• 08 Apr
    Oyindrila Basu

    10 संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह (Cognitive Bias) जो आपकी सोच समझ को प्रभावित करते हैं।

    cognitive bias

     

    इंसान का मस्तिष्क प्रति सेकंड 160 प्रक्रियाओं को पूरा कर सकता है, जो इसे कोई भी कंप्यूटर या मशीन से बेहतर बनाता है। लेकिन इस मस्तिष्क में कई कमियां भी हैं। और इन्हीं में से एक है संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह या अंग्रेजी में हम कहते हैं Cognitive Bias। ये एक तरह का दिमागी पक्षपात है, जो हमें चेतना और सूझ बूझ से परे कर देता है, और हम सिर्फ अपनी धारणाओं के आधार पर फैसले लेते हैं। यह एक मानसिक समस्या है।

    आइए देखते हैं किस तरह के होते हैं ये पक्षपात-

    1. Confirmation Bias - हम उन्हीं लोगों से मिलना पसंद करते हैं जो हमारी तरह सोचते हैं और बोलते हैं। हम वही न्यूज़ चैनल्स और कार्यक्रम देखते हैं, जो हमारी राजनीतिक चिंता का समर्थन करती है। यानी भिन्न मत से हम दूर ही रहना पसंद करते हैं, क्योंकि हमारा समर्थन वहाँ नहीं होता।
    2. Bandwagon Effect - इसका मतलब है झुण्ड में चलना। जनमत समर्थन। हम किसी भी बात पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं, जब कई और लोग उसका समर्थन कर रहे हों। यानी जितने ज्यादा लोग एक बात को कहेंगे, उतना ही ज्यादा हम उस बात पर यकीन करेंगे, उसे सच मानेंगे।
    3. Conservatism Bias - पुरानी सोच पर ज्यादा भरोसा होने से हम किसी भी घटना के नए पहलू को देखना नहीं चाहते। हम सोचते हैं की जो चीज़ें पहले कही गयी थीं, वही सही है। नया सब कुछ गलत है।
    4. Post purchase Rationalization - इसे हम choice-supportive bias भी कहते हैं। हम जिस चीज़ को चुनते हैं, हम उसी का समर्थन करते हैं, भले ही उसमें लाखों खामियां हो। अगर हमने बाजार से कोई फालतू चीज़ खरीदते हैं, तो कितना भी दुरुपयोगी क्यों न हो, हम यही जताना चाहते हैं कि चीज़ बहुत अच्छी और किफायती है।
    5. Ostrich Effect - कोई इंसान जब गम्भीर सच्चाई से भागता है तो उसके मस्तिष्क में यही समस्या होती है। शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर घुसेड़ कर वह सोचता है, सूरज है ही नहीं।
    6. Recency - Conservatism का उल्टा है ये पक्षपात। इस में इंसान हाल ही में पाये गए तथ्य को ही सच और सही मानता है, क्योंकि उसे लगता है जो तथ्य बाद में आया है, वह काफी रिसर्च के बाद पाया गया है।
    7. Stereotyping - रूढ़िवादिता यानि किसी इंसान या समूह को बिना उसे जाने या पहचाने अपनी राय ज़ाहिर करना। किसी गलतफहमी से पनप रहे राय को ही Stereotyping कहते हैं। जैसे बंगाली लोग रसगुल्ले के शौक़ीन हैं, दक्षिण भारतीय हिंदी नहीं बोलते, मोटा इंसान ज्यादा खाना खाता है, और पतला इंसान कुछ खाता ही नहीं।
    8. Gambling Fallacy - भाग्य पर गलत तरीके से भरोसा करना इस समस्या की जड़ है। किसी भी काम में हार मिलने से हम सोचते हैं अगली बार ज़रूर जीत होगी, जैसे भाग्य मेरी हार को जीत में बदलेगा। एक कॉइन को टॉस करने से अगर टेल आता है, तो हम सोचते है अगली बार हेड आने की ही सम्भावना है। इस सोच के कारण इंसान को जुए की लत लगती है। जीत पाने की आशा में वह खेलता ही रहता है।
    9. Outcome Bias - इसी प्रकार जो इंसान फल पर निर्भर होकर सिद्धांत बनाता है, उसे यह समस्या होती है। अगर एक बार आप जुए में जीत गए, इसका ये मतलब नहीं की पैसों से जुआ खेलने का फैसला सही था।
    10. Blind-spot Bias - जब हम खुद ही अपने दिमागी पक्षपात को पहचान नहीं पाते, यह खुद में एक मानसिक समस्या है।
  • 05 Apr
    Oyindrila Basu

