कुल 169 लेख

  • 27 Mar
    Oyindrila Basu

    मानव तस्करी से पीड़ित व्यक्ति की सहायता कैसे करें?

    niyar saikia traffiking

     

    "मैं 12 साल की थी, जब मैं एक लड़के से मिली जो 18 साल का था। कच्ची उम्र में एक मर्द से मिल रहे ध्यान और परवाह से मेरा झुकाव उसकी तरफ होने लगा । पहले 6 महीनों में लगा मैं उससे प्यार करती हूँ, एक शाम, जब मैं 13 साल की थी, उसने मुझे दो लड़कियों से मिलवाया.... और कहा की मुझे स्ट्रिप बार में जा कर नाचना होगा", (Alexiana’s story: Escaping from a Nightmare)

    अकसर छोटी बच्चियों को इस मानव तस्करी के दलदल में फंसाया जाता है । प्यार और मोह के जाल में कैद कर इनका शोषण किया जाता है, इन्हें बेच दिया जाता है। इसे "ह्यूमन ट्रैफिकिंग" कहते है।

    हमें सावधानी हमेशा बरतनी चाहिए।

    जो दासत्व #UncleTom’sCabin में सिर्फ जातिवाद के रूप से अभ्यास किया जाता था, आज समाज का एक जाना-माना जुर्म है। औरतों और बच्चों का देह व्यापार या दासत्व करवाने के लिए अपहरण किया जाता है ।

    ऐसे जुर्म से पीड़ित व्यक्ति की मानसिकता पर गहरी चोट पहुँचती है। वे अगर इस गिरोह से बच भी गए, तो भी हर पल असुरक्षित महसूस करते हैं। समाज में नकारा मानते हैं खुद को। इनके मन पर पड़े गहरी चोट से इन्हें आज़ाद करने के लिए हम सब को कोशिश करनी होगी।

    1. एन जी ओ जैसे संस्थाओं को और तत्पर होना पड़ेगा। पीड़ित के लिए ऐसा वातावरण बनाये, की वे अपने जैसे और लोगों से मिल पाएं, और एक दूसरे से दुःख बाँटने से, उनका दर्द कम हो सकता है।

    2. पीड़ित को आर्थिक रूप से सबल बनाना ज़रूरी है। उनके रोज़गार के लिए हम सबको कोशिश करनी चाहिए। वे जैसा काम पसंद करते हैं, सिलाई, कढ़ाई,या पढ़ाना , जो भी उनके लिए उपयुक्त हो, उसमें उन्हें व्यस्त करना ज़रूरी है। इससे उनका आत्मविश्वास मज़बूत होगा, और मनोबल बढ़ेगा।

    3. पीड़ित व्यक्ति से सही प्रकार बात करना ज़रूरी है। हमदर्दी ना जताएं। इससे उनकी बुरी यादें वापस आ सकती है। खुल कर उनसे अच्छी चीज़ों पर विचार करें। स्वाभाविक रूप से उनसे मिलें, दोस्त की तरह घुल मिल जाएँ, वे भी आप जैसे ही एक और व्यक्ति हैं।

    4. समाज को भी अपनी धारणा बदलनी होगी, तस्करी के पीड़ित की तरफ अपना रवैया बदलना होगा। वे मुजरिम नहीं हैं, पीड़ित हैं, उनका शोषण हुआ है, उन पर उँगली उठाने की बजाए, उनका साथ दें।

    5. इस जुर्म के खिलाफ, कानून में सख्त सज़ा मिलती है, इस बात की जानकारी पीड़ित व्यक्ति को देना ज़रूरी है। इससे उन्हें राहत मिलेगी, के जिन्होंने उसे सताया है, इस दलदल में धकेला है, उनको सज़ा हो रही है, और वे सुरक्षित महसूस करेंगे।

    6. बच्चे जो तस्करी से मुक्त हो पाएं है, उन्हें शिक्षा की ओर ले जाना ज़रूरी है। इससे वे अपने अँधेरे को जल्द भूल पाएंगे। ज्ञान की रौशनी से काले दिन मिट जाएंगे ज़िन्दगी से।

    7. Rehab home सही काम कर रहे हैं, ये जांच करने के लिए गवर्नमेंट को और सक्रिय होना पड़ेगा।

     

