कुल 169 लेख

  • 10 Apr
    Oyindrila Basu

    पैरेंटहुड-कोई खुश खबरी है क्या?

    parenthood

     

    हाल ही में, अपनी एक दोस्त से बात करते हुए अहसास हुआ, कि कैसे भारत, विदेश की सर्द हवाओं के बीच में भी, हमारे दिल में, मज़बूत जगह बनाये हुए है। वे बिहार से आएं है, सारे चार साल शादी को हो गए हैं, अब तक संतान नहीं है। और सिर्फ इस वजह से, अमरीका जैसे महेंगे देश में, वे लगभग हर दूसरे दिन डॉक्टर अपॉइंटमेंट्स को दौड़ते हैं। इसका फल मिलता है ना....... रिपोर्ट्स positive आने पर हर जांच के तुरंत बाद, अपनी सास को सब विस्तार से बताती है, कि डॉक्टर ने क्या-क्या हिदायत दी है ।

    "parenthood"  हमारे देश, भारत में, शादी-शुदा जोड़े के लिए हमेशा चर्चा में रहा है- शादी के बाद अगर जल्द बच्चा न आये तो दिक्कत, बिन ब्याही माँ बनना तो उससे भी बड़ी दिक्कत।

    1. हमारे देश में बच्चा होने के लिए शादी एक माध्यम माना जाता है।
    2. शादी के पहले दो सालों में, दोस्त रिश्तेदार हर मुलाक़ात में, एक बार तो ज़रूर पूछेंगे, "कोई खुश खबरी है क्या?" न मिले, तो फिल्म "हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी" भी देख लो, तो उनकी ख्वाहिशें और सलाह-मशवरा उससे ज्यादा ही लगेंगी।
    3. अगर तीसरा साल भी यूं ही निकल जाए, तो फिर आप तो गये....
    4. वैसे भी, खानदान में रोज़ आती "खुश-खबरियों" से आपको अचानक लगने लगेगा कि आप सच में इस दौड़ में अव्वल आने से चूक रहे हैं, जिसका नाम "Parenthood" है।

     

    एक नई जान को धरती पर लाने का निर्णय ये माँ-बाप मिल कर तय करते हैं। इसका निर्णय, बिन किसी दबाव के सिर्फ उनका होना चाहिए, जब वे ठीक समय समझें, तब बच्चे के जन्म के बारे में सोचें, तो ऐसा क्यों होता है, कि ऐसे महत्वपूर्ण फैसले में, अकसर घरवाले, मोहल्ले वाले, और ये समाज, अपना मत शामिल करने लगता है?

    समाज गुटबंदी पर टिका हुआ है, जहां अगर एक व्यक्ति भी उससे अलग सोचने या करने लगे, तो समाज उसे अलग कर देता है, अकेला कर देता है, उसका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।

    शायद इसी डर से, हम सब सामाजिक जीव, अकसर समाज के नियमों के विरुद्ध नहीं जाते, और एक वक़्त के बाद ये हमारी आदत बन जाती है।

    समाज, इसे आपके अस्तित्व मिटने का डर दिखा कर, कई अंधविश्वास, दकियानूसी नियमों का पालन करने पर भी मजबूर कर देता है। हमको हमारे फैसले लेने नहीं देता, घरवालों के रूप में, हमारी स्वतंत्रता पर रोक लगती है।

    पैरेंटहुड में देरी भी ऐसी ही एक स्थिति है, जब घर वाले मिलकर आपको समझाने लगते हैं, कि वक़्त पर घर में बच्चा ना आने से, आप समाज में मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे, आपकी नज़र नीची हो जाएगी, नाक काट जायेगी।  

    मनोवैज्ञानिक  Solomon Asch ने, अपने कथन, #SocialConformity में इस पर ख़ास तौर से चर्चा की है, कि कैसे इंसान के अकेले हो जाने का डर, उसे समाज के कहे अनुसार चलने पर मजबूर करता है।

    शादी के बाद, जल्दी बच्चे को लाना, यह एक अनुष्ठान की तरह है, जिसके नियम होते हैं, और अगर देर हुई तो माता पिता को अकसर काफी कुछ सुनना पड़ता है। अश्लील नामों (बांझ  या नपुंसक) से उन्हें सराहा जाता है।

    अकेली महिला जो माँ बन जाती हैं, उन पर भी जल्दी शादी करने और अपने लिए पति ढूंढने का का दबाव होता है। समाज उनकी  दृढ़ता और क्षमता को सलाम करने के बजाए उन्हें और मुश्किल में डालता  रहता  है।

