कुल 169 लेख

  • 16 Feb
    Oyindrila Basu

    रिटायरमेंट को एक नई शुरुआत बनाएं।

    retirement ko ek nai shuruaat banayein

     

    हम कई बार रिटायरमेंट के बारे में हमारी कल्पनायें ज़ाहिर करते हैं। यहां जाएंगे, वहाँ खाएंगे, ये देखेंगे, वहां घूमेंगे, मज़ा करेंगे।

     

    पर क्या वह आखिरी दिन आने पर हम सचमुच खुश होते हैं?

     

    जब एक दिन आप के डेस्क पर, फूलों के गुलदस्तों के साथ  सेवानिवृत्त शुभेच्छा आने लगती है... आपको पता होता है, कल आपका ऑफिस में आखिरी कार्यदिवस है । आपको उत्साह रहता है, कि सब आपके काम को सराहेंगे, आपको मुबारकबाद  देंगे, पर एक डर भी लगता है, एक आशंका, कि.... अगले दिन से आप क्या करने वाले हैं?

     

    यह सवाल,जिसका जवाब आप नहीं जानते, पर अब आप जान सकते हैं, हमारे साथ।

     

    1.काम से अवकाश के बाद, खर्च एक चिन्ता ज़रूर होती है। देखा गया है, कि आम आदमी को अपने अवकाश से पहले मिलने वाले वेतन का ९०% जीवन यापन करने में लगता है । रिटायरमेंट का मतलब खर्च में समझौता न हो, इसलिए, पहले से संचय शुरू करें, और विभिन्न पालिसी में निवेश करें, जो रिटायरमेंट के बाद आपके बैंक खाता को भरती रहेंगी ।

     

    2.जब खर्च की चिन्ता न हो, तो आप बहुत कुछ सोच सकते हैं। ये विश्व बहुत बड़ा है, और इनमें कई जगह पर फोटो खींचने का सपना तो आपने भी देखा होगा। रिटायरमेंट के बाद इस ख्वाब को पूरा करने की शुरुआत करें। जो पास में घूमने लायक जगह हैं, और आप को काम की वजह से, जाने का अवसर नहीं मिला वहाँ रिटायरमेंट के बाद, अपने साथी के साथ घूमने का प्रबंध करें, 

     

    3.अगर आपके माता-पिता हैं, और इतने सालों में, आपको वक़्त नहीं मिला उनके लिए, तो आज से रोज़ कुछ ऐसा करें, जिससे उन्हें ख़ुशी मिले।

     

    4.अपनी सामाजिकता को बढ़ावा दें। घर में दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ पार्टी करें ।

     

    5.या अपने पुराने दोस्तों के साथ किसी जंगल की सैर पर चले जाएँ, जो आपकी तरह सेवानिवृत्त हैं।

     

    6.अगर आपको कोई व्यक्तिगत शौक है, जैसे लेखन, कला का  तो उसका अभ्यास शुरू करें, क्या पता, आप कोई नए काम की ओर बढ़ रहे हों!

     

    7.व्यवसाय में आपकी रुचि हुयी हो, तो उसको अंजाम देने के लिए इस अवसर का लाभ उठाएं।

     

    रिटायरमेंट के बाद क्या नहीं करना चाहिए:

    कुछ लोगों में, काम से अवसर या रिटायरमेंट का बुरा असर होता है। अचानक से ज़िन्दगी का थम जाना वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। खुद को नकारा समझने लगते है, हर बात में झिकझिक करने लगते हैं।

     

    1.अपनी निराशा का बोझ, अपने परिवार पर न निकालें, इससे आपके आपसी संबंधों पर खराब असर पड़ेगा, जब आपको उनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है।

     

    2.अपने ईगो को अपने काम की प्रतिभा पर हावी न होने दें। अकसर देखा गया है, कि ऊँचे पद पर रहते हुए, अवकाश लेने से, बाद में नए काम को स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि हम किसी के नेतृत्व में रहना नहीं चाहतें, इससे हम अच्छे काम की कदर नहीं कर पाते।

     

    3.अपनी पिछली ज़िन्दगी पर शोक मनाना छोड़ कर अपनी आगे की ज़िन्दगी का पूरा आनंद लें।

     

    काम से अवकाश को एक नई शुरुआत बनाएं, अपने जीवन को एक नई शुरुआत दें, तो ये रिटायरमेंट के दिन आप के लिए आसान हो जाएंगे।

     

