• 03 Feb
    Oyindrila Basu

    Bullying-असली ज़िन्दगी की कहानियाँ।

    cyber bullying

     

    "Bullying पहली कक्षा से शुरू हो गयी थी। कोई मेरे दोस्त नहीं थे। सब मुझ पर हँसते थे। मैं उनसे घुल मिलने की कोशिश करती थी, पर वे मुझे दूर कर देते थे। दूसरी कक्षा में परिस्थिति और गंभीर हो गया। मेरे दो नए दोस्त बने, पर जब उन्होंने भी मेरा मज़ाक उड़ाना शुरू किया तो........... " (सु का कथन , नेशनल बुलीइंग प्रिवेंशन सेंटर को )

     

    ज्यादातर यही होता है, bullying से जुडी समस्याओं का कोई समाधान न मिलने पर, हम उदासी में दिन बिताते है, या फिर जल्दी में, कुछ गलत कदम उठाते हैं।

     1. सारा लीन बटलर, आर्कान्सास् की एक प्रतिभाशाली महिला ने कुछ ही समय पहले आत्महत्या जैसे जघन्य रास्ते का सहारा लिया क्योंकि, इंटरनेट पर उस पर होने वाले अभद्र कमेंट, चित्र से वह बहुत परेशान थी, और डर गयी थी, कि समाज में उसकी छवि , इज़्ज़त, सब खराब होने वाली है। घरवालों को भी बता नहीं पा रही थी, #MySpace पेज पर कोई उसे अश्लील मेसेज भेज रहा था।

     2. लंदन में, एनाया नाम की लड़की को भी bullying का शिकार होना पड़ा अपने स्कूल में। वह किसी से शिकायत नहीं कर सकती थी। चुपचाप रहती थी।

     

    पर अगर प्रशासन में उपस्थित लोग भी इस दबी रैगिंग के पक्ष में हो तो?

     

    3. कलकत्ते में पढ़ने वाली एक पांचवी कक्षा कि लड़की ने हाल ही में कथन दिया है, कि जब शिक्षक के मत से उसका मत अलग था, तो शिक्षक जान बूझकर दूसरे बच्चों को उस लड़की से मिलने, या उसे पढ़ाई में दूसरे बच्चो से मदद की अनुमति नहीं देतीं थी। अगर कोई बताता, तो उसे भी डांट-फटकार मिलती, या फिर परीक्षा में कम नंबर।

    ये क्या है?  कैसे समाज में जी रहे हैं हम, जहां, शिक्षक अपने छात्रों से बैर निकाल रहे हैं?

     

    4. लोकल ट्रेन में bullying तो आम बात है। जैसे सीट को लेकर । पद्मा शुक्रे, मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर करने वाली एक यात्री ने बताया, कि रोज़ दूर सफ़र के वक़्त, जब इतनी भीड़ होती है, कुछ लोग हमेशा सीट कब्ज़ा करके रखते हैं। कोई थका इंसान बैठने भी जाए तो उसे, धमका कर या परेशान करके वहां से उठने पर मजबूर कर देते हैं।

    पर इस का क्या समाधान है? कैसे इसका प्रतिरोध किया जाये?

     

  • 02 Feb
    Oyindrila Basu

    छेड़-छाड़-एक सामाजिक कलंक

    bullying

    तस्वीर से मेल पा रहे हैं आप, जी हाँ सही समझे।

    अगली बार जब #सावधानइंडिया के एपिसोड में आप देखें की एक मासूम लड़की इंटरनेट पर छेड़छाड़ का शिकार हो रही है, तो अपने हाथ उठाएं, ज़ोर से इस बदमाशी को "ना" बोलें।

    एक वक़्त था, जब #खिलाडीकुमार की छेड़छाड़ वाली हरकतों पर हमें खूब मज़ा आता था, कि वे कैसे अपने जोश से फिल्मों में, कॉलेज की सारी लड़कियों को मोहित कर रहे हैं।

