कुल 22 समाचार

  • 22 Jan
    eWellness Expert

    याददाश्त ऐसे बढ़ाई जा सकती है

     

    memory power

     

    किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने में एवं उस व्यक्ति को कामयाबी दिलाने में उसकी स्मरण शक्ति का बहुत बड़ा हाथ होता है। जिस व्यक्ति की स्मरण शक्ति बहुत हीं कमजोर हो जाती है उसे अपने जीवन में बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है। किसी भी कारण से अगर आपकी याददाश्त कमजोर हो गई है तो कुछ प्राकृतिक तेल आपकी स्मरण शक्ति को वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इनके बारे में विस्‍तार से इस लेख में जानें।

    रोजमेरी का तेल

    रोजमेरी तेल का तेल स्‍मरण शक्ति को बढ़ाने में बहुत ही प्रभावी है। इस तेल को दौनी के पत्तों से निकाला जाता है जिसमें बहुत हीं औषधीय गुण होते हैं। इसमें मष्तिष्क की शक्ति बढ़ाने के गुण होते हैं जिसकी वजह से इसे ब्रेन टॉनिक भी कहा जाता है। इसकी तीखी खुशबू की वजह से लोग इसे खाना पकाने के काम में भी लाते हैं। इसकी तीखी खुशबू मष्तिष्क को उत्प्रेरित करती है जिसकी वजह से दिमाग की कार्यक्षमता और एकाग्रता बढ़ती है।

    मछली का तेल

    मछली को दिमाग का आहार माना जाता है क्योंकि उसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है। ओमेगा 3 फैटी एसिड मष्तिष्क के लिए बहुत जरुरी हैं एवं इनके सेवन से आपका दिमाग तेज होता है और स्मरण शक्ति बहुत हद तक बढ़ जाती है।

    अलसी का तेल

    अलसी के तेल यानी फ्लैक्स सीड में भी ओमेगा 3 फैटी एसिड पाया जाता है। इसके सेवन से भी मछली के तेल जितना हीं फायदा मिलता है। अलसी का तेल आपकी एकाग्रता बढ़ाकर स्‍म‍रण शक्ति को तेज करता है। इसके सेवन से सोचने और समझने की क्षमता भी बढ़ती है। इसका नियमित सेवन करने से मानसिक विकार भी नहीं होता है।

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  • 05 Jan
    eWellness Expert

    सेलुलर एंटी एजिंग थेरेपी

    cellular anti-aging therapy

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    कई बार आप काम करके लौटते हैं, तो अपने आप को बेहद थका हुआ पाते हैं। ऐसा महसूस होता है कि शरीर में वह ताकत और ऊर्जा नहीं रही, जो युवावस्था में थी।
    साथ ही आपकी मानसिक व बौद्धिक क्षमता और त्वचा की चमक व कसाव भी कम होती जाती है।
    वास्तव में ये शरीर में उम्र के बढऩे के साथ साथ होने वाले परिर्वतन हैं, जिन्हें एजिंग प्रोसेस कहते हैं, जो शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करते हैं।
    एजिंग प्रक्रिया के लक्षण जल्दी थक जाना या पूरे शरीर में थकावट महसूस करना।
    चिड़चिड़ापन व जोड़ों में दर्द रहना। हृदय, किडनी और फेफड़ों की कार्य-क्षमता में कमी आना। त्वचा पर झुर्रियां पडऩा कार्यक्षमता में कमी आना।

    क्या है एजिंग ?
    वास्तव में मानव शरीर अरबों कोशिकाओं (सेल्स) से निर्मित होता है। साथ ही, इसमें टिश्यू रीजनरेशन (पुनर्निर्माण)की असीम क्षमता भी होती है, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में लगने वाली चोटें, बीमारियां और मानसिक तनाव जैसे आघात इन सेल्स को नष्ट करते रहते हैं।
    जब शरीर इन नष्ट हुई कोशिकाओं का पूरी तरह से पुनर्निर्माण नहीं कर पाता है, तब एजिंग प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
    वास्तव में यह एजिंग प्रक्रिया कोशिकाओं में मौजूद टेलोमियर नामक डीएनए कैप के छोटे होने से होती है, जिसका प्रतिकूल असर सबसे ज्यादा त्वचा और फेफड़ों की कोशिकाओं पर पड़ता है। Read more....

