• 01 Mar
    Oyindrila Basu

    परीक्षा देने से कभी मत डरिये

    pareeksha narendra modi

     


    परीक्षा के नाम से ही अकसर हमारे दिमाग में डर पैदा हो जाता है। हमें पसीना आने लगता है। परीक्षा के समय मानसिक तनाव का होना स्वाभाविक है । पर ऐसा क्यों होता है?


    हम अकसर दूसरों की उम्मीदों के बोझ तले दब जातें है। बच्चों पर माता-पिता, परिवार और दोस्तों की उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव होता है।

    हमारी वार्षिक परीक्षा निर्णय करती है, कि हम अगली कक्षा में जाएंगे या नहीं। ऐसे प्रेशर के कारण बच्चों के शारीरिक विकास पर भी असर होता है, जैसे नींद न आना, भूख न लगना, अधिक परेशानी, यह सब मानसिक दबाव का असर है....

    और दबाव से तनाव होता है, और मानसिक स्वस्थ बिगड़ जाता है....नतीजा-परीक्षा से डर, परीक्षा में गलतियां।


    इस लिए नरेंद्र मोदी जी ने इस साल के विद्यार्थियों के लिए 'मन की बात' पर एक प्रेरणा सूचक सन्देश दिया हैं, और आशा करते हैं, कि बच्चों को इससे ज़रूर लाभ होगा।


    उनके साथ भारत रत्न सचिन तेंदुलकर जी भी हैं, जो बताते हैं.... "अपना लक्ष्य खुद बनाओ। लक्ष्य वही बनाओ, जो आप हासिल कर सकते हो। दूसरों की उम्मीदों के दबाव में मत आओ। मैं जब खेलता था, मुझ पर भी दबाव था, कभी अच्छे वक़्त थे, कभी बुरे, पर लोगों की उम्मीदें हमेशा थी, और वह बढ़ती गयी, लेकिन मेरा ध्यान सिर्फ गेंद पर होता था, मैंने खुद का लक्ष्य खुद बनाया, और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता गया"


    आपकी सोच सकारात्मक होना ज़रूरी है, पॉजिटिव सोच के फल अच्छे ही होते हैं।


    ये एक अहम बात है। हम अकसर सर्वश्रेष्ठ बनने के चक्कर में, खुद के लिए काल्पनिक लक्ष्य बना लेते है, और बाद में उनके पूरे न होने पर निराश हो जातें है।


    इसी बात पर गौर करते हुए मोदी जी कहते हैं, "प्रतिस्पर्धा क्यों, अनुस्पर्धा क्यों नहीं... दूसरों से स्पर्धा करके वक़्त क्यों बर्बाद करें, क्यों न खुद से ही स्पर्धा करें, और अपने पिछले रिकॉर्ड को तोड़ने का संकल्प करें। जब आप खुद की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे, तो आत्म संतुष्टि के लिए आपको दूसरे की अपेक्षा नहीं होगी"


    उनका यह मानना है, की परीक्षा से सिर्फ यह पता चलता है कि हम सही दिशा में जा रहे हैं या नहीं, उसमें आये अंक को अपने जीवन का आधार मान लेना गलत होगा। खुले मन से परीक्षा को स्वीकारने से, उसके प्रति डर चला जायेगा।


    ऐसे में लोकप्रिय शतरंज खिलाडी विश्वनाथन आनंद भी बच्चों के लिए कुछ विशेष टिपणी रखतें है:


    "अच्छी नींद ज़रूरी है, पेट भर खाना ज़रूरी है, आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, तभी आप परीक्षा के लिए पूर्ण रूप से तैयार होंगे। जैसे शतरंज में खेलते वक़्त कौन सी चाल कब आएगी ये पता नहीं होता, वैसे ही परीक्षा में क्या सवाल आएंगे ये पता नहीं होता, इसलिए अगर आप पेट से परितृप्त हैं, और अच्छी नींद पूरी करके आएं हैं, तो आप शांति से सोच समझकर सवाल के सही जवाब लिख पाएंगे, खुद को शांत रखना सबसे ज़रूरी है"


    ये तो मोदी जी भी मानते हैं, कि अनुशासन अच्छे फल के लिए बेहद ज़रूरी है। वक़्त पर खाना, वक़्त पर सोना, आपको स्वस्थ रखेगा।

    मन की शान्ति भी ज़रूरी है, बौखलाया हुआ इंसान, कुछ सही से समझ नहीं पाता, इसलिए अगर पूरे वर्ष में आपने बहुत पढ़ाई की है, और आप में ज्ञान का सागर भी है, तो भी जल्दीबाजी में आप को कुछ याद नहीं आएगा।