    कम चिंता कैसे करें?

    worry

     

     

    चिंता एक जीर्ण समस्या है, जो संक्रामक रोग की तरह फैलता है। आप किसी से वार्तालाप करने जाते हैं, तो दो एक बातों के बाद ही आप चिंतित हो जाते हैं, क्योंकि आपका ध्यान खुश होने वाली  बातों से हट कर परीक्षा या फिर ऑफिस अप्रैज़ल जैसे विशेष मुद्दों पर चला जाता है, और जैसा की अक्सर होता है कि आप भी उस समान परिस्थिति के शिकार होते हैं, तो आप भी उससे जुड़ जाते हैं।

    कभी कभी चिंता हवा की तरह खिड़की से घुस आता है। बिना वजह आप चिंता करते हैं। लेकिन अगर आप अधिक मात्रा में चिंता करने लगे, तो ये स्वास्थ्य के लिए हानि करती है, और फिर हमें डॉक्टर की मदद लेनी होती है।

    लेकिन यदि हम खुद अपनी मदद ना कर पाएं तो डॉक्टर क्या करेगा!  हमें डॉक्टर के पास जाना कभी पसंद नहीं होता।

    तो इस चिंता का समाधान क्या है?

    चिंता या एंग्जायटी से लड़ने के लिए ध्यान का अभ्यास किया जाता है, अपने आज पर, अपने रोज़ के कार्यक्रम पर पूर्ण ध्यान दें।

    चिंता एक जुनून है, इससे खुद को बाहर निकालें - आप चिंता नहीं करेंगे ऐसा शपथ करें। हिंदी फिल्मों के डायलॉग याद करें, "जुनून खतरनाक है", तभी इससे खुद को बाहर निकाल पाएंगे।

    आप का ध्यान आपके रोज़ के कामों पर होना चाहिए- रात में खाने में क्या बनाएंगे ये सोचें। हरी सब्जियों की ताज़गी को महसूस करें। उससे क्या ख़ास बना सकते हैं ये सोचें। स्वादिष्ट खाने की खुशबू को नाक में लें। इस प्रकार रोज मर्रा के काम में  जब आप खुद को व्यस्त करेंगे, तो दूर की चिंताओं से आपका ध्यान हट जाएगा।

    अच्छे जुनूनी कार्य पर समय बिताएं- वो काम करें जिसमें आपका मन लगे puzzle और वीडियो गेम्स जैसे खेल नशे की तरह होते हैं। इनसे हमारा दिमाग भी तेज़ होता है, और जीतने के लिए इन पर पूरा ध्यान देना पड़ता है । इनका अभ्यास करें। बैडमिंटन, फुटबाल, योग आदि का अभ्यास करें ।

    हर दिन व्यायाम के लिए वक़्त रखें- रोज़  व्यायाम का अभ्यास करने से स्वास्थ्य बेहतर रहता है, और चिंता हमसे कोसों दूर रहती है।

    छोटी छोटी खुशियों को त्योहार की तरह मनाएं- नए कपड़े खरीदने पर खुद को ट्रीट दें, घर लौट कर आइस-क्रीम खाएं और ख़ुशी मनाएं। ऐसे छोटी छोटी खुशियों को मनाने से आप का मन खुश रहता है ।  लम्बे क्षण में मिलने वाले लाभ के बारे में ज्यादा  सोचेंगे तो उसके ना मिलने की सम्भावना भी दिमाग में होगी, और आप फिर परेशान हो जाएंगे।

     

  • 04 Apr
    Oyindrila Basu

    आदत बनाने में कितना समय चाहिए ?

    good habit,नई आदत



    हम अकसर विज्ञापन में देखते हैं, "10 किलो वज़न कम करें सिर्फ 3 हफ्ते में", या फिर "अंग्रेजी बोलना सीखें सिर्फ 21 दिनों में" हर नई आदत के लिए आदमी को लगते हैं सिर्फ 21 दिन.......

