कुल 169 लेख

  • 19 Dec
    Shiva Raman Pandey

    कैसे अपने किशोर बच्चे के साथ सार्थक संवाद करें?

    how to talk with a teeneger

    आइये मिलते हैं, छवि जी से जो अपने 16 वर्षीय बेटे को लेकर परेशान हैं ।

     "आज  मेरा बेटा किशोर  सुबह से जाने किस बात पर मुझसे गुस्सा है? सुबह नहाने के बाद जब मैंने उससे भगवान के सामने हाथ जोड़ने के लिए कहा' तो बोलने लगा कि माँ भगवान नहीं होते,  सब झूठ है। स्कूल से आया तो मैंने पूछा "आज का दिन कैसा था?" तो बोला "माँ परेशान मत करो मेरा दिमाग अभी थका हुआ है।" वह मेरी कोई बात मानता ही नहीं है । बेटा शायद अब बड़ा हो गया है और माँ  छोटी हो गई है।“

    किशोर हो रहे बच्चों के माता पिता की भूमिका बेहद मुश्किल हो जाती है । क्योकि बच्चा उसी काम को करना चाहता है, जिसे आप  मना करते हैं या जो आपकी मर्जी के खिलाफ होता है ।जीवन की यह अवधि न केवल आपके  लिए बल्कि बच्चे लिए भी चुनौती भरी होती है।

    एक किशोर शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत सी चुनौतियों के दौर से गुज़र रहा होता है, साथ ही उसे पढ़ाई, स्कूल और कैरियर  के बढ़ते दबाव को भी झेलना पड़ता है।

    यौवनावस्था आने पर बहुत से हार्मोन्स में परिवर्तन आता है, जिससे समझा जा सकता है कि क्यों किशोर मूडी हो जाते हैं ?

    हमारे मस्तिष्क का वह  भाग जो निर्णय लेने में हमारी मदद करता है उसे हम  प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स कहते हैं । उसका विकास किशोरावस्था में हो रहा होता है, जिसके कारण किशोरावस्था में लिए गए  निर्णय जोखिम भरे, आवेशी और कई बार खतरनाक भी हो सकते हैं ।

    आज के इस लेख में हम आपको बताएँगे की कैसे एक किशोर के साथ संवाद स्थापित करें:

    • अक्सर कई बार किशोर चाहते हैं की उन्हें गंभीरता से लिया जाये, उनके भी अपने विचार और मन हैं, और वे नहीं चाहते हैं कि उन्हें बच्चो की तरह समझाया जाय। यह जरुरी है कि बढ़ती उम्र के किशोर की स्वायत्ता का सम्मान किया जाय ताकि जब वे वयस्क हों तो उनमें आवश्यक आत्म-सम्मान हो।

     

    • यह सुनिश्चित करें की जब भी परिवार में कोई निर्णय लिया जाय तो आप उनसे हम उम्र की तरह बात करे,उनसे उनकी राय लें जैसे आप अपने दोस्तों या सहयोगियों से बात करते हैं।

     

    • किशोर दिल से  बहुत संवेदनशील होते हैं, अगर आप अपने किशोर बच्चो को आदर देंगे तो वे भी आपका आदर करेंगे और तब उन्हें समझना और भी आसान हो जायेगा ।

     

    • आप जो भी उपदेश दे उसका पालन स्वयं करें । यदि आप उन्हें किसी कार्य को नहीं करने के लिए कहते हैं (उदहारण-झूठ ना बोलने के लिए ) पर आप उसे खुद उनके सामने करते रहते हैं , तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं । जब आप उन्हें कुछ ऐसा सिखाना चाहते हैं, जिसमे आप विश्वास नहीं करते और जिसका आप दैनिक जीवन में अनुसरण नहीं करते। इसलिए अच्छा व्यवहार सिखाने के लिए सबसे अच्छा है कि उन्हें उदहारण से सिखाया जाय। ध्यान दें -एक अभिभावक के रूप में उनके स्कूल ,दोस्तों, उनके सपनों और आकांक्षाओं के लिए प्यार भरी चिंता दिखाएँ ।

     

    • आप यह सुनिश्चित करें कि वे किसी विषय में आप से आसानी से बात कर सकें। अपने विचारों को उनके विचारों  अनुकूल बनाने की कोशिश करें ताकि आप अपने बच्चे के विचारों को समझ सकें ।

     

