कुल 30 कहानियाँ

  • 19 Feb
    Oyindrila Basu

    मुनिबा मज़ारी- एक जीती जागती अनुप्रेरणा।

    Muniba Mazari

    "मैं निःसंदेह ये स्वीकारती हूँ कि मैं मेरे शरीर की वजह से कैद हूँ, पर मेरा मन आज़ाद है, और मेरी आत्मा भी, मैं अब भी बड़े सपने देख सकती हूँ.....", मुनिबा मज़ारी।

     

    आज पाकिस्तान की "आयरन लेडी" अपने ३ साल के बेटे के साथ एक खुशहाल ज़िन्दगी बिता रही है, पर पिछले सात साल की लड़ाई आसान नहीं था। २८ साल की मुनिबा, जब वे २१ साल की थीं, तब एक कार क्रैश का शिकार हो गई थीं ।

     

    पर इस खूबसूरत महिला ने इस हादसे से अपने जज़्बे को टूटने नहीं दिया, और तब से आज तक का उनका विकास एक सफर जैसा है, जबकि उनका कद तकनीकी रूप से सीमित हो चुका  है।

     

    मैं जैसा बता रही हूँ, बात उतनी सीधी नहीं थी, लेकिन मुनिबा खुद उस एक्सीडेंट को एक दिन की घटना की तरह मानती हैं, और हम उनके इस नज़रिये को सलाम करते हैं।

     

    "मेरे कलाई की हड्डी टूटी हुयी थी, कंधे की भी... और हॉस्पिटल जाते वक़्त ही मुझे एहसास था कि मेरा आधा शरीर टूट चुका है, और आधा paralyzed  हो चुका है..... एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में भटकने के बाद, कराची में एक हॉस्पिटल ने मेरी जांच की, वहां मैं ढाई महीने तक थी, जीने की कोई वजह नहीं थी, मेरे ३ बड़े और २ छोटे ऑपरेशन हुए", ऐसा मुनिबा खुद बताती हैं।

     

    जब वे घर आई, तब भी सुधार कुछ नहीं था, उन्हें बिस्तर से बाँध दिया गया था, और एक व्हील चेयर थमा दिया  गया था, पर उन्होंने ठान ली थी, की वह किसी पर निर्भर नहीं होंगी, अपनी ज़िन्दगी खुद की शर्तों पर जियेंगी। 

     

    जब सब ने उनका साथ छोड़ दिया था, तो कला ने उन्हें सम्हाला। हॉस्पिटल के दिनों में भी, वे चित्र बनाने लगी थी, और इन चित्र के रंगों ने, उनकी बेजान ज़िन्दगी को थोड़ा सा ज़िंदादिल बनाये रखा। आज वह पहली व्हील-चेयर से जुडी महिला कलाकार हैं। कंटेंट राइटर के काम से भी उन्हें वह संतुष्टि नहीं मिल रही थी, जो उन्हें सामाजिक कार्य करने में मिला ।

     

    हमारे समाज में विकलांग या शारीरिक रूप से दुर्बल लोगों को एक कमज़ोरी का प्रतीक बना के दर्शाया जाता है, उनसे हमदर्दी की जाती है, और ये बात मुनिबा को हरगिज़ गवारा नहीं था। ऐसे ही विकलांग बच्चों को समाज में सही जगह दिलवाने के लिए वे संस्थाओं के साथ जुड़ गयीं।

     

    "हम भी इंसान हैं, हम भी आप की तरह सांस लेते हैं, हमें सहारे की ज़रूरत नहीं है, हम अपनी ज़िन्दगी खुद जीने के काबिल हैं, और हमें वह जीने दें", मुनिबा मज़ारी।

     

    टोनी&गाए के लिए वे ब्रांड एम्बेसडर बनी, और आज वे दुनिया की पहली व्हील-चेयर से जुड़ी, मॉडल हैं। और कुछ ही दिनों में, वे व्हील-चेयर से जुड़ी पहली टीवी संचालक भी बनने वाली हैं।

    और वे अपनी स्थिति से खुश हैं। सराहने वाली बात है, की उन्होंने अपनी कमज़ोरी को अपनी ताक़त बना ली है ।  उनकी हिम्मत और सकारात्मक चिंता को हमारा सलाम। उन्होंने कभी न रुकने की ठान ली है...

