कुल 169 लेख

  • 24 Dec
    Shiva Raman Pandey

    मैं अपने अंदर खाली सा महसूस करती हूँ

    mai andar se khali sa mahsoos karti hun

    "मैं अपने अंदर खाली सा महसूस करती हूँ ।"

    "मैं लगातार अपने जीवन का मतलब ढूढ़ती हूँ "

    "मैं दूसरों की प्रतिक्रिया से खुद को आंकती हूँ "

    "मैं नहीं जानती कि मैं कौन हूँ "

    इन पंक्तियों से हम उनका दर्द समझ सकते हैं जो बॉर्डर लाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर Borderline personality disorder से जूझ रहे हैं ।

    यह एक ऐसा मानसिक विकार है जिससे विश्व के २% लोग प्रभावित हैं । और यह सबसे भ्रमित करने वाली मानसिक बीमारी है ।

    और तकलीफ तब ज्यादा होती है, जब लोग इनसे ग्रसित व्यक्ति को समझ नहीं पाते और उन्हें इमोशनल कह कर उनका मजाक बनाते हैं । आखिर ऐसा क्यों करते हैं लोग?

    बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर एक प्रमुख चिंता का विषय है और पुरुषों की तुलना में महिलाओं को यह अधिक प्रभावित करता है । अगर इस विकार का समय से इलाज न हो तो यह अन्य मानसिक विकारों को जन्म दे सकता है । जिसमे आत्मघाती व्यवहार भी शामिल है ।

    व्यक्ति का मूड बुरी तरह प्रभावित होता है, वह कुछ ही सेकेंड्स में एक मूड से दूसरे मूड में बदल जाता है । इस रोग से प्रभावित व्यक्ति अपने मन को अपने बस में नहीं कर पाते और खुद को खुश और कॉंफिडेंट नहीं महसूस करते ।

    उनके लिए रिश्तों को बनाये रखना और नौकरी को बचाये रखना मुश्किल हो जाता है । उनका मन उनके बस में ना होने से वे अपराधिक काम और ऐसे काम ज्यादा कर सकते हैं, जिसमें जोश और होश दोनों खो सकते हैं ।

    बी पी डी होने पर एक कमी यह  होती है कि व्यक्ति का जीवन के प्रति काला और सफेद नजरिया हो जाता है । या तो सारी चीजें अच्छी हैं या सारी चीजें खराब हैं । इसलिए व्यक्ति के द्वारा की हुई एक ही गलती उसकी नजरों में उसके पूरे व्यक्तित्व को खराब कर देती है ।

    इस विकार के इलाज के लिए डिएलेक्टिकल  बिहैवियर  थेरेपी'(डी बी टी) Dialectical behaviour therapy का प्रयोग किया जाता  है, जिसमें प्रभावित व्यक्ति को यह विश्वास दिलाया जाता है कि दो विचारों के बीच झूलना सही है ।

    और प्रभावित व्यक्ति को लगातार यह सोचने का दबाव नही देना है कि मेरे दो रूपों में कौन सा उसका असली रूप है? अतः न सिर्फ स्वयं और अपने खुद के व्यक्तित्व के साथ बल्कि दूसरों में,जीवन की परिस्थितियों आदि में,यहां तक कि थेरेपिस्ट के साथ भी यह व्यक्ति को उसकी दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करने का अवसर देता है।

    'डी बी टी' के द्वारा संसार के प्रति इस काले और सफेद नजरिये को चुनौती दी जाती है ।

    ‘डी बी टी’ में ध्यानपूर्ण तकनीक(Mindfulness techniques) का इस्तेमाल किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति धीरे - धीरे स्वीकृति की विचारधारा को गले लगाये । यह सिद्धांत ‘डी बी टी’ मार्श लेनिहेंन द्वारा बनाया  गया था, जब वे आत्मघाती व्यवहार से ग्रस्त महिलाओं के साथ काम कर रहीं थीं , लेकिन उन्होंने देखा कि यह आत्म-हानि(self-harm) के साथ 'बॉर्डर लाइन पर्सनाल्टी डिसऑर्डर' के मूड और कुछ अन्य विकारों  में भी सहायक है।

    अनुसंधानों से यह पता चला है की Mindfulness techniques और DBT therapy की मदद से धीरे धीरे व्यक्ति BPD की दोनों अवस्था को स्वीकार करने लगता है ।