    पर आज इस छेड़खानी वाली हरकतों को हम हलके मिज़ाज से नहीं ले सकते, क्योंकि यह समाज में एक बीमारी की तरह फ़ैल रही है।

    अकसर बच्चे स्कूल से रोते हुए वापस आतें हैं, और बताते हैं, कि कैसे उसके पीछे बैठे स्टूडेंट ने उसके बाल खींचे, या फिर पूरी कक्षा के सामने उनका मज़ाक बनाकर उनकी खिचाई की।

    ये आम बातें होती है। हम सब के साथ हुआ है कभी न कभी।

    क्लास में कुछ सक्षम सहपाठियों का, हमारा टिफ़िन छीन लेना, या फिर हमारी कमज़ोरियों का मज़ाक बनाना, ये छेड़छाड़ और बदमाशी के किस्से हैं। ऐसी परिस्थिति में हम अकसर उदास हो जाते हैं, डर जाते हैं, कि हम किसी को बताएंगे, तो अगले दिन वह सहपाठी हमारा मुंह तोड़ देंगे, और फिर हमें पूरे स्कूल में ये सूजा हुआ मुंह ले कर घूमना होगा।

    ऐसे हादसे मानसिक रूप से हमें दुर्बल कर देते है। पर स्कूल बदल लेना, या क्लास का सेक्शन बदल लेना इसका समाधान नहीं है।

    अपने डर का सामना करें।

    छेड़छाड़ के बारे में अपने माता -पिता या शिक्षक से विचार करें।

    उन्हें बताएं, कि आपके साथ क्या हो रहा है।

    क्लास में हो रहे छेड़छाड़ के बारे में, अपने क्लास टीचर को सूचित करें।

    स्कूल में हुई छेड़खानी, बच्चों के मानसिक विकास को धीमा कर सकती है।

     

    "हिम्मत आग है, बदमाशी धुआं"- बेंजामिन इसराइल ।

     

    जैसा हमने पहले भी कहाँ है, बदमाशों को हिम्मत नहीं मिलेगी तो वे बदमाशी नहीं करेंगे।

    आखिर, बदमाशी करने वाले ऐसा क्यों करते हैं? दूसरों को परेशान करने कि मानसिकता आती कहाँ से  है?

    मवैज्ञानिकों के अनुसार उनका अतीत इस मानसिकता के लिए ज़िम्मेदार है। कॉलेज में, सीनियर विद्यार्थी अपने से नीची कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की, रैगिंग के नाम पर खिचाई करते हैं। क्योंकि अतीत में उनके साथ भी ऐसा ही हुआ था। ये हम सास-बहु के रिश्ते में भी देखते है, कि सास बहु को हमेशा सिखाने की कोशिश करती है कि घर कैसे चलता है, उसके हर काम में रोक टोक कर रहीं है।

     

     पर कभी कभी इंसान का व्यक्तिगत चरित्र ही हिंसक होता है। वे खुद को ज्यादा बलवान साबित करने के लिए दूसरे को परेशान करते रहते है। इंसान या तो प्यार से लोकप्रिय होते है, या फिर डर के प्रयोग से। इंसान जो बदमाशी या बदतमीजी करते है, वे असल में, लोगों में अपना डर बनाकर लोकप्रियता, और क्षमता पाना चाहते हैं।

    पर कोई हमें तभी छेड़ सकता है, जब हम उसे बढ़ावा दें। छेड़छाड़ का विरोध शुरू से ही करें।

    चुप्पी साधने से कोई ज़रूरी नहीं, कि कोई आपको फिर से परेशान नहीं करेगा।

    अगर कोई और इस घ्रिन्न मानसिकता का शिकार हो रहा है, उसकी मदद करें, छेड़खानी के खिलाफ आवाज़ उठाएं।

     

     

     

     

  • 01 Feb
    Mandavi Pandey

    प्यार में हमें अच्छा क्यों लगता है?