    ऐसे सामाजिक दबाव कई और क्षेत्रों में भी दिखते है, जैसे लड़की की शादी, बच्चे की पढ़ाई, या बेटे की नौकरी, हर चीज़ के फैसले में सामाजिक मानसिकता ज़रूर शामिल होती है।

    इसका कोई समाधान नहीं, जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे, ये समाज नहीं बदलेगा, क्योंकि हम लोगों से ही तो समाज बनता है ।

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  • 09 Apr
    Janhavi Dwivedi

    क्षमा करने की शक्ति को पहचानो

    power of forgiveness

     

    शिखा की कोई सहेली नही बन पाती थी, क्योंकि वह  सबसे किसी न किसी बात पर गुस्सा हो जाती थी,यहां तक की अपने छोटे भाई से भी छोटी -छोटी बातों पर  कई दिनों तक बात नही करना उसकी आदत बन  गयी थी। शायद इसका एक कारण यह है कि उसे दूसरों को माफ़ करना नहीं आता, इस लेख के माध्यम से हम बता रहें हैं कि माफ़ी में कितनी शक्ति होती है।

    शायद किसी को शिकायतों को मन में रखे रहना सही लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह हमारे लिए ही नुकसानदायक होती है। शोधों से यहपता चला है कि जो व्यक्ति अपने मन में क्रोध और शिकायतों को लम्बे समय तक रखे रहता है,वह खुश नहीं रह सकता।

    आप उसकी गलती का बदला लें या नहीं लें लेकिन इन सब से सबसे ज्यादा आपको ही नुकसान होता है।

    दूसरी तरफ क्षमा या माफ़ कर देने से आपके मन से शिकायत ,क्रोध आदि मिट जाता है और आपका मन हल्का होने में आपको मदद मिलती है।

    शायद ऐसा लगे कि, जिसने गलती की उसे यूँ ही छोड़ना गलत है।लेकिन वास्तव में क्षमा करना किसी उत्पीड़न या अपनी परिस्थति को बिना कुछ कहे  स्वीकारने से एकदम अलग है। क्षमा करना एक बहुत ही सोच समझ कर लिया गया निर्णय होता है। इसलिए किसी को माफ़ करने का निर्णय मन से लेना चाहिए ना की किसी जल्दबाजी में।

    जब आपका कोई मित्र या साथी कोई गलती करता है जिससे आपको ठेस पहुंचती है,तो गुस्सा तो आएगा ही ,क्योंकि ये तो सहज मानवीय व्यवहार है, फिर आप ये सोचिये की गुस्सा करने या बदला लेने  की भावना से तो किसी का भला नही होगा। जितनी जल्दी आप ये समझ जायेंगे उतनी जल्दी आप अपने दुःख से बाहर निकल पाएंगे, क्योंकि ज्यादा समय तक मन में गुस्सा बने रहना भी एक समस्या है।

    यदि हम एक दूसरे को दुःख देते रहते हैं तो हम एक सामान्य मनुष्यों जैसा ही व्यवहार करते हैं। लेकिन यदि हमें अच्छे सार्थक संबंध और उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना करनी है तो अपनी भावनाओं को भी ज्यादा ऊँचे स्तर तक ले जाना जरूरी है। जरा सोचिये: यदि जीवन में किसी मोड़ पर बहुत से लोगों से आपको शिकायत हो तो कितने लोगों से आप अलग हो जाओगे, और कितनों से लड़ोगे? किसी की एक छोटी सी गलती पर उस व्यक्ति केलिए मन में नफरत या शिकायत की भावना ले कर बैठ जाना तो सही नही है। इससे तो बेहतर है आप उस घटना को भूल जाएँ। शोध से यह सामने आया है कि जो दम्पत्ति एक दूसरे की गलतियों को नजरंदाज करते हैं उनका रिश्ता, जो ऐसा नही करते उनसे ज्यादा स्वस्थ होता है। गलतियां तो मनुष्यों से ही होती है ,और यदि हम हर गलती को मुसीबत मान लेगें तब तो सारे रिश्ते हमसे दूर हो जायेंगें।    

    लेकिन इसका मतलब ये नही है की आप अपने जीवन में तिरस्कार करने वाले साथी या व्यक्ति को भी माफ़ कर दें। क्षमा करने की पहली शर्त आपका आत्मसम्मान है। इसलिए यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति या साथी से संबंध रखतें है जो आपका तिरस्कार करता है तो उस रिश्ते से अलग हो जाना ही बुद्धिमानी होगी।

