कुल 22 समाचार

  • 03 Jan
    eWellness Expert

    सोच अच्छी तो सेहत अच्छी

    girl thinking

    चाहे -अनचाहे जाने- अनजाने ये नकारात्मक विचार और व्यवहार आ धमकते हैं । अपने विचार एवं सोच बदलिये और सेहत को बदलते देखिये...

    - डॉ. मोनिका शर्मा

    अनमना सा मन और थका सा तन। आजकल हर किसी की शिकायतों का हिस्सा है। अगर आप के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है तो अपने विचारों की लगाम थामिए। आपके मन जीवन में इनके दख़ल पर काबू पाइए क्योंकि ये आते तो शांत भाव से हैं लेकिन अगर सकारात्मकता ना लिए हों तो मन मस्तिष्क के हर भाव को कोलाहल में बदल देते हैं। कहते हैं कि गर्भावस्था में माँ जो सोचती है जैसा विचार करती है विचार बच्चे पर बहुत असर डालते हैं। बच्चे की सोच और व्यक्तित्व पर इसका गहरा असर पड़ता है। ऐसा है तो हम सब समझ ही सकते हैं कि हमारे अपने विचार हमारी शारीरिक और मानसिक सेहत पर कितना असर डालेंगें ? चाहे -अनचाहे जाने- अनजाने ये नकारात्मक विचार और व्यवहार आ धमकते हैं। तो फिर देरी क्यों ? अपने विचार एवं सोच बदलिए और सेहत को बदलते देखिए।


    समझिए स्वस्थ होने के सही मायने-

    आमतौर पर माना जाता है कि अगर कोई बीमार नहीं वो स्वस्थ ही है। लेकिन बीमार होकर बिस्तर ना पकड़ने भर का नाम स्वस्थ होना नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक स्वस्थ होने का मतलब मात्र रोगों का अभाव नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की स्वस्थता की सकारात्मक अवस्था है। यदि इस परिभाषा को आधार बनाया जाए तो हमारे आस-पास बहुत से लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के हालात काफी चिंताजनक है। इसके लिए कई सारे कारणों के साथ एक बड़ा कारण है विचारों का स्वस्थ ना होना भी है। विशेषज्ञों की मानें तो अगर आपका दिमाग स्पष्ट और स्वस्थ होने के साथ-साथ उसमें किसी तरह का तनाव नहीं है तो आप स्वस्थ हैं। लेकिन आज की तनाव और जद्दोज़हद भरी जि़ंदगी में यह संभव ही कहाँ है ? क्योंकि मन तो हर वक्त किसी ना किसी उलझन में डूबा ही रहता है। तकनीक और अति संवाद के दौर में ये समस्याएं कुछ और बढ़ गई हैं। ऐसी ही उलझनों और असहजता से जूझने की शक्ति देते हैं पॉजिटिव विचार। क्योंकि सकारात्मक विचारों का प्रभाव हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बराबर पड़ता है।

    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का प्रसिद्ध कथन है कि इंसान वैसा ही बनता जाता है जैसे उसके विचार होते हैं। यह बात बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी पर समान रूप से लागू होती है। स्वास्थ्य सलाहकार भी मानते हैं कि जब हम निराश और कुंठित महसूस करतेे हैं तो सिरोटोनिन नामक रसायन का स्त्राव कम हो जाता है। इस रसायन से हमारे मन के अच्छे बुरे भावों से सीधा संबंध है। इसकी कमी अवसाद और असामाजिक व्यवहार को जन्म देती है। इसीलिए ज़रूरी है कि मन में ऐसे भावनाओं को स्थान ही ना मिले जो मानसिक स्वास्थ्य को पॉजिटिव ढंग से प्रभावित करें। सकारात्मक विचार तन-मन को स्वस्थ रखने में अहम भगीदारी निभाते हैं। जबकि उत्साहहीनता, खिन्नता और दुर्बलताओं के विचार हमें तन-मन दोनों के स्तर पर बीमार करते हैं। यूं भी नकारात्मक विचार केवल एक अकेले इंसान को नहीं घेरते बल्कि उसके पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी बड़ा बदलाव ला देते हैं। नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति अपने परिवेश में ऐसा नकारात्मक माहौल बना लेते हैं जो उनके
    साथ-साथ उनके अपनों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालता है।