    घबराइये नहीं, आप जितना डरते हैं, उतनी मुश्किल परीक्षा नहीं है।


    वे हमें योगा और मेंडिटेशन करने के लाभ के बारे में भी बतातें है। मेंडिटेशन हमारे मानसिक स्थिति को बनाये रखने में मदद करता है।


    "ये एक अभ्यास है, मैं आज बोलूंगा तो आप कल से नहीं कर पाएंगे, लेकिन परीक्षा के वक़्त योग हमेशा काम आता है", मोदी जी का कहना है।


    ज्यादा तनाव में न रहें। हँसी मज़ाक में परीक्षा को पार करें। दोस्तों के साथ हँसे, बातें करें, तो सब आसान हो जाएगा।


    वे ये भी बताते हैं, परीक्षा के बाद कितने नंबर आएंगे, ये ना सोचें, परिवार के साथ दूसरे चीज़ों पर गप्पे लड़ायें। "जो हो गया सो हो गया", आगे देखते हुए अगली परीक्षा की तैयारी करें।

    विद्यार्थियों के लिए कुछ साधारण टिप्पणी:


    परीक्षा के केंद्र में वक़्त पर या उससे पहले पहुंचे ताकि देर होने का डर न हो।
    पूरी नींद लें और जल्द जाग कर पुर्नभयास करें।
    सब्जेक्ट में जो ज़रूरी बातें हैं, उन पर आखिरी वक़्त में थोड़ी सी चर्चा कर लें, तो लिखते वक़्त सब दिमाग में ताज़ा रहेगा।
    निष्ठा, लगन और कठोर मंशा से ही जीत हासिल होगी।


    "अगर आप डटे रहोगे, तो डर भी दूर हो जायेगा।", मोदी जी कहते हैं।


    सकारात्मक चिंता से बड़ी ताक़त और प्रेरणा, और कुछ भी नहीं।

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    Responses 1

    • dinesh singh
      dinesh singh   Dec 27, 2015 08:48 PM

      मुझे  अपने दोस्तों के साथ या परिवार का साथ बहुत पसंद है लेकिन  जब भी मुझे कही किसी अनजान  लोगो के साथ बात करता हूँ तो मुझे एक अजीब  सा  डर लगता है क्या यह भी  सोशल फोबिया हो सकता है |  

  • 29 Feb
    Shiva Raman Pandey

    काउंसलिंग के विषय में कुछ मिथकों का स्पष्टीकरण

    Clarification of 19 myths about counselling

     

    काउंसलिंग स्वयं को जानने और स्वस्थ होने का एक अनोखा मार्ग हो सकता है यदि यह सही काउंसलर के द्वारा सही तरीके से दी जाय। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि, काउंसलिंग को लेकर  बहुत सी मिथक और गलतफहमियां हैं जिसे लोगों ने काउंसलिंग के प्रति अपनी सोच में पाल रखा है। हम उनमे कुछ भ्रांतियों को दूर करने के लिए स्पष्टीकरण दे रहें हैं ,कृपया जरूर पढ़ें :-

    मिथक 1. कोई भी काउंसलर बन सकता है।

    स्पष्टीकरण :ऐसा देखा गया है कि १-२ महीने का कोर्स करके लोग काउंसलर बन कर लोगों की काउंसलिंग करने लग जाते हैं। दुर्भाग्य से भारत में यह बहुत अधिक हो रहा है। लेकिन वास्तव में एक काउंसलर के पास human development या psychology में कम से कम मास्टर्स की डिग्री होनी चाहिए। यदि आपको काउंसलर के विषय में कोई अनिश्चितता हो तो आप उनसे उनकी योग्यता के विषय में पूछ सकते हैं यह आपका जानने का अधिकार है।

     

    मिथक 2. यदि काउंसलिंग सस्ती है तो यह अच्छी नही है।

    स्पष्टीकरण :यह सत्य नही है। बहुत से कम्युनिटी सेंटर और NGO  मुफ्त में ऐसी सेवाएं दे रहें हैं और अच्छे भी हैं।

     

    मिथक 3. यदि कोई अधिक मूल्य ले रहा है तो वह जरूर अच्छा है।

    स्पष्टीकरण: यह ऊपर वाले मिथक के समान है ।  बहुत से नीम हकीम भी ऊँचे दाम वसूलते है। इसलिए मूल्य गुणवत्ता का कोई मापदंड नही है।

     

    मिथक 4. काउंसलर का काम है मुझे सलाह देना।

    स्पष्टीकरण: काउंसलर का काम है आपकी भावनाओं को फिर से ठीक करके आपको योग्य बनाने में आपकी मदद करना ताकि आप स्वयं अपनी समस्याओं को हल कर सकें। काउंसलर आपको सलाह नही देते और यदि वे ऐसा करते हैं, तो यह गलत है।

     

