कुल 169 लेख

  • 04 Apr
    Oyindrila Basu

    आदत बनाने में कितना समय चाहिए ?

    good habit,नई आदत



    हम अकसर विज्ञापन में देखते हैं, "10 किलो वज़न कम करें सिर्फ 3 हफ्ते में", या फिर "अंग्रेजी बोलना सीखें सिर्फ 21 दिनों में" हर नई आदत के लिए आदमी को लगते हैं सिर्फ 21 दिन.......

    ये बात हवा में उड़ती हुयी नहीं आती, इसकी शुरुआत 1950 साल में हुयी थी, जब सर्जन मैक्सवेल मलट्ज (surgeon Maxwell Maltz) नें अपने पेशेंट्स को ऑब्सर्व  करते हुए पाया कि, हर इंसान को किसी नई परिस्थिति के साथ ताल मेल बनाने में लगभग 21 दिन लगते हैं।

    अगर किसी के पैर का ऑपरेशन हुआ है, तो उसे सच को स्वीकारने में वक़्त लगता है, पहले कुछ दिन वह अपने दोनों टांगों पर चलने फिरने की कोशिश करता है।

    वैसे ही, प्लास्टिक सर्जरी से गुज़रे इंसान को, अपनी नयी शक्ल को अपनाने में लगभग 21 दिन का वक़्त लगता है। इस प्रकार वे इस समाधान पर पहुंचे की हर इंसान को कोई भी नए अभ्यास को जीवन में लाने के लिए 21 दिन लगते हैं।

     

    पर इसका मतलब ये नहीं, की यही ध्रुव सत्य है। हाल ही में 2010 में, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में एक शोध द्वारा पता चला है, कि नए अभ्यास की आदत बनाने में 66 दिन लगते हैं।

    यहाँ कुछ लोगों को अपने ब्रेकफास्ट के बाद पानी पीने को कहा गया था। पानी पीने को आदत बनाना पड़ेगा ऐसा कहा गया था।

    हर रोज़ वे  लोग ये काम करते, और खुद के बनाये गए नियम अनुसार, रिकॉर्ड करते। इस प्रकार वे देखना चाहते थे, किस दिन ये हरकत  आदत बनती है। तभी पता चला 66 दिनों में ये नित्य काम का हिस्सा बन गया था।

    आप पहले कुछ हफ़्तों में सफल ना हों इसका ये मतलब नहीं कि कभी भी सफल नहीं होंगे।

     

    खुद को प्रोत्साहित रखना ज़रूरी है।

    1. हार नहीं माने-पहले कुछ दिनों में किसी भी नई परिस्थिति को अपनाना मुश्किल लगता है। शायद आप खुद के लक्ष्य में सफल नहीं होंगे। लेकिन नएपन को अपनाने के लिए कोशिश करते रहें। हार नहीं मानना है। अगर आप रोज़ पढ़ने की आदत डालना चाहते हैं, तो पहले कुछ दिनों में शायद रोज़ ये ना हो पाये, काम और दूसरी ज़िम्मेदारियों की वजह से, लेकिन हफ्ते में 2 दिन होगा, उसे कोशिश और लगन से 3 दिन बनाये, फिर 4, और ऐसे ही आदत को खुद में लाते रहें।

     

    1. खुद के लिए लक्ष्य सही रूप से स्थिर करें-कोई भी नई चीज़ आज बोलने से कल नहीं हो जायेगी। वक़्त तो लगता है, इसलिए "3 हफ्ते में 10 किलो वजन कम करने " जैसे वाहियात लक्ष्य नहीं बनाना है, इससे आप हताश होंगे।

     

    1. पहले कुछ हफ़्तों में दम नहीं छोड़ना है-डटे रहिये, गति को धीमा न पड़ने दें। शुरुआत में अगर एक भी दिन आदत को छोड़ा तो उसे अभ्यास नहीं बना पाएंगे।

     

    1. धीरे धीरे लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे-याद रखें कोई भी अच्छी आदत एक प्रयास है, एक सफर है, कोई हादसा नहीं जो एक बार में हो जायेगा। धीरे धीरे रोज़ थोड़ा-थोड़ा व्यायाम करते हुए 10 किलो घटाने की ओर बढ़ें। अच्छी आदत जब फल देगी तो आनंद और उत्साह दुगना होगा।