    "व्हील-चेयर बहाना नहीं हो सकता, जिससे मैं कोई काम न करूँ," ऐसा वह कहती हैं।

     

    हालातों से मुक़ाबला करके, खुश रहना, ज़िन्दगी का आनंद उठाना यह सब  मज़ारी हमें समझाती हैं।

    ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है, छोटी छोटी चीज़ों का मलाल रखने से हमें कुछ हासिल नहीं होगा। सच कहती हैं, मज़ारी, अपनी कमज़ोरी को ताक़त बनाने की कला आप सीख गये, तो आकाश आपकी मुट्ठी में है..... जियें, खुश रहें, हर पल का मज़ा उठाएं, और अपनी क्षमता को निखरने का मौका दें ।

     

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    चिंता

    chinta kya hai aur isse kaise nipten

    लोग हर समय तनाव और चिंता की बातें करते रहते हैं। हालाँकि उनमें से काफी लोग जब अपने घर जाते हैं और अपने परिवार, मजेदार दोस्तों या अपने शौक में व्यस्त हो जातें हैं तो अपने तनाव को भूल जातें हैं। ऐसा मेरे साथ नही था। मैं हरसमय चिंता किया करता था। हर सुबह अख़बार की तरफ देख कर मैं भयभीत हो जाता था। सभी प्रकार के अपराध,  मौत और दुःख के समाचार अख़बार में होते थे। मैं भयभीत हो जाता था। जब मैं अपने परिवार और दोस्तों से मिलता था, मैं उनके बारे में चिंता करता था। जब मैं पढ़ने बैठता था तो रिज़ल्ट की चिंता करता था।

    मैंने ये सोचना शुरू किया की मेरे साथ कुछ गलत हो रहा है। मैं हमेशा से ऐसा नही था। मेरे साथ ऐसा क्या हुआ? मुझे माँ की मृत्यु से पूर्व के समय का ज्यादा याद नहीं है।  माँ  पिताजी के स्वास्थ्य को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित रहतीं थीं, क्योंकि पिताजी काम के कारण बहुत ज्यादा यात्रा करते थे, जिसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता था। इसके साथ ,बदलता मौसम और भोजन ,कुछ संचार साधनों के जोखिमों को ध्यान नहीं देना माँ को घंटों विचारमग्न रखता था। वो हमेशा ये चिंता किया करतीं थीं की पिताजी की अनुपस्थिति में हम कैसे सुरक्षित रहेंगें।

    एक दिन मैं स्कूल से वापस घर आया तो दरवजा खुला हुआ था ,माँ अंदर जमीन पर लेटी हुईं थीं......... उनकी गर्दन पर किसी ने चाकू से वार किया था ।  कुछ चोर आये थे, और जब माँ ने उन्हें देखकर ज्यादा शोर मचाने लगीं तो उन्होनें माँ को मार दिया। .......... मैं इतना ज्यादा सहम गया था की मैं कई दिनों तक बोल नही पाया था। वह समय गुजर गया, पिताजी ने दोबारा शादी कर ली। मेरी नई माँ अच्छी है। कम से कम वह मुझे कोई हानि नही पहुचातीं।

    उन्होंने मुझसे कहा की मेरी जो भी चिंताएं हैं । उनके बारे में मुझे परामर्शक से बात करनी चाहिए। उन्होंने मुझे अपने एक मित्र का नाम सुझाया। यहाँ आकर मुझे अपने 'चिन्तात्मक विकार ' के बारे में पता चला, जो माँ की मौत से शुरू हुआ था। मेरे दिमाग में हर समय ये विचार चलता रहता था की यदि मैं चिंता नही करूंगा और सबका ध्यान नही रखूंगा तो वो सब भी माँ की तरह मुझे छोड़कर चले जायेंगें। धीरे -धीरे हमने परामर्श के माध्यम से मेरे विचारों पर काम किया और अब मैं कम चिंता करता हूँ। लेकिन अभी और आगे जाना बाकी है.............l

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  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    सोते समय चलना

    sote samay chalna

    मैं शांति का प्रतीक था। कोई भी घटना इतनी बुरी नही होती थी कि मेरा क्रोध नियंत्रण के बाहर हो जाय। हम गंभीर आर्थिक संकटों से गुजर रहे थे, और मैंने अपने माता पिता को खो दिया था। जाहिर है की मैं एक बच्चे की तरह रोया था लेकिन मैंने अपने आप को नियंत्रित किया और फिर से वापस ठीक से जीने लगा। हां मुझे अंदर से महसूस होता था लेकिन मैं ठीक से पढ़ने और काम करने में सक्षम था।