    क्षमा करना आपके लिए ही अच्छा है, ना की किसी  अन्य के लिए और दूसरी बात ये है कि जिसने आपको ठेस पहुँचायी है उसके पास भावनात्मक कमी है और क्षमा करके आप उसे बदलने का एक मौका देंगे।

    यदि आप क्षमा करने की बजाय शिकायतों और गुस्से को मन में लिए रहते हैं तो आप को दुःख होगा। इसलिए यह काम आप अपने लिए कीजिये और क्षमा करने की आदत को अपने मन में जगह दीजिये ताकि आपका स्वास्थ्य बेहतर बना रहे और आपके रिश्तों में खुशियाँ ।

  • 08 Apr
    Oyindrila Basu

    10 संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह (Cognitive Bias) जो आपकी सोच समझ को प्रभावित करते हैं।

    cognitive bias

     

    इंसान का मस्तिष्क प्रति सेकंड 160 प्रक्रियाओं को पूरा कर सकता है, जो इसे कोई भी कंप्यूटर या मशीन से बेहतर बनाता है। लेकिन इस मस्तिष्क में कई कमियां भी हैं। और इन्हीं में से एक है संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह या अंग्रेजी में हम कहते हैं Cognitive Bias। ये एक तरह का दिमागी पक्षपात है, जो हमें चेतना और सूझ बूझ से परे कर देता है, और हम सिर्फ अपनी धारणाओं के आधार पर फैसले लेते हैं। यह एक मानसिक समस्या है।

    आइए देखते हैं किस तरह के होते हैं ये पक्षपात-

    1. Confirmation Bias - हम उन्हीं लोगों से मिलना पसंद करते हैं जो हमारी तरह सोचते हैं और बोलते हैं। हम वही न्यूज़ चैनल्स और कार्यक्रम देखते हैं, जो हमारी राजनीतिक चिंता का समर्थन करती है। यानी भिन्न मत से हम दूर ही रहना पसंद करते हैं, क्योंकि हमारा समर्थन वहाँ नहीं होता।
    2. Bandwagon Effect - इसका मतलब है झुण्ड में चलना। जनमत समर्थन। हम किसी भी बात पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं, जब कई और लोग उसका समर्थन कर रहे हों। यानी जितने ज्यादा लोग एक बात को कहेंगे, उतना ही ज्यादा हम उस बात पर यकीन करेंगे, उसे सच मानेंगे।
    3. Conservatism Bias - पुरानी सोच पर ज्यादा भरोसा होने से हम किसी भी घटना के नए पहलू को देखना नहीं चाहते। हम सोचते हैं की जो चीज़ें पहले कही गयी थीं, वही सही है। नया सब कुछ गलत है।
    4. Post purchase Rationalization - इसे हम choice-supportive bias भी कहते हैं। हम जिस चीज़ को चुनते हैं, हम उसी का समर्थन करते हैं, भले ही उसमें लाखों खामियां हो। अगर हमने बाजार से कोई फालतू चीज़ खरीदते हैं, तो कितना भी दुरुपयोगी क्यों न हो, हम यही जताना चाहते हैं कि चीज़ बहुत अच्छी और किफायती है।
    5. Ostrich Effect - कोई इंसान जब गम्भीर सच्चाई से भागता है तो उसके मस्तिष्क में यही समस्या होती है। शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर घुसेड़ कर वह सोचता है, सूरज है ही नहीं।
    6. Recency - Conservatism का उल्टा है ये पक्षपात। इस में इंसान हाल ही में पाये गए तथ्य को ही सच और सही मानता है, क्योंकि उसे लगता है जो तथ्य बाद में आया है, वह काफी रिसर्च के बाद पाया गया है।
    7. Stereotyping - रूढ़िवादिता यानि किसी इंसान या समूह को बिना उसे जाने या पहचाने अपनी राय ज़ाहिर करना। किसी गलतफहमी से पनप रहे राय को ही Stereotyping कहते हैं। जैसे बंगाली लोग रसगुल्ले के शौक़ीन हैं, दक्षिण भारतीय हिंदी नहीं बोलते, मोटा इंसान ज्यादा खाना खाता है, और पतला इंसान कुछ खाता ही नहीं।
    8. Gambling Fallacy - भाग्य पर गलत तरीके से भरोसा करना इस समस्या की जड़ है। किसी भी काम में हार मिलने से हम सोचते हैं अगली बार ज़रूर जीत होगी, जैसे भाग्य मेरी हार को जीत में बदलेगा। एक कॉइन को टॉस करने से अगर टेल आता है, तो हम सोचते है अगली बार हेड आने की ही सम्भावना है। इस सोच के कारण इंसान को जुए की लत लगती है। जीत पाने की आशा में वह खेलता ही रहता है।
    9. Outcome Bias - इसी प्रकार जो इंसान फल पर निर्भर होकर सिद्धांत बनाता है, उसे यह समस्या होती है। अगर एक बार आप जुए में जीत गए, इसका ये मतलब नहीं की पैसों से जुआ खेलने का फैसला सही था।
    10. Blind-spot Bias - जब हम खुद ही अपने दिमागी पक्षपात को पहचान नहीं पाते, यह खुद में एक मानसिक समस्या है।
  • 05 Apr
    Oyindrila Basu