    सकारात्मक ऊर्जा का सम्बल -

    मन के भीतर की सकारात्मक वैचारिक ऊर्जा बड़ी से बड़ी समस्याओं को हल करने की राह सुझाती है। जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी खुद को दृढ़ता और संयम के साथ थामे रखता है ये सकारात्मक ऊर्जा का यह प्रवाह। इसीलिए मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि अगर बीमार भी है तो भी बीमारी की बात रोगी को कम से कम करनी चाहिए । किसी शारीरिक और मानसिक व्याधि को बार बार याद करना भी नकारात्मकता लाता है। आज के दौर में जब दिल और दिमाग को स्वस्थ और तनाव मुक्त रखना मुश्किल होता जा रहा है। विचार प्रवाह की दिशा को समझना ज़रूरी है। सही और सार्थक सोच के ज़रिए ही तनाव को कम किया जा सके तो जीवन काफी बेहतर हो सकता है। सकारात्मक चिंतन की अनमोल सौगात जीवन को अर्थपूर्ण दिशा दे सकती है। सकारात्मक सोच से चाहे कार्यक्षेत्र की समस्याएं हों या पारिवारिक परेशानी, हर जगह सफलता पाना संभव है। सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्मविश्वास के बलबूते पर हर काम किया जा सकता है। विचारों की संगति का प्रभाव जीवन की उन्नति पर भी पड़ता है। सकारात्मक सोच आक्रामता को दूर कर विचारों को दृढ़ता देती है। जिसकी आज के दौर में बहुत अधिक आवश्यकता है। तभी तो सम्पूर्ण स्वास्थ्य की बात होती है तो हमारी मेंटल हैल्थ का भी जि़क्र होता है। ऐसे में हम स्वयं समझ सकते हैं कि हमारे विचार, हमारी सोच, मानसिक स्वास्थ्य पर कितना प्रभाव डालती होगी? विचारों की इस नींव का आधार अगर सकारात्मक हो, तो संपूर्ण स्वास्थ्य पाया जा सकता है।


    सकारात्मक विचार अच्छे स्वास्थ्य का आधार -


    कई वैज्ञानिक सिद्धांत भी यह साबित करते हैं कि हम काफी हद तक अपने विचारों के ज़रिये ही स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे विचार शारीरिक और भावनात्मक सेहत पर गहरा असर डालते हैं। सकारात्मक सोच का सबसे बड़ा परिणाम ये होता है कि यह सोच एक 'इजी गोइंग' लाइफ स्टाइल से रूबरू करवाती है। इसीलिए कहा भी जाता है कि इत्मीनान और विश्वास से किसी काम को अंजाम देना हो तो मन में नकारात्मक विचारों को स्थान ही नहीं मिलना चाहिए। आत्मविश्वास तो वो स्व उपार्जित मानसिक शक्ति है जो हर परिस्थिति में आपको स्वाधीन बनाये रखती है। अपनी ऊर्जा का सही और सधा प्रयोग करने की संतुलित सोच देती है। यूँ भी अपनी योग्यता और क्षमता का पूर्ण प्रयोग करने के लिए पॉजिटिव सोच का साथ आवश्यक है। कहते हैं कि आत्मिक शक्तियों का आदर करने का सबसे अच्छा तरीका खुद को आत्मविश्वासी बनाए रखना ही है। इसी आत्मविश्वास का आधर बनते हैं हमारे सकारात्मक विचार। इस बात से सभी इत्तफाक रखते हैं कि पॉजिटिव थिंकिंग मन और शरीर दोनों को स्वस्थ रखती है। अपने मनोबल और उत्साह को बनाये रखने के लिए नकारात्मक भावों से बचना बेहद ज़रूरी है। सकारात्मक सोच की सिफत इतनी ही है यह हमें हर सफलता के लिए आश्वस्त करने को काफी है। ऐसे विचारों से कार्यों की सफलता और संपादन दोनों के लिए भरोसा मिलता है। जो अंतत हमारी कार्यक्षमता को बढ़ाता है। बिना दबाव और तनाव के हम अपनी जिम्मेदारियों को निर्वहन करना सीखते हैं।