    हर दिन अपने साथ कुछ नया लाती है, उसे महसूस करें, खुश रहना मानसिक स्थिति के लिए बेहत ज़रूरी है।

     

    Responses 1

    • dinesh singh
      dinesh singh   Dec 27, 2015 08:59 PM

      आपकी पोस्ट बहुत अच्छी है लेकिन अक्सर ही हमने अपने  आस पास कुछ मानसिक रूप  से कमजोर लोगो को  देखा  जिसे  लोग अक्सर  मैंने चिढ़ाते  हुए देखा है जिससे वो व्यक्ति और अधिक चिड़चिड़ाता है और बहुत ही परेशान होता है और इसीलिए लोग उस व्यक्ति से दूरी भी बना कर रखने लगते है की वह पागल है |

  • 15 Feb
    Shiva Raman Pandey

    हम अपने देश को भविष्य में कैसा देखना चाहते हैं ?

     

    Clean India is Happy India

    "नन्ही खेतों में आज नाच रही थी। उसकी मधुर आवाज़ फूलों और बहारों में गूँज रही थी। .... फिर कुछ बच्चों से मिली। ... और उन्हें प्राकृतिक कविता सुनाने लगी। इससे साफ़ आवाज़, और इससे स्वच्छ बोली तो हो ही नहीं सकती थी। फिर अचानक बजी एक घंटी। ..... ट्रीइईन्न्न। नन्ही की नींद टूट गयी, उसकी मम्मी ने पूछा, 'ब्रश कर लिया नन्ही?', और नन्ही ने कहा, 'कक्क क क कर र र र रह रही हूँ', सर को एक तरफ निरंतर हिलाते हुए वह बाथरूम गयी, और अपने अक्षमता पर धिक्कार से थूक दी "

    क्या नन्ही जैसे बच्चे, हमेशा सपनों में ही खुद में पूर्णता ढूंढेंगे?

    अब वक़्त आ गया है, बदलने का। अब बच्चे सपनों का सहारा नहीं लेंगे, खुद को उत्तम महसूस करने के लिए, समाज उनको यकीन दिलाएगा कि वे उत्तम और पूर्ण हैं, वे हमारी ही तरह हैं। उन्हें खुद को बदलने की ज़रूरत नहीं, सिर्फ अपनी दुर्बलताओं से लड़कर, उनपर जीत हासिल करना है।

    पर समाज में साफ़ सोच लाने के लिए, ग़लतफ़हमी, गलत धारणा और पक्षपात जैसी गंदगी को मिटाना पड़ेगा।

    ये बड़ी दुखद बात है, कि हमारा समाज, किसी भी मानसिक रोग से जूझने वाले इंसान की तरफ, एक नकारात्मक व्यवहार दिखाता  है।

    उनकी सहायता करने के बजाए, उन्हें नकारता  है, उनका मज़ाक बनाकर उन्हें और तकलीफ पहुंचाता  है।

    वक़्त आ गया है, कि मानसिक रोग पर समाज को नई जानकारी मिले, और वे अपनी धारणा बदलें।

    मानसिक रूप से दुर्बल इंसान के मन में आत्मविश्वास जगाना ज़रूरी है, और ये हमारा कर्तव्य है।

    स्कूल में, मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य पर अलग विभाग होने चाहिए, ताकि बच्चे मानसिक स्वास्थ्य, उसके कई रोग, और समाधान के बारे में विस्तार से जान पाएं।

    मानसिक रोग को कलंक मानने के बजाए, उनपर खुल कर चर्चा हो सके, हमारे शिक्षालय में ऐसे फोरम बनाने चाहिए ।

    आज भी भारत में कई जगहों पर, किसी को मानसिक बीमारी होने पर, मंदिर ले जाया जाता है, डॉक्टर से सब दूर रहते हैं, क्योंकि, बात फ़ैलने से बदनामी होगी, इस बात को मनोचिकित्सक-प्राची कंडेपार्केर  सिद्ध करती हैं।

    यहां तक कि, मनोरोग को भूत प्रेत का साया बोल कर, ओझा, और साधु का सहारा लिया जाता है। इस अशिक्षा को मिटाना आवश्यक है।

    आज भी कौमार्य और श्लीलताहानी जैसी बातों पर समाज में गलतफहमी  प्रचलित है।

    अगर इनको जल्द मिटाया न गया, तो ऐसी घटनाओं से पीड़ित व्यक्ति को, और मानसिक दर्द होगा, समाज में सांस लेना मुश्किल होगा।