    और फिर खुद ही आप देखेंगे की यह आदत आपकी  ज़िन्दगी का हिस्सा है।

  • 29 Mar
    Oyindrila Basu

    मोटापा कम करें डिस्पोसिशनल माइंडफुलनेस के अभ्यास से

    mindful eating

     

    पिछले दिन मैं फ़िल्म #साइज़ जीरो देख रही थी, जिसमें, मोटाफे को खामी के रूप में देखने के बजाय उसे महत्व दिया जा रहा था, यह समझ में आया कि, स्वस्थ शरीर ही सब से ख़ास है, दुकान में रखी मैनिक्विन की तरह होना आवश्यक नहीं, लेकिन अगर आपके शरीर के कर्व्स ज़रुरत से ज्यादा ही बढ़ जाएँ, तो ये ओबेसिटी के लक्षण हो सकते हैं। :( इससे आपको कई भयानक बीमारियां भी हो सकती हैं । डायबिटीज, हृद-रोग, कोलेस्ट्रॉल डिसऑर्डर इत्यादि।
    थोड़ी सूझ बूझ से अपने खाना खाने के तरीकों में सुधार लाकर आप काफी हद तक मोटापा नियंत्रण में कर सकते हैं ।
    समस्या यह नहीं कि आप क्या खा रहे हैं समस्या है आप किस तरह से खा रहे हैं
    परिमाप में खाएं, बार बार थोड़ा खाएं तो आपका वज़न कम हो सकता है।
    पर जो सबसे ज़रूरी है वह है 'डिस्पोसिशनल माइंडफुलनेस' यानी अपने हर पल पर अधिक ध्यान।
    ये 'माइंडफुलनेस मैडिटेशन' से काफी अलग है, जहां हम दिन के एक समय पर अपने आज पर ध्यान देते हैं।
    लेकिन डिस्पोसिशनल माइंडफुलनेस का मतलब है, हर पल अपने आज पर ध्यान, अपने शारीरिक हरकतों पर ध्यान, क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं, उस पर ध्यान। ये मानसिकता एक इंसान की अंदरूनी ताकत है। पर इसका अभ्यास भी किया जा सकता है, इसे सिखाया भी जा सकता है।

    एरिक लूकस नामक वैज्ञानिक ने रिसर्च द्वारा साबित किया है, जो लोग MAAS Score, यानी माइंडफुलनेस की समीक्षा में ज्यादा अंक पाते हैं उनमें 34% फैट कम पाया गया है, तुलना में उनके जिन्हे सिर्फ 4 अंक मिले हैं।

    ये प्रक्रिया 394 लोगों पर आजमाई गई थी ।
    साफ़ शब्दों में कहा जाए, तो जो लोग, अपनी छोटी से छोटी हरकतों को भी ध्यान लगा कर करते हैं, आवेगशील हो कर कभी भी कुछ भी नहीं खाते। उनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है ।

     

    पर इसका अभ्यास कैसे करेंगे?


    1. धीरे धीरे शुरू करें- पहले दिन सिर्फ एक सोच पर ध्यान लगाएं, आप कैसा भोजन ले रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिए अच्छा है या नहीं उस पर ध्यान दें। फिर आहिस्ता-आहिस्ता इस सोच, इस ध्यान को दिन के बाकी समय में जो खा रहे हैं, उस पर भी लगाएं।

    2. खुद से ये प्रश्न करें कि आप क्यों खा रहे हैं- जब कोई भी चीज़ आप लेने जा रहे हैं, तो खुद से प्रश्न करें, आप क्यों खा रहे हैं? क्या आपको भूख लगी है? या सिर्फ मन बहलाने के लिए कुछ चाहिए? या स्वाद के प्रति आप ललचा रहे हैं? इस सवाल का जवाब देने से, आपातकालीन रूप से आप कुछ लेने से थम जाएंगे।


    3. अपनी शारीरिक हरकतों को खाने के बाद महसूस करें- क्या आप भारीपन महसूस कर रहे हैं? क्या आपको सुस्ती छा रही है? इसका मतलब है अपने गलत खान खाया है, या फिर गलत परिमाण में खाया है। अगली बार से आप ऐसा नहीं करेंगे।