    इसके साथ साथ व्यवहार थेरेपी Behaviour therapy की भी मदद ली जाती है , जिसमें व्यक्ति का डेली रूटीन निश्चित  किया जाता है, क्योंकि रोज -रोज के  बेतहाशा बदलती दिनचर्या भी मूड से जुडी समस्याओं को बढ़ाती है ।

    दिनचर्या में सरल कार्य पहले करने को कहा जाता है, और एक समय सीमा तय कर दी जाती है ।

    इसमें खुद दिमाग को विश्राम देने की तकनीक और अनहोनी को हैंडल करना सिखाया जाता है ।

    इस थेरेपी की मदद से व्यक्ति खुद में आत्मसम्मान महसूस करने लगता है और सुधार महसूस करने लगता है ।

    यह थेरेपी शिक्षा, संबंधों ,और रोजगार  के मामलों में काफी सफल रही है ।

    इसमें समय लगता है लेकिन ‘बी पी डी’ BPD से ग्रस्त लोग ‘डी बी टी’ DBT  थेरेपी से काफी फायदा महसूस करते हैं ।

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  • 26 Dec
    Shiva Raman Pandey

    7 सवाल जिनके जवाब हर अभिभावक को देना चाहिए

    abhibhavak ki jimmedariya

     

    कनिका का पढ़ाई में मन नही लगता। जिसकी वजह से उसकी क्लास टीचर उसे अक्सर समझाती रहती थीं | एक दिन टीचर ने उसके पिता को बुलाकर उसकी शिकायत की ।  जब उसके पिता टीचर से मिलकर चले गए, तब टीचर किसी काम से क्लास के बाहर आईं तो उन्होंने देखा की कनिका के पिता उस पर जोर- जोर से चिल्ला रहे थे, और  उसी गुस्से में उन्होंने उसे एक थप्पड़ भी मार दिया । टीचर को बड़ा अफ़सोस हुआ कि, उनकी वजह से कनिका को इतना झेलना पड़ा, बाद में कनिका ने मैम को रोते हुए बताया कि उसके पापा और मम्मी के बीच रोज लड़ाई होती है । और वे उसे भी जरा-जरा सी बात पर डांटते और मारते रहते हैं । 

    कहीं आपका, आपके बच्चे के साथ ऐसा ही संबंध तो नही?

    पूरे विश्व में खासकर भारत में ये विश्वास किया जाता है कि माता-पिता अपने बच्चे के लिए हमेशा  अच्छा चाहते हैं। जबकि यह बहुत से माता-पिता के लिए सच होता है, कुछ ऐसे माता -पिता भी होते हैं ,जिनके लिए शायद यह सच नहीं होता। इसके दो मुख्य कारण  है :पहला कि माता -पिता बच्चे के भले के लिए क्या सोचते हैं और, वास्तव में बच्चे के लिए क्या अच्छा है, इसमें बहुत बड़ा अंतर होता है । और दूसरा कारण है कि माता -पिता अपने भावनात्मक मुद्दो पर नियंत्रण नही रख पाते,और बच्चे के लिए क्या अच्छा है,यह जानने के बावजूद वे उसे  दे नहीं पाते ।

    क्या अभिभावक के क्रोधित होने का कारण उसका बच्चा होता है ?

    लोग सोचते हैं कि माता -पिता के क्रोधित होने का कारण बच्चे की शरारत और समस्याएं है । हालाँकि इस बात की संभावना काफी अधिक होती है कि ये भावनात्मक समस्या सिर्फ आपके पास नही रहती, बल्कि सामाजिक संबंधों के कारण बच्चे के पास भी आ जाती है ।

    हालाँकि बड़ों के पास बहुत सी भावनात्मक समस्याएं होती हैं । बहुत से माता -पिता इस पर ध्यान देते हैं, और उम्मीद की जाती है कि इसके बच्चों को नुकसान पहुँचाने के स्तर तक बढ़ने के पहले मदद और उपचार प्राप्त कर लेते हैं। जबकि अवसाद और क्रोध पर बहुत समय तक ध्यान नही दिया जाता है ।

    अगर आप सोच रहे हैं कि कहीं आप तो इस श्रेणी में नही आते हैं ?