    • खासकर जब बच्चे में किसी बुरी आदत के संकेत दिखाई देते हैं, तो उनपर झूठ बोलने का आरोप मत लगाइये बल्कि उन्हें बहुत गंभीरता से लीजिये और जितने जल्दी हो सके उनसे इस समस्या पर चर्चा करें।

     

    • मदद लें - अगर आप अपने जीवन साथी के साथ बहुत अधिक झगड़ा करते हैं, तो यह आपके बच्चे के कोमल मन को प्रभावित कर सकता है, और उस सम्मान को भी जो आपके लिए उसके मन में है। आप अपनी वैवाहिक समस्याओं और बच्चे के लिए अपने लड़ाई और झगड़े को कम करने और आपस में बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए मनोचिकित्सक से परामर्श प्राप्त कर सकते हैं ।

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  • 19 Dec
    Shiva Raman Pandey

    आपके बच्चे आपसे क्या सीखते हैं ?

    aapke bachhe aapse kya seekhte hai

    क्या आप सोचते हैं कि, आपके बच्चे अपनी एक अलग दुनियाँ में व्यस्त हैं?

    यह काफी हद तक सच भी है, आजकल बच्चे तरह- तरह की हॉबी क्लासेज और दूसरे अन्य प्रोग्राम्स, गेम्स, टॉयज और इंटरैक्टिव मीडिया के द्वारा पहले ज़माने की तुलना में ज्यादा बिजी हो गए हैं | फिरभी, बच्चे स्वभाव  से उत्सुक होते हैं, और जितना आप सोच सकते हैं उससे कहीं ज्यादा बच्चे हमें ओब्सेर्व करते हैं ।

    इसका मतलब यह है कि उन्हें जो भी सीख,ज्ञान हम माता पिता या कोई भी बड़ा देता है,और अगर हम उस दी गई ज्ञान या सीख के विरुद्ध कुछ अलग व्यवहार करते हैं , तो बच्चा भ्रमित हो जाता है |

    अनुसन्धानों से यह पता चला है कि, बच्चों को अच्छा व्यवहार सिखाने के लिए सबसे अच्छा  तरीका है कि, माता-पिता भी वही व्यवहार करें जो वो अपने बच्चे से उम्मीद करते हैं । बच्चे माता-पिता को अपना रोल-मॉडल मानते हैं, और उन्ही की तरह व्यवहार करना चाहते हैं|

    इसलिए अगर आप बच्चे को बताते हैं कि “ झूठ मत बोलो”, लेकिन अगर आप किसी से फ़ोन पर बात नहीं करना चाह रहें हैं, और आप बच्चे से बोलते हैं कि “जाकर फ़ोन में कह दो की आप घर पर नहीं हैं”, तो बच्चा तो यही सोचेगा कि, आप उससे उन बताए गए नियमों का उल्लंघन करवा रहें हैं |

    बच्चों का दिमाग  एक वयस्क के दिमाग  की तरह परिपक्व नहीं होता, और वे इन कठिन परिस्थिति में विभेद नहीं कर पाते  कि , इन नियमों  का कब पालन करना चाहिए और कब नहीं करना चाहिए । वे तो यही सोचते हैं कि,अगर बड़े लोग इन नियमों का पालन नहीं करते , तो हम भी इन नियमों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं ।

    अतः बच्चों के सामने ,जो भी हम कहते हैं या करते हैं हमें बहुत ही केयरफुल रहना चाहिए ।

    अधिकतर बच्चे जो इस तरह के मिश्रित संवाद वाले माहौल में बड़े होते हैं, वे अंडर कॉन्फिडेंट होते हैं, और सामाजिक जीवन में विभिन्न  मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से घिरे रहते हैं। वे ऐसे समाज की अवधारणा बना लेते हैं जहाँ बड़े लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं ।

    अतः बेहतर होगा कि उनकी दुनिया अच्छे व्यव्हार से जितनी सिंपल रखें  उतना अच्छा होगा,  ना की विरोधाभासी व्यव्हार से उनकी दुनिया कठिन बन जाये ।

    इसके अलावा जीवन जीने कि कला बच्चे अपने माता-पिता से ही सीखते हैं,क्योंकि वे उनको अपना रोल मॉडल मानते हैं, और वे यह महसूस करते हैं कि उनके  माता- पिता का जीवन जीने का तरीका ही सही तरीका है ।