     

  • 03 Jan
    eWellness Expert

    अधिक तनाव से थायराइड

    tension from thyroid

    विश्व में करीब 20 करोड़ लोग थाइरायड संबंधी विकारों से पीडि़त हैं और उनमें से करीब 4.2 करोड़ भारत में हैं। भारत की अग्रणी डायग्नोस्टिक चेन एसआरएल डायग्नोस्टिक्स के सर्वे के मुताबिक, विश्व में करीब 20 करोड़ लोग थाइरायड संबंधी विकारों से पीडि़त हैं और उनमें से करीब 4.2 करोड़ भारत में हैं।

    थाइरायड संबंधी रोगों की एक वजह तनाव भी है। एसआरएल द्वारा थाइरायड विकारों के लिए जांचे गए 20 लाख से अधिक नमूनों में से करीब 25.3 फीसदी में टीएसएच का स्तर असामान्य पाया गया। पुरुषों (24 फीसदी) के मुकाबले महिलाओं (26 फीसदी) में यह स्तर अधिक संख्या में असामान्य पाया गया।

    इन आंकड़ों का विश्लेषण करने पर खुलासा हुआ कि असामान्य टीएसएच स्तर के सबसे अधिक मामले देश के पूर्वी हिस्से (कुल नमूनों के 27 फीसदी) में हैं। इसके बाद 26 फीसदी के साथ उत्तर भारत का नंबर आता है।

    वहीं, दक्षिण और पश्चिमी भारत के लिए टीएसएच असामान्यता का यह आंकड़ा काफी कम 22-22 फीसदी रहा। फोर्टिस लैब्स की निदेशक डॉ. लीना ने कहा कि अब समय आ गया है कि लोगों के बीच जाकर उन्हें थाइरायड विकारों की वजह, लक्षणों, इलाज और समय पर उनकी जांच के महत्व के बारे में बताया जाए।

    उन्होंने कहा कि एसआरएल डायग्नोस्टिक्स के पास मौजूद देशव्यापी आंकड़ों में देश के विभिन्न हिस्सों और शहरों में रहने वाले पुरुषों और महिलाओं, चाहे वे किसी भी पेशे या सामाजिक-आर्थिक वर्ग से संबंध रखते हों, के जांच नतीजे शामिल थे। उन्हीं नतीजों का विश्लेषण किया गया।

    उन्होंने बताया कि थाइरायड संबंधी समस्याओं में थाइरॉयड (गले के पास एक ग्रंथि) से हॉर्मोन का असामान्य उत्पादन होता है। इस हॉर्मोन के अधिक उत्पादन की स्थिति को हाइपरथाइरॉयडिज्म कहते हैं। जबकि थाइरायड का उत्पादन कम होने से हाइपोथाइरायड होता है। विस्तार से पढ़ें ....

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  • 03 Jan
    eWellness Expert

    सोच अच्छी तो सेहत अच्छी

    girl thinking

    चाहे -अनचाहे जाने- अनजाने ये नकारात्मक विचार और व्यवहार आ धमकते हैं । अपने विचार एवं सोच बदलिये और सेहत को बदलते देखिये...

    - डॉ. मोनिका शर्मा

    अनमना सा मन और थका सा तन। आजकल हर किसी की शिकायतों का हिस्सा है। अगर आप के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है तो अपने विचारों की लगाम थामिए। आपके मन जीवन में इनके दख़ल पर काबू पाइए क्योंकि ये आते तो शांत भाव से हैं लेकिन अगर सकारात्मकता ना लिए हों तो मन मस्तिष्क के हर भाव को कोलाहल में बदल देते हैं। कहते हैं कि गर्भावस्था में माँ जो सोचती है जैसा विचार करती है विचार बच्चे पर बहुत असर डालते हैं। बच्चे की सोच और व्यक्तित्व पर इसका गहरा असर पड़ता है। ऐसा है तो हम सब समझ ही सकते हैं कि हमारे अपने विचार हमारी शारीरिक और मानसिक सेहत पर कितना असर डालेंगें ? चाहे -अनचाहे जाने- अनजाने ये नकारात्मक विचार और व्यवहार आ धमकते हैं। तो फिर देरी क्यों ? अपने विचार एवं सोच बदलिए और सेहत को बदलते देखिए।


