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  • 03 Jan
    eWellness Expert

    सकारात्मक सोच से ही मिलेगी सफलता

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  • 01 Jan
    eWellness Expert

    ऑटिज़्म और सेंसिटिव प्रॉसेसिंग डिसऑर्डर

    sensitive girl
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    दुनिया में कई लोगों को छोटी छोटी बातों से बहुत फ़र्क़ पड़ता है. ऐसे लोग कुछ ख़ास चीज़ों जैसे रोशनी या तेज़ आवाज़ को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं.

    पहले उन्हें सिर्फ़ संवेदनशील कहा जाता था. मगर अब अमरीका समेत कई देशों में हुए रिसर्च के बाद ऐसे लोगों के ज़्यादा संवेदनशील होने को एक बीमारी बताया जा रहा है. इस बीमारी का नाम सेंसरी प्रॉसेसिंग डिसॉर्डर या एसपीडी है.

    कुछ लोग किसी के क़दमों की आहट या शोर-गुल से परेशान हो जाते हैं. वे चीखने लगते हैं. कुछ लोग तेज़ रोशनी को बर्दाश्त नहीं कर पाते.

    ऐसे ही लोगों में अमरीका का एक बच्चा है. उसका नाम जैक क्रैवेन है. बेहद तेज़ दिमाग़ वाला जैक, बचपन से ही शोर बर्दाश्त नहीं कर पाता था. वो चीखने लगता था. स्कूल गया तो वहां भी बच्चों के शोर-गुल से उसे भयंकर परेशानी होने लगी. मां लोरी को उसे स्कूल से हटाना पड़ गया.

    ऐसी ही एक और बेहद संवेदनशील महिला हैं, अमरीका की रैशेल श्नाइडर. रैशेल को भी लोगों की आवाज़ों से परेशानी होती है. उन्हें किसी के क़दमों की आहट से भी घबराहट होने लगती है. जब वो भीड़ के सामने बोलने के लिए खड़ी होती हैं तो यूं लगता है कि उनका दम निकल जाएगा.

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    साल 2010 में पता चला था कि रैशेल को एसपीडी यानी सेंसरी प्रॉसेसिंग डिसॉर्डर है. उस वक़्त उनकी उम्र 27 बरस थी. अब तक का जीवन उन्होंने रोज़ मर-मर के काटी थी. उन्हें ताने सुनने पड़ते थे. बाहर निकलने में डर लगता था.

    रैशेल की परेशानी का ये आलम है कि तेज़ रोशनी वाले बल्ब भी उन्हें स्पॉटलाइट लगते हैं. रेडियो पर गाना बज रहा हो तो उसके इको तक से रैशेल को दिक़्क़त हो जाती है. सिपाहियों की क़दमताल तो उनकी जान ही ले लेते है.

    कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एलिसा मार्को इस बेहद तेज़ एहसास वाली बीमारी के बारे में जानकारी जुटा रही हैं. उन्होंने हाल ही में ऐसी परेशानियों से जूझ रहे लोगों को शिकागो बुलाया. और सबको बारी बारी से अपना तजुर्बा बांटने को कहा.

    ऐसी परेशानी के शिकार लोगों में ज़्यादातर बच्चे थे. वे अपने मां-बाप के साथ इस बैठक में आए थे. लेकिन रैशेल जैसे लोग भी थे, जिनको बड़े होकर पता चला कि ज़्यादा संवेदनशील होना एक बीमारी है. .

    over sensitive

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    इस बीमारी का नाम पहले पहल अमरीका के डॉक्टर ज्यां आयर्स ने रखा था. उन्होंने 1960 में इसका नाम सेंसरी इंटीग्रेशन डिसॉर्डर रखा था. ज्यां आयर्स की छात्रा रही लूसी जेन मिलर ने ज्यां के इस बीमारी के बारे में रिसर्च को आगे बढ़ाया. उन्होंने इस बीमारी की तीव्रता नापने के लिए कुछ पैमाने भी ईजाद किए हैं.

    वो आजकल पूरी दुनिया में इस बीमारी के बारे में लोगों को आगाह करने के काम में जुटी हैं.

    2008 में मिलर ने इस बारे में कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में ही एक प्रेज़ेंटेशन दिया था. इस प्रेज़ेंटेशन को एलिसा मार्को ने भी देखा था. बाद में दोनों ने इस बीमारी पर साथ मिलकर काम करने का फ़ैसला किया. मिलर ने आगे के रिसर्च के लिए पैसों का इंतज़ाम किया. वहीं एलिसा ने मरीज़ जुटाए.

    उन्हीं कुछ मरीज़ों में जैक और रैशेल हैं.