    कई एन जी ओ हैं, जो पीड़ित लोगों को मुक्त करने की कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ तस्करी से मुक्त होना काफी नहीं हैं, मानसिक दर्द और भय से मुक्त होना पड़ेगा। अमेरिका में, "Girls on a Journey Program", साल में लगभग 50 ऐसी पीड़ित लड़कियों की मदद करता है।

    इनकी कहानी समाज तक पहुंचे इस के लिए हम सब को सोशल मीडिया का उपयोग करना चाहिए। इससे सचेतनता बढ़ेगी,और समाज का नज़रिया भी बदलेगा।

  • 26 Mar
    Oyindrila Basu

    जल्दबाज़ी की वजह से होने वाली चिंता को कैसे दूर करें ?

    jaldibaaji,चिंता

     

    हम जब भी जल्दी में होते हैं, हमें टेंशन होता है, हम चिंतित होते हैं कि हमारे पास ज्यादा वक़्त नहीं है। और इस चिंता के कारण हाथ पैर ठंडे पड़ जाते हैं, पसीना आने लगता है, और कभी कभी हाथ-पैर कांपने लगते है। हम में से कुछ लोग चिंता से नाखून चबाने लग जाते हैं। ये अचानक चिंता हमारे स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है, तो अगर जल्दबाज़ी से हो रही शंका को दूर करना है तो क्या करेंगे?

    जो चिंता आपके दिमाग में है उसे ज़ोर से शब्दों में स्वीकार करें। यानी 'हाँ मैं जल्दी में हूँ इसलिए चिंतित हूँ, मेरे पास वक़्त नहीं है, और मुझे टेंशन हो रहा है' इस प्रकार जज़्बातों को बयान करने से दिमाग पर ज़ोर कम हो जाता है, चिंता घटने लगती है।

    Matthew Lieberman द्वारा किये गए शोध में पाया गया है, कि जज़्बातों को खुल कर बताने से amygdala, जो की दिमाग का एक हिस्सा है, उसे नियंत्रण में लाया जा सकता है। ये हिस्सा, शरीर में और मन में चल रहे शंका इत्यादि का कारण है।

    सोचते रहने से बेहतर है बात करना। जब हम बोल रहे हैं 'मैं टेंशन में हूँ', तो चिंता और शंका वाली जो सोच है, वह कम हो जाती है। क्योंकि हम सोच में नहीं रहते, बात करने लगते हैं, इससे एंग्जायटी दूर होती है।

    जान बूझकर जल्दी हाथ पैर चलायें। सोचते रहने से अच्छा है, आप कुछ कर के जल्दी करें। खुद के साथ खेल खेलें कि कितनी जल्दी आप काम कर सकते हैं! खुद के सामने लक्ष्य रखें कि इतने समय में आप ये खत्म करेंगे। इससे भी आपकी चिंता घट जायेगी, क्योंकि आप कार्य में खुद को व्यस्त कर लेते हैं ।

    काम करते वक़्त शारीरिक हरकतों को महसूस करें। जैसे, अगर आप चल रहे हैं तो पैरों की आवाज़ पर ध्यान दें, हवा को चेहरे पर महसूस करें, अगर आप कंप्यूटर पर टाइप कर रहे हैं, तो उंगलियों के हिलने पर नज़र दें, इस प्रकार आप का ध्यान चिंतामूलक सोच से हटकर दूसरी चीज़ों में बंट जाएगा।

    अगर एंग्जायटी से आज़ाद होना चाहते हैं जो जल्दबाज़ी की सोच से मुक्त होना होगा। 'जल्दी करना होगा' ऐसा सोचने से प्रेशर बढ़ेगा, और कोई फल नहीं होगा, खुद को जल्द काम करने के लिए प्रोत्साहित करें। खुद को अपनी चिंता से अवगत कराएं, उसे शब्दों में स्वीकार करें, तो सोच अपने आप दूर हो जाएगा।

  • 25 Mar
    Oyindrila Basu

    एंग्जायटी से जुड़े दस सच

    anxiety

     

     

    हम सभी को चिंता या एंग्जायटी होती है, आम तौर पर यह मानसिक समस्या ज्यादातर लोगों में पायी जाती  है। इसके होने की सम्भावना किनको ज्यादा होती है, और इससे कैसे मुक़ाबला हो सकता है ये तो हमने पहले भी देखा है। आइए एंग्जायटी से जुड़े कुछ सच जानते हैं

