कुल 169 लेख

  • 25 Jan
    Shiva Raman Pandey

    थेरेपिस्ट (चिकित्सक) न ही भगवान है, न ही जादूगर

    therapist

     

     

    थेरेपी या काउंसलिंग के बारे में बहुत सी गलत धारणाएं होती हैं जिनके कारण लोग चिकित्सक को एक जादूगर मानने लगे हैं। चिकित्सक से इतनी ज्यादा अपेक्षा करना क्या सही है?....

    क्योंकि कई बार होता ये है कि मरीज अप्रशिक्षित और गैर पेशेवर के चक्कर में फँस जाते हैं जो मरीज के किसी प्रश्न का उत्तर नही देते, और अपर्याप्त सेवाओं के लिए ज्यादा फीस वसूलते हैं। दूसरी तरफ इस धारणा के कारण मरीज चिकित्सक से किसी चमत्कार की उम्मीद करने लगते हैं, और सब कुछ चिकित्सक के ऊपर छोड़ देते हैं, और स्वयं कुछ नही करते।


    थेरेपी एक सहयोगी प्रक्रिया है.... 
    मरीज से यह उम्मीद की जाती है कि वह थेरेपी के दौरान समान रूप से शामिल हो और नियमित रूप से पूछे गए सवालों के जवाब दे। लेकिन जब मरीज चिकित्सक को भगवान या जादूगर मानने लगते हैं, तब वे चिकित्सक के सुझावों को आदेश की तरह लेते हैं जिसका पालन किसी भी कीमत पर किया जाना है । ,इसके बारे में चिकित्सक से कोई चर्चा नही करते और इसलिए यह एकतरफा और बेमानी हो जाती है।


    थेरेपी का मतलब विचारों और भावनाओं का वास्तविक बदलाव है ।

    थेरेपी के दौरान व्यक्ति के मन में बदलाव आने पर उसके विचार और भावनाएं बदलने लगती हैं। और यह होना भी चाहिए । यदि वह चिकित्सक को भगवान मान बैठेगा तो कैसे उनसे अपनी किसी गलत भावना को बता पायेगा, जिससे पूरी चिकित्सा झूठी हो सकती है । वह चिकित्सक की हर बात पर सिर हिलाकर सहमति दे देगा, और जिसके कारण विचारों और भावनाओं का कोई भी वास्तविक बदलाव नहीं हो सकता।


    मिल कर विचार करना ही सबसे अच्छा समाधान होगा ।

    इसलिए सिर्फ चिकित्सक से बातचीत करके समस्या गायब नहीं हो सकती। वे आपकी बात ध्यान से सुनते हैं, जिससे आपको अच्छा महसूस होगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। समस्या के बारे में बात करना तो शुरुआत है। आपको इसका हल निकलने के लिए जो भी मुश्किल हैं उन पर मिलकर बात करें।

     

    वास्तविक उपचार के लिए थेरेपी पर विश्वास करना बहुत जरूरी है।
    चिकित्सक सब कुछ जानता है और यही आप के लिए सबसे अच्छा है। क्योंकि जब तक आप उन्हें अच्छा दोस्त नहीं मानेंगे,अपनी गलतफहमियों और कमियों की खुलकर चर्चा नहीं करेंगें तब तक आप कैसे थेरेपिस्ट को अपना विश्वसनीय दोस्त बना पाएंगे ।


    थेरेपिस्ट को बहुत प्रभावशाली मानना भी गलत होगा।
    शोध बताते हैं कि जो लोग थेरेपिस्ट को ऊँचे और प्रभावपूर्ण स्थान पर रखते हैं,उनके साथ यह संभावना अधिक रहती है कि वे अपने जीवन में भी अन्य व्यक्तिओं को स्वयं से ज्यादा प्रभावशाली मानते हों, इसका मतलब वे उनमें आत्मसम्मान की कमी है । उन्हें इस चलन में सुधार लाना चाहिए। थेरेपिस्ट के साथ अच्छे संबंध परामर्श की अच्छी शुरुआत में मदद करेगा।

     