    तो नीचे दिए कुछ प्रश्नों को देखिये :

    1. क्या बच्चे को आपसे अपने मन की बात कहने में डर लगता है?
    2. क्या आप अक्सर बच्चे को मारते हैं?
    3. जब आप बच्चे पर गुस्सा करते हैं तो क्या ये बच्चे के द्वारा की हुई गलती के अनुपात में है?
    4. उन पर चिल्लाने के बाद क्या आप उन्हें सांत्वना देने का कोई प्रयास करते हैं?
    5. क्या आपका बच्चा भी लम्बे समय तक क्रोध और दुखी मन के लक्षण प्रकट करना शुरू कर रहा है?
    6. क्या आपका बच्चा समय से भोजन लेता है?
    7. क्या आपके बच्चे के पास जब उसे जरूरत होती है, किताबें, खिलौने या दूसरी चीजें होती हैं?

    यदि आपने पहले पांच प्रश्नों के उत्तर 'हाँ' में दिए और अंतिम दो प्रश्नों के उत्तर 'न ' में दिए हैं तो ये चिंता का कारण हो सकता है। इस बात की सम्भावना है, कि आपको कोई समस्या आज भी हो और शायद यह आपको अपने माता पिता द्वारा गलत तरीके से की गयी परवरिश की वजह से हो । क्रोध और अवसाद, रिश्तों के साथ हस्तक्षेप कर उन्हें तनाव पूर्ण और नाजुक बना देतें हैं।

    मनोचिकित्सक से परामर्श

    अभी भी देर नही हुई है। अगर आप ऐसे अभिभावक है जो बात बात पर बच्चे को डांटते और मारते हैं, तो इसका कारण बच्चा नहीं बल्कि आप किसी मनोविकार (mental illness) से ग्रसित हैं, जिसका गुस्सा आप छोटे बच्चे पर निकाल कर खुद को शांत करना चाहते हैं |अब यही समय है इसे बेहतर बनाने का । याद रखें, यह सिर्फ आप के स्वास्थ्य का सवाल नही है, बल्कि आप का अपने बच्चे के साथ रिश्ता उतना ही महत्वपूर्ण है जितना दूसरों के साथ । अगर आप इस पर काम करेंगे तो आपके संबंध कार्यस्थल (office) और घर दोनों स्थानों पर बेहतर हो जायेगें।     

    भावनात्मक समस्याओं से निपटने का सबसे बेहतर तरीका है, इन क्षेत्रों में काम करने वाले परामर्शक या मनोचिकित्सक (psychotherapist)से मिलें । यह बेहतर होगा कि आप ऐसे किसी के पास जाएँ जो माता पिता -बच्चे के संबंधों का विशेषज्ञ हो । सिर्फ स्वयं किताबे या इंटरनेट पर लेख पढ़ कर मदद लेने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा । यह आवश्यक है कि आप अपने और अपने बच्चे के साथ जो संबंध हैं, उसपर विशेषज्ञ के साथ मिलकर  काम करें, और अब तक जो भी नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करें ।

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  • 28 Dec
    Shiva Raman Pandey

    ये 4 बातें आपके घर के बॉस जानना चाहते हैं?

    pati patni ke beech ke nokjhok

    अमन के मम्मी और पापा दोनों की दिनचर्या व्यस्त और दोनों ही वर्किंग थे । शाम को जब  वे घर आते, तो अमन से खाना खाकर सो जाने के लिए कहते क्योंकि दूसरे दिन फिर से सबको जल्दी काम पर जाना होता था । इन सब दिनचर्या के बीच अमन से बात करने का उनके पास समय ही नहीं  होता। एक  दिन  अमन की टीचर ने उन्हें स्कूल बुलाया और अमन की शिकायत करने लगीं, उन्होंने बताया कि अमन अपने सहपाठियों से ठीक ढंग से व्यव्हार नहीं करता है। अक्सर उनके साथ मार-पीट और अच्छा व्यव्हार नहीं करता ।

    आजकल इस तरह की समस्या बच्चों के साथ आम हो गई है, लेकिन क्या हमनें कभी ये जानने की कोशिश की है कि, क्या है बच्चों के इस व्यवहार का कारण ?