    कम चिंता कैसे करें?

    worry

     

     

    चिंता एक जीर्ण समस्या है, जो संक्रामक रोग की तरह फैलता है। आप किसी से वार्तालाप करने जाते हैं, तो दो एक बातों के बाद ही आप चिंतित हो जाते हैं, क्योंकि आपका ध्यान खुश होने वाली  बातों से हट कर परीक्षा या फिर ऑफिस अप्रैज़ल जैसे विशेष मुद्दों पर चला जाता है, और जैसा की अक्सर होता है कि आप भी उस समान परिस्थिति के शिकार होते हैं, तो आप भी उससे जुड़ जाते हैं।

    कभी कभी चिंता हवा की तरह खिड़की से घुस आता है। बिना वजह आप चिंता करते हैं। लेकिन अगर आप अधिक मात्रा में चिंता करने लगे, तो ये स्वास्थ्य के लिए हानि करती है, और फिर हमें डॉक्टर की मदद लेनी होती है।

    लेकिन यदि हम खुद अपनी मदद ना कर पाएं तो डॉक्टर क्या करेगा!  हमें डॉक्टर के पास जाना कभी पसंद नहीं होता।

    तो इस चिंता का समाधान क्या है?

    चिंता या एंग्जायटी से लड़ने के लिए ध्यान का अभ्यास किया जाता है, अपने आज पर, अपने रोज़ के कार्यक्रम पर पूर्ण ध्यान दें।

    चिंता एक जुनून है, इससे खुद को बाहर निकालें - आप चिंता नहीं करेंगे ऐसा शपथ करें। हिंदी फिल्मों के डायलॉग याद करें, "जुनून खतरनाक है", तभी इससे खुद को बाहर निकाल पाएंगे।

    आप का ध्यान आपके रोज़ के कामों पर होना चाहिए- रात में खाने में क्या बनाएंगे ये सोचें। हरी सब्जियों की ताज़गी को महसूस करें। उससे क्या ख़ास बना सकते हैं ये सोचें। स्वादिष्ट खाने की खुशबू को नाक में लें। इस प्रकार रोज मर्रा के काम में  जब आप खुद को व्यस्त करेंगे, तो दूर की चिंताओं से आपका ध्यान हट जाएगा।

    अच्छे जुनूनी कार्य पर समय बिताएं- वो काम करें जिसमें आपका मन लगे puzzle और वीडियो गेम्स जैसे खेल नशे की तरह होते हैं। इनसे हमारा दिमाग भी तेज़ होता है, और जीतने के लिए इन पर पूरा ध्यान देना पड़ता है । इनका अभ्यास करें। बैडमिंटन, फुटबाल, योग आदि का अभ्यास करें ।

    हर दिन व्यायाम के लिए वक़्त रखें- रोज़  व्यायाम का अभ्यास करने से स्वास्थ्य बेहतर रहता है, और चिंता हमसे कोसों दूर रहती है।

    छोटी छोटी खुशियों को त्योहार की तरह मनाएं- नए कपड़े खरीदने पर खुद को ट्रीट दें, घर लौट कर आइस-क्रीम खाएं और ख़ुशी मनाएं। ऐसे छोटी छोटी खुशियों को मनाने से आप का मन खुश रहता है ।  लम्बे क्षण में मिलने वाले लाभ के बारे में ज्यादा  सोचेंगे तो उसके ना मिलने की सम्भावना भी दिमाग में होगी, और आप फिर परेशान हो जाएंगे।

     

  • 04 Apr
    Oyindrila Basu

    आदत बनाने में कितना समय चाहिए ?

    good habit,नई आदत



    हम अकसर विज्ञापन में देखते हैं, "10 किलो वज़न कम करें सिर्फ 3 हफ्ते में", या फिर "अंग्रेजी बोलना सीखें सिर्फ 21 दिनों में" हर नई आदत के लिए आदमी को लगते हैं सिर्फ 21 दिन.......