    मिथक 5. काउंसलर के पास सिर्फ पागल लोग जाते हैं।

     स्पष्टीकरण: काउंसलिंग सिर्फ मनोवैज्ञानिक समस्या से ग्रस्त लोगों के लिए नही है। काउंसलिंग रिश्तों को सुधारने ,ऑफिस में कार्य क्षमता बढ़ाने,शैक्षणिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने ,तनाव प्रबंधन आदि से भी संबंधित होती है।

     

    मिथक 6. काउंसलिंग के लिए जाने का मतलब मैं कमजोर हूँ। 

     स्पष्टीकरण: क्या जुखाम की दवा लेने का मतलब आप कमजोर हैं ? नही ना।  यह होशियारी और समझदारी है कि स्वयं को सही समय पर बचाने के लिए मदद ली जाय।

     

    मिथक 7. काउंसलिंग से आप काउंसलर के ऊपर निर्भर हो जाएंगे।

    स्पष्टीकरण : नही, एक अच्छा काउंसलर आपको अधिक कुशल बनाने में आपकी मदद करता है,ताकि आप अपना जीवन स्वतंत्रता पूर्वक व्यतीत कर सकें ।

      

    मिथक 8.काउंसलिंग या थेरेपी कई वर्षों तक जारी रहती है। 

    स्पष्टीकरण : यह सत्य नही है। हालाँकि कुछ मन में गहराई तक बसी हुए भावनाओं को लम्बे समय तक काउंसलिंग की जरूरत होती है। लेकिन ज्यादातर मामले कम अवधि की थेरेपी से ही हल हो जाते हैं।

     

    मिथक 9. थेरेपी में आपको दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं।   

    स्पष्टीकरण : थेरेपी में कोई भी कार्य जबरन नही करना होता है। और यही इसकी खूबसूरती है। चयन आपके ऊपर होता है। काउंसलर एक डॉक्टर के सहायक के रूप में कार्य कर सकता है, जो आपको सिर्फ दवाइयाँ लिख कर दे सकते हैं। लेकिन यह आपके ऊपर है कि आप दवाएं लें या नही।

    मिथक 10. काउंसलर दवाएं लिख सकता है।

    स्पष्टीकरण : जबतक काउंसलर के पास मेडिकल की डिग्री नहीं होती वे ऐसा नहीं कर सकते।

     

    मिथक 11. थेरेपी की प्रक्रिया के दौरान थेरेपी लेने वाला निष्क्रिय रहता है।

    स्पष्टीकरण : थेरेपी लेने वाले व्यक्ति को थेरेपी के दौरान बहुत ज्यादा सक्रिय रहना चाहिए, क्योंकि वे स्वयं के लिए लगातार कौशल का विकास कर रहें हैं।

     

    मिथक 12.केवल महिला काउंसलर ही अच्छी होती हैं।

    स्पष्टीकरण : हालाँकि इस व्यवसाय में बहुत सी महिला काउंसलर्स दिखाई देती हैं। यदि एक व्यक्ति के पास सही कौशल, योग्यता और अनुभव है तो फिर वह चाहे पुरुष हो, अच्छा होता है।

     

    मिथक13. ज्यादा उम्रदराज़ काउंसलर अच्छे होते हैं। 

    स्पष्टीकरण : हालाँकि अनुभव जरूरी होता है, लेकिन कभी कभी उम्र लोगो को कठोर भी बना देती है। इसलिए यहां ऐसा कोई नियम नहीं है।

     

    मिथक 14. काउंसलर थेरेपी के बाद हमारे मित्र बन सकते हैं।

    स्पष्टीकरण : सही यही होगा कि काउंसलिंग के संबंधों से अलग दोस्ती का संबंध ना बनाया जाय, क्योंकि थेरेपी को प्रभावी बनाने के लिए सीमाओं का होना जरूरी है।

     

    मिथक 15.  काउंसलिंग सिर्फ बात करना है।

    स्पष्टीकरण : व्यक्ति की मानसिक शुद्धि और समस्या के निदान के लिए  भावनात्मक समस्या को पहचानकर उसे फिर से व्यवस्थित करने की गंभीर प्रक्रिया काउंसलिंग है।

     

    मिथक 16. मित्र और परिवार के सदस्य एक दूसरे की काउंसलिंग कर सकते हैं।

     स्पष्टीकरण : मित्र और परिवार के सदस्य एक दूसरे की सामर्थ्य और कमजोरियों को उतनी निष्पक्षता पूर्वक नही देख सकते जितना की काउंसलर देख सकता है। और उनके पास कोई ट्रेनिंग भी नहीं है, इसलिए उन्हें आधिकारिक तौर पर परामर्श नही देना चाहिए।

     

    मिथक 17.ऑनलाइन काउंसलिंग भरोसेमंद नही होती।

     स्पष्टीकरण :बहुत से भरोसेमंद ऑनलाइन काउंसलिंग के विकल्प हैं, जो मजबूत और सुरक्षित हैं।

    मिथक  18. काउंसलिंग सिर्फ विकारग्रस्त और बीमार व्यक्तियों के लिए है।    

    स्पष्टीकरण :आप भी अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए काउंसलिंग का उपयोग कर सकते हैं। जैसे - अलग सोच की दक्षता।

     

    मिथक19. काउंसलर क्या मेरे राज को मेरे खिलाफ इस्तेमाल करेगा ?