    ये बात हवा में उड़ती हुयी नहीं आती, इसकी शुरुआत 1950 साल में हुयी थी, जब सर्जन मैक्सवेल मलट्ज (surgeon Maxwell Maltz) नें अपने पेशेंट्स को ऑब्सर्व  करते हुए पाया कि, हर इंसान को किसी नई परिस्थिति के साथ ताल मेल बनाने में लगभग 21 दिन लगते हैं।

    अगर किसी के पैर का ऑपरेशन हुआ है, तो उसे सच को स्वीकारने में वक़्त लगता है, पहले कुछ दिन वह अपने दोनों टांगों पर चलने फिरने की कोशिश करता है।

    वैसे ही, प्लास्टिक सर्जरी से गुज़रे इंसान को, अपनी नयी शक्ल को अपनाने में लगभग 21 दिन का वक़्त लगता है। इस प्रकार वे इस समाधान पर पहुंचे की हर इंसान को कोई भी नए अभ्यास को जीवन में लाने के लिए 21 दिन लगते हैं।

     

    पर इसका मतलब ये नहीं, की यही ध्रुव सत्य है। हाल ही में 2010 में, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में एक शोध द्वारा पता चला है, कि नए अभ्यास की आदत बनाने में 66 दिन लगते हैं।

    यहाँ कुछ लोगों को अपने ब्रेकफास्ट के बाद पानी पीने को कहा गया था। पानी पीने को आदत बनाना पड़ेगा ऐसा कहा गया था।

    हर रोज़ वे  लोग ये काम करते, और खुद के बनाये गए नियम अनुसार, रिकॉर्ड करते। इस प्रकार वे देखना चाहते थे, किस दिन ये हरकत  आदत बनती है। तभी पता चला 66 दिनों में ये नित्य काम का हिस्सा बन गया था।

    आप पहले कुछ हफ़्तों में सफल ना हों इसका ये मतलब नहीं कि कभी भी सफल नहीं होंगे।

     

    खुद को प्रोत्साहित रखना ज़रूरी है।

    1. हार नहीं माने-पहले कुछ दिनों में किसी भी नई परिस्थिति को अपनाना मुश्किल लगता है। शायद आप खुद के लक्ष्य में सफल नहीं होंगे। लेकिन नएपन को अपनाने के लिए कोशिश करते रहें। हार नहीं मानना है। अगर आप रोज़ पढ़ने की आदत डालना चाहते हैं, तो पहले कुछ दिनों में शायद रोज़ ये ना हो पाये, काम और दूसरी ज़िम्मेदारियों की वजह से, लेकिन हफ्ते में 2 दिन होगा, उसे कोशिश और लगन से 3 दिन बनाये, फिर 4, और ऐसे ही आदत को खुद में लाते रहें।

     

    1. खुद के लिए लक्ष्य सही रूप से स्थिर करें-कोई भी नई चीज़ आज बोलने से कल नहीं हो जायेगी। वक़्त तो लगता है, इसलिए "3 हफ्ते में 10 किलो वजन कम करने " जैसे वाहियात लक्ष्य नहीं बनाना है, इससे आप हताश होंगे।

     

    1. पहले कुछ हफ़्तों में दम नहीं छोड़ना है-डटे रहिये, गति को धीमा न पड़ने दें। शुरुआत में अगर एक भी दिन आदत को छोड़ा तो उसे अभ्यास नहीं बना पाएंगे।

     