    छोटे परिवार जहाँ माता और पिता दोनों काम करते हैं, वहाँ घर में होने वाले टकराव को छोटे और विशेष तरीके से समझाने की जरूरत बढ़ रही है। टीचर माता-पिता को बच्चे की शरारतों के बारे में शिकायत तो कर देते हैं, परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देने वाली है कि अभिभावक अपने बच्चे का हमेशा भला ही चाहते हैं । उन्हें जरूरत है यह समझाने कि कैसे वे अपने तनाव पूर्ण जीवन का असर बच्चे पर न पड़ने दें । 

    इसलिए क्या माता -पिता और बच्चे घर पर प्यारभरी और खुशहाल जीवन के लिए मिलकर कोई कदम उठा सकते हैं ?

    निश्चित रूप से हाँ। मनोवैज्ञानिक शोध ये दिखाते हैं, कि बच्चो के लिए उनके खिलौने और गेम्स से ज्यादा जो चीज कीमती है वह है, उनके माता -पिता का 'समय', हालाँकि वे मॉल या दुकान पर आपसे किसी महंगे खिलौने के लिए जिद कर सकते हैं, पर यह इसलिए होता है क्योंकि बालमन चंचल होता है और खुद को नियंत्रित नहीं कर पाते ।  जैसे हम बड़े किसी ऐसी चीज को खरीद कर ठग जाते हैं जिसकी हमें ज्यादा जरूरत नहीं होती है।

    इस दिशा में सबसे पहला कदम यह होगा कि

    1. बच्चे से खुद मदद लें :

    समस्या को स्वीकार किया जाए और उसे हल करने के लिए बच्चे से भी बात करी जाए।  हाँ इतना जरूरी है कि जो भी कदम उठाया जाए वह बच्चे की आयु ध्यान में रखते हुए हो ,जिससे उसे बुरा भी ना लगे और बच्चे को समझ में भी आ जाये । नही तो दबाव में इसके उलटे परिणाम भी हो सकते हैं । जैसे  कि अगर आपका बच्चा तीन साल का है तो तीन साल के बच्चे से  आप कह सकते हैं ,"तुम्हारे और मेरे बीच बहुत सी कट्टी हो गई है हम कैसे इन्हे बट्टी में बदले।" बच्चे सहज और सरल होते हैं वे जो समाधान का सुझाव देते हैं उसे आसानी से लागू किया जा सकता है और यह बहुत सफल होता है।

    2.साथ समय बिताएं 

    अभिभावक को बच्चे के साथ समय बिताने के लिए एक टाइम टेबल बना लेना चाहिए, जैसे रोज़ रात का खाना पूरा परिवार साथ बैठ कर खाएंगे, इस समय कोई टी.वी नही (एक बार फिर यहां याद दिल दें कि बच्चे को आदेश न देकर दोस्ताना तरीके से ये बतायें कि क्यों ये कदम लिया गया है ) फिर हर व्यक्ति को इसका पालन करने  की जरूरत है। इसके साथ साथ एक चार्ट भी बना लें, जिसमें बच्चा रोज निशान लगा सके कि आज साथ में कितना वक्त बिताया गया । एक साथ इस तरह की गतिविधियों से सम्बन्ध बढ़ते हैं और बच्चा भी यह महसूस करता है कि घर में जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उसमें भागीदार होता है । 

    3.डांटे नहीं

    जब टीचर से बच्चे के बारे में कोई शिकायत मिले तो, किसी कल्पना के आधार पर बच्चे को तुरंत डाँटिए नहीं कि "तुमने किसी लड़के को क्यों मारा"? बल्कि इसके स्थान पर  आप कहिये कि "टीचर कह रही थीं कि तुम्हारे और किसी लड़के के बीच कोई लड़ाई  हुई थी, क्या हुआ था?" ऐसा कर के आप बच्चे को पूरी बात कहने का एक मौका देते हैं। जिसके बाद आप उससे इसमें उसकी भूमिका के बारे में बात कर सकते हैं, और उसे धीरे से क्लासमेट के साथ हुए मतभेद को सुलझाने का सही  तरीका समझाइये।