    अतः आप और आपके पार्टनर एक दूसरे के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, उससे बच्चा संबंधों को किस तरह से निभाते हैं की कला सीखता है । अगर आप अपने जीवन साथी का लोगों के सामने अपमान करते है, तो काफी संभावना है कि आपका बच्चा भी वही व्यवहार सीखेगा ,और दूसरे लोगों का अपमान और बुरा व्यवहार करेगा ।

    अंत में, माता पिता का जीवन  बच्चे  के जीवन के लिए ब्लू-प्रिंट है । जिस तरह से पेरेंट्स एक दूसरे से व्यवहार करते हैं ,बात करते हैं,खाते हैं,सोते हैं,सभी कुछ बच्चे ओब्सेर्वे करते हैं ।

    यही जिम्मेदारी और दूसरे बड़े लोग जैसे शिक्षक पर भी है , बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानते है ,और वे बच्चे के ज्यादा करीब भी होते हैं,और उन पर ज्यादा प्रभाव भी डालते हैं ।

    अतः हमें बच्चे क्या ओब्सेर्व करे, इसका ध्यान रखना चाहिए ।

  • 19 Dec
    Anjali Khurana

    बच्चों का इंट्रोवर्ट नेचर कोई बीमारी नहीं, इन बातों का रखिए ध्यान

    bacchho ka intravart nature koi bimari nahi

    कई बच्चे छोटी उम्र से ही खुद में रहना पसंद करते हैं। अकेले बैठ कर म्यूजिक सुनना या कुछ पढ़ते रहना। बच्चों की इस आदत को अकसर अभिभावक समझ ही नहीं पाते हैं और दूसरे लोगों के साथ न घुलना-मिलने के कारण टेंशन में आ जाते हैं, लेकिन जरूरी नहीं ये बच्चे पूरी जिंदगी इंट्रोवर्ट ही रहें। बढ़ती उम्र के साथ बच्चे एक्सट्रोवर्ट यानी दूसरों के साथ बातचीत करने लगते हैं। अगर आपका बच्चा दूसरों से बातचीत करने की बजाय खुद में रहना पसंद करता है तो परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। इन कुछ बातों पर ध्यान दें-

     

    पहला, इसे स्वीकार करिए।
    इंट्रोवर्ट बच्चों के पेरेंट्स को लगता है कि उनके बच्चों में एक्स-फैक्टर नहीं है। इंट्रोवर्ट नेचर के लिए बच्चों को डांटिए मत। उन्हें बताइए कि आप बाकी बच्चों से अलग हो, लेकिन जैसे हो अच्छे हो। पेरेंट्स द्वारा ऐसा कहने से बच्चों को अच्छा महसूस होगा और वे अपनी ताकत को पहचानने लगेंगे। इससे बच्चे को किसी को कॉपी करने या उस जैसा बनने की एक्टिंग करने की भी जरूरत नहीं रहेगी।
    bachho me intravert nature
    दूसरा, बैलेंस करना सीखिए। इंट्रोवर्ट बच्चे खुद के कंफर्ट ज़ोन में ही रहना चाहते हैं। ऐसे में बच्चे को थोड़ा एडवेंचरस बनना सिखाइए। बच्चों से लगातार बात करिए। उन्हें बताइए कि दूसरों से बातचीत करना, उनके साथ मिलना-जुलना एक लाइफ स्किल है, जो समाज में रहने के लिए बहुत जरूरी है। बहुत सारे कार्य एक साथ ही करने को मत करिए। उन्हें हर हफ्ते के लिए एक प्रोजेक्ट या असाइनमेंट दें, जिनसे बच्चे का सोशल कॉन्फिडेंस बढ़ने लगे। इसमें बर्थडे पार्टी का हिस्सा बनना, स्कूल असेंबली में बोलना या फैमिली फंक्शन में परफॉर्म करना शामिल होगा।
    Bachho ke sath balance kaise kare
    तीसरा, सेलिब्रेट करिए।
    एक्सट्रोवर्ट लोगों को पसंद किया जाता है, लेकिन इंट्रोवर्ट लोग ग्रेट थींकर बनते हैं। क्योंकि एक कोने में शांत बैठकर वे खुद के भीतर झांकते रहते हैं। वे दुनिया को एक्सट्रोवर्ट लोगों की अपेक्षा बेहतर तरीके से समझते हैं। इसलिए बच्चों की नेचर जैसी भी हो, उनके साथ सेलिब्रेट करिए। इंट्रोवर्ट बच्चे भी इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करने के सक्षम होता है, जिसका कारण उनकी विशेषताएं होती हैं।

    Article taken from Danik Bhaskar news paper (http://www.bhaskar.com/news/LIF-RELA-4-things-to-be-remember-with-introvert-kids-5145600-PHO.html)

    Credit for images and text goes to their respective owners, we are just helping in taking it to masses. eWellness Expert doesn't own anything in this post.

