रियजन की मौत , जुदाई , दुर्घटना, अलगाव, व्यापार में घाटा, बचपन के बुरे अनुभव , जॉब को लेकर चिंता , पैसे की कमी , काम का दबाव  इन सभी सामाजिक कारणों की वजह से जो व्यक्ति मानसिक बीमारी के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं , वे इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं । अतः आप देख सकते हैं कि मानसिक बीमारी के कारणों में वातावरणीय कारक,बायोलॉजिकल कारक और मनोवैज्ञानिक कारक हो सकते हैं ।

    इसका मतलब है कि मानसिक बीमारी के उपचार के लिए दवाएँ ही अकेले समस्या का समाधान नहीं कर सकती  है। वे मरीज के न्यूरोट्रांसमीटर में हुए असंतुलन को नियंत्रण करने में मदद करती हैं , बाकी काम विभिन्न प्रकार की थेरेपी के द्वारा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर किया जाता है । थेरपी व्यक्ति के अंदर के नकारात्मक विचारो को सकारात्मक विचारों में परिवर्तित कर उसे सशक्त बनाती है ।

    परन्तु विडम्बना यह है कि,मानसिक विकार को लेकर काफी सारी भ्रांतियां फैली हुई हैं , हमें इसकी रोकथाम के लिए मिल जुल कर काम करना चाहिए । हम अभी भी मानसिक विकार के रोकथाम और उपचार पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे हैं, और  सामाजिक परिस्थितियों, गरीबी, शोषण और हिंसा जैसे अनुभवों से इसके और अधिक होने की संभावना है ।  पीड़ित व्यक्ति के साथ प्यार भरा व्यवहार  ही  इसकी रोकथाम की दिशा में पहला कदम  होगा ।

    मानसिक रोग से परेशान व्यक्ति को अपशब्द जैसे 'तुम पागल हो' या 'क्या तुम साइको हो' जैसे वाक्य बोल कर अपमानित नहीं  करना  चाहिए । हमें यह समझना होगा कि पीड़ित व्यक्ति किन संघर्ष के साथ जीवन को जीने की कोशिश कर रहा है । हमे उन लोगों का अपमान नहीं करना चाहिए , क्योंकि वे खुद इस रोग के होने का कारण नहीं है, यह समाज उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है ।

    कृपया अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए वीडियो को देखें ।

  • 19 Dec
    Anjali Khurana

    जानें! कैसे बनें कुशल वक्ता

    Kaise bane kusal vakta

    अगर आपको स्टेज पर लोगों के सामने बोलने  से डर लगता है,तो रखें इन बातों का ध्यान ।
     
    लोगों के सामने बोलने का डर सबसे बड़ा डर माना जाता है।अगर आपको पब्लिक में बोलने से डर लगता है तो आप अकेले इंसान नहीं हैं| आप अपने इस डर को दूर कर सकते हैं| बस आपको कुछ बातों का ध्यान रखना होगा |
    सबसे पहले आप इतना सुनिश्चित कर लें कि,जिस टॉपिक को आप बोलने जा रहें हैं वह आपको अच्छे से पता होना चाहिए । वही टॉपिक चुनें जिसके बारे में आपको अच्छे से पता हो,अन्यथा टॉपिक की जानकारी ना होने पर तनाव होगा और आप ठीक से स्टेज पर बोल भी नहीं पाएंगे ।
     
    स्पीच को पॉइंट्स में लिखें, ऐसा करने से आप स्पीच को जल्दी और अच्छे तरीके से याद कर पाएंगे ।
     
    आप स्पीच को याद करने के लिए सुबह का समय चुन  सकते है ,क्योंकि यही वह समय है जब आप अपने दिमाग को बिना किसी डिस्टर्बेंस के साथ संकेंद्रित कर सकते हैं|
     
    अगर संभव हो सके तो अपनी स्पीच को रिकॉर्ड करके उसको सुनिए और गल्तियों को सुधार कर फिर से प्रैक्टिस कीजिये ।
    kushal vakta banne ke liye kya kare
    दर्पण के सामने खड़े हो कर स्पीच की प्रैक्टिस करें जिससे आपको अपने अंदर की खूबियों को बाहर लाने का मौका मिलेगा |
     
    अपने दिमाग को संकेंद्रित करने के लिए आप स्टेज पर जाने से पहले सीधे खड़े हो जाइए, फिर आँखो को बंद करके सिर्फ अपनी साँसो की आवाज सुनिये| अब आप पूरी तरह रिलैक्स्ड और कॉंफिडेंट हो कर स्टेज पर जा सकते हैं|
     
    जब आप मंच पर होते है ,आप नर्वस हो सकते है ,पर याद रखिये ,लोग आपके अंदर की इस फीलिंग को नहीं देख सकते| दर्शकों की प्रतिक्रियाओं की ज्यादा चिंता मत करें|
     
    एक अच्छा वक्त होने के लिए इतना ही काफी है की आप जो भी बोले दिल से बोलें|
  • 19 Dec
    Shiva Raman Pandey

    क्यों होता है लड़ाई के बाद सरदर्द ?

    ladai ke bad sar dard kyo hota hai

    उफ़!तुमसे तो बात करके मेरे सिर में दर्द होने लगता है !

