समाज में लिंग विभेद से लड़ना मुश्किल नहीं । 

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"स्त्री -पुरुष जीवन रुपी गाडी के अगले और पिछले पहिये हैं", इस कथन से समाज साफ़ बता देता है, कि वे पहिये साथ तो चलते हैं, पर एक पायदान पर नहीं आ सकते। सामाजिक तौर पर, एक आदमी को कमाना चाहिए, और एक औरत को घर सम्हालना चाहिए।

ये कथन आज के ज़माने में शायद अक्षरों के हिसाब से सत्य न हो, पर समाज में सभी इसी को मान के चलते है ।

विभेद मिटाने के लिए जड़ से शुरुआत करना होगा ।

स्कूलों में लड़के लड़कियों में विभेद को कम करना ज़रूरी है । लड़कियों को भी लड़कों के समान खेल, पढ़ाई में प्रोत्साहन मिलना चाहिए ।

बचपन से बच्चों को लिंग समानता की सीख दें । ताकि लड़कियां इस भ्रम में ना जियें कि वे नाज़ुक हैं, और अपना सामान नहीं उठा सकती, ना ही किसी खेल-कूद में भाग ले सकती हैं ।

और लड़के ये न माने, कि वे रो नहीं सकते, और किसी को भी मार सकते हैं ।

 काम के क्षेत्र में, आज मर्द और औरत कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं, सब को अच्छी शिक्षा मिल रही है, पर फिर भी इस क्षेत्र में ही लिंग की वजह से भेद-भाव देखा जाता है।

 औरतें ज्यादातर वही काम लेती हैं, जो समाज की बाकी औरतें करती है, और इससे उनकी तनख्वाह में बहुत अंतर आता है, जैसे टीचिंग ।  ज्यादातर महिलाएं इस क्षेत्र में भाग लेती है, इससे उस क्षेत्र में एक प्रकार के लिंग के लोगों की भीड़ हो जाती है, और वेतन घटने लगता है, और उस क्षेत्र का महत्व भी। व्यवसाय या आर्थिक क्षेत्र में वेतन बहुत ऊँचा होता है, पर डॉक्टर महिला उसमें भाग नहीं लेती, और इस प्रकार, साल में, औरत आदमी से, आर्थिक रूप से २०% पीछे रह जाती हैं।

इसका कारण सामाजिक सोच है, जो औरतों पर हावी रहता है, वे सोचती हैं, कि वे पुरुष प्रधान कार्य नहीं कर सकतीं या वे उसके काबिल नहीं, या फिर उन्हें यह इतना महत्वपूर्ण नहीं लगता, या वे घर-परिवार की प्राथमिकता ज्यादा महत्वपूर्ण समझती हैं । और इस तरह से ये विभेद कभी नहीं घटता।

इससे हमारे बॉलीवुड के सितारे भी बच नहीं पाते। हाल ही में, अनुष्का शर्मा, अपने कड़े शब्दों में निंदा करती हैं कि,"एक समान काम के लिए, इस इंडस्ट्री में कभी एक समान वेतन नहीं मिलता। अभिनेता को हमेशा ज्यादा वेतन मिलता है, भले मेहनत दोनों समान करते हों, या अभिनेत्री प्रधान फ़िल्म हो ।"

 

  1. कम्पनीज में विभेद को रोकने के लिए एम्प्लायर को तत्पर होना पड़ेगा । एक समान काम के लिए कर्मियों को एक समान वेतन मिले, ये उन्हें देखना होगा ।
  2. महिलाओं को खुद के लिए आवाज़ उठाना ज़रूरी है । वेतन में भेद भाव को न माने, नौकरी जाने के डर से चुप ना रहे ।

 

कर्म क्षेत्र के अलावा कई और सामाजिक क्षेत्र में भी ये विभेद दिखता है। आदमी को ज्यादा सुविधा दी जाती है।

शादी के बाद उपनाम का परिवर्तन। आदमी को नाम नहीं बदलना पड़ता, पर औरत को समाज, रिश्तेदार बार बार उकसाते है की वे अपना उपनाम अपने पति के नाम पर रख लें। नाम एक इंसान का परिचय है, और उसको एक दिन के बाद अचानक बदलना बहुत मुश्किल होता है, क्या करना है समझ नहीं आता तो औरत अपने दोनों उपनाम को प्रचार करने लगती है। (एक पिता का, एक पति का)

1. उपनाम का रिश्ते से कोई सम्पर्क नहीं है, ये समझना ज़रूर है। अपने मत पर अड़े रहे, और दूसरों को भी अपनी बात सही तरीके से समझायें ।

2. घर में आदमी को आर्थिक चीज़ों पर बोलना चाहिए, और औरतों को दाल-मसाले पर, ये अलिखित नियम अभी भी है।   

वैज्ञानिकों नें शोध में पाया है कि, आदमी और औरत की मष्तिष्क संरचना एक होती है । अगर आपको ज्ञान है, तो आप किसी भी विषय पर अपना मत रख सकती हैं। ये बात औरत के लिए समझना सबसे ज़रूरी है। इन्टरनेट का इस्तेमाल करें, जो भेद भाव कर रहे हैं, उन्हें हर प्रकार से #सच का सामना करवाएं । खुद पर आत्मविश्वास होने पर ही, आप इस लिंग भेद भाव से बच सकती है।

कई क्षेत्र में, आदमी को भी इस भेद भाव का शिकार होना पड़ता है। डाइवोर्स के वक़्त भरपाई आदमी को ही भरना है (बावजूद ये की उसकी पत्नी शायद उससे ज्यादा कमाती है), क्योंकि समाज ऐसा मानता है की आदमी आर्थिक रूप से सबल है। अगर कोई महिला गृह-हिंसा का मामला दर्ज करती है, तो समाज मान लेता है, कि औरत तो अबला है, कमज़ोर है, सच ही बोल रही होगी। ऐसे में औरत को गलत तरीके से सहायता मिलती है, जो नहीं होना चाहिए।

विभेद हटाने के लिए पहले लोगों को गलत फायदे का एहसास दिलाना ज़रूरी है, जो प्रति पक्ष को मिल रहा है, पर ये हमें ही करना होगा। खुद पर विश्वास रखें, और ऐसी परिस्थिति का डट कर सामना करें।

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