    love

     

    प्यार में oxytocin की भूमिका :-

    प्यार एक भाव है। हम सब अक्सर इस भाव को अपने अंदर महसूस करते हैं। प्यार के संबंध में वह neurochemicals जिसकी बात सबसे ज्यादा की जाती है वह oxytocin है। जब हम किसी को(जिसे हम प्यार करते हैं ) गले लगाते या चुंबन लेते हैं तो यह काफी अधिक मात्रा में मस्तिष्क में प्रवाहित होती है, और मन में साहस का संचार करके हमें अच्छा महसूस कराता है, और उसके साथ हमारे संबंध को और मजबूत बनाती है।

     

    Dopamine और Serotonin की भूमिका :-

    हालाँकि प्यार सिर्फ एक भाव की अपेक्षा  न्यूरोकेमिकल का प्रभाव अधिक होता है। इसमें oxytocin के अलावा Dopamine और Serotonin केमिकल की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मस्तिष्क में 'इनाम देने की व्यवस्था में Dopamine कार्य करता है। जब हम कोई ऐसा कार्य करते हैं जो हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक होता है (विकास के क्रम में शिकार करना या वंशवृद्धि के लिए मिलन ) तो हमारा दिमाग इस व्यवहार को प्रोत्साहित करता है ताकि हम इस काम को  जारी रखें और आगे भी इस काम को करने की संभावना बनी रहे। 'प्यार' ऐसा ही व्यवहार है, जिसमे मिलन और फिर वंशवृद्धि की संभावना होती है। इसीलिए जब हम प्यार में होते हैं तो मस्तिष्क में Dopamine इस व्यवहार को फील गुड कराता है।

    Serotonin एक ऐसा केमिकल है जो किसी के मन को नियंत्रित करने में सक्षम होता है। जब किसी को प्यार का भाव आता है तो Serotonin का स्तर कम हो जाता है। (मन पर से नियंत्रण कम हो जाता है ) एक शोध ये बताता है कि, प्यार में होने पर इसका स्तर ओ सी डी  के मरीजों के बराबर स्तर तक कम हो जाता है जो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नही रख पाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? विकासवाद के अनुसार यदि हमारा मन नियंत्रण में रहेगा तो हम अपने साथी से आगे बढ़कर प्यार का इजहार नही कर पायेगे। प्यार का संबंध मजबूत नही होगा। और साथी के साथ मिलन की भावना भी प्रबल नही होगी। इसलिए यह जरूरी है कि प्यार में  मन पर से नियंत्रण हटा दिया जाय, और यही कार्य मस्तिष्क Serotonin की मात्रा कम करके हमारे लिए करता है।

     

    अभिलाषा का neurochemicals Adrenalin:-

    जब हमें प्यार होता है तब दूसरे हार्मोन्स जो प्रभावी हो जाते हैं वो हैं,- adrenalin और cortisol,  पर वास्तव में ये प्यार की अपेक्षा अभिलाषा को बढ़ाते हैं। और अभिलाषा प्यार को बढ़ाती है। अभिलाषा बढ़ने पर हम साथी को आकर्षित करने के लिए स्वयं को अच्छा दिखाने की कोशिश करते हैं।

    क्यों लोग प्यार और अभिलाषा एक ही साथ महसूस करते हैं :- प्यार और अभिलाषा मस्तिष्क के एक ही भाग में उत्पन्न भावना है, फिर भी दोनों में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है। इसीलिए अक्सर लोग प्यार और अभिलाषा एक साथ महसूस करते हैं, और दो अलग लोगों के लिए भी इन भावनाओं को महसूस करते है। इसीलिए अक्सर अपने साथी के साथ अभिलाषा की भावना खत्म होने के बाद भी प्यार बना रहता है।

    कुल मिलाकर जब हम प्यार में होते हैं तो दिमाग में बहुत कुछ केमिकल लोचा हो रहा होता है। इसलिए ये कहना कि प्यार का कारण ये केमिकल हैं गलत नही होगा।