    स्पष्टीकरण :एक अच्छा काउंसलर थेरेपी के दौरान हुई बातों को थेरेपी तक ही रखता है, और कभी आपके खिलाफ नही इस्तेमाल करता है। 

     

     

     

    Responses 2

    • sapna sahi
      sapna sahi   Dec 25, 2015 03:52 PM

      अपने मानसिक और शारीरिक  बीमारियो  को भगाने का बहुत ही अच्छा और सरल उपाय । धन्यबाद

    • shruti jain
      shruti jain   Dec 25, 2015 12:53 PM

      BAHUT HI ACHHI ARTICLES HAI 

  • 31 Jul
    Nandini Harkauli

    अक्षय कुमार के माता पिता,आप सराहनीय हैं

    Akshay Kumar

    हाल ही में, प्रसिद्ध अभिनेता अक्षय कुमार ने अपने बचपन की एक चौकाने वाली घटना के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि “वह जब 6 साल के थे तब उनके बिल्डिंग के लिफ्ट मैन ने उनको अनुचित रूप से छुआ था " उन्होंने अपने इस अनुभव के बारे में मुंबई में आयोजित एक महिला सशक्तिकरण समारोह में बात की। शुक्र है, उन्होंने इस बारे में अपने माता-पिता को बताया ,और उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज की। लिफ्ट-मैन की गिरफ्तारी के तुरंत बाद, यह पता चला कि वह नियमित रूप से इस तरह के अभद्र व्यवहार करता था, और कई अन्य बच्चों के साथ भी ऐसा करने का उसका इतिहास रहा था।

    अक्षय ने ज़ोर देकर कहा कि, वे उस घटना से तनावग्रस्त नहीं हुए, इसका एकमात्र कारण था उनके माता पिता और उनके बीच अच्छी सहज बातचीत होना। और इसलिए ही वे कार्रवाई भी कर पाए। यह निश्चित रूप से ऐसा किस्सा था जिसे बाँटने से इस तरह की घटनाओं के बारे में जागरूकता फैलती है। इस घटना के कारण, वह आज भी "बम (bum)" शब्द का प्रयोग नहीं करते, क्योंकि यह उन्हें गुस्सा दिलाता है। एक शब्द जो हम सब कईं बार उपयोग करते हैं, दुर्भाग्य से अक्षय के लिए कहना आसान नहीं है। ज़ाहिर है उन्हें इस घटना से धक्का पहुँचा है ,भले ही इतने साल बीत चुके हैं। मशहूर अभिनेता अक्षय कुमार वर्तमान में अपनी आगामी फिल्म, 'टाय्लेट एक प्रेम कथा' का प्रचार कर रहे हैं, और उन्हें अपने अतीत से आगे बढ़ते हुए देख हम सभी मदद लेने ओर पिछली बातें छो ड़कर आगे बढ़ने के लए प्रोत्साहित होते हैं। साथ ही हम इस बात पर भी ज़ोर देना चाहते हैं कि माता-पिता और बच्चों के बीच एक स्पष्ट संवाद का होना बेहद आवश्यक है।

    हालांकि यह तो केवल एक किस्सा है,ऐसे लाखों अन्य मामले रोज़ होते हैं जो सामने नहीं आते। रिपोर्ट दर्ज कराना तो दूर, बहुत से बच्चे और महिलाएं इसके बारे में बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। ऐसी घटनाओं को अक्सर अपमानजनक और भद्दी नज़रों से देखा जाता है।मेरे प्रिय दोस्तों, हमें यही नज़रिया बदलने की जरूरत है। हमें औरतों को शिक्षित एवम् इतना सशक्त करने की ज़रूरत है कि वह अपने साथ हुए शोषण की रिपोर्ट करने से पीछे ना हटें। इसलिए, यह ब्लॉग माता- पिता और बच्चों के बीच सही एवं गलत स्पर्श के बारे में बात करने का महत्व बताना चाहता है। चाहे वो एक अजनबी का आपको घूरना हो या फिर एक अनुचित स्पर्श ; महिलाएं, बच्चे, पुरुष, जवान या बूढ़े इस से गुज़र कर चुप बैठें, यह ठीक नहीं है।