    4. खाने को उपभोग करें- उसकी सुगंध को महसूस करें, उसके रंगों को परखें, और खाने के कण-कण को स्वाद से चटकारे, इससे मुंह में लार जल्दी बनेगा, और हज़म अच्छे से होगा, जिससे आपकी चर्बी कम होगी।


    5. एक वक़्त पर एक ही काम करें- पढ़ते पढ़ते खाना नहीं खाना चाहिए, या फिर टी वी देखते हुए भी खाना अच्छा नहीं होता। जब खा रहे हैं तो ध्यान लगाएं, इससे कितना खाना है उसका पता होगा, और आप उपभोग भी कर पाएंगे।

     

  • 27 Mar
    Oyindrila Basu

    मानव तस्करी से पीड़ित व्यक्ति की सहायता कैसे करें?

    niyar saikia traffiking

     

    "मैं 12 साल की थी, जब मैं एक लड़के से मिली जो 18 साल का था। कच्ची उम्र में एक मर्द से मिल रहे ध्यान और परवाह से मेरा झुकाव उसकी तरफ होने लगा । पहले 6 महीनों में लगा मैं उससे प्यार करती हूँ, एक शाम, जब मैं 13 साल की थी, उसने मुझे दो लड़कियों से मिलवाया.... और कहा की मुझे स्ट्रिप बार में जा कर नाचना होगा", (Alexiana’s story: Escaping from a Nightmare)

    अकसर छोटी बच्चियों को इस मानव तस्करी के दलदल में फंसाया जाता है । प्यार और मोह के जाल में कैद कर इनका शोषण किया जाता है, इन्हें बेच दिया जाता है। इसे "ह्यूमन ट्रैफिकिंग" कहते है।

    हमें सावधानी हमेशा बरतनी चाहिए।

    जो दासत्व #UncleTom’sCabin में सिर्फ जातिवाद के रूप से अभ्यास किया जाता था, आज समाज का एक जाना-माना जुर्म है। औरतों और बच्चों का देह व्यापार या दासत्व करवाने के लिए अपहरण किया जाता है ।

    ऐसे जुर्म से पीड़ित व्यक्ति की मानसिकता पर गहरी चोट पहुँचती है। वे अगर इस गिरोह से बच भी गए, तो भी हर पल असुरक्षित महसूस करते हैं। समाज में नकारा मानते हैं खुद को। इनके मन पर पड़े गहरी चोट से इन्हें आज़ाद करने के लिए हम सब को कोशिश करनी होगी।

    1. एन जी ओ जैसे संस्थाओं को और तत्पर होना पड़ेगा। पीड़ित के लिए ऐसा वातावरण बनाये, की वे अपने जैसे और लोगों से मिल पाएं, और एक दूसरे से दुःख बाँटने से, उनका दर्द कम हो सकता है।

    2. पीड़ित को आर्थिक रूप से सबल बनाना ज़रूरी है। उनके रोज़गार के लिए हम सबको कोशिश करनी चाहिए। वे जैसा काम पसंद करते हैं, सिलाई, कढ़ाई,या पढ़ाना , जो भी उनके लिए उपयुक्त हो, उसमें उन्हें व्यस्त करना ज़रूरी है। इससे उनका आत्मविश्वास मज़बूत होगा, और मनोबल बढ़ेगा।

    3. पीड़ित व्यक्ति से सही प्रकार बात करना ज़रूरी है। हमदर्दी ना जताएं। इससे उनकी बुरी यादें वापस आ सकती है। खुल कर उनसे अच्छी चीज़ों पर विचार करें। स्वाभाविक रूप से उनसे मिलें, दोस्त की तरह घुल मिल जाएँ, वे भी आप जैसे ही एक और व्यक्ति हैं।

    4. समाज को भी अपनी धारणा बदलनी होगी, तस्करी के पीड़ित की तरफ अपना रवैया बदलना होगा। वे मुजरिम नहीं हैं, पीड़ित हैं, उनका शोषण हुआ है, उन पर उँगली उठाने की बजाए, उनका साथ दें।