    मेरे घर पर अब  सिर्फ मैं, मेरे भैया और भाभी थे,मेरे माता पिता परलोक सिधार चुके थे। एक सुबह मैं उठा और मैंने पाया की मैं अपने बिस्तर पर नहीं बल्कि बरामदे की बेंच पर हूँ। मैं यहाँ कैसे आया? मैं पूरी तरह उलझा हुआ था। अगले दिन जब मैं उठा तो मेरे हाथ में एक चाकू था।

    मैं और मेरे भैया बहुत परेशान थे। उन्होंने बोला की मै आधी रात को उठ कर बाहर चला जाता हूँ। वह मेरी सुरक्षा के लिए डर गए थे। इसलिए उन्होंने दरवाजे पर डबल लॉक लगा दिया। बंद दरवाजे पर नाराज होकर मैंने रसोईं से चाकू उठा लिया। मेरे भैया ने उसे मेरे हाथ से लेने की कोशिश की ,पर उससे मै नाराज हो गया। तो उन्होंने मुझे आराम से बिस्तर पर चाकू के साथ लिटा दिया।

    पहले हमने सोचा कि यह काला जादू है या कुछ असाधारण हो सकता है ,पर बाद में हमने सोचा की चलो डॉक्टर को दिखा दे। हमे नींद से जुडी समस्याओं के मनोचिकित्सक के पास भेजा गया। उन्होंने बताया की यह सब शुरू हुआ है उन सभी तनावों की वजह से, जिनसे मैं गुजरा हूँ। साथ ही साथ शांत स्वाभाव का होने के कारण मैंने किसी से झगड़ा नहीं किया, इसीलिए यह इस तरह से बाहर आया।

    धीरे-धीरे, मैंने अपने सारे संदेह, भय और दुख प्रकट किये और फ़ूट-फ़ूट के रोया।  लेकिन मैं ठीक हो गया। मैं आराम से सोने लगा और धीरे धीरे मेरी- नींद में चलने की आदत बंद हो गई।                        

     

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    हमने खोया प्यार पाया

    khoya pyar kaise paye

    प्रेम मानव के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक है। मेरे प्यार की कहानी काफी खास है। वह एक लड़की थी जिससे मैं कॉलेज में मिला। कुछ  हिचकिचाते हुए मैंने उससे दोस्ती का प्रस्ताव रखा। जल्दी ही हम दोस्त बन गए और फिर एक संबंध में बंध गए।

    परिवार और करियर के सामान्य अवरोधों को पार करते हुए लगभग 30 वर्ष की उम्र में हमने शादी कर ली। धीरे -धीरे दैनिक जीवन की एकरसता और काम का दबाव हमारे जीवन में आने लगा।

    नए संबंधों की नवीनता हमारे साथ ज्यादा समय तक नहीं चली, न ही हमारा लक्ष्य  माता-पिता 'बनने का था। इन सब के साथ हम पूर्ण थे और अब भी हम सिर्फ दो ही थे।

    हमने सोचा,क्या है जो गलत है, हमारे पास एक बच्चा होना चाहिए। हमने यही किया ,और हमारे दो बच्चे हुए। कुछ समय के लिए हम इन सबमें व्यस्त हो गए ,लेकिन बाद में यह भी हमारे दिनचर्या का हिस्सा हो गया। यह अजीब था कि हमारे बीच शायद ही कभी लड़ाई हुई हो। हमारे बीच सिर्फ एक दूसरे के प्रति उत्साह और अंतरंगता की कमी हो गयी थी। मैं लालायित  रहता था हमारे जवानी के उन दिनों के लिए जब हम एक दूसरे को देखने के लिए बिलकुल इंतजार नही कर सकते थे।

    अब हमारे पास शायद ही कहने के लिए कुछ था। मैं ऑफिस में दूसरी युवा लड़कियों की तरफ आकर्षित हो रहा था। मेरे पुरुष मित्र मुझसे कहते कि ये एक समान्य बात है,और जब मैं ले सकता हूँ,तो मुझे एक मौका लेना चाहिए। जो मैं चाहता था उसे पाकर मैं दूर जा सकता। लेकिन मैं अपने प्यार में विश्वास करता था और इसे फिर से पाना चाहता था।