    समझिए स्वस्थ होने के सही मायने-

    आमतौर पर माना जाता है कि अगर कोई बीमार नहीं वो स्वस्थ ही है। लेकिन बीमार होकर बिस्तर ना पकड़ने भर का नाम स्वस्थ होना नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक स्वस्थ होने का मतलब मात्र रोगों का अभाव नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की स्वस्थता की सकारात्मक अवस्था है। यदि इस परिभाषा को आधार बनाया जाए तो हमारे आस-पास बहुत से लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के हालात काफी चिंताजनक है। इसके लिए कई सारे कारणों के साथ एक बड़ा कारण है विचारों का स्वस्थ ना होना भी है। विशेषज्ञों की मानें तो अगर आपका दिमाग स्पष्ट और स्वस्थ होने के साथ-साथ उसमें किसी तरह का तनाव नहीं है तो आप स्वस्थ हैं। लेकिन आज की तनाव और जद्दोज़हद भरी जि़ंदगी में यह संभव ही कहाँ है ? क्योंकि मन तो हर वक्त किसी ना किसी उलझन में डूबा ही रहता है। तकनीक और अति संवाद के दौर में ये समस्याएं कुछ और बढ़ गई हैं। ऐसी ही उलझनों और असहजता से जूझने की शक्ति देते हैं पॉजिटिव विचार। क्योंकि सकारात्मक विचारों का प्रभाव हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बराबर पड़ता है।

    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का प्रसिद्ध कथन है कि इंसान वैसा ही बनता जाता है जैसे उसके विचार होते हैं। यह बात बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी पर समान रूप से लागू होती है। स्वास्थ्य सलाहकार भी मानते हैं कि जब हम निराश और कुंठित महसूस करतेे हैं तो सिरोटोनिन नामक रसायन का स्त्राव कम हो जाता है। इस रसायन से हमारे मन के अच्छे बुरे भावों से सीधा संबंध है। इसकी कमी अवसाद और असामाजिक व्यवहार को जन्म देती है। इसीलिए ज़रूरी है कि मन में ऐसे भावनाओं को स्थान ही ना मिले जो मानसिक स्वास्थ्य को पॉजिटिव ढंग से प्रभावित करें। सकारात्मक विचार तन-मन को स्वस्थ रखने में अहम भगीदारी निभाते हैं। जबकि उत्साहहीनता, खिन्नता और दुर्बलताओं के विचार हमें तन-मन दोनों के स्तर पर बीमार करते हैं। यूं भी नकारात्मक विचार केवल एक अकेले इंसान को नहीं घेरते बल्कि उसके पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी बड़ा बदलाव ला देते हैं। नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति अपने परिवेश में ऐसा नकारात्मक माहौल बना लेते हैं जो उनके
    साथ-साथ उनके अपनों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालता है।


    सकारात्मक ऊर्जा का सम्बल -

    मन के भीतर की सकारात्मक वैचारिक ऊर्जा बड़ी से बड़ी समस्याओं को हल करने की राह सुझाती है। जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी खुद को दृढ़ता और संयम के साथ थामे रखता है ये सकारात्मक ऊर्जा का यह प्रवाह। इसीलिए मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि अगर बीमार भी है तो भी बीमारी की बात रोगी को कम से कम करनी चाहिए । किसी शारीरिक और मानसिक व्याधि को बार बार याद करना भी नकारात्मकता लाता है। आज के दौर में जब दिल और दिमाग को स्वस्थ और तनाव मुक्त रखना मुश्किल होता जा रहा है। विचार प्रवाह की दिशा को समझना ज़रूरी है। सही और सार्थक सोच के ज़रिए ही तनाव को कम किया जा सके तो जीवन काफी बेहतर हो सकता है। सकारात्मक चिंतन की अनमोल सौगात जीवन को अर्थपूर्ण दिशा दे सकती है। सकारात्मक सोच से चाहे कार्यक्षेत्र की समस्याएं हों या पारिवारिक परेशानी, हर जगह सफलता पाना संभव है। सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्मविश्वास के बलबूते पर हर काम किया जा सकता है। विचारों की संगति का प्रभाव जीवन की उन्नति पर भी पड़ता है। सकारात्मक सोच आक्रामता को दूर कर विचारों को दृढ़ता देती है। जिसकी आज के दौर में बहुत अधिक आवश्यकता है। तभी तो सम्पूर्ण स्वास्थ्य की बात होती है तो हमारी मेंटल हैल्थ का भी जि़क्र होता है। ऐसे में हम स्वयं समझ सकते हैं कि हमारे विचार, हमारी सोच, मानसिक स्वास्थ्य पर कितना प्रभाव डालती होगी? विचारों की इस नींव का आधार अगर सकारात्मक हो, तो संपूर्ण स्वास्थ्य पाया जा सकता है।