    1. धीरे धीरे लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे-याद रखें कोई भी अच्छी आदत एक प्रयास है, एक सफर है, कोई हादसा नहीं जो एक बार में हो जायेगा। धीरे धीरे रोज़ थोड़ा-थोड़ा व्यायाम करते हुए 10 किलो घटाने की ओर बढ़ें। अच्छी आदत जब फल देगी तो आनंद और उत्साह दुगना होगा।

    और फिर खुद ही आप देखेंगे की यह आदत आपकी  ज़िन्दगी का हिस्सा है।

  • 29 Mar
    Oyindrila Basu

    मोटापा कम करें डिस्पोसिशनल माइंडफुलनेस के अभ्यास से

    mindful eating

     

    पिछले दिन मैं फ़िल्म #साइज़ जीरो देख रही थी, जिसमें, मोटाफे को खामी के रूप में देखने के बजाय उसे महत्व दिया जा रहा था, यह समझ में आया कि, स्वस्थ शरीर ही सब से ख़ास है, दुकान में रखी मैनिक्विन की तरह होना आवश्यक नहीं, लेकिन अगर आपके शरीर के कर्व्स ज़रुरत से ज्यादा ही बढ़ जाएँ, तो ये ओबेसिटी के लक्षण हो सकते हैं। :( इससे आपको कई भयानक बीमारियां भी हो सकती हैं । डायबिटीज, हृद-रोग, कोलेस्ट्रॉल डिसऑर्डर इत्यादि।
    थोड़ी सूझ बूझ से अपने खाना खाने के तरीकों में सुधार लाकर आप काफी हद तक मोटापा नियंत्रण में कर सकते हैं ।
    समस्या यह नहीं कि आप क्या खा रहे हैं समस्या है आप किस तरह से खा रहे हैं
    परिमाप में खाएं, बार बार थोड़ा खाएं तो आपका वज़न कम हो सकता है।
    पर जो सबसे ज़रूरी है वह है 'डिस्पोसिशनल माइंडफुलनेस' यानी अपने हर पल पर अधिक ध्यान।
    ये 'माइंडफुलनेस मैडिटेशन' से काफी अलग है, जहां हम दिन के एक समय पर अपने आज पर ध्यान देते हैं।
    लेकिन डिस्पोसिशनल माइंडफुलनेस का मतलब है, हर पल अपने आज पर ध्यान, अपने शारीरिक हरकतों पर ध्यान, क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं, उस पर ध्यान। ये मानसिकता एक इंसान की अंदरूनी ताकत है। पर इसका अभ्यास भी किया जा सकता है, इसे सिखाया भी जा सकता है।

    एरिक लूकस नामक वैज्ञानिक ने रिसर्च द्वारा साबित किया है, जो लोग MAAS Score, यानी माइंडफुलनेस की समीक्षा में ज्यादा अंक पाते हैं उनमें 34% फैट कम पाया गया है, तुलना में उनके जिन्हे सिर्फ 4 अंक मिले हैं।

    ये प्रक्रिया 394 लोगों पर आजमाई गई थी ।
    साफ़ शब्दों में कहा जाए, तो जो लोग, अपनी छोटी से छोटी हरकतों को भी ध्यान लगा कर करते हैं, आवेगशील हो कर कभी भी कुछ भी नहीं खाते। उनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है ।

     

    पर इसका अभ्यास कैसे करेंगे?


    1. धीरे धीरे शुरू करें- पहले दिन सिर्फ एक सोच पर ध्यान लगाएं, आप कैसा भोजन ले रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिए अच्छा है या नहीं उस पर ध्यान दें। फिर आहिस्ता-आहिस्ता इस सोच, इस ध्यान को दिन के बाकी समय में जो खा रहे हैं, उस पर भी लगाएं।

    2. खुद से ये प्रश्न करें कि आप क्यों खा रहे हैं- जब कोई भी चीज़ आप लेने जा रहे हैं, तो खुद से प्रश्न करें, आप क्यों खा रहे हैं? क्या आपको भूख लगी है? या सिर्फ मन बहलाने के लिए कुछ चाहिए? या स्वाद के प्रति आप ललचा रहे हैं? इस सवाल का जवाब देने से, आपातकालीन रूप से आप कुछ लेने से थम जाएंगे।