    थेरेपिस्ट आपका गाइड या एक अच्छा दोस्त है।
    थेरेपिस्ट को अपना एक अच्छा गाइड या एक सच्चा दोस्त मानना चाहिए ,जो हमेशा आपका भला चाहता है, लेकिन यदि आप उससे असहज महसूस कर रहे हैं तो आप बता सकते हैं और मिलकर इस पर काम करना चाहिए।

  • 22 Jan
    eWellness Expert

    गुस्सा हमें क्यों आता है ? कैसे इसे कंट्रोल करें?

    angry

     

    वैज्ञानिकों के अनुसार यह भावना व्यक्त करने का माध्यम है, जैसे  हम जब ज्यादा परेशान हो जाते हैं, या हमारे मन में कोई डर बैठ जाता है... या फिर हमें किसी चीज के खो जाने का डर होता है... जैसे हमारे अपने,  हमारी इज़्ज़त, संपत्ति, या खुद की पहचान। और ख़ास कर तब, जब हमारे पास ऐसे हालत से निपटने  के लिए कोई हल नजर नहीं आता ।

    उदाहरण के लिए:

    हम किसी को कोई बात समझाना चाहते हैं, और वह  व्यक्ति उस बात को समझने की बजाय आप से वाद-विवाद करने लगे...तो आप अपनी भावना को व्यक्त करने के लिए गुस्से का सहारा लेते हैं ।

    या फिर हमें पता चलता है, कि हमारे अपनों को, कोई नुकसान पहुंचाना चाहता है पर हम कुछ  कर नहीं पाते हैं, तो हमें खुद पर गुस्सा आता है...

    अगर आप अपने गुस्से को काबू में नहीं रख पाते, तो इससे..

    आपका ही नुकसान है ...

    आपका स्वास्थ्य खराब होता है..

    आपके मस्तिष्क को हानि पहुँचती है...

    आपका ब्लड प्रेशर बढ़  सकता है,

    यहाँ तक, इसके अधिक प्रचार से दिमाग की नसें फट सकती है, और इंसान की मौत भी हो सकती है...

    हम गुस्से में अपना साधारण स्वभाव भूल जाते है, क्योंकि इसकी वजह से हमारे मस्तिष्क में हॉर्मोन्स के प्रभाव से दिमाग सुन्न हो जाता है, और हमारे सोचने की क्षमता पर असर पड़ता है, हम ऐसा बुरा व्यव्हार करते हैं जिसका बाद में हमें पछतावा होता है ।

    क्रोध से हम सिर्फ अपना ही नहीं,  हमारे अपनों की भी हानि करते हैं । हमारे अतिरिक्त गुस्से से वे भी परेशान हो जाते हैं। उन्हें हमारे कठोर जवाबों से दुःख और तकलीफ होती है, धीरे धीरे वह हमसे दूर होने लगते हैं।

    बाहर भी, क्रोधित इंसान के स्वभाव की वजह से, कोई उन्हें पसंद नहीं करता।

    क्रोध को नियंत्रण में लाने के लिए, पहले उसके होने वाले कारण को पहचानना जरूरी है ।

    आइये जाने गुस्से को काबू में करने के कुछ गुण:

    1.बात करते वक़्त, अगर वाद-विवाद की संभावना दिखे तो खुद को  तर्क से दूर रखिये ।

    2.गुस्से को शांत करने के लिए अच्छा गाना गायें या सुनें (जो आपको पसंद हो)

    3.अच्छी चीज़ें सोचें, जो चीज़ें आपको ख़ुशी देती है।

    4.क्रोध को कम करने के लिए बातचीत बंद करें, और खाने में जो चीज़ पसंद है, उसे स्वयं के लिए बनाना शुरू करें, तो कुछ ही समय में आप क्रोध को भूल जायेंगे ।

    5.योगा, हमारे शरीर और मन की संतुलन को ठीक रखने में हमारी मदद करता है। हर रोज़ योगा का और मैडिटेशन का प्रयास, क्रोध को नियंत्रण करने में बहुत हद  तक मदद करता है।

    अगर कुछ काम ना आये तो ज्ञानी पुरुषों की बात मानें और अकेले में "ॐ" स्वर का प्रयोग करें। laughing

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  • 22 Jan
    Shiva Raman Pandey

    असफल हों, बार-बार हों, पर एक ही कारण से नहीं ।

    fdont fail for same reason

     

    असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो, 

    क्या कमी रह गई,  देखो और सुधार करो।

    जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,

    संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।

    कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,

    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।"

                                                         -हरिवंशराय बच्चन

    फ्रेंड्स हरिवंश राय बच्चन की यह कविता हमें सफल बनने की लिए प्रेरित करती है।

    एक सफल व्यक्ति और असफल व्यक्ति के बीच एक छोटा सा फर्क होता है…. सफल व्यक्ति अपनी एक बार की हुई गलती को दोबारा नहीं दोहराता है और असफल व्यक्ति उसी गलती को  बार-बार करता है।

    असफलता से यदि आप कुछ सीखते हैं तो यह सफलता के लिए मील का पत्थर है। यदि नहीं  तो असफलता सिर्फ आपके समय की बर्बादी है।

    कल्पना कीजिये दो बच्चे रेस की प्रैक्टिस कर रहे हैं ।

    पहला बच्चा 100 मीटर की रेस को रिकॉर्ड समय में पूरा करता है, लेकिन 200 मीटर को ऐसा करने में असफल हो जाता है। अगले प्रयास में उसने 200 मीटर को समय पर पूरा कर लिया ,लेकिन 300 मीटर को पूरा नही कर सका। उसका हर प्रयास उसे हर अगली बार सफल होने में मददगार सबित हो रहा है। वह कई  बार फेल हो रहा है,लेकिन हर प्रयास के बाद ज्यादा बेहतर कर रहा है।

    इससे उलट दूसरा बच्चा पिछली 200 मीटर की रेस को रिकॉर्ड समय में पूरा नही कर पा रहा ,या तो वह रेस की शुरुआत ठीक से नही करता या  रेस पूरी नही करता या बीच मे छोड़ देता है।

    दूसरे बच्चे में कोई प्रगति नही हो रही है। इस स्थिति में ,वह हताश हो सकता है।

    या वह दौड़ना पसंद नही करता है …

    या वह दौड़ता है, भले ही उसमे दौड़ने की योग्यता नही है।

    या ऐसा इसलिए हो सकता क्योंकि उस बच्चे ने रेस शुरू होने के पहले ठीक से रेस की starting और ending techniques की प्रैक्टिस नहीं की है।

    इसका मतलब है कि उसने जितने प्रयास किये वो सारे प्रयास व्यर्थ गए।

    इस प्रकार दोनों बच्चों में अंतर साफ़ है।

    असफल होना तब तक सही है जब तक यह आपको आगे बढ़ने में मदद करे।

    यदि बहुत सी असफलताओं के बाद भी आप में कोई सुधार नही हो रहा है, तो यह इस बात का  इशारा  है कि यह कार्य आपके अनुकूल नही है, आप अपने पसंद का कोई अन्य काम करें या इस काम को थोड़े समय के लिए टाल दें।

    अब सवाल यह है कि, ये कैसे पता करें कि ये असफलताएँ आपके सफलता में मददगार हैं कि नही?..

    क्या आपको लगता है कि आपने इन असफलताओं से कुछ सीखा है, या सीखने में कोई सुधार नहीं हुआ है।

    आपके मन में जो हताशा उपजी है उसके कई कारण हो सकते हैं ।

    पहला या तो कार्य कठिन है ।

    दूसरा या तो आप इसे सिर्फ समय की बर्बादी समझतें हैं।

    आपने जबसे शुरुआत की है तबसे अब तक आप में कितना सुधार हुआ है?

    इसके पता करने के लिए आप किसी अन्य व्यक्ति या दोस्त जो ईमानदारी से अपनी राय दे सकते हैं उनकी मदद लें।

    क्या आपने कभी अवकाश लेने की सोचा? कभी-कभी इन असफलताओं से भी ऐसी सीख  मिलती है जो तब सामने आती है जब आप इस कार्य से अलग कोई दूसरा काम करते हैं।

    इसलिए थोड़ा अवकाश लेकर देखें, ये असफलताएँ भी आपकी सफलता में सहायक हो सकती हैं । 

     

    असफलता से सीखने योग्य कुछ बातें :

     

    1.असफलता आपको फीड बैक देती है, जिससे आप अगली बार अपने काम में और सुधार करते हैं ।