    समझिए विचारों की प्रक्रिया -

     

    विचारों की प्रक्रिया को समझने के लिए उनका पीछा करना होगा। समझना होगा कब और कैसे विचार मन मस्तिष्क में उपजते हैं और हमारा व्यवहार उन्हीं के अनुरूप हो जाता है। इसी रास्ते पर आप ख़ुद समझ जायेंगें कि आपकी सेहत पर भी असर पड़ रहा है। डॉ. दीपक चोपड़ा के मुताबिक ' सोचना ब्रेन केमिस्ट्री का अभ्यास है' हमारे मस्तिष्क में करीब 60,000 विचार रोज़ जन्मते हैं। जिनमें से अधिकतर दोहराये ही जाते हैं। इनमें से वास्तविक विचारों को चुनें और नकारात्मक और चिंताजनक विचारों के दोहराव पर काबू पाएं। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिवरपूल ने नेगेटिव और पॉजिटिव विचारों को लेकर किये शोध के मुताबिक नकारात्मक विचारों की लगातार हावी होना दिमाग की सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन के अध्ययन के अनुसार भी हमारे दिमाग में आने वाले विचारों में से 70 प्रतिशत से 80 प्रतिशत विचार नकारात्मक ही होते हैं। इसलिए जरूरी है कि कभी तथ्यों तो कभी कल्पनाओं के आधार बनाकर मन पर कब्जा जमाने वाले नकारात्मक से हर हाल में बचा जाए। ऐसे में पॉजिटिव मेमोरीज को याद करना शरीर और मस्तिष्क दोनों की सेहत संवारता है। ऐसी सोच संतोष का भाव साथ लाती जो उदासी, तनाव और पीछे छूट जाने के ख़यालों से मुक्त करती है। इतना ही नहीं सकारात्मक विचार आगे बढ़ने की भी प्रेरणा देते हैं।

    ज़रूरी है इमोशनल वेलनेस


    हमारे इमोशंस हमारे इम्यून सिस्टम को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। जो कि विचारों से जुड़े होते हैं। इससे जुड़े कई शोध भी अब सामने आ रहे हैं। जो बाते हैं की फील गुड फैक्टर बहुत ज़रूरी है। इसीलिए डॉक्टर को हमेशा अपनी इमोशनल हेल्थ के बारे में भी बताएं। आप खुद भी इसे समय रहते समझें क्योंकि अंदरूनी उलझनों से बाहरी बदलाव भी दिखने लगते हैं। ध्यान रहे कि विचारों की उथलपुथल केवल मन के भीतर ही नहीं कई तरह के शारीरिक बदलावों का भी कारण बनती है | ऐसे लोगों की बड़ी संख्या होती है जिसमें बढ़ता वजन ही बता देता है कि विचार भार बन रहे हैं। यादाश्त कम होने लगती है। कई तरह के भय मन को घेरने लगते हैं। जिनमें बहुत से डर तो ऐसे होते हैं जिनका कोई आधार ही नहीं होता। हमारे विचारों की उलझन ही उन्हें जन्म देती है। साथ ही नींद ना आना और अवसाद का बढना भी। अनिद्रा की बीमारी से तो आज करीब एक तिहाई आबादी ग्रस्त है। एक अध्ययन के मुताबिक ये विचारों के ज़रिये ही तनाव भी इंसानी मन मस्तिष्क को घेरे रहता है। ऐसे में इस तनाव का सामना ना कर पाने वाले करीब 25 फीसदी दूसरों की तुलना में ज्यादा बीमार पड़ते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक कैंसर सहित कई बड़ी बीमारियों में से 80 फ़ीसदी इंसानी मन और उसके व्यवहार से ही जुड़ी हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि विचारों से उपजी उलझनें केवल मनोवैज्ञानिक तकलीफें पैदा करती हैं। लेकिन सच तो यह है कि तकलीफें सीधे-सीधे शरीर पर भी असर डालती हैं।