    १. एंग्जायटी वंशानुकर्मिक है- अगर माता-पिता में से किसी एक को या दोनों को चिंता से जुड़ी समस्या है, तो बच्चे को भी एंग्जायटी हो सकती है। ज्यादातर चिंतित माता-पिता अपने बच्चे पर भरोसा करने से कतराते हैं, उन्हें प्रोत्साहित नहीं कर पातें। इससे बच्चे में हीन भावना पैदा होती है, और वे कोई भी काम करने से पहले और बाद में चिंतित रहते हैं।

    २. एंग्जायटी हमें शारीरिक पीड़ा भी देती है - मस्तिष्क में चिंता के संकेत होने पर, शरीर में एड्रेनालाईन और नॉर-एड्रेनालाईन जैसे हॉर्मोन्स निकलते हैं, जिससे हमें तकलीफ होती है, सीने में दर्द, सिरदर्द, थकान और उलटी की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं।

    ३. व्यायाम से एंग्जायटी कम हो सकती है- रोज़ व्यायाम करने से हम काफी स्वस्थ रह सकते हैं। ज्यादा  कार्य करने से शारीरिक गतिविधियों में मन लगा रहता है,  और चिंता बढ़ाने वाले विचार नहीं आते ।

    ४. एंग्जायटी हमारी घ्राण शक्ति को कम कर देती है- एक चिंतित  इंसान तटस्थ घ्राण को बदबू के रूप में सूंघता है।

    ५. हेल्थी खाने से एंग्जायटी कम हो सकती है- अगर हम प्राकृतिक भोजन जैसे फल सब्जी, मछली, इत्यादि खाते हैं, तो हम स्वस्थ रहेंगे, ना की तली हुयी चीज़ें खाने से।

    ६. एंटीडिप्रेसेंट के प्रभाव से बच्चा भी प्रभावित हो सकता है- अगर प्रेगनेंसी के वक़्त, माँ को एंटीडिप्रेसेंट से चिकित्सा किया जाए, तो बच्चे पर बड़े होने के बाद भी इसका असर रहता है, और वे एंग्जायटी से काफी समय तक बच सकते हैं।

    ७. एंग्जायटी ने निराशा को भी पीछे छोड़ दिया है- अमरीका में लगभग १०% युवा और ४०% एडल्ट लोगों को एंग्जायटी से जुडी  बीमारी है।

    ८. महिला और पुरुष में, महिलाएं, एंग्जायटी से ज्यादा प्रभावित होती हैं।

    ९. अगर आपको सोशल एंग्जायटी है, तो लोग आपको बेहतरीन समझेंगे- क्योंकि जब भी आप बात करेंगे, आप उससे पहले बहुत सोचेंगे, और फिर संवेदनशीलता से अपनी बात बताएंगे, इससे आपके शब्द अच्छे और सही होंगे, जिससे लोग आपसे प्रभावित होंगे।

    १०. एंग्जायटी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर से जुडी है- मेनिया, और कई प्रकार के कार्य जो हम बार बार दोहराते हैं, ये भी चिंता के लक्षण हैं।

  • 25 Mar
    Oyindrila Basu

    माइंडफुलनेस-चिंता को भगाने का चमत्कारी उपाय 

    mindfulness

     

    आप सोच रहे होंगे, अब ये माइंडफुलनेस क्या चीज़ है! इसका जवाब है एक आसान और सहेजलभ्य तरीका जिससे हमें चिंता यानी एंग्जायटी से मुक्ति मिल सकती है।

    हमने पहले भी पावर पोज़, और डिटरमिनेशन जैसे प्रक्रियाओं पर चर्चा की है, जिनसे एंग्जायटी, दूर हो सकता है।

    माइंडफुलनेस एक प्रकार की ध्यान-प्रक्रिया है, जिसमें आप सिर्फ अपने आज पर ध्यान देते हैं। अगली-पिछली बातों को जान बूझकर भुला देते हैं।

    आज की ख़ुशी को माध्यम बनाकर माइंडफुलनेस का अभ्यास करें, शारीरिक हरकतों को महसूस करें, #प्रकृति के स्पर्श को खुद में अनुभव करें, आप देखेंगे कि धीरे धीरे आपकी चिंताएं घट रही हैं।

     

    माइंडफुलनेस किस प्रकार चिंता कम करता है?