    क्या कभी आपने महसूस किया है की जब भी हम तनाव में रहते हैं,अथवा किसी से लड़ाई होती है तो अक्सर हमारा सिरदर्द होने लगता है ?

    ऐसा क्यों होता है? हो सकता है कि हमारा दिमाग और हमारा शरीर एक दूसरे से जुड़े हैं ,और इसलिए हमारा मनोवैज्ञानिक तनाव शारीरिक दर्द के रूप में प्रकट होता है ।

    जी हाँ सच यही है। एक अध्ययन के अनुसार ७०% मामलों में सामान्य चिकित्सकों ने  ऐसा पाया है कि   

    शारीरिक दर्द का प्रमुख कारण तनाव से उत्पन्न होता है ।

    नकारात्मक व्यवहार से ना सिर्फ मानसिक बल्कि शारीरिक असर भी होता है | ज्यादातर बीमारियां साइकोसोमाटिक यानि मनोकायिक होती हैं ।

    बिना किसी स्पष्ट शारीरिक कारण के जो दर्द होते हैं, उनका सम्बन्ध  सोमटोफोर्म नामक एक मानसिक विकार से हो सकता है, जिसमें दर्द होने का कोई वास्तविक शरीर से जुड़ा कारण नहीं समझ में आता । इसका डायग्नोसिस भी बहुत मुश्किल हो जाता है, क्योंकि व्यक्ति जब भी सामान्य चिकित्सक के पास इलाज के लिए जाता है, उसे चिकित्सा प्रणाली के विभिन्न दौर से गुजरना पड़ता है, परन्तु जब टेस्ट रिपोर्ट में कुछ नहीं निकलता तो वह डॉक्टर्स के प्रति अपना विश्वास खोने लगता है ।

    अब सवाल यह उठता है कि ऐसे प्रकार के दर्द होते क्यों है? इनका कारण क्या है?

    अनुसंधानों से यह पता चला है कि बच्चे अपनी विकास की अवस्था के दौरान यह संकेत समझते हैं कि जब भी घर का कोई सदस्य बीमार होता है,घर वाले उसका ज्यादा ध्यान रखते हैं । उसे स्कूल नहीं जाना पड़ता, उसे स्कूल का होमवर्क नहीं करना पड़ता । अगर परिवार के लोग बच्चे के साथ समय नहीं बिताते तो अभिवावक का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए बच्चे बीमार होना ज्यादा पसंद करते  हैं ।

    दूसरी बात यह है कि,काफी लोग मनोवैज्ञानिक समस्याओं के  बारे में अनजान हैं | वे इन मामलों को इतना गंभीर नहीं मानते, उन्हें लगता है की मानसिक बीमारियां सिर्फ कमजोर लोगों को होती हैं ।  उस स्थिति में वे इसके बारे में बात करना नहीं चाहते, और इन सब बीमारियों से अनजान बने रहते हैं । उन्हें इसका आभास भी नहीं हो पाता कि किस प्रकार उनके जीवन में होने वाले  मानसिक तनाव का असर उनके शरीर पर पड़ रहा है । और जब यह बहुत ज्यादा हो जाता है ,तो शारीरिक दर्द  के रूप में प्रकट हो जाता  है । दिमाग शारीरिक दर्द के द्वारा यह सिग्नल देता है कि कुछ गलत हो रहा है जिसे विश्राम और विचार के द्वारा दूर किया जाना चाहिए ।

    अक्सर यह देखा गया है की समस्या चाहे, शारीरिक हो या मानसिक, अगर व्यक्ति को प्यार, देखभाल और सहयोग  मिले तो दर्द अपने आप ठीक हो जाता है ।

    अनुसंधानों से यह भी पता चला है की किसी भी रोग के ठीक होने की रफ़्तार तब और बढ़ जाती है, जब व्यक्ति को उस स्थिति में किसी का प्यार मिले और ख़ुशनुमा वातावरण मिले । अतः हमे यह समझना होगा कि क्यों हमारा दिमाग ज्यादा मानसिक तनाव की स्थिति में उसे शारीरिक दर्द के रूप में बदल देता है । जिससे दिमाग यह सुनिश्चित कर ले कि हमें उचित देखभाल,प्यार,और आराम  मिल सके ।

     

    अगर व्यक्ति इस दर्द से लगातार जूझता रहा तो वह यह स्वीकार कर लेता है कि मेरे दर्द का कोई इलाज नहीं है ,और यह सोच उसे और दुखी कर देती है ,उसे यह जानकारी ही नहीं होती की मनोवैज्ञानिक तरीके से भी इस दर्द को दूर किया जा सकता है ।

     

    मनोवैज्ञानिक  थेरेपी के दौरान उन दर्द  के  होने वाले कारणों की जानकारी देते हैं और धीरे धीरे उसे यह अहसास दिलाते हैं कि कैसे नई सोच को विकसित कर दर्द को कम  किया जा सकता है ।

     अनुसंधानों से यह पता चला है कि एक कुशल चिकित्सक के द्वारा थेरेपी होने पर १०-१२ सेशंस में सोमटोफोर्म विकार में काफी सुधार देखने को मिल जाता है ।