    सकारात्मक विचार अच्छे स्वास्थ्य का आधार -


    कई वैज्ञानिक सिद्धांत भी यह साबित करते हैं कि हम काफी हद तक अपने विचारों के ज़रिये ही स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे विचार शारीरिक और भावनात्मक सेहत पर गहरा असर डालते हैं। सकारात्मक सोच का सबसे बड़ा परिणाम ये होता है कि यह सोच एक 'इजी गोइंग' लाइफ स्टाइल से रूबरू करवाती है। इसीलिए कहा भी जाता है कि इत्मीनान और विश्वास से किसी काम को अंजाम देना हो तो मन में नकारात्मक विचारों को स्थान ही नहीं मिलना चाहिए। आत्मविश्वास तो वो स्व उपार्जित मानसिक शक्ति है जो हर परिस्थिति में आपको स्वाधीन बनाये रखती है। अपनी ऊर्जा का सही और सधा प्रयोग करने की संतुलित सोच देती है। यूँ भी अपनी योग्यता और क्षमता का पूर्ण प्रयोग करने के लिए पॉजिटिव सोच का साथ आवश्यक है। कहते हैं कि आत्मिक शक्तियों का आदर करने का सबसे अच्छा तरीका खुद को आत्मविश्वासी बनाए रखना ही है। इसी आत्मविश्वास का आधर बनते हैं हमारे सकारात्मक विचार। इस बात से सभी इत्तफाक रखते हैं कि पॉजिटिव थिंकिंग मन और शरीर दोनों को स्वस्थ रखती है। अपने मनोबल और उत्साह को बनाये रखने के लिए नकारात्मक भावों से बचना बेहद ज़रूरी है। सकारात्मक सोच की सिफत इतनी ही है यह हमें हर सफलता के लिए आश्वस्त करने को काफी है। ऐसे विचारों से कार्यों की सफलता और संपादन दोनों के लिए भरोसा मिलता है। जो अंतत हमारी कार्यक्षमता को बढ़ाता है। बिना दबाव और तनाव के हम अपनी जिम्मेदारियों को निर्वहन करना सीखते हैं।

    समझिए विचारों की प्रक्रिया -

     

    विचारों की प्रक्रिया को समझने के लिए उनका पीछा करना होगा। समझना होगा कब और कैसे विचार मन मस्तिष्क में उपजते हैं और हमारा व्यवहार उन्हीं के अनुरूप हो जाता है। इसी रास्ते पर आप ख़ुद समझ जायेंगें कि आपकी सेहत पर भी असर पड़ रहा है। डॉ. दीपक चोपड़ा के मुताबिक ' सोचना ब्रेन केमिस्ट्री का अभ्यास है' हमारे मस्तिष्क में करीब 60,000 विचार रोज़ जन्मते हैं। जिनमें से अधिकतर दोहराये ही जाते हैं। इनमें से वास्तविक विचारों को चुनें और नकारात्मक और चिंताजनक विचारों के दोहराव पर काबू पाएं। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिवरपूल ने नेगेटिव और पॉजिटिव विचारों को लेकर किये शोध के मुताबिक नकारात्मक विचारों की लगातार हावी होना दिमाग की सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन के अध्ययन के अनुसार भी हमारे दिमाग में आने वाले विचारों में से 70 प्रतिशत से 80 प्रतिशत विचार नकारात्मक ही होते हैं। इसलिए जरूरी है कि कभी तथ्यों तो कभी कल्पनाओं के आधार बनाकर मन पर कब्जा जमाने वाले नकारात्मक से हर हाल में बचा जाए। ऐसे में पॉजिटिव मेमोरीज को याद करना शरीर और मस्तिष्क दोनों की सेहत संवारता है। ऐसी सोच संतोष का भाव साथ लाती जो उदासी, तनाव और पीछे छूट जाने के ख़यालों से मुक्त करती है। इतना ही नहीं सकारात्मक विचार आगे बढ़ने की भी प्रेरणा देते हैं।