    इसलिए देश में, विभिन्न कार्यक्रमों से जागरूकता फैलाना ज़रूरी है, जिसमें हम लोगों को बता सकते है, कि दोष पीड़ित का नहीं, बल्कि उनका है जिन्होनें यह घिनौना काम किया है। 

    पूरे विश्व में दुर्बल के प्रति इंसान का व्यवहार निंदनीय होती है।

    अगर कोई गिर जाए तो हम हँसते है, कोई हकला रहा है, तो हम हँसते हैं, किसी ने अलग तरह के कपड़े पहने है, तो हम हँसते है।

    यानी जो भी हमारे हिसाब से दुर्बल है, हम उन पर हँसते हैं, और जो भी हम सबसे अलग है, और बहुमत से मेल नहीं खाता, वह समाज में पागल कहलाता है।

    उस हिसाब से आइंस्टीन भी पागल ही थे। इसी लिए मन को जानना  और समझना ज़रूरी है। दुर्बलता और पागलपन में फर्क को समझेगी दुनिया, तभी, आगे बढ़ेगी दुनिया।

    अगर समाज अपना हाथ बढ़ाएगा, तो किसी भी रोहित को अपना मनोबल बढ़ाने के लिए जादू की ज़रूरत नहीं होगी । 

    टीवी में अंतरा और ईशान जैसे चरित्र हमें छू जाते हैं, पर क्या हम सच में उनकी पीड़ा  समझ पाते हैं?

    डैने वाण डेरेन, एक एथलीट और रनर हैं, जिनको मिरगी थी। 1997 में, उन्होंने ऑपरेशन का फैसला लिया, जबकि वह जानती थी, की इससे उनका दिमाग हमेशा के लिए खराब हो सकता है, या उनकी मौत भी हो सकती है। पर उनमें जोश और जज़्बा था, जिससे वे अपने मानसिक रोग से लड़ पायीं, और आज नॉर्थ कैरोलिना में हुयी 1000 मील की दौड़ पूरा करने वाली, गर्वित महिला हैं वह।

    ऐसी कहानियाँ हमें हमेशा प्रेरित करती है, और हमें इन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर करना चाहिए,  ताकि मानसिक रोग से पीड़ित लोगों को राहत मिले, आशा की नई रोशनी मिले, और समाज को भी सीख मिले ।

     

    Responses 1

    • shruti jain
      shruti jain   Dec 25, 2015 12:50 PM

      मै कक्षा  १० की क्षात्रा हूँ , जब भी कभी मुझे स्टेज पर बोलने के लिए बुलाया जाता है मुझे बहुत डर सा लगता है ,और मै वहा पर कुछ भी नहीं बोल पाती, कई बार तो मैंने  घर में  बहुत सारी प्रैक्टिस भी किया लेकिन जब मै स्टेज पर पहुंचती हूँ तो मेरे पैर काँपने  लगते है मेरी समझ में नहीं आता की मै क्या बोलू  और मुझे कुछ  याद भी नहीं रहता  कृपया मेरी मदद करे । धन्यवाद 

  • 15 Feb
    Oyindrila Basu

    मुझे वैलेंटाइन डे मनाने की उम्मीद नहीं थी।

    Support your love

     

    मैं किचन में आज क्या है देखने के लिए जा रही थी, तो मैंने देखा, संजय, सुबह से एक ही जगह पर बैठे हुए, बालकनी के बाहर ताक रहे हैं, उनके हाथ में टैब है, और सामने लैपटॉप। मुझे एक क्षण के लिए लगा, "क्या मैं हार गई? कुछ न कुछ कर सखी?..."

     

    (8th October, 2015)

    "संजय, आपको कौन सी बात सत्ता रही है, आप मुझसे कहिये, मैं आपकी मदद कर सकती हूँ", कुछ समय सिर्फ "हम्म”, और "हुंह" में जवाब देते रहे, फिर कहा- "सब खत्म हो रहा है। मैं कुछ अच्छा नहीं कर रहा हूँ,.....ये इंडस्ट्री टूट जायेगी, दीमक की तरह हमें चाट रही है......... चिन्मय से बात करना होगा,.......... मेरा कुछ नहीं हो सकता, हमारा कुछ नहीं हो सकता है।"

     

    ऐसे टूटे फूटे शब्द जोड़ कर वह जो भी कुछ  कहना चाहते थे, वह वाक्य और जो भी हो, पर कुछ अच्छे तो नहीं थे। वह बहुत ही नेगेटिव सोच थी। संजय अचानक उठे, और बिस्तर पर सर पकड़ कर सो गए।