    महिलाएं अधिक गिरफ्त हैं -

    आमतौर पर देखने में आता है कि महिलाएं कई मानसिक उलझनों में फंसी रहती है। उनका मन अजब-गजब विचारों में डूबता रहता है। गृहिणी है तो भी और कामकाजी है तो भी। इसीलिए वे इस वैचारिक प्रक्रिया बदौलत उपजने वाली समस्याओं का अधिक शिकार बनती हैं। माना जाता है कि हमारी सोच और हमारा व्यवहार हमेशा किसी प्रतिक्रिया की उम्मीद में रहते हैं इसलिए उनसे कई सारे डर भी जुड़े रहते हैं। इस भय से महिलाएँ अक्सर जूझती हैं। जिसके चलते शारीरिक ही नहीं कई मानसिक समस्याओं का भी शिकार बनती हैं। अपने विचार या उन विचारों से जुड़ी सामाजिक-पारिवारिक प्रतिक्रियाओं को लेकर वे जो चिंता और बेचैनी झेलती हैं उसी के चलते महिलायें मोटापा, हार्ट अटैक, अनियमित मासिक धर्म और ओस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों का शिकार बन रही हैं। हैरानी की बात है कि कई बार उनकी चिंता और अंदेशे बिलकुल आधारहीन होते हैं लेकिन विचारों की नकारात्मकता उन्हें इस सोच से घेरे रहती है। ज़रूरी है महिलायें भी इस वैचारिक प्रक्रिया का आधार समझें और ख़ुद को नकारात्मकता के फेर में ना पड़ने दें।

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  • 03 Jan
    eWellness Expert

    सकारात्मक सोच से ही मिलेगी सफलता

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  • 01 Jan
    eWellness Expert

    ऑटिज़्म और सेंसिटिव प्रॉसेसिंग डिसऑर्डर

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    दुनिया में कई लोगों को छोटी छोटी बातों से बहुत फ़र्क़ पड़ता है. ऐसे लोग कुछ ख़ास चीज़ों जैसे रोशनी या तेज़ आवाज़ को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं.

    पहले उन्हें सिर्फ़ संवेदनशील कहा जाता था. मगर अब अमरीका समेत कई देशों में हुए रिसर्च के बाद ऐसे लोगों के ज़्यादा संवेदनशील होने को एक बीमारी बताया जा रहा है. इस बीमारी का नाम सेंसरी प्रॉसेसिंग डिसॉर्डर या एसपीडी है.

    कुछ लोग किसी के क़दमों की आहट या शोर-गुल से परेशान हो जाते हैं. वे चीखने लगते हैं. कुछ लोग तेज़ रोशनी को बर्दाश्त नहीं कर पाते.

    ऐसे ही लोगों में अमरीका का एक बच्चा है. उसका नाम जैक क्रैवेन है. बेहद तेज़ दिमाग़ वाला जैक, बचपन से ही शोर बर्दाश्त नहीं कर पाता था. वो चीखने लगता था. स्कूल गया तो वहां भी बच्चों के शोर-गुल से उसे भयंकर परेशानी होने लगी. मां लोरी को उसे स्कूल से हटाना पड़ गया.

    ऐसी ही एक और बेहद संवेदनशील महिला हैं, अमरीका की रैशेल श्नाइडर. रैशेल को भी लोगों की आवाज़ों से परेशानी होती है. उन्हें किसी के क़दमों की आहट से भी घबराहट होने लगती है. जब वो भीड़ के सामने बोलने के लिए खड़ी होती हैं तो यूं लगता है कि उनका दम निकल जाएगा.

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    साल 2010 में पता चला था कि रैशेल को एसपीडी यानी सेंसरी प्रॉसेसिंग डिसॉर्डर है. उस वक़्त उनकी उम्र 27 बरस थी. अब तक का जीवन उन्होंने रोज़ मर-मर के काटी थी. उन्हें ताने सुनने पड़ते थे. बाहर निकलने में डर लगता था.

    रैशेल की परेशानी का ये आलम है कि तेज़ रोशनी वाले बल्ब भी उन्हें स्पॉटलाइट लगते हैं. रेडियो पर गाना बज रहा हो तो उसके इको तक से रैशेल को दिक़्क़त हो जाती है. सिपाहियों की क़दमताल तो उनकी जान ही ले लेते है.

    कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एलिसा मार्को इस बेहद तेज़ एहसास वाली बीमारी के बारे में जानकारी जुटा रही हैं. उन्होंने हाल ही में ऐसी परेशानियों से जूझ रहे लोगों को शिकागो बुलाया. और सबको बारी बारी से अपना तजुर्बा बांटने को कहा.