    अब जब कभी आप किसी के प्रति प्यार महसूस करें तो घबराएं नही बल्कि इसे केमिकल का प्रभाव समझ कर प्यार का मजा लें और खुश रहें, और यदि आपको लगे की ये गलत प्यार है,तो सारा दोष केमिकल पर लगा कर अलग हो जाना बेहतर विकल्प है।  

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  • 31 Jan
    Shiva Raman Pandey

    सही कैरियर का चुनाव

     

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    सही कैरियर का चुनाव

     

    अभी हाल ही में कोचिंग केन्द्रो में पढ़ने वाले छात्रों की आत्महत्या किये जाने की खबरें प्रकाशित हुई थी। इन खबरों से मन में स्वाभाविक  प्रश्न उठता है कि

    आखिर क्या वजह है, जिससे ये छात्र आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठा रहें हैं?

    कहीं माता-पिता, कोचिंग संस्थानों और समाज के द्वारा उनके मन पर डाले जा रहे प्रतिकूल दबाव के कारण तो ऐसा नहीं हो रहा?

    हमें अपने होनहारों को उनके मन के अनुकूल कैरियर चुनने में मदद करनी चाहिए ना की समाज या दूसरों के दबाव में आकर।

     

    चलिए हम एक मछली, एक कुत्ता और एक चिड़िया के उदाहरण को देखते हैं, यदि तीनो से ही तैराक बनने के लिए कहा जाय, तो मछली वास्तव में बहुत अच्छी तैराक बनेगी, कुत्ता सिर्फ थोड़ा सा ही तैर पायेगा, और चिड़िया तो बेचारी पानी में घुस ही नही पायेगी और बेरोजगार ही रह जाएगी। तीनों की अपनी अलग-अलग शक्तियाँ  हैं और तीनो को हमें एक ही कैरियर चुनने के लिए नहीं कहना चाहिए।

    लेकिन आज के दौर में हम यही काम अपने बच्चों के साथ कर रहें हैं, हम सभी अपने बच्चों की रुचियाँ और विशेषताओं की परवाह किये बिना उन्हें इंजीनियर्, डॉक्टर और मैनेजर बनाना चाहते हैं।

    ये तीन बातें हमें हमारे निर्णय बदलने में हमारी मदद कर सकते हैं:-

    व्यक्तिगत स्वास्थ्य :-

    जब हम अपने मन की इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं तो,चुनौतीपूर्ण कार्य होने के बावजूद हम उत्साह के साथ उस कार्य को करते हैं। जबकि यदि  ऐसा कार्य करने के लिए हम पर दबाव डाला जाता है, जिसे ना ही हम करना पसंद करते हैं और ना ही उसे करने के लिए हमारे पास योग्यता और मन है ,तब समय बीतने के साथ-साथ हम तनाव, उत्तेजना और अन्य समस्याएं महसूस करने  लगते हैं। अच्छा और मनपसंद काम हमारी ऊर्जा को बढ़ता है, लेकिन यदि हम ऐसा काम करते हैं, जिसे करने में हम ख़ुशी  महसूस नहीं करते बल्कि घबराहट महसूस करते हैं, तो हमें आत्मसम्मान में कमी होने का अहसास होता है। आजकल 5th या 6th क्लास में पहुंचते ही बच्चे को दिन के 14 या और अधिक घंटों के लिए व्यस्त(पहले school फिर tuition classes) कर देते हैं। बच्चे अपने मन से खेलने के लिए बिलकुल भी समय नही पाते हैं,ऐसे बच्चे बड़े होकर एक ऐसे वयस्क नागरिक बनते हैं, जो अपने कार्य से हमेशा असंतुष्ट और दुखी रहते हैं।