     

    (10th November, 2015)

     

    घर में साफ़-सफाई का दिन था, और संजय के कमरे के बाहर से मुझे बहुत सारे खाली कागज़ के टुकड़े मिले। मैं स्वभावानुसार चिल्लाने लगी, "इतने कागज़ क्यों बर्बाद किये तुमने? हमेशा बर्बाद करते रहते हो", और अजीब बात थी, कि उन्होंने पलट कर जवाब नहीं दिया, खिड़की के बाहर ताकते रहे। मैं बोलती रही "किधर देख रहे हो, मैं तुमसे बात कर रही हूँ, मेरी बात कोई सुनता ही नहीं है," पर उन्होंने "हम्म" के अलावा कुछ नहीं कहा। मुझे गुस्सा आ रहा था," क्या सभी आई टी के लोग ऐसे ही होते हैं?"

     

    (13th November, 2015)

     

    "कैसी कॉफ़ी बनाई है? एक सही कॉफ़ी भी नहीं बना सकती", संजय ने कप उठाया, और ज़मीन पर पटक दिया। बात हो रही थी, सीरियल के एक चरित्र पर, कहाँ से कहाँ पहुँच गयी। मैंने संजय को इतने गुस्से में कभी नहीं देखा था। वह शांत इंसान हैं, झगड़े में भी क्रोधित नहीं होते थे, तो उन्हें ये क्या हो रहा था? फिर से वह जा कर सो गये।

     

    (14th November, 2015)

    ...डिप्रेशन या निराशा, इंसान को आलसी बना देता है, बिस्तर छोड़ने का मन नहीं होता, कुछ काम करने की इच्छा नहीं होती, या तो इंसान ज्यादा खाता है, या खाना छोड़ देता है। ..... साइकोलॉजी की स्टूडेंट रहते वक़्त जो कुछ सीखा था, वह सब याद करने की कोशिश कर रही थी मैं। संजय को शायद निराशा घेर रही थी, मैं समझ सकती हूँ, क्योंकि ये मेरे साथ भी हुआ है ज़िन्दगी में। मुझे याद है, कैसे मैं, दिन भर सोये रहती थी, मम्मी से गुस्से से बात करती थी, कुछ काम नहीं होता था। ... सिर्फ एक ही बात दिमाग में रहता था - सब खत्म हो गया। अब संजय भी किसी चीज़ का सामना नहीं करना चाहते थे, दिन भर सोने की कोशिश करते थे, किस चीज़ से वे भाग रहे थे, जानना ज़रूरी था, नहीं तो बात बिगड़ सकती है।

     

    (16th November, 2015)

    "संजय, उठो, देखो, सुबह कितनी सुन्दर है, बाहर चलते हैं। "मेरे कहने पर संजय, जाना नहीं चाहता था, पर मैंने उसे अच्छी कॉफ़ी के साथ मना लिया। हम नदी के पास वाले रास्ते से टहलने लगें, और मैंने उससे कहा- "मैं तुम्हारे साथ हूँ संजय, मैं गुस्से में जो भी कहूँ, तुम बहुत अच्छे पति हो, तुम्हारी ज़िन्दगी मेरे लिए ज़रूरी है, मैं तुमसे हर रोज़ सीखती हूँ",

    उन्होंने मेरी तरफ प्रभावित होकर देखा, और कहने लगे, "पता है, आजकल समझ नहीं पाता  हूँ कि क्या कर रहा हूँ, कुछ नई पढ़ाई नहीं हो रही है, वक़्त बीतता  जा रहा है, हमारे इंडस्ट्री में वक़्त ही अहम है,"..... बहुत दिनों बाद संजय खुल कर बात कर रहे  थे, और मैं शांत हो कर सुन रही थी।

     

     

    निराशा में डूबे इंसान की बात सुनना ज़रूरी है। निराशाजनक बातों को न बता पाने पर, इंसान घबरा कर आत्महत्या की ओर बढ़ने लगता है।

    (25th November 2015)

     

    आजकल मैं उनके साथ ज्यादा वक़्त बिताती हूँ। साथ बैठ कर हम सिनेमा देखते हैं, अकसर। उन्हें जो पसंद है, वही देखते हैं, ताकि उन्हें अकेला महसूस न हो, और गलत चिन्ता मन में ना आये।