    यहां कुछ विशेष बातें दी गई हैं जिनसे माता-पिता और परिवार के सदस्य अपने बच्चों को बेहतर और खुलकर संवाद करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं:

     1: बचपन से ही उन्हें यह सिखाएं कि, वे जब चाहें किसी भी चीज़ के बारे में, अपने माता-पिता से बात करने के लिए स्वतंत्र हैं। मैं यह इसलिए कह रही हूं ,क्योंकि अक्सर बच्चे अपने और माता-पिता एवं देखभाल करने वालों के बीच एक दीवार खड़ी कर देते हैं ,क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें ही डाँट या मार पड़ेगी, इसलिए वह चीज़ों को बड़ों से छिपाते हैं। "कभी भी , कुछ भी ", यह वाक्यांश उन विषयों के बारे में है जिनके बारे में ज़्यादातर माता-पिता बात करने से हिचकिचाते हैं। जैसे "अच्छे स्पर्श और बुरे स्पर्श में अंतर", सेक्स आदि, सभी विषय हैं, जिन पर माता-पिता को अपने बच्चों को शिक्षित करने की कोशिश करनी चाहिए। नहीं, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि जैसे ही वह 5 साल के हों, तो आपको उन्हें सेक्स और रिश्तों के बारे में सिखाना चाहिए, इसके लिए उचित आयु 10 या 11 वर्ष होगी, इससे पहले कि वे यौवन में प्रवेश करें। माता-पिता को अपने बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में, जितनी जल्दी हो सके, सिखाना चाहिए और इस तरह की परिस्थितियों को कैसे संभालना है यह भी बताना चाहिए। जब बच्चों को यह यकीन हो जाएगा कि उनका बड़ों को यह सब बताना अनिवार्य है तो वह बिना हिचकिचाहट ऐसा करने में सक्षम होंगे।

    2: अपने बच्चों से रोज़ बात करें। आप अपनी दिनचर्या में कितने ही व्यस्त हों,अपने बच्चों को कम से कम आधा घंटा दीजिए ,उनके बारे में अपडेटेड रहिए, इससे वह सुरक्षित महसूस करेंगे। उन्हें पता रहेगा कि आप उनके जीवन में रुचि ले रहे हैं, और इस तरह, भले ही बच्चा कुछ भी ना कहे, आपको उनके हाव भाव से संकेत मिल जाएंगे कि उनके जीवनशैली में कुछ अलग या गड़बड़ है। इस तरह से आप उन पर बेहतर निगरानी रख पाएंगे और समय से उनकी सुरक्षा कर सकेंगे।

    3: उन्हें दुनिया में चल रहे महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में शिक्षित करें। अड़चन यह है कि माता-पिता और बड़े लोग सोचते हैं कि "वे इसके लिए अभी बहुत छोटे हैं"। मेरा मतलब है हाँ, वे दुनिया के भयानक सत्य जानने के लिए छोटे हैं, लेकिन यह वही दुनिया है जिसमे वह रह रहे हैं। आपको इसके बारे में बहुत स्पष्ट और विस्तार से बताना ज़रूरी नहीं है, कईं तरीके हैं जिनसे आप अपनी बात उनकी उम्र के अनुकूल कहानियों द्वारा भी समझा सकते हैं। उन्हें ऐसे लोगों के बारे में बताइए जो अकेले में उनसे संपर्क करने की कोशिश कर सकते हैं। उदाहरण देकर उन्हें बताइए की वह ऐसे में क्या कदम उठाएं। बिना विस्तार में जाए आप यह बात स्पष्ट करें ,ऐसी कोई भी घटना होने पर वह चुप बिल्कुल ना रहें।

    4: उन्हें कभी ऐसा महसूस न होने दें कि आप उनकी पहुँच के बाहर हैं। माता-पिता की सबसे बड़ी गलतियों में से एक है, बच्चे को यह लगना कि उनका कोई महत्व नहीं है। आप बहुत व्यस्त हैं, तब भी, अगर आपका बच्चा परेशानी लेकर आपके पास आए, उसे अनदेखा ना करें। उनसे पूछिए कि क्या हुआ है ,कि उन्हें आपको बताने से डरने की ज़रूरत नहीं है। अगर वह कोई बेतुकी बात कहें तो परेशान मत होईए, उन्हें बताइए कि क्या सही है। लगातार उनका विश्वास जीतना ज़रूरी है ताकि वह आपसे कुछ छिपाएं नहीं।

    5: सप्ताह में कम से कम एक बार उनके साथ क्वालिटी समय व्यतीत करें, यह विशेष रूप से काम कर रहे माता-पिता पर लागू होता है। और यह समय पॉइंट 2 से अलग होना चाहिए, पॉइंट 2 में जिस विषय पर बात की है वह तो अनिवार्य है ही, इसे क्वालिटी समय के रूप में गिना नहीं जाएगा।