    2013 में उनके रिसर्च की पहली किस्त छपी. इसमें उन्होंने एसपीडी की जड़ें दिमाग़ में तलाशने की कोशिश की थी. उन्हें पता चला था कि इस बीमारी के शिकार लोगों का दिमाग़, आम लोगों के दिमाग़ से अलग होता है.

    दिमाग के इस हिस्से की मदद से हम आवाज़, रोशनी और छुअन को महसूस करते हैं. एसपीडी से पीड़ित लोगों के दिमाग़ का यही हिस्सा कम विकसित था.

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    2014 में आए रिसर्च के दूसरे हिस्से ने एक और बात साफ़ की कि एसपीडी का सीधा ताल्लुक़ ऑटिज़्म नाम की बीमारी से होता है. क्योंकि 90 फ़ीसद मरीज़ों में ऑटिज़्म के लक्षण पाए गए.

    एलिसा मार्को ये बात पक्के तौर पर जानना चाहती थीं कि क्या ऑटिज़्म का ताल्लुक़ एसपीडी से है. या फिर एसपीडी के शिकार लोगों का ऑटिज़्म की बीमारी होना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है.

    यूं तो एलिसा और मिलर अपने तजुर्बों से काफ़ी ख़ुश थीं, मगर ज़्यादातर अमरीकी डॉक्टर उनके नतीजों पर भरोसा करने को राज़ी नहीं थे. इनमें कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के कुछ सीनियर वैज्ञानिक भी थे.

    ऐसे ही लोगों में से एक हैं प्रोफेसर थॉमस बॉयस. वो ये तो मानते हैं कि एसपीडी जैसी कोई चीज़ तो है. मगर ये एक बीमारी है, इसको लेकर वो मुतमईन नहीं. वो ये कहते हैं कि शायद मुझे इस बारे में अभी पूरी समझ नहीं.

    autism aur sensitive processing disorder

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    वैसे किसी ख़ास चीज़ से परेशानी नई बात नहीं. बहुत से बच्चे रोशनी या आग या शोर-गुल से घबराकर चीखने लगते हैं. एक सर्वे के मुताबिक़ सोलह फ़ीसद बच्चे ऐसी परेशानी की शिकायत अपने मां-बाप से करते हैं.

    हालांकि उम्र बढ़ने के साथ उनकी ये दिक़्क़त दूर हो जाती है. लेकिन, जैक और रैशेल जैसे लोग भी हैं, जो अपने एहसास से बेहाल रहते हैं.

    जैक की मां लोरी, उनके पति और बेटी ने तो तय किया है कि वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे या कहेंगे जिससे जैक को परेशानी हो. उसकी बातों को वो ध्यान से सुनते हैं. जैक की पढ़ाई भी अब घर में ही हो रही है.

    असल में हमारे एहसास, हमें बाक़ी दुनिया से रूबरू कराते हैं. वो हमें दुनिया दिखाते हैं. आवाज़ें सुनाते हैं. छुअन को महसूस कराते हैं. होता ये है कि हमारा दिमाग़ इन संकेतों को पकड़कर इसे हमें महसूस कराता है.

    कुछ लोगों को दूसरों को ख़ुश या परेशान देखकर उनके सुख-दुख का एहसास हो जाता है. कॉमेडी सीरियल देखते वक़्त लोगों को हंसते देखते हैं तो आप भी हंस पड़ते हैं. आस-पास कोई तकलीफ़ में हो तो आपको उससे हमदर्दी हो जाती है.

    autism ka dukh

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    एलिसा मार्को ऐसे लोगों को ऑर्किड बुलाती हैं. उनको ज़रा सी बात चुभ जाती है. वे दुख भरी ख़बर सुनकर रोने लगते हैं. कोई मज़ेदार सीरियल देखते वक़्त उनकी हंसी है कि रुकती ही नहीं. उन्हें पार्टियों से ज़्यादा क़िताबों का शौक़ होता है.

    अमरीकी मनोवैज्ञानिक एलेन आरोन कहती हैं कि संवेदनशील लोग, भावों को ज़्यादा गहराई से नापते हैं. बातों या चीज़ों को लेकर वो बहुत संवेदनशील होते हैं. दूसरों से उन्हें तुरंत हमदर्दी हो जाती है.

    ऐसे बेहद संवेदनशील लोगों के बारे में एलेन के तजुर्बे से एक बात सामने आई है. वे किसी भी हालात को आराम से समझते हैं. तब उस पर कोई प्रतिक्रिया देते हैं. वो आस-पास के माहौल को लेकर भी काफ़ी चौकन्ने रहते हैं. उनके ऊपर दूसरों के मूड तक का असर पड़ता है. एलेन कहती हैं कि दुनिया के बीस फ़ीसद लोग ज़्यादा संवेदनशील होते हैं.