    मैं एक काउंसलर के पास गया। उसने मुझे बताया की कैसे एक माँ ,पत्नी और एक ऑफिस जाने वाली की भूमिका निभाते हुए मेरी पत्नी के ऊपर इतना तनाव हो जाता है कि उसके पास मेरे लिए मुश्किल  से कोई ऊर्जा बचती है।

    मैं अचम्भित था। कब मैं दूसरे ठेठ आदमियों की तरह बन गया? मैंने चीज़ों को बेहतर बनाने का संकल्प लिया। मैंने घर पर भाग लेना शुरू किया और बच्चों के पालन -पोषण में भी बराबर का भाग  लेने लगा।

    मैं अपनी पत्नी को काउंसलर के पास ले गया। और हमारे बीच बेहतर संवाद के लिए हम दोनों थेरेपी लेने लगे। अब सब कुछ पहले से बेहतर था लेकिन अब भी एक चीज़ की कमी थी -उत्साह की। हमने निर्णय किया कि यात्रा करने का सपना है जो हमे फिर से एक कर देगा।

    हमने एक बजट योजना बनाई और एक के बाद एक स्थलों को चुनते गए। पहले इंडियन स्थानों को फिर विदेशी स्थानों की। इन सब में कुछ यात्राओं पर हम बच्चों को भी ले गए और बाकी यात्राओं में सिर्फ हम दोनों ही थे। और इस प्रकार हमारे बीच प्यार फिर से जाग गया।

  • 29 Dec
    Shiva Raman Pandey

    दोस्त हमेशा अच्छे नहीं होते

    achhe dost ko pahchane

    मैं कॉलेज में  एक उज्ज्वल छात्र था। मैं ज्ञान की वास्तविक प्यास के साथ ज्यादा से ज्यादा लेक्चर्स  और  सेमीनार में उपस्थित रहता था। मेरे मन में एक घबराहट सी बनी रहती थी।

    इससे कोई फर्क नही पड़ता था की मैं कितना जानता हूं और मैंने कितनी कोशिश की। परीक्षा के समय मेरा दिमाग खाली हो जाता था। और फिर से मैं खराब रिजल्ट के साथ खड़ा रहता था।

    एक लड़का मेरे बगल में आकर खड़ा हुआ ,वह बोला कि उसे भी याद करने में परेशानी होती थी, और  किसी  ने उसे बताया कि यह सब दिमाग कि उस चिंता की वजह से होता है जो उसकी सीखी हुई चीज़ो को याद करने में परेशानी देती हैं, और फिर उसे एक दवा दी गई जो उसे शांत रखती है,जिससे वह अच्छी तरह से याद कर सके।

    मैं काफी हैरान था ! मेरी सभी समस्याओं का समाधान एक गोली है? मैं अगले दिन उसके घर गया ,वहाँ एक प्रकार की पार्टी चल रही थी। मैंने उससे पूछा कि या तो वह मुझे गोली दे या कम से कम उसका नाम लिख कर दे।

    वे सब मेरा मजाक बनाने लगे और मुझ पर हँसने लगे ,और मुझे पाउडर के जैसी कोई चीज दी गई, मैं तब इसे नही जानता था। लेकिन उन सब ने मुझे एक शक्तिशाली ड्रग के चंगुल में फंसा दिया था।

    दिन बीतने के साथ मुझे ड्रग्स की चाह बढ़ती गई ,पढ़ाई में मेरा प्रदर्शन काफी खराब होता गया और ड्रग्स की लत के कारण मैं घर से चोरी करने लगा।

    मैं भयभीत रहने लगा कि ये मैं क्या कर रहा हूँ? मैं इस अपराधबोध को कम करने के लिए और ज्यादा ड्रग्स लेने लगा, यह एक दुष्चक्र था और मैं इसमें फंसने लगा।

    एक दिन इन सबसे थक कर मैंने स्वयं को खत्म करना चाहा, उसी समय मेरी माँ वहां आ गई,उन्होंने दौड़कर मुझे गले लगा लिया और समझाया की हम मिलकर इसका हल निकालेगें। मुझे पुनर्वास केंद्र में भेजा गया।

    वहाँ का उपचार गतिविधियों पर आधारित रहता था और दवाइयाँ कम दी जाती थीं। मुझे एक अच्छे काउंसलर मिले जिन्होंने मेरी परेशानी को समझा और मुझे बताया कि मेरी मुख्य समस्या आत्मविश्वास की कमी और घबराहट है।

    हमने एक साथ इस पर काम किया और अब मैं ज्यादा बेहतर हूँ ।