    5. इस जुर्म के खिलाफ, कानून में सख्त सज़ा मिलती है, इस बात की जानकारी पीड़ित व्यक्ति को देना ज़रूरी है। इससे उन्हें राहत मिलेगी, के जिन्होंने उसे सताया है, इस दलदल में धकेला है, उनको सज़ा हो रही है, और वे सुरक्षित महसूस करेंगे।

    6. बच्चे जो तस्करी से मुक्त हो पाएं है, उन्हें शिक्षा की ओर ले जाना ज़रूरी है। इससे वे अपने अँधेरे को जल्द भूल पाएंगे। ज्ञान की रौशनी से काले दिन मिट जाएंगे ज़िन्दगी से।

    7. Rehab home सही काम कर रहे हैं, ये जांच करने के लिए गवर्नमेंट को और सक्रिय होना पड़ेगा।

     

    कई एन जी ओ हैं, जो पीड़ित लोगों को मुक्त करने की कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ तस्करी से मुक्त होना काफी नहीं हैं, मानसिक दर्द और भय से मुक्त होना पड़ेगा। अमेरिका में, "Girls on a Journey Program", साल में लगभग 50 ऐसी पीड़ित लड़कियों की मदद करता है।

    इनकी कहानी समाज तक पहुंचे इस के लिए हम सब को सोशल मीडिया का उपयोग करना चाहिए। इससे सचेतनता बढ़ेगी,और समाज का नज़रिया भी बदलेगा।

  • 26 Mar
    Oyindrila Basu

    जल्दबाज़ी की वजह से होने वाली चिंता को कैसे दूर करें ?

    jaldibaaji,चिंता

     

    हम जब भी जल्दी में होते हैं, हमें टेंशन होता है, हम चिंतित होते हैं कि हमारे पास ज्यादा वक़्त नहीं है। और इस चिंता के कारण हाथ पैर ठंडे पड़ जाते हैं, पसीना आने लगता है, और कभी कभी हाथ-पैर कांपने लगते है। हम में से कुछ लोग चिंता से नाखून चबाने लग जाते हैं। ये अचानक चिंता हमारे स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है, तो अगर जल्दबाज़ी से हो रही शंका को दूर करना है तो क्या करेंगे?

    जो चिंता आपके दिमाग में है उसे ज़ोर से शब्दों में स्वीकार करें। यानी 'हाँ मैं जल्दी में हूँ इसलिए चिंतित हूँ, मेरे पास वक़्त नहीं है, और मुझे टेंशन हो रहा है' इस प्रकार जज़्बातों को बयान करने से दिमाग पर ज़ोर कम हो जाता है, चिंता घटने लगती है।

    Matthew Lieberman द्वारा किये गए शोध में पाया गया है, कि जज़्बातों को खुल कर बताने से amygdala, जो की दिमाग का एक हिस्सा है, उसे नियंत्रण में लाया जा सकता है। ये हिस्सा, शरीर में और मन में चल रहे शंका इत्यादि का कारण है।

    सोचते रहने से बेहतर है बात करना। जब हम बोल रहे हैं 'मैं टेंशन में हूँ', तो चिंता और शंका वाली जो सोच है, वह कम हो जाती है। क्योंकि हम सोच में नहीं रहते, बात करने लगते हैं, इससे एंग्जायटी दूर होती है।

    जान बूझकर जल्दी हाथ पैर चलायें। सोचते रहने से अच्छा है, आप कुछ कर के जल्दी करें। खुद के साथ खेल खेलें कि कितनी जल्दी आप काम कर सकते हैं! खुद के सामने लक्ष्य रखें कि इतने समय में आप ये खत्म करेंगे। इससे भी आपकी चिंता घट जायेगी, क्योंकि आप कार्य में खुद को व्यस्त कर लेते हैं ।

    काम करते वक़्त शारीरिक हरकतों को महसूस करें। जैसे, अगर आप चल रहे हैं तो पैरों की आवाज़ पर ध्यान दें, हवा को चेहरे पर महसूस करें, अगर आप कंप्यूटर पर टाइप कर रहे हैं, तो उंगलियों के हिलने पर नज़र दें, इस प्रकार आप का ध्यान चिंतामूलक सोच से हटकर दूसरी चीज़ों में बंट जाएगा।