    1. ये आपके मस्तिष्क को कुछ हद तक बदलने का प्रयास करता है। Amygdala जो जज़्बातों के लिए ज़िम्मेदार है, वही हममें शंका, डर, चिंता इत्यादि भी पैदा करता है, और हम अपने आने वाले कल से घबराने लगते हैं। माइंडफुलनेस से Amygdala की आकृति छोटी हो जाती है।

    दिमाग में कोर्टिसोल जैसे हानिकारक हॉर्मोन्स की पैदाइश भी कम हो जाती है, जिससे चिंता दूर होती है। 27 मिनट के ध्यान से दिमाग में प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स का घनत्व बढ़ता है, जिससे हम शांत महसूस करते हैं।

    2. माइंडफुलनेस बेहतर ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी है- रिसर्च द्वारा पाया गया है, की कई लोगों ने माइंडफुलनेस का अभ्यास किया और खुद को चिंतामुक्त रख पाएं। इससे आप संतुष्ट रह पाएंगे।

    3. अगर ये वजह काफी नहीं, तो इनके अलावा माइंडफुलनेस शारीरिक रूप से भी कई सुधार ला सकता है-स्ट्रेस, हार्ट प्रॉब्लम, ब्लड प्रेशर, गैस प्रॉब्लम इत्यादि समस्याओं से भी आप मुक्त हो पाएंगे।

     

    कैसे इसका अभ्यास करें ?

    1. माइंडफुलनेस करने के लिए ध्यान लगाना ज़रूरी है। आज पर अपनी शक्ति डालें। ख्यालों को रेत की तरह गुज़र जाने दें।

    2. दिमाग की हर हरकत पर ध्यान दें,

    3. शुरुआत में, आप को लगेगा की आप बहुत ज्यादा कोशिश कर रहे हैं, चिंता दूर होने के बजाय बढ़ रही है, लेकिन इसका लगातार प्रयास करते रहेँ। आगे जा कर आप को फल मिलेगा।

     

    इसकी प्रक्रिया क्या है?

    1. चेयर पर सीधे पीठ बैठें, या फिर ज़मीन पर पैरों को मोड़ कर।

    2. चुपचाप बैठ कर अपनी सांसों की गति पर ध्यान दें, और उस मंत्र को मन ही मन दोहराएं जिससे आपको सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

    3. शारीरिक हरकतों को महसूस करें। ठंड, गर्म, दर्द, चिकोटी, हर छोटी से छोटी हरकत को ध्यान में लाएं।

    4. पारिवारिक हरकत जैसे कहीं आवाज़, गंध इत्यादि पर भी गौर करें।

    5. अपने लालच से भी मुक़ाबला करना ज़रूरी है। चिंताओं को आ कर चले जाने दें, आप सिर्फ अपनी सांसों पर ध्यान दें।

    इस प्रकार रोज़ अभ्यास करने से कुछ ही दिनों में आप एंग्जायटी,  को कम कर पाएंगे, और स्वस्थ रह पाएंगे।

    Image source

  • 23 Mar
    Janhavi Dwivedi

    जॉब इंटरव्यू और salary negotiation के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव

    job interview

     

     

    कई बार नौकरी के लिए इंटरव्यू के समय आपको घबराहट होती है, और उस समय अपनी  बात कहना बहुत मुश्किल हो सकता है।  हालाँकि रिसर्च के अनुसार यदि आप अपनी बात (आय तय करने संबंधी ) कहने में सक्षम होते हैं, तो इसका मतलब है कि, आप अन्य भत्तों के साथ अच्छा पद और ज्यादा आय प्राप्त कर सकते हैं।

    जब आप साक्षात्कार के लिए जाते हैं, तो निश्चित रूप से साक्षात्कारकर्ता वहां ज्यादा अधिकार सम्पन्न पक्ष के रूप में होते हैं। इसलिए पहले उन्हें अपनी बात कहने दें, मतलब कि पहले उन्हें प्रश्न पूछ लेने दें। जब उनके प्रश्न और आपके उत्तर समाप्त हो जाते हैं तो वे आपको आपकी भूमिका, आपके वेतन और काम के अन्य पहलुओं के बारे में आपको बताएंगे। यही समय है, जब आप इस विषय  में बात कर सकते हैं, लेकिन जल्दबाजी में नही, पहले उन्हें सुन लें।