    एलेन की तरह कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के थॉमस बॉयस भी मानते हैं कि बच्चे दो तरह के होते हैं. एक तो वो जो हर माहौल में ढल जाते हैं. मज़े करते हैं. दूसरे वो बच्चे, जिन्हें आगे बढ़ने के लिए एक ख़ास माहौल चाहिए.

    over sensitive autism mri

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    पर एक सवाल वहीं का वहीं है, कि आख़िर एसपीडी के शिकार लोग कहां फ़िट बैठते हैं? एलिसा मानती हैं कि एसपीडी पीड़ित असल में थॉमस बॉयस के तजुर्बे वाले ऑर्किड हैं. वे भावों को मुश्किल से समझते हैं. मगर एक ख़ास माहौल में वो तेज़ी से फलते-फूलते हैं.

    लोगों में सेंसिटिव प्रॉसेसिंग डिसऑर्डर का पता लगने के बाद अगला क़दम उनके इलाज का होता है. इसका मक़सद उनके एहसास कम करना नहीं होता. बल्कि कोशिश ये होती है कि आम माहौल में वो कम तकलीफ़ के साथ रह सकें. ज़िंदगी में आगे बढ़ सकें.

    एसपीडी पीड़ितों का इलाज दवाओं के साथ ही साथ कंप्यूटर गेम वग़ैरह से भी किया जा रहा है. ख़ुद एलिसा मार्को ने इवो नाम का एक खेल तैयार किया है. हालांकि अभी ये बाज़ार में नहीं आया है. लेकिन, जैक ने ये गेम ख़ेला था. उसकी मां लोरी बताती हैं कि इसके बाद उसके बर्ताव में काफ़ी बदलाव आया है.

    फिलहाल तो एसपीडी पर काम कर रहे रिसर्चर और इसके शिकार लोग, इसे एक बीमारी का दर्जा दिलाने, इसके बारे में लोगों को जागरूक करने में जुटे हैं.

    (मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.

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  • 01 Jan
    eWellness Expert

    जब बच्चे दें पलट कर जवाब

    jab bacche palat kar jawaab dein

     

     

     

    हर अभिभावक यही चाहता है कि उनका बच्चा हर किसी से अच्छा व्यवहार करे, ऎसे में बहुत बुरा लगता है, जब बच्चा बदमिजाजी करने से बाज नहीं आता। बच्चे का बुरा व्यवहार हर अभिभावक के लिए बेहद परेशान करने वाला होता है, इसकी वजह से कई बार उन्हें शर्मिदगी उठानी पड़ जाती है।

    बेवजह की जिद

    क्या होता है

    आपकी बेटी या बेटा किसी दुकान पर गए और वो वहां पर अपनी मनपसंद चॉकलेट लेने की जिद करने लगे और आपने न कर दिया। जिसके बाद वो दुकान पर ही रोने- चिल्लाने और तमाशा करने लग जाता है।

    क्यों होता है ऎसा

    बच्चे तब जिद करते हैं. जब उन्हें किसी मुद्दे पर अपने अभिभावकों से बहस करनी होती है, ताकि वे ये साबित कर सकतें कि उन्हें क्या चाहिए। नखरे और जिद हर वक्त सही नहीं होते, खासकर तब जब बच्चा बड़ा हो रहा होता है। और अंत में बच्चों के जिद की समाप्ति उनके अडियल रूख और रोने से होती है।

    क्या करें आप

    अगर आप किसी पब्लिक एरिया में अगर हों या आसपास ज्यादा भीड़ हों तो ऎसी परिस्थिति आए, इससे पहले ही वहां से चली जाएं या फिर बच्चों के इस व्यवहार पर ज्यादा ध्यान न दें, क्योंकि अगर एक बार आपकी बेटी (या बेटे) को पता लग गया है कि उसके इस व्यवहार से आपको कोई फर्क नहीं पड़ रहा है तो वो खुद ब खुद शांत हो जा एगी। आप उससे बेहद शांत और सधी हुई भाषा में न करने का कारण बताएं।

    शिकायती होना

    क्या होता है

    बारिश हो रही है और उस कारण आपका बेटा बाहर खेलने नहीं जा पाता है। ऎसे में वह लगता है शिकायत करने क्योंकि आपने बारिश होने पर रोका या उसे खेल के मैदान तक पहुंचाने के लिए कुछ नहीं किया।

    क्यों होता है ऎसा

    चूंकि बच्चा खुद तो कुछ कर नहीं पाता है तो ऎसे में वो शिकायत करके अपनी भड़ास निकालता है। इसके अलावा अगर बच्चा भूखा हो, थका हुआ हो या फिर उसे किसी तरह की परेशानी हो रही हो, तब भी वह ऎसा व्यवहार करता है।