     

    (25th December, 2015)

    "चलो कुछ दोस्तों को आज घर बुलाते हैं। " संजय भी इस बात को मान गये। मैंने शाम को, संजय के कुछ दोस्तों को डिनर के लिए बुला लिया, और इससे हमें जश्न मनाने की वजह मिल गयी। बहुत दिनों बाद मैं संजय को अपने दोस्तों के साथ हँसते देख रही थी। निराशा को ख़ुशी से ही मिटाया जा सकता है। जश्न मनाने की वजह ढूंढिए, उन्हें इसमें भाग लेने पर को कहिये, धीरे धीरे उनकी निराशा कम होती दिखेगी। उस रात, मैंने संजय से कहा, "अपने आपको कभी अकेला मत समझो, मैं हर स्थिति में तुम्हारा साथ दूँगी।"

     

    डिप्रेशन में डूबे इंसान को सहानुभूति दिखाना सबसे गलत होता है। "हरियाली को देखो", "भगवान का दिया सब कुछ तो है", जैसे मुफ्त के ज्ञान से परेशानी और बढती है। दीपिका पादुकोणे भी निराशा की शिकार हुई थी, ये बात उन्हें किसी हाल में अच्छी नहीं लगेगी, बल्कि उनकी निराशा और बढ़  जायेगी, क्योंकि ये निराशा भी संक्रामक है।

     

    (14th Feb, 2016)

    ....मैं आशा छोड़ने ही वाली थी, तब संजय मेरे पास आए और कहा, "मेरा वैलेंटाइन  गिफ्ट कहाँ है? मैं तुम्हारा सरप्राइज बर्बाद करके रहूँगा", तब मुझे अहसास हुआ, कि वे फिर से मेरे पुराने संजय लग रहे थे। संजय कहने लगे "तुमने मेरा बहुत साथ दिया, नहीं तो मैं कभी इस नकारात्मकता से बाहर नहीं आ पाता", और मुझे ख़ुशी थी, कि मैं नहीं हारी, मैं सफल हुई उन्हें निराशा से बचाने में।

     

    Depressed इंसान के साथ धैर्य बहुत ज़रूरी है। कभी कभी हमारे बस में शायद कुछ न हो, पर कोशिश ज़रूर करनी चाहिए, क्योंकि वे हमारे अपने हैं, और हम उनसे प्यार करते हैं। बात ज्यादा गंभीर हो जाए, तो अपने साथी को थेरेपिस्ट की मदद लेने के लिए उत्सुक करें। बस उनका साथ दें, इससे बहुत फर्क पड़ेगा।

  • 14 Feb
    Dr. KV Anand

    10 आदतें जो आपके ATTITUDE को बदलने में मदद करती हैं।

    Positive habits

    दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो कहते हैं कि I CAN”T और दूसरे वे जो I CAN के सिद्धांत को मानते हैं। I CAN का सिद्धांत मानने वालों के लिए किसी भी चैलेंज को स्वीकार करना या लाइफ में रिस्क लेना मुश्किल नहीं होता है, और वही लोग जीवन में सफलता की बुलंदियों को छू पाते हैं। हमें अपनी सोच या attitude हमेशा सकारात्मक रखनी चाहिए।

    कई बार हम सोच या नजरिये की बात करते हैं, हम सबने अपनी सोच की शक्ति के बारे में सुना है, और ये हमारी सोच ही है, जो हमारी सफल होने की संभावना को निर्धारित करती है। हम जानते हैं कि सकारात्मक सोच जीवन के कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जबकि नकारात्मक सोच स्वयं ही हमारे जीवन को तबाह कर देती है। आमतौर पर सकारात्मक सोच हमें हमेशा खुश रखती है, और सफलता की ओर ले जाती है। जबकि नकारात्मक सोच हमें दुखी, उदास, तनावपूर्ण, और जीवन से छुटकारा पाने के विचार की ओर ले जाती है। इसलिए अच्छी और रचनात्मक सोच सफलता और उपलब्धियों के लिए बहुत जरूरी है।

    हम कैसे ऐसी आदतें विकसित करें, जो हमारी सोच को सकारात्मक बनाने में मदद करे?

    सबसे पहले आइये जानते हैं कि, सोच या attitude क्या होता है।

    सोच क्या है?