    ये बात हवा में उड़ती हुयी नहीं आती, इसकी शुरुआत 1950 साल में हुयी थी, जब सर्जन मैक्सवेल मलट्ज (surgeon Maxwell Maltz) नें अपने पेशेंट्स को ऑब्सर्व  करते हुए पाया कि, हर इंसान को किसी नई परिस्थिति के साथ ताल मेल बनाने में लगभग 21 दिन लगते हैं।

    अगर किसी के पैर का ऑपरेशन हुआ है, तो उसे सच को स्वीकारने में वक़्त लगता है, पहले कुछ दिन वह अपने दोनों टांगों पर चलने फिरने की कोशिश करता है।

    वैसे ही, प्लास्टिक सर्जरी से गुज़रे इंसान को, अपनी नयी शक्ल को अपनाने में लगभग 21 दिन का वक़्त लगता है। इस प्रकार वे इस समाधान पर पहुंचे की हर इंसान को कोई भी नए अभ्यास को जीवन में लाने के लिए 21 दिन लगते हैं।

     

    पर इसका मतलब ये नहीं, की यही ध्रुव सत्य है। हाल ही में 2010 में, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में एक शोध द्वारा पता चला है, कि नए अभ्यास की आदत बनाने में 66 दिन लगते हैं।

    यहाँ कुछ लोगों को अपने ब्रेकफास्ट के बाद पानी पीने को कहा गया था। पानी पीने को आदत बनाना पड़ेगा ऐसा कहा गया था।

    हर रोज़ वे  लोग ये काम करते, और खुद के बनाये गए नियम अनुसार, रिकॉर्ड करते। इस प्रकार वे देखना चाहते थे, किस दिन ये हरकत  आदत बनती है। तभी पता चला 66 दिनों में ये नित्य काम का हिस्सा बन गया था।

    आप पहले कुछ हफ़्तों में सफल ना हों इसका ये मतलब नहीं कि कभी भी सफल नहीं होंगे।

     

    खुद को प्रोत्साहित रखना ज़रूरी है।

    1. हार नहीं माने-पहले कुछ दिनों में किसी भी नई परिस्थिति को अपनाना मुश्किल लगता है। शायद आप खुद के लक्ष्य में सफल नहीं होंगे। लेकिन नएपन को अपनाने के लिए कोशिश करते रहें। हार नहीं मानना है। अगर आप रोज़ पढ़ने की आदत डालना चाहते हैं, तो पहले कुछ दिनों में शायद रोज़ ये ना हो पाये, काम और दूसरी ज़िम्मेदारियों की वजह से, लेकिन हफ्ते में 2 दिन होगा, उसे कोशिश और लगन से 3 दिन बनाये, फिर 4, और ऐसे ही आदत को खुद में लाते रहें।

     

    1. खुद के लिए लक्ष्य सही रूप से स्थिर करें-कोई भी नई चीज़ आज बोलने से कल नहीं हो जायेगी। वक़्त तो लगता है, इसलिए "3 हफ्ते में 10 किलो वजन कम करने " जैसे वाहियात लक्ष्य नहीं बनाना है, इससे आप हताश होंगे।

     

    1. पहले कुछ हफ़्तों में दम नहीं छोड़ना है-डटे रहिये, गति को धीमा न पड़ने दें। शुरुआत में अगर एक भी दिन आदत को छोड़ा तो उसे अभ्यास नहीं बना पाएंगे।

     

    1. धीरे धीरे लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे-याद रखें कोई भी अच्छी आदत एक प्रयास है, एक सफर है, कोई हादसा नहीं जो एक बार में हो जायेगा। धीरे धीरे रोज़ थोड़ा-थोड़ा व्यायाम करते हुए 10 किलो घटाने की ओर बढ़ें। अच्छी आदत जब फल देगी तो आनंद और उत्साह दुगना होगा।

    और फिर खुद ही आप देखेंगे की यह आदत आपकी  ज़िन्दगी का हिस्सा है।