    4.जो कहें वह करें

    अंत में एक बात और  बच्चे वो सब कुछ नहीं सुनते जो हम बोलते हैं लेकिन वे सब देखते हैं जो काम  हम करते हैं। अगर आप उन्हें कोई सलाह दें और वास्तविक जीवन में आप खुद  उसका पालन नहीं करते तो वे परेशान हो जाते हैं और आपके बच्चे भी  इसका पालन करेंगे इसकी कम संभावना है। अगर आप उनसे कहते हैं कि "झूठ मत बोलो" और किसी गेस्ट से आप मिलना नहीं चाहते,और बच्चे से कहते हैं कि "अंकल से कह दो पापा घर पर नही हैं" जबकि आप घर पर हैं तो ये झूठ है। बच्चे जब बार-बार माता-पिता का उदाहरण देखते हैं कि वे अपनी बात का पालन नहीं करते हैं तो वे माता -पिता को गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं।

    इन बताये गए सुझावों को अगर आप पालन करें तो जरूर आप अपने बच्चे के साध संबंधों को सुधर पाएंगे और उन्हें भी आपका प्यार मिलेगा ।

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  • 02 Jan
    Janhavi Dwivedi

    क्या है पैनिक अटैक Panic attack?

    panic attack

     

    श्रुति एक बहुत ही प्यारी और कोमल विचारों वाली लड़की थी  । वैसे तो शादी के पूर्व तक उसके स्वाथ्य को लेकर किसी ने इतनी चिंता नहीं की और सोचा कि समय के साथ यह ठीक हो जायेगा । उसकी शादी हुए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन मेहमानों के स्वागत के चलते वह काफी व्यस्त थी और अचानक से उसे सांस लेने में दिक्कत , और सीने में भारीपन लगने लगा, और उसे अजीब सा महसूस होने लगा । उसके पति काफी सुलझे विचारों के थे , उन्होंने श्रुति के इस तरह अचानक हुए अटैक का डॉक्टर से सलाह लेकर मनोचिकित्सक से इलाज करवाया । आज वह खुल कर अपना जीवन संवारने में लगी है, क्योंकि उसे पता है कि उसका कोई अपना है जो इस दर्द में उसका साथ देगा । इस मनोविकार को लेकर समाज  में  काफी भ्रांतियां फैली हैं | लोग छुपाने की कोशिश करते हैं, जिससे उनके भविष्य में होने वाले संबंधों को लेकर कोई दिक्कत ना आये ।

     

    क्या है पैनिक अटैक Panic attack?

    Panic attack पड़ने पर अचानक कुछ मिनटों के लिए साँस लेने में परेशानी और भारीपन के साथ विशेष प्रकार की अनुभूति होती है।

    Panic attack या तो अकेले हो सकता है या फिर अन्य मनोविकार के साथ मिल कर हो सकता है ।

    पैनिक डिसॉर्डर की पहचान निम्न तरीकों से होती हैं :

    1. बार -बार और अचानक से होना
    2. सभी अटैक एक प्रकार के हों
    3. कई panic attack कुछ ही मिनटों में

    इसके अलावा निम्न में से चार लक्षण अगर हैं तो यह panic attack हो सकता है :

    1. घबराहट /दिल का तेजी से धड़कना
    2. बढ़ी हुई दिल की धड़कन
    3. पसीना आना
    4. कंपकंपी
    5. जल्दी -जल्दी सांस चलना
    6. घुटन का अहसास
    7. सीने में दर्द /असहजता
    8. जी मिचलाना /पेट दर्द
    9. कभी -कभी निम्न लक्षण भी इसके साथ दिखाई देते हैं :
    10. अत्यधिक डर का एकाएक आवेग /बहुत ज्यादा बेचैनी
    11. चक्कर आना
    12. ठंडे /गर्म चकत्ते
    13. संज्ञाहीनता /सिहरन का अहसास
    14. अवास्तविकता का अहसास (स्वयं की अनुभूति खोना और वास्तविकता से अलग महसूस करना
    15. नियंत्रण खोने का डर
    16. मृत्यु होने का डर
    17. एक माह में कम से कम एक अटैक होने पर -

    लगातार चिंता करना

    जिन्हे यह panic attack होता है, वे इससे बचने के लिए अलग तरह से व्यवहार करने लगते हैं । वे अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि panic attack होने पर दूसरे उनकी आलोचना करेंगे, इससे निपटने  के लिए वे नजरंदाज करने वाले व्यवहार करते हैं।

     