    जब मैं क्वालिटी समय की बात कर रही हूँ, मेरा मतलब है कि वास्तव में बच्चे के साथ अपने संबंध बढ़ाना। आप कुछ पेरेंट-चाइल्ड क्लासेस ले लीजिए, साथ मूवीज़ देखिए, उनके साथ खेलिए, उन्हें गले लगाइए, उनके साथ सोने जाइए। ये गतिविधियां आपके बच्चे के साथ आपके बंधन को बढ़ाती हैं और बेहतर करती हैं, अधिक संबंध = अधिक खुलापन।

         बच्चे हमेशा किसी ना किसी प्रकार की अनचाही घटनाओं के अधीन होते है, अफसोस की बात है कि हमारा समाज पहले जितना सुरक्षित नहीं रहा, और माता-पिता को और भी अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। उपर्युक्त बिंदुओं का मतलब यह नहीं है कि आपको अपने बच्चे को, उनका विश्वास हासिल करने के लिए बहुत लाड़ करना चाहिए, बिल्कुल नहीं। दृढ़ रहें, जब ज़रूरत हो तो उनसे सीधी बात करिए, लेकिन समय -समय पर अपना कोमल व भरोसेमंद रूप भी दिखाइए। आपके बच्चों को आपसे डरना नहीं, बल्कि आप का सम्मान करना सिखाइये, यह एक पतली रेखा है जिसको समझने में शायद आपको ऊपर दिए हुए बिंदु सहायता कर सकें। यदि अक्षय कुमार 6 साल की उम्र में ऐसा कर सकते हैं, तो अपने बच्चों को भी ज़रूर सिखाएं ताकि वे और सतर्क एवं संरक्षित हो सकें। धन्यवाद, अक्षय कुमार, आप वास्तव में युवा माता-पिता और हम सभी के लिए एक महान उदाहरण हैं।

    Source: 

  • 29 Feb
    Oyindrila Basu

    सिबलिंग राइवलरी के कारण और निदान

    bhaai bahan ke beech ladaai

     

    'सिबलिंग राइवलरी' यानि सहोदरों के बीच विकृत सम्पर्क। अगर एक ही माता पिता के दो या उससे ज्यादा संतान हों, तो ये संभावना होती है, कि बच्चे एक दूसरे के प्रति एक प्रतिद्वंदी रवैया पैदा कर लेते हैं। इसको अंग्रेजी में 'सिबलिंग राइवलरी' कहते है।

    एक बच्चा खुद को दूसरे से बेहतर साबित करने की फिराक में होता है, और कभी कभी इस प्रकार छेड़छाड़ में, सबल दुर्बल को तकलीफ भी पहुँचाने से पीछे नहीं हटता। बच्चे भूल जाते हैं, कि वे एक दूसरे के भाई या बहन हैं, उनका रिश्ता कोमल और सुन्दर होना चाहिए।

    लेकिन जलन और लड़ाई की मंशा उन में कभी अपनापन पलपने ही नहीं देती। अकसर देखा गया है, जिन घरों में दो से ज्यादा बच्चे हैं, वहां ऐसी प्रतिद्वंदिता ज्यादा पायी जाती है।

    माता पिता का प्यार बट रहा है, ऐसा महसूस होने पर, बच्चे एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं, और ये बचपन से ही खत्म नहीं होता, इसका दुष्प्रभाव उम्र भर रहता है। बड़े हो जाने के बाद भी, भाईओं के बीच मतभेद, झगड़ा आम बातें हैं, हालाँकि तब कारण अलग होता है। (सम्पत्ति पर मतभेद, या आपसी रिश्तों पर)

    सिबलिंग राइवलरी के कई कारण हो सकते हैं:

    1 . माता पिता का दायित्व सब से महत्वपूर्ण है। अकसर परिवार में दो बच्चों के होने से, माता पिता अनजाने में ही, एक के प्रति पक्षपाती हो जातें है। (क्योंकि वे या तो परिवार का पहला बच्चा है, या फिर सब से छोटा है, या फिर सबसे ख़ूबसूरत दिखता है, या फिर पढ़ाई में अव्वल है।) और इस हाल में, वे अपने प्यारे बच्चे को ज्यादा तोहफे देते हैं, ज्यादा प्रशंसा करते है। और इस वजह से उनके दूसरे बच्चे के अंदर हीन भावना पैदा होती है। वह मानने लगता है, कि माता पिता उससे ज्यादा उसके भाई को चाहते हैं, और तब से शुरू होती है, जलन और गुस्सा।