    क्या करें आप

    आप उससे बात करें कि आखिर ऎसा कौन-सा रास्ता है, जिससे उसकी समस्या का समाधान हो सकता है। आप उनके सामने यह जाहिर करें कि आप उसकी समस्या को अच्छे से समझ रही हैं और साथ ही समाधान पर काम भी कर रही हैं। आप चाहें तो उसे विकल्प के तौर पर भी कई सुझाव दे सकती हैं, जैसे वो घर पर आपके साथ या अपने भाई-बहन के साथ बोर्डगेम खेल सकता है, साथ ही अगले दिन आप उसके साथ बाहर खेलने जरूर जाएंगी।

    झूठ और चोरी करना

    क्या होता है

    आपका छह साल का बच्चा स्कूल से एक नया रबर लेकर आता है और जब आप इसके बारे में उससे पूछती हैं तो कहता है कि वह उसके दोस्त ने बर्थ डे गिफ्ट के तौर पर दिया है।

    क्यों होता है ऎसा

    बच्चों को यह पता नहीं होता कि किसी चीज को लेने और चोरी करने में क्या अंतर है। वो चीजें ले लेते हैं क्योंकि उन्हें वह चीज पसंद आ रही होती है, उन्हें बाद में यह लगता है कि उनकी हरकत गलत है। ऎसे में वे अपनी गलती छिपाने लगते हैं और झूठ बोलते हैं।

    क्या करें आप

    उनकी इस हरकत को छिपाएं नहीं। कोशिश करें कि वे खुद से आपको बता दें कि उन्होंने ही रबर खुद से लिया है। अगर आप डरा-धमका कर उनसे पूछताछ करनी शुरू करेंगी तो वे एक झूठ छिपाने के चक्कर में और झूठ बोलना शुरू कर देंगे। उनके सामने बहुत ही सलीके से यह जाहिर करें कि उन्होंने जो किया है वो आपको पसंद नहीं आया। अगर वो आपके सामने सच बोल दें तो आप बदले में बाजार से वही चीज उन्हें लाकर तोहफे के रूप में दें।

    पलट कर जवाब देना

    क्या होता है

    आपके होमवर्क करने के लिए कहने पर आठ साल का बेटा आपसे यह कहता है कि वो अपना होमवर्क करने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि उसके लिए यह एक तरह से समय बर्बाद करने वाला काम है।

    क्यों होता है ऎसा

    बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, उनकी एक अपनी सोच बनती जाती है। कई बार अपने माता-पिता के बहुत ज्यादा अनुशासन से उनके अंदर गुस्सा भर जाता है, जिस वजह से वे कई बार रूखा व्यवहार करते हैं, तर्क-कुतर्क करते हैं। अगर ऎसे व्यवहार पर पेरेंट्स हंस देते हैं तो उन्हें लगता है कि उनका व्यवहार सही है और पेरेंट्स उसे स्वीकार भी कर रहे हैं।

    क्या करें आप

    खुद को बेहद शांत और संतुलित रखें। आप बहुत ही सधे हुए लहजे में बच्चे को यह दर्शाएं कि उसका यह व्यवहार आप कभी पसंद नहीं करेंगी। आप उसे बताएं कि जिस लहजे में उसने बात की है, वैसी भाषा और लहजा परिवार का कोई भी सदस्य बात करने में नहीं इस्तेमाल करता। इसलिए आगे से वह इसी तरह के लहजे में बात बिल्कुल ही न करे।

    आक्रामक हो जाना

    क्या होता है

    आपका बच्चा बाहर से आता है, उसके बाद आपको अचानक से यह पता चले कि वह तो वहां से लड़ाई करके आया है। उसने अपने भाई-बहन या अन्य किसी बच्चे को मारा, उसके बाल पकड़े या फिर काट लिया।

    क्यों होता है ऎसा

    बहुत ज्यादा आक्रामकता भी यह दर्शाती है कि बच्चा अपने प्रति लोगों का (या पेरेंट्स का) ध्यान आकर्षित करना चाह रहा है, साथ ही अपने आसपास के माहौल को कंट्रोल करना चाह रहा है। यह ध्यान देना ज्यादा जरूरी है कि वह आखिर ऎसा क्यों रहा है।

    क्या करें आप

    बच्चे की आक्रमकता को रोकने के लिए आप किसी तरह की हिंसा का सहारा न लें क्योंकि इससे वह और ज्यादा हिंसक हो जाएगा। इसकी बजाय आप बच्चों से बात करें। ध्यान रखें कि बच्चा कहीं टीवी पर आक्रामक या लड़ाई-झगड़े वाला कोई प्रोग्राम तो नहीं देख रहा। यह पता लगाएं कि आखिर क्या वजह है कि बच्चे को इतना ज्यादा गुस्सा आता है। कुछ ऎसी एक्टिविटी खोजें, जिससे बच्चे को शांत रखा जाए और उसका गुस्सा भी कम किया जा सके

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