    ऐसी परेशानी के शिकार लोगों में ज़्यादातर बच्चे थे. वे अपने मां-बाप के साथ इस बैठक में आए थे. लेकिन रैशेल जैसे लोग भी थे, जिनको बड़े होकर पता चला कि ज़्यादा संवेदनशील होना एक बीमारी है. .

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    इस बीमारी का नाम पहले पहल अमरीका के डॉक्टर ज्यां आयर्स ने रखा था. उन्होंने 1960 में इसका नाम सेंसरी इंटीग्रेशन डिसॉर्डर रखा था. ज्यां आयर्स की छात्रा रही लूसी जेन मिलर ने ज्यां के इस बीमारी के बारे में रिसर्च को आगे बढ़ाया. उन्होंने इस बीमारी की तीव्रता नापने के लिए कुछ पैमाने भी ईजाद किए हैं.

    वो आजकल पूरी दुनिया में इस बीमारी के बारे में लोगों को आगाह करने के काम में जुटी हैं.

    2008 में मिलर ने इस बारे में कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में ही एक प्रेज़ेंटेशन दिया था. इस प्रेज़ेंटेशन को एलिसा मार्को ने भी देखा था. बाद में दोनों ने इस बीमारी पर साथ मिलकर काम करने का फ़ैसला किया. मिलर ने आगे के रिसर्च के लिए पैसों का इंतज़ाम किया. वहीं एलिसा ने मरीज़ जुटाए.

    उन्हीं कुछ मरीज़ों में जैक और रैशेल हैं.

    2013 में उनके रिसर्च की पहली किस्त छपी. इसमें उन्होंने एसपीडी की जड़ें दिमाग़ में तलाशने की कोशिश की थी. उन्हें पता चला था कि इस बीमारी के शिकार लोगों का दिमाग़, आम लोगों के दिमाग़ से अलग होता है.

    दिमाग के इस हिस्से की मदद से हम आवाज़, रोशनी और छुअन को महसूस करते हैं. एसपीडी से पीड़ित लोगों के दिमाग़ का यही हिस्सा कम विकसित था.

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    2014 में आए रिसर्च के दूसरे हिस्से ने एक और बात साफ़ की कि एसपीडी का सीधा ताल्लुक़ ऑटिज़्म नाम की बीमारी से होता है. क्योंकि 90 फ़ीसद मरीज़ों में ऑटिज़्म के लक्षण पाए गए.

    एलिसा मार्को ये बात पक्के तौर पर जानना चाहती थीं कि क्या ऑटिज़्म का ताल्लुक़ एसपीडी से है. या फिर एसपीडी के शिकार लोगों का ऑटिज़्म की बीमारी होना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है.

    यूं तो एलिसा और मिलर अपने तजुर्बों से काफ़ी ख़ुश थीं, मगर ज़्यादातर अमरीकी डॉक्टर उनके नतीजों पर भरोसा करने को राज़ी नहीं थे. इनमें कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के कुछ सीनियर वैज्ञानिक भी थे.

    ऐसे ही लोगों में से एक हैं प्रोफेसर थॉमस बॉयस. वो ये तो मानते हैं कि एसपीडी जैसी कोई चीज़ तो है. मगर ये एक बीमारी है, इसको लेकर वो मुतमईन नहीं. वो ये कहते हैं कि शायद मुझे इस बारे में अभी पूरी समझ नहीं.

    autism aur sensitive processing disorder

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    वैसे किसी ख़ास चीज़ से परेशानी नई बात नहीं. बहुत से बच्चे रोशनी या आग या शोर-गुल से घबराकर चीखने लगते हैं. एक सर्वे के मुताबिक़ सोलह फ़ीसद बच्चे ऐसी परेशानी की शिकायत अपने मां-बाप से करते हैं.

    हालांकि उम्र बढ़ने के साथ उनकी ये दिक़्क़त दूर हो जाती है. लेकिन, जैक और रैशेल जैसे लोग भी हैं, जो अपने एहसास से बेहाल रहते हैं.

