हम अपने देश को भविष्य में कैसा देखना चाहते हैं ?

 

Clean India is Happy India

"नन्ही खेतों में आज नाच रही थी। उसकी मधुर आवाज़ फूलों और बहारों में गूँज रही थी। .... फिर कुछ बच्चों से मिली। ... और उन्हें प्राकृतिक कविता सुनाने लगी। इससे साफ़ आवाज़, और इससे स्वच्छ बोली तो हो ही नहीं सकती थी। फिर अचानक बजी एक घंटी। ..... ट्रीइईन्न्न। नन्ही की नींद टूट गयी, उसकी मम्मी ने पूछा, 'ब्रश कर लिया नन्ही?', और नन्ही ने कहा, 'कक्क क क कर र र र रह रही हूँ', सर को एक तरफ निरंतर हिलाते हुए वह बाथरूम गयी, और अपने अक्षमता पर धिक्कार से थूक दी "

क्या नन्ही जैसे बच्चे, हमेशा सपनों में ही खुद में पूर्णता ढूंढेंगे?

अब वक़्त आ गया है, बदलने का। अब बच्चे सपनों का सहारा नहीं लेंगे, खुद को उत्तम महसूस करने के लिए, समाज उनको यकीन दिलाएगा कि वे उत्तम और पूर्ण हैं, वे हमारी ही तरह हैं। उन्हें खुद को बदलने की ज़रूरत नहीं, सिर्फ अपनी दुर्बलताओं से लड़कर, उनपर जीत हासिल करना है।

पर समाज में साफ़ सोच लाने के लिए, ग़लतफ़हमी, गलत धारणा और पक्षपात जैसी गंदगी को मिटाना पड़ेगा।

ये बड़ी दुखद बात है, कि हमारा समाज, किसी भी मानसिक रोग से जूझने वाले इंसान की तरफ, एक नकारात्मक व्यवहार दिखाता  है।

उनकी सहायता करने के बजाए, उन्हें नकारता  है, उनका मज़ाक बनाकर उन्हें और तकलीफ पहुंचाता  है।

वक़्त आ गया है, कि मानसिक रोग पर समाज को नई जानकारी मिले, और वे अपनी धारणा बदलें।

मानसिक रूप से दुर्बल इंसान के मन में आत्मविश्वास जगाना ज़रूरी है, और ये हमारा कर्तव्य है।

स्कूल में, मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य पर अलग विभाग होने चाहिए, ताकि बच्चे मानसिक स्वास्थ्य, उसके कई रोग, और समाधान के बारे में विस्तार से जान पाएं।

मानसिक रोग को कलंक मानने के बजाए, उनपर खुल कर चर्चा हो सके, हमारे शिक्षालय में ऐसे फोरम बनाने चाहिए ।

आज भी भारत में कई जगहों पर, किसी को मानसिक बीमारी होने पर, मंदिर ले जाया जाता है, डॉक्टर से सब दूर रहते हैं, क्योंकि, बात फ़ैलने से बदनामी होगी, इस बात को मनोचिकित्सक-प्राची कंडेपार्केर  सिद्ध करती हैं।

यहां तक कि, मनोरोग को भूत प्रेत का साया बोल कर, ओझा, और साधु का सहारा लिया जाता है। इस अशिक्षा को मिटाना आवश्यक है।

आज भी कौमार्य और श्लीलताहानी जैसी बातों पर समाज में गलतफहमी  प्रचलित है।

अगर इनको जल्द मिटाया न गया, तो ऐसी घटनाओं से पीड़ित व्यक्ति को, और मानसिक दर्द होगा, समाज में सांस लेना मुश्किल होगा।

इसलिए देश में, विभिन्न कार्यक्रमों से जागरूकता फैलाना ज़रूरी है, जिसमें हम लोगों को बता सकते है, कि दोष पीड़ित का नहीं, बल्कि उनका है जिन्होनें यह घिनौना काम किया है। 

पूरे विश्व में दुर्बल के प्रति इंसान का व्यवहार निंदनीय होती है।

अगर कोई गिर जाए तो हम हँसते है, कोई हकला रहा है, तो हम हँसते हैं, किसी ने अलग तरह के कपड़े पहने है, तो हम हँसते है।

यानी जो भी हमारे हिसाब से दुर्बल है, हम उन पर हँसते हैं, और जो भी हम सबसे अलग है, और बहुमत से मेल नहीं खाता, वह समाज में पागल कहलाता है।

उस हिसाब से आइंस्टीन भी पागल ही थे। इसी लिए मन को जानना  और समझना ज़रूरी है। दुर्बलता और पागलपन में फर्क को समझेगी दुनिया, तभी, आगे बढ़ेगी दुनिया।

अगर समाज अपना हाथ बढ़ाएगा, तो किसी भी रोहित को अपना मनोबल बढ़ाने के लिए जादू की ज़रूरत नहीं होगी । 

टीवी में अंतरा और ईशान जैसे चरित्र हमें छू जाते हैं, पर क्या हम सच में उनकी पीड़ा  समझ पाते हैं?

डैने वाण डेरेन, एक एथलीट और रनर हैं, जिनको मिरगी थी। 1997 में, उन्होंने ऑपरेशन का फैसला लिया, जबकि वह जानती थी, की इससे उनका दिमाग हमेशा के लिए खराब हो सकता है, या उनकी मौत भी हो सकती है। पर उनमें जोश और जज़्बा था, जिससे वे अपने मानसिक रोग से लड़ पायीं, और आज नॉर्थ कैरोलिना में हुयी 1000 मील की दौड़ पूरा करने वाली, गर्वित महिला हैं वह।

ऐसी कहानियाँ हमें हमेशा प्रेरित करती है, और हमें इन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर करना चाहिए,  ताकि मानसिक रोग से पीड़ित लोगों को राहत मिले, आशा की नई रोशनी मिले, और समाज को भी सीख मिले ।