    इन सबके चलते बच्चे में

    स्कूल से संबंधित तनाव,

    एग्जाम से संबंधित तनाव

    और कार्य करने को लेकर तनाव में देखा जाता है। स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

    उच्चरक्तचाप और ह्रदय संबंधी परेशानियां, मोटापा, शरीर के किसी भाग में लगातार दर्द या पीड़ा और खराब स्वास्थ्य के रूप में दिखाई देता है। यहां तक की मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों का भी कारण तनाव हो सकता है। इस तनाव को कम करने या इससे मन को भटकाने के लिए मादक द्रव्यों का सेवन इन बीमारियों को और बढ़ाता है। मनोवैज्ञानिक तौर पर उनमें अत्यधिक क्रोध, निराशा और मानसिक तनाव होता है।

     

    कार्यक्षेत्र में प्रदर्शन :-

    जब आप मन लगाकर किसी कार्य को नहीं करते हैं तो इसकी संभावना अधिक है कि आपका कार्य भी अच्छा नहीं होता और आपका प्रदर्शन भी अच्छा नही होता है। इसका असर आपके कार्यक्षेत्र में, रिश्तों में, आत्मसम्मान में और आपके व्यवहार में झलकता है। अगर किसी तरह आप अपने को औसत या कुछ अच्छे प्रदर्शन के लिए फ़ोर्स भी कर लेते है, लेकिन आपका मन यहाँ नही है जिससे आप लगातार अपनी योग्यता के बारे में असुरक्षित महसूस करते हैं।

     

    धन /आय :-

    ज्यादातर लोग विशेष रूप से माता -पिता ऐसा सोचते हैं कि आमदनी अच्छी है तो सब सही है। प्रोफेशनल संस्थानों में प्रवेश लेने वालों की संख्या बढ़ने से शिक्षा का मूल्य तो बढ़ गया है लेकिन इसकी गुणवत्ता में कमी आई है, परिणाम स्वरूप प्रति वर्ष ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है जो इंजीनियरिंग, प्रबंधन और मेडिकल  की पढ़ाई करके भी बेरोजगार हैं। हाल ही में 7500 इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स ने चपरासी की job के लिए आवेदन दिया। क्या माता -पिता वास्तव  में अपने बच्चे को ऐसी स्थिति में देखना  चाहते हैं?

    माता -पिता दूसरे के बच्चे क्या कर रहे हैं, इस बात से प्रभावित हुए बिना अपने बच्चे को बचपन में पर्याप्त खेलने के अवसर दें ताकि उसके व्यक्तित्व का अच्छे से विकास हो सके, और उसकी रुचियों और रुझानों के बारे में जानकर हम उसे उसके मनपसंद क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करें, आप स्वयं देखेंगे की कैसे आपके बच्चे एक खुशहाल, स्वस्थ और आर्थिक रूप  से सक्षम नागरिक बनेगें।

    आइये देखते हैं संदीप माहेश्वरी की इस बारे में राय :

     

  • 17 Dec
    eWellness Expert

    मिलनसार इंसान का मनोविज्ञान

    introvert extrovert

     

    अगर आपका कोई दोस्त मिलनसार या एक्सट्रोवर्ट(बहिर्मुखी )स्वभाव का है, तो इसका मतलब आप बड़े खुशकिस्मत हैं ।  वह बहुत जल्द लोगों से घुल मिल जाएगा, और गर्मजोशी से लोगों से दोस्ती बना लेगा।

    अगर आप ऐसे इंसान के साथ है, तो अनजान लोगों से मिल कर बात करने की पीड़ा आप को उठानी ही नहीं पड़ेगी, आप का दोस्त अनजान इंसान को भी झट से अपना बना लेगा। इस प्रकार, वे सबसे निर्लिप्त सेल्स पर्सन से भी बात कर पाएंगे, और उच्च पद में कार्यरत मैनेजर से भी।

    ऐसे लोगों में बहुत ज्यादा एनर्जी और उत्साह होता है। जिसे सही रूप से, सही दिशा में खर्च ना किया जाए, तो उलझन पैदा कर सकता है। काम बिगाड़ सकता  है।

     

    तो ऐसे मिलनसार इंसान से कैसे काम करवाएंगे?