    ज़रूरी है इमोशनल वेलनेस


    हमारे इमोशंस हमारे इम्यून सिस्टम को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। जो कि विचारों से जुड़े होते हैं। इससे जुड़े कई शोध भी अब सामने आ रहे हैं। जो बाते हैं की फील गुड फैक्टर बहुत ज़रूरी है। इसीलिए डॉक्टर को हमेशा अपनी इमोशनल हेल्थ के बारे में भी बताएं। आप खुद भी इसे समय रहते समझें क्योंकि अंदरूनी उलझनों से बाहरी बदलाव भी दिखने लगते हैं। ध्यान रहे कि विचारों की उथलपुथल केवल मन के भीतर ही नहीं कई तरह के शारीरिक बदलावों का भी कारण बनती है | ऐसे लोगों की बड़ी संख्या होती है जिसमें बढ़ता वजन ही बता देता है कि विचार भार बन रहे हैं। यादाश्त कम होने लगती है। कई तरह के भय मन को घेरने लगते हैं। जिनमें बहुत से डर तो ऐसे होते हैं जिनका कोई आधार ही नहीं होता। हमारे विचारों की उलझन ही उन्हें जन्म देती है। साथ ही नींद ना आना और अवसाद का बढना भी। अनिद्रा की बीमारी से तो आज करीब एक तिहाई आबादी ग्रस्त है। एक अध्ययन के मुताबिक ये विचारों के ज़रिये ही तनाव भी इंसानी मन मस्तिष्क को घेरे रहता है। ऐसे में इस तनाव का सामना ना कर पाने वाले करीब 25 फीसदी दूसरों की तुलना में ज्यादा बीमार पड़ते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक कैंसर सहित कई बड़ी बीमारियों में से 80 फ़ीसदी इंसानी मन और उसके व्यवहार से ही जुड़ी हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि विचारों से उपजी उलझनें केवल मनोवैज्ञानिक तकलीफें पैदा करती हैं। लेकिन सच तो यह है कि तकलीफें सीधे-सीधे शरीर पर भी असर डालती हैं।


    महिलाएं अधिक गिरफ्त हैं -

    आमतौर पर देखने में आता है कि महिलाएं कई मानसिक उलझनों में फंसी रहती है। उनका मन अजब-गजब विचारों में डूबता रहता है। गृहिणी है तो भी और कामकाजी है तो भी। इसीलिए वे इस वैचारिक प्रक्रिया बदौलत उपजने वाली समस्याओं का अधिक शिकार बनती हैं। माना जाता है कि हमारी सोच और हमारा व्यवहार हमेशा किसी प्रतिक्रिया की उम्मीद में रहते हैं इसलिए उनसे कई सारे डर भी जुड़े रहते हैं। इस भय से महिलाएँ अक्सर जूझती हैं। जिसके चलते शारीरिक ही नहीं कई मानसिक समस्याओं का भी शिकार बनती हैं। अपने विचार या उन विचारों से जुड़ी सामाजिक-पारिवारिक प्रतिक्रियाओं को लेकर वे जो चिंता और बेचैनी झेलती हैं उसी के चलते महिलायें मोटापा, हार्ट अटैक, अनियमित मासिक धर्म और ओस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों का शिकार बन रही हैं। हैरानी की बात है कि कई बार उनकी चिंता और अंदेशे बिलकुल आधारहीन होते हैं लेकिन विचारों की नकारात्मकता उन्हें इस सोच से घेरे रहती है। ज़रूरी है महिलायें भी इस वैचारिक प्रक्रिया का आधार समझें और ख़ुद को नकारात्मकता के फेर में ना पड़ने दें।

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  • 03 Jan
    eWellness Expert

    सकारात्मक सोच से ही मिलेगी सफलता

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