    मनोविज्ञान में सोच या नजरिया या रवैया किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना के पक्ष या विपक्ष में भावना की अभिव्यक्ति है।

    दूसरे शब्दों में, सोच किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे में सोचने या विचार करने का एक स्थाई तरीका है।

    Positive attitude- सकारात्मक विचार, सकारात्मक भावना, और सकारात्मक अभिव्यक्ति होती है।

    Negative attitude- नकारात्मक विचार, नकारात्मक भावना और नकारात्मक अभिव्यक्ति होती है।

     

    कैसे पाएं सकारात्मक सोच :-

    आइये नीचे हम आपको कुछ ऐसी आदतों के बारे में बताते हैं, जो आपको अपनी सोच को सकारात्मक बनाने में मदद कर सकती है।

     

    1.अहसानों (greatfullness) की एक डायरी बनाएं :

    कोई एक बुरी घटना एक क्षण में आपका पूरा दिन खराब कर सकती है, या किसी के साथ कोई झगड़ा या बहस हमारी खुशियों को उस दिन कम देता है। जब भी आपको लगे कि आपके मन में नकारात्मक भावनाएं आपको परेशान कर रही हैं तो इन्हे नियंत्रित करने के लिए एक डायरी में उस दिन की 5 ऐसी बातों या घटनाओं को लिख डालिये जब आपने कृतज्ञता या अहसानमंद होने की भावना महससू करी, और आप देखेंगे कि कैसे आपका नजरिया बदल जाता है। ये देखा गया है कि प्रशंसा से आप खुश होते हैं और चिंता, नकारात्मकता और तनाव की भावनाएं आपके पास नहीं आने पाती।

     

    2.अपनी चुनौतियों का सामना नए तरीके से करें:

    हमे अपनी पुरानी सोच कि, ये काम बहुत कठिन है यह नही हो सकता। .....इन बातों के स्थान पर, यह हो जायगा, ये मैं कर सकता हूँ जैसी भावना लाएं। हो सकता है ऐसी बहुत सी चीजे हों जिन पर हमारा पूरा नियंत्रण ना हो लेकिन यदि हम अपनी पूरी सामर्थ्य और मन को उस काम करने में लगाते हैं तो हमें बाद में कोई पछतावा नही रहता। चुनौतियों का सामना साहस के साथ करो ना कि विकास के अनुभव में रुकावट की तरह ।

     

    3.REJECT होने पर भी अच्छा महसूस करें:

    रिजेक्शन एक कला है, जिससे हमें अपनी असफलताओं को समझने और कमियों को सुधारने का मौका मिलता है, क्योंकि जीवन में कोई भी बिना रिजेक्शन के आगे नही बढ़ता है। इसलिए reject होने पर परेशान ना हों और बुरा होने की आशा कभी मत करें। यदि बुरा होने का इंतजार करेंगे, तो बुरा होने की संभावना होती है। इसलिए हमेशा ये सोच रखिये कि reject हो गया तो क्या हुआ, मैं स्वयं की कमियों का सुधार करूंगा, सबठीक है, और मेरे पास अगला मौका है।

     

    4.अपने जीवन का वर्णन सकारात्मक शब्दों से करें:

    हमारी सोच से ज्यादा प्रभावी हमारे शब्द होते हैं। आप वो हैं जो आप अपने बारे में सोचते हैं। आप अपने जीवन के बारे में जो बोलते हैं, वैसा ही आपका जीवन होता है। जो भी आप बोलते हैं आपका दिमाग वही सुनता है। इसलिए हमेशा अपने लिए अच्छे, सरल और सुंदर शब्दों का प्रयोग करें आप देखेंगे आपका जीवन एक अलग तरह के प्रकाश से चमक उठेगा। आपने अपने जीवन के लिए जो मार्ग चुना है उसमे आपको अधिक आनंद मिलेगा। हमेशा अपने शब्दों में सकरात्मक रहें। उदाहरण के लिए जब भी सम्भव हो अपने आप से कहें-"मैं सम्पूर्ण हूँ" "मैं खुश हूँ"और "मैं सकारात्मक हूँ "

     

    5.Negative  या प्रश्नवाचक शब्दों को सकारात्मक शब्दों से बदलिये:

    हम अक्सर नकारात्मक या प्रश्नवाचक शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे -मुझे यह काम करना है, पानी का गिलास आधा खाली है, आदि-आदि। इसके बदले में  सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करें। जैसे मुझे यह कार्य करने का अवसर मिला, पानी का ग्लास आधा भरा हुआ है।  आपका रवैया आपके कामों को पूरा करने, उसमें प्रशंसा पाने में तेजी से बदलाव लाता है, और हम वैसा पाते हैं जैसा हम चाहते हैं।