     

    १. उनसे बात कैसे करना है ये पता होना चाहिए- मिलनसार इंसान से उसकी जन्म भाषा में बात करें। इससे वे खुल कर बात करेंगे, और बातों बातों में आपके काम की बात पर काफी मुख्य इन्फार्मेशन देंगे, इस प्रकार आप उससे बेहतर घुल-मिल जाएंगे। अगर आप कोई ऑफिसियल या बिज़नेस की भाषा में बात करते हैं तो वे जल्द ही आप से ऊब जाएंगे।

     

    २. उनके उत्साह को बढ़ावा दें- उनके अंदर, कुछ नया कर दिखाने का जोश भरा होता है, पर आपका काम है उसे सही तरह से सम्हालना। उनके जोश और जज़्बे को बढ़ावा दें। हर विषय पर वे मत देना चाहेंगे, उन्हें रोकिये मत। उनकी बात सुने, समझें, और प्रशंसा करें, भले वह परिस्थिति से मेल ना खाती हो। "तुम्हें हर बात में अपनी विशेष टिपणी बताने की ज़रुरत नहीं", अगर इस प्रकार तिरस्कार करेंगे, तो इंसान दब जाएगा, और जब उत्साह ज़रूरी होगा तब भी नहीं दिखा पायेगा।

     

    ३. उनसे काम करवाना है, तो उन्हें कायदे से झूठ बोलें- एक बहिर्मुखी इंसान के लिए ये विश्व इंसानों के रिश्ते पर आधारित है। इसलिए उसके लिए ये मानना कठिन होता है, कि कोई इंसान अकेले भी रहना पसंद करते हैं। लेकिन वे यह  आसानी से मान लेंगे कि, दूसरे इंसान की ख़ुशी आप पर निर्भर है।

    इसलिए उनको काम करवाना हो तो सिर्फ इतना बताएं "ये काम हो जाना ज़रूरी है, एक ख़ास इंसान की ज़रुरत के लिए", वे फौरन उस पर लग जाएंगे।

     

    ४. उनको मल्टीटास्किंग करने दें- बहिर्मुखी व्यक्ति एक प्रकार के काम पर ज्यादा देर तक, अपना ध्यान नहीं रख पाते। वे थक जाते हैं। वे एक साथ कई चीज़ों पर विचार करते हैं। इसलिए उन्हें साथ में २-३ काम दे दें और भरोसा रखें कि, वे अपने समय का सदुपयोग करेंगे और हर काम को वक़्त पर पूरा करेंगे।

     

    ५. उन्हें बोलते रहना चाहिए- बहिर्मुखी इंसान बात नहीं करेंगे तो वे सोच भी नहीं पाएंगे। उन्हें बात करने दें, आप अगर उनकी लम्बी कहानियों से परेशान भी हो रहे हैं, तो उसे ज़ाहिर होने ना दें। क्योंकि वह एक ज़रूरी विषय पर ही बात कर रहे हैं, जिसे आप समझेंगे, पर उस प्रक्रिया में वे कई विभिन्न चीज़ों पर भी आलोचना करना चाहते हैं।

     

    ६. वे स्वतंत्रता से काम करना चाहते है और उन्हें ऐसा करने दें- उनको सिर्फ टॉपिक बता दें, और उन्हें खुद से उस में कूदने दें। आपको उन्हें शुरुआत में गाइड करने की ज़रुरत नहीं। उन्हें अपने हिसाब से सोचने दें, और बाद में आप उनके काम पर मत प्रदान करें। उनके स्वतंत्र सोच को दबने ना दें। इससे वे और बेहतर काम करेंगे, और सफलता से ज़िम्मेदारी को सम्हालेंगे।