    2.ध्यान रखिये कि... "हार के बाद ही जीत है, रात के बाद ही सुबह होती है"।

    3.आपके प्रयास व्यर्थ नहीं जायेंगे परन्तु गलतियों को  एक ही कारण से दोहराना नहीं चाहिए।

     

  • 20 Jan
    Shiva Raman Pandey

    रिजेक्ट होना भी आपकी Growth में मदद करता है ।

    rejection help us to grow

    बचपन से ही डॉ कलाम का सपना पायलट बनने का था, लेकिन उनका सपना तब टूट गया जब  योग्यता टेस्ट में वे फेल हो गए। रिजेक्ट होने पर वे भी काफी निराश हुए थे, लेकिन उनकी मंजिल तो कुछ और ही थी। आज पूरी दुनिया उनको मिसाइल मैन# Missile Man के नाम से जानती है। तो क्या पायलट बनने के टेस्ट में रिजेक्शन से उनका मूल्य कम हो गया ?

    नहीं ना!

    तो आइये जानते हैं कैसे रिजेक्ट होना भी आपकी ग्रोथ में मदद करता है ।

    जब हम खुशियों के बारे में सोचते हैं तो हम सफलता और उपलब्धियों के बारे में सोचते हैं। असफलता या विशेष रूप से रिजेक्शन के बारे में शायद ही सोचते हैं। हमारी यह धारणा होती है कि, रिजेक्शन ऐसी  चीज है जिससे हमें दूर रहना चाहिए, क्योंकि रिजेक्शन का मतलब है कि, आपका मूल्य कम है या आप किसी काम के नही हैं, क्या मैंने सही कहा?...........गलत..

    1.रिजेक्शन  सिर्फ डिमांड और सप्लाई की बेमेल प्रक्रिया है।

    अरे मान लीजिये आपने नौकरी के लिए आवेदन दिया है, लेकिन कम्पनी किसी और को यह जॉब दे देती है । आप तो मान बैठे कि आप में कम योग्यता है । परन्तु यह वैसा ही है जैसे आप कॉफी पीना चाहते हैं और कोई आपको चाय लाकर दे देता है, आप चाय को मना कर देते हैं क्योंकि आपको चाय नहीं  पीना। इसका मतलब यह नहीं है कि आप चाय पसंद नहीं करते और चाय की कीमत कॉफी से कम है । चाय अपनी जगह है, उसका अपना स्वाद है , और कॉफ़ी, अपनी जगह । उसी तरह आपकी अपनी कुछ खासियत है,

    जरूरत है तो बस उसे समझने वाले की, जिसके लिए आपको प्रयास, मेहनत करनी पड़ेगी ।

     

    2.अब सवाल यह है कि हम रिजेक्शन को लेकर इतना दुखी क्यों हो जाते हैं ?

    ऐसा आज के हमारे समाज में सफलता को मापने के तरीके के कारण होता है। पूंजीवाद # capitalism और सम्राज्य्वाद #imperialism के आने के बाद से हम सफलता को लाभ और सुविधाओं के रूपों में मापते हैं एक साधु या सन्यासी जिसे किसी भी सुख सुविधा की आवश्यकता नही, उसे पागल माना जाता है।

     

    3.आप को अगर प्रूफ चाहिए कि “रिजेक्शन आपके विकास में सहायक है” तो यह एक्सपेरिमेंट#Experiment पढ़िए ।

    यू-टयूब पर एक चर्चित परीक्षण है, जिसे 100 days of rejection के नाम से जाना जाता है। जिसमें लोग जिया जियांग के निर्देशों का पालन करते हैं, और रोज एक प्रश्न पूछते हैं जिसका संभावित उत्तर 'न ' हो। शुरू में उन्हें बहुत डर और अजीब लगता है, इसमें प्रश्न पूछना आगे और अधिक कठिन होता गया क्योंकि वे ऐसे प्रश्न चाहते थे जिनके लिए उत्तर 'न हो हालाँकि परीक्षण  खत्म होते -होते प्रतिभागियों का डर समाप्त हो गया, और वे जान गए कि रिजेक्शन से कैसा अनुभव होता है, और सबसे महत्वपूर्ण वे समझ गए कि यह अनुभव कुछ ही क्षणों के लिए है, और इसके बाद  आप और अधिक मजबूत हो जाते हैं।