     

    6.कोशिश करें कि अपने आपको, दूसरों की शिकायतों में घसीटने का मौका न दें:-

    आपका दिन बहुत अच्छा जा रहा है, और आप बहुत अच्छा काम कर रहे है और आपके सहयोगी इस शानदार माहौल पर पकड़ ढीली नहीं करना चाहते हैं। आपको पता भी नहीं चलेगा और अचानक  वह आपको शिकायत के उत्सव में शामिल कर लेंगे। एक महीने के अंदर आपको बड़ी चतुराई के साथ इस बेहद गर्म विरोध प्रदर्शन में शामिल कर लिया जायेगा। कोशिश करें कि आप इस तरह के जाल में न फंसे। Warsaw School of Social Psychology  का एक अध्ययन यह दिखाता है, कि नकारात्मक मन और भावनाएं आपके जरूरतों की पूर्ति, आपके आदर्श, और आपकी सकारात्मक भावनाओं में कमी लाती हैं।

     

    7.सकारात्मकता लाने में सांसों का इस्तेमाल करें :-

    हमारी साँस विशेष रूप से हमारी भावनाओं से जुडी हुई है। क्या आपने गौर किया है कि जब हम किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो अपनी सांसो को रोक कर रखते हैं?और क्या अपने महसूस किया है कि, जब हम क्रोध करते हैं, तो हमारी साँस बदल जाती है। हमारी साँस हमारी भावनाओं के अनुसार बदल जाती है। इसी प्रकार अपनी सांसो का इस्तेमाल करके अपनी सोच का तरीका भी बदल सकते हैं।  जब भी आप फ्री हों-दस बार लम्बी और गहरी साँस लीजिये। आपको अच्छा लगेगा।

     

    8.बुरे समय (आपदा ) में भी सच्ची बातों पर ध्यान दीजिये:

    जब मीडिया में चारो तरफ नफरत और क्रूरता फैली हो तब विश्वास और सकारात्मक बातें सोचना बहुत कठिन होता है। आपदा, युद्ध, और दर्दनाक अनुभव की घटनाओं में झूठी संवेदना और अपनापन दिखाने वाली खबरों की बजाय हमें सच्ची खबरों को देखना सीखना होगा।

     

    9.किसी समस्या के साथ उसका समाधान भी खोजिए:

    सकारात्मक रहने का मतलब ये नहीं कि आप समस्याओं के प्रति जागरूक ही ना हों। रचनात्मक व्यक्ति के पास किसी भी समस्या को सुलझाने का हल होता है। जब आप अपने आस -पास की किसी समस्या को उठायें तो उसके समाधान का प्रस्ताव पर भी आपका प्रयास होना चाहिए। समस्या आने पर उससे परेशान होने की बजाय ये समस्या किस प्रकार हल हो सकती है, इसका प्रयास कीजिये।

     

    10.किसी को ख़ुशी दीजिये:

    क्या अपने कभी किसी गरीब या बेसहारा व्यक्ति की मदद की है, या उनके बारे सोचा है? हममे से अधिकांश उन्हें देखकर बुरा सोचते है। हमें अपनी समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझना चाहिए। प्रति दिन किसी एक व्यक्ति को थोड़ी ख़ुशी देने का उद्देश्य बनाइये, और देखिये इससे आपको कितनी ख़ुशी मिलेगी। इससे आपको आस-पास रहने वाले सामान्य लोगों के प्रति आपकी बुरी मानसिकता को बदलने में मदद मिलेगी।

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  • 07 Feb
    Mandavi Pandey

    पीरियड्स के समय मुझे कैसा लगता है, ये जानो तुम।

    periods

    सूरज-"सुधा चलो आज कहीं बाहर घूमने के लिए चलते हैं" 

    सुधा- "आज मेरा मन कहीं जाने का नही है, मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है।"

    अक्सर ऐसा ही होता है, पीरियड्स के दिनों में सुधा की हालत खराब हो जाती। पेडू में दर्द, चिड़चिड़ाना, किसी काम में मन नही लगना और अनेक समस्याएं सुधा को परेशान कर देतीं।

    महिलाओं के लिए पीरियड्स एक मुश्किल समय होता है, क्योंकि इन दिनों में उन्हें दर्द और मूड बदलने जैसी समस्याएं होती हैं।