    फिर, "यदि मैं सही समझ रहा हूँ" से शुरू करते हुए उनके द्वारा कही गयी बात को संक्षेप में दोहरा दें। इससे आपको जो बातें नहीं  समझ आ रही हैं, उनका स्पष्टीकरण भी हो जायेगा। इससे वे आश्वस्त होगें कि आपने उनकी बात सुनी, आपको इसमें रूचि है, और आप जो बात उन्होंने कही उसका सम्मान करते हैं।

    फिर उनकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए, अपनी बात भी  रखें। उदाहरण के लिए, कहिये कि,”मैं मानता हूँ कि, मैं अभी नया हूँ, और हो सकता है यह आपके लिए चिंता का विषय हो। लेकिन मैंने पढ़ाई के दौरान बढ़िया काम किया है, और आसानी से मैं यहाँ भी कर सकता हूँ। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि एक सफल कर्मचारी होने पर मुझे क्या फायदे मिल सकते हैं”।

    यदि आप बारीकी से देखें, तो आप ये पाएंगे कि इन वाक्यों में आपने ये मान लिया है कि, आप एक सफल कर्मचारी बनेगें और आपको लाभ मिलेगा। लेकिन आप सिर्फ ये पूछ रहें हैं, कि क्या और कितना लाभ मिलेगा। वे कुछ अस्पष्ट सा जवाब दे सकते हैं, जैसे 'आगे देखा जायगा', जिसपर आप कह सकते हैं, ओह, आपका मतलब appraisal? क्या आप बता सकते हैं, पहला appraisal कब होगा?

    इसलिए यह तरीका उन्हें कुछ भी अस्पष्ट छोड़ कर जाने नहीं  देगा, बल्कि कुछ हद तक एक वायदा देगा।  यदि आपको अभी वेतन वृद्धि नहीं मिल सकती, फिर भी salary या appraisal का वादा भी एक अच्छा सौदा है।

    संवाद विशेषज्ञ अपनी बात को अच्छी तरह से मनवाने और बातचीत करने के लिए निम्न सुझाव देते हैं :

    • दूसरे पक्ष के तर्कों को ध्यान से सुनें, और उनके मतलब को समझें।
    • जिन मुद्दों पर आप स्पष्ट नही हैं उन्हें कैसे, क्यों, कब, कहाँ और क्या प्रश्नों से स्पष्ट करें।
    • दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण सभी मुद्दों की सूची बनाएं और मुख्य मुद्दों की पहचान करें।
    • किसी भी व्यक्तिगत एजेंडे को पहचानें। उसके समाधान और आपत्ति (यदि हो ) के विषय बात करें।
    • एक समान क्षेत्रों को पहचाने।
    • किसी बाहरी दबाव को समझिए, जो समस्या को प्रभावित कर सकता है।
    • शांत रहिये और अपने व्यवहार में आक्रामकता की बजाय आत्मविश्वास लाइये।
    • तनाव को कम करने के लिए चतुराई और कूटनीति का प्रयोग करें।
    • याद रखें : 'ना' कहना एक छोटा-सा शब्द है, लेकिन इसमें बड़ी शक्ति है।
    • आपकी बॉडी लैंग्वेज सही होनी चाहिए।
    • ये जानिए कि कब समझौता करना है। लेकिन समझौता बहुत थोड़ी मात्रा में ही करना है।
    • अपनी जरूरतों को पहचानिये : ये मुख्य बिंदु हैं, जिन पर आप समझौता नही कर सकते।
    • और उन बातों में दिलचस्पी लें, जिन्हे आप स्वीकार कर सकते हैं।
    • यदि थोड़े समझौते आप स्वीकार कर सकते हैं, तो दूसरे पक्ष को नौकरी स्वीकार करने की सहमति दे दें।
    • ये सुनिश्चित करें की उन्होंने आपके प्रस्ताव की समय सीमा पर सहमति दी है।
    • कार्रवाई को निर्धारित करने के बाद समझौते पर आइये।
    • बातचीत के अंत में, अंतिम समझौता संक्षेप में, लिखित रूप में होना चाहिए।
    • यदि आप समझौते तक नही पहुंच सकते तो वैकल्पिक मार्ग के बारे में सोचें।