    अगर एंग्जायटी से आज़ाद होना चाहते हैं जो जल्दबाज़ी की सोच से मुक्त होना होगा। 'जल्दी करना होगा' ऐसा सोचने से प्रेशर बढ़ेगा, और कोई फल नहीं होगा, खुद को जल्द काम करने के लिए प्रोत्साहित करें। खुद को अपनी चिंता से अवगत कराएं, उसे शब्दों में स्वीकार करें, तो सोच अपने आप दूर हो जाएगा।

  • 25 Mar
    Oyindrila Basu

    एंग्जायटी से जुड़े दस सच

    anxiety

     

     

    हम सभी को चिंता या एंग्जायटी होती है, आम तौर पर यह मानसिक समस्या ज्यादातर लोगों में पायी जाती  है। इसके होने की सम्भावना किनको ज्यादा होती है, और इससे कैसे मुक़ाबला हो सकता है ये तो हमने पहले भी देखा है। आइए एंग्जायटी से जुड़े कुछ सच जानते हैं

    १. एंग्जायटी वंशानुकर्मिक है- अगर माता-पिता में से किसी एक को या दोनों को चिंता से जुड़ी समस्या है, तो बच्चे को भी एंग्जायटी हो सकती है। ज्यादातर चिंतित माता-पिता अपने बच्चे पर भरोसा करने से कतराते हैं, उन्हें प्रोत्साहित नहीं कर पातें। इससे बच्चे में हीन भावना पैदा होती है, और वे कोई भी काम करने से पहले और बाद में चिंतित रहते हैं।

    २. एंग्जायटी हमें शारीरिक पीड़ा भी देती है - मस्तिष्क में चिंता के संकेत होने पर, शरीर में एड्रेनालाईन और नॉर-एड्रेनालाईन जैसे हॉर्मोन्स निकलते हैं, जिससे हमें तकलीफ होती है, सीने में दर्द, सिरदर्द, थकान और उलटी की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं।

    ३. व्यायाम से एंग्जायटी कम हो सकती है- रोज़ व्यायाम करने से हम काफी स्वस्थ रह सकते हैं। ज्यादा  कार्य करने से शारीरिक गतिविधियों में मन लगा रहता है,  और चिंता बढ़ाने वाले विचार नहीं आते ।

    ४. एंग्जायटी हमारी घ्राण शक्ति को कम कर देती है- एक चिंतित  इंसान तटस्थ घ्राण को बदबू के रूप में सूंघता है।

    ५. हेल्थी खाने से एंग्जायटी कम हो सकती है- अगर हम प्राकृतिक भोजन जैसे फल सब्जी, मछली, इत्यादि खाते हैं, तो हम स्वस्थ रहेंगे, ना की तली हुयी चीज़ें खाने से।

    ६. एंटीडिप्रेसेंट के प्रभाव से बच्चा भी प्रभावित हो सकता है- अगर प्रेगनेंसी के वक़्त, माँ को एंटीडिप्रेसेंट से चिकित्सा किया जाए, तो बच्चे पर बड़े होने के बाद भी इसका असर रहता है, और वे एंग्जायटी से काफी समय तक बच सकते हैं।

    ७. एंग्जायटी ने निराशा को भी पीछे छोड़ दिया है- अमरीका में लगभग १०% युवा और ४०% एडल्ट लोगों को एंग्जायटी से जुडी  बीमारी है।

    ८. महिला और पुरुष में, महिलाएं, एंग्जायटी से ज्यादा प्रभावित होती हैं।

    ९. अगर आपको सोशल एंग्जायटी है, तो लोग आपको बेहतरीन समझेंगे- क्योंकि जब भी आप बात करेंगे, आप उससे पहले बहुत सोचेंगे, और फिर संवेदनशीलता से अपनी बात बताएंगे, इससे आपके शब्द अच्छे और सही होंगे, जिससे लोग आपसे प्रभावित होंगे।

    १०. एंग्जायटी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर से जुडी है- मेनिया, और कई प्रकार के कार्य जो हम बार बार दोहराते हैं, ये भी चिंता के लक्षण हैं।