    2 . तुलना करना बुरी बात है। हर बच्चे में अपनी खासियत होती है, पर अकसर माता पिता अपने बच्चों में तुलना करने लगते हैं, और एक की छवि को आदर्श बनाकर दूसरे को प्रोत्साहन देने की कोशिश करते है, पर इससे उलटा प्रभाव होता है, बच्चा और ज़िद्दी हो जाता है, भाई के प्रति क्रोधित हो जाता है। "मम्मी मुझे हमेशा कहती है, अपने बड़े भाई से कुछ सीखो, नहीं तो कभी भी डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाओगे, पर मैं तो क्रिकेट खेलना चाहता हूँ ", बताते हैं अभिषेक मित्तल, 12 वी कक्षा के छात्र।

    3 . बच्चों के मन में कड़वाहट पैदा हो सकती है, अगर माता पिता अपने हर बच्चों पर समान ध्यान नहीं देते। कभी कभी, परिवार में कोई बच्चा, शारीरिक या मानसिक रूप से दुर्बल है, तो माता पिता उसे ज्यादा सुरक्षा देने की कोशिश करते हैं, पर इससे दूसरे बच्चे को महसूस होता है, जैसे वह परिवार में ज़रूरी नहीं है, और क्योंकि माता पिता से प्रतिशोध नहीं ले पाता, इसलिए, अपने दुर्बल भाई पर क्रोधित हो जाता है, आशा करता है, कि वह कभी पैदा ही नहीं हुआ होता। ऐसा हमने हिंदी फिल्म 'हाइड एंड सीक' में देखा है।

    4 . अकसर घर में होते रोज़ के झगड़ों से भी बच्चों में मन मुटाव हो सकता है।

    5 . कोई बच्चा थका हुआ हो, तो सब का ध्यान अपनी ओर करने के लिए भी वह दूसरे भाई को छेड़ने लगता है।

    6 . इंसान खुद से सबसे ज्यादा प्यार करता है, यही क्षमता उसे दूसरों को प्यार करना सिखाती है, और यही, उसे स्वार्थी भी बनाती है। खुद्की अलग पहचान बनाने की चाह भी सिबलिंग राइवलरी की वजह हो सकती है।

     

    पर इसके प्रभाव बहुत हानिकारक हो सकते है। कभी कभी भाई बहनों के बीच लड़ाई हो जाती है, तो कभी वे मरने मारने पर उत्तर आते हैं। बड़े होने के साथ साथ मुकाबले की सूरत बदलती रहती है। अगर सहोदर एक ही इंसान से प्यार करते हैं, तो फिर से उनमें मुक़ाबला शुरू हो जाता है, जैसे अंजना और संजना के बीच हुआ, फिल्म 'अलोन' में।

    इसे कैसे रोकें:

    1 . पहले तो ये समझें की सिबलिंग राइवलरी या सहोदरों के बीच लड़ाई 'सामान्य' घटना नहीं है। सिर्फ इसलिए, कि यह आम तौर पर घरों में देखा जाता है, इसका ये मतलब नहीं, की ये अच्छी चीज़ है।

    2 . हर बच्चे को उसके प्रतिभा के लिए उत्साह दें। बच्चों में तुलना बुरी बात है। कौन सी क्षमता बेहतर है इसका फैसला माता पिता नहीं कर सकते। उन्हें सबको  समानता से देखना चाहिए।

    3 . अगर आप देखते हैं, की आपका एक बच्चा दूसरे को छेड़ रहा है, तो फौरन पीड़ित को बचाने की कोशिश गलत है। बल्कि छेड़ते बच्चे से बात करें, उसके मानसिकता को समझने की कोशिश करें, और फिर उसे एहसास दिलाएं, कि अगर उसके साथ ऐसा हो रहा होता तो उसे कैसा लगता। इससे उसके मनोवृत्ति में सुधार आएगा।

    4 . माता पिता का ये समझना ज़रूरी है, की कुछ भी अपने आप ठीक नहीं होगा। आप को बचपन से उन्हें सिखाना होगा कि रिश्तों का सम्मान कैसे करते हैं।

    5 . अपने बच्चों को समान रूप से पुरस्कृत करें।

     

    परिवार में खुशहाली हो, तो बच्चे प्यार और सम्मान सीखेंगे। माता-पिता के बीच रिश्ते को देख कर ही बच्चे सीखते हैं, और परिवार में प्यार हो, तो रिश्तों में कड़वाहट कम ही आती है।

  • 28 Feb
    Oyindrila Basu

    च्युइंग गम चबाने से सतर्कता बढ़ती है।

    chewing gum

     

     

    च्युइंग गम का नाम आते ही मुझे अपने स्कूल के दिनों की पुरानी यादें ताजा हो गयीं, जब हम#Chicklets or #BigBubble के boxes अपने पास रखना पसंद करते थे, और च्युइंग गम चबा कर गुब्बारे बनाना बहुत मजेदार लगता था।