  • 19 Dec
    Shiva Raman Pandey

    ६ टिप्स जिन्हे अपना कर ऑफिस में कार्य शक्ति बढ़ाएं ।

    how to deal with work pressure

     

    हम सभी को वर्किंग working रहते हुए सामाजिक जीवन के कर्त्तव्य और और कई भूमिकाओं को एक साथ  निभाना होता है । हम में से कुछ उन जिम्मेदारियों का अच्छी तरीके से निर्वहन करते हैं, और कुछ संघर्ष के साथ कर पाते है ।

     आखिर ऐसा क्यों होता है ?

    सफलतापूर्वक काम के दबाव से निपटने के लिए कई पहलू हैं। इस बारे में अनुसन्धानों से यह पता चला है कि,निम्न टिप्स को अगर आप पालन करें तो आप भी इस दबाव से  निकल सकते हैं |

    Jeevan me samay kya mahtva hai

    समय प्रबंधन

    हम सभी के  काम के घंटे सीमित है, और यह जरूरी है की हमें अपने दिन भर में जो भी काम करना है उसका एक टाइम शेडूल बना लें । इससे न केवल हम पूरे कार्य के लिए एक समय सीमा तय कर पाते हैं, बल्कि  प्रत्येक छोटे कार्य के लिये एक समय सीमा निर्धारित करने में मदद मिलती है। इसलिए, चाहे एक कदम ही उस कार्य को करने में लिया जाए, परन्तु इससे आपको उस कार्य को करने में जो समय लिया जाना है आपको वह पता चल जायेगा ।

    apne laghya ki prapti kaise kare

    लक्ष्य निर्धारण

    टाइम मैनेजमेंट के बाद अगला जरूरी स्टेप है अपने टारगेटTarget को निर्धारित करना । लक्ष्य व्यवस्थित, प्राप्य और समय-सीमा में होना चाहिए। बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल होने की उम्मीद कम होती है । हर स्टेपStep में आगे बढ़ने से पहले जरूरी है कि उसके पहले का स्टेप पूर्ण हो ।

    Apne din ki suruaat kaise kare

     

    तनाव प्रबंधन

    हमारा तनाव हमें यह अहसास कराता है कि हमें कार्य को समय से पूर्ण करना है । हालाँकि अगर इस तनाव की वजह से हमारे कार्य करने में दिक्कत आ रही है तो, शारीरिक व्यायाम, सांस लेने की तकनीक, विश्राम, योग और एक सामान्य स्वस्थ जीवन शैली अपना कर अपने लक्ष्य  को पूरा करना  चाहिए ।

    सहयोगियों से सम्बंध

    हम सभी काम में सहयोग पाने के लिए हमारे जूनियर, वरिष्ठ लोगों और अपने सहयोगियों की मदद की लेते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि हमारे सम्बन्ध उनसे मधुर बने रहें । लोगों को उनके अच्छे काम के लिए बधाई देना, उनके साथ मित्रवत व्यवहार और सबसे महत्वपूर्ण किसी कार्य में असहमति होने पर आक्रामक होने के बजाय मिल जुल कर उस कार्य को पूर्ण किया जाना चाहिए ।

    krodh ke dushprabhav

    क्रोध पर नियन्त्रण

    बहुत सारे प्रतिभावान कर्मचारी भी अपने गुस्से को काबू में ना कर पाने की वजह से टॉप पर नहीं आ पाते, उनका क्रोध उन्हें  उनके कार्य में में फोकस नहीं करने देता, और इस स्वभाव की वजह से उनके सम्बन्ध  मैनेजर, जूनियर और सहयोगियों के साथ अच्छे नहीं रह पाते, और उनकी उन्नति में रुकावट बनते हैं । क्रोध को बढ़ने से पूर्व ही निम्न दिमागी कसरत जैसे जटिल गणना, बैकवर्ड गिनती करना, गहरी सांस लेना अथवा प्राणायाम करके रोका जा सकता है।