    3. अपनी शारीरिक हरकतों को खाने के बाद महसूस करें- क्या आप भारीपन महसूस कर रहे हैं? क्या आपको सुस्ती छा रही है? इसका मतलब है अपने गलत खान खाया है, या फिर गलत परिमाण में खाया है। अगली बार से आप ऐसा नहीं करेंगे।

    4. खाने को उपभोग करें- उसकी सुगंध को महसूस करें, उसके रंगों को परखें, और खाने के कण-कण को स्वाद से चटकारे, इससे मुंह में लार जल्दी बनेगा, और हज़म अच्छे से होगा, जिससे आपकी चर्बी कम होगी।


    5. एक वक़्त पर एक ही काम करें- पढ़ते पढ़ते खाना नहीं खाना चाहिए, या फिर टी वी देखते हुए भी खाना अच्छा नहीं होता। जब खा रहे हैं तो ध्यान लगाएं, इससे कितना खाना है उसका पता होगा, और आप उपभोग भी कर पाएंगे।

     

  • 31 Jul
    Nishi agarwal

    चुप न रहे आवाज़ दें


    एक शांत दोपहर मैं इतिहास का विषय पढ़ रही थी। इतिहास का विषय सबके के लिए नींद की गोली जैसा था, पर मेरे लिए एक रोमांचक राज़।

    अंजाने में ही मेरे अंकल घर जल्दी वापस आ गए। वह हमेशा से ही मेरे, कपडे, पढ़ाई एवं मेरे दोस्तों में रूचि रखते थे। मैं उनसे प्रेरित थी, क्योंकि वो मुझे मेरे पिता से ज़्यादा निर्देशित करते थे।

    मैं अपने अंकल को घर में आराम से रहने देती थी। कई चीज़ों के बारे में चर्चा करते करते उन्होंने मुझे अपने पास आकर बैठने को बोला। मुझे इसमें कुछ भीअटपटा नही लगा और मैं उनके पास जा कर बैठ गयी।

    बात करते समय अचानक ही वे मेरे गुप्त अंगों को बेहूदे तरीके से छूने लगे। यह देख कर मैं पीछे हट गयी। इससे मुझे असुविधा महसूस होने लगी। मैं सही समय पर कोई प्रतिक्रिया नही कर पाई।

    भाग्यवश मेरी माँ हॉल में आ गयीं। मैं मौके का फायदा उठाकर अपने कमरे में भाग गई। "मेरे साथ हॉल में जो कुछ भी हुआ वह समझने में मुझे थोड़ा वक़्त लगा। वो एक ऐसा भाग था जिसने मेरी जिंदगी अस्त व्यस्त कर दी थी।

    मैंने खुद से घृणा के भाव से पूछा "मेरे साथ क्यों" मैं अपनी माँ को यह बात नही बता पा रही थी क्योंकि मुझे शर्मिंदगी और घबराहट महसूस हो रही थी। मरते दम तक यह राज़ ही रहने वाला था। यह बात वहीं तक रुकी नही!

    अगले दिन उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ा और शैतानो वाली हँसी देते हुए पूछा कि, मुझे कैसा लग रहा था। मेरे कुछ जवाब न देने पर उन्होंने मुझे धमकाया। मैं डर के साथ साथ क्रोधित भी हो गयी थी।

    मैं उन्हें थप्पड़ मारना चाहती थी पर उनकी पकड़ से छूट ही नहीं पा रही थी।" "मेरी चुप्पी उनके ऐसे कामों को और बढ़ावा दे रही थी। धीरे धीरे मैं अपने अंकल से दूर रहने लगी, ऐसी किसी जगह जाती ही नहीं थी जहाँ उनके होने की संभावना हो। उन्हें देखते ही मुझे घृणा और अत्याचार पीड़ित महसूस होने लगता था।

    मेरा समाज के कार्यक्रमो में हिस्सा ना लेना मेरे माता पिता को अनुचित लगता था। वे मेरे इस व्यवहार का कारण पूछते रहते थे। मैं इस उलझन में थी कि यह सब सुनने के बाद इस बारे में उनकी क्या राय होगी, मैंने ये बात उन्हें नही बताना ही सही समझा।

