ग्रुप थेरेपी के बारे में जानने योग्य 6 बातें

 group therapy

1.ग्रुप थेरेपी की शुरुआत किसने की?

ग्रुप थेरेपी एक सरल और कम लागत वाली  मनोचिकित्सा है। मनोचिकित्सा का यह रूप बहुत ही कम समय में कई स्थानों  पर चर्चित हो गया। हालाँकि इसको कामयाब बनाने का श्रेय कई लोगों को दिया  जाता है, लेकिन उनमे दो नाम गौर करने योग्य हैं:-

  1. Carl Rogers
  2. Irvin Yalom

Carl Rogers व्यक्ति केंद्रित मनोचिकित्सा के संस्थापक थे, जिसमे थेरेपी का फोकस और ताकत बहुत ही योग्य और अनुभवी विशेषज्ञ के द्वारा व्यक्ति को स्थानांतरित कर दी जाती है। उन्होंने काउंसलर्स के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों और सम्मेलनों का आयोजन किया, जहां से उन्हें ग्रुप थेरेपी का आइडिया आया।

दूसरी तरफ Irvin Yalom ने बड़े पैमाने पर ग्रुप थेरेपी के बारे में लिखा, जिसमे उन्होंने बताया है की कैसे ग्रुप थेरेपी का संचालन किया जाता है,और कैसे यह लाभदायक हो सकता है।

 2. ग्रुप में सदस्यों की न्यूनतम संख्या :-

एक ग्रुप में लगभग एक जैसी समस्या से ग्रस्त छः या आठ सदस्य हो सकते हैं और एक या दो काउंसलर्स जो उन्हें थेरेपी लेने में मदद करते हैं। कभी कभी ज्यादा लोग लिए जा सकते हैं, लेकिन छः से आठ सदस्यों की संख्या एक आदर्श संख्या है जो ना तो बहुत ज्यादा है और ना ही बहुत कम। यह एक खुला ग्रुप हो सकता है,जिसमे कोई भी शामिल हो सकता है और छोड़ सकता है या यह एक बंद ग्रुप हो सकता है जिसमे सदस्यों की संख्या स्थिर होती है।

 

3. ग्रुप का उद्देश्य एक दूसरे की मदद करना :-

एक ग्रुप बहुत से उद्देश्यों के लिए बनाया जा सकता है। जैसे कुछ नया सीखने के लिए,बेतुके व्यवहार को नियंत्रित  करने के लिए, बेहतर होने के लिए। क्योंकि सभी व्यक्तियों की सामाजिक  स्थिति एक समान होती है और उनकी समस्याओं का समाधान एक दूसरे की मदद करने से हो सकता है। उदाहरण के लिए घरेलू हिंसा से पीड़ित लोग। प्रत्येक थेरेपी में काउंसलर की भूमिका भिन्न होती है।

 

4.ग्रुप के सदस्यों के बीच क्रियाकलापों के दौरान काउंसलर उनके व्यवहार का निरीक्षण करता है :-

ग्रुप थेरेपी में सदस्य आपसी व्यवहार से कुछ सीखते हैं और यह उनकी थेरेपी में मदद करता है,क्योंकि ये ग्रुप उनकी समस्या को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। Tuckman ये विश्वास करते हैं कि लोग ग्रुप में अपने परिवार के समान व्यवहार करते हैं, कोई प्रमुख की भूमिका में होता है तो कोई निष्क्रिय रहता है। फिर यह काउंसलर का कार्य है कि पहले वह ग्रुप में सभी की भूमिका का निरीक्षण करे फिर जो निष्क्रिय है उसे सुधारने के लिए उसे प्रमुख की भूमिका दे । लेकिन ये कार्य बहुत गोपनीय तरीके से करे, अन्यथा रोगी को पता लगने पर वह इस परिवर्तन को स्वीकार नही कर सकता और अपने वास्तविक जीवन में इस सुधार को नहीं ले जा सकता।

 

5.निश्चित विषय पर क्रियाकलाप :-

ग्रुप थेरेपी का अन्य पहलू है- जिस विषय पर आपसी क्रियाकलाप होना है उसका पाठ्यक्रम। ग्रुप का संचालन निम्न उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है :-

क्रोध नियंत्रण के लिए

आत्म विश्वास पाने के लिए

चिंता कम करने के लिए 

अवसाद खत्म करने के लिए

या अन्य किसी मनोवैज्ञानिक समस्या के निदान के लिए

यदि काउंसलर एक या अधिक सदस्यों पर उस थेरेपी से कोई प्रभाव पड़ते नही देखते तो उन्हें थेरेपी के उस विषय को फिर से नही होने देने के प्रति सावधान रहना होगा,और निष्पक्ष बने रहना होगा।

 

6. काउंसलर ग्रुप के पड़ाव की श्रृंखला की योजना बनाते हैं :-

अंत में, एक ग्रुप बहुत ही सुनियोजित होता है। ग्रुप कई पड़ावों से होकर गुजरता है।

किसे ग्रुप में शामिल होने की अनुमति देनी है,

क्या क्रियाकलाप होना है, और किस प्रकार होना है?

कैसे ग्रुप समाप्त होगा ?

क्या ग्रुप के सदस्य थेरेपी के बाहर मिल सकते हैं या नही ?

सब कुछ बहुत ही अच्छी तरह से सुनियोजित होता है, और इसमें काउंसलर की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है।

 

भारतीय परिवेश में ग्रुप थेरेपी आदर्श है, क्योंकि हम स्वभाव से सामाजिक होते हैं। यह थेरेपी सुरक्षित है और किसी अन्य थेरेपी से कम खर्चीली है।

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