    हालाँकि ज्यादातर महिलाओं को सिर्फ शुरुआत के दो दिनों में ही हल्की समस्या होती है, लेकिन कुछ महिलाओं के लिए ये दिन बहुत चिंताजनक हो जाते हैं।

    नीचे कुछ सुझाव दिये गए हैं, जिनसे आपको उन कठिन दिनों में बेहतर महसूस करने में मदद मिल सकती है।

    यदि आपकी समस्याएं जारी रहती हैं तो आप स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श ले।

    सही भोजन और नींद :- पीरियड्स के दौरान शरीर बहुत ही तनाव के दौर से गुजर रहा होता है, और इस दौरान शरीर की दूसरी क्रियाओं जैसे पाचन और शरीर के तापमान को आप सही भोजन और नींद के द्वारा संतुलित कर सकते हैं।

    यदि हो सके तो जल्दी रात दस बजे तक बिस्तर पर सोने के लिए चली जाएँ, और ६-८ घंटे की नींद लें। इससे आपका शारीरिक तापमान जरूरत से ज्यादा नही बढ़ेगा।

    आमतौर पर महिलाएं स्वयं के स्वास्थ्य के ऊपर अधिक ध्यान नही देती हैं, जिससे उन दिनों में शारीरिक परेशानी और बेचैनी के कारण मानसिक अशांति उत्पन्न हो जाती है।

    बेहतर खानपान और पर्याप्त नींद के द्वारा इसे कम किया  जा सकता है।

    फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ जैसे फल और सब्जियों के सेवन से पाचन क्रिया सुगमता पूर्वक होती है। ज्यादा मसाले युक्त भोजन ,अल्कोहल, कोल्ड ड्रिंक्स और डिब्बाबंद खाद्य वस्तुओं से परहेज करें।

    पर्याप्त मात्रा में पानी पियें:- माहवारी के दौरान शरीर में पानी की खपत बढ़ जाती है, लेकिन जैसा की ज्यादातर महिलाएं पर्याप्त मात्रा में पानी नही पीती। पानी की कमी के कारण आपको अधिक प्यास का अनुभव होने के साथ कब्ज की समस्या भी हो जाती है। और पेट और पेडू में दर्द के दौरान पानी की कमी इसे और भी बदतर बना देती है।

    वास्तव मे पानी की पर्याप्त मात्रा के सेवन से पेट की सूजन में राहत मिलेगी और आप हल्का महसूस करेंगी। और ये आपको भावनात्मक रूप से भी बेहतर होने का अहसास करायेगा, क्योंकि शरीर और मन आपस में जुड़े हुए होते हैं।

    स्वच्छता :- यह शारीरिक और मानसिक दोनों की स्वच्छता के विषय में है।

    अपनी सफाई का ध्यान रखें और अपने सेनेटरी नैपकिन और कपड़ों को बार -बार बदलती रहें। जिससे आपको सूखेपन और ताजगी का अहसास हो । अन्यथा गंदे होने के कारण आपको चिड़चिड़ाहट महसूस होती है।

    नकारात्मक बातों और लोगों से अपने को दूर रखें, ताकि इसके कारण आपको उदासी की भावना न आने पाये।

    ध्यान :- ध्यान और कुछ योगासन तनाव और दर्द में आराम देकर आपको अच्छा महसूस कराते हैं। हालाँकि बहुत कठिन मुद्रा और श्वसन क्रियाओं से शुरुआत ना करें।

    कुछ प्राणायाम में पेट की एक्सरसाइज भी शामिल होती है, जिन्हें धीरे-धीरे सीखा जाता है, और बिना अभ्यास के इसे ज्यादा कर लेने से पेट की मांसपेशियों को नुकसान होता है।

    मनोरंजन :- कुछ समय अपने मनपसंद कामों में बिताने से मन खुश होता है और अच्छा लगता है। इसलिए मनपसंद काम जैसे -

    कोई फिल्म देखें

    कोई किताब पढ़ें

    अपने दोस्तों से मिलें

    या कोई रचनात्मक कार्य (बागवानी,पेंटिंग, कढ़ाई, सिलाई, नृत्य आदि ) करें ।

    अपना मनपसंद कार्य करने से दिमाग में डोपामाइन नामक हार्मोन का स्राव होता है, जो आपके तनाव को कम करके बेहतर महसूस कराता है। और आपके दर्द और नकारात्मक भावनाओं दोनों को कम कर देता है।

    इन सुझावों को आजमा कर देखिये !    

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