    जैक की मां लोरी, उनके पति और बेटी ने तो तय किया है कि वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे या कहेंगे जिससे जैक को परेशानी हो. उसकी बातों को वो ध्यान से सुनते हैं. जैक की पढ़ाई भी अब घर में ही हो रही है.

    असल में हमारे एहसास, हमें बाक़ी दुनिया से रूबरू कराते हैं. वो हमें दुनिया दिखाते हैं. आवाज़ें सुनाते हैं. छुअन को महसूस कराते हैं. होता ये है कि हमारा दिमाग़ इन संकेतों को पकड़कर इसे हमें महसूस कराता है.

    कुछ लोगों को दूसरों को ख़ुश या परेशान देखकर उनके सुख-दुख का एहसास हो जाता है. कॉमेडी सीरियल देखते वक़्त लोगों को हंसते देखते हैं तो आप भी हंस पड़ते हैं. आस-पास कोई तकलीफ़ में हो तो आपको उससे हमदर्दी हो जाती है.

    autism ka dukh

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    एलिसा मार्को ऐसे लोगों को ऑर्किड बुलाती हैं. उनको ज़रा सी बात चुभ जाती है. वे दुख भरी ख़बर सुनकर रोने लगते हैं. कोई मज़ेदार सीरियल देखते वक़्त उनकी हंसी है कि रुकती ही नहीं. उन्हें पार्टियों से ज़्यादा क़िताबों का शौक़ होता है.

    अमरीकी मनोवैज्ञानिक एलेन आरोन कहती हैं कि संवेदनशील लोग, भावों को ज़्यादा गहराई से नापते हैं. बातों या चीज़ों को लेकर वो बहुत संवेदनशील होते हैं. दूसरों से उन्हें तुरंत हमदर्दी हो जाती है.

    ऐसे बेहद संवेदनशील लोगों के बारे में एलेन के तजुर्बे से एक बात सामने आई है. वे किसी भी हालात को आराम से समझते हैं. तब उस पर कोई प्रतिक्रिया देते हैं. वो आस-पास के माहौल को लेकर भी काफ़ी चौकन्ने रहते हैं. उनके ऊपर दूसरों के मूड तक का असर पड़ता है. एलेन कहती हैं कि दुनिया के बीस फ़ीसद लोग ज़्यादा संवेदनशील होते हैं.

    एलेन की तरह कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के थॉमस बॉयस भी मानते हैं कि बच्चे दो तरह के होते हैं. एक तो वो जो हर माहौल में ढल जाते हैं. मज़े करते हैं. दूसरे वो बच्चे, जिन्हें आगे बढ़ने के लिए एक ख़ास माहौल चाहिए.

    over sensitive autism mri

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    पर एक सवाल वहीं का वहीं है, कि आख़िर एसपीडी के शिकार लोग कहां फ़िट बैठते हैं? एलिसा मानती हैं कि एसपीडी पीड़ित असल में थॉमस बॉयस के तजुर्बे वाले ऑर्किड हैं. वे भावों को मुश्किल से समझते हैं. मगर एक ख़ास माहौल में वो तेज़ी से फलते-फूलते हैं.

    लोगों में सेंसिटिव प्रॉसेसिंग डिसऑर्डर का पता लगने के बाद अगला क़दम उनके इलाज का होता है. इसका मक़सद उनके एहसास कम करना नहीं होता. बल्कि कोशिश ये होती है कि आम माहौल में वो कम तकलीफ़ के साथ रह सकें. ज़िंदगी में आगे बढ़ सकें.

    एसपीडी पीड़ितों का इलाज दवाओं के साथ ही साथ कंप्यूटर गेम वग़ैरह से भी किया जा रहा है. ख़ुद एलिसा मार्को ने इवो नाम का एक खेल तैयार किया है. हालांकि अभी ये बाज़ार में नहीं आया है. लेकिन, जैक ने ये गेम ख़ेला था. उसकी मां लोरी बताती हैं कि इसके बाद उसके बर्ताव में काफ़ी बदलाव आया है.

    फिलहाल तो एसपीडी पर काम कर रहे रिसर्चर और इसके शिकार लोग, इसे एक बीमारी का दर्जा दिलाने, इसके बारे में लोगों को जागरूक करने में जुटे हैं.

    (मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.

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