    लेकिन क्या बड़ों को इसका महत्व कम समझना चाहिए ? नही ! ये च्युइंग गम के छोटे, रसीले टुकड़े सिर्फ गुब्बारे बंनाने की तुलना में बड़े चमत्कार कर सकते हैं।

    हाल के शोधों में ये बात सामने आई है कि च्युइंग गम में सतर्कता बढ़ाने की क्षमता होती है। लगातार किसी चीज को चबाते रहने से दिमाग में रक्त का प्रवाह बढ़ता है, जिससे हमारी सतर्कता बढ़ जाती है। यह  इन्सुलिन का स्तर बढ़ा देता है, जिससे मस्तिष्क में प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार भागों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

    एक जापानी संगठन के द्वारा पुरुषों और महिलाओं पर समान रूप से एक परीक्षण किया गया। जिसमे उन्हें स्क्रीन पर दिखाई गई दिशा में प्रतिक्रिया के रूप में अपनी दाई या बायीं ऊँगली से एक बटन दबाना था, आधे लोगो को च्युइंग गम चबाने के लिए दिया गया, और बाकि लोगों को नही दिया गया, आधे घंटे के परीक्षण में ये देखा गया कि वे जो लगातार चबा रहे थे उन्होंने प्रतिक्रिया सिर्फ 493 मिलिसेकेंड में दे दिया ,जबकि दूसरे ग्रुप को इसी काम में 545 मिली सेकेण्ड लगे।

    डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि  लगातार चबाने से, कुछ समय के लिए स्मृति कार्य में हस्तक्षेप से आप और अधिक सतर्क बनते है, और फलस्वरूप स्मृति बेहतर होती है।

    इसलिए अब सभी मां अपने बच्चों का दिमाग तेज करने के लिए च्युइंग देना शुरू कर दें।

    हाल में अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन ने भी घोषित किया है, कि चीनी मुक्त च्युइंग गम चबाने से मसूड़ों में सुधार होता है।  कैविटी से बचाव और दांत मजबूत बनाने के अलावा यह सांस की बदबू से आप को मुक्त रखता है।

    जल्दी ही इन रिपोर्ट से पूरी दुनिया में सभी ब्रांड के च्युइंग गम की बिक्री बढ़ने वाली है।

    अब ये टैग कि "संजू! दांत सड़ जायेंगे" च्युइंग गम के साथ नहीं रहेगा। चॉकलेट को तो चबा नहीं सकते ना।

    हालाँकि इस गुब्बारे की तरह फूलने वाले च्युइंग गम के बहुत से चमत्कारी कार्य हैं।

     #NutritionalNeuroscience ने पहले से उपलब्ध तथ्यों में अपनी ये रिपोर्ट शामिल की है कि च्युइंग गम ध्यान में सहायक होता है, उन्होंने ये दावा किया है कि जब कोई नींद में होता है तो चबाने की क्रिया का अधिक प्रभाव होता है। च्युइंग गम आपके दिमाग  में भूख के अहसास को भुला देता है क्योंकि अधिकांश में थोड़ी मात्रा में चीनी होती है ,जो कार्बोहाइड्रेट की कमी को पूरी कर देता है।

    च्युइंग गम फायदेमंद होता है, क्योंकि यह आपको सक्रिय रखता है, और आपके दिमाग को ऐसा लगता है की आप कुछ खा रहे हैं, जो आपको ताकत दे रही है, जिससे आपको ज्यादा सजग होकर सोचने में मदद मिलती है, और खाने,पीने और भूख जैसी कम महत्वपूर्ण बातों की ओर आपका ध्यान नहीं जाता।

    च्युइंग गम कैफीन या निकोटिन जैसे हानिकारक चीजों को लेने की आदत को भी कम कर सकती है, इसलिए जो लोग धूम्रपान की लत को छोड़ना चाहते हैं वे अक्सर च्युइंग गम चबाते हैं।

    लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि, चबाने के भी नकारात्मक प्रभाव होते हैं :-

    • सतर्कता के अलावा ये आपकी जंक फ़ूड खाने की आदत को भी बढ़ा सकती है।
    • लगातार चबाने से आपके जबड़ों में TMJ (Temporomandibular Joint Disorder) हो सकता है।
    • इसके कारण आपको गैस संबंधी समस्या भी हो सकती है, क्योंकि वास्तव में चबाने का मतलब है ज्यादा हवा को निगलना।
    • जिन लोगो के दांतों में mercury की fillings हुई है उन्हें ज्यादा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि च्युइंग गम मुंह के अंदर इसके केमिकल को तोड़ सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।
    • चीनी युक्त च्युइंग गम से दूर रहिये।

    Responses 1

    • dinesh singh
      dinesh singh   Dec 27, 2015 08:51 PM

      ज्यादा कहना और कम खाना दोनों  ही स्वास्थ के लिए हानिकारक है |

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