    कार्य और निजी जीवन में संतुलन

    अंत में एक अत्यधिक मूल्यवान कर्मचारी वह है जो कार्य करने में खुशी और ताजगी  महसूस करे। आप नए विचार, और उच्च गुणवत्ता वाले काम तभी सोच पाते है जब आप अपने कार्य से एक अवकाश लें । जब आप घर पर भी कार्य का बोझ लेकर जाते हैं तब यह संभव नहीं हो पाता। इसका कारण है की जब आप कार्य से एक ब्रेक नहीं लेते तो आपकी  मस्तिष्क की कोशिकाओं का एक  गुच्छा लगातार एक ही काम करने से थक जाता है और वो ठीक से कार्य नहीं कर पातीं। यह उसी तरह से है जैसे कि  परीक्षा से पहले अंतिम मिनट की पढ़ाई आपके स्कोर बढ़ाने में मदद नहीं कर सकती । इसलिए परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत और अच्छी नींद भी काम के दबाव को संभालने के लिए  महत्वपूर्ण है। 

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  • 19 Dec
    Anjali Khurana

    क्या है मानसिक विकार(Mansik vikar)?

    mansik vikar

    क्या है मानसिक विकार ?

    आप सोच रहे हैं कि मानसिक विकार का मतलब क्या होता है ?

    क्या कमजोर लोग ही मनोचिकित्सा करवाते हैं ?

    क्या इस रोग से ग्रसित व्यक्ति नियन्त्रण में नहीं रह पाते  ?

    क्या मानसिक स्वास्थ्य विकार होने का मतलब आप पागल हैं ?

    या यह बीमारी संक्रामक होती है ?

    अथवा  ग्रसित व्यक्ति के संपर्क में आने से आप को भी यह बीमारी हो जाएगी ?

    इस तरह के और कई अन्य सवाल आपके मन में होंगे । हम नीचे आप के लिए उनमें से कुछ के जवाब दे रहे हैं ।

    मानसिक बीमारी के कारण

    मानसिक विकार में शामिल विभिन्न कारण हैं । ये कारण हैं:

    किसी प्रियजन की मौत , जुदाई , दुर्घटना, अलगाव, व्यापार में घाटा, बचपन के बुरे अनुभव , जॉब को लेकर चिंता , पैसे की कमी , काम का दबाव  इन सभी सामाजिक कारणों की वजह से जो व्यक्ति मानसिक बीमारी के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं , वे इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं । अतः आप देख सकते हैं कि मानसिक बीमारी के कारणों में वातावरणीय कारक,बायोलॉजिकल कारक और मनोवैज्ञानिक कारक हो सकते हैं ।

    इसका मतलब है कि मानसिक बीमारी के उपचार के लिए दवाएँ ही अकेले समस्या का समाधान नहीं कर सकती  है। वे मरीज के न्यूरोट्रांसमीटर में हुए असंतुलन को नियंत्रण करने में मदद करती हैं , बाकी काम विभिन्न प्रकार की थेरेपी के द्वारा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर किया जाता है । थेरपी व्यक्ति के अंदर के नकारात्मक विचारो को सकारात्मक विचारों में परिवर्तित कर उसे सशक्त बनाती है ।

    परन्तु विडम्बना यह है कि,मानसिक विकार को लेकर काफी सारी भ्रांतियां फैली हुई हैं , हमें इसकी रोकथाम के लिए मिल जुल कर काम करना चाहिए । हम अभी भी मानसिक विकार के रोकथाम और उपचार पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे हैं, और  सामाजिक परिस्थितियों, गरीबी, शोषण और हिंसा जैसे अनुभवों से इसके और अधिक होने की संभावना है ।  पीड़ित व्यक्ति के साथ प्यार भरा व्यवहार  ही  इसकी रोकथाम की दिशा में पहला कदम  होगा ।

    मानसिक रोग से परेशान व्यक्ति को अपशब्द जैसे 'तुम पागल हो' या 'क्या तुम साइको हो' जैसे वाक्य बोल कर अपमानित नहीं  करना  चाहिए । हमें यह समझना होगा कि पीड़ित व्यक्ति किन संघर्ष के साथ जीवन को जीने की कोशिश कर रहा है । हमे उन लोगों का अपमान नहीं करना चाहिए , क्योंकि वे खुद इस रोग के होने का कारण नहीं है, यह समाज उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है ।

    कृपया अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए वीडियो को देखें ।