    रात के समय panic attack काफी आम होते हैं। panic attack आमतौर पर असामान्य घटना है, लेकिन इसके लक्षण अक्सर फिर से दिखाई देने लगते हैं, और बहुत कम लोगों को इससे पूरी तरह से छुटकारा मिलता है। आमतौर पर बीस की उम्र के आसपास यह पहली बार होता है। बचपन के बारे में जानकारियां इसके कारणों को समझने में मदद कर सकती हैं। इसके दुष्प्रभावों में ह्रदय गति का रुकना, भावनात्मक शोषण और यौन शोषण होने का खतरा, और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो सकती है।

    प्रायः इसका कोई कारण अवश्य होता है, कोई तनावपूर्ण घटना जो व्यक्ति को तनाव की स्थिति में ला देती है ।

    इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले लोग  panic attack के दुबारा होने को  लेकर  अत्यधिक परेशान रहतें हैं। उनको यह चिंता रहती है की वो एक ऐसी बीमारी से जूझ रहे हैं जो  कभी भी अचानक से हो सकती है और वे इसके लिए कुछ नहीं कर सकते,  इसलिए हर बार जब शरीर की प्रतिक्रिया थोड़ी सी भी  अलग होती है तो पीड़ित व्यक्ति  इसका गलत अर्थ निकलते हैं । और थोड़ा सा  भी दर्द उन्हें panic attack ला सकता है , क्योंकि वे और भी डर जाते हैं ।   

    हालाँकि ,अच्छी खबर यह है कि panic attack को संभाला जा सकता है शरीर में कुछ निश्चित संकेत होते हैं, जिनसे लोगों को लगने लगता है कि उन्हें panic attack हुआ है,और यह उन्हें वास्तव में panic attack की ओर ले जाता है।  मनोचिकित्सा  इन संकेतों के प्रति  मरीज की चिंता को थेरेपी के द्वारा काम करते हैं ।  साथ ही मनोचिकित्सक panic attack से संबंधित जो भी विचार मरीज के मन में आ रहे हैं उन्हें समझ कर, और उनकी सोचने के तरीके में बदलाव लाकर उसे सकारात्मक दिशा देते हैं । इसके साथ-साथ दवाएं (चिंता निवारक /अवसाद निवारक ) इत्यादि कुछ लक्षणों को रोकने में मदद कर सकती हैं।

    इसलिये अगर आप या अपना कोई जिसे  panic attack के दौरे पड़ते हैं तो मनोचिकित्सक से अवश्य सहायता लें। मदद लेने में कभी न हिचकिचाये। जीवन अनमोल है, उसे खुल कर जियें ।

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  • 04 Jan
    Shiva Raman Pandey

    स्टार्टअप फील्ड में मोटिवेशन के 5 लेवल

    motivation level in startups

    शर्मा जी ने  नए साल के शुरुआत में ही उन्होंने बड़े जोश के साथ अपने बढ़ते मोटापे को लेकर चिंता हुई तो उन्होंने ठान ली कि वे पहले दिन से ही एक्सरसाइज और खान-पान के द्वारा अपना वजन कम करेंगे । बस फिर क्या था उन्होनें एक्सरसाइज करना शुरू किया,एक हफ्ते तो सब ठीक रहा, फिर धीरे-धीरे उनका जोश ठंडा सा होने लगा, आलस आने लगा कि सुबह की नींद कौन ख़राब करे, फिर क्या भरोसा कि इतना सब करने के बाद वजन कम हो या न हो ।

    चाहे वजन कम करने की बात हो, या किसी नई आदत को अपनाने की कोशिश या फिर किसी बुरी आदत को छोड़ने की कोशिश : आपने एक बात जरूर गौर की होगी, कि आप जिस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, उसके लिए आपका जोश का लेवल और दूसरे के जोश का लेवल अलग-अलग होता है ।

    • कुछ लोग बड़ी धूमधाम और जोर-शोर से शुरुआत करते हैं, लेकिन रास्ते में ही कहीं असफल हो जाते हैं।
    • दूसरे शुरुआत धीमे करते हैं, फिर रफ़्तार पकड़ते हैं।
    • कुछ दूसरे धीमे शुरुआत करते हैं लेकिन जैसे हे वे सफलता प्राप्त करने लगते हैं, वास्तव में बहुत उत्साही हो जाते हैं।
    • इन में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो इसे आधे अधूरे मन से शुरू करते हैं और अगले मोड़ पर छोड़ देते हैं।

    अतः लोगों के अलग प्रकार से प्रेरणा प्राप्त होने का क्या कारण है?