     

    4.अब अगर आप समझ गयें हों तो रिजेक्शन के डर को दूर भगाइए और आगे बढ़िए ।

    डर के आगे जीत है यह कहावत तो हम सबने सुनी है। हमें अपने डर का सामना करना है। डर के कारण एक ही जगह पर बैठने से शायद ही किसी का विकास हुआ हो। डर के बंधन से बाहर निकलिये  और संभावनाओं के संसार में आगे बढ़िए, स्वयं को यह विश्वास दिलाइए कि रिजेक्शन एक अच्छा कदम है, और यह आपको ज्यादा मजबूती देता है। डर ज्यादा देर तक नहीं रहेगा और आप जान जाएंगे  कि, आपको डर किस कारण से लगता है, और इससे निकलना कितना आसान है। फिर आप ये सोचेंगे कि ओह! मैं इससे डरता था? लेकिन अब मुझे इससे बेहतर लगता है। मैं बिना वजह डरता था?

     

    5.आपको अपने विकास के रास्तें में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए अब अधिक प्रयास करना होगा ।

    मनोविज्ञान कहता है कि जब हमारे रास्तें में बाधाएं आती हैं तब हम इन्हे दूर करने के लिए अधिक प्रयास करते हैं जिससे हमारा कौशल#skill और बढ़ता है। उदाहरण के लिए यदि पहले प्यार में हमें रिजेक्शन मिलता है तो अगली बार इसकी संभावना अधिक होती है कि हम अपने प्रेमी को खास महसूस करायें, और अपने रिश्ते को अच्छा बनाने की दिशा में लगे रहें । जिसके फलस्वरूप आपको यह विश्वास रहेगा कि आपके पास एक अच्छा और मजबूत रिश्ता है, जो जीवन की हर परिस्थिति में आपका साथ निभाएगा।

     

    6."जिस काम से डर लगे वही काम करिये और डर गायब हो जायेगा"

     खुद को मजबूत बनाने के लिए डर का सामना करो। ऐसे सफल लोगों के जीवन से प्रेरणा लीजिये जिन्हे आप जानते हैं, और जो भावनात्मक रूप से मजबूत हैं, क्या उनके संघर्ष के दिन  बहुत आसान थे ?

    नहीं ना !

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  • 19 Jan
    Oyindrila Basu

    जश्ने-जीवन साथी-- कैसे अपने जीवन साथी की सफलता का जश्न मनाएं

    life partner

     

    अपने दाम्पत्य जीवन में एक मधुर बदलाव लाने के लिए आज सुबह अपने जीवनसाथी को, "फॉर अ चेंज"(for a change),  उन्होनें जो भी अच्छा किया है, उस के लिए उनको सराहें। कहने का मतलब यह है, कि अगर आज कोई "occasion" नहीं  भी है, तो भी उनके साथ जश्न मनाएं।

    करके देखिये अच्छा लगता है। :)

    साथ में जश्न मनाना, रिश्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता  है, जो अकसर हम समझ नही पातें।

    जश्न मनाना, यानी, अपने लाइफ पार्टनर  की सफलता को प्रोत्साहन देना।

    रिश्ते हमारे लिए बहुत महत्व रखते हैं, पर हम उन्हें अकसर ठीक से संभाल नही पातें। स्वार्थी व्यक्तित्व हम सब में है, चाहे हम मानें, या नकार दें। अगर हमें सफलता मिलती है, तो हम ख़ुशी से पागल होकर "गुड न्यूज़" सबसे शेयर करते हैं, कभी फेसबुक (#Facebook) पर तो  कभी ट्विटर(#Twitter) पर, बड़ी सफलता पर दावतें रखते हैं, पर क्या यही सब हम आमतौर पर, अपने जीवन साथी  की सफलता पर करते हैं?