    मुझे असहाय महसूस होने लगा और सालों तक सब चुपचाप सहने लगी। लंबे समय तक वह सारी यादें मेरे दिमाग में एक क्लेइडोस्कोपीक चलचित्र के जैसे ताज़ा थे। मैं अपनी माँ से इस बारे में बात करना चाहती थी पर नहीं कर पाती थी।

    जीवन में आगे जा कर मैं मर्दो के साथ लंबे समय तक रिश्ता नहीं निभा पाती थी। मुझे मेरे दोस्तों(लडके) का साधारण तरीके से छूना भी पसंद नही आता था। मैं अपने बिगड़ते रिश्तों का कारण नहीं जान पा रही थी।

    मैं खुद का आदर नही करती और खुद से ही नाराज़ रहती थी। एक दिन मेरा धैर्य समाप्त हो गया। मेरी भावनाओं का उथल पुथल जब मेरे बर्दास्त के बाहर हो गया तो मैं एक साइकोलॉजिस्ट के पास गयी।

    शुरू में मैं थोड़ी भयभीत थी फिर धीरे धीरे मैंने उसे अपने पर बीती सारी बातें बताई। थेरेपिस्ट के साथ रोज़ के सेशन से मुझे हौसला मिलने लगा। मैं अपने अंकल से अब और नहीं डरती थी और बाद में अपनी माँ को इस यौन शोषण के बारे में बताया।

    मेरी माँ क्रुद्ध हो गयी और मेरे इस दुर्दशा को न जान पाने के लिए अति शर्मिंदगी महसूस करने लगी।" " अब उस बात को 7 साल हो चुके है। अब मुझे एहसास हुआ है कि मेरी उस दुर्दशा का कारण सिर्फ मेरी चुप्पी और मेरा डर कि, मेरे माता पिता मेरे बारे में क्या सोचेंगे ही था।

    इस बात को सबके सामने आने के डर से मैं हिचकिचाती थी और शर्मिंदगी महसूस करती थी। अगर मैं चुप नही रहती तो मुझे इतने समय तक सब कुछ सहना नहीं पड़ता"..... शालिनी ने घोषणा की। आज शालिनी एक एन जी ओ में काम करती है ।

    अब अपने सोच विचार समाज के सामने रखने से बिलकुल नही डरती। मुखरता ने उसे एक सकारात्मक आत्मछवि और जीने का विश्वाश दिया है। वह अब चुपचाप सहती नही है।

    मुखरता, सहनशीलता और आक्रमंता का सही बैलेंस है। मुखर होना मतलब खुद के या दूसरों के अधिकार के लिए आराम से और सकारात्मक भाव से ना कि आक्रामक या सहनशील होकर खड़ा होना। यह सब के पास जन्म से नही होता।

    यह सामजिक काबिलियत है जो समय के साथ हम सीख जाते हैं। मुखरता खुद में ही एक पुरस्कार की तरह है क्योंकि यह देख कर अच्छा लगता है कि लोग आपकी बातें ध्यान से सुनते है, और परिस्थितियां भी अक्सर अपने अनुसार ही चलती है।

    यह हमें अपने सोच विचार को खुल कर सामने लाने का आत्मविश्वाश और ताकत देती है। यह हमें किसी को भी अपना फायदा उठाने नहीं देती है। मुखरता की ट्रेनिंग एक तरह का व्यवहारिक उपचार है जो लोगो को खुद की मदद करने में सक्षम बनाता है।

    ट्रेनिंग में: - मुखरता की मांग करती स्थिति की पहचान - सबसे अच्छे अन्य रास्ते का विचार - चुने हुए रास्ते का अभ्यास - व्यवहार को आकार देना मुखरता की अभिव्यक्ति, आत्मवृद्धि और लक्ष्य प्राप्ति के बारे में है। जीवन में बलि का बकरा बनने से अच्छा है कि हम खुद के लिए आवाज़ उठाये।

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