    क्या किसी शुरुआत के लिए अलग तरह की प्रेरणा होती है?

    और इसे बनाये रखने के लिए अलग तरह की?

    मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्रेरणा के ऊपर बहुत सारे शोध हुए हैं। उनसे ये पता चला है कि, कम या ज्यादा प्रेरणा के स्तर, और शुरुआत या बनाये रखने की प्रेरणा के बहुत सारे कारण होते हैं। ये इस बात पर ज्यादा होता है कि

    हम खुद कितना motivate होते हैं:

    अगर खुद के motivation की बात करे तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि, हमारा स्वभाव कैसा हैं, हमारे शरीर की बनावट के ऊपर, और सोसाइटी से आप कितना प्रभावित होते है, इस के साथ-साथ आपकी personality भी आपके motivation के लेवल पर असर डालती है ।  यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप नए ज़माने की नई technology को कितना जानते समझते और use करते हैं ।

    ये सभी बातें आपके motivation level पर असर डालती हैं, जैसे अगर आपको eating disorder है, और आप दुबले हैं, तो आपको खिलाडी बनने के सपने में दिक्कत आ सकती है । 

    हमारे चारो तरफ का माहौल कैसा है:

    आपके चारो तरफ अगर junk food की दुकान है और आपको आसानी से ये मिल जाते हैं तो आप के weight loss के आपके target में problem आ सकती है । परन्तु यही situation उन कंपनीज़ के लिए अच्छी है जो उसके  employee को motivate करती है । और उन्हें अच्छा काम करने के लिए promote करती है ।  

    और ये स्थिति बदलती भी रहती हैं, और आप खुद भी इन स्थिति को बदल सकते हैं ।

    हमारे साथ के लोग हमें कितना motivate करते हैं ।

    इसके अलावा आप का self confidence तब और बढ़ जाता है जब आपका परिवार, दोस्त आप का मनोबल बढ़ाते हैं, और आपके द्वारा किये अच्छे कार्य की सराहना करते हैं और जिसकी वजह से आप अपने target को achieve करने में ज्यादा problem नहीं महसूस करते, उत्साही रहते हैं । मन में दुःख नहीं रहता ।

    बहुत लोग यह कहते हैं कि आपका भाग था जो आप यहाँ तक पहुंचे, क्या ये सही है ? आपकी सफलता, असफलता आपका भाग्य नहीं आपका motivation level तय करता है ।

    जाने माने मनोवैज्ञानिक मिलर और रोलनिक ने अपनी रिसर्च में यह पाया कि  ने बड़े पैमाने पर उन लोगों के साथ काम किया है, जिन्हे ड्रग्स छोड़ने के लिए motivate करना था । उनके अनुसार किसी भी नए कार्य को करने के लिए हमें 5 stages से गुजरना होता है ।

    statups motivation

    ये stages of motivation निम्न हैं :

    1. कार्य शुरू करने के पहले उसके बारे में सोचना
    2. कार्य शुरू करने के लिए उसके बारे में सोचना
    3. कार्य शुरू करने का निर्णय लेना
    4. कार्य को आगे बढ़ाने के लिए hard work करना
    5. कार्य पर बने रहना

    ये stages अगर आप एक के बाद एक cross करते रहें तो ठीक है, परन्तु जब भी आपके अंदर दुविधा आती है आप किसी एक stage पर आकर अटक जाते हैं । और आप इस दुविधा की स्थिति में बने रहना चाहते हैं । आप वहां रहना इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि उसके कुछ फायदे हैं। आप को वहाँ कम जोखिम लगता है । 

    तो फिर सवाल यह है की इसका हल क्या है ?

    इसका हल है : दोहरे विचार को हल करें,अपने आपको लगातार समझाएं कि यथास्थिति से परिवर्तन बेहतर है-सिर्फ शुरुआत में ही नही, बल्कि हर दिन और हर stage पर । आपकी यही सोच आपको बुलंदियों तक ले जायेगी ।

    स्वयं के अंदर आत्मविश्वास उत्पन्न करने के लिए और उसे बनाये रखने के लिए आप eWellness Expert के Quotes visit करिये ।

     

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