    कुछ कहेंगे "हाँ", पर, यह सच है ।  आंकड़ों के हिसाब से देखा गया है, कि ऐसी परिस्थिति में, 86% लोग चाहते हुए भी उतना खुश नहीं  हो पाते, जितना वह स्वयं की सफलता पर होते हैं।

    ऐसी सोच, किसी के व्यक्तिगत दोष को नहीं दर्शाती, बल्कि यह एक स्वाभाविक मानसिकता है, जो हमें अपनी तुलना, अपने  पार्टनर से करने पर मजबूर कर देती है, और फिर हमें लगता है, कि हम उतने सफल नहीं है।

    विशेष रूप से, जब पत्नी को सफलता हासिल हो, तो पति उसे खुले मन से अकसर स्वीकार नहीं  कर पाते।

    'डाह' या दूसरों की सफलता से जलन, एक स्वाभाविक मानसिक स्थिति है, जिसके चलते, हमारे  व्यक्तिगत रिश्तों में कड़वाहट आ सकती है। ये  दोष सिर्फ हमारा दोष नहीं है, बल्कि इस स्थिति के लिए सामाजिक, आर्थिक, जनमत और ऐसे  कई सारे कारक जिम्मेदार होते हैं ।

     रिश्ते(दोस्त, प्यार,जीवनसाथी), जो हमारे लिए इतने प्यारे हैं, डाह की वजह से, हम उनकी खुशियों में शामिल नही हो पाते, उनकी सफलता को सकारात्मक रूप से स्वीकार नहीं कर पाते, और इससे उनको तकलीफ पहुँचती है। अकसर यह  भी होता है, कि बहुत समय से रिश्ते को विशेष रूप से ध्यान न देने की वजह से भी, उनका महत्व घटता नज़र आता है। हमारे दोस्त/पार्टनर हमसे दूर होते नज़र आते हैं।

    पर हम तो ऐसा नही चाहतें, फिर ऐसा क्यों होता है? हम अकसर सोचते हैं ऐसा क्या करें जिससे हमारे रिश्ते मजबूत और टिकाऊ  बने :)

    नही, इसके लिए फेविकोल (Fevicol) का जोर या अम्बुजा सीमेंट (Ambuja Cement) शायद काम न करें :D

    पर पहल तो आपको ही करनी पड़ेगी।

    पहले तो खुद में सकारात्मकता (positivity) लाये। यह बड़ी-बड़ी मुश्किलों को आसान कर देता है।

    ये हमें खुले मन से खुश होने की आज़ादी देता है। तुलना या प्रतियोगिता का भाव रिश्तों में अच्छा नहीं  होता, और सकारात्मकता, हमें इन बुरी भावनाओं से मुक्त करता है।

     

    अब जब आप थोड़ा 'पॉजिटिव फील' कर चुके हों तो आगे बढ़ते हैं, :) और देखते हैं कि कैसे हम अपने दोस्त/पार्टनर की सफलता का जश्न मनाएं और उन्हें खुश करें :

     

    आप उनके खास दिनों को नोट कर लें, जैसे जन्मदिन, सालगिरह, आदि , और कैलेंडर में 'मार्क' कर लें।

     

    उन दिनों पर अपने दोस्त या पार्टनर को सुबह 'wish' (मुबारकबाद) करें, फ़ोन से , या फूलों के गुलदस्ते से उन्हें सराहें, उनके चेहरे पर जो ख़ुशी होगी, वह आप सोच भी नहीं सकते।

     

    आपके दोस्त को प्रमोशन मिले, तो आप सबसे यह खबर 'शेयर' करें और उनकी तरफ से सब को बुलाकर, आप दावत रखें।

    और फिर अगर यह आपके पति या पत्नी की बात है, फिर तो कोई गल ही ना ! अभी उठिए और उनके लिए एक 'Surprise Gift' लेकर उन्हें अचम्भित कर दीजिये।

     

    अकसर हमें ज़िन्दगी के कुछ ख़ास दिन, जैसे जनम, सालगिरह, नौकरी का पहला दिन, आदि  याद रहता है, पर रिश्ते की शुरुआत, या साथ साथ चलना, ज्यादातर , ख़ास नहीं लगता, तो हम उनको भूल जाते हैं। पर यह याद रखें, जश्न के लिए कोई अवसर ज़रूरी नहीं है। रिश्ते को आप जब चाहें 'ताज़ा' कर सकते हैं, और आपको #लिप्टनचाय भी नही चाहिए,:) बस किचन में जाइए और कुछ ख़ास स्वादिष्ट खाना बनाइये और अपने पार्टनर के साथ अपने रिश्ते की सफलता का जश्न मनाईये, और फिर देखिये कमाल!

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